नजरों में कैसी समायी ये दुनिया
**********************
नजरों में कैसी समायी ये दुनिया
पलकें उठा कर बिजली गिराती
उमड़ते अरमानों को है जलाती
निगाहों में यादें बसाती ये दुनिया
इंसानों को ठगती ,हैवानों को भाती
अपनी सी लगती ,मगर गैर होती
निगाहों में जिसके नहीं है ठिकाना
उम्मीदों के दीपक जलाती बुझाती
रिश्तों में उलझा - सताती ये दुनिया
किस्तों में दिलको जलाती ये दुनिया
ये सिक्के और पायलों की खनखन
बहका के क्यों बहलाती ये दुनिया
किसी को हँसी दे रुलाती है दुनिया
नजरों में उठा के गिराती है दुनिया
वफाओं को निगाहों से गिरा के
कातिलों सी मुस्काती ये दुनिया
सिसकती है यादें सताती है दुनिया
हँसी लबों की चुराती ये दुनिया
पनाहों में लेकर - ठोकर क्यों देती
किसी को बसंत किसी को सर्द देती
मुहब्बत का पैगाम सुनाती ये दुनिया
चिता फिर उसकी सजाती ये दुनिया
बुझी राख को सहलाती ये दुनिया
नजरों में कैसी समायी ये दुनिया
अपने ये जो आँसू खिलते कमल हैं
इसे न सूखा दो ये प्यारी सी दुनिया।
-व्याकुल पथिक
**********************
नजरों में कैसी समायी ये दुनिया
पलकें उठा कर बिजली गिराती
निगाहों में यादें बसाती ये दुनिया
इंसानों को ठगती ,हैवानों को भाती
अपनी सी लगती ,मगर गैर होती
निगाहों में जिसके नहीं है ठिकाना
उम्मीदों के दीपक जलाती बुझाती
रिश्तों में उलझा - सताती ये दुनिया
किस्तों में दिलको जलाती ये दुनिया
ये सिक्के और पायलों की खनखन
बहका के क्यों बहलाती ये दुनिया
किसी को हँसी दे रुलाती है दुनिया
नजरों में उठा के गिराती है दुनिया
कातिलों सी मुस्काती ये दुनिया
सिसकती है यादें सताती है दुनिया
हँसी लबों की चुराती ये दुनिया
पनाहों में लेकर - ठोकर क्यों देती
किसी को बसंत किसी को सर्द देती
मुहब्बत का पैगाम सुनाती ये दुनिया
चिता फिर उसकी सजाती ये दुनिया
बुझी राख को सहलाती ये दुनिया
नजरों में कैसी समायी ये दुनिया
अपने ये जो आँसू खिलते कमल हैं
इसे न सूखा दो ये प्यारी सी दुनिया।
-व्याकुल पथिक
