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Sunday, 13 May 2018

आत्म कथा, प्यारी प्यारी है, ओ मां, ओ मां

व्याकुल पथिक
( आत्मकथा )

        प्यारी प्यारी है, ओ मां ,ओ मां...
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         कल शनिवार को वाराणसी से मीरजापुर के लिये रात्रि के 8 बजे ही बस मिल पाई। तब जा कर अखबार का बंडल लगा।  सो, कम से कम सवा 10 बजे रात्रि तक का समय शास्त्री सेतु पर ही टहल घुम कर मुझे बिताना है, यह तो तय ही था। ऊपर से जाम लगने का अज्ञात भय। बड़े भैया चंद्रांशु जी की कृपा से मिले, उन्हीं के मुसाफिरखाने पर कह कर आया था कि भाई थोड़ा सहयोग करना साढ़े 11 बजे रात्रि तक तो निश्चित ही आ जाऊंगा। चूंकि यूपी में जो सरकार इन दिनों है, वह मेरे नजरिये से नौकरशाहों की सरकार है। अफसर यहां पर नेताओं सा आचरण कर रहे हैं और जनप्रतिनिधियों को पब्लिक की तनिक भी चिन्ता नहीं है, वे अफसरों से पंगा नहीं लेना चाहते हैं। वहीं विपक्षी पार्टियों की इतनी हैसियत नहीं है कि उसके नेता ऐसे अधिकारियों से पंजा लड़ा सकें। ऐसे में हम जैसे श्रमिक वर्ग के लोग अच्छे दिन की चाहत में बेहद ही बुरे दौर से गुजर रहे हैं। मैं एक पत्रकार हूं, करीब ढ़ाई दशक से इस मीरजापुर में हूं। परंतु जीवन में ऐसे बुरे दौर कभी नहीं देखने को मिलें हैं । अमूमन रात में साढ़े 10 बजे तक का समय,इसी शास्त्री पुल पर अनेकों वाहनों के काले धुएं और धूल से दोस्ती निभाने में व्यतीत हो जाता है। ऐसे में मन का व्याकुल होना स्वाभाविक है। यह मानव स्वभाव है। ऐसी मनोस्थिति में कभी कभी अतीत की सुखद स्मृतियां इस पीड़ा के उपचार के लिये जीवन संजीवनी बन जाती हैं। मुझे ही देखें न मैं यहां मीरजापुर के शास्त्रीपुल से पल भर में ही कोलकाता के हावड़ा ब्रिज पर जा पहुंचता हूं। बचपन में मां से जिद्द कर अकसर ही नीचे मिठाई कारखाने के आफिस में बैठें घोस दादू   
के साथ हावड़ा ब्रिज की ओर निकल पड़ता था। कभी -कभी तो पैदल ही पूरा ब्रिज पार कर हावड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाया करता था या फिर ब्रिज से नीचे उतर चार पांवों वाले इस विशाल झुले को अपलक निहारता रहता था...   इसी बीच बंडल लेकर आ गयी बस मुझे झकझोर देती है कि कहां खोया है, यथार्थ तुम्हारे सामने यह अखबार का बंडल है। अब साइकिल उठाओं और अपने कर्मपथ पर बढ़ चलो। बचपन में पढ़ा है न कि वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

    वैसे ,आज तो मदर डे है। हमारे बचपन में मदर और फादर डे  को कोलकाता जैसे महानगर में भी लोग नहीं जानते थें। हां, हम बच्चे अपने प्रियजनों के जन्मदिन पर उन्हें भी कुछ उपहार देने की चाहत जरूर रखते थें। नियति की यह भी कैसी विडंबना है। जिसके पास तीन - तीन मां हो (नानी मां, मौसी मां और मम्मी तो है हीं )  , आज वह एक वक्त के भोजन से ही समय गुजर लेता है, मन ही नहीं होता रात्रि में खाने का।  खुद के हाथ से बने खाने में मां के भोजन जैसा मिठास ही कहां है।  जब भोजन की बात कर रहा हूं, तो याद आती है कि 12 वर्षें की उस अवस्था में मैंने  खाना बनाना भी तो मां से ही सीखा था। तब घर पर तीन लोग ही थें , मां , बाबा और मैं। मां की बीमारी बढ़ने लगी थी, फिर खाना कौन बनाये। सुबह देशबंधु के यहां से जलपान आ जाता था। दोपहरमें इटली- डोसा से हम काम चला लेते थें। परंतु रात में बिना पराठे के बाबा से रहा नहीं जाता था। शुद्ध देशी घी का पराठा और आलू का पराठा बाबा को पसंद था। ऐसे में मां ने ही बेड पर लेटे-लेटे मुझे आटा गुथना सिखाया था। हां पराठे बनाने में थोड़ी कठिनाई जरुर होती थी। सो, मुझे उसमें उलझा देख जब कभी लिलुआ वाली नानी जी यहां मां को देखने आ जाती थीं, तो वे मुझे चल हट किनारे बैठ , कह स्वयं ही पराठा बना देती थीं। उन्होंने अंतिम समय तक मां का साथ नहीं छोड़ा था। वे देर शाम लोकल ट्रेन पकड़ लिलुआ से आती थीं और रात्रि में जब बाबा ऊपर कमरे में आते थें, तब घर वापस जाती थीं। रात्रि के 12 तो बज ही जाते होगें उन्हें अपने घर लिलुआ पहुंचने में, परंतु काफी हिम्मती महिला थीं। इसी तरह से सादी सब्जी बनानी भी मैंने मां से ही सीख ली थी।
     शायद मां को यह आभास हो गया हो कि उनके बाद जीवन भर मुझे अपने ही हाथों का बनाया भोजन खाना है, इसिलिये तो उन्होंने मुझे खाना बनाने का बचपन में ही प्रशिक्षण दे दिया था , ताकि उनका मुनिया भूखा नहीं रहे ...
 
मां को आज के दिन और क्या कहूं कि

 तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है, प्यारी प्यारी है, ओ मां, ओ मां....

क्रमशः

(शशि) 13/5/18

9 comments:

  1. अदभुद सर ,दिल को छु जाते है विचार

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  2. आदरणीय शशी जी -- आपने बहुत ही मर्मान्तक लिखा \ आपने अपने बारे में स्पष्ट नहीं लिखा किअकेले रहने की नौबत क्यों आई | शायद अगली कड़ीयों में इसका खुलासा हो जाएगा | पर आपके एक एक शब्द में एक संवेदनशील और श्रमजीवी का मन मुखर हुआ है | माँ के स्नेह की यादें किसी भी इंसान के जीवन की अनमोल थाती होती हैं | हमारे भीतर के गाँव में इन यादों का रंग सदा हरा ही रहती है | मैं खुशकिस्मत हूँ मेरी माँ की छाया बरकरार है | पर असमय इस छाया से कोई वंचित ना हो | आपके शब्दों में एक इमानदार लेखन की झलक पाती हूँ | ईश्वर ने चाहा तो आपकी रचना यात्रा के सहयात्री शनै - शनै बढ़ते जायेगें | लिखते रहिये मेरी शुभकामनाये स्वीकार हो | सादर --

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    1. जी मैं अपने बारे में 17 मार्च से ही लिख रहा हूं। एक पत्रकार होने के कारण यहां इस शहर में हजारों लोग मंत्री, सांसद ,विधायक, व्यापारी, शिक्षक,डाक्टर और उनसे कहीं अधिक आम आदमी जिनके लिये मैंने ढ़ाई दशक तक खबरें लिखी हैं, सभी की इच्छा रही कि मैं अपने बारे में कुछ लिखूं, हमारे मित्रों का भी कहना रहा कि आपकी मृत्यु के बाद ऐसा कुछ होना चाहिए कि जिसकों समाज के समक्ष रखा जा सकें कि इस अर्थ युग में भी एक पत्रकार ऐसा भी था , जो कभी सत्ता, पैसा और ताकत के सामने झुका नहीं, स्वयं ही समाचार लिखना , पेपर का बंटल लाना और उसका वितरण भी रात के 11 बजे तक खुद ही करना, इससे मेरे मित्र, अधिकारी और राजनेता सभी मुझे काफी स्नेह देते हैं। यह मेरा काफी बड़ा परिवार है। मैं चाहता तो उस स्थिति में तब था और आज भी हूं कि पैसों की कमी न रहती, परंतु मैंने स्वयं ही यह कांटों भरा कर्मपथ चूना है। बस मित्रों के कहने पर मुझे कुछ समय निकाल ब्लॉग पर यह सब लिखना पड़ रहा है। परंतु लेखक बनने की क्षमता मुझमें नहीं है, क्यों कि भाषा पर उतनी पकड़ नहीं है,व्याकरण ज्ञान कमजोर है और सबसे बड़ी बात की समय नहीं है। फिर भी उत्साह बढ़ाने के लिये धन्यवाद आपकों, हर होता है कि आप सभी प्रवासी भारतीय अपनी पहचान अपनी संस्कृति और संस्कार बनाये रखने के लिये कितना संघर्ष कर रही हैं। काश !ऐसा अपने देश के जेंटलमैन भी करतें।

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  3. पहले से बहुत बेहतर दिख रहा है ब्लॉग |

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    1. करीब सवा पांच हजार जो लाइक वाली संख्या है, वह कैसे दिखे ब्लॉग , जैसा कि आपके दोनों ब्लॉग पर नजर आ रही है, कुछ प्रकाश डालने की कृपा करें।

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    2. आदरणीय शशि जी -- लाइक का तो पता नहीं पर leyout में जाकर आप पेज सख्या का बिकल्प जोड़ सकते हैं | धीरे धीरे ब्लॉग और भी बेहतर हो जाएगा |

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  4. आपकी बात से मुझे याद आया |आज ही मेरी माँ ने मुझे फोन पर कहा कि कितनी बनावट आ गयी है जमाने में पहले तो कभी माँ का दिन नहीं मनता था | क्या हमे अपनी माँ प्यारी नहीं थी ?

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  5. बिल्कुल ठीक कहती हैं, मुझे भी ऐसा ही लगता है कि मां यदि होतीं, तो यही कहतीं की क्या नाटक मचाया है,मैं थी तो शैतानी कर परेशान करता रहता था

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    1. हाँ वो दिन ही जीवन की यात्रा का अनमोल संबल बनते हैं | सादर --

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yes