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Thursday, 7 June 2018

इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास...





     
     निःसन्देह ब्लॉग लेखन का मेरे व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव दिख रहा है। जो भी मैंने लिखा था, वह आज मुझे ही नसीहत दे रहा है । देखो रंग मत बदलों मेरे यार ! कल तो आत्मबोध कर रहे थें और आज तनिक सी बात पर यूं क्यों उद्वेलित हुये जा रहे हो । अंदर की ये आवाज अब कुछ तो साफ सुनाई पड़ती है। यहां मेरे भी कुछ मित्रों का कहना है कि दिन भर समाचार तलाशते तुम अपनी बातें ना कर पाते थें। सो, मन हल्का करने का यह अच्छा ठिकाना है। सो, एक बात तो साफ कर दूं कि आत्मावलोकन ही मेरे ब्लॉग लेखन का मकसद है।
          अब देखेंं न कल रात और आज सुबह भी दो बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं कि यदि पूर्व की स्थिति में होता, तो मन को अति आघात पहुंचना निश्चित था। परंतु अब किसी के द्वारा किया कटाक्ष भी कबीर की वाणी लगती है। अपना कर्मक्षेत्र ही ऐसा है कि जाने अनजाने में मित्र भी शत्रु बन जाता हैंं।  इसका मतलब यह तो नहीं की हम भी तलवार भांजने लगे। विनम्रता ही हमारी पहचान है, पूर्व में लिखी बातें यह हर वक्त याद दिलाती हैं। गलतियों को बतलाती हैं और नेकी की राह दिखलाती हैं। सो, आज जो कुछ हुआ, उसे लेकर मन नहीं तनिक मलीन हुआ। ईश्वर को धन्यवाद देता हूं कि यह सुधार मुझमें जारी रहे। पत्रकारिता छोड़ते समय न रहे किसी से दुश्मनी बस यारी हमारी रहे। भूख, गरीबी, बेरोजगारी, बेगारी, बदहाली पर तो कब का नियंत्रण पाया हूं। अब वाणी संयम की जब बार है। कल रात से आज सुबह जो दो कड़ी परीक्षा देनी पड़ी है, उम्मीद यही है कि पास जरुर उसमें हुआ हूं।  मान-अपमान  से जब तक ऊपर नहीं उठेगा हमारा मन , तब तक यह व्याकुलता जारी है , यह हमें और आपको भी पता है।  फिर भी आज अपने में इस परिवर्तन पर मन ही मन आनंदित हूं। हां, मानव अभी मुझे बनना है ! एक बात बताऊं, कम्पनी गार्डन में भी कभी "मानव जी"  मिला करते थें। मैं निठल्ला उस समय उनकी कविताओं का मोल ना समझ सका था। वे पांखड से दूर बेहद ही सज्जन इंसान थें । बुजुर्ग थें और हाई ब्लडप्रेशर के शिकार थें। काशी की धरती थी,  सो कर्मकांडी उन्हें खिसियाते थें। फिर भी बीड़ी के धुएं में मानव जी की कड़क आवाज दूर तक उनकी मौजूदगी का एहसास दिलाती थी। सत्य को भला कौन दबा सकता है, मुझे बार बार वे सिखलाते थें। आज अचानक आंखें नम हो आयी हैं। काश ! कुछ दिन और उनके समीप गुजारा होता, संसार के इस भुलभुलैया से कब का मोक्ष पाया होता।  बस इस प्यारी सी प्रार्थना...

             "इतनी शक्ति हमें देना दाता
           मन का विश्वास कमजोर हो ना
            हम चले नेक रस्ते पे हमसे
             भूलकर भी कोई भूल हो न"

  के साथ आप सभी को शुभरात्रि कहता हूं।

(शशि)
       चित्र गुगल से साभार

Wednesday, 6 June 2018

आनंद की खोज मेरी जब हुई पूरी !





   
    आनंद क्या है , कैसा है और कहां है ... हर इंसान को इसकी तलाश रही है। धन से जब वह नहीं प्राप्त होता तो धर्मग्रंथों में हम उसे ढ़ूढ़ने लगते हैं। पुकारते है हम उसे आनंद ओ आनंद ! तुम कहां हो भाई... फिर भी वह हमारे पास नहीं आता। मृगमरीचिका सा हमें दौड़ाता है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा हर धर्म स्थलों की दौड़ लगाते हैं हम । कबीर की अमर  वाणी को भी अजमाते हैं हम, "  मोको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में।"
    फिर भी यह आनंद है कि सुनता ही नहीं, मानो  मूक बधिर और नेत्रहीन हो गया है वह !  या जानबूझ कर पास आने से मटियाता है ।  व्याकुल पथिक शीर्षक से इस ब्लॉग के सृजन का मकसद भी तो मेरा यही है। अपनी बातें इससे साझा जो कर सकूं।  इस वर्ष 17 मार्च से इस पर जो कुछ लिख रहा हूं, उसे जब तब उलट पलट कर देख भी रहा हूं। कभी - कभी सोचता हूं कि ऐसा क्यों लिख दिया मैंने । मन की वेदनाओं को जब इतने वर्षों तक दबाये- छुपाये रहा हूं , तो अचानक कौन सी व्याकुल आ पड़ी कि यह पथिक यूं ही पिघलता सा  गया था। कभी - कभी तो लगता है कि यह क्या बकवास लिख रहा हूं। खुद ही अपनी जगहंसाई का जरिया यूं क्यों सृजन कर कर रहा हूं। हिन्दी तक शुद्ध लिखने आती नहीं महाशय को और प्रवचन कर रहा हूं। मित्रों यह मन भी न... क्या कहूं अब इसे ?  हां, एक कार्य अच्छा यह हुआ है कि रात की अंधेरी गलियों से निकल कर जबसे सुबह का सूरज देख रहा हूं। अभी कल ही की तो बात है , आनंद सामने खुद- ब -खुद यूं ही खड़ा था। सुबह के पांच बज रहे थें, जब मैं अखबार बांटते हुये एक पार्क की ओर बढ़ा था। देखा एक प्रौढ़ दम्पति एक दूसरे का हाथ थामें बच्चों सा खिलखिला रहा था। न यौवन ढलने का गम , ना ही बुढ़ापे का भय... वह तो बस आनंद की प्रतिमूर्ति ही मुझे दिखा था। साइकिल से पीछा करते मैं अपलक उन्हें निहारे जा रहा था। कारण मेरा मार्ग भी वही था , जिधर उन्हें जाना था। देखा, तभी एक मंदिर पर महिला के पांव ठहर जाते हैं। दुपट्टे को सिर पर किसी दुल्हन की तरह वह सवारती  है , साथ ही हमसफर को भी नयनों से इशारा करती है। दोनों वहां सिर झुकाते हैं, मानों एक दूसरे की सलामती चाहते हैं। और फिर उसी अंदाज में खिलखिलाकर कर मुस्कुराते हैं। घर से पार्क तक का उनका यह सुहावना सफर शायद हर सुबह ऐसा ही होता होगा। फिर किसी और आनंद की क्या है जरुरत इन्हें। हां,  दुआएं इतनी  हमारी भी है, यूं ही गुनगुनाते रहें,  यह जो जोड़ी प्यारी सी है...
 
     हमसफर मेरे हमसफर, पंख तुम परवाज़ हम
    जिंदगी का साज़ हो तुम, साज़ की आवाज हम।

( शशि )
चित्र गुगल से साभार

Tuesday, 5 June 2018

पथिक ! किस छांव की अब तुझे तलाश...


  केंद्रीय राज्यमंत्री ,भारत सरकार व मीरजापुर सांसद अनुप्रिया पटेल एवं जिलाधिकारी अनुराग पटेल पौधा लगाते
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   स्टोर बाबू की चाकरी ने मेरे कल्पनाओं के पंख कब के कतर दिये है। सो, मुझे सपना बेचना आता नहीं। ज्ञान गंगा के लिये व्हाट्सअप ग्रुप वैसे ही पटे हैं। मैं तो बस वहींं लिखता हूं, जो सहा हूंं और देखता हूं। देखें न आज एक बार फिर विश्व पर्यावरण दिवस का शोर चहुंओर मचा है , पर मेरा मित्र कम्पनी गार्डेन अपने सिकुड़ते अस्तित्व पर सिसक रहा है । आग उगल रहे सूर्य की तेज किरणों से बचने के लिये हर राहगीर पेड़ की छांव तलाश रहा है। पर वृक्ष हैं कहां मेरे भाई , जो उसके नीचे तनिक ठहर अपने तन की तपिश को शांत कर  पाओगे।यातायात सुगम बनाने के लिये जिन मार्गों पर फोरलेन  सड़कें बन रही हैं, वहां उनके दोनों किनारे लगे हजारों वृक्षों को चंद घंटों में काट धाराशायी कर दिया गया है। जो सैकड़ों वर्ष से खड़े थें। हम मुनष्यों को आम, अमरुद और जामुन देते थें। जो फलदार नहीं भी थें , वे भी हमें छांव तो निश्चित ही देते थें। हमारे ही जीवन रक्षा के लिये भूगर्भ जलस्तर को बढ़ा रहे थें। फिर भी हम मनुष्यों ने उन्हें असमय मौत दे दी क्यों ...स्वयं के विकास के नाम पर यह कैसी हमारी कृतघ्नता है। जरा भी नहीं विचार किया किसी ने कि जब फोरलेन सड़क की प्लानिंग बनी थी तो फिर इन वृक्षों को काटने से पहले नये पौधों को क्यों नहीं लगे थें। शास्त्रीपुल पर बसों की प्रतीक्षा करने वाले यात्रियों से पूछे इन वृक्षों के कटने का दर्द, तेज धूप में झुलसते व्याकुल हुआ जा रहा है उनका तन- मन । इस ओर सड़क तक नहीं बनी है अभी , अतिक्रमण दूर तक दुकानदारों ने कर रखा है। लेकिन , करीब दो वर्ष पूर्व सबसे पहले वृक्षों का गर्दन ही रेता है यहां हमने । इंसान की इनसे ऐसी क्या दुश्मनी थी कि एक पेड़ भी नहीं छोड़ा है। मैंनें जिन दो वृक्षों के नीचे औराई के लिये बस की प्रतीक्षा में दो दशक गुजारे थें। वे भी नहीं रहे यहां, पथिक किस छांव को अब तलाशोगे । हैं अब तो धुआं उगलते अनगिनत विशालकाय वाहन यहांऔर एक यात्री शेड जो सांसद ने लगवाया है।  कोई बाईस वर्ष इस मीरजापुर- औराई मार्ग पर सफर रही हमारी। बस से सड़क किनारे दोनों और हरे-भरे वृक्ष मन को कितना आनंदित किये हुये थें । यदि ट्रैफिक लोड के कारण जब कभी जाम लगता था। हम यात्री इन वृक्षों के नीचे ही तो शरण लेते थें। याद है मुझे जाम लगने पर माधोसिंह से औराई कितनी ही बार इन वृक्षों की छांव तले ही मैं पैदल चला था। नहीं तो अंगारे बरसाता यह सूर्य का तेज मृत्यु का देव बना खड़ा था। हाय ! जीवनदाता वृक्ष पर इतना अत्याचार  कर, फिर विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधे लगाने का स्वांग क्यों। कहीं माननीय, तो कहीं पत्रकार व सामाजिक संगठन ताम झाम से फरसा चला पौधे लगा रहे हैं। फोटो  खिंचवाने की होड़ यहां भी उनमें लगी है । सोशल मीडिया का नेटवर्क सुबह से ही ओवरलोड है। उधर अपना विंध्य पर्वत पुकार रहा है, कोई हमारे नंगे बदन का फोटो भी तो लो ना भाई। दशकों से अवैध खनन ने मेरी भी हरियाली छीनी है। मुझे पत्थर का ढ़ांचा इन्हीं लोगों ने बना खड़ा किया है। अनगिनत वृक्षों को विस्फोट के धमाके में दफन कर मेरा कलेजा अनेको बार फटा है। फिर आज के दिन चंद पौधे लगा इन्हें दी जा रही यह कैसी श्रद्धांजलि है । यह कैसा ढ़ोग है , कुछ तो बोलों बंधुओं ! जो जेठ की दुपहिया में तुम ये पौधे लगा रहे हो...
(शशि)

Monday, 4 June 2018

निकम्मा नहीं साहब स्टोर बाबू कहो..



     जब तक आश्रम में था या उससे पूर्व कलिंपोंग में भोजन और वस्त्र की व्यवस्था हो जाती थी, सो चिंता काहे की.. तब भी मेरी यही दो जरुरतें थीं  और आज फिर से उसी राह पर  हूं । यूं समझ लें कि इस महंगाई के हिसाब से बेरोजगार ही हूं। संस्थान ने बीते होली पर जब मुझे विज्ञापन मिला , तो उसमें से अपना हिसाब रख लेने को कहा गया था । पर भूख तो हर रोज लगती है न साहब , पैसे की जरूरत भी हर माह होती है ! मैं तो किसी विभाग से पत्रकार के नाम पर धन उगाही भी नहीं करता हूं। फिर भी बंधुओं मैं खुशकिस्मत हूं कि इन 24-25 वर्षों में अपनी सारी भौतिक इच्छाओं को दबा कुछ पैसे इसी संकट काल के लिये एकत्र किये हैं, ताकि किसी के सामने हाथ फैलाना न पड़े। और ऐसा मुझे विश्वास है कि अपने स्वाभिमान की बलि मैं कतई नहीं चढ़ने दूंगा..
     बात यदि अपनी पहली नौकरी की करूं, तो आश्रम छोड़ने के बाद सीधे मुजफ्फरपुर मौसी जी के घर एक बार फिर जा पहुंचा। वह मेरा तीसरी बार मुजफ्फरपुर जाना हुआ था। पहली बार मां - बाबा संग कोलकाता से कुछ दिनों के लिये गया था। दूसरी बार हाईस्कूल करने के बाद घर से संबंध बिगड़ने पर चला गया। तब मौसा जी का मोटर पार्ट्स और मैकेनिक की दुकान थी। लेकिन, तीसरी बार जब गया तब परिस्थितियां विपरीत थी। मौसा जी अपने पिता जी के सर्राफा दुकान में ड्यूटी देते थें। हालांकि मौसी जी मेरा बहुत ख्याल रखती थी। जब छोटा था, तभी से ही वे मुझे अपना ही पुत्र समझती है। उनकी पुत्री यानी मेरी बहन स्वीट तो मुझसे साढ़े बारह वर्ष छोटी है। इसीलिये तो कहता हूं कि नियति का यह कैसा खेल है कि तीन -तीन मां के होने के बावजूद मैं एक बंजारा हू... खैर, मुजफ्फरपुर में इस बार मैं किसी पर बोझ नहीं बनने की सोच रखी थी। युवा जो हो गया था, कहीं यहां भी लोग वही निठल्ला न कहने लगें मुझे । सवाल यह उठा कि मेरे पास कोई डिग्री तो थी नहीं कि उन दिनों बिहार जैसे पिछड़े प्रांत में मुझे अच्छी प्राइवेट नौकरी मिल जाती। बनारस में मास्टर साहब का लड़का और कोलकाता में बाबा मां के दुलारा , यही मेरी पहचान थी। एक बैंक में बड़ी मौसी जी कार्यरत थीं। बैंक प्रबंधक रहें बड़े मौसा जी के आकस्मिक निधन के बाद उन्हें नौकरी मिल गयी थी। उनका मुझपर काफी स्नेह रहा। सो, एक बड़े थ्रेसर कम्पनी में काम मिल गया। फैक्ट्री के मालिक ने मुझे स्टोर सम्हालने की जिम्मेदारी दी थी। मैं काफी सहमा हुआ था, स्वयं पर ग्लानि भी हो रही थी कि कहां तो ख्वाहिश इंजीनियर बनने की थी और अब यह स्टोर बाबू का काम.. वो गाना याद है न आपको..

जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर , कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं..

   सो ,चल पड़ा काम पर।तब मैं साइकिल तक ठीक से नहीं चला पाता था। अतः मौसा जी एक  छोटी साइकिल ले आये। यहां से बाद में मुझे दूर सुनसान इलाके में फेक्ट्री पर पोस्ट कर दिया गया। साइकिल से जाने में एक घंटा और वापसी में भी इतना ही समय लग जाता था। यूं कहें कि सुबह सात बजे निकला तो रात्रि साढ़े नौ -दस बजे वापसी होने लगी थी। थ्रेसर मशीन का सीजन जो था। मालिक समझ गये थें कि मैं अच्छे परिवार का हूं और बेहद ईमानदार भी, इसलिये स्टोर से बिना मेरी अनुमति के कोई कुछ नहीं लेता था। यहां तक कि मालिक ने स्टोर रजिस्टर भी देखना बंद कर दिया था। कोई कुछ कहता, तो सीधे कहते कि  लड़के से पूछों।  मालिक का मुझमें यह विश्वास देख वरिष्ठ कर्मचारियों का ईष्या करना स्वभाविक है।सो, एक शाम न जाने क्यों मालिक ने मुझे अपशब्द कह दिया, इसके बाद वे मुझे वापस काम पर बुलाने आये थें , बड़ी मौसी जी से अनुरोध करते रहें, पर मैं फिर नहीं गया वहां...
    बिना किसी डिग्री के कुशल स्टोर बाबू बनने की वह मेरी पहली पहचान थी , जिसे मैंने अपनी ईमानदारी, परिश्रम और काम के प्रति समर्पण से बनाई थी।
      बंधुओं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि हम किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकते हैं। मुजफ्फरपुर आकर मैंने यही सीखा । अपनों द्वारा निठल्ला कहलाने के कलंक से यहां मुक्त जो हो गया...
  (शशि)

Sunday, 3 June 2018

बेरोजगारी का दर्द देख नम हो आती हैं आंखें



         जैसे ही हम छात्र जीवन से गुजरते हुये यौवनावस्था में प्रवेश करते हैं और यदि हम उद्यमी अथवा बड़े राजनेता के लाडले नहीं हैं,तो हमारी पहली चुनौती नौकरी ही होती है। सरकारी नौकरी मिलनी लाटरी लगनी जैसी ही तो होती है। यह एक बड़ा जुआं है। हर मेधावी बच्चों को पता है कि  10 अंकों के इस खेल में खुलेगा सिर्फ एक ही अंक। वहीं हमारी जनसंख्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है।  यदि बच्चे ने मेहनत से तैयारी की और दुर्भाग्य से वह असफल रहा, नौकरी नहीं मिली तो वह टूट जाता है। प्राइवेट सेक्टर में आकर्षक नौकरियां हैं जरुर , परंतु तैयारी तो कुछ और पर चल रही थी ,उस सरकारी नौकरी न पाने वाले नौजवान की। बेरोजगारी की स्थिति में वह मजबूरन प्राइवेट सेक्टर में नौकरी कर लेता है, पर एक वेदना उसके चेहरे पर साफ झलकती है। अब देखे न प्राइमरी पाठशाला में सिर्फ हाजिरी लगा गुरु जी जितनी मोटी रकम सरकार से पाते हैं,प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाला अध्यापक तमाम योग्यता रखने के बावजूद अत्यधिक श्रम कर भी सरकारी सहायक अध्यापक का एक चौथाई वेतन तक नहीं पाता। तो फिर उसका कुंठित होना स्वाभाविक है। हम जिस पिछड़े शहर मीरजापुर में रहते हैं। वहां वहां निजी विद्यालय के शिक्षक हो या फिर किसी प्रतिष्ठान में काम करने वाले कर्मचारी अमूमन पांच हजार वेतन ही प्रतिमाह पाते हैं। ये सभी पढ़े लिखे युवक युवतियां हैं। बताए घर गृहस्थी कैसे चलेगी इनकी। किराये पर ढ़ाई हजार रुपये से नीचे कोई कमरा ही नहीं मिलता। यह सोच कर भयभीत हो जाता हूं कि यदि संग बीवी-बच्चे होते, तो साढ़े चार हजार रुपये के पगार  (अब तो उसका भी ठिकाना नहीं है) में क्या करता मैं ? इस ईमानदारी  और स्वाभिमान  की रक्षा कैसे करता ! पत्नी भी कहीं यह न कह बैठती की तेरी दो टकियां दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये...
    अभी तो मुसाफिर की तरह रात कट जाती है। इन पच्चीस वर्षों में कोई घर ठिकाना नहीं है, यहां मेरा। अपने अखबार का भी मैं एक चलता फिरता दफ्तर हूं। एक पत्रकार हूं, सो हर पर्व त्योहार पर जब भी रिपोर्टिंग करने निकलता हूं तो निम्न मध्यवर्गीय परिवार के मुखिया की व्याकुलता देख आंखें मेरी भी नम हो जाती हैं । रमजान के बाद में अभी ईद पर्व आएगा। किसी गरीब मुस्लिम इलाके में यह पूछने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूं कि भाई जान कैसी तैयारी चल रही है। सुबह मुस्लिम इलाके में एक प्रतिष्ठित दरी निर्यातक के भव्य बंगले पर पेपर देने गया, तो देखा कि सामने एक खंडहरनुमा मकान के बारजे पर एक वृद्ध बुनकर दम्पति दरी की काती सुलझा रहे थें और एक दूसरे को हाथ के पंखे से हवा भी कर रहे थें। यह सुखद दृश्य को  मैं अपलक निहारता रहा। सोचा चलो इस गरीबी में एक तो अच्छाई है कि आपसी प्रेम सम्बंध को वह और प्रगाढ़ कर देती है। मन में भावना जगी कि इस वृद्ध बुनकर दम्पति का एक फोटो ले लूं, फिर ठिठक इसलिये गया कि कहीं वे बुरा न मान लें। क्यों कि गरीबों की निगाहों में हम मीडिया कर्मी झूठ की राह पर हैं । इसीलिए कभी मजबूरी में ही मेरी जुबां से यह निकलता है कि पत्रकार हूं भाई ...मुस्लिम परिवार में आज भी महिलाएं बीड़ी बना अपने बच्चों के पेट की ज्वाला शांत करती हैं। तमाम तरह की बीमारियों ने कुपोषण के कारण इन्हें घेर रखा है। जब से जीएसटी का हल्ला बोल हुआ है, कालीन और दरी के धंधे पर अच्छे दिन की ख्वाहिश का ग्रहण लगा हुआ है। कल ही तो मिर्जापुर दरी एवं मैन्युफैक्चर एसोसिएशन की बैठक हुई थी। जिसमें बताया गया जीएसटी रिफंड की भारी समस्या से निर्यातकों की पूंजी का एक बड़ा हिस्सा सरकार के पास फंसा है। जिससे 48 फीसदी बुनकरों का पलायन हो गया है। चुनाव में तो हमारे रहनुमाओं ने सीना चौड़ा कर नौकरी देनी की बात कही थी, पर यह उल्टी बयार कैसे चल पड़ी...
  पढ़ेलिखे बेरोजगार नौजवानों की टोली जरायम की दुनिया  में इंट्री मारे जा रही हैं। बस चंद रुपयों के लिये ये बड़े बड़े अपराध कर बैठ रहे हैं। काश ! इनके पास नौकरी होती..तो पापा का नाम यूं ना बदनाम करते। बेरोजगारी का जख्म आज भी इस उम्र में भी मुझे अतीत से जुड़ी कड़ुवी स्मृतियों को ताजा किये रहती है।

(शशि)

Saturday, 2 June 2018

दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे...

 
     मदर इंडिया फिल्म का एक प्यारा सा गीत है..

 दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे
/ रंग जीवन में नया लायो रे...

       आज सुबह चार बजे जब मैं उठा और स्नान कर पौने पांच बजे अखबार का बंडल लेने मुकेरी बाजार चौराहे पर पहुंचा, तो सारे अवसाद से मुक्त था। इन पच्चीस वर्षों में खुले वातावरण में सुबह को उगते मासूम से उस लाल सूरज को कहां देख पाया था। जिससे मैं काशी के गंगा घाट पर हर सुबह आंखें मिला कर बातें किया करता था। पर अब मैं वह सब कर सकता हूं। सुबह दो घंट साइकिल चलाना कोई खराब नहीं लग रहा था, बल्कि इस दुर्बल शरीर में कुछ स्फूर्ति ही आ गयी ,ताजी हवा लगने से। अनेक स्नेही पाठकों ने कह रखा है कि शशि भाई चिन्ता ना करें, पेपर सुबह ही डाल दिया करें। ग्राहक और हॉकर वाला उनका - मेरा संबंध नहीं है और ना ही एक पत्रकार जैसा ही। सो, सुबह अखबार बांटने में बड़ा ही आनंद आ रहा था, ऐसा लगा कि चिन्ता से मुक्त हो चिन्तन  की ओर बढ़ रहा हूं। पैसा और भोजन यह दोनों मेरे लिये प्रधान कभी नहीं रहा। आज ही कोर्ट में तारीख के कारण दोपहर में प्याज- रोटी ही नसीब में था। सब्जी बनाने का समय नहीं मिला, क्यों कि बड़े भैया आशीष बुधिया जी का आग्रह था कि होटल गैलेक्सी में आयोजित कालीन और दरी निर्यातकों की मीटिंग में आना है। जलपान तो वहां भी बढ़िया था, पर मैंने आजीवन बढ़िया भोजन न करने का कठोर संकल्प ले रखा है, इस वर्ष से। सो ,एक बर्फी खा कर ठंडा पानी पी लिया और चाय पी कर जो बिस्तरे पर आ गिरा, तो नींद ऐसी लगी कि रात्रि में भी कुछ खाने की व्यवस्था नहीं कर सका..
       मेरे जीवन संघर्ष का सबसे कठिन और लम्बा दौर सचमुच यूं समाप्त हो गया है। अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहा हूं। अब देखें न आज थकान के कारण देर शाम आंखें लग गयी थीं और अचनाक रात्रि के साढ़े नौ बजे  हड़बड़ा कर उठ बैठा। ऐसा लगा कि देर तो नहीं हो गयी , पेपर लेने शास्त्रीपुल पर जान में...मोबाइल के स्क्रीन पर नजर दौड़ाई घंटी तो नहीं बजी तो,  अनिल ने बस नंबर बताने के लिये फोन तो नहीं किया था। अकसर ऐसा होता है जब बीच में निंद्रा भंग हो जाती है तो अपने याददाश्त को न जाने क्या हो जाता है। खैर याद आयी कि मैंने ही तो उसे कह दिया था कि तुम्हें भी देर शाम तक वाराणसी कैंट डिपो में बस तलाशने की अब जरूरत नहीं है। अखबार वाली जीप से रात में बंडल लगा दिया करों। सो, फिर कुछ देर के लिये सो गया। ऐसी आजादी कहां मिली थी इन पच्चीस वर्षों में.. अखबार का बंडल लेने के लिये मैंने करीब बीस वर्ष औराई चौराहे पर घंटों खड़े रह कर गुजारा है और साढ़े तीन वर्ष शास्त्रीपुल पर .. शेष डेढ़ वर्ष तक मीरजापुर से वाराणसी प्रतिदिन आता जाता था। बंडल ना छुटने पाए , यह एक ऐसा जुनून था कि तेज बारिश में भी छाता से सिर ढके औराई चौराहे पर बस को निहारता रहता था। कितनी ही सड़क दुर्घटना वहां चौराहे पर मेरी आंखों के सामने हुये जिनमें भाजपा के तीन जिले के संगठन के मंत्री की मौत को तो आज तक मैं भूला नहीं हूं। मुझे बसों के पीछे पागलों की तरह भागता देख वहां जो मित्र बंधु थें , वे गुस्से में कहां करते थें कि तुम्हारी भी समाधि एक दिन जरूर औराई चौराहे पर बनेगी। वह दिन आ भी जाता, पर मैं सौभाग्यशाली रहा और बचता रहा! सबसे अधिक परेशानी सावन माह में हुआ करती थी। जब जीटी रोड की एक तरफ की सड़क कांवड़ियों के हवाले कर दी जाती थीं। ऐसे में बसें काफी विलंब से आती थीं। बाद में मीरजापुर जब बंडल लेने लगा, तो वर्तमान सरकार में ट्रैफिक जाम की स्थिति इतनी भयावह हो गयी थी कि पेपर 9 से 10 बजे के बीच आने लगा था। रात्रि के साढ़े 11 तक बज जाते थें पाठकों के दरवाजे-दरवाजे अखबार पहुंचाते हुये। इसी विलंब के कारण मेरे पास जो अन्य लड़के पेपर बांटने वाले थें , काम छोड़ चले गये। एक युवक ने जो सदैव मुझसे पांच हजार के आस पास एडवांस भी लिये रहता था, ने पैसा वापस करने की जगह यह ताना मारा था कि आपको तो परिवार है नहीं, इसलिए रात सड़कों पर घुमते रहते हैं। लेकिन, मेरी पत्नी मेरा इंतजार कर रही है भोजन पर। मैं कितने ही पैसे इसी तरह से लड़कों को एडवांस देकर गंवाए हैं, ताकि अखबार रात्रि साढ़े 9 बजे तक विंध्यवासिनी धाम से लेकर नगर में चहुंओर दिखता रहे। इन 25 वर्षों में चाहे कुछ भी हो जाए, सारे संबंध टूट जाये, बुखार से शरीर तपता हो, मार्ग जाम के कारण तीन-चार किलोमीटर भी पैदल चलना हो, बंडल लेकर ही औराई से लौटता था। यह मेरा अपना संघर्ष था संस्थान से तनिक भी सहानुभूति नहीं मिली थी कभी ! जब बीमार था , चादर लपेट कर भी औराई चौराहे जाया करता था, तब भी किसी ने यह नहीं कहा कि अच्छा किसी से बंडल भेज रहा हूं मीरजापुर ...वहीं मैं बावला बड़े अखबारों के बुलावे पर भी उनके दफ्तर में नौकरी करने गया नहीं। जबकि अच्छा वेतन भी मिल रहा था। राजनीति और क्राइम की खबरों को लेकर मेरी सराहना होती थी। पर मैं था कि पागलों की तरह रात के अंधेरे में भी गांडीव लिये गली-गली साइकिल दौड़ाये ही जा रहा था। क्यों कि बंधुओं यह मेरे लिये एक निर्जीव पेपर नहीं है...मैंने इस पौधे को यहां बड़ा करने के लिये अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण 25 वर्ष यूं ही गंवा दिया ! मुझे इसका तनिक भी दुख नहीं है। क्यों कि जब बेघर था ,तो मेरी क्षुधा को इसी ने शांत की थी।
(शशि)

Friday, 1 June 2018

अंधेरी गलियों में अब ना रखूंगा कदम...



कोई ढ़ाई दशक लम्बा कठिन संघर्ष इस मई माह के आखिरी दिन  बिखर सा गया। पाठकों के लिये यह संदेश व्हाट्स अप ग्रुप में टाइप करते समय मेरी उंगलियां कुछ कांप सी रही थीं। फिर भी मजबूर था। सारे रास्ते बंद हो चुके थें।  मैंने यह लिखा था कल ही तो...
             *मित्रों/ अग्रजों सहित स्नेही सभी पाठकों को बताना चाहता हूं कि रात्रि में वाराणसी से बस नहीं मिल रही है, यदि मिल भी रही है तो भारी जाम लगा रहता है, ऐसे में बिगड़ते स्वास्थ्य और जो इस असम्वेदनशील सरकार का रवैया है(जिसका परिणाम , चुनाव में आप सभी देख रहे हैं) , इन्हीं कारणों से अब रात्रि में अखबार वितरण कर पाने में असमर्थ हूं। ढ़ाई दशक तक आपकी सेवा देर रात तक पेपर बांट कर की है। लेकिन, इस सरकार और उसके रहनुमाओं में अब सम्वेदनाओं का कोई स्थान नहीं है। सो, अब सुबह ही पेपर पहुंचा पाऊंगा। जिनका सहयोग और आशीर्वाद मुझ हॉकर पत्रकार को मिलेगा। उनकी सेवा जारी  रहेगी और जो पाठक अखबार बंद करना चाहें, तो साहब कल तक बता दें। बड़ी कृपा होगी।*

      सत्ताधारी इन रहनुमाओं से मैंने एक आखिरी गुहार 25 मई को यहां तुलसी भवन में तब लगाई थी...

   जब भाजपा के चार वर्ष पूरा होने के अवसर पर एक पत्रकार वार्ता में पार्टी के प्रदेश संगठन के मंत्री मोदी सरकार की  उपलब्धियां  गिनवा रहे थें । मैंने मंत्री जी से कहा था कि
कैंट वाराणसी से फ्लाईओवर हादसे के बाद से बस देर शाम नहीं मिल रही है। अवरुद्घ मार्ग कब खुलेगा। जिस पर ,संगठन मंत्री का कहना रहा कि धैर्य रखें रुड़की से इंजीनियरों की टीम आयेगी , जांच के पश्चात मलबा हटा रास्ता खोल दिया जाएगा। समझ में नहीं आता कि रुड़की अमेरिका में है क्या कि पखवाड़े भर से ऊपर इस हादसे को हो गया और रास्ता बंद है ।
    अंततः मुझे वह अप्रिय निर्णय लेना ही पड़ा, जिसे मैं पिछले वर्ष से ही टालता आ रहा था। मीरजापुर आने के बाद से जो मेरी पहली पहचान थी, मेरी तपस्या थी और जिसके कारण मैं श्रेष्ठता का अनुभव कर गौरवान्वित महसूस करता था, जिसे अभी मैं खोना बिल्कुल भी नहीं चाहता था, भले ही स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था... जी हां यह मेरी दीवानगी ही थी कि रात्रि में 11 बजे तक पेपर बांटने वाला इकलौता हॉकर था , अपने पेशे के प्रति इस मोहब्बत का विवशता में परित्याग करते समय मेरी मनोदशा कैसी है, उसे आपको कैसे समझाऊं...शायद  इसीलिये बड़े बुजुर्ग सदैव कहा करते थें कि यौवन के ढलान पर हमसफर का होना जरुरी है। ताकि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में अवसाद से बचने के लिये किसी के आंचल का सहारा मिल सके। खैर , जब मेरा अस्तित्व ही एक बंजारे में तब्दील हो गया , तो फिर इस व्याकुलता, इस वेदना ,इस व्यथा पर नियंत्रण पा ही लूंगा , हां अभी पीड़ा में हूं। हुआ यूं कि 31 मई  को देर शाम शास्त्री पुल पर अखबार का बंटल लेने कोई पखवारे भर बाद खड़ा था। सोचा था कि यदि नौ बजे भी पेपर लेकर बस आ जाती ,तो कम से कम स्नेही पाठकों से दुआ सलाम हो जाता। पच्चीस वर्षों से हर संबंधों को तोड़ कर यही तो एक रिश्ता ग्राहक और मेरा बचा था...
      बस और बंडल का पुल पर बेसब्री के साथ बस की प्रतीक्षा में खड़ा था। घड़ी ने रात्रि के 10 बजने का संदेश दे दिया था ...कब बस आती और कब पेपर बांटता। पहले  9 बजे तक पेपर बांट कर खाली हो जाता था और  अब 10 बजे बंटल ही मिलना कठिन था ।  समय से अखबार आने से ही तो समाचार लेखन की सार्थकता हैं न। पर ऐसा हो नहीं रहा था.. और मुझे कहना ही पड़ा...
" तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद "

(शशि)

Thursday, 31 May 2018

पत्रकारिता दिवसःयह मेरा घर वह तेरा घर

इस बार यहां पत्रकारिता दिवस काफी कड़ुवाहट भरे दौर से गुजरा। अभी भी सोशल मीडिया पर धुंवाधार वाक्य युद्ध जारी है। विचित्र विडंबना है हम पत्रकारों की भी की राजनैतिक दलों की तरह अपनी अपनी पार्टी बना झगड़ते रहते हैं। वैसे तो जहां भी एक से अधिक प्रबुद्ध लोग होते हैं, आपसी एकता की गुंजाइश कम ही होती है, क्यों कि निःस्वार्थ भाव में कमी आ जाती है और अपने  हित में स्वार्थ भाव प्रबल होता जाता है। धर्म, जाति, परिवार , संगठन, समाज, मठ मंदिर सभी जगह विवाद के केंद्र में यह प्रबुद्ध प्राणी ही रहता है। जहां तक मेरा सवाल है , तो मुझे ऐसा कोई बड़ा पत्रकार संगठन स्वीकार नहीं, जहां मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुंचे।।पत्रकारिता में यहां आज जो भी पहचान है,वह मेरे परिश्रम  का परिणाम है।  न कोई मेरा गॉड फादर था और ना ही ऐसा कोई पत्रकार मंच , जो मुझे आगे बढ़ने में सहयोग किया हो अथवा में संकट में काम आया हो। पर पाठकों और गैर पत्रकार मित्रों ने का भरपूर सहयोग एवं स्नेह मिला। खैर , वर्ष में एक बार 30 मई को यहां पत्रकार संगठनों में वर्चस्व की लड़ाई को लेकर ऐसा होना कोई बुरा भी नहीं है। जो युवा पत्रकार है, उन्हें यदि वरिष्ठ पत्रकार उनका हक अधिकार नहीं देंगे तो, तो वे अपने पराक्रम का प्रदर्शन निश्चित ही करेंगे। यही प्रकृति का नियम है। कभी बंदरों की लड़ाई आपने देखी है... इस जंग में जो युवा बंदर होता है, वह अंततः विजयी होता है और सारी बंदरियों की टोली उसके पास चली आती है। यहां पत्रकार संगठनों में भी इसी प्रकार की लड़ाई चलती रहती है। अब देखें न वर्षों बीत गये हैं, लेकिन पत्रकार भवन को लेकर आपसी सहमति तक नहीं बन पा रही है। पैसा आकर पड़ा है। जनप्रतिनिधि सहयोग को तैयार है। फिर भी पत्रकार भवन बनने से पहले ही उस पर वर्चस्व को लेकर जगहंसाई हो रही है, इस जनपद के पत्रकारों की। पुलिस और प्रशासन भी  तो यही चाहता है कि पत्रकार कभी एक न हो ! खैर यह मेरी व्यक्तिगत समस्या नहीं है, क्यों कि किसी अधिकारी और नेता को सलाम करने की फुर्सत नहीं है मेरे पास। जो अपनी पहचान इन्हें बताने  को लेकर व्याकुल रहूं। पहले एक दौर था कि हमलोग अधिकारियों से मिलने बिन बुलाये मेहमान की तरह नहीं पहुंच जाते थें, हमारी लेखनी बिन मुलाकात के ही हमारी पहचान आला अफसरों को बता देती थी। अधिकारी समाचार पढ़ कर समझ जाते थें कि किस पत्र प्रतिनिधि में कितना दम है। पर आज का दौर जो है , उसमें पत्रकार अफसरों से यह कहा करता है कि ये साहब ! कुछ छुटने न पाये , तनिक ध्यान रखिएगा।  विज्ञापन एवं खबरों के बोझ के कारण पत्रकारों का सिर अधिकारियों और राजनेताओं के दरबार पहले की तरह अब कहां तना रहता है। अब जब दिन भर संस्थान के लिये पत्रकार हाथ फैला रहा है, तो अपना भी तो घर परिवार है उसका। बिन लक्ष्मी के भला गृहलक्ष्मी कैसे सम्मान देगीं अपने पतिदेव पत्रकार महोदय का, जरा विचार करें !
   बता दूं कि  पत्रकार सम्मान कार्यक्रम में सबसे पहले मुझे बुलाने पर कुछ पत्रकारों को बुरा लगा, इतना तो समझ में आया। लेकिन हमारे घनिष्ठ मित्र कामरेड  मो0 सलीम भाई का कुछ और ही सवाल मुझसे था!
              उन्हें ऐसा लगा कि शशि भाई ने यह सम्मान कैसे स्वीकार कर लिया, जहां दागदार सफेदपोश भी हो। दरअसल,  एक आदर्श पत्रकार के रुप में मित्रों के बीच में मैं जो अपनी पहचान रखता हूं। सो, मुझे उन्हें सफाई देनी पड़ी।
 मैंने बताया कि भले ही ऐसे सफेदपोश मौजूद रहे हो , परंतु सम्मान चिन्ह तो जिलाधिकारी से ही लिया  न भाई । और यह सब मान सम्मान मेरे लिये अब इस उम्र में बेमानी है। हां, मेरी तमन्ना एक यह है कि किसी विशेष मंच से  श्रेष्ठ समाचार पत्र विक्रेता का  सम्मान मुझे एक बार मिले! मेरा सबसे अधिक परिश्रम भरा हॉकर वाला पहचान इस पत्रकारिता के भुलभुलैया में खो गया है।
 वैसे, मैं तो पत्रकारिता दिवस को पत्रकारों का मछली बाजार नहीं कहना चाहता।पर इस एक दिन की भाषणबाजी में भी यह मुद्दा प्रमुख नहीं होता कि सुबह आंख खुलने से लेकर देर रात बिस्तरे पर जाने तक काम करने वाले पत्रकारों को कुछ तो उचित वेतन मिलनी चाहिए, ताकि बीबी ताना न मारे घर पर...
(शशि)

Wednesday, 30 May 2018

पत्रकारिता दिवस में भावनाओं से भरा वह पल



      यदि हमने निष्ठा, समर्थन और ईमानदारी से अपना काम किया है, तो लक्ष्मी की प्राप्ति हो न हो, पर इतना तो तय है कि समाज में सम्मान और पहचान मिलेगा। इसके लिये हमें  उतावलापन दिखलाने से बचना चाहिए, आज पत्रकारिता दिवस ने मुझे इस बात का पुनः एहसास कराया। जैसा कि मैंने कल ही बताया था कि वर्षों बाद मैं पत्रकारिता दिवस के मौके पर मौजूद रहूंगा। सो, अन्य सारे इधर-उधर के कार्यक्रम छोड़ जिला पंचायत सभाकक्ष में जा पहुंचा। हां, थोड़े देर के लिये इसी बीच पुलिस लाइन मनोरंजन कक्ष में एएसपी नक्सल के प्रेसवार्ता में जाना पड़ा था। दो मामलों का खुलासा पुलिस को जो करना था। अतः अखबार का काम सबसे पहले जरूरी है। बहरहाल, विंध्याचल प्रेस क्लब के इस कार्यक्रम में जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, पूर्व विधान परिषद सदस्य आदि तमाम भद्रजन मौजूद रहें। भाषणों का दौर शुरू हुआ, पर यहां दो वक्ताओं ने मेरे दिल को छू लिया।  समाजवादी पार्टी के पूर्व नगर अध्यक्ष लक्ष्मण ऊमर ने बड़ी ही दमदारी से कहा कि यहां एक ऐसे भी पत्रकार शशि जी हैं, जो पूरे स्वाभाविक के साथ पत्रकारिता ही नहीं समाचार पत्र वितरण भी करते हैं। वे मिसाल हैं कि हर कोई पत्रकार दलाल नहीं ...  तो अगले वक्ता रहें  रोहित शुक्ला ' लल्लू'  जो समाजवादी पार्टी के टिकट से बीता विधानसभा चुनाव लड़  चुके हैं, ने मेरी पत्रकारिता पर कहा कि देर शाम उन सबकों व्हाट्सअप पर यह इंतजार रहता है कि गांडीव में उन्होंने आज क्या लिखा है, विशेष कर राजनीति से जुड़े समाचार । मेरा नाम इन दोनों वक्ताओं से सुनकर  मंचासीन अधिकारियों की भी उत्सुकता निश्चित ही मुझे लेकर कुछ बढ़ी होगी। मैं वैसे तो अनावश्यक अफसरों के कार्यालय में आता-जाता नहीं। सो, वे चेहरे से मुझे यदि पहचानते भी हो, तो नाम से नहीं।  फिर जब पत्रकारों को सम्मान देने की बारी आई , तब भी क्लब के सचिव कृष्णा पांडेय ने सबसे पहले मेरा और साथ में बड़े भैया प्रभात मिश्रा का नाम  तमाम पत्रकारों के मौजूद रहते हुये लिया । जिलाधिकारी से इस पत्रकार संगठन का प्रथम सम्मान चिन्ह लेते हुये मुझे इतना तो महसूस हुआ ही कि पच्चीस वर्षों की मेरी तपस्या व्यर्थ नहीं गई है, क्यों कि वहां मौजूद तमाम लोग मुझे बधाई हो कहते दिखें।
         यहां बात सम्मान का नहीं है, वाराणसी में इसके लिये बड़े मंचों मंचों पर कई पत्रकार संगठन मुझे आमंत्रित करते रहे हैं। परंतु मैं साफ तौर पर उनसे कह देता हूं, मुझे कहां वक्त है ! हां, तमाम वरिष्ठ पत्रकारों की मौजूदगी के बावजूद भी सचिव कृष्णा जी ने मुझे जिस तरह से वरियता दी, उससे मैं भावुक हो उठा था।  उनके क्लब के अध्यक्ष अशोक सिंह सहित सारे सदस्य मेरे प्रति वहां आदर भाव दिखा रहा था। उससे कहीं अधिक जो लोग बैठें थें, जिनके दरवाजे- दरवाजे देर रात मैं अखबार पहुंचाता रहा हूं। वे तालियां बजा हर्ष ध्वनि करते दिखें। मित्रों ये बातें मैं अपनी तारीफ के लिये नहीं कह रहा हूं। इस ब्लॉग के माध्यम से आपकों यह बताना चाहता हूं कि देखिए किस तरह से ईमानदारी और कठोर श्रम के साथ किये गये कर्म की कहीं न कहीं तो पूजा होती ही है। बिना उच्च शिक्षा , न  पत्रकारिता की कोई डिग्री और सड़कों पर साइकिल से 11 बजे रात तक अखबार बांटने वाले मुझ जैसे इंसान के प्रति लोगों में कितना  सम्मान और स्नेह है। अब देखें न ब्लॉग लेखन में रेणू जी ने मेरा कितना सहयोग किया। मैं तो उन्हें जानता तक नहीं, न वे भी मुझे जानती हैं। फिर भी  व्यस्तता के बावजूद उन्होंने मेरा मार्ग दर्शन किया। यह जो प्रोत्साहन है न , वह एक टानिक ही तो है। जो स्थाई सम्मान  है, वह पैसे से कभी नहीं मिलेगा बंधुओं। यदि ऐसा होता तो इन तमाम भद्रजनों के मध्य मैं एक अजनबी होता न  !

(शशि)

Tuesday, 29 May 2018

छुप जाता है सच, झूठ इतना शोर करता है...

      हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर

     30 मई यानि की हिन्दी पत्रकारिता दिवस  पर विचार गोष्ठियों का आयोजन एक बार फिर होगा। आज भी कार्यक्रम हुये हैं। भव्य समारोह में मंच पर मौजूद महाशय हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाएंगे। लाख रुपये तक वेतन पाने वाले प्रोफेसर, अफसर से लेकर राजनेता तक आएंगे। कभी-कभी किसी प्रेस में ऊंचे ओहदे पर बैठे लोग भी आ जाते हैं। जिन्हें ठहराने के लिये वातानुकूलित होटल की व्यवस्था की जाती है। वहीं मंच के सामने हम जैसे श्रमिक पत्रकार पेट को हाथ से दबाये बैठे रहते हैं,कुछ का ध्यान भाषण पर कम डिनर पर अधिक होता है। हम सभी को पता है कि इन ज्ञानी ध्यानी भद्रजनों की भाषण कला से पत्रकारों का भला नहीं होना है और साहब मैं तो कहूंगा कि ये पहले दर्पण में स्वयं को तो टटोल लें जरा, फिर हमें बताएं नैतिक ज्ञान। मामूली पगार पाने वाले हम पत्रकार सुबह से रात तक आन ड्यूटी रहते हैं और ये साहब तरमाल गटकते हैं। मैं कभी ऐसे मंच और कार्यक्रम को साझा नहीं करना चाहता ! यदि इस घुटन भरे माहौल में जुबां खुल गयी, तो कितनों का चेहरा बेनकाब हो जाएगा। सो काहे कबाब में हड्डी बनूं इनके। लेकिन एक संगठन के कार्यक्रम में कल जाना ही है। उसके सचिव कृष्ण पांडेय का विशेष आग्रह जो है।   और ये पत्रकारिता दिवस की जो चकाचौंध है न बंधुओं , उसका खर्च भी तो यहां आये मेहमान ही उठाते हैं । अपने तो सभी ठन ठन गोपाल हैं। मजीठिया आयोग की सिफारिशों की खुशबू की महक ना जाने कहां खो गयी है, अब तो पच्चीस वर्षों से पत्रकारिता का बस्ता ढोते ढोते जवानी भी ढल गयी है। बुढ़ौती कैसे कटेगी सोचो जरा यारों ! अपनी तो जैसे तैसे बीत ही जाएगी।  40 रुपये दिहाड़ी मजदूरी पर वर्ष 1994 में पत्रकारिता शुरू की थी। जेब खाली था, तो गृहस्थ जीवन की चाहत धरी रह गयी। दो वर्ष पूर्व तक साढ़े चार हजार रुपया पगार प्रतिमाह मिलता था। काम न पूछे साहब कितना करता था। शरीर की चमड़ी धूप में काली पड़ गयी है मित्रों और दायीं आंख की रोशनी भी तो जाने को है। वे लग्जरी वाहन से भाषण दे निकल जाएंगे और यहां वहीं पुरानी साइकिल जिंदाबाद है। माना कि कलम अपना बेचा नहीं, पर समाज ने क्या कभी यह पूछा कि शशि भाई चूल्हा आपका जला की नहीं ! ऊपर से हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाने वालों आइने में देखों किसका मुखड़ा काला है। माना की पत्रकारिता अब बदली है। ठेकेदार, कोटेदार, दुकानदार तक  वेे सभी पत्रकार हैंं, जिनका कुछ जुगाड़ है। हम गरीब तो सम्मान में अफसरों से एक प्याली चाय की उम्मीद भर रखते हैं और वे अमीर इन्हीं साहब के बच्चों को चाकलेट और मिठाई पहुंचाते हैं ! तो बोलो अफसरों के लिए कौन असली पत्रकार है।  खैर यह भी अच्छा ही है, पैसे को लेकर पत्रकारों का विलाप कम तो हुआ ! एक और पत्रकारों का तबका है, धंधा कुछ नहीं फिर भी काम उनका माशा अल्लाह है। जुगाड़ तंत्र का जमाना है ये बाबू ,काहे नीर बहाना है। अबकि तो गजब हो गया साथियों, नशाखोरी पर कलम चलाने वाले साथी मदिरालय के स्वामी जो बन गये। फिर भी हम एक ही जैसे कलमकार हैं। एक गीत अश्वनी भाई ने अभी भेजा है ..

ये लो में हारी पिया, हुई तेरी जीत रे, काहे का झगड़ा बालम नई नई प्रीत रे।

 तो मित्रों आओ हिन्दी पत्रकारिता दिवस का हैप्पी बर्थडे मनाएं। ताली पीटे और अपने घर जाएं। (शशि)

Monday, 28 May 2018

बस्ती बस्ती परबत परबत गाता जाए बंजारा

   

     एक ईमानदार व्यक्ति को उसके हिस्से का अमृत जीवनकाल में कहां प्राप्त होता है, हलाहल पीना ही उसकी नियति है। यह जो भौतिक एश्वर्य है न बंधुओं, वह हम जैसों के लिये कहां है। इनके करीब जाने के लिये छल और स्वांग रचना होगा । साथ ही सफेद नकाब में अपने वास्तविक चेहरे को छुपाने की कला भी आनी चाहिए। इतनी बाजीगरी के साथ झूठ सच  बोल जो नेताओं सा दांत निपोरता रहे, समझ ले कि इस अर्थयुग का अमृत कलश उसे मिलना ही है और हम जैसों के हिस्से में सहानुभूति है इस समाज की । फिर भी हम मस्त फकीर हैंं । मैं भले ही लेखक ,साहित्यकार और कवि नहीं हूं , एक पथिक तो हूं न ! जो कुछ अपनी इस यात्रा में देखा -पाया , उसे हुबहू आपसे रूबरू करवाता रहा । मैं पढ़ता नहीं हूं , सिर्फ देखता हूं और लिखता हूं। मैं तो स्वयं में ही एक किताब हूं। उस आम आदमी की पुस्तक हूं, जिसके बीच सुबह से रात गुजरती है। उसकी बुझी बुझी सी टिमटिमाती आंखें , उदास चेहरे और पीट से चिपके पेट ही मेरी लेखनी है। मेरे अखबार के पाठक की मुझसे बड़ी उम्मीद रहती है। यह जानते हुये भी कि जिस समाचार पत्र से मैं जुड़ा हूं, उसका चादर तंग है। मेरा बहुमूल्य समय क्राइम की खबर लपकने में ही गुजर जाता है। हत्या , दुराचार , चोरी , टप्पेबाजी की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। आज के लड़के बिना मेहनत किये ही स्मार्ट बाइक और महंगे रेस्टोरेंट में गर्लफ्रैंड के साथ मौज मस्ती चाहते हैं। जिस मीरजापुर से मैं जुड़ा हूं, वहां किशोरियों और बच्चों संग दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। यह कैसी हैवानियत है, मासूम बच्चियों तक को नहीं छोड़ रहे हैं , ये भेड़िये ! रही बात किशोरियों और युवतियों की तो कड़ुवा सच यही है कि अधिकांश मामलों में मधुर संबंध का राज जब परिजनों के समक्ष खुल जाता है, तो बेचारा आशिक दुराचारी ठहरा दिया जाता है। पैसा के लोभ में भी ऐसे आरोप लग जा रहे हैं। यह जानते हुये कि फलां ने दुष्कर्म नहीं किया है। यह मुकदमा झूठा है। अखबार वाले बढ़ा-चढ़ा कर खबर छापते हैं। कुछ पत्रकार तो  आरोपी के पिता तक का नाम खबर में डाल देते हैं। ताकि उसके पूरे परिवार को ही शर्मिंदा होना पड़े। पर मेरी अलग सोच है यदि मेरे अंदर की आवाज यह कह रही होती है कि लड़का निर्दोष है, तो समचार भले ही पेपर में देना मेरी मजबूरी हो, परंतु युवक का नाम - पता तो मैं नहीं ही देता हूं।  यह ठीक है कि मजनूओं की तादाद बढ़ती ही जा रही है। वे कन्या विद्यालयों के मार्ग में बाइक स्टंट करते मिलेंगे। पर कभी अभिभावकों ने किशोरावस्था पार कर रहींं अपनी पुत्रियों से यह पूछा है कि सुबह तो धूप भी नहीं है, फिर चेहरे पर नकाब बांध और कान में मोबाइल लगाये, वे घर से स्कूल जाने की राह में किससे वार्तालाप कर रही थीं। पिता- भाई तक नहीं पहचान पता रास्ते में इन्हें। मैं पत्रकार हूं, इसलिए जानता हूं कि वे बाइक सवार के पीछे बैठ कहां जाती हैं । हमारे पवित्र विंध्याचल धाम के कतिपय होटल इसी के लिये बदनाम हैं। वापसी पर इन युगल के हाथों में देवी मां का प्रसाद नारियल चुंदरी होता है। मन व्याकुल हो उठता है, अपनी नयी पीढ़ी का यह नया संस्कार देख कर । अखबार के कालम में अभिभावकों को सावधान ! होशियार !! करता रहता हूं। वे जगते तब हैं जब थाने पर जाकर सिर झुकाये गुहार लगानी पड़ती है कि दरोगा जी मेरी बिटिया को फलां... अब चले पुलिस सब काम छोड़ उन्हें ढ़ूंढने , इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस से इनके मोबाइल फोन से  लोकेशन का पता लगा प्रेमी युगल को पकड़ कर लाया जाता है।  लड़का को जेल मिलता है और लड़की के ऊपर से  मोहब्बत का नशा उतर जाता है। आशनाई को लेकर ही आज सुबह ही एक अविवाहित युवक की निर्मम हत्या कर फेंका शव मिला है। मन ऐसी घटनाओं से व्यथित हो उठता है, पर दबाव यह रहता है कि किसी एंगल से खबर कमजोर ना पड़ने पाए। अजीब हालात है इस जिले का , यहां जितने भी कत्ल हो रहे हैं, उसमें से दो तिहाई इसी प्रेम रोग का परिणाम है। अवैध संबंध में बलि सदैव पुरुष की ही चढ़ती है ! कौन इन्हें राह दिखाएं ? यह प्रेम कितना सच्चा होता है ! कभी इस दर्द को मैंने भी जाना- समझा है। सारे मेले पीछे छूट गये तो गुनगुनाए जा रहा हूं...

        बस्ती बस्ती परबत परबत गाता जाए बंजारा
         लेकर दिल का एकतारा

     जानता हूं आज ब्लॉग पर, जो लिखा, यह बकवास आपकों पसंद नहीं आया होगा, पर जो लिखा हूं  उससे युवा पीढ़ी को हमें बाहर निकालना ही होगा..
   (शशि)

Sunday, 27 May 2018

"सतनाम" और "राम" में भेद से बढ़ा मेरे अंतर्मन का द्वंद



      हममें से अधिकांश यह मानते हैं कि सबका मालिक एक है, तो आपस में धर्म और जाति के नाम पर यह द्वंद क्यों है। चाहे मंदिर हो या मस्जिद सिर झुकाते हुये ना सही, तो कम से कम एक मानव धर्म जो हम सभी के लिये है, " सबका सम्मान और एक समान अधिकार " उसका तो अनुसरण हमें करना ही चाहिए। अब देखें न नानी मां की मृत्यु के बाद से मंदिरों में जाकर ईश्वर के प्रतिबिंब के समक्ष शीश झुकाने की मेरी बिल्कुल भी इच्छा नहीं होती है, फिर भी तिरस्कार किसी का नहीं करता। आज भी याद है कि कोलकाता में मां के  अस्वस्थ होने पर मेरा एक होमवर्क यह भी था कि कोई दो दर्जन तस्वीर और मूर्तियों की सफाई और श्रृंगार करूं।
       उन पर लाल- सफेद चंदन लेप लगाना, जिस देवी- देवता को जो भी अलग- अलग  प्रकार के पुष्प चढ़ते हो,जैसा देवी पुष्प (गुलहड़), गुलाब ,गेंदा और तुलसी पत्र, दुर्वा, चंदन से राम नाम लिखा सफेद चक्र रहित विल्वपत्र और फिर बंगाल के पुष्प से श्रृंगार यह सारी तैयारियां उस 12 वर्ष की अवस्था में ही मैं करता था। लेकिन, अब इन ढ़ाई- तीन दशकों में मैं किसी भी मंदिर में माला- फूल और प्रसाद लेकर या बिना कुछ लिये ही बहुत कम ही गया हूं। परंतु इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं इन उपासना स्थलों के प्रति अनादर का भाव रखता हूं। मंदिरों में बजने वाले घंटा- घड़ियाल की आवाज मुझे बहुत कर्णप्रिय है। मैं तो उन सभी धार्मिक उर्जा केंद्रों का एक जैसा सम्मान करता हूं, जहां से मनुष्य को बिना जाति -मजहब का भेदभाव किये मानव बनने का संदेश मिलता हो..
                  आश्रम भी यही सोच लेकर गया था। परंतु वैचारिक संकीर्णता कहां नहीं है। सतनाम यानी एक अकाल पुरुष , इतना तो बिल्कुल उचित ही बताया गया था यहां, (आज भी व्याकुलता बढ़ने पर सतनाम का ही जाप मैं करता हूं) परंतु साथ में यह जोड़ा गया कि मन ही राम (वह राम जिसे परम्ब्रह्म कहते हैं सनातन धर्म में)  है। यह मन यानि की राम ही इस संसार की लीला करते हैं। लेकिन, वे अकाल पुरुष नहीं हैं। सो, उनकी(राम)  इस लीला से मुक्त होने के लिये हमें सतनाम का निरंतर जाप कर उस अकाल पुरुष को प्राप्त करना है। दूसरी बात गायत्री को अबला बताया गया था, जो स्वयं अपना ही कल्याण न कर सके, उसके मंत्र जाप से क्या लाभ !  कुछ ऐसा ही कहा गया। यही भेदभाव वाला धर्म ज्ञान मुझे यहां आश्रम पर समझ में नहीं आ रहा था, वरना करुणा, परोपकार, सहृदयता, वैराग्य सभी कुछ तो था  आश्रम पर ...
      हां, अब मेरी समझ में कुछ कुछ बातें आ रही हैं। असल में जो श्रेष्ठ जाति के लोग थें ,उन्होंने हिन्दू धर्म पर अपना वर्चस्व कायम रखा था और इसी की उपज है निम्न जाति के महापुरुषों और संतों का यह अलग अलग पंथ .. जिसमें एक समानता की बात तो होती है। परंतु जिसकी उपासना करनी होती है, उसे लेकर श्रेष्ठता का वही झमेला कायम है...
   और यही वैचारिक मतभेद मुझे आश्रम के आनंदानुभूति से दूर किये जा रहा था। मैं बार बार यही सवाल पूछता था कि सतनाम बड़े और राम छोटे क्यों ...
   आज भी मैं सबका बराबर सम्मान करता हूं , फिर भी ना जाने क्यों मेरा शीश किसी देवालय में झुकता नहीं .. हां, किसी का मन रखने के लिये यदि देवालय में सिर झुका कर प्रसाद ग्रहण करना पड़े, तो इसमें भी तनिक संकोच नहीं करता। कारण किसी की भी आस्था को ठेस पहुंचाना बिल्कुल नहीं चाहता मैं । धर्म तो मेरा एक ही है ..."इंसानियत"। इसलिए तो न्यूज से जुड़े मेरे जितने भी व्हाट्सएप ग्रुप हैं, उनमें स्पष्ट निर्देश है कि जाति- धर्म विवाद से जुड़ी कोई सामग्री न भेजी जाए ।
      वैसे , आश्रम छोड़ने का " सतनाम " और  " राम " को लेकर मेरे अंतर्मन का अंतर्द्वंद ही एकमात्र कारण नहीं था। सम्भवतः आश्रम  के समीप स्थित अखाड़े के कुछ पहलवान भी मुझे निठल्ला ही समझने लगे थें। कुछ तो व्यंग्य भी  करते थें कि देखों इस चेले को मुफ्त का भोजन कर बिल्कुल पहलवान होता जा रहा है। सो,  एक सम्मानजनक जीवन की चाहत फिर से जग गयी।सो,  मन पुनः व्याकुल हो उठा और आश्रम के आनंद से वंचित भी।

(शशि)

Saturday, 26 May 2018

आनंद की खोज में मिला आश्रम का वह सुख !



  कम्पनी गार्डेन संग मित्रता से मुझे एक और सुख की जो प्राप्ति आगे चल कर हुई, वह रहा आश्रम जीवन का  अनुभव.. जहां आनंद ही आनंद रहा, क्लेश का कोई स्थान नहीं था वहां। चमकता हुआ मुखमण्डल, स्वस्थ शरीर, नियमित दिनचर्या, मन को एकाग्र करने के साधन और सादगी भरा भोजन सभी तो थें वहां। परंतु यह मेरा दुर्भाग्य था कि वर्ष भर ही रह पाया इस तपोस्थल पर ... धर्म हो या कर्म ,इन सभी को समझने का मेरा अपना दृष्टिकोण सदैव मेरी उलझनें बढ़ता रहा है। सो, इस आनंद से मैं वंचित हो, पुनः मुजफ्फरपुर मौसी जी के यहां चला गया, मन को शांति देने वाले उस आश्रम से , मेरी यूं बिदाई नहीं चाहते थें बाबा जी, पर इसे मन की माया बता मौन हो गयें..दादी और अपने बंधु कम्पनी गार्डन तक को छोड़ मैं चला गया... समझ में नहीं आता कि इतना निष्ठुर कैसे हो गया था ! दादी की आंखें किस तरह से भर आई थीं। फिर भी मैं यह न समझ सका कि यह हमारी आखिरी मुलाकात होगी। अच्छा ही है कि आज मैं यतीम हूं ..यह मेरा दंड भी है और प्रायश्चित भी, क्यों कि इन ढ़ाई दशकों से प्रतिदिन कम से कम रात्रि में तो निश्चित ही, इस पीड़ा की अनुभूति एक भावुक इंसान होने के कारण करता आ रहा हूं .. फिर भी यदि वैराग्य भाव की प्राप्ति ना हुई, तो सदैव ही करता रहूंगा... दुनिया से जाने वाले लौट कर तो आएंगे नहीं ना ! सोचता हूं कि आश्रम में रहता तो इस अपराध बोध से मुक्त तो रहता। जब आश्रम में गया था,  बिल्कुल कोरा कागज ही था, पर अब ऐसा नहीं है... कोई होता जिसको अपना कह लेने की चाहत ने वर्षों मुझे पीड़ा दी है। जब यह समझा की प्रेम की बगिया में फूल खिलने को है, वह कांटों भरा हार फंदा बन चुभने लगा... खैर बिगड़ते स्वास्थ और ढलते यौवन ने इस जख्म पर मरहम का काम किया !
    अभी तो चला अपने आश्रम की ओर , जिसे मैं कोई 27 वर्ष पीछे छोड़ आया हूं। मुझ बेरोजगार निठल्ले युवक को कम्पनी गार्डन में बड़ों के सानिध्य और सत्संग का जो लाभ मिला, उसका स्पष्ट प्रभाव मेरे विचारों पर पड़ा था। सम्भवतः इसी से साधू- संत, महात्मा, चिंतक, अध्यापक और भी विद्वतजन मुझमें रुचि लेते दिखें, वहां कम्पनी गार्डन में। पर मैं बिखरे हुये पारिवारिक सम्बंधों से व्याकुल था। आनंद की खोज में संतों का प्रवचन सुनने दूर दूर तक जाता था...
  एक बार  श्यामवर्ण के तेजयुक्त ब्राह्मण देवता मुझे इसी कम्पनी गार्डन से अपने साधना स्थल तक ले गये थें। जहां कई वेदपाठी दिखे थें। युवावस्था में पैसे के अभाव में मेरी थोड़ी बढ़ी हुई दाढ़ी देख उन्होंने कहा था कि वैराग्य भाव के लिये यह दाढ़ी कोई बुरी नहीं है। इसी के कुछ महीनों बाद मुझे याद है कि श्वेत वस्त्र धारण किये नाटे और गठीले शरीर वाले एक बाबा से प्रातः भ्रमण के दौरान मेरी यहीं कम्पनी गार्डन में मुलाकात हुई थी। उनका हर कोई सतनाम बाबा जी कह, अभिवादन किया करता था। उन भद्र जनों से तुलना करूं तो ऐसा कुछ भी तो नहीं था मेरे पास फिर भी सतनाम बाबा ने मुझे अपने साथ नंगे पाव बगीचे की हरी घास पर टहलने की मौन स्वीकृति दे दी थी। पास ही लोहटिया स्थिति अखाड़े पर बने अपने छोटे से अस्थायी आश्रम पर वे मुझे ले भी गयें। एक बेरोजगार युवक की पहली आवश्यकता तो क्षुधा की अग्नि की शांति ही थी न , सो मुझे वहां इसके लिये संघर्ष नहीं करना था।  शुद्ध देशी घी , दही और मलाई की व्यवस्था थी। सब्जियों में जो तीन मसालें पड़ते थें, धनिया, हल्दी और जीरा इनके साथ ही सेंधानमक को कुटने की जिम्मेदारी अब मेरी थी।  घर से सुबह पौने चार बजे ही आश्रम के लिये निकल पड़ता था। आश्रम और अखाड़े में  झाड़ू लगाने से पूर्व  कुछ कसरत भी पहलवानों की तरह करने लगा था। एक  कार्य और मुझे भोर होते ही करना पड़ता था, वह था.वहां अखाड़े के समीप बनी टंकी को कुएं पर रखे बड़े बाल्टे से लबालब भरना। तागतवर लोग ही उस बाल्टे से इतना अधिक पानी निकाल सकते थें और मैं आठ-दस बाल्टा पानी यूं ही निकला लिया करता था। कसरत करने से सीना इतना चौड़ा हो गया था कि मानों कमीज फाड़ कर बाहर आ जाये। परंतु आश्रम में मैं इसलीये तो नहीं आया था कि पहलवान या फिर भोजनभट्ट बन जाऊं...

क्रमशः (शशि)