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Tuesday, 3 April 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 3/4/18


पत्रकारिता में यदि मैं झोलाछाप  डाक्टर होकर भी आप पाठकों का स्नेह पा सकता हूं तो चिकित्सा जगत में भी ऐसे कर्मठ झोलाछाप डाक्टरों का मेरे नजरिये से गरीब वर्ग के लिये अपना अलग महत्व तो है ही।  मेरा मतलब है कि जो असली डिग्री धारी डाक्टर हैं, वे ही कहां कलयुग के भगवान रहे हैं अब। मरीज के आते ही महंगी दवा और जांच जब बाहर  से सरकारी डाक्टर लिख रहे हो, तो फिर प्राइवेट नर्सिंग होम और क्लीनिक खोल रखे डाक्टरों की तो पूछे ही मत,  फिर गरीब किसके पास जाए। हां ,झोलाछाप डाक्टरों को लोभ में आकर अपनी सीमा रेखा का उलंघन नहीं करना चाहिए। मुझे ही लें पत्रकारिता के लिये कोई खास अंग्रेजी नहीं आती, संस्कृत और उर्दू भी ज्ञान नहीं है। पर सरल हिन्दी भाषा में तो जनता के हितों की बात कर ही सकता हूं। बस काम और मिशन के प्रति ईमानदारी होनी चाहिए।  और एक बात जो मुझे समझ में आयी, वह यह है कि यह जो बुद्धिजीवी तबका है न , वह अपने हितों के लिये कुछ भी कर सकता है। चाहे समाज पर उसका प्रतिकूल प्रभाव क्यों न पड़े। आज पत्रकारिता के क्षेत्र में भी यही तो हो रहा है। वरिष्ठ कहलाने वाले तमाम पत्रकार अपने और अपने संस्थान के हित में अपने कलम को तोड़ मरोड़ ले रहे हैं। अखबारों का राजनीतिकरण भी हो गया है।  अब जनता के हितों के संरक्षण के लिये कलम कहां चल रही हैं।  हां अखबार के व्यवसायिक हितों को ध्यान में  रख कलम खूब चल रही है। मैंने ऐसा नहीं किया, भले ही सारे सम्बंधों कि बलि इस रंगमंच पर चढ़ा चुका हूं। यह इस त्यग का ही परिणाम है कि पत्रकारिता जगत में झोलाछाप हो कर भी इस रंगमंच पर अब  भी डट चमक रहा हूं।
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हमार नैतिक दायित्व ...

       क्या अब भी हम आप कोई सबक नहीं लेंगें। कुछ तो नैतिक दायित्व हमारा भी बनता है। समाज के प्रति और अपने गांव, शहर और देश के प्रति। हमारी आपकी जरा सी इसी गलती से ही एक हंसती खिलखिलाती बच्ची को इस तरह से  निर्मम मौत मिला है। जिसके लिये उस बोरवेल को खुला छोड़ने वाला शख्स ही नहीं हम सभी जागरूक वर्ग के लोग भी जिम्मेदार है। क्या गांव के लोग , प्रधान और  अन्य पहरुये इसकी शिकायत समय रहते नहीं कर सकते थें। और हम मीडिया वाले भी किसी हादसे के बाद ऐसे स्थानों पर अपने मतलब की खबर के तलाश में ही धमकते हैं। जबकि अखबार में हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के स्क्रीन पर कम से कम ऐसी जनसमस्याओं को तो प्रमुखता से उठाते ही रहना चाहिए।  कहां जर्जर तार लटक रहा है। आटो रिक्शे पर दर्जन भर से अधिक सवारी क्यों बैठे हैं। कहां गड्ढा खोद कर छोड़ दिया गया है। सरकारी बसें यात्रियों को समय से मिल रहे हैं कि नहीं।  आपूर्ति विभाग, सरकारी अस्पताल, समाज कल्याण विभाग से लेकर किसानों की समस्याओं पर अब  कितने कालम की खबरें लिखी जाती हैं, जरा पन्ना उलट कर बतायें। और जब लिखी भी जाती हैं तो यह जुगाड़ लगाया जाता है कि सम्बंधित विभागीय अधिकारी रिपोर्टर के प्रभाव में आ जाये और साहब फिर तो घोड़ा घास की आपस में दोस्ती हो जाती है।(शशि)

क्रमशः

Monday, 2 April 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 2/4/18
 आत्मकथा

      वैसे,पत्राकारिता के क्षेत्र में मैं स्वयं को एक झोलाछाप डाक्टर से अधिक कुछ नहीं समझता हूं। एक पत्रकार कहलाने के लिये मेरे पास कुछ भी तो नहीं है। न ही कोई  डिग्री है, न ही उच्च शिक्षा प्राप्त किया हूं। इस अर्थ युग के हिसाब से कोई तामझाम भी नहीं कि देखने में मैं स्मार्ट रिपोर्टर जैसा लगूं। पहले पैदल चलता था और अब साइकिल से। फिर भी लोग मुझसे और मेरी खबर से पता नहीं क्यों प्रभावित रहें। जबकि उस समय कई वरिष्ठ पत्रकार थें, समाचार पत्र भी। सम्भवतः मेरी सारी कमजोरियों को सत्य के करीब रहकर समाचार लिखने का प्रयास ढक लेता था। क्योंकि न तो इस पत्रकारिता जगत में यहां मेरा कोई गॉड फादर रहा, न ही कोई ऐसा पत्रकार संगठन , जिसके सहारे मैं ऊंचा उठ पाता। पत्रकार जिसे चौथा स्तम्भ मुझे बताया गया था, वे भी गुटबाजी और  जातिवाद से जकड़े हुये है, इसे मैंने यहीं आ कर करीब से देखा समझा। हालांकि मुझे हर किसी का स्नेह तब मिला। शायद यह पत्रकार बिरादरी भी मेरे परिश्रम से प्रभावित रहा हो !

क्रमशः


व्याकुल पथिक

       मोह को मैं अब तक अपने जीवन में कोई स्थान नहीं देना चाहता, न ही अर्थ प्राप्ति के लिये कोई नया कर्म ही। सो, मैं लोगों के बीच रहते हुये भी सबसे दूर रहने का भाव अपने हृदय में लाने का प्रयास कर रहा हूं। यहां तक कि अपने शरीर के प्रति भी मोह का त्याग करने का प्रयास कर रहा हूं। जब युवावस्था में पहुंचा था, तो इस शरीर को बनाने और सजाने के लिये क्या क्या नहीं प्रयत्न किया। भले ही अखबार बांटता था। परंतु स्वेटर मेरा वाराणसी के कंबल घर का होता था। जूता  बाटा, एक्शन अथवा किसी महंगी  कम्पनी का। कपड़े भी उसी तरह से। परन्तु वर्ष 1998 में असाध्य मलेरिया से जैसे ही पीड़ित हुआ सबसे पहले शरीर खो दिया। आज तक उसमें सुधार नहीं ला सका। फिर और कोई मोह इस माटी के पुतले के लिये क्यों करुं। हां स्वस्थ रहना चाहता हूं। तो इतना ध्यान रखना ही होगा कि आहार अनुकूल रहे। मैंने एक मोह से मुक्त आहार का चार्ट बना रखा है। जिससे शरीर का काम तो चल जाएगा पर स्वाद का लोभ भी नहीं रहेगा यहां। अपनी प्रिय वस्तुओं का लोभ भी नहीं रखना चाहता हूं। सारे पहचानों से मुक्त हो जाना चाहता हूं। इसी पहचान के मोह ने ही तो मुझे इतने लंबे समय तक एक ही रंगमंच पर कैद कर रखा है। पर अब व्याकुलता बढ़ते ही जा रही है। अपनों की हर यादों से मुक्ति चाहता हूं । सोचता हूं कि मेरा मस्तिष्क ही संज्ञा शून्य हो जाए। पर आनंन में तो दो ही लोग रहते हैं एक फकीर और दूसरा जिसे हम पगला कहते है। फर्क यह है कि फकीर को उस आनंन सुख की अनुभूति होती है, लेकिन दूसरे को नहीं। ऐसे में चैतन्य तो रहना ही होगा।  हां,  मैं जंगल में विचरण करने वाला वैरागी तो नहीं ही बनना चाहूंगा। जहां खोने के लिये.कुछ है ही नहीं, वहां त्याग फिर कैसा। अब जब ऐसे विचार मेरे मन में उठने लगे हो, तो फिर मैं अपने पत्रकारिता धर्म के प्रति ठीक से न्याय नहीं कर पा रहा हूं। मैं किसी की आलोचना करने से बचने जो लगा हूं। आप यदि एक सच्चे पत्रकार हैं, तो व्यवस्था में खामियों को आपकों उजागर करना ही होगा। यहां आपका कर्मपथ तय है। मैंने स्वयं तब तक ऐसा किया, जब तक मुझे लगा कि एक सच्चे  पत्रकार की तरह ही मुझे इस रंगमंच पर आखिरी शो करके अलविदा कहना है। परंतु  अब अंतरात्मा से यह आवाज उठ रही है कि बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा ना ....।

Sunday, 1 April 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक 1 / 4 / 18

आत्मकथा

    जनता से जुड़े किसी चुनाव को करीब से देखने और उससे कहीं अधिक उस पर अपनी कलम चलाने का यह मेरा पहला अवसर था। लगभग दो वर्षों की पत्रकारिता में मैं तब इतना तो अनुभवी हो गया था कि मुझे कहां,क्या और कैसे लिखना है। सो, अरूण दादा और कामरेड साथियों का भाषण कुछ अधिक गौर से सुनता था। उस समय पोस्टर वार जबर्दस्त हुआ। नागरिक संगठन की भी इसमें विशेष भूमिका थी। भाजपा को घेरने के लिये बड़े ही सटीक मुद्दे उछाले जा रहे थें। जो मुझे सही प्रतीत हो रहा था। सो, स्वतः ही मेरी लेखनी चल गई इस मीरजापुर के गांधी पर । पता नहीं  राजनीति से जुड़ी हलचलों को लिखना अचानक ही क्यों तब मुझे इतना भाने लगा कि एक समय बाद में ऐसा भी आया कि गांडीव का मीरजापुर वाला कालम पाठकों की नजर में राजनीति का अखाड़ा बन गया। तमाम राजनेताओं ने तब गांडीव लेना इसीलिए शुरु कर दिया था ।इसलिये शायद कि वे जिले की सियासत से पूरी तरह से अपडेट हो जाते थें ,गांडीव पढ़ कर । तब सोशल मीडिया का युग तो था नहीं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी स्थानीय समाचार इतना कहां दिखलाते थें। एक बात यह भी रही कि यहां के लोग  इतना तो कहते ही थें कि यदि शशि ने लिखा है, तो उसमें सच्चाई होगी ही। पाठकों का यही विश्वास था। जबकि मुझे राजनीति का ककहरा तक नहीं पता था, फिर भी जिज्ञासा प्रबल रही। अतः मैं तब जो वरिष्ठ पत्रकार, राजनेता और बुद्धिजीवी रहें, उनसे पूछता भी था। मैं इस मामले में भाग्यशाली हूं , जिसे सर्वप्रथम यहां पं० रामचंद्र तिवारी( अब स्वर्गीय) और वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्रनाथ जायसवाल जिन्हें सभी लल्लू बाबू कहते हैं, का सानिध्य प्राप्त हुआ। बाद में आज अखबार के जिला प्रतिनिधि रहें  सलिल भैया का स्नेह भी मिला। क्राइम की खबर में तब दैनिक जागरण देख रहें सुरेश चंद्र सर्राफ  जी का भरपूर सहयोग मिलता था।  साथ ही धुंधीकटरा स्थित राजमोहन भैया के यहां भी जाता था। वहां संतोष श्रीवास्तव मास्टर साहब  ,जो कभी गांडीव भी देखते थें, वे भी मेरा उत्साहवर्धन करते ही थें। बाद में पत्रकारिता के क्षेत्र में भरपूर जानकारी रखने वाले सर्वेश जी के यहां भी गया। परंतु अखबार बांटने और प्रतिदिन बनारस आने जाने के कारण मेरे पास पढ़ने लिखने और किसी के सानिध्य में बैठ कर समाचार लिखने का समय कम ही था। हां , वरिष्ठ पत्रकार लल्लू चाचा के घर पर तब सुबह पहुंच जाया करता था। करीब एक-दो घंटे वहीं बैठ कर समाचार लिख लिया करता था। निर्भिक पत्रकारिता मैंने उन्हीं से सीखीं है और गंभीर पत्रकारिता अपने गुरु जी यानि   स्व० रामचंद्र तिवारी जी से। उत्साहवर्धन मेरा सलिल भैया ने खूब किया। सरदार भूपेंद्र सिंह डंग मुझे जनसत्ता पढ़ने को देते ही थें। इस तरह से राजनीति की खबर लिखने में मुझे रुचि बढ़ती ही गई। दरअसल  ऐसी खबरों कि चर्चा भी खूब होती थी। शाम ढलते ही लोग गांडीव तलाशने लगते थें। ऐसे में जब मैंने अपने कालम में अरुण दादा की खबरों को प्रमुखता देना शुरू कर दिया। उन्हें चेयरमैन की कुर्सी का प्रबल दावेदार बतला दिया, तो हमारे डाक इंचार्ज मधुकर जी थोड़ा चौंके, शायद सोचा हो कि इस लड़के को हो क्या गया है। वे मीरजापुर रह चुके थें। यहां तमाम उनके परिचित भी थें। सो, मेरी एक खबर पर उन्होंने टोक ही दिया कि जनसंघ के गढ़ में मुहं टेढ़े को जीता रहे हो ! मैंने भी पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया कि सर उनकी जीत कोई रोक नहीं सकता। अब आप समझ लें कि भाजपाइयों से अच्छी मित्रता के बावजूद मैंने अपने कलम के साथ यह पहला न्याय किया।  किसी प्रलोभन में फंसा नहीं। उस समय गांडीव का यहां शहर में कुछ तो प्रभाव था ही। पेपर मार्केट में थें ही कितन। दैनिक जागरण, आज, राष्ट्रीय सहारा, भारतदूत और गांडीव तथा अंग्रेजी का अखबार एनआईपी । इसके अतिरिक्त जो पेपर थें कोई खास चर्चा में नहीं थें। हां, अमृत प्रभात , स्वतंत्र भारत, जनवार्ता के पत्रकार भले ही दमदार थें। बहरहाल, मेरी समीक्षा सही निकली और दादा लगभग 6 हजार मतों से विजयी हुयें। इसके बाद से अब तक मेरी कोई समीक्षा गलत नहीं हुई है। हालांकि चुनाव आयोग की पाबंदी के कारण विगत कई चुनावों से हार जीत की समीक्षा मतदान के पूर्व मीडिया नहीं करती है। नहीं तो इसे लेकर भी कलम को धन सम्पन्न प्रत्याशी खरीद लेते थें। एक बार एक बड़ा प्रलोभन भरा प्रस्ताव मेरे समक्ष भी आया था।

क्रमशः

Saturday, 31 March 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 1 /4/18

 कल रात्रि 11 बजे तक शास्त्रीपुल पर अखबार के बंडल की प्रतीक्षा में खड़ा था। लेकिन, फिर भी बस नहीं आई तो खाली हाथ वापस लौट आया। आज रविवार है, तो पेपर आना नहीं है। ग्राहकों की शिकायत रहेगी की भैया आपसे स्नेह के कारण  अखबार ले रहा हूं, अन्यथा....। अब आप यह समझ नहीं सकते कि कितनी पीड़ा मुझे होती है। सुबह ही सवा पांच बजे इसलिये उठता हूं कि समय से मोबाइल पर समाचार टाइप कर प्रेस को भेज दूं। इस दौरान अपने ऊपर बस इतना ही समय देता हूं कि सुबह दैनिक कर्म से निवृत्त हो  दलिया पका और खा सकूं। फिर कचहरी, अस्पताल पोस्टमार्टम आदि जगह जा समाचार संकलन में दोपहर के ढ़ाई- तीन तो बज ही जाते हैं अमूमन। दोपहर बाद  करीब साढ़े तीन -चार बजे जब मुसाफिरखाने पर पहुंचता हूं, तो भूख लगी रहती है। बाहर का सामान अब मैं ग्रहण करता ही नहीं, न रात्रि में ही भोजय करता हूं। सो, यहां प्रेम भवन आते ही सब्जी बनाने की तैयारी में लग जाता हूं। उबली सब्जी लेता हूं। अतः ज्यादा समय इसे बनाने में नहीं लगता है। रोटी की व्यवस्था भी राही लाज में ही हो गई है। ऊपर अनिल बनवा दिया करते हैं। भोजन के बाद सिर्फ एक घंटे का समय अपने ऊपर दे पाता हूं। इसके बाद चिन्ता यह लगी रहती है कि बनारस से बस कितने बजे पेपर का बंडल लेकर  निकली है। अमूमन सायं 6 बजे के बाद ही बस चलती है। कल तो साढ़े 7 बजे बंडल लगा था। बस जब 11 बजे रात्रि भी नहीं आई, तो इस चिन्ता में वापस लौटना पड़ा कि आप सभी ग्राहकों से क्या कहूंगा।  जिस मार्ग पर जाम लगता है। उसे लेकर पुलिस की अपनी बहानेबाजी रहती है। वह यह कह बच निकलती है कि सड़क खराब है। जबकी कल पूर्णिमा था। कितने ही हजार दर्शनार्थी इसी मार्ग से विंध्याचल   आते है। परंतु कहां थी टेढ़वा और औराई के मध्य पुलिस की व्यवस्था। इन अफसरों को सोशल मीडिया पर चेहरा चमकाना पसंद है। परंतु बस यात्री कल मध्य में तीन चार किलोमीटर के जाम के कारण वाराणसी और जौनपुर से बाया गोपीगंज होते हुये पांच से छह घंटे में मीरजापुर पहुंच रहे थें। उन्हें जाम से मुक्ति दिलाने की कोई ठोस पहल उन्होंने की क्या। पूरी व्यवस्था ही ध्वस्त हो गई है। और मुझे जो लग रहा है कि वर्तमान सरकार में ये अधिकारी परम स्वतंत्र होते जा रहे हैं। मैं तो इसे नौकरशाही का राजनीतिकरण ही मानता हूं।  सो ,आप झेलो , परेशान हो हर छोटी छोटी समस्याओं को लेकर। इस पीड़ा का अनुभव मैं शास्त्रीपुल पर खड़ा खड़ा कल रात्रि 11 बजे तक कर रहा था। सोचा, तो यह था कि एक अनुशासित पार्टी के नेताओं के हाथ प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता आई है ,तो कुछ तो परिवर्तन व्यवस्था में दिखेगा ही। तो साहब यही परिवर्तन है कि सात बजे चली बस दो घंटे में यहां पहुंचने की जगा पता चला कि साढ़े 12 बजे रात आई थी। कितने ही दर्शनार्थी चैत पूर्णिमा पर्व के कारण बसों में थें, जो मार्ग में फंसे हुये थें। जबकि दो जनपदों की सीमा पर जाम लगा था। चील्ह और औराई पुलिस चुस्त रहती तो ऐसा नहीं होता। ट्रैफिक पुलिस भी लापता रहती है। ऐसे मौके पर, ऐसा मैं अनुभव कर रहा हूं। अब यात्रीगण इस अपना अच्छा दिन , समझे या बुरा। परंतु इस सरकार के बारे में मेरी मत बिल्कुल साफ है....

क्रमशः

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 31/3/18

 मैं यह नहीं साबित करना चाहता कि  ईमानदारी से पत्रकारिता करके मैंने कोई बढ़ा गुनाह किया है। मैं सिर्फ नये व युवा पत्रकारों को यह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि यह राह कितना कठिन है। चकाचौंध भरी इस दुनिया में आप भी ऐसा ही कर कहीं अवसाद की ओर न बढ़ जाएं। क्यों इस रंगमंच पर आकर मैं जब सभी अपनों से दूर होता चला गया, तो उस एकाकीपन से उबरने के लिये मुझे कठिन संकल्प लेंने ही पड़ रहे हैं। संतोष इस बात का है कि मैं इसमें सफल हो रहा हूं। क्योंकि मैं अपने पेशे के प्रति अपनी ईमानदारी को यूं तो अवसादग्रस्त होकर जाने नहीं दूंगा। ताकि कल को लोग यह कहें देखों जरा इस पागल को भाई ,बड़ा ईमानदार पत्रकार बन रहा था ! अतः संकल्प शक्ति से मैं वैराग्य के मार्ग पर बढ़ कर अपनी पीड़ा से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर रहा हूं। भले ही रंगमंच का पात्र वही रहूं, परन्तु यह न कहना पड़े कि जीना यहां मरना यहां , इसके सिवा जाना कहा...। सो,  हर आसक्ति से परे होने का संकल्प लिया है। इसी कारण मैंने  प्रेम भवन में अपना नया आशियाना बनाया। तो एक बार फिर से मोह ग्रस्त होने का जब कुछ एहसास और मन में भारी पन भी हुआ, तो मैं राही लाज चला आया। चंद्रांशु भैया ने इसकी मुझे आजादी दे रखी है कि मैं यहां वहां कहीं भी रह सकता हूं। हां, यहां राही लाज में कोई भी सामग्री ऐसी मेरी नहीं है कि उससे आसक्ति बढ़े । सो, बिलकुल ही मुसाफिर सा हूं और आनंदित भी। अब किसी अपने ठिकाने के प्रति मोह मुझे कैसे जकड़ेगा ?

 रही बात आत्मकथा लेखन कि तो मैंने इसके रविवार का दिन चयन किया है अथवा फुर्सत में कभी भी । शेष अन्य दिन समय मिलना मुश्किल है। आज रात्रि तो वाराणसी से साढ़े सात बजे पेपर ही लगा है। बस साढ़े नौ बजे से पहले नहीं आएंगी। फिर अखबार बांटने में भी दो घंटे तो लग ही जाते हैं। अब साढ़े 11 बजे रात मुसाफिरखाने पर वापस  लौट कर आऊंगा, तो लिखूंगा क्या।(शशि)

क्रमशः

Friday, 30 March 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक
31/3/18

 रात्रि में लेखन कार्य मेरे लिये काफी कठिन प्रतीत हो रहा है। कल जो कुछ लिखा,आज सुबह जब देखा तो कुछ भाषाई अशुद्धियां थीं। क्यों कि निंद्रा का प्रभाव बढ़ता जाता है। दो तीन घंटे के कठोर श्रम से शरीर भी थका रहता है। ऐसे में यदि 11 बजे के आसपास कुछ लिखने बैठेंगे,तो स्वभाविक है कि जिस गंभीरता की उम्मीद अपनी लेखनी से चाहता हूं, वैसा हो नहीं पाता। सो, इसके लिये रविवार अथवा अवकाश का दिन कहीं अधिक उचित रहेगा। (शशि)

व्याकुल पथिक आत्मकथा

व्याकुल पथिक
30/ 3/ 18

  शास्त्रीपुल पर धूल भरे तेज आंधी का करीब एक घंटे तक मुकाबला और फिर साइकिल से दो घंटे पूरा शहर घुम कर अपने कुशल हॉकर धर्म को निभाते हुये वापस मुसाफिर खाने आया, तो वहां एक शुभचिंतक ने मेरे केश, चेहरे और वस्त्र पर जमी सफेदी ( बालू और धूल) की परत की और ध्यान दिलाई,  हाथ मुंह पानी से साफ करने को कहा। मेरा यहां और कहीं भी कोई घर परिवार तो नहीं कि तुरंत आवाज लगाता और तौलिया तथा कपड़े आ जाते।  खैर , छोड़े इन बातों का क्या ? यह तो मेरी नियति है।

              मैं जो कहना चाहता हूं, वह यह है कि जो ईमानदार पत्रकार शब्द का प्रयोग लोग अमूमन मेरे लिये करते हैं, यह अब और न करें। यह तमगा मुझे अत्यधिक पीड़ा देता है। इस  एक अवगुण के कारण आज मैं  राजकपूर साहब की "आवारा"  फिल्म की तरह  चेहरे पर झूठा मुस्कान लिये यह गुनगुनाता फिर रहा हूं कि घरबार नहीं संसार नहीं, मुझसे किसी को प्यार नहीं...।

 एक भूखा नंगा इंसान यदि ईमानदारी का जहर पीने चलेगा तो यही तो होगा न। अरे साहब, डाक्टर, इंजीनियर, पुलिस और प्रशासनिक सेवा के अफसर , राजनेता  , मंत्री, सरकारें ईमानदार तो इन्हें होना चाहिए। पर आप एक छोटे से अखबार के जिला सम्वाददाता हो, न उचित वेतन का पता, न मंजिल का और लगें शोर मचाने कि मैं तो लोभ मुक्त होकर पत्रकारिता करूगा।  तो मैं ललकार के कहता हूं कि जिलास्तरीय कौन ऐसा पत्रकार है , जिसने अपने पेशे का लाभ स्वहित में कमोवेश न लिया हो। यदि नहीं लिया होगा, तो वह भी आज मेरे ही जैसा एकाकी होगा। इसी अवसाद से बचने के लिये मैं जबरन मन की दिशा मोड़ रहा हूं। मैं पत्रकारिता में क्यों आया, इसीलिए न की भूखा था और किसी अपने के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहता था। पर जब पत्रकारिता से मुझे रोटी कमाने का बढ़िया मौका मिलने को हुआ तो मैं इस कमाई के माध्यम को पीत पत्रकारिता बता उससे मुंह मोड़ बैठा।  कितने ही अधिकारियों ने स्नेह भरे शब्दों में मुझे छोटे भाई और पुत्रवत समझाया था, तब कि जीवन के इस कड़ुवे सत्य को समझो  कि धन से ही घर परिवार है। कल को तुम्हारे भी बीबी बच्चे होंगे तो क्या करोगे ?  ईमानदारी के इस झूठे तमगे के जूनून में मैंने अपने गुरु जी का यह सबक भी भूला दिया था कि यदि समाज में रहना है तो धन चाहिए, नहीं तो संयासी बन कर वन की राह पकड़ लो। और आज जब मन व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि मन की पीड़ा मस्तिष्क में कहीं विस्फोट न कर जाए, तो इससे मुक्ति का एक ही आसान राह है कि मस्तिष्क को संज्ञा शून्य बना देना। सो, मैं भी अवसाद की जगह मन को वैराग्य की ओर ढकेल रहा हूं। अच्छे स्वादिष्ट भोजन की चाहत मुझे भी थी। परंतु इसी पत्रकारिता के मोह में जब अपने लिये बढ़िया भोजन भी समयाभाव के कारण नहीं पका पाया, तो इस वर्ष एक संकल्प के तहत ऐसे सभी स्वादिष्ट भोजय पदार्थों को त्याग दिया। धन का लोभ मुझे है नहीं और ढाई दशक के संघर्ष ने मुझे मृत्यु भय से भी मुक्त कर दिया है, यह मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं।

           खैर मैं बता रहा था कि यहां  पत्रकारिता में मुझे पहचान बनाने का जो पहला अवसर मिला,वह रहा नगरपालिका परिषद अध्यक्ष वर्ष 1995 का चुनाव। मुझे इस पर रिपोर्टिंग करनी थी। इस भगवा गढ़ में मेरे  अखबार के तमाम ग्राहक भाजपाई थें। तब भाजपा उम्मीदवार रहें बैजनाथ केशरवानी भी मेरा अखबार  कम से कम एक वर्ष से तो लेते ही रहे होंगे। और भी भाजपा व्यापारी नेता तब तक गांडीव के अच्छे पाठक हो गये थें। उन दिनों करीब साढ़े 6 बजे  मैं वाराणसी से पेपर का बंडल लेकर मीरजापुर आ ही जाता था। और उस समय भी पैदल ही शहर में घुम घुम कर पेपर बांटा करता था। मेरी लेखनी चलने लगी थी।  जो कुछ त्रुटियां रहती भी थी, तो वहां डाक देख रहें कमलनयन मधुकर जी या फिर अत्रि अंकल उसमें सुधार कर मुझे बताया सिखाया करते ही थें। पुलिस विभाग में यहां मेरी पकड़ कैसे बढ़ी और क्यों तब के अधिकारी इस अनाड़ी कलम के नौसिखिये सिपाही से भय भी खाते थें और सम्मान तो देते ही थी। इस पर बाद में चर्चा करुगां। डा० राधारमण चित्रांशी जी का व्यापक प्रभाव तब वाराणसी जोन.के पुलिस महकमे पर था। अतः एस एन साबत साहब जब यहां के कप्तान थें, तो उनका भी काफी स्नेह मिला। हां, तब भी छोटे बड़े पुलिस अधिकारी यह बात अच्छी तरह से समझ गये थें कि अन्य नये पत्रकारों की तरह मेरे किसी कड़ुवे समाचार पर वे मुझ पर आंखें नहीं तरेर सकते हैं। खैर , पुलिस और अपनी पत्रकारिता के संदर्भ में खास बातें फिर कभी करुंगा। अभी तो नगर निकाय चुनाव पर बता रहा था कि भगवा गढ़ में किस तरह से उसके प्रत्याशी की पराजय का संकेत मैंने बेखौफ अपनी लेखनी से कर दी थी। उस चुनाव में प्रतिद्वंद्वी के रुप में बतौर निर्दल प्रत्याशी अरुण कुमार दूबे  जिन्हें दादा सम्मान से लोग कहते थें खड़े थें। तब नागरिक संगठन और भाकपा माले के नेता जैसे अरुण कुमार मिश्रा, मो० सलीम, शरद मेहरोत्रा आदि ने , जो एक चर्चित सियासी जुमला उछला था, वह रहा "अरुण नहीं यह आंधी हैं मीरजापुर का गांधी है"।  इस नारे का यहां के मजदूर तबके और युवाओं पर खासा प्रभाव पड़ा। अखबार बांटते हुये मैं भी इनकी नुक्कड़ सभाओं में पहुंच जाता था।(शशि)

क्रमशः

Thursday, 29 March 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक
29/3/ 18

   सफर की बात जब कर ही रहा हूं, तो पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरी यात्रा की पहली परीक्षा वर्ष 1995 का नगरपालिका परिषद मीरजापुर चुनाव रहा। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि अपने कार्य के प्रति निष्ठा मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। मैं जो ठान लेता हूं , वह कर भी लेता हूं।  जैसे ब्लॉग पर प्रतिदिन मुझे कुछ लिखना है, तो फिर आंखें नींद से कितनी भी भरी क्यों न हो , चंद शब्द लिखूंगा जरूर। पर आज बिल्कुल थका हुआ हूं। अभी थोड़ी देर पहले ही अखबार बांट कर आया हूं। सुबह साढ़े पांच बजे से पहले  उठ जाता हूं। कल मुकदमे की तारीख भी तो हैं। तो जेब भी टटोलना पड़ता  है। खैर , मैं बात नगरपालिका परिषद अध्यक्ष पद  के  चुनाव से जुड़े पत्रकारिता की कर रहा हूं। जिसमें मैं सौ फीसदी अंक प्रयास करने में  सफल रहा। यही से मेरे अखबार के दफ्तर में बतौर पत्रकार मेरा कद ऊंचा हुआ था।....

क्रमशः

Wednesday, 28 March 2018

आत्म कथा मेरी यात्रा

व्याकुल पथिक
जीवन यात्रा
28/3/ 18

  यात्री को बढ़िया मुसाफिरखाना मिल जाए, तो यह उसके लिये सुकून की बात तो है। लेकिन, पथिक को पता रहता है कि यह यात्री निवास उसका मंजिल नहीं है, बल्कि एक पड़ाव है। उसे तो और आगे का सफर तय करना है। तब कहीं जा कर वह अपने आशियाने तक पहुंच पाएगा। अतः अपने पथ और मंजिल दोनों की बखूबी जानकारी राहगीर रखता है। लेकिन,  यदि कोई जब यह कहे
    मुसाफिर हूं यारो  न घर है न ठिकाना, मुझे बस चलते जाना है...।
     यह पथिक भी बचपन से यात्रा पर ही तो है। परंतु मंजिल से अंजान रहा। सो, घर ठिकाने की तलाश में वर्षों से सुबह से शाम तक भटक रहा है। कभी बढ़िया सराय मिला, तो कभी घटिया। अब जब आत्मकथा लेखन में जुटा हूं, तो चिन्तन करता हूं कि यह कैसी विडंबना भरी जीवन यात्रा है मेरी। जन्मा तो सिल्लीगुड़ी(बंगाल) के एक बढ़िया नर्सिंग होम में। वर्षों बाद ननिहाल में एक पुत्र का जन्म हुआ इसी लिये ,सभी आनंदित थें। क्यों मेरे नाना जी को पुत्र नहीं था, तब उनका कारोबार वहीं था। इसके बाद जीवन यात्रा कुछ ऐसी उलझी कि युवा अवस्था तक कोलकाता से वाराणसी फिर वहां से कोलकाता और पुनः वाराणसी  हो मुजफ्फरपुर और वहां से भी वापस वाराणसी होते हुये कालिंगपोंग जा पहुंचा। युवा हो रहा था,  गोरखालैंड आंदोलन के बावजूद पहड़ों पर बेखौफ मचल रहा था। प्रातः भ्रमण वहां मुझे बहुत पसंद था। भले ही एक बार जीवन जोखिम में पड़ गया था और मुझे संदिग्ध बाहरी व्यक्ति समझ नेपाली युवकों ने खुखरी लेकर घेर लिया था।मेरे लिये हमसफर की तलाश सबसे पहले वहीं से शुरु हुई। पहाड़ी हवा और अच्छा भोजन के कारण सारे कपड़े छह माह में ही छोटे पड़ गये थें। परंतु यहां भी मुझे मंजिल नहीं मिली। सो, वापस आकर वाराणसी से घर से निकल एक आश्रम की ओर कदम बढ़ाया । वहां भी मंजिल नहीं मिला, तो सादगीभरे जीवन को छोड़ फिर से मुजफ्फरपुर होते हुये एक बार पुनः कालिंगपोंग जा पहुंचा और वहां से काशी वापस आने के बाद जब इस विंध्यक्षेत्र में आया हूं। तभी से  (वर्ष 1994 ) अब तक यहीं इसी रंगमंच पर यह गुनगुना रहा हूं

 जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां...
   
    एक बार दिल्ली एम्स में इलाज के लिये जरूर गया था। हां , बचपन से लेकर मीरजापुर आने से पूर्व तक मेरी यात्रा जो भटकाव भरी थी। अब यहां उसका पथ निश्चित था। करीब तीन वर्ष से भी अधिक समय तक मेरी यात्रा की जो राह रही, वह वाराणसी से मीरजापुर तक प्रतिदिन आना जाना था। बाद मे यह यात्रा औराई से मीरजापुर तक समिति हो गयी । और अब कोई तीन वर्षों से शहर से शास्त्री पुल तक की यात्रा हो गयी है। इसके बाद साइकिल से पूरे शहर की यात्रा करता हूं। मौसम या स्वास्थ्य प्रतिकूल भी रहा, तो भी इस यात्रा म़े व्यवधान नहीं आया।

         यहां मीरजापुर में हॉकर और रिपोर्टर से भी बड़ी एक चुनौती मेरे सामने एक और रही। वह यह कि नीचीबाग, वाराणसी  जाकर वहां कार्यालय से गांडीव लेकर मीरजापुर की बस पकड़ यहां आने की। जब तक प्रबंधक मंजीत सिंह रहें, तो वाराणसी -मीरजापुर आता जाता था। फिर अरुण अग्रवाल जी प्रबंधक बन कर आये। उन्होंने कहा कि खर्च बहुत है। ऐसा करों कि औराई आ कर पेपर लो। पहले वहां तक एक आदमी प्रेस से पेपर लेकर आता था, हम सभी का। फिर और भी पैसा बचाने के लिये बंडल को बस से लगाया जाने लगा।  और यही से मेरी परेशानी बढ़ती ही गई। बंडल लेने के लिये लगभग 18- 19 वर्ष मैंने औराई में चौराहे पर खड़ा होकर गुजारा है। जाड़ा, गर्मी और बरसात में भी, एक यंत्र मानव की तरह हर तकलीफ को सीने में दबाये, चेहरे पर मुस्कान लिये औराई चौराहे पर खड़े खड़े वाराणसी मार्ग को निहारता रहता। वाराणसी से वह बस कब आएगी पता नहीं रहता, क्योंकि इतना ही बतया जाता है कि फलां नंबर की बस इतने बजे चली है। अब कहीं जाम लगा हो या बस खराब हो गई हो, क्या पता। धूल उड़ा रही सड़क किनारे चुपचाप खड़ा रहता।  फिर जब पेपर काफी विलंब से लगने लगा , जिस कारण औराई से मीरजापुर के लिये रात्रि में साधन का अभाव दिखा , तो मैंने मीरजापुर में बंडल लेना शुरु किया। अब बस शास्त्री सेतु तक कि यात्रा पर देर शाम निकलता हूं।
     हां अब जो यात्रा करने के लिये व्याकुल हूं, वह है मुक्ति पथ की यात्रा। जहां, से आगे न कोई सफर है, न ही हमसफर ।(शशि)

क्रमशः

Tuesday, 27 March 2018

व्याकुल पथिक आत्मकथा

व्याकुल पथिक

27/ 3/18

  जिसे हिंदी ही ठीक से नहीं लिखने आती हो, वह भला लेखक बनने का दिवास्वप्न क्यों देखें। सबसे अधिक डांट मुझे इस विषय में पड़ी है विद्यालय में। पर जो अध्यापक थें मेरे, उन्हें यह नहीं पता कि कोलाकाता में रहने के कारण बंगला भाषा का और वहां ननिहाल में ही कुछ उड़िया भाषा का भी प्रभाव मेरी भाषा शैली पर पड़ा। बाद में कालिंगपोंग गया, तो वहां नेपाली बोलने लगा। रही सही मेरी हिंदी भी चौपट हो गई। व्याकरण का ज्ञान तो मुझे बिल्कुल भी अब नहीं है। पत्रकारिता में आना मेरे जीवन की एक बड़ी दुर्घटना थी। एक हाथ में कलम , तो दूसरे में.पेपर थमा दिया गया। पर जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूं कि चुनौती कितनी भी कठिन हो, कदम बढ़ा लिया तो वापसी करना मेरा स्वभाव बाल्यकाल से ही नहीं रहा। हां, एक बात बताना चाहता हूं कि मैं यह आत्मकथा इस लोभ से नहीं लिख रहा हूं कि इसे पुस्तक का रुप दे दिया जाए। लोग मुझे पत्रकारिता जगत में संघर्ष का प्रतीक समझ मरणोपरांत मेरे चित्र पर माला पहना कर मेरी आदर्श एवं संघर्षमय पत्रकारिता का बखान करें। जिस तरह से संतान की उपेक्षा के दंश से वृद्धावस्था में व्यथित  माता पिता की मृत्यु के बाद वही पुत्र जब उनकी बड़ी सी तस्वीर अपने ड्राइंगरुम में लटका स्वाग रचते हैं। मैं यह कड़ुवा सच आपको बार बार बताना चाहता हूं कि आज के इस पत्रकारिता जगत में यदि आप जिला प्रतिनिधि / ब्यूरोचीफ के पद पर हैं, तो आपके लिये समाज सेवा का कोई स्थान नहीं है। प्रेस आपसे सिर्फ व्यवसाय मांगेगा सर्वप्रथम। विज्ञापन हित में  खबरों को तोड़मरोड़ के आपकों प्रस्तुत करते रहना होगा। हां, यदि मेरे तरह निर्भिक सम्वाददाता/ जिला प्रतिनिधि बनने की चाहत रखेंगे, तो बाहरी ही नहीं अपनी बिरादरी के भी शत्रुओं से घिरते जाएंगें। और फिर क्या होगा पता है, अवसर मिलते ही वे जब प्रत्यक्ष प्रहार नहीं कर सकेंगे , तो आपकी किसी कमजोरी का लाभ उठा मुकदमे आदि में फंसा ही देंगे। तब क्या होगा। आज के सम्पादक पहले की तरह उदार नहीं है। न ही वे कोई खतरा मोल लेना चाहते हैं। उन्हें तो बस माल(व्यवसाय) चाहिए।  आप अपनी बेगुनाही की लगाते रहें कितनी भी क्यों न गुहार , परंतु जिस संस्थान के लिये आपने दशकों खून पसीना बहाया हो, वहां से आपकों निराशा के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। हां, इतना रहम आप पर किया जा सकता है कि उस अखबार के दफ्तर के दरवाजे आपके लिये बंद न किये जाएं। परंतु प्रश्न यह है कि पैसा कहां से आएगा मुकदमा लड़ने का। आपने अनैतिक तरीके से भले ही कुछ न कमाया हो। लेकिन, यदि मुकदमे में फंसे तो सबकों सुविधा शुल्क देते रहना होगा। आपका परिश्रम का पैसा  तारीख दर तारीख  वकील, मुंशी, पेशकश सभी लेते रहेंगे और आप लाचार, बेवश , उपहास के पात्र बने किसी तरह से मुकदमा खत्म हो , इसकी प्रतीक्षा में टूटने लगेंगे। आपका सम्पादक दूर बैठा बैठा अलग फटकार लगाता रहेगा। हालांकि ऐसी स्थिति में एक बड़ा लाभ यह भी होता है कि अपने पराये की पहचान हो जाती है। कौन कितनी पुरानी बातों का बदला ले रहा है। वह भी बेनकाब हो जाता है।  मेरे कितने ही पत्रकार साथी मित्र और वे लोग जो मेरी कलम को दबाना चाहते थें, वे मुझे फंसाने के लिये इतने गिर सकते हैं, यदि मुकदमा ही नहीं होता तो मुझे इस कड़ुवे सच का ज्ञान कैसे होता। फिर भी आज मेरी जो पहचान है न, उसके इर्द गिर्द भी ये बड़े अखबारों के तथाकथित पत्रकार आ तो नहीं ही सकते हैं। हां, बड़े बैनर का लाभ उठा वे अपनी ठेकेदारी जरुर चमका सकते हैं। सो जरा विचार करें कि आपकों जिला प्रतिनिधि बन कर मेरी ही तरह एक ही जिले में सड़ना है, दुश्मनों से घिरना है अथवा आगे का सफर भी तय करना है। हां,  बड़ा सवाल तो यह है कि आज की पत्रकारिता में आप करेंगे क्या। जब मैं आया था , तो सिखाया गया था कि जन समस्याओं पर अधिक ध्यान दूं। स्थानीय लोगों से वार्ता कर बिजली, पानी सड़क , अस्पताल की समस्याओं पर कलम चलाऊं। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के कामकाज पर लिखूं। हो सके तो गांव- किसानों तक कलम को ले जाऊं।  और अब कि पत्रकारिता यह है कि यदि कहीं मुख्यमंत्री योजना के तहत सामुहिक विवाह हो रहा है। तो उसमें यह ढूंढ़ा जाए कि किसी को खराब आभूषण तो नहीं मिल गये हैं, या कोई जोड़ी नाबालिग तो नहीं है। ठीक है, यह भी एक खबर है, लेकिन प्रमुख  समाचार तो यही होना चाहिए कि डेढ़ सौ कन्याओं का हाथ पीला हुआ। (शशि)

Monday, 26 March 2018

आत्म कथा

व्याकुल पथिक
26/3/18

      आत्म कथा लिखना कितना पीड़ा दायी होता है। इसका एहसास अब मुझे हो रहा है। बिखरे एक एक रिश्ते सामने सजीव हो उठ रहे हैं। बचपन से लेकर करीब आठ -दस वर्ष पूर्व तक मैं जिनके पीछे दौड़ा अथवा जो मुझे चाहते थें, वे सभी एक एक कर दूर होते चलें। फिर भी मै इसी रंगमंच पर उसी तरह से तना हुआ खड़ा और डटा रहा। जो दर्द दिल में था, उसका तनिक भी प्रभाव अपनी लेखनी पर नहीं पड़ने दिया।
        मैंने खूब डट कर पत्रकारिता की है। जो चाहा, जैसे चाहा, उसे लिखा। जो लिखा वह सत्य के करीब रहा। यही मेरी पहचान रही। इसी कारण अपनों से दूर जाने के बावजूद मुझे बहुतों का साथ मिला।  जो किसी अच्छे सरकारी नौकरी अथवा व्यापार में भी नहीं मिलता। यही मेरी बड़ी उपलब्धि है कि इस अनजान शहर में अब सब पहचान वाले हो गये हैं। जो चेहरे से नहीं जानता , वह नाम से जानता था । एक बार की बात बताऊं मैं विंध्याचल गया। मंदिर पर किसी युवा तीर्थ पुरोहित ने अपने स्वभाव के अनुरूप रोकटोक शुरु कर दिया। मै भी अपने स्वभाव के अनुसार यह कम ही बताता था कि पत्रकार हूं। सो, अगला क्या समझे। लेकिन, इतने में पीछे से किसी की आवाज आई कि ये तो गांडीव के पत्रकार शशि गुप्ता हैं। मुझे तब आश्चर्य हुआ कि जो पंडा अभी कुछ देर पहले तक मुझ पर बरस रहा था, वह स्नेह की बरसात करने लगा। अपने व्यवहार से कुछ झेप रहा था वह , कहता मिला कि आप ही शशि भैया है।नाम सुना था, आज मुलाकात भी हो गई। कारण यह रहा मित्रों कि उसे मेरा निष्पक्ष और बेखौफ समाचार लेखन पसंद था। परंतु अब मैं इस समाचार लेखन कार्य से भी मुक्त होना चाहता हूं।और यदि आप युवा भी इस धंधे ( यहीं कहूंगा) में आना चाहते हैं, तो मैं यही कहूंगा कि अपना युवा काल पत्रकार कहलाने के प्रयास में बेजा न करें। पत्रकारिता अब समाज का दर्पण नहीं रहा। यह खरीद फरोख्त की वस्तु हो कर रह गई है।
      इसीलिये इस पहचान से मैं आजाद होना चाहता हूं। मुक्ति पथ जिसे वैराग्य पूर्ण स्थिति मैं कहता हूं। वही मेरा गणतव्य है। जो अवसर  27 वर्षों  पूर्व  मुझे आसानी से मिल रहा था उस आश्रम में, उसे त्यागने की बड़ी कीमत मैंने चुकाई है। ऐसे में लम्बी सांसें लेकर आंखें बंद करने से भी मन को बड़ी शांति मिलती है मुझे। स्मृतियों में जो कुछ है, वह धुमिल पड़ने लगता है। किसी ने क्या कष्ट दिया अथवा स्नेह ही क्यों न दिया हो, मैं इनसे ऊपर उठना चाहता हूं। लेकिन,
ऐसा भी नहीं है कि मैं जिस रंगमंच पर तब और अब भी खड़ा हूं । वह मेरी विवशता है। मैं जब चाहता इसका परित्याग कर सकता था । पत्रकारिता में आकर धन अर्जित करना या फिर स्वयं को समाज का एक विशिष्ट व्यक्ति समझ कर दर्प से इतराना मेरे स्वभाव में नहीं है। अनेक ऐसे अवसर आये जब मैं प्लेटफार्म बदल सकता था। परंतु स्वभाव से मैं हठी हूं। किसी की अधिनता स्वीकार नहीं मुझे । सो, सीना ताने खड़ा रहा। पहचान मेरी  धीरे धीर अब बदलने लगी थी। मैं भले ही अखबार बांटता था, परंत मेरी छवि कभी और हॉकरों की तरह नहीं रहीं। बल्कि लोग तो मुझे देखते ही यह कहते थें कि शशि यदि मौजूद है, तो वह दबेगा नहीं, लिखेगा जरुर। उनका यह विश्वास मैं तब टूटने भी नहीं देता था। शाम होते होते गांडीव की टंकार सुनाई पड़ने लगती थी। यह भी भय नहीं था मुझे कि स्वयं ही खबर छाप कर उसे बांटने निकला हूं, तो कोई विवाद नहीं कर बैठै। ऐसा शायद इसलिये क्योंकि लोगों को मुझसे स्नेह था और अब भी है। वे कहते कि क्या खराब छपा है, सही तो लिखा है। बात समाप्त हो जाती थी। हां, लेखनी के माध्यम से मैंने किसी का भयादोहन कभी नहीं किया। अनजाने में कभी कोई समाचार कुछ गलत छपा भी हो, तो सत्यता ज्ञात होते ही , उसमें सुधार करना भी अपना कर्तव्य समझता रहा। (शशि)

क्रमशः

Sunday, 25 March 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
25/3/ 18

    विचित्र विडंबना है , हम आज राम जन्मोत्सव मना रहे हैं, तो जगह जगह ध्वनि विस्तार यंत्र (डीजे) के माध्यम से तेज आवाज निकाल कर। जिन जिन स्थानों पर वे लगे हैं, वृद्ध और बीमार जन इससे तकलीफ में दिखें। अपने दर्प के लिये दूसरों को कष्ट देना , क्या यही हमारा मर्यादा पुरुषोत्तम राम के प्रति समर्पण और भक्तिभाव है। दिन चढ़ते ही कितने ही लोगों की यह शिकायत मुझ तक आ पहुंची कि बड़ी ऊंची आवाज में डीजे बजा रहे हैं , कृपया व्हाट्सएप पर ग्रुप में कुछ पोस्ट कर दें। उधर , पुलिस जब कोई कार्रवाई करती है, तो विरोध प्रदर्शन। अहंकार भरे तेज स्वर में जय श्री राम बोलने से ही तो हम सच्चे रामभक्त नहीं हो जाएंगे। सवाल यह है कि भगवान राम के जन्मोत्सव पर आज हममें से कितनों ने उन्हीं की तरह आचरण करने का संकल्प लिया। जरा हाथ उठा कर  मन को टटोलते हुये बताएं आप भी  !
 
   मैं तो अभी इंद्रियों के संयम के मामले में तीसरे ही  पायदान पर फंसा हुआ हूं। स्वाद और अनर्गल ढंग से धन के अर्जन के लोभ पर नियंत्रण के बाद मेरा जो प्रयास चल रहा है, वह वाणी पर संयम है। अधिक बोलूंगा  तो जाने अनजाने में असत्य बोलूंगा, यह तो तय है। इसीलिए महापुरुष जन अधिक से अधिक मौन धारण किये रहते हैं सम्भवतः । इससे चिंतन शक्ति भी बढ़ती है। सो, इस प्रयत्न में रहता हूं कि अनावश्यक  वाणी को कष्ट न दूं। तभी और ऊपर वाली सीढ़ी पर पांव जमा सकूंगा। पर याद तो यह भी रखना है कि जितनी ऊंचाई पर चढ़ेंगे। फिसलने पर चोट लगने का खतरा भी उतना ही अधिक है। अतः प़ांव जमा जमा कर चढ़ना चाहता हूं। जो मैल वर्षों से तन मन पर जमा है। उसे इतनी शीघ्रता से कोई केमिकल डाल कर  साफ तो नहीं किया जा सकता है न।

        जब बात सत्य-असत्य बोलने की करता हूं , तो तो मुझे अपने बचपन का एक रोचक प्रसंग याद हो आता है। मेरे पिता जी कुछ अधिक ही अनुशासन प्रिय थें। एक बार उन्होंने मुझे घी लेने चिन्हित किराने की दुकान पर भेजा। वह दुकान कुछ दूर पर थी। बालक था, सो पास के ही एक दुकान से घी ले चला आया। परंतु यह बात छिपाये रखी। चाहे जैसे भी घर पर यह झूठ पकड़ में आ ही गया। इसके बाद मेरी जम कर खबर तो ली ही गई। साथ ही एक सादे पन्ने पर यह लिख कर मुझसे रामायण में रखने को कहा गया कि अब कभी झूठ नहीं बोलूंगा। यह नैतिक भय दिखलाया गया कि यदि झूठ बोला, तो बहुत पाप लगेगा। इससे मेरा बाल मन तब काफी सहम गया था। ठीक से याद नहीं है कि कितने महीनों तक फिर झूठ नहीं बोला था ।

क्रमशः

Saturday, 24 March 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक

24/3/18

आज दोपहर बाद जब विंध्याचल धाम में चल रहे माता का भंडारा से वापस आटो से शहर की ओर लौटा और लालडिग्गी पर उतर राही लाज की ओर पैदल आ रहा था, तभी अचानक गनेशगंज तिराहे पर किसी ने मुझे पुकारा कि अंकल-अंकल। देखा तो एक प्यारा सा बालक खड़ा था। जो कह रहा था कि सड़क पार करवा दीजिए। भीड़ काफी थी। इसके बावजूद बाइक फर्राटे भर रही थीं। सो, यह देख मैंने जिस दायीं हाथ से पहले उसे पकड़ा था, अब बायीं ओर ले लिया , फिर पूरी तसल्ली कर उसे सड़क उस पार छोड़ा । यह करते हुये मुझे कितना सुखद एहसास हुआ,इसके लिये शब्द नहीं है। स्मृतियों में अपना बचपन भी याद हो आया।  परंतु अब तो सारे रिश्ते ही बिखर चुके हैं। बस स्मृति शेष होने को है। उम्मीद करता हूं कि जिस तरह से अच्छे भोजन एवं धन के लोभ से मैं पूर्ण रुप से मुक्त हो गया हूं। धीरे धीरे सभी इंद्रियों पर भी नियंत्रण कर ही लूंगा। क्यों बचपन से ही मैं हठी जो हूं। जो ठान लिया , सो किया अवश्य है। मेरे गुरुजन कहते थें कि तुम्हारी मेधाशक्ति भले ही उतनी तीव्र न हो। लेकिन तुम्हारा श्रम , तुम्हें पहले पावदान पर ला खड़ा करता है। इसी कारण मैं अपनी कक्षा में सदैव ही प्रथम स्थान पर बना रहा। नहीं तो अपने वर्ग में तो जरुर ही। वाराणसी से वापस कोलकाता में जब दर्जा 6 में भर्ती हुआ। तो वहां की पढ़ाई के लिहाज से मैं कमजोर छात्र था विद्यालय का। लेकिन, जब वार्षिक परीक्षा परिणाम आया , तो मेरा नंबर प्रथम रहा और स्कूल के नियमानुसार कक्षा 7 में वहां मैं ही मानिटर होता। सहपाठी मेरी प्रतीक्षा कर रहे थें , लेकिन नानी का निधन हो गया और मेरा दुर्भाग्य मुझे वापस वाराणसी खींच लाया। काश ! इस तरह से मां(नानी) मुझे छोड़ कर ना जाती। मां का प्यार मुझे उन्हीं से मिला और कुछ मौसी जी से भी। खैर , बचपन की बातें फिर इस बालक के अंकल की एक पुकार से ताजी हो आईं। जब व्याकुलता बढ़ती है, तो किशोर दा की एक गीत

 कोई लौटा दे मेरे बीते हुये दिन , बीते हुये दिन वो मेरे प्यारे पल....

इसे सुनने के लिये मन मचल उठता है। पर मैं तो ठहरा यहां एक रंगमंच का कठपुतली मात्र । सुबह से देर रात तक एक ही शो इन करीब ढाई दशक से कर रहा हूं। और अब मैं इतना कुशल हॉकर हो गया हूं कि रात्रि 11 बजे भी पेपर अपने ग्राहकों को देता हूं , तो उसे  नहीं लेने की बात न कह वे यह कहते है कि शशि भाई कल सुबह दे देंते ,थक गये होंगे आप। क्या ऐसा कोई पाठक मिलेगा आपको। जो शाम का पेपर अगले दिन भी लेने को तैयार हो। परंतु इसके लिये बड़ा त्याग भी किया हूं। इस कुशल व विदूषक हॉकर ने मेरे सभी अपनों को मुझसे एक एक कर छीन लिया। जब गांडीव लेकर मीरजापुर आया था, तब से अब तक अपने परिवार के सिर्फ एक वैवाहिक कार्यक्रम में मैं शामिल हो सका, वह रहा ताऊ जी की बड़ी पुत्री का विवाह और फिर उनके इकलौते पुत्र के दुर्भाग्यपूर्ण मौत पर उनके घर पहुंचा था। इसके बाद बहन की शादि, ताऊ जी की छोटी पुत्री की मृत्यु,मौसा जी की दुर्घटना में मौत और फिर उनकी इकलौती पुत्री की शादी, जिसे मैंने अपनी गोद में खिलाया था, बहन और दो दिनों बाद पिता जी की मौत, इन सभी मांगलिक अमांगलिक कार्यक्रमों में शामिल होने की जगह इस शहर की सड़कों पर पैदल दौड़ लगाता हुआ , बाद में साइकिल से आप तक अखबार पहुंचा रहा था।मेरी सारी संवेदनाएं मर चुकी हैं। मैं इस रंगमंच का एक विदूषक मात्र हूं। यहां जो संबंध बने , जो अपने लगें। उनके भी ऐसे कार्यक्रमों में कहां शामिल हो पाया ठीक से। क्या अब भी आप कहेंगे कि मैं एक कुशल समाचार पत्र विक्रेता नहीं हूं।
    और रही बात पत्रकारिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी की तो,
गुरुजी (पं० रामचंद्र तिवारी) के निधन पर भी उनकी अंतिम यात्रा में न शामिल हो, मैं उनके जीवन पर और उनके साथ गुजरे दिनों को कलमबद्ध करने में जुटा था । ताकि शाम तक वह सब आ जाये। इस पर चर्चा बाद में करुंगा, अभी तो हॉकर बनने की बात चल रही है।(शशि)

क्रमशः