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Friday, 19 October 2018

है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर...

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मैं और मेरी तन्हाई के किस्से ताउम्र चलते रहेंगे , जब तक जिगर का यह जख्म विस्फोट कर ऊर्जा न बन जाए , प्रकाश बन अनंत में न समा जाए।
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(बातेंःकुछ अपनी, कुछ जग की)

कल  सुबह अचानक फोन आया ..अंकल!  महिला अस्पताल में पापा ने आपको बुलाया है... दीदी को पापा- मम्मी लेकर गये है...।
    पता चला कि उनकी बिटिया को प्रसव पीड़ा शुरू है। बड़ी पुत्री की पहली डिलेवरी रही , अतः माता- पिता ने सोचा कि गांव के ससुराल से बेहतर सुविधा वे यहाँ मायके में उपलब्ध करवा सकते हैं। पर सरकारी अस्पताल का हाल जगजाहिर है ही, परम स्वतंत्र हैं  यहाँ के मसीहा..।
       यदि बेहतर उपचार चाहिए तो पैसा या फिर जुगाड़ होना ही चाहिए, अन्यथा फिर...?  खैर , नगर विधायक प्रतिनिधि चंद्रांशु गोयल ने सहयोग किया। हमारे पत्रकार साथी सुमित गर्ग भी आ गये। हमें पत्रकार जान डाक्टर और नर्स ने अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन किया और भाई साहब नाना बन गये। यह  शुभ समाचार उन्होंने सबसे पहले मुझे ही फोन पर दी।

       ढ़ाई दशकों की पत्रकारिता के इस सफर में इसी सवाल का जवाब तो तलाश रहा हूँ मैं कि कलयुग के ये भगवान  , ये मसीहा, ये रहनुमा , ये माननीय, ये नौकरशाह  अपने पथ से विचलित क्यों हो गये और जनसेवक की जगह दौलत पुत्र क्यों हो जाते है.. ? सरकारी वेतन, बंगला और गाड़ी सारी सुख सुविधा इन्हें मिलती है फिर भी...।
      अभी पिछले ही महीने की तो बात है , सूबे के एक ताकतवर  मंत्री , जिनकों अपने इस जनपद में विकास की गति को बढ़ाने, जनहित के मुद्दों पर अफसरों की क्लास लेने और साथ ही सरकार की छवि निखारने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, ने इसी महिला चिकित्सालय का निरीक्षण किया। मरीज और उनके तीमारदारों से यहाँ की खामियाँ पूछी, सुविधा शुल्क लिये जाने की शिकायत आई। जिस पर भड़के मंत्री ने आरोपियों को जेल भेजने की बात तक कह दी ,अपने चादर से अधिक पांव बढ़ा कर...। सप्ताह, पखवाड़ा और माह बीत गये , क्यों कोई कार्रवाई नहींं हुई ...?
   इन राजनेताओं की घुड़की का कितना प्रभाव पड़ता है, जनता भी इसे अब समझने लगी है। नयी सड़क गड्ढ़े वाली पर फिसल कर बाइक सवार पिता ने अपने जिगर के टूकड़े को खो दिया। फिर इस भ्रष्टाचार पर किसी माननीय की आँखें नम नहीं हुई, न ही ठेकेदार कठघरे में खड़ा हुआ...?
   याद रखें , राजनेताओं से यह डगर एक दिन जब यही सवाल करता है, तो वे स्वयं जनता की अदालत के कठघरे में होते हैं...।

   बहरहाल, मुझे इस बात की खुशी हुई कि किसी के लिये कम से कम पत्रकार होने के कारण एक नेक कार्य तो कर पाया  मैं...

    नहीं तो दिन अपना खबरों की दुनिया में बितता है और रात दर्द भरी तन्हाई में.. ।  सप्ताह में सातों दिन शाम की रोटी मिलेगी ही, इसकी भी गारंटी नहीं है। मन उदास रहा, बुखार रहा अथवा आलस्य ने घेर लिया, तो पतंजलि के आटे वाले बिस्किट- पानी से ही काम चल जाता है, पर्व पर भी..। भले ही यह शरीर परिस्थितिजन्य किसी तपस्वी सा दुर्बल होता जा रहा हो, फिर भी न मुझे इसकी परवाह है और न कोई है ऐसा इर्द-गिर्द जो तनिक प्रेम जता ठीक समय दो जून की रोटी देता..! हाँ सुबह दलिया अवश्य बना-खा के समाचार संकलन को निकलता हूँ। ऐसे में कभी मेरे पड़ोस में किराएदार रहें ये इस दम्पति से जान पहचान हो गयी थी।
     अन्यथा हम बंजारों का इस दुनियाँ के मेले में कैसा रिश्ता- नाता ..?  जब भी इस रात की तन्हाई में किसी अपने को और अपनी मंजिल को तलाशता हूं, तो इस नगमे के सिवा और कुछ न हाथ लगता है..
एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी
मैं मुड़ा तो साथ-साथ राह मुड़ गयी
हवा के परों पर मेरा आशियाना
मुसाफिर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना..

     नियति का यह कठोर दंड मेरे लिये जेल के उस तन्हाई वाले बैरक की तरह है ,जहाँ कुख्यात कैदियों को रखा जाता है...।
    इस खूबसूरत दुनिया के पिंजरे में तन्हा कैद अनंत को निहार रहा हूँ , फड़फड़ाते हुये ... ऐसे पर्व पर मुक्त होने की चाहत लिये...।
  देखें ना ऐसी कैदियों के भी अपने हैं, जो माह- पखवाड़े,  रविवार को अन्यथा पर्व पर तो निश्चित ही जेल पर आ उनसे मुलाकात कर जाया करते हैं.. दाना - पानी कुछ दे जाया करते हैं.. उनके भी सपने अभी शेष हैं... । यहाँ अपने इस बंद कमरे में भला कौन आएगा , क्यों आएगा और  कैसे आ आएगा...।
  अतः अब तो पर्वों का भी पता, सड़कों पर बढ़ी चहल-पहल से ही चलता है मुझे.. जब सभी अपने परिजनों संग खुशियाँ मना रहे होंगे ... तब यह तन्हाई मुझे एहसास कराती है कि कोई त्योहार है आज, इसीलिये सभी व्यस्त हैं ...  फिर मुझे कौन पूछेगा और क्यों ..?
   खैर मैं और मेरी तन्हाई के किस्से ताउम्र चलते रहेंगे , जब तक जिगर का यह जख्म विस्फोट कर ऊर्जा न बन जाए, प्रकाश बन अनंत में न समा जाए...।
    इस तन्हाई को मैं नकारात्मक शक्ति मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हूँ, यह मेरी चिन्तन शक्ति है..।
     अपनी वेदना को, अपने रूदन को, अपने एकांत को चरम तक पहुँचाने का प्रयास हमें करना होगा,  वैराग्य से नीचे इस जीवन के उलझे मार्ग में हम जैसों के लिये कोई सुख नहीं है, जो अन्य तृष्णा है भी, वह छलावा है, अवरोध है...। यह विजयादशमी पर्व फिर से मुझे इस सत्य को अवगत करा गया.. ।
 यदि हम जैसे लोग गृहस्थ जनों जैसे आनंद की कल्पना करेंगे तो, बार - बार फिसल कर हाथ- पांव चोटिल करते रहेंगे, फिर कौन मरहम पट्टी  करेगा इस मासूम से मन का...
  दिल अपना और दर्द पराया , यदि जब कभी ऐसी स्थिति बने भी तो उसे जनकल्याण को समर्पित कर दें , यही वैराग्य है, सन्यास है..
 मेरा अपना मानना है कि जब तक आत्मज्ञान विकसित नहीं होता  सकारात्मकता की बातें इंद्रजाल जैसी ही लगती हैं, हम जैसों को , भले ही ज्ञान के बाजार में सकारात्मकता सुपर माडल हो...
  साथियों .. !   बुद्ध, भृतहरि,तुलसी और विवेकानंद  जैसे महापुरुषों ने भी  अपनी वेदना को चरम पर पहुँचाने की कोशिश की है, तभी उस ज्ञान प्रकाश को वे प्राप्त कर सके हैं।
   किसी भी तरह की लज्जा की अनुभूति नहीं करों बंधु मेरे, क्यों कि यही रूदन हमें वैराग्य एवं मोक्ष प्रदान करेगा..
  नवजात शिशु ने यदि माँ के गर्भ के बाहर आने पर रूदन नहीं किया तो , क्या उसका जीवन सम्भव है...?
 वहीं, उसके रूदन करते ही इस धरती पर उसके आगमन के स्वागत में खड़े वे अजनबी लोग, जिनसे प्रथम बार उसका संबंध तय हुआ है, देखो न वे आपस में किस तरह से शुभकामनाएं देने लगते हैं।
   संत कबीर ने कितनी अद्भुत बात कही है...

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये |
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये ||

  हमारे तपोभूमि विंध्य क्षेत्र में ऐसे भी साधक नवरात्र पर्व पर आते रहे हैं, जो किसी एकांत स्थल पर किसी आसन में बैठ माँ भगवती के ध्यान में अनंत को निहारते रहते थें और उनके नेत्रों से निरंतर अश्रु टपकते रहते थें। सच तो यह है कि रूदन से नवीन स्फूर्ति, उत्साह और शांति की अनुभूति होती है।  स्मृति एवं वियोग में ही नहीं इष्ट की चाहत में भी हम सिसकते हैं...
 यह सौभाग्य हर किसी को प्राप्त नहीं है। इसमें दिखावट और बनावट जो नहीं है।
  हाँ , यह सत्य है कि जब लौकिक प्रेम से हम वंचित रह जाते हैं, तो अलौकिक सुख की ओर आकृष्ट होते हैं और जबतक इसकी अनुभूति नहीं होती, तबतक रंगीन दुनिया दर्द देती ही रहती है ।  मैं तो ऐसे गीतों के सहारे ऐसे विशेष पर्व पर तन्हाई दूर करने का प्रयत्न करता रहा हूँ..
 
जिन्दगी को बहुत प्यार हमने दिया
मौत से भी मोहब्बत निभायेंगे हम
रोते रोते ज़माने में आये मगर
हँसते हँसते ज़माने से जायेंगे हम
जायेंगे पर किधर है किसे ये खबर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
ज़िन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र...

Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर .. )आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन
     

Wednesday, 17 October 2018

जब तक मैंने समझा जीवन क्या है ,जीवन बीत गया...

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रावण का पुतला दहन हम नहीं भूले हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, अनाचार और कुविचार से ग्रसित हो हम स्वयं आदर्श पुरुष का मुखौटा लगाये उसी रावण के सामने खड़े हैं , जिसने सीता को अशोक वाटिका में रखा था, अपने महल में नहीं..
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मैं कहाँ रहूँ मैं कहाँ बसूँ ना ये मुझसे ख़ुश ना वो मुझसे ख़ुश
 मैं ज़मीं की पीठ का बोझ हूँ मैं फ़लक़ के दिल का ग़ुबार हूँ
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ ...

     वेदनाएँ कुछ ऐसी भी होती हैं, जो इंसान को अंदर ही अंदर जला कर राख कर देती हैं। ऐसे में यदि एकाकीपन से भी मित्रता हो जाए तो उस मनुष्य का जीवन मोमबत्ती की आंसुओं की तरह ढुलक ढुलक कर एक दिन समाप्त हो जाता है। आनंद के जो अवसर प्रत्यक्ष है ,उसे छोड़ ऐसे मनुष्य कल्पनाओं एवं स्मृतियों में डूबे रहते हैं और बदले में कुछ न मिल पाता है।
     अजीब सी उलझन है मेरी भी , यही बात हर पर्व- त्योहार पर मैं अपने मासूम दिल को समझाता हूँ कि देखों मित्र जब तन्हाई का साथ मिला है,तो वैराग्य की ओर बस बढ़ते जाओं।  यह मेला - पर्व तुम्हारे लिये नहीं है। तुम्हारा मेला तो कब का पीछे छूट चुका है । बचपन की वो बातें याद कर इस भुलभुलैये में ना रहों कि तुम भी अब सामान्य परिवार  की तरह अपनों संग यह आनंद सुख प्राप्त कर सकोगे। देखों तो बाजार में कितनी चहल पहल है। युवा हो या प्रौढ़ अथवा वृद्ध ही क्यों न हो, ये दम्पति किस तरह से मधुर वार्तालाप करते हुये इस उत्सव को महसूस कर रहे हैं। मेले में बच्चों संग इस तरह से सुशोभित हैं, मानों  शंकर- पार्वती का परिवार हो।
   परंतु तुम मेले में जाकर क्या करोगे..? यहाँ तुम्हारे संग कोई न होगा अपना , स्मृतियों के अतिरिक्त तुम्हारा... व्यर्थ न  संताप करों।
    फिर भी वह मानने को भला कब तैयार होता है। दिल के उन जख्मों का भला कौन इलाज है ,जो अपनों ने दिये हैं। धीरे-धीरे कर के दिन, महीने और वर्ष गुजर रहे हैं। वर्ष 1994 में जब इस जनपद में आया था, तो इन आँखों में एक चमक थी और आज एक बंद कमरे में पड़ा अतीत से पीछा छुड़ाने के लिये हर सम्भव प्रयत्न कर रहा हूँ , पर मेरे सिर पर रखी यादों की यह पोटली इतनी भारी हो चुकी है कि न स्वयं इसे उतार पाने में समर्थ हूँ, न ही कोई मनमीत है जो इस बोझ में हिस्सेदार बन जाए...
    इसे साथ लेकर ही मुझे तब तक बस चलते जाना है, जब तक सांसें न थम जाएँ।  फिर भी पथिक यह उम्मीद खुद से लगाये हुये है कि वह संत सा बन जाए..  !  उपहास भी कर सकते हैं आप मुझपर कि कैसा बावला इंसान है यह भी ... !!
   पर मित्र उलझनें भी तो राह दिखलाती हैं। वह हमें बुद्ध, तुलसी और भृतहरि भी बनाती हैं । सो, क्यों न अपनी ही इन उदास अंधेरी रातों में कुछ ऐसा ढूंढने की कोशिश हो, जो औरों के लिये नूर बन जाए और हम कोहिनूर ...
     यदि जिगर पर यह चोट न होती , तो आज इतनी चिन्तन शक्ति कहाँ से पाता मैं । कुछ अपनी, तो कुछ औरों की सोचने का भला वक्त रहता क्या मेरे पास ऐसे खुशियों भरे पर्व पर ..?  गृहस्थी की गाड़ी  कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी होती। दशहरा, दीवाली और होली पर नये वस्त्र पहने तो वर्षों क्या दशकों बीत गये  एवं पकवान से भी रिश्ता ऐसे खास त्योहारों पर टूट चुका है।
  कोलकाता का वह बचपन, बनारस का छात्र जीवन और मीरजापुर का जीवन संघर्ष सब कब का पीछे छूट चुका है। इस दुनिया के मेले में भटकता रह मन कभी यूँ ही बहकी- बहकी बातें करता है..

एक ख़्वाब सा देखा था हमने
जब आँख खुली वो टूट गया
 ये प्यार अगर सपना बनकर
तड़पाये कभी तो मत रोना
 हम छोड़ चले हैं महफ़िल को
याद आये कभी तो मत रोना...

  मन के इस अंधकार को मिटाने के लिये अपनी चिन्तन शक्ति को दीपक बनाने की कोशिश में बार-बार उसकी अग्नि से चित्त की शांति को झुलसाने की आदत सी पड़ गयी है मेरी । फिर भी एक लाभ यह तो है ही कि आवारागर्दी से जो बचा रहता हूँ , दिखावे से बचा रहता हूँ और झूठ से भी.. भद्रजन कहलाने के लिये किसी मुखौटे की मुझे जरुरत नहीं.. यह समाज जानता है कि मुझे उससे अब और कुछ नहीं चाहिए.. जो दर्द मिला है , वह मेरी लेखनी में समा गया है.. वहीं मेरी पहचान है, वही मेरा ज्ञान है, भगवान है..?
  उसी से तो यह विचार मंथन जारी है कि हम सिर्फ अपने लिये क्यों जीते हैं ..? सुबह से रात तक बस अपना ही अपना लगाये रहते हैं..
  देखें न  इन बड़े बड़े दुर्गा पंडालों में कितनी तेज आवाज में देवी जी के गीत बज रहे हैं। मेरे पड़ोस में भद्रजनों के डांडिया रास  के लिये अत्यधिक तेज आवाज में देर रात तक डीजे भी बज रहा है। आयोजकों ने तनिक भी नहीं सोचा है कि अस्वस्थ वृद्ध जनों को इससे परेशानी होगी। मेरे दोस्त यह जो अपनी मनमानी कर रहे हो न , एक दिन तुम्हें भी कोई अपना नहींं  समझेगा.. इसमें तनिक भी संदेह न समझना..

  और इन पंडालों में आकर्षक विद्युत उपकरणों की सजावट को देख कर एक और विचार मेरे मन में आता रहा  है हर वर्ष कि काश ! यह चकाचौंध भरी रोशनी जो सीमित क्षेत्र में है, उसका विस्तार हो जाता तो कितना अच्छा होता...?  जिस खुशी में हर किसी के लिए कोई जगह होता, तो कितना अच्छा होता । हम बंजारे तो कुछ ऐसा ही चाहेंगे न कि इस रंगीन दुनिया में हमारे लिये भी कोई जगह होता , तो कितना अच्छा होता। अपना यह मीरजापुर छोटा शहर है , तब भी एक - एक दुर्गा पंडाल पर कई लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। महानगरों की बात पूछे ही मत। मैं यहाँ बंगाल की नहीं हिन्दी भाषी क्षेत्रों की बात कर  रहा हूँ। तीन - चार दिन के मेले में करोड़ों रुपये  दुर्गा पूजा पर खर्च हो जाते हैं..
  क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि इन्हीं पैसों से ये आयोजक गरीब बच्चों के चहरे पर थोड़ी सी मुस्कान लाते...?  अनाथालयों में जाकर कुछ नये कपड़े और मिठाइयाँ बांट आते.. किसी के परिवार में कोई गंभीर रोग से पीड़ित है, तो उसका उपचार करवा देतें.. नहीं तो दो- चार निर्धन कन्याओं के हाथ ही पीली करवा देते...किसी निर्धन नौजवान की प्रतिभा को कुंठित होने से रोक भी सकते थें न..
    मैं भी न यह कैसा मूर्खतापूर्ण सवाल कर उठा हूँ। ऐसा भी भला सम्भव है क्या कि जगत जननी का पूजन सामान्य तरीके से कर उसी धन का उपयोग जनकल्याण में किया जाए..?
   सैकड़ों वर्ष पुरानी हमारी रामलीला विलाप कर रही है। कितनी तैयारी होती थी रामलीला को लेकर । पात्रों का चयन , उन्हें सम्वाद रटाना, सभी पात्रों के लिये वस्त्र आदि की व्यवस्था, किस तरह से भीड़ लगती थी राम लीला स्थल पर । दादी का हाथ थामें हम भाई -बहन भी देखने जाया करते थें। तरह - तरह के मुखौटे खरीद लाते थें । तीर- धनुष, तलवार और गदा लिये ललकार लगाते थें। जो अपनी संस्कृति थी , वह धूल में मिल रही । हाँ , रावण का पुतला दहन हम नहीं भूले हैं। लेकिन, भ्रष्टाचार, अनाचार और कुविचार से ग्रसित आदर्श पुरुष  का मुखौटा लगाये हम स्वयं  उसी रावण के सामने खड़े हैं। जिसने सीता को अशोक वाटिका में रखा था, अपने महल में नहीं, यह भी सत्य है कि रावण कभी अकेले सीता से मुलाकात तक को नहीं गया था। जब हममें रामत्व है ही नहीं, तो किस अधिकार से महापंडित उस रावण का पुतला हम जलाते हैं..?  असली रावण तो हमारे अंदर ही है , घर - घर रावण है, फिर काहे का पुतला जला रहे हो..??
   पहले राम तो बना जाए .. अयोध्या के राज महल से निकलने के बाद राम ने दलित, शोषित, पीड़ित वर्ग के लिये कितने ही कार्य किये । उन जनकल्याण के कार्यों ने उन्हें वह सामर्थ्य दिया कि त्रिलोक विजेता  रावण का वध कर सकें । आज हम जनहित के एक भी कार्य किये बिना ही दशहरा मना रहे हैं। जरा विचार करें आप भी इसपर..?

  खैर, अपना तो यह जीवन सफर यूँ  ही बीत गया। हर चाहत मुझे और तन्हा कर गयी...

खुशियों के हर फूल से मैंने
ग़म का हार पिरोया
प्यार तमन्ना थी जीवन की
प्यार को पा के खोया
अपनों से खुद तोड़के नाता
अपनेपन को रोया
जब तक मैंने समझा अपना क्या है
सपना टूट गया
जब तक मैंने समझा जीवन क्या है
जीवन बीत गया...

Sunday, 14 October 2018

जब किसी से कोई गिला रखना ...

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 यहाँ मैं  गृहस्थ, विरक्त और संत  मानव जीवन की इन तीनों ही स्थितियों को स्वयं की अपनी अनुभूतियों के आधार पर परिभाषित करने की एक मासूम सी कोशिश में जुटा हूँ।
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मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता
बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता
सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता...

     दर्द कुछ अपना तो कुछ औरों का दिल में लिये इस चिंतन में कल रात खोया सा रहा कि संत की परिभाषा क्या है..?  मैंने किसी भी धर्मग्रंथ को बढ़िया से कभी पढ़ा तो नहीं है ।  हाँ , बड़े- बड़े कथा वाचकों का प्रवचन खूब सुना था , जब निठल्लों की तरह बनारस के कम्पनी गार्डेन संग मित्रता थी मेरी। विकल मन की शांति की चाहत में  पैदल ही काशी के उन स्थलों पर पहुँच जाया करता था, जहाँ विख्यात कथा वाचकों का प्रवचन होता था। परंतु वहाँ भी वही चकाचौंध करने वाला वैभव का प्रदर्शन दिखा। सम्पन्न लोगों की पूछ थी, खैर फिर भी मुरारी बापू के संगीतमय रामकथा से हृदय की अकुलाहट कुछ कम हुयी थी। कथा स्थल पर स्त्रियाँ नृत्य करती दिखीं थीं पहली बार वहाँ... इसी आनंद को वे अपने गृहस्थ जीवन में भी ला पायी या दिखावा था, ठीक से नहीं समझ पाया अब तक मैं ...

     हाँ , अपने लिये इतना अवश्य कह सकता हूँ , जब से ब्लॉग पर आया ,आत्मचिंतन से  दो प्रमुख लोभ  धन और भोजन से मुक्त हो गया हूँ । किसी के अनिष्ट की चाहत  बिल्कुल भी नहीं रह गयी है। वैसे, मेरी पत्रकारिता इससे प्रभावित हो रही हैं ,  चाह कर भी पहले की तरह खुल कर आलोचना किसी व्यक्ति विशेष अथवा राजनैतिक दल की नहीं कर पाता अपनी लेखनी से.. पर अब तो  पथिक के पग बढ़ चुके हैं , नयी मंजिल की ओर...

    यहाँ मैं  गृहस्थ, विरक्त और संत  मानव जीवन की इन तीनों ही स्थितियों को स्वयं की अपनी अनुभूतियों के आधार पर परिभाषित करने की एक मासूम सी कोशिश में जुटा हूँ।
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      एक गृहस्थ जो दिन भर परिश्रम करता है, तो सायं घर पहुँचने पर पत्नी मुस्कुरा कर उसका स्वागत करती है। भोजन की थाली में सजे व्यंजनों की सुगंध से उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है। रात्रि में कोमल मखमली शय्या पर देवी रति स्वरुपा अर्धांगिनी का जब सानिध्य प्राप्त होता है, तो वह सृष्टि की सम्पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। मन का भटकाव ठहर जाता है एवं यह मधुर मिलन उसे उर्जा प्रदान करता है साथ ही सृष्टि चक्र आगे बढ़ता है। शास्त्रों में त्रिदेव भी अपनी अर्धांगिनी संग ही विराजमान हैं। इस सुंदर घरौंदे की चाहत भला फिर किसी को क्यों न हो। अब इसे स्वच्छ रखें या गंदगी फैलाये, यह तो गृहस्वामी को तय करना है।  वर्षों पहले की बात याद आ रही है। मैं अपने एक मित्र के घर गया था। वे , उनकी अर्धांगिनी एवं पुत्र तीनों ही एक ही थाली में भोजन कर रहे थें। मित्र महोदय स्वयं अपने हाथों से बारी- बारी से माँ- बेटे के मुहँ में निवाला डालते और स्वयं भी ग्रहण कर रहे थें। मुझे देख कर कुछ सकुचा से गये , तो मैंने एक ठहाका लगाया  और कहा अरे जनाब ! इसमें क्या लज्जा ... चाट के ठेले पर फुलकी वाला इसी तरह - तरह तो बारी- बारी से गुपचुप खिलाता है न भाई..
  इससे अधिक देरी तक भोजन को चबाने के लिये समय मिलेगा, तो स्वास्थ्य भी ठनाठन रहेगा और मोहब्बत भी मेरे  दोस्त..?
   एक नगमा पेश कर रहा हूँ , स्त्रियों के सिर्फ सौंदर्य के पीछे दौड़ लगाने वाले पुरुषों के लिये...

चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था
हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था
ना रस्में हैं ना कसमें हैं ना शिकवे हैं ना वादे हैं
 इक सूरत भोली भाली है दो नैना सीधे सादे हैं
ऐसा ही रूप खयालों में था जैसा मैंने सोचा था...

  वैसे, बचपन में बाबा की थाली में भोजन के लिये हम भी दौड़ पड़ते थें।
  ...प्यारे को यह आम (गुठली वाला भाग) नहीं मिलेगा, जहाँ  बोले नहीं कि लड़ाई शुरु।
    कुछ ऐसे भी पुरुष है कि उनके घर में प्रवेश करते ही मरघट सा सन्नाटा पसर जाता है। यदि आप हिटलर बनेंगे तो  निश्चित यह प्रेम खो देगें.. फिर तो आपके इशारे पर नाचने वाली एक कठपुतली सामने होगी। जो आपकी पुकार पर दौड़ दौड़ कर चाय- पानी आप तक पहुँचाती रहती है।  तब भी अर्धांगिनी आपकों प्रेम करती है, परंतु सत्य तो यही है कि उसके हृदय के किसी कोने में अंधकार समाया रहता है..
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      अनुभूतियों को साक्ष्य मान कर यदि वैराग्य की बात करूं , तो यह एक आहत हृदय मानव की मनोवृत्ति है । जब कभी हमारा मन किसी कारण विकल होता है ,  किसी अप्रत्याशित दुखद घटना से , अपनों को खोने से हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व छिन्न भिन्न हो जाता है , स्नेह/ प्रेम का वह  बंधन जो जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि सी लगती है , कच्चे धागे सा टूट जाता है, यादों की ज़ंजीर यातना देने लगती है , निश्छल मन की भावनाओं को ठेस पहुँचता हैं, सब कुछ उपहास सा लगता है या फिर नश्वरता का बोध होता है। ऐसे में मोह का आवरण हटता सा प्रतीत होता है, फिर तो खूबसूरत संसार  मरघट सा लगता है। माँ की मृत्यु पर कोलकाता के श्मशान घाट पर मेरे बालमन को पहली बार इस वेदना की अनुभूति हुई थी। तब से अब तक दर्द के हर पैमाने को पार कर चुका हूँ। मन कोई कठपुतली तो है नहीं कि जैसे चाहूँ उसे नचा सकूँ ।  व्याकुलता जब चरम हो, अपनों से मिलन की चाह जब पूरी न हो एवं इस उपहास भरे जीवन को त्यागने की इच्छा प्रबल हो, मन को धीरज देने के लिये वैरागी पुरुषों का निश्चित ही स्मरण करना चाहिए।
    निर्वाण षटकम्‌ जो आदि शंकराचार्य की विशिष्ट स्तोत्र-रचना है। इसमें सारांशतः सम्पूर्ण अद्वैत दर्शन अभिव्यक्त है।

मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम्
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर् न तेजो न वायु:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्..

       मैं मन नहीं हूँ, न बुद्धि ही, न अहंकार हूँ, न अन्तःप्रेरित वृत्ति;मैं श्रवण, जिह्वा, नयन या नासिका सम पंच इन्द्रिय कुछ नहीं हूँ। पंच तत्वों सम नहीं हूँ (न हूँ आकाश, न पृथ्वी, न अग्नि-वायु हूँ)।वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।
    हमारे गुरु जी ने दो दशक पहले स्वयं टेपरिकार्डर और निर्वाण- षटकम् का यह कैसेट तब दिया था, जब मैं असाध्य मलेरिया ज्वर से पीड़ित था एवं जीवन के प्रति तनिक भी आकर्षक शेष न था।
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    और संत  स्वभाव क्या है..? यह मानव जीवन की सबसे श्रेष्ठ मनोस्थिति है। तब मन, वाणी एवं कर्म  तीनों एक समान व्यवहार करता है। स्वयं को कुछ मिले न मिले , परंतु अपना सब कुछ जनकल्याण के लिये दांव पर लगा देता है। किसी का अनिष्ट न हो, भले ही चतुर लोग पीड़ा दे जाएँ , फिर भी संत कभी गिला नहीं करता है। इस अर्थ युग में इस छल युद्ध में अनेकों बार मैंने अपनों से धोखा खाया है। परंतु इस अवसाद से मुक्त रहने के लिये मैं बस इतना स्मरण रखता है कि इस मीरजापुर में जब आया था,  तो दो जोड़ा कपड़े ही लाया था। अतः जो यहाँ पाया है, उसे यहीं छोड़ जाना है।
  .. बुद्ध और अंगुलीमाल का प्रसंग याद है मुझे। हर किसी के प्रति स्नेह , बदले में कुछ भी नहीं चाहता... काश ! मैं भी कुछ ऐसा कर  जाऊँ। मानव जीवन सफल कर जाऊँ। हर किसे से गिले शिकवे अब यही दूर कर जाऊँ... निदा फ़ाज़ली की इस गजल से अपना जीवन रौशन कर जाऊँ...

जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना
यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इस में रोने की जगह रखना ...


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (जब किसी से गिला रखना ) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

Thursday, 11 October 2018

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है..

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       पुरुष समाज में से कितनों ने अपनी अर्धांगिनी में देवी शक्ति को ढ़ूंढने का प्रयास किया अथवा उसे हृदय से बराबरी का सम्मान दिया..? शिव ने अर्धनारीश्वर होना इसलिये तो स्वीकार किया था न ।  पुरुष का पराक्रम और नारी का हृदय यह किसी कम्प्यूटर के हार्डवेयर और साफ्टवेयर की तरह ही तो है। एक दूसरे से है, इनका अस्तित्व।
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हे आयो आयो नवरात्री त्यौहार ओ आंबे मैय्या
तेरी जय जयकार हो आंबे मैय्या तेरी जय जयकार...

    बचपन में नवरात्र पर्व पर जैसे ही यह भक्ति गीत बजता था, पूछे मत मैं खुशी से किस तरह से चहक उठता था। टाउनहाल, वाराणसी में दुर्गापूजा पर खूब सजावट और पूरे नौ दिनों तक देश भर से सुविख्यात कथा वाचकों का आगमन होता था यहाँ। हमारे घर के पड़ोस में एक लाउडस्पीकर पूजास्थल का हर वर्ष लगता था। सुबह देवी गीत और शाम को विभिन्न धर्मग्रंथों पर कथा सम्वाद। मेरी अवस्था 10 वर्ष रही होगी तब , क्यों कि 12 वर्ष पूरा होने से पहले कोलकाता ही चला गया था। लेकिन ,जैसे ही दुर्गा प्रतिमा को विसर्जन के लिये गाड़ी पर रखा जाता था, मेरी विकलता बढ़ जाती थी। मेरा बाल मन समझ नहीं पाता था कि क्यों गंगा जी ले जा रहे हैं ये दुर्गा  मैय्या को , अभी तक तो सब पूजा पाठ कर रहे थें, अब पराया सा यह व्यवहार क्यों..
    वियोग से मुझे बचपन से ही भय लगता था। माँ - बाबा जब भी वापस कोलकाता जाने को ट्रेन पर बैठते थें, माँ को बिल्कुल भी मैं नहींं छोड़ता था। जबर्दस्ती मुझे उनसे अलग किया जाता था। लेकिन, कोलकाता का दूर्गा पूजा चकाचौंध से भरा रहा ।  बनारस में एक गरीब शिक्षक का पुत्र था, तो कोलकाता में माँ का दुलारा  मुनिया.. और बाबा चाँद - तारा तक तोड़ लाने को तत्पर रहते थें। फिर आज से करीब ढ़ाई दशक पूर्व वह दिन आया जब किसी नाते -रिश्तेदार के यहाँ शरण न लेने की ठान सान्ध्य दैनिक गांडीव समाचार पत्र हाथ में ले एक अनजान शहर मीरजापुर आ गया। पेट की असहनीय भूख ने मुझे राजा मुन्ना से ऐसा विचित्र श्रमिक बना दिया था कि एक पांव बनारस में था, तो दूसरा मीरजापुर में...
   याद आ रहा कि मैं जब मीरजापुर आ रहा था , तभी किसी अपने ने टोका था कि देखों वहाँ जा कर दो कार्य निश्चित करना एक विंध्याचल देवी का दर्शन और दूसरा सदैव मखाना खाते रहना, क्योंं कि तुमने कभी श्रम इस तरह का किया नहीं है। पर मेरे पास विंध्याचल मंदिर जाने का समय कहाँ था, बनारस पहुँचने में ही रात्रि के 11-12 बज जाते थें । हाँ , सत्य तो यह भी है कि माँ के जाने के बाद , फिर किसी उपासना स्थल पर मुझे शांति की अनुभूति नहीं होती है। रही
 मखाना खाने की बात , तो वह  मुझे पसंद नहीं था। वहाँ ,कोलकाता में तो मेरे लिये काजू बर्फी और मेवा खिलाने के लिये माँ मुझे कितना मनाती-फुसलाती  थी।
        इन्हीं स्मृतियों में आज नवरात्र के प्रथम दिन सुबह सड़कों पर देवी भक्तों कों देख खोया सा था कि घंटाघर स्थित एक हलवाई की दुकान पर कचौड़ी की सब्जी छौंकने की सुगंध ने अचानक मुझे जागृत कर दिया। मैंने भी देर न करते हुये अपने मन से पूछ ही लिया कि मित्र क्या चलेगा..गरमा गरम हैं। शाम का कटोरा भर दलिया ही तो खाये हो। अब तो रोटी भी ना ले रहे हो। मैंने सोचा कि मन टटोल लूं उसका भी.. कहीं यह न कहे कि भूखे मार रहा है । परंतु प्रति उत्तर जान संतोष हुआ, जब उसने कह दिया कि नहीं भाई चल कर दलिया और मूंग की खिचड़ी बनाई जाए...

     खुशहाल परिवार का एक सूत्र है कि अपनों की पसंद और नापसंद का ध्यान रखा जाए। विशेषकर मनमीत को लेकर ...

जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कगेंगे
चाहेंगे, निभाएंगे, सराहेंगे आप ही को
आँखों में दम है जब तक, देखेंगे आप ही को
अपनी ज़ुबान से आपके जज़बात कहेंगे ...

     यह मेरा पसंदीदा गीत है और मेरी सोच भी, यदि पुरुष को मुखिया होने का दर्प रहेगा, तो उसकी बगिया में वह सुंगधित पुष्प कभी नहींं खिलेगा, जिससे गृहस्थ जीवन का आनंद लाभ वह उठा सके। ऐसे में परिवार का हर सदस्य सहमा सा रहेगा , फिर एक दिन सब कुछ बिखर जाता है...  नहीं मिलता वह मधु कलश , जिसकी तलाश हर बागवान को होती है। जिसका मिसाल मैं स्वयं हूँ, परिवार के सभी सदस्यों के हिस्से में विष ही आता है, ऐसी परिस्थितियों में.. किसी को कम तो किसी को ज्यादा... दोषारोपण करने में ही फिर गुजर जाता है, यह अमूल्य जीवन..
       इसी वार्तालाप के क्रम में मेरे भावुक मन ने प्रश्न कर ही दिया ... मित्र  !  इस तपोभूमि विंध्य क्षेत्र के समीप रहकर तूने क्या पाया - क्या खोया...?
   पारिवारिक संबंधों और स्वास्थ्य सभी तो खो दिया है तुमने .. भोजन की थाली की जगह एक कटोरा भर रह गया है। जिसमें सुबह और शाम दलिया एवं मूंग की खिंचड़ी खाते हो। फिर भी जीवन के इस कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु की तरह आठवें द्वार पर आ फंसे हो। जितनी भी नकारात्मक शक्तियाँ हैं, चक्रव्यूह रच घेरे हुये है तुम्हें.. कहीं विजय के पूर्व ही मृत्यु का चयन तो न कर लोगे या अर्जुन की तरह गांडीव की टंकार कर ऐसी नकारात्मक चिन्तन का प्रतिकार करोगे..?
    इस तपोस्थली विंध्य क्षेत्र से तुम क्या लेकर प्रस्थान करोंगे। एक विचित्र सी व्याकुलता इस शक्ति साधना पर्व पर मेरे मन में बनी हुई है। कहाँ- कहाँ से लाखों लोग जिनमें संत से लेकर भिक्षुक  तक हैं, यहाँ आये हुये हैं। लेकिन, मेरा एक प्रश्न है महामाया के दरबार में आये इस पुरुष समाज से कि इनमें से कितनों ने अपनी अर्धांगिनी में देवी शक्ति को ढ़ूंढने का प्रयास किया अथवा उसे हृदय से बराबरी का सम्मान दिया..? शिव ने अर्धनारीश्वर होना इसलिये तो स्वीकार किया।  पुरुष का पराक्रम और नारी का हृदय यह किसी कम्प्यूटर के हार्डवेयर और साफ्टवेयर की तरह ही तो है। एक दूसरे से है, इनका अस्तित्व।
        एक सवाल और जो भद्रजन यहाँ आये हैं , वे  कन्या भ्रूण हत्या रोकने को लेकर कितने सजग हैं ..?
    वैसे  मैं तो अपनी माँ से ही सब-कुछ मांगता था, हूँ और रहूँगा। उनका सम्पूर्ण वात्सल्य सिर्फ मेरे लिये ही था , आज भी उनके साथ गुजरे हुये दिन ही मुझे धैर्य प्रदान करता है। अन्यथा प्रेम से वंचित यह पथिक जीवन के इस लम्बे सफर में गिरता, फिसलता, उलझता और सम्हलता ही रह गया है।
    जल से निकली उस मीन की तरह हूँ मैं , जो किसी के स्नेह वर्षा से श्वास भर ले रही है, परंतु  सत्य तो यही है कि न तो अब उसके लिये जल है ,न ही जीवन...
    फिर भी धड़कन तो है न .. ? हृदय का यह स्पंदन बेचैन कर देता है कभी- कभी...

   कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
   के जैसे तू मुझे चाहेगी उम्रभर यूही
   उठेगी मेरी तरफ प्यार की नजर यूं ही
   मैं जानता हूँ के तू गैर है मगर यूं ही...


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है ) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 

Sunday, 7 October 2018

माँ , महालया और मेरा बाल मन...

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   आप भी चिन्तन करें कि स्त्री के विविध रुपों में कौन श्रेष्ठ है.? मुझे तो माँ का वात्सल्य से भरा वह आंचल आज भी याद है।
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जागो दुर्गा, जागो दशप्रहरनधारिनी,
 अभयाशक्ति बलप्रदायिनी,
  तुमि जागो...

        माँ - माँ..  मुझे भी महालया सुनना है, कल भोर में समय से उठा दीजिएगा...
  अगले दिन ठीक पौने चार बजे सुबह माँ की पुकार सुनाई पड़ती थी कि मुनिया उठ ... जरा मुँह धोकर ठाकुर जी की अलमारी से अगरबत्ती ले आ तो और बैठ मेरे पास आकर।

     12 वर्ष का तो था ही मैं , फटाफट सारा काम निपटा भागे आता था। बीमारी के कारण माँ जीवन के आखिरी दो वर्ष अपने पांव पर खड़े होने में असमर्थ थीं। अतः उन्होंने मुझे इस योग्य बना दिया कि आज जब एकाकी जीवन तीन दशकों से बीता रहा हूँ, तो सभी कार्य स्वयं ही कर लेता हूँ।

       याद आया बाबा तो दिन भर के थकान के कारण निढ़ाल बिस्तरे पर पड़े रहते थें और हम माँ - बेटे अगरबत्ती सुलगा ट्राजिस्टर से आ रही  वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज को सुनते रहते थें।  जो मुझे समझ में तब बिल्कुल ही नहीं आता था। माँ बताती थी कि महिषासुर के अत्याचार से भयभीत देवगण माँ दुर्गा का आह्वान कर रहे हैं।
     लगभग 90 मिटन तक मैं बिना किसी हरकत के उस सम्मोहक आवाज को सुनते रहता था।
   रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि...
 बस इतना ही मुझे याद हो पाया था ।
      पितृपक्ष विसर्जन अमावस्या के दिन सुबह चार बजे देश और दुनिया के तमाम बंगाली उठ जाते हैं. श्राद्ध पक्ष के खत्म होने और दुर्गापूजा के आने के बीच इस दिन अल सुबह हर पारंपरिक परिवार में एक रस्म निभाई जाती है. रेडियो ऑन करके वीरेंद्र कृष्ण भद्र के धार्मिक प्ले महिषासुर मर्दनी को न सुन लिया जाए. दुर्गापूजा की शुरुआत नहीं मानी जा सकती है।  कोलकाता में रहने के कारण हम हिन्दी भाषी भी श्रद्धापूर्वक सुनते थें, बिना उसका अर्थ जाने ही..
     1931 में पहली बार सुनाए गए इस प्ले का बंगाल के सबसे बड़े पर्व का हिस्सा बन जाना  एक अनूठा मिसाल है. 1966 में रेडियो पर पहली बार महालया (पितृविसर्जन अमावस्या का बंगाल में प्रचलित नाम) के दिन वीरेंद्र भद्र के प्ले महिषासुर मर्दनी को ब्रॉडकास्ट किया गया था.  देखते ही देखते 90 मिनट की ये कंपोज़ीशन मां दुर्गा के स्वागत का प्रतीक बन गई। 1905 में पैदा हुए वीरेंद्र भद्र प्ले राइटर, ऐक्टर और डायरेक्टर थें।  संगीतकार पंकज मल्लिक के साथ मिलकर बनाई गई उनकी कंपोजीशन महिषासुर मर्दनी ने उन्हें साहित्य और कला जगत के साथ-साथ धार्मिक रस्मो-रिवाज का हिस्सा बना दिया। दुर्गा सप्तशती, लोक संगीत और कूछ दूसरे मंत्रों को मिलाकर बनाई गई इस रचना में विरेन के पढ़ने का अंदाज रोंगटे खड़े कर देता है।

       सबसे प्रचलित लोककथा के अनुसार महालया में देवी को अपनें बच्चों के साथ कैलाश से अपनें पैतृक घर (पृथ्वी) तक की यात्रा शुरू करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। यह निमंत्रण मंत्रों के जप के माध्यम से और जागो तुमी जागो और बाजलो तोमर एलोर बेनू जैसे भक्ति गीतों को गाते हुए दिया जाता है।

     ब्लॉग पर जब अपनी यादों की पोटली को टटोले जा रहा हूँ, तो महालया सुनने से अधिक उतावलापन मुझे और किसी धार्मिक कार्य में रहा हो बचपन में , स्मरण नहींं हो रहा है।
  कोलकाता का कालीघाट स्थित माँ काली का मंदिर एवं जगह जगह बने कई मंजिला ऊँचा पंडाल ,  दुर्गा जी की भव्य कलात्मक प्रतिमाएँ , बाजारों में खूबसूरत बंगाली महिलाओं की भारी खरीदारी और छोटे नाना जी की बड़ाबाजार स्थित प्रसिद्ध मिठाई की दुकान गुप्ता ब्रदर्स की वह रौनक ,  मिठाई के खाली डिब्बों में रुपये भर- भर कर उसे दुकान से कारखाने तक पहुँचाने का मुझे सौंपा गया कार्य , भला कहाँ भूल पाया आज तक। जब माँ का पैर ठीक था , छोटे नाना जी कार भेज देते थे अपनी , बाबा , माँ और हम एक रात जमकर दुर्गा पूजा घुमते थे।

  माँ और वह बचपन एक बार फिर से मिल जाता । एक तड़प सी उठ रही है मन में..

कोई लौटा दे मेरे, बीते हुए दिन
बीते हुए दिन वो हाय, प्यारे पल छिन ..

      रात्रि के डेढ़ बज चुके हैं और ये सुखद स्मृतियाँ भी  न... क्या बताऊँ, यह निद्रा की देवी के आगोश में जाने ही नहीं दे रही हैं मुझे। बिल्कुल शयन की इच्छा नहीं है, भले ही ठीक सुबह चार बजे उठना है। परंतु यह मन अपने बस में कहाँ है। वह तो कोलकाता  के बड़ा बाजार  जा पहुँचा है।  चौथी मंजिल पर स्थित वह अपना कमरा, वह बारजा , बरामदा , नल से आने वाला वह मिट्टी युक्त गंगा पानी , सोफे पर तकिये के सहारे बैठी माँ , नीचे कारखाने से सुनाई पड़ती बाबा की तेज आवाज... प्यारे, लूडो होगा क्या.. नया प्लास्टिक वाला लूडो ले कर मेरा लगभग दौड़ते हुये सीढ़ियों से उतरना , माँ की हिदायत कि सम्हल कर जा मुनिया .. कहींं पांव फिसल न जाएँ ।
     फिर खुद में ही उनका यूँ बड़बड़ाना कि ये चौधरी( बाबा)  भी न लड़के को अकेले नीचे बुला लेते हैं। यह नहीं कि कारखाने से किसी आदमी को भेज देतें, हाथ पकड़ नीचे ले जाता , समझते ही नहीं कि कितनी खतरनाक सीढ़ी है। वह हर एक दृश्य मस्तिष्क पटल पर छा सा गया है।
   उधर बाबा थें कि नीचे मुझे जयनदत्तो के कपड़े की दुकान पर लेकर चले जाते थें। दुर्गा पूजा पर हर बंगाली नये परिधान में होते हैं। महिलाएँ  तो साल भर की खरीददारी कर लिया करती थीं तब..
  अब बस भी करो यार .. चलों बिस्तरे पर, मन को समझाये ही जा रहा हूँ। परंतु उलटे वह मुझसे सवाल कर रहा है कि क्यों इतना बड़ा हो गया तू कि तेरे अपने और जो तेरे सपने थें, सभी दूर चले गये। देख तो वह हावड़ा ब्रिज तूझे ही पुकार रहा है। उस शाम तू यही पर तो खड़ा था न। किस तरह से मचलता था , घोष दादू का हाथ थामे पैदल ही उस पार हावड़ा स्टेशन तक जाने के लिये।
     खैर , अब बिस्तरे पर जा रहा हूँ, मन को यह तसल्ली देते हुये सोने का प्रयत्न करता हूँ। बेवजह परेशान करती हैं ये यादें.. कभी हर्ष तो कभी दर्द , इन गीतों की तरह ही..

सपने सुहाने लड़कपन के मेरे नैनों में डोले बहार बनके..
        या फिर इस..
जो चला गया उसे भूल जा वो न सुन सकेगा तेरी सदा ..

   वैसे, तो ढ़ाई दशक से यह जो मेरा कर्मक्षेत्र है, जहाँ
 मैं कर्म पुरुष बना,  स्वालम्बी बना, पत्रकार बना, पहचान बनी, धन, उत्तम भोजन और परनिंदा से मुक्त हुआ। जहाँ अभिव्यक्ति का सामर्थ्य भी प्राप्त हुआ , यह तपोभूमि विंध्यक्षेत्र भी भगवती विंध्यवासिनी का महा शक्ति पीठ है। महा त्रिकोण क्षेत्र में आदिशक्ति यहाँ तीन स्वरूपों में विराजमान हैं। महाकाली ,महासरस्वती एवं महा लक्ष्मी , जिनका सम्बंध हम मनुष्यों के तन, मन और धन से है।
 पूरे नवरात्र यहाँ बड़ा मेला लगता है। कोई पच्चीस लाख दर्शनार्थी आते हैं यहाँ...

  मेरा चिन्तन है कि इन्हीं जगतजननी की प्रतिविम्ब है नारी । यदि इनसे कुछ प्राप्त करना है तो बालक बन जाओ ...त्रिदेवों को ही लें, जो दूषित उद्देश्य से गये थें ऋषि पत्नी सती अनसूया के आश्रम । वहाँ उनका उद्देश्य पूर्ण  हुआ अवश्य ,किन्तु बालक बन कर । यूँ भी कह लें कि अनसूया की सकरात्मक उर्जा के समक्ष त्रिदेवों का नकारात्मक उद्देश्य बौना पड़ गया ..? माँ के अन्नपूर्णा स्वरुप को लें अब , जिनके समक्ष औघड़ दानी बाबा विश्वनाथ स्वयं याचक के रुप में उपस्थित हैं। माँ का प्रेम देखें की जो भी है उनका , वह सब कुछ महादेव को समर्पित कर दिया। पत्नी की सम्पत्ति को अधिकार से नहीं, वरन् उसमें प्रेम जागृत कर प्राप्त करें हम। हाँ , और यदि नारी क्रोधित हो, तब भी बालक बन जाए । भगवान शिव ने यही तो किया था एक बार , मासूम बालक बन रुदन करने लगे, उधर अनियंत्रित महाकाली ने जैसे ही शिव के उस बाल स्वरूप को देखा, उनमें वात्सल्य प्रेम उमड़ पड़ा, रौद्र रुप शांत हो गया। एक प्रसंग पंचवटी का यह भी है कि आसुरी शक्तियों का विनाश करने से पूर्व भगवान राम ने स्वयं अपने हाथों से पुष्प आभूषण बना माता सीता का श्रृंगार और प्रतीक पूजन किया था, शक्ति अर्जन के लिये...
 आप भी चिन्तन करें कि स्त्री के विविध रुपों में कौन श्रेष्ठ है.? मुझे तो माँ का वात्सल्य से भरा वह आंचल आज भी याद है।
 मेरी दुनिया है माँ  तेरे आंचल में
शीतल चाय जो दुख के जंगल में
ओ मैने आँसू भी दिये
पर तू रोई ना
ओ मेरी निंदिया के लिये
बरसों सोयी ना..

Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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https://youtu.be/EgojT8gjwOs

Friday, 5 October 2018

इस्तीफा जो नज़ीर न बना ..


( बातें,  कुछ अपनी- कुछ जग की )
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   सोच रहा हूँ कि जिस नज़ीर की बात उस समय शीर्ष पर स्थित राजनेता कर रहे थें। उनके उस चिन्तन का क्या हश्र हुआ ,इस आधुनिक भारत में ..?  क्या आज शीर्ष पर बैठें राजनेता, अधिकारी से लेकर परिवार का मुखिया तक किसी भी मामले में नैतिक आधार पर अपनी जिम्मेदारी तय करने को तैयार है ...?
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    आज तबीयत काफी भारी है । यूँ समझ लें  कि बड़ी कठिनाई से अपने अखबार से जुड़े कार्य कर पाया हूँ। फिर भी शाम ढलते ही व्याकुल मन विश्राम की जगह चिन्तन में खो गया है, अपने- पराये को लेकर...
  है न यह एक गीत -

आते जाते खूब्सूरत आवारा सड़कों पे
 कभी कभी इत्तेफ़ाक़ से
कितने अंजान लोग मिल जाते हैं
 उन में से कुछ लोग भूल जाते हैं
कुछ याद रह जाते हैं...

      यह जीवन मेरे लिये यादों का घरौंदा है।  गृहस्थ जीवन के सुख-दुख और किसी अपने के होने की अनुभूति हमारे जैसे यतीम भला क्या जाने.. हम किसी को अधिकार के साथ  पुकार भला कैसे सकते हैं..
  हाँ , इस तन्हा लम्बे सफर में  कुछ अंजान लोग मुझे भी मिले हैं,पर वे अपने तो नहीं होते न ..?
    यतीमों की व्याकुलता का मोल गैरों की भावनात्मक सहानुभूति के चंद शब्द से भला कितना हो सकता है । उसे तो किसी ठोस आश्रय की तलाश रहती है।  हाँ , कभी -कभी भ्रम में ऐसे निराश्रित लोग सराय को अपना आशियाना समझ लेते हैं। फिर जब कभी उन्हें यह एहसास कराया जाता है कि आप हमारे हैं कौन ..?  बस यहीं उनके जीवन में वह दर्दनाक मोड़ आ जाता है कि उस दुर्घटना के बाद वह अपाहिज से हो जाते हैं । टूट जाते हैं ,बिखर जाते हैं ,फिर भी जब उससे कहा जाय कि सामान्य जीवन जीते क्यों नहीं आप ..
     भले ही स्नेह में ही किसी ने कहा हो,  पता नहीं क्यों भावुक मन यह कैसा सवाल कर उठता है कि देखों न स्वयं तो मक्खन टोस्ट खाये वे और हमसे कहते हैं कि सूखी रोटी पर रहो , यह नज़ीर तो नहीं है न  ? ऐसे प्रिय वचन भी तब कष्टकारी क्यों हो जाते हैं  .. ?? बड़ी विचित्र स्थिति होती है, ऐसे सम्वेदनशील एकाकी इंसान की ।
    मेरा मानना है कि अपने- पराये में दिग्भ्रमित ऐसे पथिक को चाहिए कि राह में मिलते अंजान लोगों का हँस कर अभिवादन करते हुये आगे बढ़ता ही जाए। अन्य कोई विकल्प नहीं शेष है उसके पास, अन्यथा बेवजह ठोकर खाते रहेगा, बार- बार उसे लगेगा कि वह बेगाना है । फिर क्या होगा ...  दो बातें  ...
  पहला ऐसा इंसान हँसता खिलखिलाता रहता है, परंतु एक जोकर ( विदूषक) की तरह । दूसरा ऐसे में उसका वैराग्य भाव जागृत हो उसे  राह दिखला सकता है। हाँ , सार्थक पक्ष यह रहता है कि उसकी सृजनात्मक क्षमता में अप्रत्याशित वृद्धि होती है, ऐसी अनुभूति है मेरी ... यदि आपकों कुछ भी कहना है, लिखना है, तो पहले स्वयं नज़ीर बनना होगा , अपने लिये मार्ग तलाशना होगा, तब जाकर आपकी वाणी  एवं लेखनी में उर्जा प्रजवलित होगी। धैर्य रख के यह चिन्तन करना होगा कि निर्रथक हँसी-ठहाके में दिन गुजारने वाले अपनी क्या कोई नज़ीर छोड़  सकते हैं।  जबकि एकांत में चिन्तन करने वाले अकसर समाज के लिये चिराग बन जाते हैं। जो हर परिस्थितियों में रह कर विरक्त है, वही नर है। जिस तरह से मेरे इर्द गिर्द चाहे जितने भी पकवान हों, पर मेरी दृष्टि सिर्फ चार सूखी रोटियों पर ही होती है..
    कुछ का मानना है कि ब्लॉग पर ऐसा कुछ न लिखा करो कि तुम बावले कहलाओ, परंतु मेरा अपना मत है कि खुलकर लिखें, खुल कर रोये और अपना भेद छिपाने वाले ऐसे लोगों की सोच पर हँसे...
  अपना मन हल्का करने के लिये ही न हम धर्मस्थलों पर जाते हैं। एकांत में ईश्वर के समक्ष अपनी गुनाहों को कबूल करते हैं। लेकिन फिर भी चेहरे पर नकाब लगा समाज में महान बनने का दिखावा करते हैं.. याद रखें यह कोई नज़ीर नहीं है । यह छल हमें मुक्त न होने देगा इस जीवन से ...


  इस प्रार्थना के साथ ..

तुम्हीं हो माता, पिता तुम्ही हो,
तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो
तुम्ही हो साथी तुम्ही सहारे,
कोई न अपना सिवा तुम्हारे ..

 आत्मबल को विकसित करते हुये ,  हम यतीमों को अपना सामाजिक दायित्व निभाते रहना चाहिए।
  वैसे तो, ब्लॉग को मैं परनिन्दा से दूर ही रखना चाहता हूँ । फिर भी एक पत्रकार हूँ , तो मुझे ऐसे महान राष्ट्र नायक एवं सादगी पसंद महापुरुषों को श्रद्धा सुमन अपनी लेखनी के माध्यम से अर्पित करनी ही चाहिये, ऐसी प्रबल इच्छा हुई  2 अक्टूबर को मन में ..
   
      राष्ट्र के सादगी पसंद दो कर्मयोगियों की जयंती चहुंओर मनायी गयी । राष्टपिता महात्मा गांधी जिन्होंने गुलामी की जंजीरों से देश को मुक्त कराया और भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री, जिन्होंने जय जवान जय किसान का उद्घोष किया। भारत को खाद्यान्न के मामले में स्वालंबी बनाया।
    बापू पर तो हर कोई लिख रहा है, मैं तो शास्त्री जी के उस त्यागपत्र पर चिंतन कर रहा हूँ, जो उन्होंने नेहरू जी की सरकार में रेलमंत्री रहते अपने पद से तब दिया था, जब रेल दुर्घटना हुई थी। वर्ष 1956 में महबूबनगर रेल हादसे में 112 लोगों की मौत हुई थी। इस पर शास्त्री जी ने इस्तीफा दे दिया। इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने स्वीकार नहीं किया। तीन महीने बाद ही अरियालूर रेल दुर्घटना में 114 लोग मारे गए। उन्होंने फिर इस्तीफा दे दिया। तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उस त्यागपत्र को स्वीकारते हुए संसद में कहा कि वे यह इस्तीफा इसलिए स्वीकार कर रहे हैं कि यह एक नज़ीर बने, इसलिए नहीं कि हादसे के लिए किसी भी रूप में शास्त्री जिम्मेदार हैं।
    अब सोच रहा हूँ कि जिस नज़ीर की बात उस समय शीर्ष पर स्थित राजनेता कर रहे थें। उनके उस चिन्ता एवं चिन्तन का क्या हश्र हुआ ,इस आधुनिक भारत में ..? शीर्ष पर बैठें राजनेता, अधिकारी से लेकर परिवार का मुखिया तक किसी भी मामले में नैतिक आधार पर अपनी जिम्मेदारी तय करने को तैयार है ? जनप्रतिनिधि, अधिकारी, पत्रकार, वह हर प्रबुद्ध वर्ग , जो इस समाज से जुड़ा है.. यह नैतिक त्यागपत्र सबके लिये है। आपकों बताऊँ , मैं जिस मीरजापुर जनपद से हूँ , यहाँ एक सियासी जुमला मशहूर है , " नयी सड़क गड्ढ़े वाली  "।
    कितने ही करोड़ की लागत से सड़कें बन रही हैं और छह माह भी नहीं गुजर पाता कि धूल उड़ाती इन नवनिर्मित सड़कों का नामकरण नयी सड़क गड्ढे वाली हो जाता है।  कहाँ तो हमारे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गड्ढ़ा मुक्त सड़क की बात कही थी, किन्तु पिछली अखलेश सरकार से भी बुरा हाल है, इन सभी सड़कों का..
   किसी भी मंत्री, स्थानीय जनप्रतिनिधि  या फिर अधिकारी ने यह प्रयास नहीं किया कि स्थलीय निरीक्षण करे वह। इनमें इतना आत्मबल नहीं है , जो ऐसा करें वे। अतः नैतिक जिम्मेदारी और नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र ऐसे शब्द राजनीति के भेंट चढ़ गये हैं, इस अर्थ युग में। बचा कुछ भी नहीं.. ?
     एक पैमाना होना चाहिए शीर्ष पर बैठे राजनेताओं का ,अधिकारियों का ,समाज और घर के मुखिया का जनप्रतिनिधियों का कि यदि किसी भी कार्य में घोर अनियमितता की शिकायत सामने आयी, तो उन्हें अपने अंतरात्मा की आवाज सुनकर उस घोटाले, भ्रष्टाचार और लापरवाही के लिये स्वयं की भी जिम्मेदारी तय करें, न कि नीचे वाली कुर्सी पर बैठे किसी शख्स की बलि चढ़ाना चाहता है । इन दिनों जिले में क्या हो रहा है, नवनिर्मित सारी  सड़कें टूटती जा रही हैं। नयी सड़क गड्ढ़े वाली का यह शोर अखिलेश की सरकार से भी कहीं ज्यादा योगी आदित्यनाथ के शासन काल में हैं। लेकिन, जिले के किसी भी जनप्रतिनिधि अथवा अधिकारी ने इसकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं ली। कार्यदायी संस्था को काली सूची में डालने की कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की। अपने दायित्व ( पद/ कुर्सी ) का भी त्याग नहीं किया, तो फिर कैसा नज़ीर। क्यों याद रखे लोग आपकों ..
      एक बात और जब भी इस चकाचौंध भरी दुनिया में मैं व्याकुलता का अनुभव करता हूँ  ,स्वयं को शास्त्री जी के दर्पण के समक्ष प्रस्तुत करता हूँ, क्यों की यह एक नज़ीर है।
    उनकी सादगी को नमन करता हूँ , एक उर्जा मुझमें समाहित होती दिखती है। वह है सादगी की, ईमानदारी की, कर्मठता की ,नैतिक कर्तव्य की और उस नैतिक त्यागपत्र की भी।
   बापू के प्रिय इस भजन के साथ आज की अपनी बात को विराम देता हूँ...

 वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे,
पर दु:खे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे ॥

      बापू की लंगोटी और शास्त्री जी की सादगी निश्चित ही मेरे लिये एक नज़ीर है।


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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Wednesday, 3 October 2018

जागते रहेंगे और कितनी रात हम ...

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सच कहूँ, तो मेरा अब तक का अपना चिन्तन जो रहा है, वह यह है कि पुरुष व्यर्थ में श्रेष्ठ होने के दर्प में जी रहा है ,क्यों कि वह नारी ही जो अपने प्रेम, समर्पण और सानिध्य से उसे सम्पूर्णता देती है। यहाँ उसका सहज कर्म योग है।
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मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा
मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने
मुझे देखकर कह रहे हैं सभी
मोहब्बत का हासिल है दीवानगी
प्यार की राह में, फूल भी थे मगर
मैंने कांटे चुने...

     इस खूबसूरत नगमें से अपने नादान दिल को बहलाने की नाकाम कोशिश में बंद कमरे के बाहर की रोशनी का एहसास कर रहा था। अवसाद का घटाटोप कभी- कभी कर्मपथ में रुकावट बन जाता है। यह जीवन है क्या सांप- सीढ़ी का ही तो एक खेल है न, इंसान कभी  धरती से आसमां की बढ़ता- मचलता दिखता है, तो कभी कटी पंतग बन कर रह जाता है।
      कुछ जीवित्पुत्रिका पर्व सोच रहा था, अपने बचपन की मधुर स्मृतियों को , हम दोनों भाइयों का आज के दिन रंग था। किसी की डांट नहींं पड़ती थी। मेरी निगाहें तो पूजा की थाली में पड़े चना और मटर पर जमी रहती थीं। जो अगले दिन तक अंकुरित हो जाता था। मेरे लिये इन्हें तेल और जीरे के तड़का से तल दिया जाता था। महिलाओं के पर्व और रसोईघर से मुझे न जाने क्यों कोलकाता में जो लगाव हुआ, वह आज नासूर बन इस कोमल हृदय को बार-बार संताप देते रहता है। बाजार से लेकर गंगा घाटों पर कैसा उत्सव का माहौल रहा आज ,पर मैं किसी के जिगर का टुकड़ा कहाँ रहा , ना कोई मेरा ही रहा ..
 कब से अपने विकल मन को यही तो समझा रहा हूं कि किस्मत का खेल निराला है दोस्त, शांत हो जा न प्यारे ..

     परिवार में बिखराव क्या आया कि इन सभी छोटी- छोटी खुशियों पर अकाल्पनिक ग्रहण लग गया। फिर तो अपने तीन दशक के एकाकी जीवन बस यादों के सहारे ही गुजरा है।
   तभी रेणु दी का एक भावविह्वल करने वाला संदेश स्मरण हो आया।  जिसके कुछ अंश इस तरह से हैं--

   "  बस समभाव  से सृजन करते जाइये | आपके लेखन के मर्म को पहचानने वाले बहुत लोग हैं |  और आप कुछ बदल नहीं सकते तो ये भावुकता क्यों ?  कितने स्वर्णिम  साल गुजर गये किसी अवलम्बन की आस में -- आगे भी गुजर जायेंगे | आपके साथ स्नेह का नया कारवां  जुड़ा है उसके स्वागत में  अपने आपको हल्का करिये इस पीड़ा से |  खुश रहिये | "

   उनका स्नेह भरा मार्गदर्शन मुझे ब्लॉग लेखन से जुड़ने के बाद से ही प्राप्त होता रहा है। जब मेरे पोस्ट पर कमेंट बाक्स रिक्त रहता था, तो यह रेणु दी ही थी कि प्रतिक्रिया व्यक्त करती ही रहीं और गत शनिवार के पोस्ट पर भी खाली बाक्स ने जब मुझे उदास किया ,तो अचानक उनका ही कमेंट आ गया। स्नेह का बंधन कभी- कभी रक्त संबंध से भी मजबूत होता है। ऐसी अनुभूति मुझे यहाँ ब्लॉग पर हो रही है ,अपने लिये ..

   खैर, पिछले पोस्ट को लेकर कुछ मित्रों ने कहा कि शशि जी बिल्कुल नकारात्मक है। एक जिनका मुझ पर अत्यंत स्नेह है, उन्होंने नाराजगी जताते हुये कहा कि ऐसा भी कोई लिखता है..? गुस्से में ब्लॉग पर प्रतिक्रिया भी नहीं दी उन्होंने...

     बंधुओं एक बात मैं स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि लिख तो मैं किसी भी विषय पर सकता हूँ , फिर भी यहाँ स्वः अनुभूत विषयों को प्राथमिकता दे रहा हूँ।  जीवन के उस चौराहे पर मैं  एकाकी खड़ा हूँ, जहाँ पथिक को स्वयं ही सही दिशा का चयन करना है। न जीवनसाथी है, न मनमीत है , न कोई सहारा, जो हाथ थाम ले और भटकने से रोक ले ...
    मुझ जैसे कितने ही एकाकी इंसान होगें, जिनकी खामोश पुकार दुनिया के इस शोर भरे मेले में वर्षों पूर्व गुम हो चुकी है। सो, अब यह कहना-

तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
 होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
मुक़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा इन्तज़ार है,
 तुम पुकार लो ...

   स्वयं का उपहास है। फिर क्या किया जाए,जब मस्तानी शाम डरावनी सी लगने लगे और रात काली नागिन सी फुफकार रही हो ,तो है कोई रास्ता अवलंबन का..?

  तो मित्रों, तीन रास्ते हैं मेरे जैसे संवेदनशील एकाकी लोगों के समक्ष , जिन्हें बाहरी दुनिया की हंसी- ठहाका उबाऊ लगता है। क्लब की पार्टी और बैठकों में जाना पसन्द नहीं हो।   पहला अध्ययन, दूसरा चिन्तन और तीसरा लेखन। मेरे पास चौथा जबर्दस्त विकल्प है, वह यह कि दोनों कानों में इयरफोन लगा तेज आवाज में फिल्मी नगमें सुनने लगता हूँ। ऐसा करने से मस्तिष्क पटल से स्मृतियों पर पर्दा डालना आसान हो जाता है,  हृदय की वेदना भी स्वतः कम हो जाती है। अन्यथा तो..
    रात ये क़रार की बेक़रार है
   तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो...

सच कहूँ, तो मेरा अब तक का अपना चिन्तन जो रहा है, वह यह है कि पुरुष व्यर्थ में श्रेष्ठ होने के दर्प में जी रहा है ,क्यों कि वह नारी ही जो अपने प्रेम, समर्पण और सानिध्य से उसे सम्पूर्णता देती है। यहाँ उसका सहज कर्म योग है। इस पथ पर चल कर जीवन की राह में भ्रमित होने की गुंजाइश कम होती है। नहीं तो बिन स्त्री के करते रहें न हठयोग, जीवन इसे साधने में ही निकल जाएगा, यदि कहीं पांव डगमगाया तो  सारी साधना, सारा स्वाभिमान, सारा सम्मान क्षण भर में धूल में मिल जाएगा। इससे भी कहीं अधिक एकाकीपन का बड़ा रोग है..।
नर - नारी  ये प्रकृति के सृजन सूत्र हैं। यहाँ सबकुछ स्वाभाविक है, यह तृष्णा नहीं है। तृष्णा तो हमारे मन का सृजन है। प्रकृति की उत्पत्ति के मूल में संयोग ही है। इनमें से किसी भी तत्व के वियोग होते ही विखंडित हो जाएगी , हमारी यह खूबसूरत पृथ्वी ।
  फिर भी पुरुष की शंकालु प्रवृत्ति यह नहीं देख पाता कि स्नेह, प्रेम, सेवा , त्याग एवं उत्सर्ग की प्रतिमूर्ति है नारी। वह नर नारी के मध्य वासना के अतिरिक्त और भला सोचेगा भी क्या ? नारी में माता , बहन और मित्र देखने की जो उसकी आदत ही नहीं है। पुरुष की इसी प्रवृत्ति के कारण नारी कितनी भी ऊँचाई पर पहुँच जाए, फिर भी उसके वास्तविक स्वरूप को दबा उसे  भोग की सामग्री बना दिया जाता है। ऐसा मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में रह कर देखा है कि कितने ही महिला अधिकारियों के  संबंधों को यह पुरुष अपनी वासना की चाशनी में डूबो कर परोसता है। ऐसे पुरुष उसके प्यार भरे आंचल का छांव कभी प्राप्त नहीं कर पाते हैं। जिसका आश्रय पाने से पुरुष की रिक्तता, निरुद्देश्यता, व्याकुलता समाप्त हो जाती है, अर्धांगिनी के न होने के बावजूद भी ऐसी अनुभूति मुझे न जाने क्यों होती रहती है। जैसे किसी अदृश्य डोर से बधा हुआ है, मेरा यह मासूम हृदय....

 खैर , यह मन भी कितना पागल है, कल्पनाओं के भुलभुलैये से शीघ्र निकलने का नाम ही नहीं लेता है जो। अब मैं आज की शाम अपनी बात इस प्यारे से गीत से समाप्त कर रहा हूँ...

तेरे लिये पलकों की झालर बनूं
कलियों सा गजरे में बांधे फिरूं
 धूप लगे जहां तुझे छाया बनूं
 आजा साजना...

Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (जागते रहेंगे और कितनी रात हम..) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन


Sunday, 30 September 2018

गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा , हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा

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आज रविवार का दिन मेरे आत्ममंथन का होता है। बंद कमरे में, इस तन्हाई में उजाला तलाश रहा हूँ। सोच रहा हूँ कि यह मन भी कैसा है , जख्मी हो हो कर भी गैरों से स्नेह करते रहा है।
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मेरे टूटे हुए दिल से कोई तो आज ये पूछे
 के तेरा हाल क्या है
किस्मत तेरी रीत निराली, ओ छलिये को छलने वाली
 फूल खिला तो टूटी डाली
 जिसे उलफ़त समझ बैठा, मेरी नज़रों का धोखा था
 किसी की क्या खता है ...
 
     अभी कल ही मैंने अपने इस नादान मन से एक बार फिर से यह प्रश्न पूछा था कि जब तुम्हारी मंजिल उस वैराग्य की खोज है, जहाँ न किसी रिश्ते नाते की डोर है । अकेला आया था और अकेला जाना है,तो फिर किस प्रपंच में जा फंसा है। क्यों सामाजिक सारोकारों को उठा रहा है। अपने दर्द को यूँ खोल रहा है। जो राज वर्षों तक इस नाजुक मन को जख्मी करता रहा है, उन संस्मरणों को क्यों न दफन कर दे रहा है। दुनिया का तमाशा यूँ ही चलता रहेगा प्यारे ! तू क्यों बावला बना डोल रहा है रे मन !!
     अब कौन यहाँ है  तेरा , फिर क्यों है किसी का इंतजार। आने वाले को सलाम बोल ओर जाने वाले को खुदा हाफिज , क्यों कि हे मन..

गुज़रा हुआ ज़माना, आता नहीं दुबारा
हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा
खुशियाँ थीं चार पल की आँसू हैं उम्र भर के
तन्हाइयों में अक़्सर रोएंगे याद कर के
 दो वक़्त जो कि हमने इक साथ है गुज़ारा
हाफ़िज़ ...

     ढ़ाई दशकों तक राजनीति पर लिखा, अपराध जगत पर लिखा। कितनों को पसंद आया  तो कितनों ने बुरा भी माना । पर वह तुम्हारा पेशा था, रोजी रोटी का जरिया था। आज भी मित्रगण चाहते हैं कि तू ब्लॉग पर देश दुनिया के हालात पर लिख, पत्रकारिता के अपने अनुभवों से इस ब्लॉग की उपयोगिता को सार्थक कर।  आखिर में मैं अपने विषय से क्यों भटक गया यहाँ आकर । क्यों इस समाज में एक नन्हा सा दीपक बनने को रे मन तू यूँ मचल रहा है, जब कि यहाँ नहीं कहीं तेरा ठिकाना है।
   आज रविवार का दिन सदैव मेरे आत्ममंथन का होता है। सो, मुकेश के गाये इस गीत का रहस्य सुलझा रहा हूँ-

दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई
काहेको दुनिया बनाई, तूने काहेको दुनिया बनाई
 काहे बनाए तूने माटी के पुतले,
धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
 जिसमें लगाया जवानी का मेला ...

   बंद कमरे में, इस तन्हाई में उजाला तलाश रहा हूँ। सोच रहा हूँ कि यह मन भी कैसा है , जख्मी हो हो कर भी गैरों से स्नेह करते रहा है। दो बातें  किसी ने क्या कर ली, उसे अपना मीत सा समझ लेता है। वर्षों गुजर गये मनमीत को लेकर क्यों कल्पनाओं में खोया- खोया सा रहा। भृतहरि सा वैराग्य क्यों तेरे मन में तब ना आया और अब तूँ , उन्हीं विषयों को उठा रहा है, एक टूटे हुये दर्पण को चूर-चूर कर रहा है। यह ठीक है कि तुझे किताबी धर्म नहींं सिर्फ कर्म में आस्था है। फिर मन की किताब के पन्ने क्यूँ बार बार पलट रहा है।  वैराग्य धारण कर क्यों नहीं उस निर्वाण को प्राप्त कर रहा है। जो कब से तेरे द्वार पर दस्तक दे रहा है।  तूने क्यों इसे भी छोड़ रखा है, खुद को सामाजिक भावनाओं से जोड़ रखा है। यादों की जंजीर पहने डोल रहा है,जरा सोच फिर कैसे मंजिल तेरे करीब आएगी। बचपन से ही तू एक चिन्तक रहा। दर्जा पांच में जब था, तभी मृत्यु भय से साक्षात्कार हुआ था। फिर दो वर्ष बाद ही अपनी प्यारी माँ की अर्थी लेकर निकला था। कोलकाता का वह महा श्मशान आज भी तुम्हें याद है।  सोच जरा कोलकाता में पड़ोस वाले कमरे का बारजा तुझे याद है न, माँ की मौत पर तब तक वहाँ खड़ा अनंत को निहारता रहा, जब तक तुझे जबरन बनारस ना भेजा गया। जहाँ से तेरी बर्बादी की कहानी शुरू क्या हुई , नगरी- नगरी भटकता ही रहा है। अब तो तू इस बंद कमरे का द्वार खोल वैराग्य की किरणों से अपनी कोमल मन की उन सारी भावनाओं को झुलसा दें। न कहीं तू आता है, ना जाता है, न ही कहीं तू कुछ खाता है। जब जैनियों सा तेरा भोजन है,परिग्रह का लोभ न है, फिर क्यों नहीं ब्लॉग पर अंतिम हस्ताक्षर कर उस महानिर्वाण का सुख पाता है। इस अनंत की ओर तो जरा देख जहाँ तेरे अपने हैं  , एक मनमीत को छोड़ दे , तो वहाँ तेरे सपने हैं। वहाँ न तुझे सिर दर्द की दवा चाहिए, ना ही नींद की गोली, इस अंधकार भरे  कमरे में न हँसी न ठिठोली है, पर वहाँ तो हर वक्त उजाला है। रे हंसा प्यारे ! यह दुनिया का मेला है। मेले में तू बिल्कुल अकेला है। हाँ , यह तमन्ना जरूर है, तेरी कि तू किसी के काम आ सके। पर व्हाट्सएप्प का स्टेटस बदले से क्या तेरा अकेलापन दूर हो जाएगा। फिर से सोच रे पागल मन कहीं तूने कुछ झूठ तो न लिख डाला । इस पवित्र पुस्तक को बदरंग करने से पहले चल चला चल मेरे यार । अब तेरा इस जहां पर कुछ भी कार्य तो शेष नहीं बचा । जब तक रहा सिर उठा के जिया है, पहचान और सम्मान भी पा लिया है । पटरियों पर गुजरी रात या महल में, पकवान मिले भोजन में या लोटा भर जल ही पिया है । हाथ तेरे कभी न फैले थें किसी के सामने, परंतु किसी अपने की चाहत में तू गिरता गया, झुकता गया, टूटता गया, लूटता गया। फिर इस नगमे से कब और कैसे तेरा  रिश्ता हो गया -

घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं
कभी इस पग में कभी उस पग में
बँधता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह ...
कभी टूट गया कभी तोड़ा गया
सौ बार मुझे फिर जोड़ा गया
यूँ ही टूट-टूट के, फिर जुट-जुट के
 बजता ही रहा हूँ मैं...

      बस तेरी यही कहानी है, न वंश ना ही जिंदगानी है। पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाब, यह ख्वाहिश तेरे मन में भी लायी गयी थी बचपन में , पर तू तो " यतीम " बना दर दर भटक रहा है। रंगमंच पर अपने उस आदर्श पुरुष " जोकर " सा अभिनय कर रहा है।  आज शरीर साथ दे रहा है, तो दलिया बना ले रहा है, कल को रोटी जब न बना पाया तो क्या करेगा प्यारे । तूने अपना बैग हमेशा तैयार रखा है ,जैसे एक लम्बे सफर पर निकला है । तो फिर से ये मन क्यों भटक रहा है , जब न कोई साथी न बसेरा है। देख तो जरा वहाँ कितना उजाला है, जहाँ तुझे जाना है। आज तूने इस शाम के अंधेरे में , इस एकांत में  , जहाँ न कोई सखा न सहेली यह जो चिन्तन किया है मेरे दोस्त  , फिर पीछे पलट कर न देख। दर्द जो तेरे हृदय में समाया है , स्वयं को अनंत को समर्पित कर उसे बांट ले। जहाँ  न किसी के संदेश की प्रतीक्षा हो, न गुजरे दिनों की याद हो..
     रे मन ! तू उस कठोरता (वैराग्य) को प्राप्त कर । एक संत बनने की राह पर बढ़, फिर प्रस्थान कर इस जग से ।

 अपनों में रहे या ग़ैरों में
घुँघरू की जगह तो है पैरों में
कभी मन्दिर में कभी महफ़िल में
सजता ही रहा हूँ मैं
 घुँघरू की तरह ...
 
मुक्त हो जा अब इस दर्द से, इस तन- मन से ...


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (गुजरा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा, हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

Saturday, 29 September 2018

ओ दूर के मुसाफ़िर हम को भी साथ ले ले रे

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  मैं छोटी- छोटी उन खुशियों का जिक्र ब्लॉग पर करना चाहता हूँ, उन संघर्षों को लिखना चाहता हूँ, उन सम्वेदनाओं को उठाना चाहता हूँ, उन भावनाओं को जगाना चाहता हूँ, जिससे हमारा परिवार और हमारा समाज खुशहाली की ओर बढ़े ।
   बिना धागा, बिना माला  इन बिखरे मोतियों की क्या उपयोगिता है। मैं अपने इस लम्बे एकाकी जीवन में क्या खोया ,क्या पाया और क्या सीखा  इसकी चर्चा
निःसंकोच ब्लॉग पर करता हूँ ..
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 दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए
 फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए
 है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना
 ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना
 ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना ...

   यह गीत मुझे तब से पसंद है , जब एक-एक कर प्रियजन मुझे छोड़ ना जाने कहाँ चले गये।  माँ , बाबा और फिर दादी भी ... और भी जो बाद में अपनों जैसे लगे वे भी तो छल गये  मुझे ...
   इन्हीं की स्मृतियों में नेत्रों में आयी नमी को छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहा था , तभी स्मरण हो आया कि धर्म-
अध्यात्म में रुचि रखने वाले बड़े भैया सलिल पांडेय जी ने इस पितृ पक्ष माह को लेकर अभी पिछले दिनों ही बातों ही बातों में टोका था मुझे कि  तुम कुछ नहींं लिख रहे हो अपने ब्लॉग पर.. ? देखों तो अपने पूर्वजों के संग भी किस तरह से दिखावट , बनावट और मिलावट कर रहे हैं ,  उनके ये कतिपय कलयुगी संतान.. कोई गया ( पिण्डदान स्थल) के लिये दौड़ लगा रहा है, तो कोई अन्य तरीका अपना रहा है , ताकि समाज की नजरों में वह श्रवण कुमार बन सके । शायद ये जनाब यह भूल गये कि श्रवण कुमार तो अपने जीवित माता- पिता को लेकर तीर्थ यात्रा पर निकले थें। परंतु ये सभी उनकी मृत्यु के बाद गया में उन्हें मोक्ष दिलाने जा रहे हैं।  इन लोगों से जरा यह पूछ ले कि वृद्ध माँ - बाप को , उनके जीवित रहते चार न सही एक भी धाम की यात्रा करवायी थी क्या कभी ..?  फिर उनकी मृत्यु के पश्चात मोक्षधाम में जाने को लेकर यह उतावलापन क्यों है मेरे भाई ..?  इतना नाटक - नौटंकी क्यों कर रहे हो आप..  प्यारे यह पब्लिक है, सब जानती है कि आप अंदर से कितने काले हो या गोरे...
    वैसे सच कहूँ तो पितृपक्ष पर मेरी भी इच्छा रही कि कुछ लिखूँ, परंतु मैं अपने परिवार के  किसी भी सदस्य के लिये एक योग्य संतान जब स्वयं को साबित ही न कर पाया, तो क्या लिखूँ ..?
      वैसे भी मेरा यह पूरा प्रयास है कि ब्लॉग पर मैं कुछ भी असत्य नहीं लिखूँ। यह ब्लॉग मेरे लिये अब तक के जीवन काल में एक पवित्र पुस्तक से अधिक महत्व रखता है। इस पर असत्य लेखन करना मैं महापाप से कम नहींं समझता हूँ। यहाँ किसी भी प्रकार की कृत्रिमता मुझे बर्दाश्त नहीं है। चाहे भले ही उसे पढ़ लोग व्याकुल पथिक समझे  या फिर  संत या ढ़ोंगी , वे मेरा उपहास करे या फिर मुझे गंभीरता से ले , मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता , क्यों कि जिस जगह में खड़ा हूँ, बंधुओं वह अब दलदली भूमि नहीं कठोर चट्टान है। यहाँ से मेरे पांव डगमगाने वाले नहीं है, मन चाहे कितने ही जख्मों को सहता क्यों न करता रहे और राह में मिलने वाले मुझे चंद दिनों में बेगाना समझ लें। ऐसा होना भी स्वभाविक ही है , जब आप अपने परिवार के नहीं हो सके, तो गैर क्यों आप पर विश्वास कर ले.. ? हाँ ,वह आपके साथ टाइम पास जरुर कर सकता है , पर यह उस परिवार का सुख तो नहीं है न, जिन्हें इस माह वियोग होने पर हम बड़े आदर भाव से याद करते हैं। इसलिये उतावलेपन में परिवार का त्याग करने से पूर्व इस पर गम्भीर से विचार कर लें कि आपकों कैसा जीवन चाहिए ...
       मेरी तरह घुटन भरा  या फिर अपनों संग वह स्वाभाविक हँसी-ठिठोली । मित्रों , जब आपका परिवार है, तभी कोई व्याकुल होगा कि सुबह - शाम आपने क्या भोजन किया, बाहर हैं तो फोन पर संदेशा आएगा , नहीं तो मेरा हाल सुन ले कि सुबह जो थोड़ा सा दलिया खा कर निकलता हूँ , तो रात 10 बजे के बाद ही जा कर रोटी की व्यवस्था हो पाती है।  मेरे भोजन ग्रहण करने न करने से किसी को क्या फर्क पड़ेगा। इसे लेकर बेचैनी तो आपकी माँ या पत्नी को ही होती है। शेष जो भी सम्बंध हैं,इस समाज में उसमें आपके प्रति वह तड़प निश्चित ही नहीं दिखेगी, क्यों कि उसका भी अपना परिवार है, फिर हम उसकी प्राथमिकता की सूची मैं कैसे आएँगें।
    जो नौजवान गुमराह हो घर छोड़ दे रहे हैं ,उनके लिये कह रहा हूँ यह सब ... कितनी ही बार अवसाद की स्थिति में इस एकाकी जीवन को समाप्त करने की इच्छा हुई, परंतु नहीं किया। अभी तो समय के उस चक्र को पूरा करना है और अपनों की जुदाई को अभी कुछ यूं ही सहना है-

 तू ख़यालों में मेरी अब भी चली आती है
अपनी पलकों पे उन अश्कों का जनाज़ा लेकर
 तूने नींदें करीं क़ुरबान मेरी राहों में
 मैं नशे में रहा औरों का सहारा लेकर
 ग़म उठाने के लिये मैं तो जिये जाऊँगा ..

 अभिभावकों के कितने ही अरमानों को मैंने परोक्ष रुप से ध्वस्त किया। चाहे वह मेरी विवशता ही क्यों न रही हो। कोलकाता(ननीहाल) में मिले दुलार और फिर बनारस(घर) के अति अनुशासन ने मुझे बेघर कर दिया हो। आज उसी का परिणाम है कि मैं एक मुसाफिरखाने में पड़ा हूँ। फिर क्या लिखूँ और कैसे लिखूँ पितृपक्ष पर .. नौटंकी मुझे पसंद बिल्कुल भी नहीं है।
  गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है -

 पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।।

  इसे मैंने अपने ब्लॉग लेखन का पैमाना मान लिया है। एक बात और मैं छोटी- छोटी उन खुशियों का जिक्र ब्लॉग पर करना चाहता हूँ, उन संघर्षों को लिखना चाहता हूँ, उन सम्वेदनाओं को उठाना चाहता हूँ, उन भावनाओं को जगाना चाहता हूँ, जिससे हमारा परिवार और हमारा समाज खुशहाली की ओर बढ़े । बिना धागा, बिना माला  इन बिखरे मोतियों की क्या उपयोगिता है। मैं अपने इस लम्बे एकाकी जीवन में क्या खोया ,क्या पाया और क्या सीखा  इसका जिक्र निःसंकोच ब्लॉग पर करता हूँ ।  वैसे एक पत्रकार के रुप में तो मेरी रुचि राजनीति और अपराध जगत से जुड़ी खबरों में अधिक रहती है , फिर भी ब्लॉग को मैंने इससे दूर ही रखा हूँ।
     हाँ , अपने पूर्वजों को लेकर  बचपन का एक - दो संस्मरण है  मेरे पास ।  जब मैं छोटा था, तो चित्रकला में रुचि थी मेरी।  तब मैंने अपने दादा जी का चित्र बनाया था। जो घर पर सभी सदस्यों को पसंद आया था और एक याद बचपन की है। पितृपक्ष पर एक छोटी सी पोटली में भोजन सामग्री बांध उसके साथ एक बांस की छोटी सी छड़ी घर के बाहर दरवाजे पर रखी जाती थी । हम बच्चों से बताया जाता था कि रात में दादा जी इसे ले जाएँगें। अगले दिन सुबह होते ही हम दरवाजे  की ओर भागते थें। पोटली और छड़ी खोजते थें, पर वह मिलती कहाँ थी। तब हम बहुत खुश होते थें कि दादा जी ले गये उसे। सच तो यही था कि चूहा उसे खींच ले जाता होगा , फिर भी हम बच्चों को अपने पूर्वजों से भावात्मक रुप से जोड़ने का यह सहज माध्यम था। आज के बच्चों में  ऐसा आत्मीय लगाव क्यों  नहींं ला पा रहे हैं हम ..?  इस पर भी विचार करें हम ।
   सम्वेदनाओं की यही कमी , हमें अवसाद की ओर ले जा रही है। परिवार बिखर जा रहा है, हम टूट जा रहे हैं । इन्हीं सब विषयों पर यहाँ ब्लॉग पर मैं अपने आप से बात करता हूँ, अंतःकरण में दृष्टि डालता हूँ। मुझे लगता है कि अवचेतन मन  हमें लगातार संकेत देता रहता है, हम उसे भले न समझ पा रहे हो। बाबा थें ,तो माँ  की लम्बी बीमारियों के बावजूद जब भी उनका चित्त प्रसन्न  रहता था । उनका पसंदीदा गीत था..

जब प्यार किया तो डरना क्या
प्यार किया कोई चोरी नहीं की
प्यार किया कोई चोरी नहीं की
 छुप छुप आहें भरना क्या ...

     यह गीत एक दिन सत्य हो गया, उनकी मृत्यु कोलकाता में कब-कहाँ हुई, किस दिन हुई , मुझे कुछ भी पता नहीं। बस इतना पता है कि परिवार का कोई सदस्य वहाँ नहीं था। इस पितृपक्ष में सबसे अधिक मन उन्हीं को लेकर व्याकुल है। माँ का अंतिम संस्कार तो उन्होंने पूरी भव्यता के साथ किया था, परंतु स्वयं अनाथ सा चले गये। दादी घर के एक छोटे से कमरे में बीमार पड़ी रहीं और चली गई, तब मैं कलिम्पोंग में था। ताऊ जी ने बताया था कि तुम्हारे पिता की मृत्यु से दो दिनों पूर्व तुम्हारी छोटी बहन भी चल बसी । अपनी माँ की अर्थी को 13 वर्ष की अवस्था में कंधा देने वाला वह बालक इतना विवश क्यों हो गया कि फिर सभी अपनों से दूर रहा, उनके अंतिम संस्कार तक में न शामिल हो सका। अतः क्या लिखूँ ब्लॉग पर..?
 सिर्फ इन कुछ पंक्तियों के..

 ओ दूर के मुसाफ़िर हम को भी साथ ले ले रे
 हम को भी साथ ले ले
 हम रह गये अकेले
 तूने वो दे दिया ग़म, बेमौत मर गये हम
 दिल उठ गया जहाँ से, ले चल हमें यहाँ से
 ले चल हमें यहाँ से
 किस काम की ये दुनिया जो ज़िंदगी से खेले रे
 हम को भी साथ ले ले....

Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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