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Wednesday, 7 November 2018

कितना मुश्किल है पर भूल जाना...

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(दीपावली और  माँ की स्मृति)

 हमें तो उस दीपक की तरह टिमटिमाते रहना है ,जो बुझने से पहले घंटों अंधकार से संघर्ष करता है, वह भी औरों के लिये, क्यों कि स्वयं उसके लिये तो नियति ने " अंधकार " तय कर रखा है..
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बिछड़ गया हर साथी देकर पल दो पल का साथ
किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ
हमको अपना साया तक अक़सर बेज़ार मिला
जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला....

  रोशनी के पर्व दीपावली की यह काली रात आज मुझे इस तन्हाई में और स्याह क्यों प्रतीत हो रही है... बाहर तो चहुँओर उजाला है,पटाखों की आवाज भी कम नहीं सुनाई पड़ रही है और सड़कों पर भी तो भारी चहलपहल है, फिर दिल में यह अंधकार क्यों.. ?
    ऐसे प्रमुख पर्व-त्योहार पर जब भी ऐसी मनोस्थिति होती है मेरी, तो अपने पसंदीदा अभिनेता गुरुदत्त की
 फिल्म " प्यासा" को और करीब से समझने की कोशिश करता हूँ । यूँ समझे कि मन को जरा तसल्ली देने का प्रयास करता हूँ कि

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे
उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे आँसू पी लेंगे
ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला
हमने तो जब ...

     वैसे दिन भर तो व्यस्त ही रहा। स्नेहीजनों के यहाँ गया भी और सदैव की तरह ही मिठाई आदि दीपावली के उपहार भी कम नहीं मिले मुझे , जिन्हें पता था कि मिठाई से मैं कुछ परहेज करने लगा हूँ, तो उन्होंने ड्राई फ्रूट भेज दिया। जिन्हें लगा मुझे लिफाफा पंसद नहीं ,उन्होंने कुछ दूसरा उपहार दिया । वहीं कुछ माननीय और स्नेही जन ऐसे भी थें, जिन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि मुझे उनका लिफाफा स्वीकार करना ही होगा, क्यों कि यह कोई रिश्वत नहीं है। उनका कहना रहा कि आप समाज के लिये निःस्वार्थ भाव से लेखन करते हैं। अतः उनकी भी जिम्मेदारी है कि वे मेरी अर्थ व्यवस्था को बनाये रखें,ताकि मूलभूत आवश्यकताएँ मेरी पूरी  होती रहे।  इन लिफाफों में पाँच सौ से लेकर पाँच- पाँच हजार रुपये भी थें।
    उस इंसान के लिये जिसने पत्रकारिता जगत में आकर अपनी तमाम निजी खुशियाँ खो दी, उसके लिये यह मान-सम्मान और स्नेह कम नहीं है। इस जीवन रुपी सागर के मंथन से निकले  विष एवं अमृत दोनों को ही समभाव से हमें ग्रहण करना ही पड़ेगा ।
  मध्यरात्रि तक होटल के इर्द-गिर्द पटाखे बज रहे थें। परंतु पटाखों को हाथ लगाये मुझे तीन दशक से ऊपर हो गये हैं। अब सोचता हूँ कि चलो अच्छा ही है , मुझे पटाखा नहीं बनना है , जो भभक कर, विस्फोट कर अपना अस्तित्व पल भर में समाप्त कर दे, साथ ही वातावरण को प्रदूषित भी करे ..। हमें तो उस दीपक की तरह टिमटिमाते रहना है ,जो बुझने से पहले घंटों अंधकार से संघर्ष करता है, वह भी औरों के लिये, क्यों कि स्वयं उसके लिये तो नियति ने " अंधकार " तय कर रखा है..।
   आपने भी सुना होगा न यह मुहावरा कि चिराग तले अंधेरा..।
   सो, दीपावली की रात इसी चिंतन में गुजर गयी, यूँ ही मन को बार- बार बहलाते हुये।
  हाँ,  रैदानी भैया द्वारा भेजा गया कोलकाता के तिवारी ब्रदर्स की काजू की बर्फी के डिब्बे ने ननिहाल में गुजरे अपने बचपन की मधुर स्मृतियों को मानस पटल पर चलचित्र की तरह ही चलायमान कर दिया है। दरअसल, बड़ा बाजार स्थित छोटे नाना जी की मिठाई की दुकान गुप्ता ब्रदर्स का सोन पापड़ी ,तिवारी ब्रदर्स का समोसा( सिंघाड़ा) और देशबंधु की बंगाली मीठी दही संग में मैदे की लूची- चने की दाल प्रसिद्ध रही है ,जो मुझे प्रिय थी तब...। वैसे, काजू बर्फी , मलाई गिलौरी और रस माधुरी ये तीनों ही मेरे सबसे प्रिय मिष्ठान थें। माँ ,को यह पता था, सो उनके पिटारे में इनमें से दो प्रकार की मिठाइयाँ निश्चित ही रहती थीं। परंतु यह तभी मुझे मिलता था, जब हार्लिक्स डाला गया एक गिलास दूध पी लूँ । माँ का यह आदेश मुझे पूर करना ही होता था। इसमें मेरी कोई आनाकानी उन्होंने नामंजूर थी। खैर, माँ गयी, बचपन गया और उनका वह स्नेह भी अतीत की यादें बन दफन हो गया। वह आखिरी दीपावली जो माँ के साथ गुजारी थी। हम दोनों कितने खुश थें। तब क्या पता था मुझे कि चंद दिनों में ही मैं यतीम हो जाऊँगा, वह भी इस तरह की फिर कभी किसी के आंचल की छांव नसीब नहीं होगी और बंजारा कहलाऊँगा । वो है न एक गीत..
एक हसरत थी कि आँचल का मुझे प्यार मिले
मैने मंज़िल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले
ज़िन्दगी और बता तेरा इरादा क्या है...

       नियति की यह कैसी विडंबना रही कि सदैव अस्वस्थ रहने वाली माँ ने दीपावली की उस शाम स्टूल के सहारे बारजे पर बैठ मुझे पटाखे फोड़ते न सिर्फ खूब देखा था, वरन् स्वयं भी उन्हों रोशनी एवं फूलझड़ी जलाई थी। उसी दीपावली छोटे नाना जी ने उपहार में मुझे मंहगी एचएमटी की कलाई घड़ी दी थी। मैंने उनकी दुकान से मिठाई के डिब्बों में भरकर बिक्री रुपये उनके दफ्तर तक पहुँचाने की जिम्मेदारी बखूबी जो निभाई थी। और भी बहुत कुछ यादें हैं, मसलन मिट्टी के टोकरी भर खिलौने बाबा ने दिलवाया था। सामने राजाकटरा में ही तो गणेश- लक्ष्मी और खिलौनों की दुकानें थीं । बाबा कहाँ मानने वाले थें, प्यारे ये देखों, यह लोगें.. सिर हिलाते हुये दादा- दादी , पुतना का स्तन पान करते कृष्ण , रुप परी और भी तरह- तरह के खिलौने लेकर आते थें हम दोनों..। उस दीपावली बाबा ने बारजे को जगमगाने के लिये लिंची और अंगूर नुमा झालर मुझे खुश करने के लिये खरीदा था, उस समय बाजार म़े नया- नया आया इलेक्ट्रिक दीपक भी..।   मेरे पांव एक स्थान पर टिक ही नहीं रहे थें, उस दीपावली को ..घर, कारखाना और दुकान का दिन भर चक्कर लगाता रहा। बम की आवाज तो माँ को पिछले वर्ष तनिक भी पसंद नहीं था, वे हृदयरोग से पीड़ित जो थीं। लेकिन, उस आखिरी दीवाली पर वे मुझे ऐसा करने से मुझे बिल्कुल नहींं रोक रही थीं। इसी के अगले माह मेरी परीक्षा थी। कक्षा 6 में मैं अव्वल रहा। माँ के स्वपनों को पूरा किया , लेकिन तब वे मृत्यु शैय्या पर थीं। ठीक से याद नहीं है , सम्भवतः 26 दिसंबर ही था, क्यों कि 25 को तो बड़ा दिन का जश्न था, उस मनहूस सुबह ब्रह्ममुहूर्त में माँ मुझे अनाथ कर गयी। फिर बनारस, मुजफ्फरपुर, कलिम्पोंग, मीरजापुर में कितनी ही दीवाली आई और गई, तन्हाई और दर्द के सिवाय कुछ न मिला..।
  इस दीपावली को भी क्या नहीं था मेरे पास ,तरह तरह के मिष्ठान, उपहार , पैसों भरे लिफाफे भी , पर एक वो न था पास में , जो इस मासूम दिल को एहसास करवा सके , इन तीज- त्योहारों को..।
    अतः कल रात भोजन तक न मिला , यूँ समझे की मन नहीं था । माँ भी तो मुझसे किये अनेक वायदे तोड़ चली गयी , मानों उपहास कर रही हैं वो भी कि ढ़ूंढ़ते रहो ,इन सितारों में..
 वह एक गीत है न ...

कितना आसान है वादे तोड़ देना, कितना मुश्किल है वादा निभाना
कितना आसान है कहना भूल जाओ, कितना मुश्किल है पर भूल जाना..

शशि/ 8 नवंबर2018


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (कितना मुश्किल है पर भूल जाना...) आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

Tuesday, 6 November 2018

कच्ची मिट्टी के ये पक्के दिए , भूल न जाना लेना तुम...


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दीपोत्सव पर्व को लेकर बजारों में रौनक है। कल धनतेरस पर करोड़ों का व्यापार हुआ है। बड़े प्रतिष्ठान चाहे जो भी हो,धन सम्पन्न ग्राहकों का प्रथम आकर्षण वहीं केंद्रित रहता है। छोटे -छोटे दुकानदार फिर भी कुछ उदास से ही दिख रहे हैं , इस चकाचौंध भरे त्योहार में। सो, हमारा प्रयास होना चाहिए कि ऐसे खुशी के अवसर पर  उस वृद्ध महिला को ,जो दीपक और अन्य मिट्टी के खिलौने लिये सड़क पर बैठी हुई है और उस मासूम बालक को, जो अपने नाजुक गर्दन में टोकरी लटकाये रुई ले लो की पुकार लगा रहा है , कुछ लड़कियाँ सिर पर टोकरी में कमल के फूल रखें मिलीं, एक प्रयास होना चाहिए हमारा कि इन सभी को निराश न किया जाए। इन्हें खाली हाथ वापस न घर लौटना पड़े, वे भी खुशी खुशी अपना पर्व मनाएँँ., तभी हम भी ऐसे त्योहार मनाने के हकदार हैं..

निकले जो तुम आज घर से
फ़रमाइशों की फ़ेहरिस्त लिये
बटुए में बंद कर के वो नोट हजार
 तुम निकले भरी दुपहरी खरीदने बाज़ार
इस चकाचौंध इस धक्का-मुक्की में
 शायद तुम लेना भूल गए
 ये कच्ची मिट्टी के पक्के दिए
 तुम साथ ले जाना भूल गए...

  बंधुओं, ऐसा न करें। हम सभी क्यों न आपस में मिलजुल त्योहार मनाएँँ। अपने घर के साथ-साथ औरों के घरों को भी रौशन करने के लिये एक कोशिश तो हो न..।
 अन्यथा , कभी फिर आप ही कहेंगे कि दीपावली पर्व दिनोंं दिन उदास क्यों होती जा रही है। अमावस की यह रात और स्याह क्यों होती जा रही है..? बड़ी -बड़ी अट्टालिकाओं को जगमगाते ये कृत्रित प्रकाश इंसान के मन को रौशन क्यों नहींं कर रहा है..?
 बाजार में सब कुछ तो है, फिर भी इंसानियत क्यों नहीं है। हमें अपनी खुशियों का ध्यान तो ऐसे प्रमुख पर्वों पर खूब होता है, परंतु हमारे जैसे और भी इंसान हैं, जिनके पास पर्व मनाने के लिये बहुत सीमित सन-साधन है, हम कुछ खुशियाँ उन्हें तो दे ही  सकते हैं। मसलन, पर्वों पर अपनी मौजमस्ती और अपनी फिजूलखर्ची  में कुछ कटौती कर के, कम से कम एक डिब्बा मिठाई ही सही अपने बच्चे के हाथों दीपावली के उपहार के तौर पर किसी ऐसे निर्धन परिवार को दिया जा सकता है, जो उचित पात्र है। आप अपने लाडले को इंसानियत का यह पाठ भी पढ़ा सकते हैं कि देखों पटाखे में  सारे पैसे बर्बाद करने से बेहतर रहा न कि तुमने अपने एक भाई या बहन की मदद कर दी। पटाखे क्या है, दस मिनट में फूट कर ठंडे पड़  जाएंगे, यदि हम और आप " वसुधैव कुटुंबकम " पर बल देते हैं , तो याद रखें कि ऐसे छोटे- छोटे परोपकार से हमारे-आपके बच्चे नैतिक रुप से इतने जिम्मेदार हो जाएँँगे कि वृद्धावस्था आपकी इन्हें आशीर्वाद देने में ही गुजर जाएगी। पर्व त्योहार पर यदि किस असमर्थ पड़ोसी के घर हम एक भी दीपक जलाने का सामर्थ्य रखते हैं, तो वह हमारे भवन पर जगमगा रहे सैकड़ों बल्ब से लाख गुना बेहतर है, फिर भी विडंबना देखेंं न कि पर्व पर जहाँ पहले बच्चे पड़ोसियों के यहाँ आते -जाते थें। सभी मिल कर पटाखे फोड़ते थें और अब के जेंटलमैन अपने कानवेंट में पढ़ने वाले बच्चों को उनका स्टेटस बता या तो घर के अंदर रखते हैं अथवा समकक्ष लोगों तक ही इनका आना जाना होता है। जिसका सीधा प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ रहा, जिसके हृदय में वह करुणा एवं संवेदना नहीं है, जो उसे मानव बना सके।
  अब देखें न कि इस भीड़ भरी सड़क पर बुलेट दौड़ा रहे एक युवक ने एक वृद्ध को धक्का मार दिया और कह क्या रहा है , जानते हैं..? वह कह रहा था कि ये बुड्ढे ठीक से चल नहीं सकते तो बीच सड़क पर क्यों आ जाते हो, मरने की क्यों इतनी जल्दी पड़ी है तुझे ?
आप समझ लें युवा वर्ग का यह मिजाज , उक्ति है न कि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे..।  ऐसा इसलिए हो रहा है कि हम दिखावटी धार्मिक कार्य तो खूब कर रहे हैं , धर्म स्थलों पर  उमड़ती भीड़ गवाह है। परंतु जो मानवीय कर्म है, उससे हम स्वयं को और अपने संतानों को दूर किये जा रहे हैं।
  राजनीतिज्ञों और समाजसेवीजनों की बात करूँँ, तो जनता को शुभकामनाएँँ देने के लिये  उनके बड़े- बड़े  होर्डिंग -बैनर सड़कों पर लगे दिख रहे हैं। क्या यही होर्डिंग उनके सेवाकार्यों  की पहचान है ?  इन पर जो इनका हाथ जोड़ा हुआ जो फोटो चस्पा है, इसे देख जनता इन्हें महान समझने लगेगी ? ऐसा नहीं है मित्रों यहाँ मेरी इन्हीं आँखों के सामने कितने ही पावरफुल माननीय जब आम चुनाव में बोल्ड हुये, तो वापसी फिर कभी नहीं हुई उनकी, गुमनाम हो गये वो। हाँ , यह सबक वर्तमान में जो जनप्रतिनिधि हैं, उन्हें याद न रहे, तो यह इस अर्थयुग का प्रभाव है। अन्यथा , ये रहनुमा गुपचुप तरीके से ऐसे पर्वों पर  कुछ घरों को रौशन जरुर करते , लेकिन आलम यह है कि छोटा-सा भी सेवाकार्य यदि वे करते हैं, तो मीडिया कर्मियों की भीड़ पहले से जुटा ली जाती है। अखबारों में इनके सेवाकार्य का मूल्य फिक्स होता है। प्रत्यक्ष न सही, अप्रत्यक्ष तो निश्चित होता है।  फिर कैसे मने इस दबे कुचले निर्धन वर्ग की दीपावली ..?
    फिर तो ऐसे बदनसीब को जिन्होंने जीवनभर संघर्ष किया, फिर भी अपनी हैसियत इतनी भी न बना सके कि वे पर्व- त्योहारों पर उत्सव मना सकें, उन्हें तो अपनी टूटी हुई उम्मीदों को संग लिये  इन टूटे दीपकों से ही काम चलाना होगा...

इसी खंडहर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए

इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात...

   अच्छे दिन आएँँगे की उम्मीदों में वर्षों गुजर गये हैंं अब तो , फिर से कोई नया जुमला लेकर इन रहनुमाओं को आना होगा। तलाशिये अभी से इसे की अब कि आम चुनाव में आप क्या मलहरा गाएँँगे। महंगाई , बेरोजगारी , बेगारी और बदहाली से सिसक रही जनता को क्या क्या नया सियासी सब्जबाग फिर से आप दिखलाएँँगे। पुलतीघर की बुझी चिमनी में धुआँँ करने का वादा तो कर गये,पर जनाब!  इस वादाखिलाफ़ी पर आप जनता की आँँखों की पुतली फिर से कैसे बन पाएँँगे। बेचारे आम आदमी की जेब खाली है। यही कोई पांच हजार पगार है उसका , इसी में उसकी होली और दीपावली है। न कहीं से बोनस मिलना है, न ही सत्ताधारियों की कृपा प्रसादी है , फिर क्या कहूं मित्रों, बस यही न कि

खंडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही
अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही
हमको पता नहीं था हमें अब पता चला
इस मुल्क में हमारी हुकूमत नहीं रही...

   सुबह साढ़े चार बजे अखबार के बंडल की प्रतीक्षा में चौराहे पर खड़े- खड़े कुछ ऐसे ही विचार मंथन में डूबा था कि यौवन की दहलीज़ पर पहुँच चुकी, तीन सांवले रंग की तीन किशोरियों की खिलखिलाहट से मेरी तंद्रा भंग हुई। देखा कि प्लास्टिक की बड़ी - बड़ी बोरी लिये कबाड़ बीनने वाली
ये लड़कियाँ बेझिझक यह गीत गुनगुना रही थीं..

गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर
गोरा रंग दो दिन में ढल जायेगा
मैं शमा हूँ तू है परवाना
मुझसे पहले तू जल जायेगा..

   बड़ी बात कह गयीं ये बच्चियाँ, पर वीणा की तार की आवाज सुन हर कोई बुद्ध तो नहीं बन जाता है..?
   वैसे, उनकी बोरियों का वजन कुछ भारी था, इसलिये वे खुश थीं। मैं समझ गया कि लोगों ने अपने घर और प्रतिष्ठान की सफाई की है, इसलिये इन कबाड़ बटोरने वालों की दीवाली ठीक ही गुजरेगी।
शशि/मो० नं०9415251928 और 7007144343
gandivmzp@ gmail.com


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Sunday, 4 November 2018

आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन ..

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 यहाँ मंदिर पर बड़े लोग सैकड़ों डिब्बे  मिठाई दनादन बंधवा रहे हैं। ये बेचारे मजदूर तो ऊपरवाले का नाम ले, अपने मन की इच्छाओं का दमन कर लेते हैं , परंतु इन गरीबों के बच्चों को कभी आप ने दूर से टुकुर- टुकुर ताकते इन मिष्ठान्नों की ओर देखा है..? 
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हर मज़हब का एक ही कहना जैसा मालिक रक्खे रहना
जब तक साँसों का बंधन है जीते जाओ सोचो मत
कठ-पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत
सोच से ही सारी उलझन है जीते जाओ सोचो मत ...

     जैसा मालिक रखे ..?  धर्मग्रंथों तक में बयां कुछ ऐसी ही बातें आज भी पहेली है मेरे लिए। अरे जनाब !  कठपुतली और इंसान में फ़र्क होता है । हमारे पास मस्तिष्क है, हृदय है, भावनाएँ हैं, सम्वेदनाएँ हैं, अपना ईमान और कर्म भी है, फिर हम क्यों यह आकांक्षा न करें कि हमें भी हमारा उचित कर्मफल मिले..? यदि एक विद्यार्थी जो अपने जीवन में किये कठिन अध्ययन का कर्म फल अथार्त जीवकोपार्जन के लिये उचित आजीविका की व्यवस्था, जहाँ यदि निष्ठापूर्वक वहाँ अपनी सेवा दे रहा है तो उचित पगार , एक पत्नी  अपना सर्वस्व समर्पित करने के पश्चात पति के प्रेम,  एक पिता जिसने अपने पुत्र को अपने तप से स्वालम्बी बनाया , वह वृद्धावस्था में उससे थोड़ा सा स्नेह, सम्मान एवं दो वक्त की रोटी ,समाज जिसने हमे पहचान दी , वह हमसे उचित कर्म एवं राष्ट्र जिसकी माटी में हम पले-बढ़े वह संकट काल में अपने वीर सपूतों से रक्त (बलिदान) की आकांक्षा नहीं रखे, तो फिर इस सामाजिक ताने-बाने की क्या आवश्यकता है ..?  तृष्णा से ही हर भले बुरे कार्य सम्पन्न होते है । प्रणय, वैराग्य और सन्यास भी तो इसी तृष्णा की ही उपज है न..।  मैं तो इसी लौकिक जगत के में विश्वास रखता हूँ। मेरे लिये अलौकिक शब्द  सिर्फ काल्पनिकता है। जैसा कि मेरा बाल मन चाँद- सितारों में अपनी माँ को ढ़ूंढा फिरता है।
 अतः  उपदेशकों की जलेबी की तरह गोल- गोल बातें मुझे बिल्कुल समझ में नहीं आती है ..।
    और न ही यह कि जैसा कर्म करेगा, वैस फल देंगे भगवान , यह है गीता का ज्ञान...
    मैं तो  इंसान को नियति का खिलौना मानता हूँ। धर्म- कर्म से इस निष्ठुर नियति को क्या मतलब।
     आज अपने शहर के कसरहट्टी इलाके से गुजर रहा था। देखा  पीतल के बर्तन बनाने वाले तमाम श्रमिक हाथ और पैर की एड़ी से भी बर्तन बनाने वाले पीतल के चादर को रगड़- रगड़ कर चमका रहे थें। इन्हीं में कुछ वृद्ध श्रमिक भी थें।  जिन्होंने होश सम्हालते ही इस क्षेत्र में आकर पापी पेट के लिये काम करना शुरू कर दिया था और अब उनके जीवन की चिमनी बुझने को है, सो भभक रही है। तन-मन- धन तीनों ही खो चुके हैं ऐसे बर्तन निर्माण करने वाले मजदूर , फिर भी बिल्कुल यंत्र मानव की तरह कार्य करते ही जा रहे थें , ये सभी। मेरा भावुक मन कांप उठता है , दुर्गा देवी मंदिर वाले इस मुहल्ले से होकर गुजरने से । जब साइकिल के पहिये ही आगे को बढ़ना नहीं चाहते हैं, यह सब देख कर ,तो बाइक और कार से चलने की अभिलाषा भला कहाँ से जगेगी..?
 सोच रहा हूँ कि इस बर्तन मंडी जैसे ही श्रमिकों एवं दीन हीन लोगों के अनेक ठिकाने हैं , इस दुनिया के मेले में , जहाँ के शोरगुल में इंसानियत का जनाजा यूँ ही खामोशी से निकलता रहता है..
    मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
     आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन ..

     कल धनतेरस है, सो इस दुर्गा मंदिर के बाहर बड़े से स्टाल पर देशी घी की तमाम तरह की मिठाइयाँ, काजू नमकीन सहित अन्य सामग्रियाँ सजी हुई हैं। बड़े लोगों की खरीदारी जारी है। यहाँ अपने शहर में दुर्गा पूजा और रामलीला कमेटियों से जुड़े आयोजक भी पांच दिवसीय दीपामाला पर्व पर मिष्ठान तैयार करवा प्रतिष्ठित प्रतिष्ठानों से अपेक्षाकृत कुछ कम मूल्य पर ब्रिकी किया करते हैं। फिर भी दुर्गा मंदिर के सामने ही बर्तन बना रहे तमाम श्रमिकों में से किसी को भी मैंने मंदिर के बाहर सजे इन महंगी मिठाइयों को खरीदते -खाते नहीं देखा। इन श्रमिकों की छोड़े मेरे जेब में स्वयं कभी इतना पैसा नहीं था कि मैं मंदिर पर जाता तो मुझे मिठाई मिल जाती , आधे मूल्य पर..। तब न समझ में आता कि  गरीबों के लिये भी मंदिर और रामटेक पर बिक रहीं मिठाइयों को खरीदने का विकल्प है। खैर, अब पहचान वाला पत्रकार हूँ, तो महंगी से महंगी मिठाइयों के अनेकों डिब्बे मेरे पास भी आते रहते हैं, परंतु मैंने स्वयं इनका त्याग कर दिया है, तो जो मिला उसमें से अधिकांश बांट देता हूँ।
     दूसरी और यहाँ मंदिर पर बड़े लोग सैकड़ों डिब्बे मिठाई दनादन बंधवा रहे हैं। बेचारे मजदूर तो ऊपरवाले का नाम ले, अपने मन की इच्छाओं का दमन कर लेते हैं , परंतु इन गरीबों के बच्चों को कभी आप ने दूर से टुकुर- टुकुर ताकते इन मिष्ठानों की ओर देखा है..? यही कहेंगे न कि कहाँ फुर्सत है भाई , यह सब देखने और सोचने की। अपने बीवी-बच्चे की डिमांड पहले पूरी करूँ कि  बेफिजूल की बातों में उलझा रहूँ। ठीक हो तो सोचते हैं सभी, अब " अपना परिवार " का मतलब यही तो है न कि मियां- बीवी और उनके बच्चे.. ?  जब अपना परिवार का दायरा ही इतना संकुचित हो गया है, तो फिर बाहरी दुनिया में कौन-कैसे जीवन व्यतीत कर रहा है , उसमें झांक ताक से क्या मतलब।जब भी मैं इस मंदिर के बगल वाली गली से गुजरात हूँ, तो एक ही प्रश्न मेर मन में हर बार उठता है कि कहाँ हैं, इनके भगवान..? दिन भर ये श्रमिक परिश्रम करते हैं , अपने कर्म पथ पर डटे हैं और इनमें से अनेक बुरी आदत से ग्रसित भी नहीं हैं। फिर क्यों इनके पास इतना धन नहीं हो पाता कि मंदिर के बाहर सजी देशी घी की ढ़ेरों मिठाइयों में से एक- दो किलो अपने परिवार के लिये भी खरीद लें। न कर्म में इनके कोई अवगुण है, न ही धर्म में। ये सभी इन भद्रजनों से कहीं अधिक निष्ठा एवं विश्वास से मंदिर के चौखट पर शीश नवाते हैं।
      जब हम  नियति का तमाशा हैं, कोई पैमाना नहीं है ,कुछ भी कर्मफल तय नहींं है,  तो फिर क्यों दैव- दैव पुकार नेत्रों से नीर बहाऊँ ,  इन उपासना स्थलों  पर ..??

     बचपन में यह सब बहुत किया, निष्काम भाव से किया, युवावस्था की और बढ़ा तो काशी में रह कर ब्रह्ममुहूर्त में नियमित  गंगा स्नान किया ,शिव मंदिरों में  अपने आराध्य देव को कमंडल से गंगा जल भी चढ़ाया और संतों के प्रवचनों पर भी कान दिया। फिर भी नियति के समय चक्र ने मुझे यतीमों से भी बदतर जीवन दे रखा है।
   जब सभी को तीज- त्योहार मनाते देखता हूँ, तो मेरे इस विकल मन की वेदना भी अनंत हो जाती है..

  पतझड़ सा जीवन है, प्यार की बहार दो
 प्यासी है ज़िंदगी और मुझे प्यार दो
 प्यार का अकाल पड़ा सारे ही जग में
 धोखे हुए हर दिल में, नफ़रत है रगरग में
 सब ने डुबोया है मुझे, पार तुम उतार दो
 मेरी तमन्नाओं की तकदीर तुम सँवार
 दो प्यासी है ज़िन्दगी तुम मुझे प्यार दो ...
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   यह नियति कितना निष्ठुर है, ऊपर पोस्ट मेरा यह समाचार फुर्सत से आप भी पढ़े , फिर विचार करें...!!


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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Thursday, 1 November 2018

रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे..



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   एक बात मुझे समझ में नहीं आती है कि इस अमूल्य जीवन की ही जब कोई गारंटी नहीं है, तो फिर क्यों इन संसारिक वस्तुओं से इतनी मुहब्बत है। खैर अपना यह जीवन आग और मोम का मेल है, कभी यह सुलगता है, तो कभी वह पिघलता है...
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दर्द में डूबे हुए नग़मे हज़ारों हैं मगर -
साज़-ए-दिल टूट गया हो तो सुनाए कैसे
रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे
 बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे
रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएं...

  परिस्थितिजन्य कारणों से जब ऐसा मनोभाव हो और इस रंगीन दुनिया की  खूबसूरत तस्वीरें भी आँखों को चुभन देती हो, तो क्या किया जाए कि  जिंदगी बोझ न बने , हृदय में जो स्नेह का उबाल है, वह पीड़ा न दे। अपने आशियाने के बंद कमरे में मैं इसी सवाल का जवाब ढूंढता हूँ, अकसर इन तन्हा रातों में ..।
   जब कभी यह मन अनुशासन का बंधन तोड़ने को बेताब होता है, वह स्वछंदता की ओर आकृष्ट होता सा जान पड़ता है, दो पल की खुशियों के लिये हर चहारदीवारी फांदने को बेताब होता है। तब उसे बार-बार यह याद दिलाना पड़ता  है कि ये मासूम दोस्त हर किसी को भला कहाँ नसीब है वह मनमीत, जैसा तूने सोचा था ।  ख्वाबों का महल बना लिया और तू स्वयं यादों के पिंजड़े में कैद है , इससे स्वयं को आजाद करों और कर्मपथ की शेष दूरियों को पार करो...।
  पर मेरी मंजिल क्या है बंधु, जरा यह भी तो बतला दो न.. ?
इस पथिक को अब पत्रकार बनना नहीं, लेखक बनना नहीं, जोगी बनना नहीं और गृहस्थ बनने का भी कोई सवाल नहीं, तो फिर किस राह पर चलना चाहते हो ।  कोई जवाब नहीं है अभी इस सवाल का मेरे पास, पर हाँ इतना जानता हूँ कि कहाँ दलदल है, कहाँ चट्टान और कहाँ उपवन है...।
 दीपावली पर्व है , सो बजारों में खासी भीड़ है। हर सामग्री चूना-पेंट तक  गारंटी- वारंटी वाली हो गयी है। साहब , एक बात मुझे समझ में नहीं आती है कि इस अमूल्य जीवन की ही जब कोई गारंटी नहीं है, तो फिर क्यों इन संसारिक वस्तुओं से इतनी मुहब्बत है..। खैर अपना यह जीवन आग और मोम का मेल है, कभी यह सुलगता है, तो कभी वह पिघलता है।
   जब कोई खास अपना न हो , कोई मनमीत न हो, तो दिल के झरोखे को बंद किये रहना बड़ी चुनौती होती है एकाकीपन में , इसलिये बंद कमरे के बाहर की रंगीन दुनिया में झांक ताक करना कब का बंद कर चुका हूँ। अन्यथा यह भाव मन में उबाल ला सकता है..

बुझी-बुझी सी नज़र में तेरी तलाश लिये
भटकते फिरते हैं हम आज अपनी लाश लिये
यही ज़ुनून यही वहशत हो और तू आये
हम इंतज़ार करेंगे तेरा क़यामत तक...

  फिर भी कभी- कभी बंद कमरे से बाहर  कुछ अपने शुभचिंतकों से मुलाकात हो ही जाती है। अभी पिछले ही दिनों रास्ते में कामरेड मो० सलीम भाई मिल गये। भकापा (माले) के बड़े स्टार प्रचारकों में से हैं, जेएनयू के प्रोडक्ट हैं और हम उम्र भी। वे किसी अन्य प्रान्त में रहने वाले गंभीर रोग से पीड़ित अपने एक कामरेड भाई  का आर्थिक सहयोग करने बैंक गये थें। राजनेताओं में इतनी सम्वेदना होनी ही चाहिए कि यदि उसका कोई साथी किसी कारण संकट में हो, तो उसे अकेला न छोड़ दिया जाए। आज के स्वार्थपरक राजनीति में ऐसा कहाँ देखने को मिलता है..? पर अपने सलीम भाई कुछ अलग हैं, वे पहले इंसान हैं फिर नेता..। सो, मुझे कभी- कभी उनके साथ समय गुजारना और साथ ही आमना जी ( भाभी जी) के हाथों का बना भोजन पसंद है। लिहाजा, मैं उनके साथ हो लिया। घर पर पहले दूध, शहद और चूड़ा मिला, फिर ताजी रोटी और बेहद स्वादिष्ट सब्जी। वैसे तो मेरा संकल्प है कि एक ही सब्जी लूंगा, पर जब ऐसा नहीं हो पाता तो  दोनों ही सब्जियों को आपस में मिला देता हूँ मैं। सलीम भाई एक प्याले में मिश्रित दालों से बना विशेष तरह का दाल वड़ा भी ले आये। आमना जी का निर्देश था कि वह मेरे लिये तत्काल बनाया गया है, ऐसे में आनाकानी कैसे कर सकता था..? भोजन की थाली संग ऐसा ही कुछ स्नेह अगले दिन पुनः मेरे सबसे पुराने मित्र डा० योगेश सर्राफा के घर पर मिला। वहाँ भी भाभी जी ने कहा कि रोटी तो नहीं मिलेगी, शुद्ध देशी घी के पराठे आपको खाना होगा। महीनों बाद जो गया था, सो डाक्टर साहब बेहद खुश थें। होम्योपैथ के अच्छे डाक्टर हैं वे, मेरे स्वास्थ्य को लेकर वे भी चिन्तित रहते हैं। वर्ष 1998 में उन्हीं के समक्ष मलेरिया हुआ था, मुझे
 ठीक करने का हर सम्भव प्रयास किया, परंतु पड़ोसी चिकित्सक ने जो एक माह तक टाइफाइड की अंग्रेजी दवा क्या चला दी कि फिर ठीक आज तक न हो सका। डा० सर्राफा ने भी मुझे काढ़ा लेते रहने को कहा है।
     दोस्तों,  पत्रकारिता जगत में यहाँ आने के बाद यही मेरी कमाई है कि जहाँ भी जाता हूँ, सम्मान पाता हूँ। अकसर सुबह  चाय कि दुकानों पर स्नेहीजन मेरा इंतजार करते हैं ।
    हाँ , दावत से जुड़े विभिन्न समारोह और क्लब में जाना मुझे तनिक भी पसंद नही है। एक कार्य मुझसे और बिल्कुल भी नहीं हो पाता वह किसी के विवाह- बारात में सम्मिलित होना, ऐसा करने से मुझे अपनों की याद सताती है। इस व्यथित हृदय को बार - बार जख्म मैं नहीं देना चाहता। जबकि किसी के निधन पर सहभोज का औचित्य मेरी समझ से परे है। मेरे विचार से यह अवसर सामूहिक रुप से मौन रह कर मृत्यु से साक्षात्कार का है, न कि गुलाब जामुन और मालपुआ खाने का। खैर मैं किसी धार्मिक कर्मकांड पर सवाल खड़ा नहीं करना चाहता, बस मुझे व्यक्तिगत नहीं पसंद है यह सब। मेरे विचार से एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम के माध्यम से मृत व्यक्ति के सतकर्मों की चर्चा होनी चाहिए। ताकि समाज तक एक संदेश जाए। इंसान चाहे जितना भी बुरा हो , उसमें कोई अच्छाई निश्चित ही होती है। ऐसे कार्यक्रम में उसे प्रकट कर मृत आत्मा को सम्मान दिया जाए।
    दिवंगत पत्रकार तृप्त चौबे  की श्रद्धांजलि सभा में एक बात मुझे समझ में नहीं आयी कि दो प्रमुख विशिष्ट जनों ने यह क्या कह दिया..? दरअसल, इन दोनों का कथन रहा कि तृप्त भाई ने उनसे कह रखा था कि उनके और उनके कामकाज के विरुद्ध वे अपनी कलम से कुछ न लिखेंगे..। मैं इससे सहमत नहीं हूँ । घोड़े और घास में दोस्ती हो जाए,तो फिर हम अपना पत्रकारिता धर्म कैसे निभाएंगे। मैं छोटा सा बैनर लेने बावजूद अपनी पहचान इसीलिये तो बना पाया हूँ कि सभी जानते थें तब कि शशि है, तो दबाये , छिपाये बिना लिखेगा जरुर .. । हम अपने कर्म से कैसे पीछे हट सकते हैं , हालांकि अब मुझे पत्रकारिता में कोई रूचि नहीं है, यह बात साफ कर दूँ । जब अपने घर में ही विभीषण और जयचंद्र हो, तो फिर बाहरी शत्रुओं का मनोबल बढ़ेगा ही और हम जैसे पत्रकार अपने पेशे से विरक्त होते जाएंगे।
    जीवन के ऐसे मोड़ पर मैं खड़ा हूँ , जहाँ कृत्रिमता सम्भव नहीं है मुझसे, मैं तो वेदनाओं और सम्वेदनाओं की नगरी का व्याकुल पथिक हूँ और यह सम्वेदना किसके पास है? उन राजनेताओं के पास जो कि वादाखिलाफी में हीरो नंबर वन हैं अथवा सलीम भाई की तरह की कि बीमार किसी अपरिचित
रिक्शेवाले के लिये दो वक्त की रोटी की व्यवस्था अपने घर से कर रहे हैं। ऐसे सादगीपसंद राजनेताओं की मीडिया भी कहाँ खोज खबर लेती है।
   इस झूठी  माया नगरी से  तो यह अपना बंद कमरा ही बेहतर है। मैं तो अपने लिये एक विकल्प की तलाश में हूँ। काश !  कोई ऐसा हो जो मेरी भावनाओं का कद्र करता हो। जरा कठिन है ऐसे किसी स्नेहीजन की तलाश, यह भी नसीब की ही बात है, पर  एक विकल्प तो निश्चित है।

  इसीलिए तो रेणु दी की एक कविता की ये पंक्तियाँ मुझे बेहद  पसंद है..

साथ ना चल सको -
मुझे नहीं शिकवा कोई ,
मेरे समानांतर ही कहीं -
चुन लेना सरल सा पथ कोई ;
निहार लूंगी मैं तुम्हे बस दूर से -
मेरी आँखों से कभी- ओझल ना हो जाना तुम ! !

  प्रत्यक्ष न सही , आभासीय जगत में ही कोई एक तो ऐसा हो..? मन की पिघलती वेदनाओं को जो थाम ले ..।  जीवन साथी न सही कोई शखा ही मिल जाए,  जो स्वयं ही बिना आला लगाये मर्ज जान ले। हाँ, जब ये भी न हो तो दूसरा विकल्प है, जो हमारे पास वह लेखन, अध्ययन और सतसंग, मेरे लिये तो अपना यह ब्लॉग है। जब उदासी चरम पर होती है, ऐसे शब्द मरहम बन जाते हैं।

शशि/मो० नं०9415251928 और 7007144343
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Sunday, 28 October 2018

दिवंगत पत्रकार की श्रद्धांजलि सभा में जब फफक कर रो पड़ींं केंद्रीय राज्यमंत्री अनुप्रिया 
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आदमी मुसाफिर है, आता है, जाता है
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 पत्रकारिता जगत ही नहीं समाजसेवा के हर क्षेत्र में यदि हम त्यागपूर्ण तरीके से अपना कर्म करेंगे, तो समाज हमारा ध्यान
आज इस अर्थ प्रधान युग में भी रखता है , फिर भी अपने पेशे के लोग यदि सम्मान दें, पहचान दें ,तो उसका विशेष महत्व होता है। एक आत्मसंतुष्टि सी होती है कि जीवन सार्थक हुआ।
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आदमी मुसाफिर है, आता है, जाता है
आते जाते रस्ते में, यादें छोड़ जाता है...
 
  हमारे कार्य, हमारे सदगुण और हमारा संघर्ष यदि जनहित में है,तो बेजां नहीं जाता, हम रहे न रहें , फिर भी समाज हमें याद करेगा। मैं सदैव अपने स्नेह विहीन ,कष्ट भरे एकाकी जीवन को लेकर व्याकुल सा रहता था कि क्या पत्रकारिता जगत में आकर इस अस्वस्थ तन- मन के साथ यूँ ही इस दुनिया से कूच कर जाऊंगा, हमारी पहचान यूँ ही नष्ट हो जाएगी, अपना कोई वंश भी तो नहीं है कि वह मुझे याद करे..। परंतु ऐसा नहीं है , यदि हम कर्तव्य पथ पर हैं, तो समाज हमें याद रखता है। रविवार को जिला पंचायत परिषद का यह सभागार इसका गवाह रहा..।
       इस दिन सुबह साढ़े दस बजे से ही जिला पंचायत के सभागार में शोक के बादल आ-जा रहे थे कि तभी केन्द्रीय राज्यमंत्री मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल 'हिंदुस्तान' के ब्यूरोचीफ स्व तृप्त चौबे के लिए शोकोद्गार व्यक्त करने के लिए माइक थामा तो वे खुद को सम्हाल न सकी और उनके नारी-हृदय से करुणा की धारा बह चली । वे खुद फफक कर रो पड़ी । उन्हें सम्हालने श्रीमती नन्दिनी मिश्र मंच पर आयीं लेकिन श्रीमती अनुप्रिया अंत तक शोक-धारा से विलग न हो सकी और उसी में बहती नजर आयीं ।
     प्रशासन के लगभग हर उच्च अधिकारियों, यहां के पत्रकारों तथा समाज के हर वर्ग के लोगों के इस भाव की कि  स्व० चौबे की बेटी को मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार के तहत राजकीय सेवा मिले, इसकी मांग कभी पत्रकारिता जगत के स्तम्भ रहे सलिल पांडेय ने रखी और ज्ञापन स्व0 चौबे की बड़ी बेटी निमिषा (B. Sc. द्वितीय वर्ष) और छोटी बेटी साक्षी (कक्षा 12) द्वारा पत्रकारों ने एकस्वर समर्थन के साथ दिलवाया, जिस पर पूरी सहानुभूति के साथ मुख्यमंत्री तक पहुंचाने का भरोसा देते श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने यह कहा कि वे अपने स्तर से भी बेटियों के लिए बहुत कुछ करेंगी और उनकी स्नातक तक की शिक्षा की जिम्मेदारी भी स्वयं ली। विधायक राहुल प्रकाश कोल और नगरपालिका अध्यक्ष मनोज जायसवाल ने भी हर सम्भव सहयोग की बात कही।
  इससे पूर्व ऐसी श्रद्धांजलि सभा किसी पत्रकार के लिये नहीं हुई थी। जो खाटी पत्रकार रहें अथवा हैं , यही उनका सर्वोच्च सम्मान है।
   इसके पहले यहाँ पत्रकारों ने स्वर्गीय प्रेस छायाकार इंद्रप्रकाश श्रीवास्तव के परिजनों और गम्भीर रुप से अस्वस्थ दिनेश उपाध्याय के आर्थिक सहयोग के लिये भी गणमान्य जनों के सहयोग से काफी कुछ किया। यह परम्परा कायम रहना चाहिए। जाहिर है कि हममें से अधिकांश पत्रकार श्रमजीवी हैं। जब तक सामर्थ्य है और हम किसी अखबार या इलेक्ट्रॉनिक चैनल से जुड़े हैं, इस चकाचौंध भरी दुनिया में हमारी मान- प्रतिष्ठा है। हाँ, पैसा तो फिर भी एक खाटी पत्रकार के पास इतना नहीं रहता कि हम परिवार की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके, फिर भी पद व प्रभाव के कारण कोई कार्य रुकता भी नहीं, यह भी सत्य है। परंतु जैसे ही हमारी शारीरिक क्षमता घटती है, हम पूर्व पत्रकार हो जाते हैं, ऐसा कोई आर्थिक स्त्रोत हमारे पास नहीं रहता कि हम सम्मान से अपना अपना शेष जीवन व्यतित कर सकें। फिर तो हम टूट जाते हैं, गुमनाम हो जाते हैं और जिस दिन मिट जाते हैं, एक कालम की शोकसभा में इन्हीं अखबारों में ही खो जाते हैं। मुझे याद है कि अपने समय के श्रेष्ठ छायाकार  अशोक भारती एक बड़े अखबार से जुड़े थें। प्रशासन, राजनीति, व्यापार से जुड़ा हर शख्स इस शहर का उन्हें पहचानता था। हैट और सस्पेंडर बेल्ट उनकी खास पहचान थी। अपने समय के इकलौते प्रेस छायाकार थें वे, परंतु हुआ क्या उनके साथ, शरीर के कमजोर पड़ते ही प्रेस की नौकरी चली गयी। गुमनाम से पड़े रहे दरबे में और वैसे ही गुजर गये। वरिष्ठ पत्रकार पंडित रामचंद्र तिवारी जो मेरे गुरु थें , को इनसाइक्लोपीडिया (विश्वकोश)  कहा जाता था ,इस मीरजापुर के भद्रजनों की मंडली में। परंतु उनकी स्मृति में हम क्या कर पाये।  पत्रकारिता दिवस पर ऐसा कोई बैनर तक नहीं टांगते, जिसपर उन वरिष्ठ पत्रकारों के चित्र हो, जो कभी आदर्श पत्रकारिता के मिसाल थें। हम उनकी पत्रकारिता पर कभी किसी ऐसे मंच से चर्चा तक नहीं करते हैं।आदर्श पत्रकारिता के लिये यहाँ जिनकी ऊँची पहचान थी, वे आज गुमनाम हैं।जिले की पत्रकारिता पर ऐसी कोई पुस्तक नही है, जिसके माध्यम से स्थानीय पत्रकारों का जीवन परिचय और पत्रकारिता जगत में उनके संघर्ष की जानकारी युवा जगत को मिली। कोई पत्रकार भवन नहीं है, जहाँ इन आदर्श पत्रकारों के चित्र हो और हम इनकी जयंती पर वहाँ जा श्रदांजलि अर्पित करें। बस वर्ष में एक दिन पत्रकारिता दिवस पर हम मंच सजा कर बड़ी- बड़ी बातें करते हैं और फिर सहभोज..?
    हमें आपस का वैमनस्य दूर करना चाहिए। जो भी पत्रकार वास्तव में पत्रकारिता के लिये समर्पित है, उनकी सही पहचान कर क्यों न कम से कम तीज- त्योहार पर उन्हें एक छोटा सा तोहफा ही भेट करे। जिससे हर कष्ट सहन कर भी कर्मपथ पर चलने वाले ऐसे पत्रकारों का मनोबल बढ़े। उसे यह न लगे कि समर्पित भाव और ईमानदारी से की गयी उसकी पत्रकारिता इस रंगीन दुनिया की चकाचौंध में गुम हो गयी।
  बंधुओं आज में उस पड़ाव पर हूँ, जहाँ अपना परिवार, अपना स्वास्थ्य खो चुका हूँ। फिर भी थोड़ी पहचान बनायी है, इसीलिये निवास के लिये चंद्रांशु भैया ने सहृदयता दिखला , मित्र समझ अपने होटल में शरण दे दिया। बीमार होता हूँ, तो अपने सांईं मेडिकल के चंदन भैया दवा- इलाज से पीछे नहीं हटते हैं और दांत में गड़बड़ी आई तो अग्रज राजेश चौरसिया के बड़े पुत्र डा० राहुल चौरसिया ने चाचा- भतीजे वाला संबंध  का निर्वहन किया। यदि कभी मेरा सेल फोन खराब हो जाता है, तो जनप्रतिनिधि और समाजसेवी जन स्वतः ही उसकी व्यस्था कर देते हैं। वे जानते हैं कि इससे अधिक मेरी कोई आवश्यकता नहीं है। भोजन में दलिया , रोटी और थोड़ी सी सब्जी यदि बना सकूं , तो इतना बहुत है, क्षुधा शांति के लिये।
    मित्रों,  पत्रकारिता जगत ही नहीं समाजसेवा के हर क्षेत्र में यदि हम त्यागपूर्ण तरीके से अपना कर्म करेंगे, तो समाज हमारा ध्यान आज इस अर्थ प्रधान युग में भी रखता है , फिर भी अपने पेशे के लोग यदि सम्मान दें, पहचान दें ,तो उसका विशेष महत्व होता है। एक आत्मसंतुष्टि सी होती है कि जीवन सार्थक हुआ। जिसका प्रभाव नये पौध पर पड़ता है। वे भी प्रभावी तरीके से अपने कर्मपथ पर पांव जमा कर चलना सिखते हैं। यह कांटों भरा जीवन सफर है दोस्तों, किसी ऐसे पड़ाव पर पहुंच कर बहुत कुछ याद आता है...

क्या साथ लाये, क्या तोड़ आये
रस्ते में हम क्या-क्या छोड़ आये
मंजिल पे जा के याद आता है
आदमी मुसाफिर है....


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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Thursday, 25 October 2018

वो जुदा हो गए देखते देखते..


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     दबाव भरी पत्रकारिता हम जैसे फुल टाइम वर्कर के लिये जानलेवा साबित हो रही है। पहले प्रेस छायाकार  इंद्रप्रकाश श्रीवास्तव की दुर्घटना में मौत और एक और छायाकार कृष्णा का घायल होना,वरिष्ठ क्राइम रिपोर्टर दिनेश उपाध्याय का मौत के मुहँ से निकल कर किसी तरह से वापस आना और मैं स्वयं अस्वस्थ तन-मन लिये इसी पेशे का शिकार हूँ, जिसमें मुनाफा बिल्कुल नहीं है मेरे दोस्त... !
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वो भी एक पल का किस्सा था
 मैं भी एक पल का किस्सा हूँ
 कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा
 वो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ
 मैं पल दो पल का शायर हूँ
 पल दो पल मेरी कहानी है ...

    कब किसकी सांसें किस मोड़ पर थम जाए, जीवन एक कहानी बन कर रह जाए, क्या पता..। अनंत में समाने की चाहत मन में लिये मैंने बड़ी बेचैनी से आज की शाम गुजारी है। गोपियों संग ब्रह्मांड नायक श्रीकृष्ण के महारास के संदर्भ में चिन्तन कर रहा था। प्रेम की ऐसी अद्भुत परिभाषा रची कि द्वारिकाधीश हो कर भी उनकी  पूजा राधा संग ही होती है।  योगेश्वर होकर भी उनकी पहचना वृंदावन के नटखट कृष्ण कन्हैया से ही है। जिन्होंने आज शरद पूर्णिमा के दिन ही गोपियों संग महारास रचा था। आध्यात्मिक जगत करते रहे इसकी व्याख्या, परंतु ज्ञान की आँखों से परे है यह प्रेम की परिभाषा..?
  वैसे, कितना सुंदर सलोना होता है , यह शरद पूर्णिमा का चांद भी, फिर भी मुझे  बंद कमरे की खिड़की खोलने की तनिक भी इच्छा नहीं हो रही है। जबकि पड़ोस के मैरिज हाल में नाच गाने का काफी शोर है। हो सकता है कोई पार्टी हो वहाँ .। परंतु अपना तो बुखार से शरीर टूट रहा है। दांत में दर्द था, अतः रूट कैनाल करवाया है।  जिससे चेहरा भी दायी ओर गुब्बारे की तरह हो गया है।  युवा दंत चिकित्सक डा० राहुल चौरसिया ने अल्प समय में ही अपनी पहचान बना ली है। अब संबंधों के लिहाज से मैं ठहरा उनका चाचा , तो मेरा देखभाल कुछ ज्यादा ही हुआ। ढ़ाई दशक की पत्रकारिता में बस इतना ही कमाई की है कि जेब में पैसे रहे न रहे , कोई काम रुकता नहीं है, न ही मुझसे कोई पैसा ही लेना चाहता है। इस शहर में हर मोड़ पर कोई अपना परिचित मिल ही जाता है , सिर्फ अपने बंद कमरे को छोड़ कर। यहां पर ऐसा कोई मनमीत नहीं, जो मेरी मनोदशा को समझे, मैं नाराज हो जाऊँ, तो वह  मुझे मनाएं और इस तन्हाई को साझा करे।  ऐसे व्यर्थ के जीवन को मैं झेले जा रहा हूँ , परंतु कब तक..?
  मानसिक और शारीरिक पीड़ा का सीधा असर मस्तिष्क पर पड़ रहा है, फिर भी यह मन निरंतर चलायमान है। उसे कोलकाता में गुजरा अपना वह बचपन, वह कमरा, वह आंगन, वह सीढ़ी ,.वह चांद आज भी तो याद है, जब माँ के कहने पर हाथों में सुई और धागा लेकर ऊपर वाली सीढ़ी पर चढ़ जाया  करता था। जहाँ चंद्र प्रकाश में सुई के छिद्र में धागा डालता और फिर उसे लाकर माँ को दिखला देता, तो वे कितनी खुश होती थीं। कहती थीं कि मुनिया अब तेरे नेत्र की ज्योति कमजोर नहीं होगी । पर जब माँ ही चली गयी , तो आशीर्वाद का वह सुरक्षा कवच भी टूट गया।
 मीरजापुर में दो जून की रोटी के लिये कुछ इस तरह का शारीरिक एवं मानसिक श्रम करना पड़ा कि चार आँखों वाला हो गया हूँ। फिर जब मलेरिया ने घेर लिया तो चश्मे का नंबर बढ़ता ही जा रहा है..।
और हाँ, आज तो चावल की खीर खुले आसमां के नीचे रखी जाती है,  चंद्र किरणें उसे अमृत तुल्य जो बना देती हैं। इस खीर  के पीछे औषधीय कारण है कि नए धान की फसल पर जब चन्द्रमा की यह किरणें पड़ती हैं तब धान (चावल) अत्यंत पुष्टिकारक हो जाता है । आश्विन मास का नामकरण अश्विनीकुमारों के नाम से होने के कारण आयुर्वेदिक चिकित्सक तमाम बीमारियों की दवा इस रात रखे गए खीर के साथ रोगियों को देते है । पुष्टिकारक एवं आयुष्य देने वाली किरणों के कारण ही हमारे ऋषियों ने 12 महीनों में 'जीवेम शरद:शतम' का आशीष देकर इस माह को गौरवान्वित किया , परंतु अपने नसीब में तो वही दलिया ही रहा आज की शाम भी। चलों अच्छा ही हुआ कि तरह - तरह के व्यंजनों का मैंने स्वेच्छा से ही त्याग कर दिया। उक्ति है न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। ये चंद्र किरणें और अमृत तुल्य यह खीर नसीब वालों को मुबारक हो , मेरे लिये तो अपना दलिया ही छप्पन भोग है।  जब इससे अधिक कुछ बनाने में असमर्थ हूँ तो अन्य भावनात्मक  इच्छाओं की तरह व्यंजनों का भी परित्याग उचित ही मेरे लिये।  वैसे, सच तो यह भी है कि दलिया और मूंग की खिचड़ी कितना सम्हालेगी, इस शरीर की उर्जा सम्बंधित आवश्यकताओं को , यह तो मैं भी जानता हूँ,  परंतु  नियति  के समक्ष विवश हूँ, कल रात में ही दांतों में दर्द शुरू हो गया था, हालांकि डाक्टर साहब ने दवा दी थी और बताया भी था कि इंजेक्शन का प्रभाव कम होने पर कुछ दर्द होगा ही। फिर भी करवटें बदल रहा था कि रात गुजर जाय। हाँ , तभी किसी के स्नेह का आभास हुआ और कुछ देर के लिये आँखें लग गयीं । सुबह के चार बजते ही मेरे दोनों सेल फोन एक साथ उठो लाल अब आँखें खोलों ...का रट लगाने लगता है। चाहे बुखार हो या दर्द मैं अपनी ड्यूटी पूरा करने निकल पड़ता हूँ सुबह साढ़े चार बजे मुकेरी बाजार चौराहे की ओर ...।
    अन्तर सिर्फ इतना है कि पहले पेट की अग्नि शांत करने के लिये काम करता था और अब स्वयं को व्यस्त रखने के लिये , ताकि एकाकीपन अवसाद बन मन मस्तिष्क पर न छा जाए...।
 पत्रकारिता के बोझ ने जहाँ मेरे जीवन की हर खुशी छीन ली,जिसका एहसास अब इस मोड़ पर मुझे हो रहा है कि कोई एक इंसान ऐसा नहीं है , जो इस रंगीन दुनिया में , मेरा दर्द बांट सके। भला कौन इस पथिक की वेदनाओं में रूचि लेगा और कितने दिनों तक , सबका तो अपना घर परिवार है न ..।  माँ के बाद एक भी इंसान मुझे ऐसा नहीं मिला, जो मुझे इस तन्हाई में अपना समझ कर पुकारे ।  जिन्होंने पुकार भी वह छलावा था...।
  परंतु  जिनके अपने हैं , सपने हैं , वे भी अपना विकेट गंवा चले जा रहे हैं यूँ ही अचानक। हिन्दुस्तान समाचार पत्र के मीरजापुर के ब्यूरोचीफ तृप्त चौबे की हृदयगति रुकने से हुई  मृत्यु ने इस व्याकुल मन को और झकझोर दिया है। मामूली सा सीने का दर्द भयावह हो गया। पत्नी और पुत्री के समक्ष ही उन्होंने अस्पताल में कल अपनी सारी महत्वाकांक्षाओं , सारी योजनाओं और सारे सम्बंधों से नाता तोड़ लिया। कच्ची गृहस्थी बिखर गयी। पल भर में  यह क्या हो गया..?

इस दिल पे लगा के ठेस
जाने वो कौन सा देश
जहाँ तुम चले गए...

     दबाव भरी पत्रकारिता हम जैसे फुल टाइम वर्कर के लिये जानलेवा साबित हो रही है। पहले प्रेस छायाकार  इंद्रप्रकाश श्रीवास्तव की दुर्घटना में मौत और एक और छायाकार कृष्णा का घायल होना,वरिष्ठ क्राइम रिपोर्टर दिनेश उपाध्याय का मौत के मुहँ से निकल कर किसी तरह से वापस आना और मैं स्वयं अस्वस्थ तन-मन लिये इसी पेशे का शिकार हूँ, जिसमें मुनाफा बिल्कुल नहीं है मेरे दोस्त... !
     मैं भी अपने परिवार, अपने स्वास्थ्य और उन अपनों  का साथ , सभी कुछ गंवाने के बावजूद  उस अनंत में समाने को छटपटा रहा हूँ। अपना तो सबकुछ वहाँ है। यहाँ अब खुद पर भी क्या भरोसा, जो दूसरों पर विश्वास करूं ...

  गैर की बात तस्लीम क्या कीजिये
 अब तो ख़ुद पे भी हमको भरोसा नहीं
  अपना साया समझते थे जिनको कभी
  वो जुदा हो गए देखते देखते..

 और हाल यह है इस रंगीन दुनिया में रिश्तों का  ..

  मैंने पत्थर से जिनको बनाया सनम
  वो खुदा हो गए देखते देखते
सोचता हूँ कि वो कितने मासूम थे
क्या से क्या हो गए देखते देखते...
    शशि 24/10/2018

Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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Sunday, 21 October 2018

वसुधैव कुटुम्बकम का दर्पण यूँ क्यों चटक गया..

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बड़ी बात कहीं उन्होंने ,यदि हम इतना भी त्याग नहीं कर सकते तो आखिर फिर क्यों दुहाई देते हैं वसुधैव कुटुम्बकं की ? शास्त्र कहते हैं कि आदर्श बोलते तो है पर उसका पालन नहीं करते तो पुण्य क्षीण होता है ।
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गुज़रो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे...

       काश ! कुछ ऐसा ही होता कि हमारी दुआ असर दिखलाती और इस खूबसूरत दुनिया की हर बगिया गुलजार रहता। हर सम्वेदनशील, भावुक और दयालु इंसान ऊपर वाले से कुछ ऐसी ही प्रार्थना तो करता है न। हमारे शास्त्रों में   ' ' 'वसुधैव कुटुम्बकं' एक आदर्श वाक्य है। हम सम्पूर्ण विश्व का कल्याण चाहते है।  परंतु अमृतसर दशहरा हादसा एक बार फिर से हमारी मानवीय सम्वेदनाओं का उपहास उड़ाते दिख रहा है। रावण के पुतला दहन को देख रहें रलवे ट्रैक पर खड़े कितने ही बेगुनाह लोग ट्रेन से कट मरे और उससे कहीं अधिक घायल भी हैं ।  उजड़ गए परिवारों की चीख-चीत्कार, आह-विलाप से फिर भी जिसका हृदय द्रवित नहींं हुआ, वह मानव नहीं बल्कि दानव ही कहा जाएगा । कोई मां पुत्र खोई होगी है , कोई बहन अपना भाई । कोई पिता खोया तो कोई पति खोकर हुई होगी विधवा । पर्व की खुशी पल भर में मौत के तांडव नृत्य में बदल गयी।
   घटना के समय मैं अपने शरणदाता व अति उदार स्वभाव के मित्र चंद्रांशु गोयल के होटल के रिसेप्शन कक्ष में था। होटल के कर्मचारी पर्व के कारण छुट्टी पर थें, अतः बंद कमरे से बाहर निकल चंद्रांशु भैया के पास नीचे आ गया था..। जहाँ लगी बड़ी सी एलईडी टीवी के स्क्रीन पर यह समाचार ब्रेकिंग न्यूज बन कर फ्लैश होने लगा , कुछ ही मिनटों में। तब तक सोशल मीडिया पर भी यह हृदय विदारक दृश्य सहित  समाचार आ रहा था..।
   मन व्यथित हो गया इस पथिक का और भी तब यह देख कर कि यहाँ दशहरे के जश्न में कोई कमी नहीं आई। मानों मरने वाले  लोग हमारे जैसे इंसान नहीं थें...। जो रक्त बह रहे थें रेल पटरियों पर उसका रंग सुर्ख लाल नहीं था..। समझ नहीं पा रहा हूँ कि कैसे मानव हैं हम, या हमारा रक्त ही शव पर लिपटे कफन की तरह श्वेत हो चुका है..।
   तभी  सलिल भैया का यह संदेश सोशल मीडिया पर आया,
 " अमृतसर दशहरा हादसा राष्ट्रीय शोक की घड़ी । वसुधैव कुटुम्बकं मानने वाले तत्काल हर तरह के दशहरा-उत्सव करें स्थगित, मनाएं शोक । "
   मैंने सोचा कि चलो इस मार्मिक अपील के प्रभाव से निश्चित ही मेले और दुर्गा पूजा पंडाल के आयोजकों की तंद्रा भंग होगी, कम से कम वे ध्वनि विस्तार यंत्रों से निकलने वाले शोर को तो कम कर ही देंगे। परंतु अफसोस , ऐसा कुछ भी न हुआ ,जबकि हम सम्पूर्ण विश्व को अपना मानते हैं। हमें संस्कार का सबक देने के लिये सुबह होते ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ विशेष चैनल धार्मिक, नैतिक और सामाजिक आइटम परोसने लगते हैं। हम भी तो बातें बड़ी ऊंची- ऊंची करते हैं न..? और तो और हादसे पर राजनीति भी शुरु हो गयी। घटना की जिम्मेदारी को लेकर तेरा- मेरा की वहीं गंदी सियासत फिर से...।

  एक प्रश्न सलिल भैया का का विचारणीय है कि असली रावण कौन है..? अमृतसर दशहरा हादसे में मरते मरते 'रावण' (पात्र दलबीर) इतना संवेदनशील साबित हुआ कि तीन की जान बचा ले गया लेकिन रामभक्ति में डूबे दशहरा उत्सव के आयोजकों में कहीं से खबर नहीं आ रही थी कि कोई उत्सव मातम में रोक दिया गया हो। कितनी दुखद स्थिति है। अनुसरण तो हम राम का करते हैं, रावण का पुतला जलाते हैं और जब अपने ही पड़ोस के राज्य में ही इतनी बड़ी दर्दनाक घटना हो जा रही हैं , फिर भी हम मुस्कुरा रहे हैं, जश्न मना रहे हैं। यह संवेदनहीनता असुर- राक्षसों वाली ही तो प्रवृत्ति है न..। विजयादशमी के दिन 19 अक्टूबर को देर शाम यह पीड़ादायक समाचार चहुंओर फैल गया था।
सब अवाक और आहत थें,  लेकिन यह खबर कहीं से नहीं आयी कि धमाचौकड़ी और झूमझाम के कार्यक्रम स्थगित करना तो दूर थोड़ी देर के लिए आयोजकों द्वारा शोक-श्रद्धांजलि व्यक्त की गई हो । दलील दी जा सकती है कि जब उत्सव शुरू हो गया तो कैसे रोके ? रोक न पाने की स्थिति में शोक तो व्यक्त किया जा सकता था । काफी आहत दिखें सलिल भैया , जिनका कहना रहा कि मान ले कि किसी आयोजन कमेटी के महत्वपूर्ण पदाधिकारी के घर कार्यक्रम के दिन कोई गम्भीर बीमार हो जाए, कोई दुर्घटना हो जाए तो क्या वह आयोजन से तौबा नहीं करेगा ? इसी परिप्रेक्ष्य में अमृतसर की घटना में रोते-बिलखते परिजनों को यह मान लेते कि ऐसे ही अपना परिवार बिलखता तो क्या आयोजन में हम धमाचौकड़ी करते ? मुख्य अतिथि का स्वागत करते ? माला पहनाते ? बताने की जरूरत नहीं उत्तर खुद ही मन सही सही दे देगा ..।   बड़ी बात कहीं उन्होंने ,यदि हम इतना भी त्याग नहीं कर सकते तो आखिर फिर क्यों दुहाई देते हैं वसुधैव कुटुम्बकं की ? शास्त्र कहते हैं कि आदर्श बोलते तो है पर उसका पालन नहीं करते तो पुण्य क्षीण होता है । स्कन्दपुराण में स्पष्ट है कि पुण्य कब कब और कैसे-कैसे क्षीण और नष्ट होता है ।
 जहाँ तक मेरा सवाल  है , तो धर्मग्रंथों पर तो बहुत नहीं चिंतन- मनन नहीं करता , परंतु अपनी अंतरात्मा की आवाज निश्चित ही सुनने का प्रयास करता हूँ।  अन्यथा स्वयं को रावण कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं होगा।
  यदि राम कहलाना है तो हमें अपनी मानवीय संवेदनाओं को    विस्तार देना होगा। दो नारियों अहिल्या और सबरी , जिन्हें उस समय के भ्रदजनों ने ठुकरा दिया था। राम निःसंकोच उनकी कुटिया में गये। केवट , बानर  और राक्षक तक के प्रति उनमें सम्वेदना थी और हम तनिक देर शोक में मौन भी न रह सकें...?
   सोचे हम राह क्यों भटकते जा रहे हैं और अपने बच्चों की सामाजिक ज्ञान की झोली में नैतिक शिक्षा की कौन सी पुस्तक डाल रहे हैं। यदि हम अपनी सामाजिक सम्वेदनाओं को इसी तरह से सिकोड़ते जाएँगे, तो एक दिन हमारे स्वयं के परिवार में भी यह दुखद दृश्य देखने को मिलता है।  माता- पिता और भाई- बहन जैसे नजदीकी रिश्ते भी नहीं बचते। एक भाई का परिवार भूखा है और दूसरा रसमलाई खा रहा है, होता है कि नहीं बोले न ...?
    अपने बचपन की बात बताऊँ,  कोलकाता में मेरे एक काफी अमीर रिश्तेदार थें। बड़ी - बड़ी मिठाई की दुकानें रहीं और  बंगला- मोटर भी। परंतु उनकी अपनी बुआ उनकी दुकान पर मिठाई बनने के लिये आये परवल को छिलती और  उसका बीज निकाल कर जीवकोपार्जन करती थीं। बोरी भर भर कर परवल दिन भर छिला करती थीं।  बड़ा ही कठिन कार्य था, उस अवस्था में ...। हाँ , पर थीं स्वाभिमानी । मैंने भी तो अपने सम्पन्न रिश्तेदारों के समक्ष हाथ नहीं फैलाया था।
  फिर भी यह हमारा नैतिक दायित्व है कि आपदा की घड़ी में
हम यदि तन और धन से सहयोग न कर सके, तो मन को तो उन्हें समर्पित करें, जो कष्ट में हैं। पर्व- उत्साव तो फिर आएँगे ,  परंतु औरों की वेदनाओं में अपनी सम्वेदनाओं प्रकट   भावात्मक रुप से ' वसुधैव कुटुम्बकम '  को आत्मसात करने का अवसर सदैव तो नहीं आता।
  मृत्यु के पश्चात जिन भी महापुरुषों को अमरत्व को प्राप्ति हुई है , सभी ने अपने चिन्तन और कर्म से वसुधैव कुटुम्बकम का ही तो अनुसरण किया है..। अन्यथा फिर निदा फ़ाज़ली  के शब्दों में..
    कहां चिराग जलाएं कहां गुलाब रखें
    छतें तो मिलती हैं लेकिन मकां नहीं मिलता
    ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
    ज़बां मिली है मगर हमज़बां नहीं मिलता।

Friday, 19 October 2018

है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर...

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मैं और मेरी तन्हाई के किस्से ताउम्र चलते रहेंगे , जब तक जिगर का यह जख्म विस्फोट कर ऊर्जा न बन जाए , प्रकाश बन अनंत में न समा जाए।
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(बातेंःकुछ अपनी, कुछ जग की)

कल  सुबह अचानक फोन आया ..अंकल!  महिला अस्पताल में पापा ने आपको बुलाया है... दीदी को पापा- मम्मी लेकर गये है...।
    पता चला कि उनकी बिटिया को प्रसव पीड़ा शुरू है। बड़ी पुत्री की पहली डिलेवरी रही , अतः माता- पिता ने सोचा कि गांव के ससुराल से बेहतर सुविधा वे यहाँ मायके में उपलब्ध करवा सकते हैं। पर सरकारी अस्पताल का हाल जगजाहिर है ही, परम स्वतंत्र हैं  यहाँ के मसीहा..।
       यदि बेहतर उपचार चाहिए तो पैसा या फिर जुगाड़ होना ही चाहिए, अन्यथा फिर...?  खैर , नगर विधायक प्रतिनिधि चंद्रांशु गोयल ने सहयोग किया। हमारे पत्रकार साथी सुमित गर्ग भी आ गये। हमें पत्रकार जान डाक्टर और नर्स ने अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन किया और भाई साहब नाना बन गये। यह  शुभ समाचार उन्होंने सबसे पहले मुझे ही फोन पर दी।

       ढ़ाई दशकों की पत्रकारिता के इस सफर में इसी सवाल का जवाब तो तलाश रहा हूँ मैं कि कलयुग के ये भगवान  , ये मसीहा, ये रहनुमा , ये माननीय, ये नौकरशाह  अपने पथ से विचलित क्यों हो गये और जनसेवक की जगह दौलत पुत्र क्यों हो जाते है.. ? सरकारी वेतन, बंगला और गाड़ी सारी सुख सुविधा इन्हें मिलती है फिर भी...।
      अभी पिछले ही महीने की तो बात है , सूबे के एक ताकतवर  मंत्री , जिनकों अपने इस जनपद में विकास की गति को बढ़ाने, जनहित के मुद्दों पर अफसरों की क्लास लेने और साथ ही सरकार की छवि निखारने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, ने इसी महिला चिकित्सालय का निरीक्षण किया। मरीज और उनके तीमारदारों से यहाँ की खामियाँ पूछी, सुविधा शुल्क लिये जाने की शिकायत आई। जिस पर भड़के मंत्री ने आरोपियों को जेल भेजने की बात तक कह दी ,अपने चादर से अधिक पांव बढ़ा कर...। सप्ताह, पखवाड़ा और माह बीत गये , क्यों कोई कार्रवाई नहींं हुई ...?
   इन राजनेताओं की घुड़की का कितना प्रभाव पड़ता है, जनता भी इसे अब समझने लगी है। नयी सड़क गड्ढ़े वाली पर फिसल कर बाइक सवार पिता ने अपने जिगर के टूकड़े को खो दिया। फिर इस भ्रष्टाचार पर किसी माननीय की आँखें नम नहीं हुई, न ही ठेकेदार कठघरे में खड़ा हुआ...?
   याद रखें , राजनेताओं से यह डगर एक दिन जब यही सवाल करता है, तो वे स्वयं जनता की अदालत के कठघरे में होते हैं...।

   बहरहाल, मुझे इस बात की खुशी हुई कि किसी के लिये कम से कम पत्रकार होने के कारण एक नेक कार्य तो कर पाया  मैं...

    नहीं तो दिन अपना खबरों की दुनिया में बितता है और रात दर्द भरी तन्हाई में.. ।  सप्ताह में सातों दिन शाम की रोटी मिलेगी ही, इसकी भी गारंटी नहीं है। मन उदास रहा, बुखार रहा अथवा आलस्य ने घेर लिया, तो पतंजलि के आटे वाले बिस्किट- पानी से ही काम चल जाता है, पर्व पर भी..। भले ही यह शरीर परिस्थितिजन्य किसी तपस्वी सा दुर्बल होता जा रहा हो, फिर भी न मुझे इसकी परवाह है और न कोई है ऐसा इर्द-गिर्द जो तनिक प्रेम जता ठीक समय दो जून की रोटी देता..! हाँ सुबह दलिया अवश्य बना-खा के समाचार संकलन को निकलता हूँ। ऐसे में कभी मेरे पड़ोस में किराएदार रहें ये इस दम्पति से जान पहचान हो गयी थी।
     अन्यथा हम बंजारों का इस दुनियाँ के मेले में कैसा रिश्ता- नाता ..?  जब भी इस रात की तन्हाई में किसी अपने को और अपनी मंजिल को तलाशता हूं, तो इस नगमे के सिवा और कुछ न हाथ लगता है..
एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी
मैं मुड़ा तो साथ-साथ राह मुड़ गयी
हवा के परों पर मेरा आशियाना
मुसाफिर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना..

     नियति का यह कठोर दंड मेरे लिये जेल के उस तन्हाई वाले बैरक की तरह है ,जहाँ कुख्यात कैदियों को रखा जाता है...।
    इस खूबसूरत दुनिया के पिंजरे में तन्हा कैद अनंत को निहार रहा हूँ , फड़फड़ाते हुये ... ऐसे पर्व पर मुक्त होने की चाहत लिये...।
  देखें ना ऐसी कैदियों के भी अपने हैं, जो माह- पखवाड़े,  रविवार को अन्यथा पर्व पर तो निश्चित ही जेल पर आ उनसे मुलाकात कर जाया करते हैं.. दाना - पानी कुछ दे जाया करते हैं.. उनके भी सपने अभी शेष हैं... । यहाँ अपने इस बंद कमरे में भला कौन आएगा , क्यों आएगा और  कैसे आ आएगा...।
  अतः अब तो पर्वों का भी पता, सड़कों पर बढ़ी चहल-पहल से ही चलता है मुझे.. जब सभी अपने परिजनों संग खुशियाँ मना रहे होंगे ... तब यह तन्हाई मुझे एहसास कराती है कि कोई त्योहार है आज, इसीलिये सभी व्यस्त हैं ...  फिर मुझे कौन पूछेगा और क्यों ..?
   खैर मैं और मेरी तन्हाई के किस्से ताउम्र चलते रहेंगे , जब तक जिगर का यह जख्म विस्फोट कर ऊर्जा न बन जाए, प्रकाश बन अनंत में न समा जाए...।
    इस तन्हाई को मैं नकारात्मक शक्ति मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हूँ, यह मेरी चिन्तन शक्ति है..।
     अपनी वेदना को, अपने रूदन को, अपने एकांत को चरम तक पहुँचाने का प्रयास हमें करना होगा,  वैराग्य से नीचे इस जीवन के उलझे मार्ग में हम जैसों के लिये कोई सुख नहीं है, जो अन्य तृष्णा है भी, वह छलावा है, अवरोध है...। यह विजयादशमी पर्व फिर से मुझे इस सत्य को अवगत करा गया.. ।
 यदि हम जैसे लोग गृहस्थ जनों जैसे आनंद की कल्पना करेंगे तो, बार - बार फिसल कर हाथ- पांव चोटिल करते रहेंगे, फिर कौन मरहम पट्टी  करेगा इस मासूम से मन का...
  दिल अपना और दर्द पराया , यदि जब कभी ऐसी स्थिति बने भी तो उसे जनकल्याण को समर्पित कर दें , यही वैराग्य है, सन्यास है..
 मेरा अपना मानना है कि जब तक आत्मज्ञान विकसित नहीं होता  सकारात्मकता की बातें इंद्रजाल जैसी ही लगती हैं, हम जैसों को , भले ही ज्ञान के बाजार में सकारात्मकता सुपर माडल हो...
  साथियों .. !   बुद्ध, भृतहरि,तुलसी और विवेकानंद  जैसे महापुरुषों ने भी  अपनी वेदना को चरम पर पहुँचाने की कोशिश की है, तभी उस ज्ञान प्रकाश को वे प्राप्त कर सके हैं।
   किसी भी तरह की लज्जा की अनुभूति नहीं करों बंधु मेरे, क्यों कि यही रूदन हमें वैराग्य एवं मोक्ष प्रदान करेगा..
  नवजात शिशु ने यदि माँ के गर्भ के बाहर आने पर रूदन नहीं किया तो , क्या उसका जीवन सम्भव है...?
 वहीं, उसके रूदन करते ही इस धरती पर उसके आगमन के स्वागत में खड़े वे अजनबी लोग, जिनसे प्रथम बार उसका संबंध तय हुआ है, देखो न वे आपस में किस तरह से शुभकामनाएं देने लगते हैं।
   संत कबीर ने कितनी अद्भुत बात कही है...

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये |
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये ||

  हमारे तपोभूमि विंध्य क्षेत्र में ऐसे भी साधक नवरात्र पर्व पर आते रहे हैं, जो किसी एकांत स्थल पर किसी आसन में बैठ माँ भगवती के ध्यान में अनंत को निहारते रहते थें और उनके नेत्रों से निरंतर अश्रु टपकते रहते थें। सच तो यह है कि रूदन से नवीन स्फूर्ति, उत्साह और शांति की अनुभूति होती है।  स्मृति एवं वियोग में ही नहीं इष्ट की चाहत में भी हम सिसकते हैं...
 यह सौभाग्य हर किसी को प्राप्त नहीं है। इसमें दिखावट और बनावट जो नहीं है।
  हाँ , यह सत्य है कि जब लौकिक प्रेम से हम वंचित रह जाते हैं, तो अलौकिक सुख की ओर आकृष्ट होते हैं और जबतक इसकी अनुभूति नहीं होती, तबतक रंगीन दुनिया दर्द देती ही रहती है ।  मैं तो ऐसे गीतों के सहारे ऐसे विशेष पर्व पर तन्हाई दूर करने का प्रयत्न करता रहा हूँ..
 
जिन्दगी को बहुत प्यार हमने दिया
मौत से भी मोहब्बत निभायेंगे हम
रोते रोते ज़माने में आये मगर
हँसते हँसते ज़माने से जायेंगे हम
जायेंगे पर किधर है किसे ये खबर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
ज़िन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र...

Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर .. )आज के विशिष्ट लेखों में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन
     

Wednesday, 17 October 2018

जब तक मैंने समझा जीवन क्या है ,जीवन बीत गया...

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रावण का पुतला दहन हम नहीं भूले हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, अनाचार और कुविचार से ग्रसित हो हम स्वयं आदर्श पुरुष का मुखौटा लगाये उसी रावण के सामने खड़े हैं , जिसने सीता को अशोक वाटिका में रखा था, अपने महल में नहीं..
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मैं कहाँ रहूँ मैं कहाँ बसूँ ना ये मुझसे ख़ुश ना वो मुझसे ख़ुश
 मैं ज़मीं की पीठ का बोझ हूँ मैं फ़लक़ के दिल का ग़ुबार हूँ
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ ...

     वेदनाएँ कुछ ऐसी भी होती हैं, जो इंसान को अंदर ही अंदर जला कर राख कर देती हैं। ऐसे में यदि एकाकीपन से भी मित्रता हो जाए तो उस मनुष्य का जीवन मोमबत्ती की आंसुओं की तरह ढुलक ढुलक कर एक दिन समाप्त हो जाता है। आनंद के जो अवसर प्रत्यक्ष है ,उसे छोड़ ऐसे मनुष्य कल्पनाओं एवं स्मृतियों में डूबे रहते हैं और बदले में कुछ न मिल पाता है।
     अजीब सी उलझन है मेरी भी , यही बात हर पर्व- त्योहार पर मैं अपने मासूम दिल को समझाता हूँ कि देखों मित्र जब तन्हाई का साथ मिला है,तो वैराग्य की ओर बस बढ़ते जाओं।  यह मेला - पर्व तुम्हारे लिये नहीं है। तुम्हारा मेला तो कब का पीछे छूट चुका है । बचपन की वो बातें याद कर इस भुलभुलैये में ना रहों कि तुम भी अब सामान्य परिवार  की तरह अपनों संग यह आनंद सुख प्राप्त कर सकोगे। देखों तो बाजार में कितनी चहल पहल है। युवा हो या प्रौढ़ अथवा वृद्ध ही क्यों न हो, ये दम्पति किस तरह से मधुर वार्तालाप करते हुये इस उत्सव को महसूस कर रहे हैं। मेले में बच्चों संग इस तरह से सुशोभित हैं, मानों  शंकर- पार्वती का परिवार हो।
   परंतु तुम मेले में जाकर क्या करोगे..? यहाँ तुम्हारे संग कोई न होगा अपना , स्मृतियों के अतिरिक्त तुम्हारा... व्यर्थ न  संताप करों।
    फिर भी वह मानने को भला कब तैयार होता है। दिल के उन जख्मों का भला कौन इलाज है ,जो अपनों ने दिये हैं। धीरे-धीरे कर के दिन, महीने और वर्ष गुजर रहे हैं। वर्ष 1994 में जब इस जनपद में आया था, तो इन आँखों में एक चमक थी और आज एक बंद कमरे में पड़ा अतीत से पीछा छुड़ाने के लिये हर सम्भव प्रयत्न कर रहा हूँ , पर मेरे सिर पर रखी यादों की यह पोटली इतनी भारी हो चुकी है कि न स्वयं इसे उतार पाने में समर्थ हूँ, न ही कोई मनमीत है जो इस बोझ में हिस्सेदार बन जाए...
    इसे साथ लेकर ही मुझे तब तक बस चलते जाना है, जब तक सांसें न थम जाएँ।  फिर भी पथिक यह उम्मीद खुद से लगाये हुये है कि वह संत सा बन जाए..  !  उपहास भी कर सकते हैं आप मुझपर कि कैसा बावला इंसान है यह भी ... !!
   पर मित्र उलझनें भी तो राह दिखलाती हैं। वह हमें बुद्ध, तुलसी और भृतहरि भी बनाती हैं । सो, क्यों न अपनी ही इन उदास अंधेरी रातों में कुछ ऐसा ढूंढने की कोशिश हो, जो औरों के लिये नूर बन जाए और हम कोहिनूर ...
     यदि जिगर पर यह चोट न होती , तो आज इतनी चिन्तन शक्ति कहाँ से पाता मैं । कुछ अपनी, तो कुछ औरों की सोचने का भला वक्त रहता क्या मेरे पास ऐसे खुशियों भरे पर्व पर ..?  गृहस्थी की गाड़ी  कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी होती। दशहरा, दीवाली और होली पर नये वस्त्र पहने तो वर्षों क्या दशकों बीत गये  एवं पकवान से भी रिश्ता ऐसे खास त्योहारों पर टूट चुका है।
  कोलकाता का वह बचपन, बनारस का छात्र जीवन और मीरजापुर का जीवन संघर्ष सब कब का पीछे छूट चुका है। इस दुनिया के मेले में भटकता रह मन कभी यूँ ही बहकी- बहकी बातें करता है..

एक ख़्वाब सा देखा था हमने
जब आँख खुली वो टूट गया
 ये प्यार अगर सपना बनकर
तड़पाये कभी तो मत रोना
 हम छोड़ चले हैं महफ़िल को
याद आये कभी तो मत रोना...

  मन के इस अंधकार को मिटाने के लिये अपनी चिन्तन शक्ति को दीपक बनाने की कोशिश में बार-बार उसकी अग्नि से चित्त की शांति को झुलसाने की आदत सी पड़ गयी है मेरी । फिर भी एक लाभ यह तो है ही कि आवारागर्दी से जो बचा रहता हूँ , दिखावे से बचा रहता हूँ और झूठ से भी.. भद्रजन कहलाने के लिये किसी मुखौटे की मुझे जरुरत नहीं.. यह समाज जानता है कि मुझे उससे अब और कुछ नहीं चाहिए.. जो दर्द मिला है , वह मेरी लेखनी में समा गया है.. वहीं मेरी पहचान है, वही मेरा ज्ञान है, भगवान है..?
  उसी से तो यह विचार मंथन जारी है कि हम सिर्फ अपने लिये क्यों जीते हैं ..? सुबह से रात तक बस अपना ही अपना लगाये रहते हैं..
  देखें न  इन बड़े बड़े दुर्गा पंडालों में कितनी तेज आवाज में देवी जी के गीत बज रहे हैं। मेरे पड़ोस में भद्रजनों के डांडिया रास  के लिये अत्यधिक तेज आवाज में देर रात तक डीजे भी बज रहा है। आयोजकों ने तनिक भी नहीं सोचा है कि अस्वस्थ वृद्ध जनों को इससे परेशानी होगी। मेरे दोस्त यह जो अपनी मनमानी कर रहे हो न , एक दिन तुम्हें भी कोई अपना नहींं  समझेगा.. इसमें तनिक भी संदेह न समझना..

  और इन पंडालों में आकर्षक विद्युत उपकरणों की सजावट को देख कर एक और विचार मेरे मन में आता रहा  है हर वर्ष कि काश ! यह चकाचौंध भरी रोशनी जो सीमित क्षेत्र में है, उसका विस्तार हो जाता तो कितना अच्छा होता...?  जिस खुशी में हर किसी के लिए कोई जगह होता, तो कितना अच्छा होता । हम बंजारे तो कुछ ऐसा ही चाहेंगे न कि इस रंगीन दुनिया में हमारे लिये भी कोई जगह होता , तो कितना अच्छा होता। अपना यह मीरजापुर छोटा शहर है , तब भी एक - एक दुर्गा पंडाल पर कई लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। महानगरों की बात पूछे ही मत। मैं यहाँ बंगाल की नहीं हिन्दी भाषी क्षेत्रों की बात कर  रहा हूँ। तीन - चार दिन के मेले में करोड़ों रुपये  दुर्गा पूजा पर खर्च हो जाते हैं..
  क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि इन्हीं पैसों से ये आयोजक गरीब बच्चों के चहरे पर थोड़ी सी मुस्कान लाते...?  अनाथालयों में जाकर कुछ नये कपड़े और मिठाइयाँ बांट आते.. किसी के परिवार में कोई गंभीर रोग से पीड़ित है, तो उसका उपचार करवा देतें.. नहीं तो दो- चार निर्धन कन्याओं के हाथ ही पीली करवा देते...किसी निर्धन नौजवान की प्रतिभा को कुंठित होने से रोक भी सकते थें न..
    मैं भी न यह कैसा मूर्खतापूर्ण सवाल कर उठा हूँ। ऐसा भी भला सम्भव है क्या कि जगत जननी का पूजन सामान्य तरीके से कर उसी धन का उपयोग जनकल्याण में किया जाए..?
   सैकड़ों वर्ष पुरानी हमारी रामलीला विलाप कर रही है। कितनी तैयारी होती थी रामलीला को लेकर । पात्रों का चयन , उन्हें सम्वाद रटाना, सभी पात्रों के लिये वस्त्र आदि की व्यवस्था, किस तरह से भीड़ लगती थी राम लीला स्थल पर । दादी का हाथ थामें हम भाई -बहन भी देखने जाया करते थें। तरह - तरह के मुखौटे खरीद लाते थें । तीर- धनुष, तलवार और गदा लिये ललकार लगाते थें। जो अपनी संस्कृति थी , वह धूल में मिल रही । हाँ , रावण का पुतला दहन हम नहीं भूले हैं। लेकिन, भ्रष्टाचार, अनाचार और कुविचार से ग्रसित आदर्श पुरुष  का मुखौटा लगाये हम स्वयं  उसी रावण के सामने खड़े हैं। जिसने सीता को अशोक वाटिका में रखा था, अपने महल में नहीं, यह भी सत्य है कि रावण कभी अकेले सीता से मुलाकात तक को नहीं गया था। जब हममें रामत्व है ही नहीं, तो किस अधिकार से महापंडित उस रावण का पुतला हम जलाते हैं..?  असली रावण तो हमारे अंदर ही है , घर - घर रावण है, फिर काहे का पुतला जला रहे हो..??
   पहले राम तो बना जाए .. अयोध्या के राज महल से निकलने के बाद राम ने दलित, शोषित, पीड़ित वर्ग के लिये कितने ही कार्य किये । उन जनकल्याण के कार्यों ने उन्हें वह सामर्थ्य दिया कि त्रिलोक विजेता  रावण का वध कर सकें । आज हम जनहित के एक भी कार्य किये बिना ही दशहरा मना रहे हैं। जरा विचार करें आप भी इसपर..?

  खैर, अपना तो यह जीवन सफर यूँ  ही बीत गया। हर चाहत मुझे और तन्हा कर गयी...

खुशियों के हर फूल से मैंने
ग़म का हार पिरोया
प्यार तमन्ना थी जीवन की
प्यार को पा के खोया
अपनों से खुद तोड़के नाता
अपनेपन को रोया
जब तक मैंने समझा अपना क्या है
सपना टूट गया
जब तक मैंने समझा जीवन क्या है
जीवन बीत गया...