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Wednesday, 6 March 2019

दर्द नया दे चल दिये !

दर्द नया दे चल दिये !
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जिन्हें   मीत समझा
अजनबी बनाके चल दिये
  दिल के फिर टुकड़े हुये
दर्द नया दे चल दिये !

रंग भरने की न सोच
  जल जाएगी ज़िंदगी
ताउम्र किसीकी याद में
  कटती कहाँ ये ज़िंदगी ?

मयख़ाने तो हैं अनेक
  साक़ी     मिला ना  कोई
जाम जो ऐसा दे पिला
नशा हो न फिर कोई !

ज़ख्मी दिल से ना पूछ
  नादानी तेरी किसने सही
ज़ुबां पे न उफ़ किसीकी
 बेगाना बना के चल दिये

यतीमों को ठिकाना कहाँ
  क़ब्र तक   पनाह देती नहीं
आशियाना एक दिल में था
नापाक़ बता के चल दिए  !!!!!

           -व्याकुल पथिक

Sunday, 3 March 2019

कल रहे ना रहे हम..

   
स्वास्थ्य संबंधित परेशानी से कुछ दिनों के लिये मैं ब्लॉग जगत से दूर जा रहा हूँ। रेणु दी के स्नेह के कारण मैं इस योग्य बन सका कि अपनी भावनाओं को शब्द दे सकूँ। उन्होंने मेरी नकरात्मक लेखनी की भी सराहना की। वैसे अन्य वरिष्ठजनों का आशीर्वाद भी मिलता रहा। परंतु तबीयत अचानक अधिक बिगड़ गयी है। अतः कुछ लिखने और पढ़ने में असमर्थ हूँ।
   सभी स्नेहीजनों को पुनः प्रणाम कर रहा हूँ। ब्लॉग पर आना मेरे लिये एक अलग तरह की अनुभूति रही। इतना स्नेह और सम्मान मिलेगा ,इसकी कल्पना नहीं की थी। 

Saturday, 2 March 2019

है अभिशाप ये कैसा !

है अभिशाप ये कैसा !
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वो आश्रम की बातें,न सपने थें झूठे;
कहाँ भूल बैठा, रे पथिक तू बेचारा !

निर्मल सा मन था,वो सुंदर सा काया;
मिटा खाक में सब  , हुआ तू पराया।

भटकती जवानी थी, है कैसे गुजारी;
लूटे अरमानों को,न सजाया-संवारा।

 वो ज्ञान की बातें,थी अमृत सी धारा;
 कहाँ भूल बैठा ,  वो वैराग्य तुम्हारा।

थी वृक्षों की छाया, था कुएँ का पानी;
छूटा देशअपना,न मिला कोई ठिकाना।

वो पादुका की खटखट,मौनथी वाणी;
कहाँ भूल बैठा, वो श्वेत वस्त्र तुम्हारा।

था गुरु ने पुकारा , मिला जब सहारा;
है यादें वो पुरानी ,जो संकल्प तुम्हारा।

वो कर्मपथ तुम्हारा,वो धर्मपथ तुम्हारा;
 कहाँ भूल बैठा , वो सत्यपथ तुम्हारा।

वो ग्रंथों की बातें ,थी संतों की वाणी;
कहाँ भूल बैठा , वह मौन की भाषा

वो कांति तुम्हारी , वो शांति तुम्हारी;
कहाँ भूल बैठा , रे पथिक तू बेचारा !

वो चौखट पुकारे,वो आश्रम की रोटी
कहाँ भूल बैठा , वो  गुरूमंत्र तुम्हारा

ठठरी सी  काया , है अकथ कहानी;
जला तू दीपक ,बुझा मन की वाणी।

बटोही तेरा दर्द  , किसी ने न  जाना;
अभिशप्त-सा जीवन,न कोई ठिकाना।

पथ में मिले जो , वो झूठे थें साथी ;       
जला मनकी होली,है मरघट पे जाना।

पाषाण बना क्यों, अहिल्या हो जैसे;
वैदेही सा फिर तू , न धरा में समाना।

तेरे स्नेह का मोल , किसने है जाना ?
क्यों भटक रहा ,रे पथिक तू दीवाना।

चढ़ा प्रत्यंचा तू , है वीरगति पाना ;
शापित था जीवन, कर्ण को है जाना।

अभिशाप ये कैसा,क्यों दंड तूने पाया;
नियति से ना पूछ, छोड़ उसकी छाया।

                 - व्याकुल पथिक

Friday, 1 March 2019

ऐ मेरे उदास मन..

 ऐ मेरे उदास मन..
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    अभिशापित व्यक्ति के जीवन में भला खुशियाँ आ भी कहाँ सकती है। उसे तो भयावह शाप, बददुआ और लांछन  को सहते हुये ही अपना जीवन चक्र पूरा करना है।एक तरह उदासी उसके मुखमंडल पर सदैव छायी रहती है।
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ऐ मेरे उदास मन
चल दोनों कहीं दूर चले
मेरे हमदम तेरी मंज़िल
ये नहीं ये नहीं कोई और है..

  अभिशापित व्यक्ति के जीवन में भला खुशियाँ आ भी कहाँ सकती है। उसे तो भयावह शाप, बददुआ और लांछन  को सहते हुये ही अपना जीवन चक्र पूरा करना है।एक तरह उदासी उसके मुखमंडल पर सदैव छायी रहती है। वह कर्मपथ पर चलता अवश्य है , परंतु परिणाम तय रहता है, उसे मंज़िल नहीं मिलती है। वह अपने हृदय को सदैव यहीं समझाता रह जाता है ताउम्र-

इस बगिया का हर फूल देता है चुभन काँटों की
सपने हो जाते हैं धूल क्या बात करे सपनों की
मेरे साथी तेरी दुनियाँ
ये नहीं ये नहीं कोई और है
ऐ मेरे उदास मन ...

     मिथ्या दोषारोपण कभी- कभी मृत्युदंड से भी अधिक पीड़ादायक होता है। धर्मग्रंथों में देखें तो तीन ऐसे प्रमुख पात्र अहिल्या, सीता और कर्ण रहे हैं , जिन्हें इस कष्ट को सहन करना पड़ा। अहिल्या पाषाण बन गयी, जब यौवन ढल गया तो वृद्धावस्था में अयोध्या के राजकुमार राम ने उसका सम्मान वापस किया, फिर उसके जीवन में कैसा आनंद ? सीता पर दो बार लांछन लगा। पहली बार तो उन्होंने अग्निपरीक्षा दी , परंतु दूसरी बार जब एक नारी का सम्मान आहत हुआ तब उन्होंने उस राज्य और राजा दोनों का परित्याग कर दिया। अभिशापित जीवन से मुक्ति पाने के लिये सीता पृथ्वी की गोद में समा गयीं। वहीं अभिशापित जीवन के बावजूद कर्ण ने संघर्ष किया। मृत्यु से पूर्व अपने सामर्थ्य से सम्पूर्ण जगत, यहाँ तक कि सर्वसमर्थ कृष्ण को भी अचम्भित किया। परंतु अभिशापित था वह , अतः विजय के स्थान पर वीरगति को प्राप्त हुआ। सर्वश्रेष्ठ योद्धा होकर भी वह इस सम्मान से वंचित रह जाता है।

 अभिशप्त -सा जीवन जिस व्यक्ति का हो। जिसके स्नेह का का कोई मोल नहीं हो । जो अहिल्या की तरह पथरा गया हो। सीता की तरह जिसकी पावनता निर्रथक हो । उस कर्ण की तरह जिसके नम नेत्रों से किसी का भी हृदय न पिघले, उसे यह वेदना सदैव सहनी पड़ती -

जाने मुझ से हुई क्या भूल जिसे भूल सका न कोई
पछतावे के आँसू मेरे आँख भले ही रोये
ओ रे पगले तेरा अपना
ये नहीं ये नहीं कोई और है
ऐ मेरे उदास मन ...

   यही अभिशाप है। कृष्ण द्वारा शापित अश्वत्थामा जैसा कोई भी कुकृत्य इन तीनों ही का नहीं था, फिर भी नियति का यह  कैसा अन्याय ?
   समसामयिक विषय पर कहूँ , तो पाकिस्तान हमारे देश के लिये अभिशाप ही है। भारत ने सदैव उसे छोटे भाई सा सम्मान देने का प्रयास किया, फिर भी वह आतंकवाद का पोषक बन स्थाई रूप से पीड़ा देता आ रहा है। यही नहीं वह सम्पूर्ण विश्व और मानवता के लिये खतरा बन गया है। उसे दंडित करने के लिये भी किसी कृष्ण की आवश्यकता है, ताकि अश्वत्थामा सा वह भी मानव समाज के लिये घृणा का पात्र बने और अपने ललाट पर बदनुमा दाग लिये उस कष्ट की अनुभूति करे , जो आतंकवाद के माध्यम से मानवता को देते आ रहा है।

   अभिशप्त जीवन बड़ा ही कष्टकारी होता है। पथिक भी अपने इस एकाकी जीवन में  कोलकाता में माँ ( नानी) और काशी में गुरु द्वारा दुखी मन से कही गयी उस वाणी को कभी नहीं भुला पाता, यद्यपि उन्होंने उसे दंडित करने के लिये उन शब्दों का प्रयोग नहीं किया था। वे तो उससे स्नेह करते थें,  मार्गदर्शक थें। लेकिन, यतीमों जैसे अपने जीवन से जब भी वह विचलित हो जाता है, उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारती है कि उसने अपने बाल्यावस्था में ऐसी शरारत क्यों की थी कि उसकी माँ को यह कहना पड़ा कि जब वे नहीं रहेंगी ,तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने प्रथम और अंतिम बार ऐसे कठोर शब्द कहें। जाहिर है कि उनकी मृत्यु के बाद से ही वह बालक पथिक बन भटक रहा है, अस्वस्थ तन- मन लिये, अभिशापित सा ? वहीं आश्रम जब वह छोड़ रहा था,तो गुरु ने कहा था कि जा रहा है ,लेकिन याद रख कि माया की यह नगरी तेरे लिये कल्याणकारी न होगी। इसके बाद उसने जब भी स्नेह की दुनिया में प्रवेश करना चाहा, ठोकर लगी और सभी ने दरवाजे बंद कर लिये। पथिक वापस आश्रम में जाना चाहता है ,परंतु तन- मन जर्जर है। गुरु के ज्ञान का प्रकाश विलुप्त हो चुका है। उसका जीवन अभिशापित जैसा ही है, मुक्ति पथ पर बढ़ा जा रहा है,उसकी वेदना उनके लिये उपहास एवं उपेक्षा से अधिक कुछ भी नहीं रही , जिनसे उसे स्नेह रहा है । अतः उसका मन जब भी बेचैन होता है,मान -अभिमान फिल्म का यह गीत , उसके नेत्रों की नमी को पिघलने नहीं देता है-


पत्थर भी कभी इक दिन देखा है पिघल जाते हैं
बन जाते हैं शीतल नीर झरनों में बदल जाते हैं
तेरी पीड़ा से जो पिघले
ये नहीं ये नहीं कोई और है
ऐ मेरे उदास मन ...

    यह वेदना और यह अभिशाप ही यदि नियति है ,तो भी कर्ण की तरह अपने पराक्रम का  प्रदर्शन करते हुये अग्निपथ की ओर बढ़ते जाना है।

Wednesday, 27 February 2019

है लहराया तिरंगा



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है लहराया तिरंगा,होरही पुष्प वर्षा
मनाते दिखे सब , होली -दीवाली

मुखरित हुआ मौन, सिंहनाद भारी
माँ भारती के वीरों की हुंकार भारी

ये वक्त हमारा है, वो गर्दिश तुम्हारी
ये आसमां हमारा , वो कब्र तुम्हारी

ये होली हमारी है, वो लहू  तुम्हारा
ये गोली हमारी है, वो लाशें तुम्हारी

शहीदों की माताएँ , कहें सीना ताने
है बढ़े जो कदम तेरे , पीछे न लाना

प्रतिशोध की ज्वाला  ,यूँ न बुझाना
मिटा  दुश्मनों को, वीर लौट आना

शहीदों की विधवाएँ, कहें भैया मेरे
हैं फड़कती भुजाएँ, उठा ले तिरंगा

टूटी चूड़ियों की है सौगंध,तू सुन ले
दुश्मन जो ताके, मिटा उनकी लंका

दिखा पराक्रम आज, जयकार भारी
नभ से पुकारे कोई, वीर भारतवासी

शहीदों की मुस्कान,जुबां पे है वाणी
जला रे तू दीपक,अब हमें दे सलामी

                .         -व्याकुल पथिक

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हम तुम्हें मारेंगे  और जरूर मारेंगे
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 भारत द्वारा सीमा पार आतंकी शिविरों पर की गई बमबारी और भारी संख्या में आतंकवादियों को मार गिराने की खबर से देश का हर नागरिक  गर्व से  सीना  फुलाए है। सौदागर फिल्म में  राजकुमार का वो डायलॉग  "हम तुम्हें मारेंगे  और जरूर मारेंगे, पर  वह बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी और वक्त भी हमारा होगा , बस जमीन तुम्हारी होगी "  युवा वर्ग की जुबां पर है। वहीं वरिष्ठ लोग "जय हिंद जय हिंद की सेना" इस उद्घोष के साथ भारत माता के वीर जवानों को सलाम कर रहे हैं।
   भारी उत्साह का माहौल है । होली और दीपावली दोनों ही सड़कों पर उतर कर यहां की जनता मना रही है। एयर सर्जिकल स्ट्राइक- 2 के बाद से जनमानस में यह भावना जगी है कि हमारी सरकार ,हमारे जवान अब शत्रुओं को उन्हीं की भाषा में उत्तर देने में कोताही नहीं करेंगे । 14 फरवरी को जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमले में मारे गए जवानों की तेरही पर हमारी सेना ने जो सफल कार्रवाई की है, वह इन शहीदों के प्रति सबसे बड़ी सच्ची श्रद्धांजलि है। अन्यथा जुबानी ललकार तो वर्षों से हमारे राजनेताओं की भाषा रही है ।जिसे सियासत से अधिक और कुछ भी नहीं जानता समझ रही थी,  परंतु अब यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह कहते हैं, " मैं देश नहीं रूकने दूंगा-मैं देश के लिए नहीं झुकने दूंगा" या फिर यह कहते हैं "खुद से बड़ा दल ,दल से बड़ा देश" , तो फिर उनकी बातों में वजन है इतना तो कहा ही जा सकता है। भले ही सियासी चश्मे से इसे विभिन्न राजनैतिक दलों के लोग देखते हो ,परंतु यह जश्न का समय है और अपनी सेना की ताकत पर ,उसकी सफल ऑपरेशन पर और उसके सम्मान में जितने भी राजनेता हैं, सभी को एक मंच पर खड़े होकर ताली बजाना चाहिए। जो ऐसा नहीं करता है, वह इस राष्ट्र में जयचंद से अधिक कुछ भी नहीं है। ऐसे लोगों की पहचान यदि समय-समय पर होती रहती तो आज यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती। ऐसे अलगाववादी तत्वों को राजनैतिक संरक्षण देने के कारण ही आतंकवादियों को अपने रास्ते में शरण देने वालों का मनोबल बड़ा है। परंतु इस सर्जिकल स्ट्राइक टू से अब आतंकवादियों के रहनुमाओं को समझ में कुछ तो आया ही होगा कि हमारी सरकार और हमारी सेना बड़ी कार्रवाई के लिए तत्पर है और वह किसी कूटनीति के चक्रव्यू में उलझने वाली नहीं है सेना का मनोबल इससे बड़ा होगा और शत्रुओं को यह समझ में आ गया होगा कि दरबे में छिपकर बैठने और मौका मिलते ही कायरों की तरह घात लगाकर हमला करने का उनका नापाक खेल अब उनपर ही भारी पड़ेगा । देश की सुरक्षा के लिए मां भारती के लाल अब सीमा उस पार घुस कर भी उन्हें कब्र में सुला सकते हैं ।जैसा कि उन्होंने 26 फरवरी को किया ।भारतीय लड़ाकू विमानों ने जिस तरह से अपना पराक्रम पाकिस्तान की सीमा में घुस कर दिखाया और अपना ऑपरेशन पूरा कर वे वापस अपने वतन को लौट आये ,उससे शत्रुओं का दहल जाना और वहां के राजनेताओं का उल जलूल बयान देना दोनों ही परिस्थितियां पाकिस्तान के प्रतिकूल है। विशेषकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के लिए कल जहां पाकिस्तान के रहनुमाओं के विरुद्ध सेम- सेम का नारा लग रहा था तो वहीं अपने देश में भारत माता की जय और मोदी जिंदाबाद का उद्घोष चहुंओर सुनने को मिला। और ऐसा हो भी क्यों ना क्योंकि आतंकवादियों की घिनौनी हरकतों और बिना लड़े ली भारतीय जवानों के इस तरह से मारे जाने को लेकर जनता में वर्षों से आक्रोश रहा। राष्ट्र के प्रति समर्पित हर नागरिक जो स्वयं को भारत माता का संतान समझता है, उसकी एक ही इच्छा थी कि शत्रुओं को उसकी धरती पर सबक सिखाया जाए ।युद्ध का परिणाम भले ही विनाशकारी हो, विध्वंस कारी हो और सभ्य समाज को कटघरे में खड़ा करता हो।  लेकिन यह भी सत्य है कि बिना बलिदान के , बिना युद्ध के, बिना रक्तपात के शांति की स्थापना कहाँ हो पाती है।

Monday, 25 February 2019

याचना नहीं अब रण हो



वीर शहीदों को श्रद्धांजलि के बाद
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  रामधारी सिंह "दिनकर" की वीर रस से भरी एक रचना की इन पंक्तियों-

‘हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा...

      ...को साकार करने की मंशा लिये  आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों के प्रति राष्ट्रीय और उसके नागरिकों ने विभिन्न आयोजनों के माध्यम से अपना श्रद्धा सुमन अर्पित किया । प्रबुद्ध वर्ग से लेकर साधारण तबक़ा तक ऐसे कार्यक्रमों को करते दिखा। जिससे लगा कि सचमुच हमारे सैनिकों की इस शहादत से हमारी सुप्त संवेदना , हमारी भ्रष्ट व्यवस्था , हमारे जुगाड़ तंत्र, हमारी राजनीति और रहनुमाओं की सोच में बड़ा परिवर्तन आने वाला है। आतंकवाद का पुतला दहन और पाकिस्तान मुर्दाबाद जैसे नारे लगाते लोगों को इस प्रकार से गली -सड़कों पर उतरते मैंने पहले कभी नहीं देखा था। बड़ों की बात छोड़ें,  नासमझ बच्चों का समूह 'मुर्दाबाद-मुर्दाबाद' कहते हुए हाथ में पुतला लिए गलियों में घूम रहा था । सभी की इच्छा यह रही कि आतंकवादियों और उनके संरक्षक को सबक़ सिखाने का समय आ गया है । अब भी अधिकांश लोग यह कहते मिल रहे हैं कि हमारी केंद्र सरकार निश्चित ही इन जवानों की हत्या का प्रतिकार लेगी। जब समझौता का कोई भी विकल्प शेष न हो तो युद्ध का शंखनाद कोई उन्माद नहीं है।  अन्यथा योगेश्वर कृष्ण महाभारत युद्ध होने ही न देते । 
    जब दुर्जनों को प्रेम की भाषा समझ में न आए, उसे यह लगे कि अहिंसा की बात करने वाले मूर्ख हैंं,कमजोर हैंं , बुज़दिल हैं और समझौते का आखिरी मार्ग भी बंद हो जाए तो फिर योगेश्वर कृष्ण द्वारा प्रदत्त 'ज्ञान गीता' रूपी रथ पर सवार हो अर्जुन बन हमें भी शस्त्र उठाना होगा। आरम्भिक परिणाम चाहे जो भी हो ,परंतु विजय सत्य की ही अंततः होती है।

आखिरी रास्ता
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   हमारे राजनेताओं का नज़रिया भले ही सियासत से जुड़ा हो। लेकिन , इस वोट बैंक की राजनीति से देश की रक्षा और उसके मान, सम्मान और स्वाभिमान की सुरक्षा संभव नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री द्वय लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने  युद्ध के आमंत्रण को स्वीकार किया और इसीलिये आज भी इन्हें राष्ट्र याद करता है। परिस्थितियाँँ चाहे जितनी भी कठिन हो, अंतरराष्ट्रीय दबाव जो भी हो,  लेकिन युद्ध जब आवश्यक है तो फिर उस महायुद्ध के लिए कमर कस कर तैयार हो जाना चाहिए और इन परिस्थितियों में विपक्ष में चाहे जो भी राजनीतिक पार्टी हो उसे सत्ता पक्ष का समर्थन करना चाहिए । इंदिरा गाँँधी के बाद हमने छद्म युद्ध कला भुला दी।  जिसका परिणाम है कि आतंकवादी बाहर के भी हैं और घर के भी..., इंदिरा गांधी स्वयं भी घर के आतंकवाद का शिकार हुई थीं। राजनीति में जब भी हम अपने स्वार्थ में अराजक तत्वों के साथ क़दमताल करेंगे तो उसका परिणाम हमें और हमारे राष्ट्र को भी निश्चित भुगतना पड़ेगा । जैसा कि पाकिस्तान स्वयं भी भुगत रहा है और वहाँँ के रहनुमाओं को अपनी सत्ता बचाने के लिए और सेना को खुश रखने के लिए सर्प रूपी ऐसे अराजक तत्वों को दूध पिलाते रहना होगा,  क्यों कि स्थिति उनके हाथ से निकल चुकी है। भारत के प्रति विद्वेष की राजनीति पर उनकी सत्ता टिकी हुई है।

मातमी चोले से करें तौबा
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   यह कैसी विचित्र विडंबना है हम भारतीयों की भी कि अभी कुछ दिनों पूर्व राष्ट्र के वे नागरिक , जो जवानों की हत्या पर आतंकवादियों और पाकिस्तान के विरुद्ध आग उगल रहे थे। शोक संवेदना का मातमी पर्व- सा माहौल पूरे भारत में बना हुआ था। यह सब देख कर पत्रकार से कहीं अधिक एक नागरिक के रूप में मैं भी इस उम्मीद से उत्साहित था कि क्या सचमुच 'व्यवस्था' में एक बड़ा परिवर्तन इस घटना के बाद हो रहा है? क्या अब लोग पहले से अधिक संवेदनशील हो रहे हैं ? क्या  हमारे नेता धनबल , जातिबल और बाहुबल की राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय के प्रति सच्चे हृदय से स्वयं को समर्पित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं ?
    काश !  ऐसा होता तो कितना सुखद होता है।  इन वीर जवानों के बलिदान पर  इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या होती कि हम एक संवेदनशील भारतवासी बन गए होतें ,परंतु एक संदेह यूँ कहें कि वेदना इस दौरान और भी हृदय में गहरा गई  कि अनेक लोग जो कि दिन में पुतला दहन कर रहे थे, वे शाम ढलते ही विभिन्न मांगलिक आयोजनों में डीजे पर थिरकते दिखेंं। मदिरालयों में भीड़ उमड़ी हुई थी।  और मैंने यह भी देखा कि पुतला दहन जुलूस के साथ सेल्फी लेने वाले युवकों की टोली भी थी, जिनकी आँखों में पानी नहीं था , वे तो अपने कार्यक्रमों के हर दृश्य की वीडियो ग्राफी कर सोशल मीडिया को गुलजार कर रहे थे । वे जुलूस के आगे खड़ा होकर सेल्फी ले रहे थे। 
      इतनी बड़ी घटना के बाद यदि वैवाहिक समारोह में डीजे नहीं बजता तो क्या विवाह बारात की भव्यता में कमी आ जाती ? सुबह तक उपदेशक की भूमिका में जो थे, वे शाम को " आज मेरे यार की शादी है " जैसे गीत पर  ठुमके लगाते मिले। तेज आवाज़ वाले वाद्य यंत्रों पर थिरकते ऐसे नादान लोगों को इतना भी समझ नहीं है कि पड़ोस में कोई व्यक्ति बीमार है, कोई बच्चा परीक्षा की तैयारी में जुटा है, किसी के घर का चिराग़ बुझ जाने से वहाँ मातम का माहौल है । वाद्ययंत्रों और पटाखों की तेज आवाज़ से हृदय रोग से पीड़ित बुजुर्ग लोगों का बुरा हाल है । तो फिर ऐसे तथाकथित देशभक्त शहीदों को खाक श्रद्धांजलि देंगे ? सो,अच्छा तो यही होता कि हमारी असंवेदनशील आँखें पूर्व की भांति वैसी ही पथराई रहतींं , उनमें ऐसी नमी किस काम की है ? कथनी- करनी का  फ़र्क परिवार , समाज एवं राष्ट्र के लिए अत्यधिक पीड़ादायक और हानिकारक है।  ऐसे महाशय जो सुबह मातमी चादर लपेटे  दिखते हैं, शाम होते ही रंग क्यों बदल लेते हैं ? इनकी संवेदना किस तरह के बलिदान से जगेगी ? यह तब भी यक्ष प्रश्न था और अब भी है । समय के साथ यह और भी गहराते जा रहा है।

पुकार रहा कर्मपथ
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  हमारी सुरक्षा व्यवस्था , हमारी खुफिया व्यवस्था और हमारी पुलिस की कार्यप्रणाली कितनी कमजोर है । इसका एक उदाहरण अपने मिर्ज़ापुर मंडल का भदोही जनपद रहा। जहाँ  गत शनिवार को एक मकान में भीषण विस्फोट हुआ था। यह घटना अत्यंत भयावह थी। उस मकान में रहने वाले एक दर्जन से अधिक लोगों की मृत्यु हो गयी। बताया जाता है कि पटाखा बनाने के लिए भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री यहाँ रखी गयी थी । पुलिस प्रशासन द्वारा इस अवैध पटाखा फैक्ट्री की अनदेखी किये जाने का मामला गरमाने लगा तो आलाअफ़सरों ने अपने ही महकमे के कतिपय प्यादों पर दांव खेल अपनी कुर्सी बचा ली।  हर बड़ी घटनाओं में उनके द्वारा कुछ इसी तरह से से मातहतों को शहीद किया जाता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पूर्व पटना के गांधी मैदान में आयोजित उनकी रैली के दौरान जो बम ब्लास्ट हुआ था। उसमें प्रयुक्त बम हमारे मिर्ज़ापुर नगर में बने थे। बाद में जब इसका खुलासा हुआ , तो यहाँ  से भी कुछ युवकों को उठाकर सुरक्षा जाँच ऐजेंसी की टीम ले गई थी । जरा विचार करें कि जनपद स्तर पर  हमारा सुरक्षा तंत्र और ख़ुफ़िया महकमा कितना कमजोर है , परंतु क्या हम नागरिकों का यह दायित्व नहीं है कि पड़ोस में यदि मौत का सामान बन रहा हो तो इसकी जानकारी हमारे माध्यम से शासन-प्रशासन तक पहुँच जाए ? मैं तो सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि जाति और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर   देश के हर नागरिक का यह नैतिक कर्तव्य है कि ऐसे अराजकता तत्वों पर, ऐसे संदिग्ध लोगों पर दृष्टि रखी जाए ? यही हमारा धर्मपथ और कर्मपथ भी है। कभी-कभी माँ भारती के इस पवित्र कार्य के लिए रक्तदान भी करना पड़ सकता है,इन शहीद जवानों की  तरह-

कर्मपथ पर सीना ताने,
 वीर जवान चल दिये,
माँ भारती के थे  दुलारे,
 धर्मपथ पर चल दिये।

-व्याकुल पथिक

Saturday, 23 February 2019

तुम आओ न..

तुम आओ न..
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दर्द ये पिघल जाए
दिल जो बहल जाए
स्वप्न  फिर संवर जाए
तुम आओ न..

सोच ये बदल जाए
मीत  जो  मिल जाए
गीत  कोई  नया  गाए
तुम आओ न..

रंग ये निखर जाए
संग जो  तेरा पाए
पुष्प फिर खिल जाए
तुम आओ न..

दिन ये चमक जाए
शाम  जो बहक जाए
बेक़रार हमें कर जाए
तुम आओ न..

नयन ये मुस्काए
बदन जो सिहर जाए
मिलन  फिर हो जाए
तुम आओ न..

चमन ये महक जाए
बागवां जो मिल जाए
सुंगध फिर  बिखर जाए
तुम आओ न..

राह ये दिखा जाए
चैन  जो  हमें आए
हम किसी के हो जाए
तुम आओ न..

यादें ये रुला जाए
आंगन जो सूना पाए
किस्मत नहीं बदल पाए
तुम आओ न..

       -व्याकुल पथिक

Thursday, 21 February 2019

ये क़रार तो न था..

 ये क़रार तो न था..
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क़रार जिनसे था , थी बे-क़रारी
झुकी नज़रों में थी,किस्मत हमारी

कहा था जो,किसी ने सुनाते रहेंगे
ताउम्र वो लफ्ज़, तेरी जिंदगी के

दोस्ती से आगे , हममें क्या न था
लबों पे मुस्कान, मयखाना तो न था

नशा इश्क़ का,थे अरमान ज़िंदगी के
ग़फ़लत हुई,वो कत्लखाना तो न था

सजदे में थें जब , वो देते थें दस्तक
हैं रोजे में अब , जाने कहाँ गये सब

ग़म-ए-ज़िंदगी हम, मिटाने चले थें 
ख़्वाबों के लहू में ,नहा के चले हम

साथ चलने का , क़रार हममें न था
यादें भुलाने की,बे-क़रारी थी कैसी

 लफ़्ज़ों का वह खेल और ये तन्हाई
 शहनाई तेरी, कैसी जहर घोल गई

यतीमों को मिलता , कहाँ ठिकाना
दोस्ती वो दो पल की,क़रार तो न था

थी सुकून भरी सांसें, लबों पे मुस्कान
चिराग बुझाना था ,जलाया क्यों था

दर्द जुदाई का उनसे , बूराभी न था
मगर बेवफ़ाई का,  क़रार तो न था

छीन कर,किसी का सब्र-ओ-क़रार
विदाई तेरी , कोई फ़रेब तो न था

                         -व्याकुल पथिक




Wednesday, 20 February 2019

प्रख्यात समालोचक डा0 नामवर सिंह की थी अभिलाषा

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       राजनीति में जमा कूड़ों को जलाने का काम करें साहित्यकार
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      आलोचना के शिखर पुरुष समालोचक डॉ नामवर सिंह के निधन से  प्रेमघन, मतवाला, आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा डॉ भवदेव पांडेय की नगरी भी शोक विह्वल हुई है । यहां के विद्वान साहित्यकारों एवं प्रबुद्ध जनों ने शोक सभा कर उन्हें श्रद्धांजलि  दी। जहां तक मेरा प्रश्न है , साहित्य जगत से प्रत्यक्ष रूप से अपना कोई वास्ता नहीं रहा। पत्रकारिता में आने के बाद समाचार संकलन के लिए कभी- कभी साहित्यकारों के बड़े कार्यक्रम में जाना मेरी विवशता ही थी, क्यों कि कवि सम्मेलन और साहित्यिक चर्चा में मुझे कोई अभिरुचि तब न थी। मुझे याद नहीं है कि नामवर सिंह के आगमन के पहले मैंने कभी ऐसे किसी कार्यक्रम में अपना पूरा समय दिया और ध्यान पूर्वक मुख्य वक्ता की बातें सुनी हो।

 
   नामवर सिंह 27 दिसंबर 2000 को उग्र जन्मशती के अवसर पर मिर्ज़ापुर आए थे। उन्होंने कार्यक्रम में जो उद्गार व्यक्त किये, मैं यहां उसका उल्लेख करना चाहता हूँ। डा0 सिंह तब कहा था कि छोटे-छोटे शहर और कस्बों जहां से हिंदी साहित्य बना है, हमें इन छोटे शहरों का साहित्यिक इतिहास लिखना है। हां , एक तरह का गजेटियर तैयार करना होगा एवं हो सके तो इस का आरंभ मिर्ज़ापुर से ही हो ,तो बहुत अच्छा है ।उन्होंने यहां की साहित्यिक क्षमता का जिक्र करते हुए तब कहा था कि गंगा की भांति ही हिंदी साहित्य की गंगा को भी काशी जाने से पूर्व मिर्ज़ापुर से होकर गुजरना पड़ता , यदि मिर्ज़ापुर ना होता तो काशी के साहित्य की गरिमा वैसी नहीं होती । लायंस स्कूल के बिरला प्रेक्षागृह में नामवर सिंह ने अपने प्रथम आगमन पर यह भी कहा था कि उग्र जी आग लगाना और कूड़ा जलाना दोनों ही जानते थे और अब भी अपनी जन्मशती पर वे मानो ऐसा ही संदेश दे रहे हैं । उन्होंने कहा था कि हम साहित्यकारों को भी राजनीति में जमा कूड़ों को जलाने का काम करना चाहिए । उन्होंने कहा था कि वह हिंदी साहित्य में खासकर अपने गद्य के लिए पहचाने जाते हैं और स्वयं उनको (नामवर सिंह) भी आलोचना की बारीक सोच उग्र जी से ही मिली थी।
       एक बड़ी बात नामवर सिंह ने तब और कही थी , वह यह कि ब्राह्मण विद्वेष में जलते हुए लोगों को वे उग्र जी कि वह पंक्ति सुनाना चाहेंगे,  जिसमें उसने स्वयं को शूद्र कहने में संकोच नहीं किया था, क्यों कि उनके विचारों से शूद्र ब्राह्मण का पूर्व रूप है।  ठीक वैसा ही जैसे मूर्ति का पूर्ण रूप अनगढ़ पत्थर होता है। जिसकी अनगढ़ता में विश्व विराट की मूर्तियों की संभावनाएं सुरक्षित रहती है, जो मूर्ति में नहीं होती।
    डा0 सिंह वर्ष  2001 और 2003 के बीच हिंदी गौरव डॉ भवदेव पांडेय के बुलावे पर दो बार यहाँ आये थें। आचार्य रामचंद्र शुक्ल , प्रेमघन, डॉ काशी प्रसाद जायसवाल ,पांडेय बेचन शर्मा "उग्र" , महादेव प्रसाद सेठ और बंग महिला आदि से जुड़ी इस साहित्यिक भूमि पर आ कर उन्हें प्रसंता हुई थी।
  स्व0 डा0 भवदेव पांडेय के पुत्र व साहित्यकार सलिल पांडेय ने बताया कि डॉ नामवर सिंह जब यहां आए तो उच्चस्तरीय साहित्यिक कार्यक्रमों में जी खोलकर सिर्फ सम्मिलित ही नहीं हुए बल्कि वाराणसी और मिर्जापुर के बीच साहित्यिक सेतु का निर्माण भी किया था । पहली बार डॉ नामवर सिंह  साहित्य एकेडमी द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम में डॉ भवदेव पांडेय के 'साहित्य के निर्माता पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' मोनोग्राफ के लोकार्पण के लिए आए थे । लायन्स स्कूल के खचाखच भरे कार्यक्रम में लगभग डेढ़ घण्टे के उद्बोधन से वे भारतेंदु मण्डल के नगर मिर्जापुर को साहित्य जगत के शीर्ष स्थान पर पहुंचा गए । अत्यंत सम्प्रेषणीय शैली में उनका उद्बोधन रहा । नई कविता एवं नई कहानी में आधुनिकता-बोध से डॉ नामवर सिंह ने अपने अभियान में इस जिले को भी सम्बद्ध किया । उनका वक्तव्य अत्यंत सहज ही नहीं बल्कि ठहाकों के साथ रहा । डॉ नामवर सिंह प्रगतिवादी चिंतन के थे लेकिन स्थानीयता को यहां उन्होंने पूरा सम्मान दिया।  वे मां विन्ध्यवासिनी धाम गए । मां विन्ध्यवासिनी का दर्शन भी किया तथा रत्नाकर होटल में आकर उन्होंने आगन्तुक रजिस्टर में अपने विचार भी लिखे । उन्हें दर्शन कराने में वर्तमान विधायक श्री रत्नाकर मिश्र  तीर्थ पुरोहित की भूमिका में थे । इसके बाद 2003 में डॉ सिंह पुनः डॉ भवदेव पांडेय की पुस्तक 'आचार्य रामचंद्र शुक्ल : आलोचना के नए मानदंड' का लोकार्पण लायन्स स्कूल में ही किया।  यहां वे भारतेंदु मण्डल के प्रमुख सदस्य प्रेमघन जी की तिवराने टोला स्थित कोठी, गऊघाट में महादेव प्रसाद सेठ 'मतवाला' के उस भवन को देखा जहां सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और 'उग्रजी' सम्पादन कार्य करते थे । वे नारघाट स्थित शहीद उद्यान भी गए । वहां क्रांतिकारियों को नमन किया तथा लाला लाजपत राय स्मारक पुस्तकालय के रजिस्टर पर विचार भी लिखे । डॉ नामवर के साथ काशी का साहित्यजगत का हुजूम भी था जिसमें उनके छोटे भाई श्री काशीनाथ सिंह, श्री गया सिंह, श्री चौथीराम यादव सहित दर्जनों लोग थे । दोनों बार डॉ नामवर सिंह लोकार्पण कार्यक्रम के बाद डॉ भवदेव पांडेय के तिवराने टोला स्थित आवास पर आए । घण्टों बैठे तथा डॉ पांडेय के अन्वेषी चिंतन को उल्लेखीय कहा ।

    अंतिम बार डॉ नामवर सिंह वर्ष 2008 में मिर्जापुर पारिवारिक दृष्टि से आए । उनके समधी श्री वाई पी सिंह उन दिनों बाणसागर परियोजना में सहायक अभियंता थे । उनके बुलाने पर सिंचाई डाक बंगले में आए । डॉ भवदेव पांडेय को भी डाक बंगले पर बुलाया।  उन्हें लेने वर्तमान समय में सिद्धार्थ नगर में अधिशासी अभियंता के पद पर तैनात श्री धर्मेंद्र कुमार सिंह आए तथा वाराणसी तथा मिर्जापुर की साहित्यिक धाराओं को डाक बंगले पर मिलाया । इस प्रकार त्रिकोणधाम के लिए विख्यात मिर्जापुर में डॉ नामवर सिंह की यह तीन यात्राएं महत्त्वपूर्ण रहीं । उनके निधन से दो आंखों से ही नहीं बल्कि चिंतन की तीसरी आँख से अश्रुधारा यहां भी बहती दिख रही है । डॉ भवदेव पांडेय शोध संस्थान भी शोक विह्वल है ।वहीं एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन यहां शहीद उद्यान में ही किया गया ।इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार वृजदेव पांडेय ने  नामवर सिंह को इतिहास पुरुष बताते हुए कहा कि आलोचना के क्षेत्र में वे नये-नये सूत्र गढ़ते थे ।वे किसी भी पुस्तक को तत्कालीन सामाजिक परिवेश और मानवीय मूल्यों की कसौटी पर रखकर देखते थे । उन्होंने कहानी नई कहानी लिखकर नई कहानी के क्षेत्र में अविस्मरणीय कार्य किया । वे ऐसा मानते थे कि नई कहानी के जनक निर्मल वर्मा थे। निर्मल वर्मा की कहानी परिंदे को नई कहानी की प्रथम रचना उन्होंने माना। साहित्यकार भोलानाथ कुशवाहा ने उन्हें बेजोड़ समालोचक बताते हुये कहा कि वे जब तक रहे शीर्ष पर रहे।
  साहित्यकार गणेश गंभीर ने कहा कि उनके पास नामवर सिंह जी द्वारा दिया गया उग्र जी का मोनो ग्राफ है, जो उनके द्वारा सदिनांक हस्ताक्षरित है ।तथ्य का सत्यापन साहित्य अकादमी के निमंत्रण -पत्र से भी किया जा सकता है ।यह भी कि उन्होंने भी उग्र के नाटक महात्मा ईसा पर आलेख पाठ भी किया था ।इस कार्यक्रम में देश के कई साहित्यकार शामिल हुए थे ।
      डा0  नामवर सिंह को मैंने देखा था ,
सुना था और उनकी बातें अच्छी भी लगी थीं। अतः ब्लॉक जगत का सदस्य होने के लिहाज से, मैं उनकी अभिलाषाओं को साहित्य जगत को पुनः अवगत कराते हुए अपनी ओर से यह श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहा हूं।

Monday, 18 February 2019

पथिक! खोल हृदय का ताला

संत रविदास जी
      की
  जयंती पर
नमन एवं वंदन
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मंजिल ढ़ूंढे, दर-दर भटके ;
पथिक , कहाँ तुझे  जाना ।
है तेरा कौन  ठिकाना ?
दे हृदय पर ताला ।

आयो बसंत, फुले पलाश;
जगमग हुआ मधुशाला ।
पथिक, तू न प्रेम बढ़ाना ;
दे हृदय पर ताला ।

प्रीति की रीति न जाने कोई;
बनिये सा व्यापार नहीं होई।
पथिक , फिर ना पछताना;
दे हृदय पर ताला।

हँसी-ठिठोली करे जो सखियाँ;
पथिक , ना तू भरमाना ।
तुझे साजन संग है जाना;
दे हृदय पर ताला ।

फगुवा बहे, हिय जब झुलसे ;
जेठ  से प्यास बुझाना ।
पथिक , ना तू घबड़ाना;
दे हृदय पर ताला ।

होनी करे, सब खेल निराला;
माटी का पुतला  जग सारा ।
पथिक,  फिर काहे पछताना;
दे हृदय पर ताला।

प्रेम नगर का ठौर ठिकाना;
तुझे पता जहाँ है जाना ।
धीरज रख ,मन बहलाना;
दे हृदय पर ताला।

सतगुरु मिले जान न पाया;
माया ने तुझको भटकाया ।
पथिक ,अब न नाच दिखाना;
दे हृदय पर ताला।

जग भोगी, तू जोग में हुलसे ;
न मंदिर , ना मस्जिद जाना  ।
पथिक !किसका है तू दीवाना;
दे हृदय पर ताला।

जाग पथिक, मिलेंगे प्रियतम ;
हिय कठोती,ज्यों गंग समाना।
सतनाम का अलख जगाना;
खोल हृदय का ताला ।

         -व्याकुल पथिक

Saturday, 16 February 2019

न जलाओ दीपक,न दो मुझे सलामी !

न जलाओ दीपक , न दो मुझे सलामी !
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वतन के लिये ,कफन हमने बांधा ;
थी चाहत अपनी, दुश्मनों को मिटाना।

लड़ के मरे हम ,हो प्रताप तुम्हारा;
संगीन पर हो , तब मस्तक हमारा।

राणा के वंशज, वो झांसी की रानी;
वीरों सा सीना, गरजती थी वाणी ।

चले थें घर से , ये तमन्ना लिये हम;
दुश्मन जो ताकें , लाहौर हो हमारा ।

अर्थी सजी हो,तब लोग ये पुकारे;
देखों बन ,अब्दुल हमीद घर आया।

टूटी चूड़ियाँ  ,जब खनकने लगे ;
कहे ,गीदड़ों को मार तेरा वीर आया।

प्रेम -दिवस तब , हुंकार करे सब ;           
कहे मत रो , हो शहीद लौट आया।

माता का आंचल , पुकार करे जब ;
कहे  लाल तेरा ,वो वतन में समाया ।

बूढ़े पिता की , है लाठी जो टूटी ;
कहे लाल तेरा , हो अमर घर आया।

कलाई पर बंधा, है धागा जो टूटा;
कहे भाई तेरा , हुआ सबको प्यारा।

बेटा बुलाएँ, है पिचकारी जो टूटी;
कहे बाप तेरा , अब होली में समाया।

पर मुझे यूँ मरना , तुझे है सिसकना;
बता कैसे चुकाऊँ ,माँ भारती कर्ज तेरा।

वो कत्ल करें , हम शीश बढ़ाएँ ;
बता कैसे निभाएँ , माँ भारती फ़र्ज़ तेरा ।

ये मजमा लगा है, जयचंदों का कैसा ;
न जलाओ दीपक , न दो मुझे सलामी।
     
                        -व्याकुल पथिक

Friday, 15 February 2019

श्वेत पलाश सा तू मुस्काना

श्वेत पलाश सा तू मुस्काना
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बाबा देख तुझे क्यों ?
ऐसा लगता मेरा-तेरा रिश्ता है।
एक नदी किनारे बैठा है,
एक भवसागर में डूबा है।

 पथराई सी तेरी अँखियाँ,
 मन  मेरा भी सुना है ।
वैरागी बना काहे तू बाबा,
क्या खेल जगत का देखा है ?

कुछ तो मुझसे बोल दे बाबा ,
दिल का दर्द खोल दे बाबा,
भटके को  दे जीवन -दर्शन,
कर ले सफल तू अपना मग ।

रिश्तों का सब बंधन छूटा ,
अपनों का यह स्वांग है झूठा,
तेरी राह में  मैं  बढ़ जाऊँ,
बाबा मुझकों गले लगाना ।

अपना वो वैराग्य दे बाबा,
बसंत का उपहार दे बाबा,
फूल पलाश सा; न मुझे बनाना ,
रंग स्नेह दे; क्यों हुआ बेगाना ?

बाबा बोलें बच्चा सुन लें,
वन की आग बन ;
न मन को जलाना,
श्वेत पलाश सा तू मुस्काना ।

दुर्लभ समझ ढ़ूंढे जब कोई,
रीति जगत का  उसे बताना।
दिल का दर्द न किसे सुनाना,
मन की बात न मुख से लाना।

डोली सजी अब पिया बुलाये,
मुझकों -  तुझसे  दूर है जाना।
"पथिक" जब होते हर फूल यतीम,
पुष्प पलाश सा तू  मुस्काना ।

  - व्याकुल पथिक

हम पलाश के फूल,सजे ना गुलदस्ते में

हम पलाश के फूल,सजे ना गुलदस्ते में
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हम पलाश के फूल,सजे ना गुलदस्ते में
खिल कर महके,सूख,गिर गये,फिर रस्ते में
भले वृक्ष की फुनगी  पर थे हम इठलाये
पर हम पर ना तितली ना भँवरे मंडराये
ना गुलाब से खिले,बने शोभा उपवन की..

  जरा देखें न एक कवि ने पलाश के फूलों के दर्द को किस तरह से शब्द दिया है। उसकी अंतरात्मा चित्कार कर रही है कि उसने तो इस संसार को प्रेम का रंग दिया है , बदले में नसीब ने उसे क्या दिया है। जंगल में तो उसकी खूबसूरती के इतने किस्से हैं, पर क्या इंसान के गुलदस्ते में उसके लिये भी कोई हिस्सा है ? नहीं न , यह मनुष्य तो गुलाब की खूबसूरती और  खुशबू का कद्रदान है।
   पलाश के इसी टीस को समझने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि जिसे जंगल के आग के रूप में पहचान मिली है। जो ऋतुराज बसंत का प्रिय पुष्प है। वह टेसू का फूल जिसके रंग में इंसान अपने तन- मन को रंगता है, उसी के घरौंदे में अन्य पुष्पों की तरह उस पलाश के फूल को स्थान न मिलने की पीड़ा उस विकल पथिक से मिलती-जुलती है, जिसके स्नेह की सराहना हुई , परंतु किसी के हृदय पर अधिकार कहाँ है उसका ? वह आशियाना कहाँ , वह मन मंदिर कहाँ, वह गुलदस्ता कहाँ , जहाँ वह किसी के गले का हार बनता ।
 वो गीत है न-
जाने वो कैसे लोग थे जिनके
प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियाँ माँगी
काँटों का हार मिला..

   इसे ही किस्मत कहते हैं, अन्यथा जिस पुष्प से पूरा जंगल सुर्ख लाल सिंदूरी रंग से दहकता हो, वह उपवन में क्यों नहीं होता है। उसके भी तो कुछ सपने होते, कुछ अपने( तितली और भँवरे) होते।  उसका यह मौन क्रंदन सुना क्या कभी किसी ने-
ना माला में गुंथे,देवता  के  पूजन की
ना गौरी के बालों में,वेणी  बन निखरे
ना ही मिलन सेज को महकाने को बिखरे..

     क्यों सुनेगा कोई ? हर किसी को सिर्फ उससे रंग (प्रेम) चाहिए, अपने आनंद एवं उत्सव के लिये । कहते हैं कि  कृष्ण  ने इसी पलाश के रंग से ब्रजमंडल की गोपियों संग होली खेली थी । वे स्वयं तो चितचोर से योगेश्वर हो गये, परंतु बावली गोपियाँ स्नेह के इस श्याम रंग में ऐसी रंगी कि विरह की अग्नि में तप कर जोगन हो गयी, पंडितों की वाणी हो गयी । इन पर नहीं चढ़ा फिर कोई दूसरा रंग । यह भजन तो आप सुनते ही है-

राधा ऐसी भयी श्याम की दीवानी,
की बृज की कहानी हो गयी..

       इस वन की आग के मन में धधकते दावानल और विचारों के द्वंद में उलझा हूँ।  प्रकृति की इस निष्ठुरता पर कि ऐसा क्यों होता है कि सर्वस्व अर्पित करके भी प्रेम का यह रंग फीका क्यों , तो दिल का यह दर्द उभर है-

मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
मुझको रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला...

 जंगल की इस दहकती लाली की उदासी के मर्म को यदि  कवि मदन मोहन 'घोटू' ने समझा है , तो ऋतुराज के प्रिय पुष्प होने के उसके गौरव पर गोपाल दास 'नीरज' यूँ कह उसको मान भी दिया है-

नंगी हरेक शाख हरेक फूल है यतीम
फिर भी सुखी पलाश है इस तेज़ धूप में..

  सचमुच पलाश के फूल ऐसे समय लगते हैं जब बाकी पेड़ों में पतझड़ के बाद नई कोपलों के फूटने का समय होता है। चारों ओर इस सूखे माहौल के बीच एक पलाश ही रौनक पाता है। तब यह उस फिल्मी गीत की पंक्तियों को चरितार्थ करता प्रतीत हो रहा है जिसके बोल हैं..

आ के तेरी बाहों में हर शाम लगे सिंदूरी
मेरे मन को महकाया तेरे मन की कस्तूरी..

     पलाश की तरह एक और पुष्प इसी ऋतु में मुस्काता है। रंग दोनों का ही सुर्ख लाल है, परंतु यह सेमल का पुष्प रंग नहीं बिखेरता है, यह इंसान को जीवन का रहस्य बताता है।

याद है न संत कबीर की वाणी -

कबीर यह संसार है जैसे सेमल फूल
दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग ना फूल ।

  युवावस्था में काशी में जब अपनी दोस्ती कम्पनी गार्डेन से थी, तो मंदाकिनी सरोवर किनारे इस वृक्ष के इर्दगिर्द बैठ जाया करता था। भूमि  पर बिखरे सेमल के कुमलाए रक्त वर्ण के पुष्पों से मौन वार्ता होती थी मेरी। तब मैं भी बिल्कुल बेरोजगार और निठल्ला ही था । सो, सेमल के पाँच पंखुड़ियों वाले बड़े - बड़े लाल पुष्पों को खिलते, बढ़ते और गिरते हुये ही नहीं देखता था,वरन् इसके पके फलों से मुलायम श्वेत रेशे जब  हवा में उड़ा करते थें, तो उस दृश्य को भी टकटकी लगाये देखा करता था।  मानों  कभी न मुर्झाने वाले ये श्वेत रेशमी रेशे चहुँओर बिखर कर शांति का संदेश दे रहे हो। इसी सेमल फूल से तब मुझे भी इस जगत की नश्वरता का कुछ- कुछ बोध हुआ था , जब परिजनों  से संवादहीनता की स्थिति थी।  दादी मुझे दुखी देख कम्पनी गार्डेन ले आया करती थीं । जहाँ , इसी  सेमल के पुष्प संग मेरा मौन संवाद जब मुखरित हुआ , तो सतगुरु का दर्शन हुआ और उनके संग आश्रम चला गया। परंतु एक दिन यह सबक, "माया महा ठगनी हम जानी"
 भुला बैठा और पुनः इस भवसागर में आ फंसा ।
       वैसे तो , सेमल के फूल से पलाश के पुष्प की पीड़ा कहीं अधिक है , क्यों कि आकर्षण तो दोनों में ही है, परंतु पलाश अपनी प्रीति का रंग देकर भी अन्य पुष्पों की तुलना में उपेक्षित है।