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Thursday, 14 June 2018

हम न सोचें हमें क्या मिला है, हम ये सोचें किया क्या है अर्पण


   


      आज सुबह  निकला तो हृदय को छूने वाले कर्णप्रिय भजन की यह पंक्ति " हम न सोचें हमें क्या मिला है, हम ये सोचें क्या किया है अर्पण"  मेरे मन की वेदना से अनेकों सवाल करते मिली। सचमुच मैं बिल्कुल स्तब्ध सा रह गया कि आखिर क्या संदेश छिपा है, इस प्रार्थना गीत में !  स्वयं को एक बार फिर से टटोलने लगा मैं । अपनों से क्या मिला, समाज ने क्या दिया , यह उलाहना दे मन किस तरह से करुण क्रंदन करता आ रहा है ,  जाने कितने ही वर्षों से। मां के गुजरने के बाद कभी आंचल की छांव की चाहत, तो कभी घर-आंगन को अपनी किलकारियों से सराबोर करने वाले मासूम चेहरों की कल्पना , जिस सुख से मैं इस धरा पर मानव तन पा कर भी वंचित ही रह गया। या फिर स्वस्थ शरीर खोने की पीड़ा जैसी व्याकुलता से आंखें ना मालूम कितनी बार भर आई होंगी। क्या यही वेदना मेरी नियति है ? मैं ही एक इकलौता इंसान हूं, जो उस दयालु परमात्मा की कृपा से वंचित हूं। ऐसे अनेकों सवाल न जाने कब से मन को आहत करते रहे हैं। मैं एक कूपमंडूक सा उसी में उलझा पड़ा सिसकता रहा अब तक। क्या बताऊं दूर ना सही अपनों की ओर भी निगाहें नहीं डाली मैंने। वाराणसी में मेरे घर से ताऊ जी का मकान बहुत दूर नहीं है। वे मेरे  सगे ताऊ जी नहीं , मेरी दादी की बड़ी बहन के पुत्र हैं। फिर भी स्नेह मुझ पर उनका सदैव रहा है। यदि मैं कभी बनारस जाता भी हूं, तो कैंट से प्रेस के दफ्तर और फिर वहां से अपने मित्र कंपनी गार्डन को निहारते हुये सीधे ताऊ जी के घर ही जाता हूं। काफी बड़ा बंगाल है शहर में उनका। एक महाविद्यालय में विधि संकाय के विभागध्यक्ष रहें वे। सम्मान में बड़े-छोटे सभी उन्हें वकील साहब कहते हैं। तीन पुत्रियों के जन्म के काफी दिनों बाद पूजा पाठ से एक पुत्र धन की प्राप्ति हुई थी। सबके दुलारे विक्की बाबू जब छोटे थें, तो मेरे पापा के विद्यालय में ही पढ़ते थें। इकलौता संतान, पर  बेहद आज्ञाकारी था वह। जब किशोरावस्था समाप्ति की ओर थी,  एक दिन घर पर ही हुई एक दुर्घटना से ताऊ और ताई जी के आंखों का तारा , बुढ़ापे का सहारा अप्रत्याशित तरीक़े से छीन लिया गया । उसकी मौत ने सभी को स्तब्ध कर दिया था।नियति ने एक और छल किया । कुछ वर्षों बाद उनकी छोटी पुत्री जो तीनों बहनों में सबसे चंचल, हंसमुख एवं गृहकार्य में दक्ष थी, को ना मालूम किस बीमारी ने डस लिया कि शरीर का रंग काला पड़ता गया, वजन बिल्कुल ही गिर गया। इसके बावजूद भी उसने जीवन के लिये काफी संघर्ष किया। परास्नातक की शिक्षा दिलवाने के लिये ताऊ जी ने उसके लिये स्कूटी खरीदी थी। परंतु वह भी अपने भाई की राह पर बढ़ चली। आज जब मुझे इन दोनों छोटे-भाई बहन की याद रुला दे रही है कि किस तरह से मैं जब कभी मीरजापुर से वाराणसी उनके घर जाता था ,तो वे शशि भैया फालसा का शर्बत लें, यह खा लें न ? ताई जी की तरह ही इन सभी बच्चों का स्वभाव था। बड़ी दो पुत्रियों का विवाह हो गया और इन दोनों बच्चों को वे खो दिये। आप समझ सकते है कि उनपर क्या बीती होगी।       
              लेकिन, इस नियति को किस तरह से पराजित किया जाता है, इसे मैंने यहीं पर देखा है। कुछ महीने पूर्व संगीतमय देवी भागवत के आयोजन पर जब ताऊ जी के बुलावे पर मैं बनारस गया था।  वहां एक सुखद अनुभूति से मन प्रफुल्लित हो गया था । परिवार के तमाम सदस्य कथा सुनने जुटे हुये थें और इसी दौरान मुख्य यजमान की भूमिका में  बैंठी ताई जी भावमय मुद्रा में हाथ ऊपर किये नृत्य कर रही थीं। ताऊ जी बताते हैं कि तुम्हारी ताई जी को काफी मुश्किल से पुनःइस स्थिति में वापस ला पाया हूं । यह अंधकार से प्रकाश की ओर उनका कठिन सफर है। अब ताई जी मुझसे  बराबर यह कहती हैं कि पप्पी तुम एक बार तिरुपति वैंकटेश्वर बाला जी का दर्शन कर आओ, देखों अपना ही जिद्द ना करों। तुम भी स्वयं में परिवर्तन देख पाओगे। पर सिर झुकाये उनकी आज्ञा का निरंतर उलंघन करते आ रहा हूं। मुझे अपनी इन दो बूंद आंसुओं  में ईश दर्शन जो करना है।

शशि

(चित्र गुगल से साभार )
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मित्रों, विशेष यह कहना है कि अब मुझे भी कुछ पढ़ना हैं। अतः सप्ताह में हर दूसरे दिन ही हमारी मुलाकात होगी।
आप सभी का स्नेह मिल रहा है, इसके लिये आभार पुनः व्यक्त कर रहा हूं। हां , अपने 94 फॉलोवर का यह विश्वास  कभी नहीं टूटने दूंगा कि सपना नहीं बेचता मैं, हकीकत मेरी कहानी है। इस ब्लॉग को अस्तित्व में लाने के लिये मैं सदैव रेणु दी का आभारी हूं।
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Wednesday, 13 June 2018

सबको सन्मति दे भगवान, कोई नीच ना कोई महान

               चित्र गुगल से साभार
       
          हम साथ- साथ रहते हैं, हंसते -बोलते हैं और अगले ही क्षण जातीय, मजहबी और राजनीति के दलदल में जा फंसते हैं। जबकि हम प्रबुद्ध नागरिक हैं ,फिर भी ऐसा कर बैठते हैं कि अपने क्षणिक आत्मसंतुष्टि के लिये औरों को आहत कर देते हैं। आज सुबह मेरी इच्छा थी कि इस मीरजापुर- भदोही क्षेत्र से सांसद रहीं पूर्व दस्यु सुंदरी स्वर्गीय फूलन देवी के बारे में ब्लॉग पर कुछ लिखूंगा। वे भले ही एक डैकत रहीं, परंतु मुझे एक पत्रकार की जगह एक सम्वेदनशील इंसान वे समझती थीं। उन्हें विश्वास था कि मैं उनकी भी भावनाओं को समझूंगा, न कि सिर्फ बेहमई कांड की खलनायिका। औरों के साथ उनका व्यवहार जैसा हो मुझे नहीं पता। हां, मैं जब भी उनसे मिला वे खुले दिल से  अपनी बातें रखती थीं। अब आज इसपर चर्चा नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि दोपहर बाद एक ऐसा अनावश्यक विवाद हमारे व्हाट्सअप ग्रुप के कारण उठ खड़ा हुआ, जिससे मन भी बेहद आहत है। मेरी इस मानसिक वेदना को वहीं समझ सकेगा, जो राजनीति से ऊपर हो, क्यों कि स्थिति यह है कि नेता तो राजनीति करते ही हैं, प्रबुद्ध वर्ग से लेकर आम जनता यहां तक मीडिया में भी दलगत राजनीति की उबाल है। हम पत्रकार आखिर ऐसा क्यों करते हैं नहीं समझ पाता। मुझे आज अपने व्हाट्सअप ग्रुप को लेकर जिस कष्ट की अनुभूति हो रही है, उसे स्पष्ट रूप से बता भी नहीं सकता । सभी मेरे ही मित्र- बंधु हैं। दुख- दर्द के साथी हैं। लेकिन , फिर भी एक राजनैतिक समाचार के पोस्ट होते ही भूचाल सा आ गया ग्रुप में। इतने वर्षों से ग्रुप चला रहा हूं मैं ,ऐसी अप्रिय स्थिति तो कभी नहीं आई। ग्रुप में विभिन्न दलों के  जनप्रतिनिधि, राजनेता, शिक्षक, चिकित्सक, व्यवसायी से लेकर आमलोग हैं। ठसाठस भरा है यह ग्रुप। ये सभी मुझपर विश्वास  करते हैं कि शशि भाई निष्पक्ष हैं, तो मैंने भी खुल्लमखुल्ला खुल्ला सभी से बोल रखा है कि न मैं हिन्दू हूं  ना मुस्लमान, बस इंसान बनने की शक्ति दो मुझे मेरे दोस्तों। मैं किसी राजनैतिक दल के दर्पण में अपना प्रतिबिंब नहीं देखना चाहता हूं। कोई बहरा हो तो भोंपू लगा कर कहूं। जिस गली- चौराहे पर चाहों मैं इस बात पर यकीन दिलाने के लिये अपनी नुमाइश लगा सकता हूं। परंतु हाथ जोड़ कर पुनः प्रार्थना करता हूं कि जिस ग्रुप का सृजन मैंने आपस में भाईचारा कायम करने के लिये किया था, उसे बदनाम मत करों मेरे साथियों। आज जो हुआ इस दर्द को मुझे दुबारा न दो। कामरेड सलीम भाई से कोई ढाई दशक मेरा पुराना संबंध रहा है। लेकिन, वे रुठ कर ग्रुप से चल दियें। आखिर जाति, मजहब और राजनीति की यह बड़ी खाई कब तक हमें आपस में एक दूसरे से दूर रखेगी। यह "साम्प्रदायिक " और "सेकुलर" शब्द क्या इंसानियत से भी ऊंचा है या हम बिल्कुल बावले हो गये हैं। टेलीविजन खोलते ही जिस भी चैनल पर जाएं डिबेट के नाम नेताओं का एक दूसरे के प्रति जहर उगलना समाज के पूरे वातावरण को विषाक्त किये हुये है और आज यही तो मेरे उस व्हाट्सअप ग्रुप में भी हो गया, जिसका सृजन मैंने कितने ही परिश्रम से किया है। हमारे प्रिय मित्र देवमणि त्रिपाठी यहां से गोंडा चले गये, फिर भी खबर लगातार पोस्ट करते हैं अन्य सदस्य भी कहीं भी कोई घटना उनके संज्ञान में आई नहीं  कि तुरंत बतलाते हैं। ग्रुप का हर सदस्य मुझे प्रिय है। किसी को यदि मैं निकालता हूं, तो उसकी जो पीड़ा मुझे होती है आप नहीं समझेंगे। ये जो ग्रुप हैं न मित्रों यह मेरा परिवार है। क्या हुआ जो गृहस्थ आश्रम वाला घर-संसार मेरे पास नहीं है। यहां तो एक नहीं अनेक मित्र मेरे संकट में दौड़े आते हैं। मैं इसे बिखरने नहीं देना चाहता हूं। सो, मित्रों इस सार्वजनिक घर में राजनीतिक न करें। बस इतना कहूंगा बंधुओं..
       ये तेरा घर ये मेरा घर , ये घर बहुत हसीन है।

Tuesday, 12 June 2018

एक और युवा क्रांति के लिये करें सृजन


   
       पिछले पोस्ट में बात पुलिस विभाग की कर रहा था। प्रशासनिक महके में मैं सबसे करीब इसी के रहा हूं। आज में पुलिस आफिस भले ही यदा- कदा जाता हूं। लेकिन मेरे एक व्हाट्सअप ग्रुप में सवा सौ के करीब इसी विभाग के लोग जुड़े हैं। इनमें से कुछ दरोगा, सिपाही और इंस्पेक्टर ऐसे भी हैं, जिनके स्नेह और सहयोग के कारण यह ग्रुप अपडेट बना रहता है। हां, अफसरों से मैं कुछ अधिक उम्मीद नहीं करता हूं, उस मुकदमे से मुझे यह सबक तो मिला ही कि इनके पास बैठ कर अथवा इनके लिये अत्यधिक लिखना पढना, अपने कलम का अपमान करना है। सो, इन सभी से जब भी भेंट होती है, मैं तुरंत प्रणाम कर पिछली सीट पर जा बैठता हूं। नहीं तो एक दौर वह भी था कि मैं और कुछ एसपी साथ- साथ चाय-जलपान करते थें। एएसपी जो थें वे तो छोड़ते ही नहीं थें। उस समय मोबाइल का जमाना नहीं था। सो, दूर दराज की घटनाओं की जानकारी सबसे अधिक एएसपी से मिलती थी मुझे। कुछ सिपाही मुझ पर इतना भरोसा करते थें कि विभाग ऐसी कोई भी खबर नहीं रहती थी , जो मुझे नहीं मिलती थी। जैसे ही कप्तान की बड़ी पेशी में जाता था सभी हर्षित हो उठते थें। वे जानते थें कि शशि भाई कुछ भी इधर- उधर नहीं करेंगे। अखिलेश सिंह हो या प्रदीप सिंह और भी बहुत से पुलिस मित्र मेरी कोई खबर छूटने नहीं देते थें। वरिष्ठ अधिकारियों को बड़ा आश्चर्य होता था कि इसका तो कोई कार्यालय नहीं है, क्षेत्रीय प्रतिनिधि भी नहीं है, टेलीफोन नहीं है, साइकिल से चलता है, फिर कहां से सटीक खबर वह भी सबसे पहले पाता है। बाद में हेरोइन के ठिकानों की खबर छापने को लेकर एक अधिकारी से मेरी उन्हीं के कार्यालय में बहस भी हुई थी। ये साहब नंबर दो की कुर्सी पर जरुर थें, परंतु हम पत्रकारों को दबा कर रखना चाहते थें। लेकिन, जब मैं उन्हें उनकी सर्किल के हेरोइन(घातक मादक द्रव्य) बिक्री के ठिकानों का नाम बताना शुरु किया, तो लगे पसीना पोंछने । वे षड़यंत्रकारी अधिकारी थें, सो यहीं से मेरी घेराबंदी शुरू हो गयी थी। एक मित्र सिपाही से धीरे से बताया कि आपका मोबाइल सर्विलांस पर लगाया जा रहा है। ताकि पता चल सके कि इतनी सटीक जानकारी कौन दे रहा है। अब आप देख लें खाकी वाले ऐसे अफसरों की मानसिकता, मैं तो जनहित में इतना खतरा मोल लेकर तमाम हेरोइन बिक्री केंद्रों का हाल खबर दे रहा था । जनता पीठ थपथपा रही थी मेरी और वो मुझे फंसाने का षड़यंत्र रच रहे थें।  तकलीफ इस बात की है कि यदि मैं ऐसी खबर इन इन धंधेबाजों को ब्लैकमेल कर धन उगाही के लिये लिखा होता, तो आप मुझे जो सजा देते , तनिक भी कष्ट नहीं होता। परंतु समाजहित में मैं इतना संघर्ष कर रहा था,इन ठिकानों से मिलने वाले पैसों को ठुकरा रहा था और आप पहरूयें मेरी ही कलम को मरोड़े जा रहे थें।  पर वह जवानी ही क्या कि बिना पंजा मिलाये ही हार स्वीकार कर ले। वैसे, भी बचपन से ही समर्पण मेरे शब्दकोश में नहीं है। भाजपा के पहचान वाले नेता रामदुलार चौधरी से पूछ लें कि सबरी से लेकर भैंसहिया टोला, आवास- विकास कालोनी, जीआईसी के बगल में, विंध्याचल, कदमतर से लेकर औराई थाने के समीप संचालित हेरोइनबाजों के अड्डों पर मैंने कितनी तगड़ी रिपोर्टिंग की थी। गांडीव का महत्व तब इसलिये और था कि वाराणसी में बैठे आईजी जोन उसे पढ़ा करते थें, सो जोन की बैठक में वे कप्तान से पूछ भी लेते थें अथवा पेपर कटिंग आ जाती थी।
     हेरोइन जैसे धीमे जहर के विरुद्ध युवा काल में मेरे द्वारा अखबार के माध्यम से इस अंदाज में मोर्चा खोलने के पीछे कुछ मार्मिक प्रसंग रहा। मेरा भावुक हृदय युवाओं की यह बर्बादी नहीं देख पाता था। जब हाईस्कूल में था, तो स्मैक से जुड़ा एक टीवी सिरियल देखा था। यहां विंध्याचल में एक प्रतिष्ठित तीर्थ पुरोहित के प्रतिभावान पुत्र को मैंने इस नशे का शिकार होते देखा था। जो अब नहीं है इस दुनिया में इसी के कारण । जब मैं मीरजापुर आया था, तो एक नवरात्र पर मेरे प्रेस के प्रमुख लोग दर्शन करने विंध्यवासिनी धाम आये थें। तब उसी युवा तीर्थ पुरोहित ने उन्हें भव्य दर्शन पूजन करवाया था। बाद में अपनी व्यवहार कुशलता से पार्षद  भी बन गया वह। लेकिन, सब कुछ बिखर गया, इसी नशे से । बाद में उसकी सांसें भी थम गयी, पर उससे पहले मेरी कलम टूट गयी थी । अब वर्षों से हेरोइन और जुएं के अड्डे पर मैं कोई खबर नहीं लिखा हूं , इसलिए नहीं की डर गया हूं खाकी, खादी और मीडिया को नापाक करने वाले कुछ लोगों के गठजोड़ से ! वरन् इसलिए कि यह समझ चुका हो कि कोई युवा क्रांति ही इस भ्रष्ट व्यवस्था  के विरुद्ध निर्णायक जंग लड़ेगी। अतः हम कलमकारों को अपने विचारों से ऐसे वातावरण का सृजन करना होगा, ताकि जो मेरा एकल
मिशन था वह बहुतों का लक्ष्य हो जाए। फिर कौन दबाएगा हमारी कलम को, उस इंकलाब जिंदाबाद के समक्ष ?

(शशि)

Monday, 11 June 2018

एसपी सावत के स्नेह से पुलिस विभाग में बढ़ी मेरी पहचान


     एक काफी पुराने मामले में कोर्ट में आज फिर तारीख लेने गया था। हम पत्रकारों के लिये एक चुनौती यह भी रहती है कि पता नहीं कौन हमारी लेखनी से नाराज हो जाए। विंध्याचल धाम में कालीखोह मंदिर में चोरी होने की खबर हिंदुस्तान समाचार पत्र में छपी थी और अगले अंक में गांडीव ने भी "नकली गहने" चोरी का समाचार प्रकाशित किया था। सो, पुलिस प्रशासन के द्वारा दोनों समाचार पत्रों के सम्पादक और हम प्रतिनिधियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाया गया था। मामला न्यायालय में है।
         इस प्रकरण के बाद से न जाने मेरा मन क्यों भारी हो गया और तब से आज तक मैं वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से यदि प्रेस कांफ्रेंस न हो तो कम ही मुलाकात करता हूं। याद है आज भी मुझे कि इस जनपद में  वर्ष 1995 - 96 में एसपी एस एन सावत जैसे युवा अधिकारी भी रहें। वर्तमान में वे एडीजी इलाहाबाद हैं। चेहरे पर सदैव मुस्कान, वाणी में कनिष्ठ जनों के लिये भी सम्मान और सही- गलत की पहचान जितनी उनमें थी, फिर कोई ऐसा एसपी यहां मेरे सामने तो  नहीं आया। वैसे,  दो और युवा एसपी डा0 प्रीतिंदर सिंह और कलानिधि नैथानी की कार्यशैली मुझे काफी पसंद आई। दोनों ही ईमानदार आईपीएस हैं। फिर भी सावत साहब का कोई जोड़ नहीं है, मेरी निगाहों में। इंसाफ की गुहार लगाने वालों के प्रति उनकी जो न्याय करने की क्षमता रही और हम पत्रकारों ने यदि किसी घटना को पुलिस व्यवस्था के लिये चुनौती बताया, तो पेपर में वह कड़ुवी खबर पढ़ कर  वे तनिक भी बुरा नहीं मानते थें, वरन् हमसे ही समाधान पूछ बैठते थें। अपनी बात करुं, तो तब पत्रकारिता में एक- दो वर्ष ही तो हुये थे कदम रखे। इसी बीच मीरजापुर और भदोही जनपद की सीमा टेढ़वा पर हत्या कर महिलाओं का शव फेंकने की तीन घटनाएं हो गयीं, तो मैंने खबर लिख दी कि शव को ठिकाने लगाने का अपराधियों का पसंदीदा स्थल बना टेढ़वा। सावत साहब ने खबर पढ़ी और कहा तुम्हारा कहना भी सही है। जिस पर मैंने कहा कि पुलिस नहीं रहती वहां, जबकि चील्ह और औराई थाने की सीमा है। उन्होंने तत्काल टेढ़वा पर थाने से दो सिपाहियों की ड्यूटी लगा दी और लाशों का मिलना भी बंद हो गया। अब पुलिस चौकी है वहां। शास्त्रीपुल से एसपी बंगाल काफी दूर था, फिर भी मैं साइकिल से उनसे मिलने अथवा अखबार देने जाता था। यह देख उन्होंने कहा कि पेपर मैं मंगा लिया करुंगा, किसी थाने या चौकी पर रख दिया करें। यहीं से गांडीव पुलिस विभाग के लिये महत्वपूर्ण अखबार हो गया। कनिष्ठ अधिकारी समझ गये थें कि साहब उसे पढ़ते हैं। फिर क्या था मेरी पकड़ भी पुलिस विभाग में हो गयी। एएसपी, सीओ, थानाध्यक्ष सभी मेरा सम्मान करने लगें। जिसका श्रेय मैं तब अपने प्रेस में विशेष प्रतिनिधि रहें  चित्रांशी अंकल को देना चाहता हूं। सावत साहब अकसर ही यह पूछ लेते थें कि कैसे आये हो साइकिल न ? वह भी इतनी दूर मेरे बंगले ! एक क्षेत्राधिकारी ने बाद में बताया था कि साहब को बिल्कुल अच्छा नहीं लगाता कि अन्य पत्रकार स्कूटर और मोटर साइकिल से आते जाते हैं, लेकिन आप इतनी दूर साइकिल से। तो मैंने मजबूरी अपनी बता दी कि भाईसाहब ईमानदारी के पैसे से सवारी बदल नहीं सकता मैं, आप सभी ने मेरे लिये इतना सोचा यह क्या कम है। आज भी कुछ माननीय और बड़े व्यवसायी , जो मेरी ईमानदारी के कारण मुझसे स्नेह करते हैं, वे बराबर कहते रहते हैं कि बहुत हो गया शशि जी अब हमलोग आपको साइकिल से नहीं चलने देंगे। वैसे, भी तो आपका स्वास्थ्य  खराब रहता है। लेकिन, मैं हूं कि मुस्कुरा कर उनके आग्रह को टालता आ रहा हूं, इतने वर्षों से। क्या करूं मित्रों , अपनी तो साइकिल ही हवाई जहाज है।उस समय टेलीफोन ड्यूटी पर दो युवा आरक्षी प्रमोद कुमार सिंह और श्रवण कुमार सिंह थें , आज दोनों ही दरोगा हैं। प्रमोद सिंह की बड़ी बिटिया तो डाक्टर बन गयी है। साबत साहब के बाद शैलेन्द्र प्रताप सिंह, बद्री प्रताप सिंह सहित कुछ और पुलिस कप्तान भी मेरी ईमानदारी और मेरी लेखनी दोनों को पसंद करते थें। अपर पुलिस अधीक्षकों से पर्याप्त सहयोग और समाचार मिल जाता था।  लेकिन, वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार हमें कैसे ढलना है, इसका प्रथम उपदेश तब मुझे एक कोतवाल ने दिया था। जिन्होंने मुझे बताया था कि शशि जी आप युवा हैं अभी ,इसीलिये नहीं समझ रहे हैं  कि हम पुलिस वाले जनसेवा नहीं नौकरी करने यहां आये हैं। और सचमुच जमाने भर की ठोकर खाने के बाद अब मुझे उक्त पुलिस अधिकारी को धन्यवाद देने का मन करता है, क्यों कि लगातार  हेरोइन और जुएं पर खबर लिखने के कारण ही मेरी  इस तरह से घेराबंदी हुई थी। संकट में न संस्थान काम आया और न ही यह समाज जिसके लिये हम जमाने से भिड़ते हैं।

शशि

Sunday, 10 June 2018

न छांव की तलाश ,न ठोकरों का भय है

 
 न छांव की तलाश ,न ठोकरों का भय है
पथिक मैं उस राह का ,जहां त्याग ही कर्म है
 वेदनाओं की बलिवेदी ही , यहां मेरा धन है
नश्वरता की छांव और वैराग्य अपना अंबर है
प्रेम कलश फूट चुका,व्याकुल नहीं हृदय है
पथिक मैं उस राह का, जहां त्याग ही धर्म है

                 पत्रकार हूं, सो इतना तो जानता ही हूं कि कविता का इस तरह से उपहास नहीं करना चाहिए मुझे, फिर भी मन की भावनाओं का विस्फोटक कहीं तो होना है ।
   हां, अब अपनी जीवन यात्रा को मुजफ्फरपुर में स्टोर बाबू की नौकरी से आगे बढाता हूं। वैसे तो सच बताऊं  दास्यभाव मुझे कभी स्वीकार नहीं था। सो, नौकरी कहीं करने की इच्छा नहीं थी। आज भी इन पच्चीस वर्षों में मैं संस्थान का नौकर तो नहीं ही हूं, वरन् अपने अखबार का यहां मीरजापुर जिला प्रतिनिधि हूं। अब हममें से कुछ पत्रकार ब्यूरोचीफ भी स्वयं को बताया करते हैं, परंतु मैं गर्व से स्वयं को हॉकर पत्रकार कहता हूं। दोनों में से किसी भी पहचान के साथ अन्याय नहीं करना चाहता हूं। रोटी की तलाश में मुजफ्फरपुर से कलिंपोंग होते हुये वापस वाराणसी आकर जब गांडीव समाचारपत्र के कार्यालय पहुंचा और पूज्य सरदार मंजीत सिंह जो तब प्रसार विभाग में वहां प्रबंधक थें, ने मुझे मीरजापुर का दायित्व सौंपा, तब भी वह नौकरी नहीं थी। बाद में भी बड़े अखबारों के कार्यालय से बुलावा आने पर मैं वहां नौकरी करने नहीं गया।, नहीं तो आज अच्छा वेतन पाता। लेकिन क्या बताऊं मेरी यह जिद्द ही था कि ना भाई ना, नौकरी और मैं करुं, बिल्कुल नहीं। करीब तीन वर्ष पूर्व तक एक जनपद से दूसरे जिले जा कर 22 वर्षों तक अखबार का बंडल लाना, फिर रात्रि में अखबार वितरण और सुबह उठते ही ताजी खबरों का पुनः संकलन 17- 18 घंटे की ड्यूटी तो प्रतिदिन देता ही था। समझ में नहीं आता कि मैं भी कितना विचित्र इंसान था कि 10-11 घंटे की नौकरी बड़े अखबारों में थी ,फिर भी करने से कतराता रहा। वहां, वेतन भी कुछ ठीक मिलता एवं साप्ताहिक अवकाश अलग से था ही। परंतु गांडीव में मेरी लेखनी स्वतंत्र थी, मेरे विचार स्वतंत्र थें और सबसे बड़ी बात मेरी पहचान स्वयं की अपनी थी। संस्थान की ओर से विज्ञापन का ही तब ना कोई दबाव था। सो, मेरा यह रंगमंच मेरे विचारों के अनुकूल था। यह वेदनाओं का दौर तब शुरू हुआ , जब अपनों के दुख- सुख से दूर हो चला। रंगमंच पर मेरा चारों शो फिक्स था। सुबह के समय समाचार लेखन फिर दोपहर तक समाचार संकलन, दोपहर बाद समयाभाव में किसी भी तरह से क्षुधा शांत कर अपरान्ह ठीक चार बजे शास्त्रीपुल पर औराई जाने के लिये बस की तलाश शुरू करना और देर रात अखबार बांट कर खाली होना। हां, जब संस्थान की स्थिति बेहतर थी, तो मेरे पास अखबार बांटने के लिये चार लड़के होते थें। ग्राहकों को दुकान बंद होने से पहले गांडीव मिल जाया करता था। उस दौर में सुबह के तीन प्रमुख समाचार पत्रों की तरह ही मेरे गांडीव का भी यहां सम्मान था। फिर कुछ हजार रुपये की नौकरी के लिये मैं अपनी यह पहचान क्यों खोता, आप ही बताएं न ? पर आज इसीलिये साथी मित्र मुझे बेवकूफ कहते हैं। वे कहते हैं कि डूबती नांव की यदि तुम्हें तनिक भी पहचान होती, तो आज खुशहाल घर गृहस्थी होती तुम्हारी। मित्रों के इस कटाक्ष का मेरे पास कोई प्रतिउत्तर नहीं है। सो, सिर झुका अपनी पराजय स्वीकार कर चुका हूं। फिर भी नौकरी मुझे स्वीकार नहीं है । पहचान बनने पर छोटे अखबारों का सम्वाददाता होने के बावजूद भी धन कमाने का आसान तरीका उस दौर में था। पर क्या कहूं मास्टर साहब का जो लड़का था। ईमानदारी की राह अभिभावकों ने बताई थी सो...
 सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी ।
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी।

(शशि)

Saturday, 9 June 2018

यह जो तुम्हारा छल है !



 

 
      मौत का यह तरीका मुझे बिल्कुल नापसंद है। यह भी कोई बात हुई कि सीधे आकर गटक गयी। शत्रु को भी एक अवसर मृत्युदंड से पूर्व अंतिम इच्छा बताने का मिलता है। यहां हम तुम्हारे कोप से बचने के लिये देवी देवता को मनाते रहे हैं ,  ग्रहों की शांति के लिये क्या-क्या नहीं करते हैं और तुम हो की हम इंसान की जिंदगी का सारा गणित  बिगाड़ जाती हो। अरे निर्मोही , जीवन के लिये संघर्ष का एक तो अवसर  दिया होता ।  तनिक भी नहीं सोचा तुमने  कितने श्रम से हमने अपने जीवन का आशियना बुना है । बीवी, बच्चों और यार दोस्तों से हमारा नाता जुड़ा है। हाय ! यह कैसा घोर अन्याय है हम प्राणियों के संग तुम्हारा ! अभी कल की ही तो बात है सुबह पेपर लेकर निकला था, तभी गिरधर चौराहे पर विनोद ऊमर से यह सुन करेंट सा झटका लगा था कि अपने गोवर्धन भैया नहीं रहें। मैं स्तब्ध सा रह गया था, क्यों कि मेरा ब्लॉग उन्होंने उस दिन भी पढ़ा था । जिस रात वे बिन बताएं सबसे नाता तोड़ चले थें। ब्लॉग का शीर्षक था आनंद की खोज ...और वे स्वयं ही खो गये थें। क्या पूरी हुई खोज उनकी, या यूं ही छोड़ हम सबको चले गये हैं ..
       क्या बताऊं मैं जब मीरजापुर आया था। मुझसे पेपर लेने वालों में वे पहली कतार में खड़े थें, लिया ही नहीं साथ चल औरों को भी गांडीव का ग्राहक बनवाया था। तभी से मेरा उनका एक अनजान सा रिश्ता था। और फिर मैं जब असाध्य मलेरिया से पीड़ित हुआ था , तो भी मेरे गिरे मनोबल को उन्होंने यह कह कर उठाया था कि अब तो बिल्कुल ठीक हो भाई , क्या लोगे चाय-नमकीन । व्यवसायी थें वे और घर पर विद्यालय भी चलता है। स्वाभिमानी इतने थें कि कांग्रेस की राजनीति मे यहां के आंका के चौखट पर नतमस्तक होते उन्हें किसी ने नहीं देखा है । उनकी अपनी कांग्रेसी गद्दी थी, छोटी थी या बड़ी थी। हां, पार्टी में पक्षपात जब अधिक होता था, तो मुझसे उम्मीद उनको होता था कि शशि है, तो मेरा भी कुछ लिख पढ़ देगा जरूर।  सो, अभी तो और लड़ाई थी, लेकिन उस रात घर अपनी जीवनसंगिनी के समक्ष ही बेचैन निगाहों से चल दिये। पिछले माह भी एक और जान पहचान के व्यापारी ने इसी बेचैनी में ट्रेन में अपने युवा पुत्र के कंधे पर सिर क्या रखा बदन ठंडा पड़ गया था। बच्चे ने पिता की ऐसी मौत की भला कहां कभी कल्पना की थी ।  ऐसा पहले कभी- कभी होता था, पर अब रोज होता है। ऐसी पहली मौत मैंने अपने आंखों से कोई 22 वर्ष पूर्व देखी थी, जब पत्रकार चाचा के घर एक अधेड़ व्यापारी आया था। देर शाम बिस्तरे पर चंद मिनटों में ही वह ठंडा पड़ गया था।  न कोई बीमारी, ना ही दुर्घटना और समय से पूर्व यूं चल देना।  मौत के इस अजब ढ़ंग से मन विकल हो जाता है। तो मेरी चुनौती स्वीकार करों हे मौत की रानी ! माना कि मैं तुम्हें हरा नहीं पाऊंगा, पर तुमसे आंखें ना चुराऊंगा । पथिक हूं और मुसाफिरखाना अभी ठिकाना है आओ संग चले
पिय के घर  जाना है।

(शशि)

चित्र साभार गुगल से

Friday, 8 June 2018

वफादारों की टोली से कुछ हमें भी कहना है...



     इन दिनों सुबह अखबार बांटना  सच बताऊं तो एक बहाना है। न पैसे की जरुरत है मुझे, ना ही काम की, अब तो बिल्कुल मस्त फकीर हूं साहेब के दरबार में ! सुबह पौने पांच बजे निकलता हूं, तो ताजी हवा भी मिल जाती है और कुछ स्नेहीजनों संग राम- राम भी। कल की बात लें  वफादारों की पूरी फौज ही मिल गयी थी। बुंदलखंडी के अपने मंगलदास चाचा हैं न , जब उनकों अखबार दिया तो देखा उनके चेहर पर कुछ उदासी थी। पता चला जनसंघ के गढ़ में चौपाल लगा , पर नहीं बुलावा आया था। जिन्दगी बीत गयी बस्ता ढोते, पार्टी के लिये जेल जाने की बात याद हो आई थी। वफादारी का क्या यही मोल कि एक आवाज तक किसी ने नहीं लगायी थी । निष्ठावान भगवा ध्वज रक्षक होने का दर्द पिछली सरकार में उन्होंने खूब सहा है। वेदना उन्हें कहीं अधिक इस बात की थी कि जो गैर थें , वे खास हो गये और अपने पराये। आगे रतनगंज में सुबह की चाय पीने को राजकुमार जायसवाल ने आवाज लगायी, दुआ सलाम के दौरान चेहरा उनका भी मुर्झाया मिला। पूछा तो पता चला कि आंका के प्रति वफादारी का रोग अब सत्ता परिवर्तन के बाद उनके पेट पर लात मार रहा है। खुशमिजाज राजकुमार भैया को राजनीति की यह पहेली सताये जा रही थी। वापस मुसाफिरखाने को लौटा , तो घनश्यामदास मोदनवाल मिल गये। मेरे सबसे अजीज मित्रों में से हैं। चाय तो मैं उनकी दुकान पर ही मेरी सुबह शाम की होती है । समझ ले कि छोटे से कुल्हड़ में लबालब " चाह" जो भरी होती है। सो, बिना यहां सलामी लिये मन नहीं मानता है। अपने समाज के कर्तव्यनिष्ठ अक्खड़ कार्यकर्ता हैं। पता चला की वफादारी के सवाल पर अपने घनश्याम भैया भी अनमने से हैं। न सेवा के पुरस्कार की चाहत  है , न ही मंच पर नेतागिरी करना उन्हें भाता है, फिर भी भैया जी क्यों उदास है। बात यहां भी समाज के रहनुमाओं से वही है कि...

          गै़रों पे करम, अपनों पे सितम,
         ऐ जान ए व़फा ये जुल्म न कर
          रहने दे अभी थोड़ा सा भरम...

    पुलिस विभाग में भी मेरे कुछ जाबांज साथी हैं, जो अपनी वर्दी के प्रति निष्ठा रखते हैं , फिर भी विभागीय ट्रांसफर पोस्टिंग चाहे जितनी हो, वे बेचारे नेपथ्य में हैंं। कारण या तो सत्ता की जाति के नहीं हैं वो या फिर जुगाड़ तंत्र से अनजान है। सबकी वफादारी की राम कहानी फटाफट सुना दी , अब अपनी पत्रकार बिरादरी का हाल भी सुनाता हूं जनाब! तो समझ लें आप यह कि हम वे बेजुबां प्राणी है कि सुबह से रात तक खबरों की गठरी ढोते हैं और जैसे ही जवानी ढली नहीं कि फुटपाथ पर होते हैं।  एक नामी अखबार के फोटोग्राफर स्वर्गीय अशोक भारती की याद हो आई है। एक जमाना था कि कलमकारों को जाने ना जाने अफसर और नेता , पर भारती भैया से सलामी  सभी लेता था।  सिर पर हैट, कंधे से पैंट में फंसा बेल्ट , जेब में टाफी ऐसी कहां इस जिले में पहचान हुई फिर किसी प्रेस छायाकार की। पर हाय ! वफादारी का क्या परिणाम मिला। जेब खाली और वनवास मिला। समय से पहले ही वृद्ध हो गये हम सबके भारती अंकल। बाहरी दुनिया से दूर घर के एकांतवास में स्मृतियों के दिवास्वप्न में खोये एक दिन अल्लाह को प्यारे हो गये हमारेअंकल !

 सो, वफादारों की टोली से बस यही कहना  है कि निष्ठा एक खिलौना है और यह भी ...

मन रे ! तू काहे ना धीर धरे
वो निर्मोही मोह ना जाने जिनका मोह करे

(शशि)

Thursday, 7 June 2018

इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास...





     
     निःसन्देह ब्लॉग लेखन का मेरे व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव दिख रहा है। जो भी मैंने लिखा था, वह आज मुझे ही नसीहत दे रहा है । देखो रंग मत बदलों मेरे यार ! कल तो आत्मबोध कर रहे थें और आज तनिक सी बात पर यूं क्यों उद्वेलित हुये जा रहे हो । अंदर की ये आवाज अब कुछ तो साफ सुनाई पड़ती है। यहां मेरे भी कुछ मित्रों का कहना है कि दिन भर समाचार तलाशते तुम अपनी बातें ना कर पाते थें। सो, मन हल्का करने का यह अच्छा ठिकाना है। सो, एक बात तो साफ कर दूं कि आत्मावलोकन ही मेरे ब्लॉग लेखन का मकसद है।
          अब देखेंं न कल रात और आज सुबह भी दो बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं कि यदि पूर्व की स्थिति में होता, तो मन को अति आघात पहुंचना निश्चित था। परंतु अब किसी के द्वारा किया कटाक्ष भी कबीर की वाणी लगती है। अपना कर्मक्षेत्र ही ऐसा है कि जाने अनजाने में मित्र भी शत्रु बन जाता हैंं।  इसका मतलब यह तो नहीं की हम भी तलवार भांजने लगे। विनम्रता ही हमारी पहचान है, पूर्व में लिखी बातें यह हर वक्त याद दिलाती हैं। गलतियों को बतलाती हैं और नेकी की राह दिखलाती हैं। सो, आज जो कुछ हुआ, उसे लेकर मन नहीं तनिक मलीन हुआ। ईश्वर को धन्यवाद देता हूं कि यह सुधार मुझमें जारी रहे। पत्रकारिता छोड़ते समय न रहे किसी से दुश्मनी बस यारी हमारी रहे। भूख, गरीबी, बेरोजगारी, बेगारी, बदहाली पर तो कब का नियंत्रण पाया हूं। अब वाणी संयम की जब बार है। कल रात से आज सुबह जो दो कड़ी परीक्षा देनी पड़ी है, उम्मीद यही है कि पास जरुर उसमें हुआ हूं।  मान-अपमान  से जब तक ऊपर नहीं उठेगा हमारा मन , तब तक यह व्याकुलता जारी है , यह हमें और आपको भी पता है।  फिर भी आज अपने में इस परिवर्तन पर मन ही मन आनंदित हूं। हां, मानव अभी मुझे बनना है ! एक बात बताऊं, कम्पनी गार्डन में भी कभी "मानव जी"  मिला करते थें। मैं निठल्ला उस समय उनकी कविताओं का मोल ना समझ सका था। वे पांखड से दूर बेहद ही सज्जन इंसान थें । बुजुर्ग थें और हाई ब्लडप्रेशर के शिकार थें। काशी की धरती थी,  सो कर्मकांडी उन्हें खिसियाते थें। फिर भी बीड़ी के धुएं में मानव जी की कड़क आवाज दूर तक उनकी मौजूदगी का एहसास दिलाती थी। सत्य को भला कौन दबा सकता है, मुझे बार बार वे सिखलाते थें। आज अचानक आंखें नम हो आयी हैं। काश ! कुछ दिन और उनके समीप गुजारा होता, संसार के इस भुलभुलैया से कब का मोक्ष पाया होता।  बस इस प्यारी सी प्रार्थना...

             "इतनी शक्ति हमें देना दाता
           मन का विश्वास कमजोर हो ना
            हम चले नेक रस्ते पे हमसे
             भूलकर भी कोई भूल हो न"

  के साथ आप सभी को शुभरात्रि कहता हूं।

(शशि)
       चित्र गुगल से साभार

Wednesday, 6 June 2018

आनंद की खोज मेरी जब हुई पूरी !





   
    आनंद क्या है , कैसा है और कहां है ... हर इंसान को इसकी तलाश रही है। धन से जब वह नहीं प्राप्त होता तो धर्मग्रंथों में हम उसे ढ़ूढ़ने लगते हैं। पुकारते है हम उसे आनंद ओ आनंद ! तुम कहां हो भाई... फिर भी वह हमारे पास नहीं आता। मृगमरीचिका सा हमें दौड़ाता है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा हर धर्म स्थलों की दौड़ लगाते हैं हम । कबीर की अमर  वाणी को भी अजमाते हैं हम, "  मोको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में।"
    फिर भी यह आनंद है कि सुनता ही नहीं, मानो  मूक बधिर और नेत्रहीन हो गया है वह !  या जानबूझ कर पास आने से मटियाता है ।  व्याकुल पथिक शीर्षक से इस ब्लॉग के सृजन का मकसद भी तो मेरा यही है। अपनी बातें इससे साझा जो कर सकूं।  इस वर्ष 17 मार्च से इस पर जो कुछ लिख रहा हूं, उसे जब तब उलट पलट कर देख भी रहा हूं। कभी - कभी सोचता हूं कि ऐसा क्यों लिख दिया मैंने । मन की वेदनाओं को जब इतने वर्षों तक दबाये- छुपाये रहा हूं , तो अचानक कौन सी व्याकुल आ पड़ी कि यह पथिक यूं ही पिघलता सा  गया था। कभी - कभी तो लगता है कि यह क्या बकवास लिख रहा हूं। खुद ही अपनी जगहंसाई का जरिया यूं क्यों सृजन कर कर रहा हूं। हिन्दी तक शुद्ध लिखने आती नहीं महाशय को और प्रवचन कर रहा हूं। मित्रों यह मन भी न... क्या कहूं अब इसे ?  हां, एक कार्य अच्छा यह हुआ है कि रात की अंधेरी गलियों से निकल कर जबसे सुबह का सूरज देख रहा हूं। अभी कल ही की तो बात है , आनंद सामने खुद- ब -खुद यूं ही खड़ा था। सुबह के पांच बज रहे थें, जब मैं अखबार बांटते हुये एक पार्क की ओर बढ़ा था। देखा एक प्रौढ़ दम्पति एक दूसरे का हाथ थामें बच्चों सा खिलखिला रहा था। न यौवन ढलने का गम , ना ही बुढ़ापे का भय... वह तो बस आनंद की प्रतिमूर्ति ही मुझे दिखा था। साइकिल से पीछा करते मैं अपलक उन्हें निहारे जा रहा था। कारण मेरा मार्ग भी वही था , जिधर उन्हें जाना था। देखा, तभी एक मंदिर पर महिला के पांव ठहर जाते हैं। दुपट्टे को सिर पर किसी दुल्हन की तरह वह सवारती  है , साथ ही हमसफर को भी नयनों से इशारा करती है। दोनों वहां सिर झुकाते हैं, मानों एक दूसरे की सलामती चाहते हैं। और फिर उसी अंदाज में खिलखिलाकर कर मुस्कुराते हैं। घर से पार्क तक का उनका यह सुहावना सफर शायद हर सुबह ऐसा ही होता होगा। फिर किसी और आनंद की क्या है जरुरत इन्हें। हां,  दुआएं इतनी  हमारी भी है, यूं ही गुनगुनाते रहें,  यह जो जोड़ी प्यारी सी है...
 
     हमसफर मेरे हमसफर, पंख तुम परवाज़ हम
    जिंदगी का साज़ हो तुम, साज़ की आवाज हम।

( शशि )
चित्र गुगल से साभार

Tuesday, 5 June 2018

पथिक ! किस छांव की अब तुझे तलाश...


  केंद्रीय राज्यमंत्री ,भारत सरकार व मीरजापुर सांसद अनुप्रिया पटेल एवं जिलाधिकारी अनुराग पटेल पौधा लगाते
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   स्टोर बाबू की चाकरी ने मेरे कल्पनाओं के पंख कब के कतर दिये है। सो, मुझे सपना बेचना आता नहीं। ज्ञान गंगा के लिये व्हाट्सअप ग्रुप वैसे ही पटे हैं। मैं तो बस वहींं लिखता हूं, जो सहा हूंं और देखता हूं। देखें न आज एक बार फिर विश्व पर्यावरण दिवस का शोर चहुंओर मचा है , पर मेरा मित्र कम्पनी गार्डेन अपने सिकुड़ते अस्तित्व पर सिसक रहा है । आग उगल रहे सूर्य की तेज किरणों से बचने के लिये हर राहगीर पेड़ की छांव तलाश रहा है। पर वृक्ष हैं कहां मेरे भाई , जो उसके नीचे तनिक ठहर अपने तन की तपिश को शांत कर  पाओगे।यातायात सुगम बनाने के लिये जिन मार्गों पर फोरलेन  सड़कें बन रही हैं, वहां उनके दोनों किनारे लगे हजारों वृक्षों को चंद घंटों में काट धाराशायी कर दिया गया है। जो सैकड़ों वर्ष से खड़े थें। हम मुनष्यों को आम, अमरुद और जामुन देते थें। जो फलदार नहीं भी थें , वे भी हमें छांव तो निश्चित ही देते थें। हमारे ही जीवन रक्षा के लिये भूगर्भ जलस्तर को बढ़ा रहे थें। फिर भी हम मनुष्यों ने उन्हें असमय मौत दे दी क्यों ...स्वयं के विकास के नाम पर यह कैसी हमारी कृतघ्नता है। जरा भी नहीं विचार किया किसी ने कि जब फोरलेन सड़क की प्लानिंग बनी थी तो फिर इन वृक्षों को काटने से पहले नये पौधों को क्यों नहीं लगे थें। शास्त्रीपुल पर बसों की प्रतीक्षा करने वाले यात्रियों से पूछे इन वृक्षों के कटने का दर्द, तेज धूप में झुलसते व्याकुल हुआ जा रहा है उनका तन- मन । इस ओर सड़क तक नहीं बनी है अभी , अतिक्रमण दूर तक दुकानदारों ने कर रखा है। लेकिन , करीब दो वर्ष पूर्व सबसे पहले वृक्षों का गर्दन ही रेता है यहां हमने । इंसान की इनसे ऐसी क्या दुश्मनी थी कि एक पेड़ भी नहीं छोड़ा है। मैंनें जिन दो वृक्षों के नीचे औराई के लिये बस की प्रतीक्षा में दो दशक गुजारे थें। वे भी नहीं रहे यहां, पथिक किस छांव को अब तलाशोगे । हैं अब तो धुआं उगलते अनगिनत विशालकाय वाहन यहांऔर एक यात्री शेड जो सांसद ने लगवाया है।  कोई बाईस वर्ष इस मीरजापुर- औराई मार्ग पर सफर रही हमारी। बस से सड़क किनारे दोनों और हरे-भरे वृक्ष मन को कितना आनंदित किये हुये थें । यदि ट्रैफिक लोड के कारण जब कभी जाम लगता था। हम यात्री इन वृक्षों के नीचे ही तो शरण लेते थें। याद है मुझे जाम लगने पर माधोसिंह से औराई कितनी ही बार इन वृक्षों की छांव तले ही मैं पैदल चला था। नहीं तो अंगारे बरसाता यह सूर्य का तेज मृत्यु का देव बना खड़ा था। हाय ! जीवनदाता वृक्ष पर इतना अत्याचार  कर, फिर विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधे लगाने का स्वांग क्यों। कहीं माननीय, तो कहीं पत्रकार व सामाजिक संगठन ताम झाम से फरसा चला पौधे लगा रहे हैं। फोटो  खिंचवाने की होड़ यहां भी उनमें लगी है । सोशल मीडिया का नेटवर्क सुबह से ही ओवरलोड है। उधर अपना विंध्य पर्वत पुकार रहा है, कोई हमारे नंगे बदन का फोटो भी तो लो ना भाई। दशकों से अवैध खनन ने मेरी भी हरियाली छीनी है। मुझे पत्थर का ढ़ांचा इन्हीं लोगों ने बना खड़ा किया है। अनगिनत वृक्षों को विस्फोट के धमाके में दफन कर मेरा कलेजा अनेको बार फटा है। फिर आज के दिन चंद पौधे लगा इन्हें दी जा रही यह कैसी श्रद्धांजलि है । यह कैसा ढ़ोग है , कुछ तो बोलों बंधुओं ! जो जेठ की दुपहिया में तुम ये पौधे लगा रहे हो...
(शशि)

Monday, 4 June 2018

निकम्मा नहीं साहब स्टोर बाबू कहो..



     जब तक आश्रम में था या उससे पूर्व कलिंपोंग में भोजन और वस्त्र की व्यवस्था हो जाती थी, सो चिंता काहे की.. तब भी मेरी यही दो जरुरतें थीं  और आज फिर से उसी राह पर  हूं । यूं समझ लें कि इस महंगाई के हिसाब से बेरोजगार ही हूं। संस्थान ने बीते होली पर जब मुझे विज्ञापन मिला , तो उसमें से अपना हिसाब रख लेने को कहा गया था । पर भूख तो हर रोज लगती है न साहब , पैसे की जरूरत भी हर माह होती है ! मैं तो किसी विभाग से पत्रकार के नाम पर धन उगाही भी नहीं करता हूं। फिर भी बंधुओं मैं खुशकिस्मत हूं कि इन 24-25 वर्षों में अपनी सारी भौतिक इच्छाओं को दबा कुछ पैसे इसी संकट काल के लिये एकत्र किये हैं, ताकि किसी के सामने हाथ फैलाना न पड़े। और ऐसा मुझे विश्वास है कि अपने स्वाभिमान की बलि मैं कतई नहीं चढ़ने दूंगा..
     बात यदि अपनी पहली नौकरी की करूं, तो आश्रम छोड़ने के बाद सीधे मुजफ्फरपुर मौसी जी के घर एक बार फिर जा पहुंचा। वह मेरा तीसरी बार मुजफ्फरपुर जाना हुआ था। पहली बार मां - बाबा संग कोलकाता से कुछ दिनों के लिये गया था। दूसरी बार हाईस्कूल करने के बाद घर से संबंध बिगड़ने पर चला गया। तब मौसा जी का मोटर पार्ट्स और मैकेनिक की दुकान थी। लेकिन, तीसरी बार जब गया तब परिस्थितियां विपरीत थी। मौसा जी अपने पिता जी के सर्राफा दुकान में ड्यूटी देते थें। हालांकि मौसी जी मेरा बहुत ख्याल रखती थी। जब छोटा था, तभी से ही वे मुझे अपना ही पुत्र समझती है। उनकी पुत्री यानी मेरी बहन स्वीट तो मुझसे साढ़े बारह वर्ष छोटी है। इसीलिये तो कहता हूं कि नियति का यह कैसा खेल है कि तीन -तीन मां के होने के बावजूद मैं एक बंजारा हू... खैर, मुजफ्फरपुर में इस बार मैं किसी पर बोझ नहीं बनने की सोच रखी थी। युवा जो हो गया था, कहीं यहां भी लोग वही निठल्ला न कहने लगें मुझे । सवाल यह उठा कि मेरे पास कोई डिग्री तो थी नहीं कि उन दिनों बिहार जैसे पिछड़े प्रांत में मुझे अच्छी प्राइवेट नौकरी मिल जाती। बनारस में मास्टर साहब का लड़का और कोलकाता में बाबा मां के दुलारा , यही मेरी पहचान थी। एक बैंक में बड़ी मौसी जी कार्यरत थीं। बैंक प्रबंधक रहें बड़े मौसा जी के आकस्मिक निधन के बाद उन्हें नौकरी मिल गयी थी। उनका मुझपर काफी स्नेह रहा। सो, एक बड़े थ्रेसर कम्पनी में काम मिल गया। फैक्ट्री के मालिक ने मुझे स्टोर सम्हालने की जिम्मेदारी दी थी। मैं काफी सहमा हुआ था, स्वयं पर ग्लानि भी हो रही थी कि कहां तो ख्वाहिश इंजीनियर बनने की थी और अब यह स्टोर बाबू का काम.. वो गाना याद है न आपको..

जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर , कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं..

   सो ,चल पड़ा काम पर।तब मैं साइकिल तक ठीक से नहीं चला पाता था। अतः मौसा जी एक  छोटी साइकिल ले आये। यहां से बाद में मुझे दूर सुनसान इलाके में फेक्ट्री पर पोस्ट कर दिया गया। साइकिल से जाने में एक घंटा और वापसी में भी इतना ही समय लग जाता था। यूं कहें कि सुबह सात बजे निकला तो रात्रि साढ़े नौ -दस बजे वापसी होने लगी थी। थ्रेसर मशीन का सीजन जो था। मालिक समझ गये थें कि मैं अच्छे परिवार का हूं और बेहद ईमानदार भी, इसलिये स्टोर से बिना मेरी अनुमति के कोई कुछ नहीं लेता था। यहां तक कि मालिक ने स्टोर रजिस्टर भी देखना बंद कर दिया था। कोई कुछ कहता, तो सीधे कहते कि  लड़के से पूछों।  मालिक का मुझमें यह विश्वास देख वरिष्ठ कर्मचारियों का ईष्या करना स्वभाविक है।सो, एक शाम न जाने क्यों मालिक ने मुझे अपशब्द कह दिया, इसके बाद वे मुझे वापस काम पर बुलाने आये थें , बड़ी मौसी जी से अनुरोध करते रहें, पर मैं फिर नहीं गया वहां...
    बिना किसी डिग्री के कुशल स्टोर बाबू बनने की वह मेरी पहली पहचान थी , जिसे मैंने अपनी ईमानदारी, परिश्रम और काम के प्रति समर्पण से बनाई थी।
      बंधुओं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि हम किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकते हैं। मुजफ्फरपुर आकर मैंने यही सीखा । अपनों द्वारा निठल्ला कहलाने के कलंक से यहां मुक्त जो हो गया...
  (शशि)

Sunday, 3 June 2018

बेरोजगारी का दर्द देख नम हो आती हैं आंखें



         जैसे ही हम छात्र जीवन से गुजरते हुये यौवनावस्था में प्रवेश करते हैं और यदि हम उद्यमी अथवा बड़े राजनेता के लाडले नहीं हैं,तो हमारी पहली चुनौती नौकरी ही होती है। सरकारी नौकरी मिलनी लाटरी लगनी जैसी ही तो होती है। यह एक बड़ा जुआं है। हर मेधावी बच्चों को पता है कि  10 अंकों के इस खेल में खुलेगा सिर्फ एक ही अंक। वहीं हमारी जनसंख्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है।  यदि बच्चे ने मेहनत से तैयारी की और दुर्भाग्य से वह असफल रहा, नौकरी नहीं मिली तो वह टूट जाता है। प्राइवेट सेक्टर में आकर्षक नौकरियां हैं जरुर , परंतु तैयारी तो कुछ और पर चल रही थी ,उस सरकारी नौकरी न पाने वाले नौजवान की। बेरोजगारी की स्थिति में वह मजबूरन प्राइवेट सेक्टर में नौकरी कर लेता है, पर एक वेदना उसके चेहरे पर साफ झलकती है। अब देखे न प्राइमरी पाठशाला में सिर्फ हाजिरी लगा गुरु जी जितनी मोटी रकम सरकार से पाते हैं,प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाला अध्यापक तमाम योग्यता रखने के बावजूद अत्यधिक श्रम कर भी सरकारी सहायक अध्यापक का एक चौथाई वेतन तक नहीं पाता। तो फिर उसका कुंठित होना स्वाभाविक है। हम जिस पिछड़े शहर मीरजापुर में रहते हैं। वहां वहां निजी विद्यालय के शिक्षक हो या फिर किसी प्रतिष्ठान में काम करने वाले कर्मचारी अमूमन पांच हजार वेतन ही प्रतिमाह पाते हैं। ये सभी पढ़े लिखे युवक युवतियां हैं। बताए घर गृहस्थी कैसे चलेगी इनकी। किराये पर ढ़ाई हजार रुपये से नीचे कोई कमरा ही नहीं मिलता। यह सोच कर भयभीत हो जाता हूं कि यदि संग बीवी-बच्चे होते, तो साढ़े चार हजार रुपये के पगार  (अब तो उसका भी ठिकाना नहीं है) में क्या करता मैं ? इस ईमानदारी  और स्वाभिमान  की रक्षा कैसे करता ! पत्नी भी कहीं यह न कह बैठती की तेरी दो टकियां दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये...
    अभी तो मुसाफिर की तरह रात कट जाती है। इन पच्चीस वर्षों में कोई घर ठिकाना नहीं है, यहां मेरा। अपने अखबार का भी मैं एक चलता फिरता दफ्तर हूं। एक पत्रकार हूं, सो हर पर्व त्योहार पर जब भी रिपोर्टिंग करने निकलता हूं तो निम्न मध्यवर्गीय परिवार के मुखिया की व्याकुलता देख आंखें मेरी भी नम हो जाती हैं । रमजान के बाद में अभी ईद पर्व आएगा। किसी गरीब मुस्लिम इलाके में यह पूछने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूं कि भाई जान कैसी तैयारी चल रही है। सुबह मुस्लिम इलाके में एक प्रतिष्ठित दरी निर्यातक के भव्य बंगले पर पेपर देने गया, तो देखा कि सामने एक खंडहरनुमा मकान के बारजे पर एक वृद्ध बुनकर दम्पति दरी की काती सुलझा रहे थें और एक दूसरे को हाथ के पंखे से हवा भी कर रहे थें। यह सुखद दृश्य को  मैं अपलक निहारता रहा। सोचा चलो इस गरीबी में एक तो अच्छाई है कि आपसी प्रेम सम्बंध को वह और प्रगाढ़ कर देती है। मन में भावना जगी कि इस वृद्ध बुनकर दम्पति का एक फोटो ले लूं, फिर ठिठक इसलिये गया कि कहीं वे बुरा न मान लें। क्यों कि गरीबों की निगाहों में हम मीडिया कर्मी झूठ की राह पर हैं । इसीलिए कभी मजबूरी में ही मेरी जुबां से यह निकलता है कि पत्रकार हूं भाई ...मुस्लिम परिवार में आज भी महिलाएं बीड़ी बना अपने बच्चों के पेट की ज्वाला शांत करती हैं। तमाम तरह की बीमारियों ने कुपोषण के कारण इन्हें घेर रखा है। जब से जीएसटी का हल्ला बोल हुआ है, कालीन और दरी के धंधे पर अच्छे दिन की ख्वाहिश का ग्रहण लगा हुआ है। कल ही तो मिर्जापुर दरी एवं मैन्युफैक्चर एसोसिएशन की बैठक हुई थी। जिसमें बताया गया जीएसटी रिफंड की भारी समस्या से निर्यातकों की पूंजी का एक बड़ा हिस्सा सरकार के पास फंसा है। जिससे 48 फीसदी बुनकरों का पलायन हो गया है। चुनाव में तो हमारे रहनुमाओं ने सीना चौड़ा कर नौकरी देनी की बात कही थी, पर यह उल्टी बयार कैसे चल पड़ी...
  पढ़ेलिखे बेरोजगार नौजवानों की टोली जरायम की दुनिया  में इंट्री मारे जा रही हैं। बस चंद रुपयों के लिये ये बड़े बड़े अपराध कर बैठ रहे हैं। काश ! इनके पास नौकरी होती..तो पापा का नाम यूं ना बदनाम करते। बेरोजगारी का जख्म आज भी इस उम्र में भी मुझे अतीत से जुड़ी कड़ुवी स्मृतियों को ताजा किये रहती है।

(शशि)

Saturday, 2 June 2018

दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे...

 
     मदर इंडिया फिल्म का एक प्यारा सा गीत है..

 दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे
/ रंग जीवन में नया लायो रे...

       आज सुबह चार बजे जब मैं उठा और स्नान कर पौने पांच बजे अखबार का बंडल लेने मुकेरी बाजार चौराहे पर पहुंचा, तो सारे अवसाद से मुक्त था। इन पच्चीस वर्षों में खुले वातावरण में सुबह को उगते मासूम से उस लाल सूरज को कहां देख पाया था। जिससे मैं काशी के गंगा घाट पर हर सुबह आंखें मिला कर बातें किया करता था। पर अब मैं वह सब कर सकता हूं। सुबह दो घंट साइकिल चलाना कोई खराब नहीं लग रहा था, बल्कि इस दुर्बल शरीर में कुछ स्फूर्ति ही आ गयी ,ताजी हवा लगने से। अनेक स्नेही पाठकों ने कह रखा है कि शशि भाई चिन्ता ना करें, पेपर सुबह ही डाल दिया करें। ग्राहक और हॉकर वाला उनका - मेरा संबंध नहीं है और ना ही एक पत्रकार जैसा ही। सो, सुबह अखबार बांटने में बड़ा ही आनंद आ रहा था, ऐसा लगा कि चिन्ता से मुक्त हो चिन्तन  की ओर बढ़ रहा हूं। पैसा और भोजन यह दोनों मेरे लिये प्रधान कभी नहीं रहा। आज ही कोर्ट में तारीख के कारण दोपहर में प्याज- रोटी ही नसीब में था। सब्जी बनाने का समय नहीं मिला, क्यों कि बड़े भैया आशीष बुधिया जी का आग्रह था कि होटल गैलेक्सी में आयोजित कालीन और दरी निर्यातकों की मीटिंग में आना है। जलपान तो वहां भी बढ़िया था, पर मैंने आजीवन बढ़िया भोजन न करने का कठोर संकल्प ले रखा है, इस वर्ष से। सो ,एक बर्फी खा कर ठंडा पानी पी लिया और चाय पी कर जो बिस्तरे पर आ गिरा, तो नींद ऐसी लगी कि रात्रि में भी कुछ खाने की व्यवस्था नहीं कर सका..
       मेरे जीवन संघर्ष का सबसे कठिन और लम्बा दौर सचमुच यूं समाप्त हो गया है। अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहा हूं। अब देखें न आज थकान के कारण देर शाम आंखें लग गयी थीं और अचनाक रात्रि के साढ़े नौ बजे  हड़बड़ा कर उठ बैठा। ऐसा लगा कि देर तो नहीं हो गयी , पेपर लेने शास्त्रीपुल पर जान में...मोबाइल के स्क्रीन पर नजर दौड़ाई घंटी तो नहीं बजी तो,  अनिल ने बस नंबर बताने के लिये फोन तो नहीं किया था। अकसर ऐसा होता है जब बीच में निंद्रा भंग हो जाती है तो अपने याददाश्त को न जाने क्या हो जाता है। खैर याद आयी कि मैंने ही तो उसे कह दिया था कि तुम्हें भी देर शाम तक वाराणसी कैंट डिपो में बस तलाशने की अब जरूरत नहीं है। अखबार वाली जीप से रात में बंडल लगा दिया करों। सो, फिर कुछ देर के लिये सो गया। ऐसी आजादी कहां मिली थी इन पच्चीस वर्षों में.. अखबार का बंडल लेने के लिये मैंने करीब बीस वर्ष औराई चौराहे पर घंटों खड़े रह कर गुजारा है और साढ़े तीन वर्ष शास्त्रीपुल पर .. शेष डेढ़ वर्ष तक मीरजापुर से वाराणसी प्रतिदिन आता जाता था। बंडल ना छुटने पाए , यह एक ऐसा जुनून था कि तेज बारिश में भी छाता से सिर ढके औराई चौराहे पर बस को निहारता रहता था। कितनी ही सड़क दुर्घटना वहां चौराहे पर मेरी आंखों के सामने हुये जिनमें भाजपा के तीन जिले के संगठन के मंत्री की मौत को तो आज तक मैं भूला नहीं हूं। मुझे बसों के पीछे पागलों की तरह भागता देख वहां जो मित्र बंधु थें , वे गुस्से में कहां करते थें कि तुम्हारी भी समाधि एक दिन जरूर औराई चौराहे पर बनेगी। वह दिन आ भी जाता, पर मैं सौभाग्यशाली रहा और बचता रहा! सबसे अधिक परेशानी सावन माह में हुआ करती थी। जब जीटी रोड की एक तरफ की सड़क कांवड़ियों के हवाले कर दी जाती थीं। ऐसे में बसें काफी विलंब से आती थीं। बाद में मीरजापुर जब बंडल लेने लगा, तो वर्तमान सरकार में ट्रैफिक जाम की स्थिति इतनी भयावह हो गयी थी कि पेपर 9 से 10 बजे के बीच आने लगा था। रात्रि के साढ़े 11 तक बज जाते थें पाठकों के दरवाजे-दरवाजे अखबार पहुंचाते हुये। इसी विलंब के कारण मेरे पास जो अन्य लड़के पेपर बांटने वाले थें , काम छोड़ चले गये। एक युवक ने जो सदैव मुझसे पांच हजार के आस पास एडवांस भी लिये रहता था, ने पैसा वापस करने की जगह यह ताना मारा था कि आपको तो परिवार है नहीं, इसलिए रात सड़कों पर घुमते रहते हैं। लेकिन, मेरी पत्नी मेरा इंतजार कर रही है भोजन पर। मैं कितने ही पैसे इसी तरह से लड़कों को एडवांस देकर गंवाए हैं, ताकि अखबार रात्रि साढ़े 9 बजे तक विंध्यवासिनी धाम से लेकर नगर में चहुंओर दिखता रहे। इन 25 वर्षों में चाहे कुछ भी हो जाए, सारे संबंध टूट जाये, बुखार से शरीर तपता हो, मार्ग जाम के कारण तीन-चार किलोमीटर भी पैदल चलना हो, बंडल लेकर ही औराई से लौटता था। यह मेरा अपना संघर्ष था संस्थान से तनिक भी सहानुभूति नहीं मिली थी कभी ! जब बीमार था , चादर लपेट कर भी औराई चौराहे जाया करता था, तब भी किसी ने यह नहीं कहा कि अच्छा किसी से बंडल भेज रहा हूं मीरजापुर ...वहीं मैं बावला बड़े अखबारों के बुलावे पर भी उनके दफ्तर में नौकरी करने गया नहीं। जबकि अच्छा वेतन भी मिल रहा था। राजनीति और क्राइम की खबरों को लेकर मेरी सराहना होती थी। पर मैं था कि पागलों की तरह रात के अंधेरे में भी गांडीव लिये गली-गली साइकिल दौड़ाये ही जा रहा था। क्यों कि बंधुओं यह मेरे लिये एक निर्जीव पेपर नहीं है...मैंने इस पौधे को यहां बड़ा करने के लिये अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण 25 वर्ष यूं ही गंवा दिया ! मुझे इसका तनिक भी दुख नहीं है। क्यों कि जब बेघर था ,तो मेरी क्षुधा को इसी ने शांत की थी।
(शशि)