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Wednesday, 29 July 2020

आत्माराम

   
आत्माराम

      उसके घर का रास्ता बनारस की जिस प्रमुख मंडी से होकर गुजरता था। वहाँ यदि जेब में पैसे हों तो गल्ला-दूध , घी-तेल, फल-सब्जी, मेवा-मिष्ठान सभी खाद्य सामग्रियाँ उपलब्ध थीं।लेकिन, इन्हीं बड़ी-बड़ी दुकानों के मध्य यदि उसकी निगाहें किसी ओर उठती,तो वह सड़क के नुक्कड़ पर स्थित विश्वनाथ साव की कचौड़ी की दुकान थी, क्योंकि कचौड़ियाँ छानते वक़्त कड़ाह से निकलने वाली शुद्ध देशी घी की सुगंध उसकी स्वादेन्दिय को बेचैन कर दिया करती थी।अपनी इस स्थिति से उसे बोध हुआ था कि संयमित व्यक्ति के उदर की अग्नि भी अनुकूल अवसर मिलते ही भभक उठती है।


   यहाँ सुबह से ही ग्राहकों के कोलाहल के बीच कोई कचौड़ी बेलने तो कोई छानने और खिलाने में व्यस्त दिखता । बड़े-से कड़ाह में कनस्तर भर घी उड़ेल दिया जाता और फ़िर कचौड़ी और जलेबी बनाने केलिए चार-पाँच सहायकों संग हलवाई लग जाते थे। इस दुकान पर कचौड़ी खाने में इलाके के रईस व्यक्ति भी अपनी शान समझते थे।


     माथे पर तिलक-चंदन लगाये बिल्कुल प्रथम पूज्य गणेश देवता जैसे लंबोदर विश्वनाथ साव दुकान के दूसरे छोर पर गद्दी संभाले ग्राहकों से पैसा बंटोरने में व्यस्त दिखते। वे अपने इस कार्य में ऐसे निपुण थे कि दुकानदारी के वक़्त सगे-संबधी भी सामने आ खड़े हों तो उसे न पहचान पाए, किन्तु साव की काक दृष्टि इतनी पैनी थी कि कोई भी ग्राहक बिना पैसा दिये भीड़ का लाभ उठा यहाँ से खिसक नहीं सकता था। दुकान के इर्द-गिर्द खड़े होकर अथवा अंदर मेज पर बैठ चटखारे ले कर कचौड़ी खाते लोगों को देख कर रजनीश बुदबुदाता -" काश! उसके जेब में कुछ पैसे होते, ताकि वह भी इन ग्राहकों की टोली में सम्मिलित हो पाता।"


      सुबह के नाश्ते में कचौड़ी-जलेबी बनारसीपन की पहचान है। कड़ाह में छन-छन कर तैयार होती कचौड़ियों को देख वह मन ही मन कहता - " आहा! कितनी बड़ी-बड़ी,लाल-लाल और फूली-फूली ये गरमागरम देशी घी की कचौड़ियाँ हैं। उसकी क्षुधा  बस दो-तीन कचौड़ियों में ही तृप्त हो जाती और यदि साथ में दो-चार रसभरी ये कुरकुरी जलेबियाँ मिल जाती,तो क्या कहना। उसे अपनी दीनता पर तरस आता । घर पर उसके लिए दो वक़्त की चार सूखी रोटियों से अधिक कुछ नहीं था। पर व्यवसायहीन व्यक्ति से तो हितैषी भी चाय-जलपान नहीं पूछते हैं, पेट की अग्नि बुझ जाए यही काफ़ी है। क्यों वह इस मिष्ठान की दुकान पर दृष्टि डालकर अपनी क्षुधा और इच्छाओं को भड़कने देता है ?


  ऐसे विचार आते ही, स्वादेन्द्रिय विद्रोह करे इससे पूर्व रजनीश तत्क्षण सावधान हो जाता और स्वयं से कहता-" बंधु ! सुनो न.. खाने दो उन्हें कचौड़ी-पकौड़ी..ज़नाब ! जब पेट खराब हो जाएगा,तो लोटा लिये दौड़ते फिरेंगे..।"


     फ़िर भी हृदय की ऐंठन जब कम नहीं होती, तो वह उसे यूँ समझाता- " सुनो भाई ! तुमने भी तो अपने ननिहाल में अन्नपूर्णा का अनादर किया था। याद करो कोलकाता के तिवारी बदर्स और देशबंधु की मिष्ठान दुकान को, ऐसे बड़े प्रतिष्ठानों के सामान भी तुम्हें नहीं पसंद थे। माँ-बाबा न मालूम कितना मनुहार कर तुम्हें मूंग की कचौड़ी और लुची खिलाया करते थे।  तुम तो काजू बर्फी खाने तक में नखड़े दिखाते थे। "


   ओह ! तो क्या अन्न के इसी तिरस्कार का परिणाम था कि बनारस में बचपन से लेकर इस शहर से नाता टूटने तक उसके जेब में इतने पैसे कभी नहीं हुये कि वह विश्वनाथ साव की दुकान पर सुबह कदम रख पाता ? यह संताप रजनीश के हृदय की शीतलता को जलन दे रहा था।


   किन्तु आज़ उसकी तब आँखें फटी की फटी रह गयी थीं,जब उसने अपने छात्र जीवन के एक सादगी पसंद अध्यापक को यहाँ खड़े हो उँगलियों से मसालेदार तरकारी वाला दोना चाटते देखा था। देखते ही देखते मास्टर जी आठ कचौड़ियाँ गटक गये थे और अब जलेबी की बारी थी। 


   वे उसे दर्जा छह में हिन्दी पढ़ाया करते थे। अजी ! पढ़ाना क्या,उससे अधिक तो अपने शिष्यों को 'सादा जीवन , उच्च विचार ' का उपदेश देते थे वे। उस समय यह वित्तपोषण विद्यालय नहीं था । सो, यहाँ के शिक्षकों को मामूली तनख़्वाह से अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींचनी पड़ती थी। उस दौर में ट्यूशन से भी कोई खास कमाई नहीं होती थी। उसे भलीभांति स्मरण है कि गाँव से शहर में नौकरी की तलाश में आये मास्टर जी ने इमली की चटनी संग चावल खाकर दिन गुजारे थे। उन्हें अपनी ही एमo एo; बीएड की डिग्री हृदय में शूल सी चुभन देती। उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारती और सवाल करती - "मूर्ख! किसान पुत्र होकर भी हल की जगह क़लम थामने तुझसे किसने कहा था? अब देख, मास्टर जी कहलाने की यह ललक तेरी खुशियों पर भारी पड़ रही है।"


     किन्तु उनके चेहरे पर पड़ी दर्द की यह लकीर कभी इस सभ्य समाज को नज़र नहीं आयी।

रजनीश के पिता भी इसी स्कूल में पढ़ाते थे। माली हालत किसी भी शिक्षक की ठीक नहीं थी। सो ,प्राइमरी से लेकर जूनियर हाई स्कूल तक की कक्षाओं में इन गुरुजनों ने रजनीश को अध्यापक पुत्र समझ सदैव सादगी और संयमित जीवन का पाठ ही पढ़ाया था। 

      गुरुओं से मिले इसी ज्ञान का परिणाम रहा कि रजनीश ने अपने जिह्वा-स्वाद पर लगभग नियंत्रण पा लिया था।  किन्तु उसी विश्वनाथ साव की दुकान पर आज़ वर्षों बाद मास्टर जी को नये अवतार में देख बिल्कुल चौंक उठा था। वह विस्मयपूर्ण नेत्रों से उनमें आये इस परिवर्तन को देखता रहा। मास्टर साहब के चेहरे पर जो लालिमा थी, उसमें दर्प झलक रहा था। बाटा कम्पनी की चमचमाती महंगी चप्पलें पहने बादामी रंग के सफ़ारी शूट में खड़े गुरुजी के व्यक्तित्व में उसे ख़ासा बदलाव आ गया था । यह देख,वह समझ गया कि लिबास बदलने से व्यक्ति का रुतबा भी बदल जाता है । उसने बड़े गौर से गुरुजी को देखा, जो कचौड़ी, घुघरी और जलेबी ग्रहण करते हुये इस क़दर आनंदित हो रहे थे कि समीप खड़ा हर शख्स उनके लिए अजनबी था। 


    .ख़ैर,रजनीश दुकान के बाहर इस प्रतीक्षा में ठहर गया कि जब वर्षों बाद भेंट हुई है, तो क्यों न उनसे दण्ड-प्रणाम कर ले? सो, जैसे ही वे इस पटरी आते हैं,उसने उनका चरण स्पर्श कर अपना परिचय दिया। " अच्छा-अच्छा, तुम तो काफ़ी होनहार छात्र थे।" उन्होंने उसे बिल्कुल साधारण पोशाक और हवाई चप्पल में देख सहानुभूति जताई थी। फ़िर पूछा , "कुछ काम-धाम करते हो या नहीं, शायद तुम्हारी पढ़ाई भी अधूरी रह गयी थी।" उनके इस प्रश्न पर झेंप -सा गया था रजनीश।  क्या जवाब देता बेचारा ,यही न कि किसी निठल्ले की तरह अपने जीवन के अनमोल क्षणों को व्यर्थ कर रहा है। " अच्छा सुनों,मुझे विद्यालय जाना है।कल कम्पनी गार्डन में आकर मुलाकात करना ।" उसे चिन्तामग्न देख मास्टर जी ने कहा था। 


  ...और अगले दिन बाग में उसने मास्टर जी को  युवाओं की तरह उछल-उछल कर कसरत करते पाया । वे कभी बैजंती के अधखिले फूलों से ओस की बूँदों को हथेली पर उड़ेल उससे अपने नेत्रों को भिंगोते , तो कभी हरी घास पर तेज कदमों से चहलकदमी करने लगते थे। और जब ललाट पर स्वेद की बूँदें मुस्कुराने लगीं ,तो वे वहीं हरी घास पर आँखें मूँद विश्राम करने लगे थे।शीतल पवन बहने लगा था । जिससे बगीचे में लगे वृक्षों के पत्ते इस प्रकार कंपन करने लगे थे कि मानो वे दुनिया के सबसे सुखी व्यक्ति के सम्मान में पँखा झल रहे हो। तभी एक युवक आया, जिसने घंटे भर उनके शरीर पर तेल मर्दन किया।जिससे इस प्रौढावस्था में भी उनके अंग- प्रत्यंग में निखार-सा आ गया था। 


   उनके इस राजस सुख को देख वह चकित हृदय से सवाल कर रहा था-" क्या ये वही गुरुजी हैं, जिन्होंने कभी उसे सादगी से जीवन जीने का पाठ पढ़ाया था ?"  मास्टर जी के 'उपदेश और उपभोग' के अंतर के द्वंद में उलझता जा रहा था वह। तभी उसे उनकी पुकार सुनाई पड़ी - "अरे ! रजनीश आ गये ? चलो उस बेंच पर बैठकर बातें करते हैं !" अपने नित्य कर्म से निवृत्त हो कर मास्टर जी ने उस पर अपनी दृष्टि डाली । स्नेह की आँच पाकर वह मोम की तरह पिघलने लगा था।


     किन्तु गुरुजी के नेत्रों में उसके प्रति अपेक्षित करुण भाव नहीं दिखा , क्योंकि उनका दर्शन शास्त्र आज़ कुछ और बोल रहा था। उन्होंने कहा था - " सुनो रजनीश,  धन के बिना सारी विद्वता और योग्यता अंधकूप में पड़ी सिसकती रहती हैं। सो,आत्महीनता की अनुभूति से मुक्त होना चाहते हो तो पैसा कमाओ, अन्यथा शहर छोड़ किसी वन में शरण ले लो, मठ- आश्रम में चले जाओ, संयासी हो जाओ, कुछ भी करो, परंतु याद रखना निर्धन व्यक्ति के लिए इस सभ्य समाज में कोई स्थान शेष नहीं है। वह उपहास का पात्र होता है ।" तभी टोकरी में सेब लिये एक बूढ़े ने आवाज़ लगायी थी और बात अधूरी छोड़ वे उस ओर बढ़ चले थे ।


     ओह ! तो मास्टर जी ने आज़ उसे इस बगीचे में धन की महत्ता का पाठ  पढ़ाने के लिए बुलाया था ? तभी वे कह रहे थे कि यह दुनिया पैसे की है। पहले अपने 'आत्माराम' को तृप्त करो। 'राम' का क्या भरोसा, हर कोई 'दाम' मांगता है। पर एक दर्द जो उन्होंने  वर्षों से अपने सीने में  दबा रखा था, आज़ बातों ही बातों में फ़िर से उभर आया था। वह विद्यालय जिसमें उनकी योग्यता का डंका बजा करता था,उसी के दबंग व धनलोलुप प्रबंधक ने वित्तविहीन इस जूनियर हाईस्कूल के वित्तपोषित होते ही ,उनसे यहाँ शिक्षक बने रहने की शर्त पर मोटी रकम मांगी थी। स्तब्ध रह गये थे मास्टर जी! जिस शिक्षक धर्म के निर्वहन के लिए उन्होंने हर कष्ट सहा ,आज़ जब सुख के दिन आने को हैं, तो उनके ईमान की बोली लग रही है। चीत्कार कर उठा था उनका अंतर्मन और बदल गयी थी उनकी  सोच। 


     ख़ैर, नौकरी तो बचानी ही थी। सो, वे प्राइवेट स्कूल के अध्यापक की जगह वित्तपोषित विद्यालय के मास्टर साहब बन गये थे। अच्छा वेतन मिलने लगा, परंतु उनका पुश्तैनी खेत हाथ से निकल गया था। साथ ही उनका 'राम' भी इसी रिश्वत की ज्वाला में जल कर भस्म हो गया।  संवेदनाशून्य हो गये थे वे । स्वांतःसुखाय के अतिरिक्त उनके जीवन का और कोई ध्येय नहीं रहा।


      मास्टर जी ने अपनी अनुभूति की पाठशाला में फ़िर कभी किसी को सादगी और ईमानदारी का पाठ नहीं पढ़ाया। इस अर्थयुग में वे अपने शिष्यों को और धोखे में नहीं रखना चाहते थे। उन्होंने स्वयं को भी बदल लिया था। वे 'आदर्श' और 'यथार्थ' के मर्म को समझ गये थे, क्योंकि बिक गये खेत में उनका ' राम ' दफ़न हो चुका था और नौकरी बचाने के लिए दिया गया  रिश्वत  'आत्माराम ' बन अट्टहास कर रहा है।


                      -- व्याकुल पथिक