Followers

Monday, 15 April 2019

ललकी की पाती सीएम के नाम



75 दिनों में ही 80 गौवंश की हो चुकी है यहाँ मृत्यु
***************************
    मीरजापुर । प्रदेश सरकार के फरमान पर यहाँ नगर में जब गौशाला खुला तो हमने सोचा था कि सड़कों और गलियों में भटकने वाले छुट्टा पशु कहलाने से हमें मुक्ति मिलेगी। इससे पूर्व वर्षों से हम जब कभी पेट की अग्नि को शांत करने की विवशता में मुकेरी बाजार, गुड़हट्टी, गनेशगंज और घंटाघर की सब्जी और गल्ला मंडी में किसी की दुकान अथवा ठेले से कोई खाद्य सामग्री ग्रहण करते थें, तो हमें भोजन चोर बता कर पिटाई होती थी। कभी - कभी इंसानों का जूठन भी नहीं मिलता था, ऐसे में हमारे लिये यह नया शरणस्थल मनभावन होगा, कुछ ऐसे ही कल्पना लोक में खोये हुये थें हम।
        पर  तब यह नहीं समझ सके थें कि नियति ने इस नये घर ( गौशाला)  का निर्माण हम जैसे निरपराध प्राणियों को मृत्यु दंड देने के लिये निर्मित करवाया है। मानो यह किसी हिटलर का गैस चैम्बर हो ,जहाँ जीवन की उम्मीद बेमानी है। अब आंकड़ों में आपको बताऊँ, तो इस गौशाला के खुले 75 दिन में  80 गौवंश की मौत  हो चुकी है । इतने संगी-साथियों को खोकर मेरा दिल मर्माहत भी है । पता नहीं कल मैं भी रहूँ ना रहूँ ?  स्वास्थ्य यहाँ मेरा निरंतर बिगड़ते जा रहा है। पेट की आग से कहीं अधिक इस भीषण गर्मी में पानी के लिये हम छटपटा रहे हैं। हमारी पुकार पर कुछ गोभक्त, मीडिया कर्मी और बाद में गौपालक नगर विधायक रत्नाकर मिश्र भी यहाँ आये। जिन्होंने सख्त चेतावनी दी थी कि भविष्य में एक भी गौवंश की मृत्यु हुई तो समझना गौहत्या का पाप लगेगा। हमारी देखभाल करने वाले इंसानों से उन्होंने और भी बहुत कुछ कठोर शब्दों में कहा था। पुआल की जगह भूंसे की व्यवस्था भी हमारे लिये करवाई गयी थी। लेकिन, आपने यह उक्ति सुनी है न कि चार दिनों की चाँदनी , फिर अंधेरी रात..?
  इसी बीच हमारे कई साथी मर गये। सच तो यह है कि वे मरे नहीं यहाँ की दुर्व्यवस्था के शिकार हो गये। लेकिन, फिर कोई गौवंश रक्षक यहाँ नहीं आया ,जो उनके विरुद्ध सजा तय करता ,जिनकी जिम्मेदारी बनती है। भविष्य में भी स्थानीय किसी रहनुमा से हमें उम्मीद नहीं है। अतः सोचा आपको अपनी पाती लिख दूँ । जिससे प्रदेश के मेरे वंशजो का भला हो सके । अतः आँखों में आँसू लिये पत्र लिख रहा हूँ।  हम बेजुबान हैं। अतः स्थानीय पत्रकार साथियों के सहयोग से यह   आखिरी पत्र आप तक भेज रहा हूँ, क्यों कि जानता हूँ कि इस पत्र के पहुँचते - पहुँचते मैं भी  आपके इस गौशाला में दम तोड़ दूँगा। पर मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ मेरे ये आँसू गवाह हैं, जिससे इन पत्रकारों ने अपने कैमरे में प्रमाण के तौर पर रख लिया है। इंसानों का जो कानून है, वह साक्ष्य मांगता है न , तो  ये रहें मृत्युदंड से पूर्व हमें मिलने वाली यातनाओं का प्रमाण मुख्यमंत्री जी । अब तनिक मेरी पीड़ा सुनिए।
    " परम प्रिय गौ रक्षक भक्त योगी जी आप अपने सद्कर्मों और पूर्व जन्म के प्रताप से इस वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं । आपकी मंशा गंगाजल की तरह पवित्र है पर आपके नुमाइंदे आड़ा - खापा से बाज नहीं आ रहे हैं  । जिनकी करनी से जिला मुख्यालय के गैबीघाट में गौशाला मौतशाला बन गया है । नवरात्रि बीतते ही रविवार को पांच गौवंश की मौत हो गयी । सोमवार को भी मेरा एक साथी गौलोक चला गया जबकि दूसरा प्रभु श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए जाने की तैयारी में है । जबतक मेरी पाती आप तक पहुंचेगी तबतक वह भी अनन्त यात्रा की ओर प्रस्थान कर जायेगा । मेरी आँखों से बह रहे आंसू मेरे सीने में अपनों की उदासीनता का परिणाम है ।आप मेरी आँखों से निकल रहे आंसुओं को पढ़ना और हो सके तो ऐसा करना जिससे गौशाला में दाना - पानी और बीमारी के चलते अब और अकाल मौत न हो ।
        मुझे ललकी के नाम से जाना जाता है । मुझे सड़क पर घूमते वक्त आपके नुमाइंदों ने पकड़ कर नगर के गैबीघाट में बने सरकारी गौशाला में डाल दिया गया । उस दौरान की गयी रस्सा कस्सी से मेरे कई साथियों के सींग तक उखड़ कर लटक गये । जख्मी होकर कई परलोक सिधार गये । जब से आपने गौशाला खोला है 75 दिन में 80 साथी इस मायावी दुनिया से चले गये । इसमें आपके मातहतों का भरपूर योगदान रहा । आप ही बतायें केवल पुआल खाकर कोई जिंदा रह सकता है ।गौपालक विधायक रत्नाकर मिश्र की फटकार के बाद पुआल को बोरा में भर दिया गया । जो आज भी गौशाला में है । उसके बाद से अब भूंसा मिल रहा है । डीएम के कहने पर खाने और पीने के लिए बर्तन मंगाया गया । उस वक्त नगर पालिका परिषद अध्यक्ष मनोज जायसवाल, नगर मजिस्ट्रेट सुशील श्रीवास्तव आकर निरीक्षण करते और निर्देश भी देते रहे ।
     जिलाधिकारी अनुराग पटेल जब औचक निरीक्षण पर आये थे तो गौशाला में उन्हें हम सब की कुल संख्या 215 बताया गया था । अब मात्र 164 रह गया है । गौशाला को 28 जनवरी 2019 को खोला गया । आज की तारीख यानि 75 दिन में 80 गौवंश की मौत हो चुकी है ।
         वर्षो पूर्व हुई बोरिंग का बदबूदार गंदा पानी मोहल्ले के लोग नहीं पीना चाहते उसे हम सबको पिलाया जा रहा है । जिसे आप छूना भी नहीं चाहेंगे उसे हम कैसे पीते है वह हम सबका दिल ही जानता है । खूंटे से बंधे होने के कारण विवशता है । हम तो बोतल के पानी की आस नही करते पर वह दूषित भी न हो की बीमार करके मौत ही दे जाये । जिस प्रकार भगवान सूर्य नारायण के पौ फटते ही कितना भी घना अंधेरा क्यों न हो मिट जाता है
 दिन अपनी उपस्थिति का आभास कराता है ।  आशा है कि उसी प्रकार व्यवस्था के नाम पर चल रहे अव्यवस्था का खात्मा होगा । तभी आपकी नेक नियति के साथ खोला गया गौशाला सफल होगा । जिसके रोम रोम में देवताओं का वास हो उनकी प्रसन्नता और खिन्नता धर्म के अनुसार कामी अहमियत रखती है । वैसे आप खुद समझदार है ।
       गौशाला की दुर्व्यवस्था की कहानी सुनकर जिलाधिकारी गौशाला में आये थें  । उस दौरान नगर विधायक रत्नाकर मिश्र भी आये और घूम घूमकर निरीक्षण किया था । भला हो विधायक का उस वक्त हम सबके पास खाने और पीने के लिए कोई पात्र नहीं था । मुझे और अन्य साथियों को खूंटे से बांध दिया गया था । दूर पानी नजर आता पर सूख रहे गले को तर करने की मंशा समय के साथ और बढ़ती जाती । कई साथी तो पानी न मिलने से प्यासे ही इस दुनिया से चले गये । उस वक्त हम सबको पुआल खाने को दिया जाता था । आपको तो मालूम है कि सर्दी के मौसम में कई जगह पुआल खिलाया जाता है वह भी भूंसा में मिला कर । लेकिन यहाँ पुआल मिला पर पानी नदारद था । खाली पुआल भी कई साथियों के लिए जहर बन गया । पुआल तो जो शरीर को गर्मी प्रदान करता है । शहर की सड़कों पर फेंके गए जूठन वगैरह खाकर जहा पानी मिला पीकर टंच रहते थें । आपके बनाये गौशाला में दूसरों के भरोसे दाना पानी वह भी आधा अधूरा रह गया है । उन दिनों जिलाधिकारी के आने पर कुल आंकड़ा 215 बताया गया था । अब मात्र 164 गौवंश बचे हैं  । गौशाला इसी वर्ष 28 जनवरी को खोला गया । 75 दिन में हममें से 80 की मौत हो चुकी है ।
      धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों मे सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो''  के साथ ही गौमाता की जय हो और गंगा मैया की जय हो भी बोला जाता है।
   आज भी यह जय घोष भारतीय संस्कृति का उद्घोष बन  हुआ है। फिर भी क्यों  गंगा और गौमाता का दर्द इसी जयघोष में घुटकर रह जा रहा है ?
   उम्मीद है कि आप स्वयं अपने इन गौशालाओं का औचक निरीक्षण कर  इस पत्र की सत्यता को परखेंगे।






Saturday, 13 April 2019

धर्म

      धर्म
     ******
तुझसे  सीखा हे पुरुषोत्तम
 है  संघर्ष  ही  जीवन- धर्म ।

विमाता को दे कर सम्मान
पुत्र धर्म का किया  निर्वहन ।

सिंहासन की चाह न की
कह, वन भी है अपना स्वर्ग।

अनुज केलिये छोड़ा अयोध्या
दिया विभिषण को स्वर्णमहल।

पुष्पक कुबेर को लौटा के
कहा पर सम्पत्ति का लोभ न कर।

छल से पाषाण बनी अहिल्या
रखा तब  तूने उसका भी धर्म ।

बैर भीलनी के खाकर जूठे
 तुमने,समरसता का दिया संदेश।

द्वापर में कृष्ण बन कर तूने ही
 रोका कृष्णा का चीरहरण  ।

मान  बढ़ाया नारी का तब
बोला ,छोड़ दुर्योधन ये अधर्म ।

फिर बोलो  हे  पुरूषोत्तम
क्यों अग्निपरीक्षा है नारी -धर्म ?

सती सीता का परित्याग
क्या यही था , तेरा राज- धर्म  ?

राम के तुलसी थें फिर भी
ठहर गयी,क्यों उनकी कलम ?

पत्नी के  निर्वासन को कहते
  कैसे  वे  राम का धर्म ?

                 -व्याकुल पथिक

Friday, 12 April 2019

अटल सत्य

अटल सत्य
**********

ए नादान परिंदे  तू
इंसानों की फ़ितरत को समझ

ये तुझे देते हैं दाना-पानी,पर
 इसे अपनी क़िस्मत ना समझ

अरे ! मुर्ख नासमझ पक्षी
  ये  तेरी खुशियों पर नहीं

ये  तेरी  कराह पर नहीं
  तेरे  क़त्ल  पर भी नहीं

 वे तो तेरे गोश्त की चाह में
 खिलखिलाते और मुस्कुराते हैं

 नहीं है उनमें भी  रहम
कह मछली जल की रानी

जो लिखते हैं तुझ पे कविता
   वे तुझे सहलाते हैं, मगर

 है  तू आखेट उनका  भी
   आज नहीं  तो कल

नौ दिन ये,उनके उपवास के
पगले ,इसे जीवनदान न समझ

टूट पड़ेंगे भूखे भेड़िये से तुझपे
 अभी बने हैं जो बगुला भगत

और बात राजनीति की करूँ
 तो चुनावी मौसम है रंगीन

 जन सेवक के पोशाक में
 आज जो तुझे दिख रहे हैं दोस्त

पहचान इन नक़ाबपोशों को
  कल  वे ही होंगे तेरे हिटलर

  नियति की  निष्ठुरता को
तू भी पथिक तनिक तो समझ

  मत  पूज तू  इसको कभी
मृत्यु दण्ड तेरा भी है अटल सत्य

          -व्याकुल पथिक

Wednesday, 10 April 2019

मज़हब

   

 मज़हब
    *******

खेलो ना दिल से किसी के
ये खिलौना तो नहीं

ताउम्र  तड़पता है जिस्म
जब छलता है कोई

ख़्वाबों को राह दिखला के
 मुकर जाते हैं जो लोग

 दर्द  तन्हाई  का  दे
 फिर ना नज़र आते है क्यों?

जो  चमकते थें कभी
 इश्क़  में आईना  बन के

 टूटे  कांच से बिखरे हैं
अब   इक कराह  है  लिये

जख़्म  ऐसा भी  न दो
जिसका  मरहम  ही न हो

बुझती  शमा  की
 रोशनी  की है तुझको कसम

सांसों की धड़कनें बन
ना बढ़ा फिर फ़ासले दिल के

मासुमियत का नक़ाब तेरा
  जला  देगा किसी  का  घर

हो ऐब कितने भी तुझमें
  पर  फ़रेब  तो ना कर

इंसानियत को बना मज़हब
 धर्म के मर्म को समझ

 किताबों में ना ढूंढ इसे
है मोहब्बत ही इक मज़हब

             - व्याकुल पथिक

Sunday, 7 April 2019

है तू इक भूल और ...


है तू इक भूल और  ...
*****************
आज  की  रात  तुझे
नींद न  फिर  आई

  यादों   की   राह  में
वो   दर्द  जो ले  आई

चादर की  इन सिलवटों में
वो खुशियाँ तो नहीं

ये तेरे करवटों की कराह है
और  कुछ भी  नहीं

खुली  जुल्फ़ों में बिखरी
  ये वो मोहब्बत भी नहीं

उन मचलते हुये बाँहों में
तेरी  ख़्वाहिश तो नहीं

खिलखिलाते उन होंठों पे
तेरा नाम तो नहीं

खनखनाती पायलों में
ना  तेरी  हँसी  है छुपी

ज़ख्म जो तेरे जिगर में
 क्यों ना भर पाता  कभी ?

बिखरे हुये कुछ कांच वहाँ
तेरी किस्मत तो नहीं

ख़्वाबों में आते हो क्यों
जब दिल पे दस्तक ही नहीं

 तू  है गुनाहों  का देवता
  और   एक भूल  ये  सही

मत कोस जमाने को
ये  तेरी  दुनिया  ही नहीं

है   तू  इक  भूल
  और   कुछ  भी  नहीं..!

     -व्याकुल पथिक

Friday, 5 April 2019

चलो मन विंध्याचल धाम-1






शक्ति की अराधना से करें नववर्ष का स्वागत
*****************************
विन्ध्य- क्षेत्रं परं दिव्यम् पावनं मंगल - प्रदम्।
यत्र  सिद्धयः  प्रसिद्धन्ति  तमा  प्रलयं  त्राम्।।
****************************
विंध्य क्षेत्र परम दिव्य, पवित्र ,मंगल देने वाला है। जहां पर तप करने से कामना सिद्ध होती है।  भारत में यह पर्वत मध्य से उत्तर दक्षिण स्थित है।

          
    


   यहीं पर आदिशक्ति माँ विंध्यवासिनी का पावन मंदिर है। वर्ष 1994 में जब आजीविका की तलाश में भटकते हुये सांध्यकालीन गांडीव समाचार पत्र लेकर काशी से मीरजापुर आया था। तो उस वर्ष वासंतिक नवरात्र से पूर्व ताऊजी ने मुझसे कहा था कि जब प्रतिदिन तुम्हें मीरजापुर जाना ही है, तो विंध्याचल मंदिर भी चले जाना और दूसरी हिदायत उनकी यह थी कि सदैव मखाने का सेवन करते रहो। वह मेरे संघर्ष का सबसे कठिन दौर रहा। वाराणसी से बस से औराई आना पुनः जीप से मीरजापुर और यहाँ सायं 6 बजे से 9 बजे तक इस अनजान शहर में पैदल ही अखबार का वितरण। इसके पश्चात रात्रि बस पकड़ कर 12 बजे वापस वाराणसी। पांव जमीन पर अगले दिन सुबह पड़ते नहीं थें। लेकिन, यह जो पेट की आग है न , वह भला माने तब तो। मास्टर साहब का अयोग्य सुपुत्र था। भले ही कक्षा में सदैव अव्वल रहा और अपने गुरुजनों का प्रिय भी, परंतु नियति के समक्ष नतमस्तक    एक भूल, एक अभिश्राप एवं जिन्हें भी स्नेह किया , उनके द्वारा तिरस्कृत  कुछ ऐसा ही है , इस पथिक का जीवन । जिसे भी वह अपना समझता है, वह एक नया दर्द दे जाता है। इसलिये हृदय का बंद कपाट कभी नहीं खोलना चाहता था तब भी और अब भी, फिर भी मार्ग में जो लोग मिले , उनमें से कुछ ऐसे भी रहें, जिन्होंने अत्यधिक स्नेह प्रदर्शन किया और फिर बेगाना बता के चल दिये।
   बात ताऊ जी के निर्देश की कर रहा था। मैं विंध्याचल गया भी, तब वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित मणिशंकर मिश्र ने अत्यधिक स्नेह दिया। विंध्यवासिनी देवी के महात्म्य के विषय में जानकारी दी। परंतु देवी धाम में जिस तरह का व्यवहार आम दर्शनार्थियों संग होता था, वह देख मन कुछ खिन्न हो गया  और वीआईपी दर्शन मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था, अतः झांकी से दर्शन करने का निश्चय कर लिया । वैसे , आम दर्शनार्थियों के साथ अच्छा व्यवहार हो, इसके लिये तीर्थ पुरोहित, प्रशासन और पुलिस तीनों ही सजग रहते हैं, परंतु विशिष्ट भक्त के आते ही उनका यह संकल्प भंग हो जाता है।  इस बार भी विंध्य पण्डा समाज ने आम सभा कर सभी दर्शनार्थियों को उत्तम दर्शन करवाने का संकल्प लिया है।
  इसी विंध्य क्षेत्र में तप कर मैं एक पत्रकार बन गया और जहाँ तक मेरे एकाकी जीवन का प्रश्न है, तो तपोस्थल पर भला कौन साथ निभाता है। यह सफर तो अकेले ही तय करना होता है। यहाँ कोई स्नेह का संबंध नहीं है और यदि आपका वैराग्य डगमगाया, तो उपहास के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा आपकों।  विचित्र विरोधाभास है मनुष्य जीवन भी।

     भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं
****************************
     देखें न भारतीय संस्कृति में नववर्ष का स्वागत जनमानस शक्ति की आराधना से करता है । देवों के देव महादेव यानि शिव भी शक्ति बिना शव अर्थात शून्य हैं  । सती के यज्ञ कुण्ड में समाहित होने के बाद सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोहराम मचा था । तब भगवान विष्णु ने शिव के कंधे पर सती के शव को काट - काट कर अलग करना आरम्भ किया था । सती के अंग जहाँ -जहाँ  गिरे वह शक्ति पीठ के नाम से विख्यात हुआ । शक्ति स्वरूपा के बिना जीवन पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता यह सन्देश अर्धनारीश्वर के स्वरूप के साथ शिव ने दिया है । देश के विभिन्न स्थानों पर शक्ति पीठ है, जबकि विन्ध्य क्षेत्र सिद्धपीठ के नाम से विख्यात है । आदिशक्ति ब्रह्मांड के केंद्र बिंदू पर बिन्दुवासिनी नाम से अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के साथ स्वयं विराजमान है ।
     'भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं। विन्ध्याचल सदा से उनका निवास-स्थान रहा है। जगदम्बा की नित्य उपस्थिति ने विंध्यगिरिको जाग्रत शक्तिपीठ बना दिया है। महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्। अर्थात-हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचलपर आप सदैव विराजमान रहती हैं। पद्मपुराण  में विंध्याचल-निवासिनी इन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है- विन्ध्येविन्ध्याधिवासिनी।
श्रीमद्देवीभागवत के दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपा को उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुव मनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ। त्रेता युग में भगवान श्रीरामचन्द्र सीताजीके साथ विंध्याचल आए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वर महादेव से इस शक्तिपीठ की माहात्म्य और बढ गया है। द्वापरयुग में मथुरा के राजा कंस ने जब अपने बहन-बहनोई देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया और वह उनकी सन्तानों का वध करने लगा। तब वसुदेवजीके कुल-पुरोहित गर्ग ऋषि ने कंस के वध एवं श्रीकृष्णावतार हेतु विंध्याचल में लक्षचण्डी का अनुष्ठान करके देवी को प्रसन्न किया। जिसके फलस्वरूप वे नन्दरायजीके यहाँ अवतरित हुई। मार्कण्डेयपुराण के अन्तर्गत वर्णित दुर्गासप्तशती (देवी-माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय में देवताओं के अनुरोध पर भगवती उन्हें आश्वस्त करते हुए कहती हैं, देवताओं वैवस्वतमन्वन्तर के अट्ठाइसवें युग में शुम्भऔर निशुम्भनाम के दो महादैत्य उत्पन्न होंगे। तब मैं नन्दगोप के घर में उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से अवतीर्ण हो विन्ध्याचल में जाकर रहूँगी और उक्त दोनों असुरों का नाश करूँगी । श्रीमद्भागवत महापुराण के श्रीकृष्ण-जन्माख्यान में यह वर्णित है कि देवकी के आठवें गर्भ से आविर्भूत श्रीकृष्ण को वसुदेवजीने कंस के भय से रातोंरात यमुनाजीके पार गोकुल में नन्दजीके घर पहुँचा दिया तथा वहाँ यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा ले आए। आठवीं संतान के जन्म का समाचार सुन कर कंस कारागार में पहुँचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर जैसे ही पटक कर मारना चाहा, वैसे ही वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुँच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित किया। कंस के वध की भविष्यवाणी करके भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।
  मन्त्रशास्त्र के सुप्रसिद्ध ग्रंथ शारदातिलक में विंध्यवासिनी का वनदुर्गा के नाम से यह ध्यान बताया गया है, उसका स्वरूप यह है कि जो देवी स्वर्ण-कमल के आसन पर विराजमान हैं, तीन नेत्रों वाली हैं, विद्युत के सदृश कान्ति वाली हैं, चार भुजाओं में शंख, चक्र, वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं, मस्तक पर सोलह कलाओं से परिपूर्ण चन्द्र सुशोभित है, गले में सुन्दर हार, बांहों में बाजूबन्द, कानों में कुण्डल धारण किए इन देवी की इन्द्रादि सभी देवता स्तुति करते हैं। विंध्याचलपर निवास करने वाली, चंद्रमा के समान सुन्दर मुखवाली इन विंध्यवासिनी के समीप सदा शिव विराजित हैं। धर्मग्रंथों का निरंतर अध्यन करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार सलिल पांडेय का कहना रहा कि सम्भवत:पूर्वकाल में विंध्य-क्षेत्रमें घना जंगल होने के कारण ही भगवती विन्ध्यवासिनीका वनदुर्गा नाम पडा। वन को संस्कृत में अरण्य कहा जाता है। इसी कारण ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी विंध्यवासिनी-महापूजा की पावन तिथि होने से अरण्यषष्ठी के नाम से विख्यात हो गई है। धर्मग्रन्थ इस धाम की महत्ता से भरे पड़े हैं ।
         तीर्थ राज प्रयाग के संगम के बाद विंध्याचल में एक और संगम होता है । वह है विन्ध्य पर्वत के साथ दो बहनों का मिलन । हजारों मील का सफर करने वाली पतित पावनी गंगा धरती पर आकर विंध्य क्षेत्र में आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी का पांव पखारती है । इसके बाद वह त्रैलोक्य न्यारी शिव नगरी काशी में प्रवेश करती है । हजारों मील लम्बे विंध्य पर्वत एवं गंगा नदी मिलन माता के धाम विंध्याचल में ही होता है । आगे जाकर गंगा उत्तरवाहिनी हो जाती है जबकि विंध्य पर्वत दक्षिण दिशा की ओर घुम जाता है । त्रिकोण पथ पर केंद्र में स्थापित सदाशिव के तीनों कोण में विराजमान मातालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती अपने भक्तों को दर्शन देकर उनकी समस्त मनोकामना पूरी कर रही है ।
   मीरजापुर में पूर्व वाहिनी गंगा नदी के तट पर विन्ध्य पर्वत के ऐशान्य कोण में विराजमान आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी का दर्शन और त्रिकोण करने से भक्तों  की सारी मनोकामनायें पूरी होती है । संगम स्थल पर आदिशक्ति अपने तीनों  स्वरूप महाकाली , महालक्ष्मी व महासरस्वती के रूप में विराजमान होकर भक्तों की सारी मनोकामनाए पूर्ण कर रही हैं  | आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी अपने भक्तों को लक्ष्मी के रूप में दर्शन देती हैं  । रक्तासुर का वध करने के बाद माता काली एवं कंस के हाँथ से छूटकर महामाया अष्टभुजा सरस्वती के रूप में त्रिकोण पथ पर विंध्याचलविराजमान हैं

 आदिवासियों की पूजित वन देवी कालान्तर में सर्वजन देवी बन गयी
***************************
-----------------
विंध्यवासिनी की पूजन सामग्री तथा फल फूल जो है उनमें अभिजन्य संस्कृति में स्वीकार सेव, अनार तथा अंगूर नहीं है,  बल्कि रोरी, रक्षा, बतासा और लाची दाना है । जो आम जन के लिए उपलब्ध हैं ।
---------------------
देवकी मथुरायां तु पताले परमेश्वरी।
चित्रकूटे तथा सीता विन्ध्ये विन्ध्यवासिनी।।
ऊँ विन्दुस्था विन्ध्यनिलया विन्ध्यपर्वतवासिनी ।
योगिनी योगजननी चण्डिका प्रणमाम्यहम्।।

    घने पेड़ों से आच्छादित विंध्य पर्वत पर विराजमान जगत जननी माता  विंध्यवासिनी देवी सतयुग में वन देवी थीं फिर जन देवी हुई और अब सर्वजन देवी विंध्यवासिनी के रूप में पूजित है । पुराणों में वर्णित हैं कि विंध्य पर्वत पर विराजमान आदिशक्ति जगत जननी माता विंध्यवासिनी आदि अनादि काल से विन्ध्य पर्वत पर विराजमान हैं । हर रोज माता के दर पर हाजिरी लगाने भक्त आते हैं । नवरात्र पर माता के दरबार में आने वाले भक्तों की तादात प्रतिदिन लाखों में पहुँच जाती है । उत्तर में पूर्ववाहिनी गंगा तो दक्षिण में विशाल विंध्य पर्वत भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है । आज भी आदिवासी एवं भील अष्टमी तिथि पर माँ का पूजन अर्चन करने आते है । मीरजापुर आदिवासी संस्कृति और दस्यु संस्कृति का प्रधान केंद्र था । यहा आदिवासी राजा होते थे । सबरों का भी विंध्याचल के जंगल में निवास होता था । यह आदिवासी टोना, टोटका, ओझयती तथा सोखयती के साथ - साथ शक्ति के पूजक थे । उन्होंने शक्ति स्वरूपा माता विंध्यवासिनी आराधना करना स्वीकार किया । माँ विंध्यवासिनी की पूजन सामग्री तथा फल फूल जो है उनमें अभिजन्य संस्कृति में स्वीकार सेव, अनार तथा अंगूर नहीं है,  बल्कि रोरी, रक्षा, बतासा और लाची दाना है । जो आम जन के लिए उपलब्ध हैं ।
साहित्यकार बृजदेव पाण्डेय ने बताया कि शिव और शक्ति द्रविणों और आदिवासियों के देवता थें । शिव का सांप लपेटना और मंदार की माला , धतूरा तथा बेलपत्र से प्रसन्न होना । शक्ति का नगाड़ा, धुधुका तथा  तासा आदि बाजाओ से प्रसन्न होना इस बात का प्रतीक है कि यह दोनों देवता वन वासियों के देवता थें । जिनके पराक्रम को देख बाद में इन्हे आर्यो ने स्वीकार किया ।
   पतित पावनी गंगा तट के दक्षिण भाग में विंध्य पर्वत पर विराजमान माता विंध्यवासिनी का चरण पखारने के लिए गंगा ने इसी स्थान पर पूर्व वाहिनी होकर काशी के लिए उतर वाहिनी होकर निकल जाती है । आदिशक्ति विंध्यवासिनी से मिलने के लिए गंगा आतुर रहती थी । इसलिए आदिशक्ति और गंगा का संगम धरा पर इसी स्थान पर होता है । विंध्याचल देवी के संदर्भ में पुराणों में अनेक मत है । वामन और मार्कण्डेय पुराण आदि मानते है कि देवी की स्थापना देवराज इंद्र ने की थी । इंद्र ने देवी की स्थापना विंध्य पर्वत पर क्यों किया इसके पीछे यह अवधारणा है कि देवी विंध्यवासिनी की बहन गंगा हैं । उनकी तीव्र उत्सुकता गंगा से मिलने की थी । इसलिए इंद्र ने इस पर्वत पर आदिशक्ति की स्थापना की । एक और मत है कि समूचा विंध्य पर्वत शैव और शाक्य संस्कृति से प्रभावित है । शिव और शक्ति अभिन्न है । यह क्षेत्र पहले वैष्णव प्रधान संस्कृति का नहीं था । इसलिए उपयुक्त स्थान मानकर देवी की स्थापना की गयी । देवी भागवत और दूसरे शाक्य पुराण यह मानते हैं कि दानव संस्कृति के अंत के लिए त्रिदेवों के साथ- साथ अन्य देवताओं ने अपने तेज को एक आकार दिया जिससे तेजस्विनी माता विंध्यवासिनी का अवतरण हुआ । उन्होंने महिषासुर सहित अनेक दुर्दांत दानवों का अंत किया ।     कुछ विद्वान ऐसा मानते है कि विंध्याचल के जंगलों में रहने वाले भैंसे बहुत शक्तिशाली होते थे । उनसे सिंह भी भयभीत होते थे । वह इतने हिंसक और घातक होते थें  कि वन्य जातियां भी घबड़ाती थी । इसलिए वन्य जातियों ने शक्ति स्वरूपा माता विंध्यवासिनी का आहवान किया और शक्ति ने भैंसों का वध किया । उन्हीं भैंसों को प्रतीकात्मक रूप में महिषासुर कहा जाता हैं । भैंसों का वध कर भक्तों को भयमुक्त करने वाली देवी को महिषासुर मर्दिनी कहा जाता है । नवरात्र में प्राचीन काल में अष्टमी तथा नवमी को सबरोत्सव होता था । सबर बाजा - गाजा के साथ माता विंध्यवासिनी की अर्चना के लिए आते थें  । जबतक इनकी पूजा नहीं होती थी तबतक नवरात्र का भी पूजन विधान पूरा नहीं होता था ।
   मान्यता हैं कि शिव - शक्ति द्रविणो और आदिवासियों के देवता थे । इनकी पूजा आराधना जंगलों में सरलता से मिलने वाले फल फूल से की जाती थी । जंगलों में कशेरु, फालसा, कमलगट्टा आदि बहुतायत थें  । प्राचीन काल में इन्ही पदार्थो से देवी की अर्चना करते थे । इसलिए भी लगता हैं कि माता विंध्यवासिनी वन देवी थी जो जन देवी बनी । आज यह सर्वजन देवी के रूप में पूजित हैं । वाममार्गियों ने देवी विंध्यवासिनी को भी अपना इष्ट माना और पूजा तांत्रिक विधि से करते हैं ।

गुरु और माता के चरण पड़ने से विंध्याचल हुआ पावनधाम
***************************
     मां विंध्यवासिनी धाम की महत्ता जहां पौराणिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है वही वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसकी महत्ता बहुत ही अधिक है । पौराणिक आख्यानों के अनुसार पवित्र क्षेत्र विंध्याचल के शक्तिमान होने के पीछे महादेव की आराधना भी है और विंध्याचल पर प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने उसको सर्वश्रेष्ठ होने का वरदान दिया था । विंध्याचल द्वारा स्थापित शिवलिंग भी द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल है । विंध्याचल परिक्षेत्र महादेव की अनुकम्पा से आज भी ऐश्वर्ययुक्त है ।
  विंध्याचल धाम की महिमा बताते हुए आध्यात्मिक साहित्यकार सलिल पांडेय ने बताया कि शिवपुराण के कोटि रूद्र संहिता के अध्याय 18 के अनुसार ऋषि नारद मर्त्यलोक में भ्रमण करते जब इस पर्वत पर आए तो विंध्यपर्वत यद्यपि नारद के सम्मान में सेवा के लिए दौड़ पड़ा लेकिन उसकी बातों में नारद को अहंकार दिखाई पड़ा । विंध्यपर्वत ने कहा था- हे मुनिश्रेष्ठ, मेरे यहां रहिए । यहां सब कुछ है । किसी चीज की कमी नहीं है । नारद को विंध्याचल की बातों में अभिमान झलकता नजर आया । वे बोले- तुम्हारे पास सब कुछ है लेकिन देवमंडल में सुमेरु पर्वत का महत्त्व ज्यादा है । इससे दुःखी होकर विंध्याचल ने नर्मदा नदी (मध्यप्रदेश के खंडवा) के तट पर पार्थिवशिवलिंग की स्थापना की ।यद्यपि एक ही ज्योतिर्पीठ है लेकिन जो मन्त्र पढ़े गए वह ओंकारेश्वर एवं पार्थिव शिव को अमलेश्वर की मान्यता महादेव ने दी । इस प्रकार विंध्याचल पर्वत इतना श्रेष्ठ हुआ कि सूर्य का मार्ग भी अवरुद्ध करने में सफल हुआ था । सलिल पांडेय ने कहा कि महादेव के आशीर्वाद से वह उच्चता प्राप्त करने में समर्थ हो गया । वह सूर्य के तेज से भी अधिक तेज अर्जित करने में समर्थ हुआ । पुराणों के अनुसार एक रात जब विंध्याचल अनन्त ऊँचाई को प्राप्त हो गया और प्रातः सूर्यदेव उदित हुए और उनका मार्ग अवरुद्ध हो गया तब धरती के उत्तर के भाग भीषण गर्मी से जीव-जंतु झुलसने लगे तथा दक्षिण भाग में अँधेरा ही अंधेरा छा गया । देवमण्डल में खलबली मच गयी । सारे देवता असहाय हो गए । भगवान विष्णु के पास गए । उन्होंने भी  विंध्याचल को महादेव द्वारा दिए गए आशीर्वाद के चलते कहा कि वे कुछ नहीं कर सकते । अलबत्ता उन्होंने कहा कि इसके लिए विंध्याचल के गुरु अगस्त्य के पास जाना होगा । देवता गुरु अगस्त्य के पास आए ।  गुरु अगस्त्य जब विंध्याचल के पास आए तो वह विनम्र हो कर झुक गया ।
     सलिल पांडेय ने बताया कि शक्तिमान होने के बावजूद जो श्रेष्ठ जनों के समक्ष विनम्र होता है, उसको प्रसिद्धि मिलती है । देवी भागवतपुराण के अनुसार विंध्याचल की ब्रह्मांड में इसी प्रसिद्धि के चलते सृष्टि के आरंभ में मनु-सतरूपा की आराधना से प्रकट हुई त्रिपुर सुंदरी शक्तिस्वरूपा मां ने उन्हें आशीर्वाद देकर कहा कि अब मैं विंध्याचल जा रही हूं । जहां मैं  विंध्यवासिनी के नाम से जानी जाऊंगी । जब मां यहां आयीं तो उसके बाद से अन्य देवी-देवताओं का भी यहां आगमन शुरू हो गया ।
    सलिल पांडेय ने बताया कि जिसके सिर पर ज्ञान देने वाले गुरु स्वयं आ जाएं तथा प्रेम-स्नेह देने वाली मां के चरण पड़ जाएं है, वह तो भाग्यशाली हो ही जाता है । फिर तो उसका डंका चहुंओर बजने लगता है । गुरु और माता के आगमन से विंध्यपर्वत जो जंगली जीव-जंतुओं से घिरा था, वह पावन हो गया । इस धाम में मां विंध्यवासिनी गरीब-अमीर, पावन-अपावन सबको आशीर्वाद देती हैं। इसीलिए विशेष सुविधाओं की व्यवस्था नहीं भी इस क्षेत्र में मिलती है  तो भी हर वर्ग के लोग नवरात्र के अलावा भी मातारानी का दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं ।

     महात्रिकोण क्षेत्र *******************
     त्रिदेवियों के मंदिरों का जहां अपना पौराणिक महत्व है। वहीं यहाँ नवरात्र में महात्रिकोण क्षेत्र में अद्भुत नजार देखने को मिलता है। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सभी नंगे पांव त्रिकोण परिक्रमा करते हैं। पूरी रात देवी भक्त त्रिकोण साधना में जुटे रहते हैं। दिन में तप रही भूमि भी उनके पथ को विचलित नहीं कर रही है। विंध्याचल क्षेत्र में स्थित महा त्रिकोण परिक्रमा का भी विशेष महत्त्व शास्त्रों में वर्णित है। नवरात्र पर्व पर यहां आने वाले प्रमुख संत नरहरि बाबा का कथन रहा है कि भगवान शंकर के तीन नेत्र से ही त्रिकोण  बनता है । तीनों गुणों की अधिष्ठात्री शक्तियां इसका निर्माण करती हैं। त्रिकोण क्षेत्र में आदि शक्ति जगदंबा  तीन स्वरूप महालक्ष्मी (विंध्यवासिनी) ,मां सरस्वती(माता अष्टभुजी )और महाकाली( काली खोह) का मंदिर स्थित है। अन्य देवी देवताओं के मंदिर भी त्रिकोण मार्ग में पड़ते हैं। विंध्य क्षेत्र जिसे  गंगा  स्पर्श करती है । इस कारण इसका सर्वाधिक महत्व है । विंध्याचल के त्रिकोण का मध्य रामेश्वर मंदिर है। इसके अलावा  इस क्षेत्र में शिव, राम, हनुमान आदि देवी देवताओं तथा शिव शक्ति के गण भी अधिष्ठापित हैं।  विंध्य क्षेत्र के बाबा भैरवनाथ , लाल भैरव, काल भैरव कोतवाल के रूप में विराजमान हैं । त्रिकोण यात्रा प्रारंभ करने के लिए यात्री को शुद्ध, सात्विक एवं एकाग्र होकर गंगा स्नान करना पड़ता है।  त्रिकोण यात्रा मार्ग में गंगा स्नान के पश्चात मां विंध्यवासिनी देवी, शीतला मंदिर पकरीतर ,भैरव भैरवी (थाना कोतवाली), श्री हनुमान जी बरतर, ग्राम देवी सायरी देवी, वनखंडी महादेव, बंधवा महावीर, पातालपुरी हनुमान जी, करणगिरी की बावली,  काली खोह , भैरव जी भूतनाथ, कामाख्या देवी, गणेश जी , गेरुआ तालाब ,भगवान श्री कृष्ण जी, मुक्तेश्वर( मोतिया तालाब),  मां अष्टभुजा देवी मंदिर ,, भैरव कुंड,  मत्स्येंद्र स्थली, मंगला गौरी , रामेश्वर नाथ, तारा देवी , राम शिला ,संकटा देवी,  शीतला माता , प्रत्यगीरा माता, निहुत महावीर,  चामुंडा देवी, बिंदेश्वर महादेव मंदिर होते हुए पुनः मां  विंध्यवासिनी के साथ ही पताका दर्शन भी करना होता है। नंगे पांव चिलचिलाती धूप में कंकड़ युक्त सड़कों पर बिना विचलित त्रिकोण साधक अपना परिक्रमा पूरा कर रहे हैं वृद्ध ,महिलाएं ,बच्चे भी रात्रि में समूह में त्रिकोण परिक्रमा करते देखे जा रहे हैं । संतों के अनुसार एक त्रिकोण परिक्रमा करने मात्र से सहस्त्र चंडी यज्ञ का फल प्राप्त होता है  वैसे अधिकांश साधक जो त्रिकोण परिक्रमा करने में असमर्थ हैं। वे विंध्यवासिनी मंदिर के गर्भगृह परिसर में ही स्थित देवी देवताओं का दर्शन पूजन करते हैं।  इन्हीं से उन्हें त्रिकोण का फल प्राप्त होता है । गर्भ गृह परिसर में दक्षिण दिशा में महाकाली, पश्चिम में महासरस्वती एवं सदाशिव विराजमान हैं । इस तरह से जो त्रिकोण पूरा होता है, उसे लघु त्रिकोण  कहा जाता है। वैसे, विंध्य क्षेत्र में वृहद त्रिकोण (पंचकोशी) यात्रा का वर्णन है।  इसके अंतर्गत कई दर्शनीय स्थल हैं। तारकेश्वर नाथ महादेव मंदिर , संकटमोचन महावीर मंदिर , बूढ़े नाथ महादेव मंदिर, नारघाट काली मंदिर, लोहंदी महावीर , लाल भैरव, विंध्येशवर महादेव, भगवान वामन मंदिर ओझला, लाल भैरव, दुग्धेश्वर महादेव,  नाग कुंड, सप्त सागर,  कंकाल काली, इत्यादि प्रमुख मंदिर इस पंचकोशी यात्रा क्षेत्र में पड़ते हैं।
   वैसे, नियति से पथिक को नारी शक्ति के माध्यम से उपहास ही मिला है, फिर भी उसे नमन है, इस शक्ति पर्व पर..।

       ---शशि गुप्ता

Thursday, 4 April 2019

सवाल जिंदगी से !


सवाल जिंदगी से !
**************
चलो  जिंदगी  से
 एक  सवाल पूछता हूँ
कौन  अपना कौन पराया ?
 ये राज पूछता  हूँ

खूबसूरत कैनवास तेरा
जब  भी होता बदरंग
  रिश्ते  जिंदगी  के
कैक्टस से देते क्यों चुभन ?

गेंदा,गुलाब,चम्पा,चमेली
है फूल तेरी बगिया में अनेक
 फिर किसी को दे "पलाश"
उसकी प्यास का उपहास क्यों?

प्रीति, स्नेह , वात्सल्य
 तेरे मधुशाला में हैं सब रंग
खो गये  कहाँ स्वपन मेरे
 बोल क्यों दिये तूने ये दण्ड?

ये ज्ञान ,वैराग्य ,दर्शन, धर्म
  ना समझाओं तू मुझको
हुआ क्यों  कोई न अपना ?
आ धैर्य बंधा जाता मुझको

थें हीरे,जवाहरात,मोती,मूंगा
 ना मिले प्रेम के दो शब्द
क्यों भिक्षुक सा पात्र लिये  ?
  बन बटोही भटक रहें हम

फूलों का  हार बन के
  जो न  महके थें कभी
भूलों की  बात  कह
वे  फिर उड़ाते  क्यों  हँसी ?

जिंदगी कर एक उपकार तू
  जब मृत्यु सेज पर हो ये तन
कोई आये यह कह जाए
 दर्द जीवन में क्यों तूने पाये ?

               -व्याकुल पथिक

Tuesday, 2 April 2019

स्वांग

स्वांग
******

हैं रातें रंगीन जिनकी
  वे  वाह-वाह किया करते हैं
किसी की उदासी पर क्यों ?
 वे  मुस्कुराया  करते हैं

सम्वेदनाओं की झोली उनकी 
 फिर भी है  क्यों खाली  ?
   शब्दों  की   चाशनी में
   जो जहर पिलाया करते हैं

नियति ने  दे रखी  है
  जिन्हें  अपनों  का  साथ
  यतीमों  के दर्द पर क्यों ?
 वे  खिलखिलाया  करते हैं

बनते  तो हैं  वे सभी
  सकारात्मकता के पुतले
 फिर अपने ग़म में यूँ
क्यों  छटपटाया करते हैं ?

खुशियों का मुखौटा जिन्होंने   
  लगा  रखा  है  सुहाना
दिल के आईने में चेहरा उनका
  क्यों  बुझा- बुझा होता है ?

 दर्द छुपा बैठें हैं वे भी कई
   उजालों का मगर स्वांग रचते हैं
 सच से मिलती जब भी निगाहें
   वे क्यों तिलमिलाया करते हैं ?

ठहर पथिक तू तनिक  ठहर
   इन मीठी बोलियों को तौल
 मौसम चुनाव का है गंभीर
  नेताओं सा ढ़ोग ये किया करते हैं
         - व्याकुल पथिक 

Sunday, 31 March 2019

अप्रैल फूल

अप्रैल फूल
*********
'अप्रैल फूल बनाया तो उनको गुस्सा आया ...'
    आज भी अप्रैल फूल के दिन यह गीत लोग गुनगुनाते हैं।
पश्चिमी देशों में एक अप्रैल को यह मूर्ख दिवस मनाने का प्रचलन रहा हैं, चूकि हम भारतीय भी अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं। अतः उनकी संस्कृति, उनकी भाषा और उनका पहनाव भी हमारा हो गया है। जो दो शब्द अंग्रेजी में बोल लेते हैं, वे जेंटलमैन समझे जाते हैं। अभिभावक हिन्दी भाषा में साहित्य सृजन करते हैं, परंतु उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करते हैं। यही कठोर सत्य है , हम भारतीयों का ?
   खैर बात मुझे अप्रैल फूल दिवस पर करनी थी और मैं भी न हिन्दी - अंग्रेजी में उलझ गया,  इसीलिये तो मित्रगण कहते हैं कि पत्रकारिता का बस्ता उतार फेंको, तब जीवन में तुम्हारे भी उल्लास आएगा। अन्यथा जेब खाली और बने रहो समाज के रखवाले। वो क्या कहते है न कि चौथा स्तंभ।  मैं भी समझता हूँ उनकी बातों में दम है, सामने पड़ी भोजन की थाली को यदि ठुकरा देंगे, तो फिर पूरे दिन  क्षुधा परेशान करेंगी ही। सो, मेरे जैसों के साथ भला अप्रैल फूल कौन मनाये । जो पहले से ही मूर्ख हैंं ,जीवन के इस सत्य को समझ न सका कि इस अर्थयुग में पैसे की ही प्रधानता है, जो अपने और पराये में फर्क नहीं कर पाया हो, उसके लिये तो जीवन का प्रत्येक दिन मूर्ख दिवस ही तो है ?
   ऐसी ही मनोस्थिति में यदि  कुछ भी मधुर स्मृतियाँ हो , अपने अच्छे दिनों की तो उसका अवलंबन निश्चित ही हमारे अधरों पर एक मुस्कान तो ला ही देगा। अपने इस यात्री गृह में  बैठे- बैठे आज जब मन बोझिल सा हो रहा था , तभी इस अप्रैल फूल दिवस का स्मरण हो आया। देखे न यह मन भी कितना चलायमान है कि वह तत्काल वर्षों पीछे अतीत में ले जाकर पटक देता है। जब पथिक बालक था और कोलकाता में अपने बाबा- माँ के साथ रहता था। बाबा नीचे मिठाई के कारखाने में और हम माँ बेटे ऊपर चौथी मंजिल पर। माँ तो अस्वस्थ होने के कारण अपने बेड पर ही बैठी रहती थीं और उनका मुनिया जो था , वह एक दिन पहले से ही योजनाएँ बनाने लगता था कि अप्रैल फूल दिवस पर विद्यालय , घर और कारखाने में किसे किस तरह से मूर्ख बनाना है। परंतु यह कार्य थोड़ा कठिन था , क्यों कि झूठ बोल कर नहीं वरन् कुछ  ऐसा खिला कर उन्हें मूर्ख बनाना था । है न कठिन कार्य , भला कोई आपका दिया क्यों खाएँगा ? तो माँ का सहारा लेता था कि हाड़ी दादू(नाना) देखे न आपके लिये  आज क्या  लेकर आया हूँ। माँ ने बनवाया है और मुझसे कहाँ है कि आपलोगों के लिये भी है। अब सामने पकवान हो और माँ ने भेजा हो, फिर इंकार कौन करेगा , अतः एक ही झटके में हाड़ी दादू, घोष दादू और बैनर्जी दादू सभी पकौड़ा खा लेते थें । फिर तो उनका क्या हाल होता था यह मत पूछे और मेरी हँसी थमती नहीं थी, क्यों कि उसमें इतनी अधिक हरी मिर्ची पड़ी होती थी कि मेरे इन बंगाली दादू लोगों का पूरा चेहरा लाल हो जाता था। लेकिन, साथ ही मैं उनके लिये बढ़िया वाला पकौड़ा और खीर या कुछ अन्य मिष्ठान भी लेकर जाता था। यह शिष्टाचार भी माँ ने सिखाया था कि किसी के साथ मजाक का यह मतलब नहीं कि उसे मिर्ची वाला पकौड़ा खिला कर छोड़ दो।  तब पांचवीं मंजिल पर एक कारीगर काम करते थें। ये पकौड़े वे ही बना देते थें।
       इसी दिन माँ को देखने लिलुआ से बड़ी माँ आ गयींं, तो उन्हें भी मैं छोड़ता नहीं था।  बड़ी माँ , जो दूर के रिश्ते में थीं , उनका स्मरण होते ही न जाने क्यों आँखें नम हो गयी हैं।  जमींदार परिवार की थीं, परंतु विशाल भूखंड होने के बावजूद भी यदि घर का मुखिया कामधंधे में रूचि न ले तो सब व्यर्थ है। फिर भी अपने परिवार की समस्या को भूला कर वे लोकल ट्रेन पकड़ कर सप्ताह में चार- पाँच दिन राजाकटरा, बड़ा बाजार आती थींं।  शाम को वे आती थींं और रात दस बजे जाया करती थींं। माँ ने अंतिम सांस उन्हीं के समक्ष ली थी और कोई भी महिला नहीं थी , उस रात परिवार की। मेरी मम्मी और मौसी भी नहीं। उन्होंने ही मुझे   सब्जी और पराठे बनाना सिखलाया था, बाद में माँ से पूछ लिया करता था।
    वे मेरे खुशी के दिन थें। एक अप्रैल को मैं उछल कूद कर पांचवीं मंजिल से लेकर नीचे कारखाने और दफ्तर  एक कर दिया करता था । इतनी चतुराई से पकौड़े खिलाता था कि दूसरे को पता ही नहीं चल पाता था। अब तो स्वयं से ही यह सवाल कर बैठता हूँ कि बारह वर्ष का बालक को इतनी बुद्धि कहाँ से आ गयी थी।  माँ के जाने के पश्चात मुझे याद नहीं है कि पुनः कभी यह अप्रैल फूल दिवस  आया मेरे जीवन में। हाँ , जब यहाँ मीरजापुर आया, तो इस दिन मेरे एक मित्र ने झूठी बड़ी घटना बता दी । सांध्यकालीन समाचार पत्र का प्रतिनिधि होने के कारण, यह खबर छूटे नहीं इसके लिये मैं अस्पताल ,पोस्टमार्टम और पुलिस अधीक्षक कार्यालय दौड़ता रहा।  मोबाइल फोन का युग तो था नहीं । जब कहींं से भी उस समाचार की पुष्टि नहीं हुई , तो मन उदास हो गया कि दोपहर के ढ़ाई बजने को है,लगता है कि आज मेरी खबर छूट जाएगी। मेरा लटका हुआ चेहरा देख, तब जा कर मित्र महोदय ने ठहाका लगाया था कि आज कौन सा  दिन है पता है तुम्हें ? मैंने कहा कि यह भी कोई पूछने की बात है। जो बताना है, वह तो बस अधूरा बता मजा ले रहे हो। तुम्हें क्या पड़ी है, समाचार तो मेरा छूटेगा न ? तब जनाब ने मुस्कुराते हुये कहा था कि अप्रैल फूल । बस इसके बाद आज तक किसी ने मुझे इस दिवस पर मूर्ख नहीं बनाया, इस जिंदगी को छोड़...।
 वैसे चुनावी माहौल है और जनता को मूर्ख कौन बनाते हैं,यह पता है न आपको ? तो मतदान के दिन प्रयास करें हम सभी कि यह दिवस आगामी पांच वर्षों के लिये हमारे लिये अप्रैल फूल न हो। योग्य प्रत्याशी को परखे , झूठे आश्वासनों में न बहके। इन सियासी रहनुमाओं ने इस लोकतंत्र के पर्व को झूठ दिवस में बदलने के लिये कुछ इस तरह से अपने वायदों का पिटारा खोल रखा है-

लो सजी बिसात सियासत की
   गरीबी हटाने वालों ने कहा
अब गरीबी मिटाएंगे हम
  अच्छे दिन के ख़्वाब न देख
ये वादा है मेरा ,सुन बे गरीब
  तुझे रोटी कपड़ा मकान तो नहीं
सम्मान और रोजगार भी नहीं
   हम तेरी गरीबी पर तरस खा
   वादों की चाशनी में  तुझे अभी
     और पिघलाएँगें ,फिरभी कभी
 साम्यवाद - समाजवाद नहीं लाएँगे..

            -व्याकुल पथिक
           31 मार्च 2019

Friday, 29 March 2019

ये आँसू तुझको बुला रहे हैं

ये आँसू तुझको बुला रहे हैं
********************

ये रातें ज़ुल्मी सता रही हैं
   ये यादें तेरी  रुला रही हैं

तुम नहीं तो है कौन मेरा
   रुदन नहीं ये बुला रही हैं

 हैं सूनी राहें और ये निग़ाहें
    तुम्हें न पा के तड़पा रही हैं

जो आग तुमने लगा है रखी
 आँसू उसे अब ये  बुझा रहे हैं

इन आँसुओं में प्रीति है देखो
  तुम्हें खुशी दे खुद  रो रहे हैं

खुद रो रहे हैं बुला रहे हैं
   हाल-ए- दिल  ये बता रहे हैं

है उम्मीद मेरी ये आरजू मेरी
  ये हसरतें मेरी  शिकायतें मेरी

ठहर जा पल भर वो जाने वाले
  ये प्यास है मेरी  बुला  रही है

तुम्ही से तो थीं खुशियाँ हैं मेरी
   अर्ज ये सुन लो थमे जो आँसू

न कोई मंज़िल न है ठिकाना
   इन अश्कों को यूँ बहते है जाना

है तोहफ़ा तेरा मेरे दो आँसू
   मन के  मोती  ये  श्रृंगार मेरे

शोलोंं पे मचलती बन के शबनम
     ये आग दिल  की  बुझा रही है

ठहर जा पल भर,वो जाने वाले
   ये आँसू  तुझको  बुला  रहे हैं

   ये   अश्रु  मेरे  ये  नीर मेरे
     नयनों  का जल है  ये पीर मेरे

  गुजर  गये जो  थे वक्त  मेरे
     वे आँसू  बन क्यों बिखर रहे हैं

                  -व्याकुल पथिक











Thursday, 28 March 2019

नियति का कटाक्ष


नियति का कटाक्ष
 ***************
न अमृत की चाह हो   
 मृत्यु  भी  उपहार  हो
कर्म का उपहास हो
पथिक तुम बढ़ते चलो

कहीं ना  प्रकाश हो
 अधर्म का सम्मान हो
भ्रष्ट  तंत्र साथ हो
 रुको नहीं बढ़े चलो

नियति का कटाक्ष हो
  धर्म  जब  परास्त  हो
समय भी प्रतिकूल हो
 पथिक  तुम बढ़े चलो

हृदय में संताप  हो
  स्नेह की न आस हो
प्रीति पर आघात हो
   धीर  धर  बढ़े  चलो

मित्र न  कोई साथ हो
  पथ  में  अंधकार  हो
संघर्ष सभी व्यर्थ हो
 है  कर्मपथ , बढ़े चलो

बसंत का  उन्माद हो
  फाग   का परिहास  हो
बन पावस बरसो,मगर
 अग्निपथ पर  बढ़े चलो

सकारात्मकता का प्रलाप हो
  सम्वेदना  करे  विलाप क्यों ?
नकारात्मक   संग   लिये
       मुक्तिपथ पर बढ़ते चलो

सूना  यह  संसार  हो
   यादों  की  बरसात  हो
वैराग्य करें विश्वासघात जो
     है धर्मपथ ,  बढ़े   चलो

          - व्याकुल पथिक

मो0 9415251928
      7007144343



 



Wednesday, 20 March 2019

अपनी अपनी किस्मत है ये..

अपनी अपनी किस्मत है ये..
****************************
 भले ही वह टूटे हुये साज़ से बसंतोत्सव न मना सका हो और न फागुन के गीत उसकी जुबां पर हो, फिर भी वह दर्द को चंद शब्द दे सकता है।
*****************************
अपनी अपनी किस्मत है ये
कोई हँसे, कोई रोये
 रंग से कोई अंग
भिगोये रे कोई
असुवन से नैन भिगोये..

  आयी मस्तों की टोली,खेलेंगे हम होली...। होली का पर्व हो और यह गाना सुनने को न मिले , यह कैसे सम्भव है । चाहे परिस्थिति कैसी भी हो किसी के खुशी और किसे के ग़म में बराबरी का साथ निभाता है यह गीत ।
 किस्मत , नियति, प्रभुकृपा, पूर्व जन्म का संचित कर्म  और  वर्तमान में किया गया धर्म-कर्म इन सब बातों में उलझ कर रह जाता है यह मानव जीवन। कभी किसी का हृदय इस कदर व्यथित हो जाता है कि जीवन के प्रति अनाकर्षक की मनोस्थिति में पर्व- त्योहार की आहट सुनाई ही नहीं पड़ती और यदि पड़ी भी  हृदय की पीड़ा को पुनः बढ़ा जाती है।
   फिर भी सत्य यही है कि जब तक जीवन है, तभी तक ये सारी अनुभूतियाँ हैं , हर्ष है एवं विषाद भी है। अन्यथा जब भी ऐसी खुशी के अवसर पर पथिक को माँ की याद आती है। मुकेश की यह आवाज -

 दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते है कहाँ
 कैसे ढूंढे कोई उनको, नहीं क़दमों के भी निशाँ
 जाने है वो कौन नगरिया, आये जाए ख़त न खबरिया
 आये जब जब उनकी यादें, आये होठों पे फरियादें
 जाके फिर न आने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ...

    फिर से दर्द दे जाती है । विचित्र सफर है जिंदगी का भी, इंसान अपने ख़्वाबों को सच करने के लिये क्या नहीं करता है। हर कोई दिवास्वप्न ही नहीं देखता है, अनेक ऐसे भी हैं कि अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिये कितनी भी कठिन राह क्यों न हो, उस पर चलते हैं, बढ़ते हैं।  सांप- सीढ़ी के खेल की तरह उन्हें कोई गॉड फादर नहीं मिलता कि वह पलक झपकते ही आसमान से बातें करने लगे। वह तो बड़े धीरे-धीरे कदम जमा कर लक्ष्य की ओर बढ़ता है, फिर भी यदि उसका यह समर्पित कर्म नियति  को रास नहीं आयी , तो वह उसके लक्ष्य के मार्ग में सीढ़ी बनने की जगह सर्प बन डस लेती है। ऐसे में कर्म का उपासक टूट जाता है और बिखर जाता है। कोई सांत्वना , प्रार्थना और  ऐसी खुशियों के पर्व उसके लिये बेमानी है।
   यहाँ तक कि योगेश्वर कृष्ण की गीता का यह ज्ञान भी कि कर्म करते रहो , फल की कामना न करो। जब पुनर्जन्म का कोई साक्ष्य न हो, तो वर्तमान में किये गये कर्म के अनुरूप ही मानव को दण्ड और पुरस्कार क्यों नहीं मिलता ? यदि यह न्याय व्यवस्था तय होती, तो सारे क्लेशों का निराकरण स्वतः ही हो जाता। परंतु यह कौन सी किस्मत है कि कर्म उससे समझ नतमस्तक है, सिवाय यह कहने के-

   ज़िंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र
   कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
  है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर
   कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं ..

     अतिथिगृह(चंद्रांंशु भैया के राही होटल)  में एकाकी पड़ा पथिक रंगोत्सव के इस पर्व पर जीवन के इसी रहस्य , सृष्टि के इसी सृजन और नियति के इसी उपहास पर  परिस्थितिजन्य कारणों से विक्षिप्त सा बना ठहाका लगा रहा था कि क्या खूब धर्म कर्म का भ्रमजाल फैला रखा है उसने , जबकि करती वह अपने मन की ही है। मानो एक  निरंकुश सत्ता , जिसके लिये न्याय- अन्याय की बात बेमानी है।
    दिन चढ़ने लगा है, बाहर होली का हुड़दंग शुरु हो गया है। यदि वह भी कोलकाता में होता , तो चौथी मंजिल से सड़क पर रंगों से भरा बैलून फेंकता और पीतल की वह पिचकारी जिसे तब उसके बाबा ने दिलवाया था, जब वह पाँच वर्ष का था, उसे ले जमकर होली खेलता, फिर सायं नये वस्त्र धारण कर अबीर लेकर निकलता । कांजीबड़ा, दहीबड़ा, सांगरी की राजस्थानी सब्जी और साथ में मेवे व केसर वाली खीर आज उसे मिलती। पर अब न तो माँ है , न ही बचपन, सिर्फ स्मृतियों का  एक झरोखा है और यह अस्वस्थ तन- मन । अभी तो उसे समझ में यह भी न आ रहा है कि आज सुबह क्या जलपान करे वह। दोपहर एक बजे की प्रतीक्षा है, उससे मित्रों ने कह रखा है कि आज दोपहर का भोजन उनके घर से  आ जाएगा। वैसे, नगर विधायक रत्नाकर मिश्र, पूर्व राज्यमंत्री कैलाश चौरसिया और केंद्रीय राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल के गुझिया वाले डिब्बे पड़े हुये हैं। हाँ , घनश्याम भैया ने आलू का पापड़ भी दे रखा है। विंध्यवासिनी भैया भोजन भेज ही रहे होंगे।
   उसे याद है कि बनारस की होली में तब गंदगी बहुत थी। रंगों की जगह नाली के कींचड़ से स्नान और कपड़ा फाड़ होली, बड़ा ही विकृत स्वरूप था। गदहा वाला बारात भी तो निकलता था। लेकिन, सायं होते ही बनारसी होली की भव्यता देखते ही बनती थी। नये वस्त्र पहन अधिकांश लोग दशाश्वमेध घाट की ओर जाते थें। चौसट्टी देवी दर्शन को जाने की वहाँ एक परम्परा है। यहीं बंगाली टोले का स्पंज वाला रसगुल्ला खाने को मिलता था। परंतु माँ की याद , उसके स्वाद को कड़ुवा कर देती थी। होली तो मुजफ्फरपुर(बिहार) में भी उसने कभी नहीं खेली है । हाँ , वह मालपुआ , जिसमें उसकी मौसी का स्नेह छिपा था, उसे कैसे भुला सकता है। वे तो जब होली पर मीरजापुर आयी थीं , तब भी उसके लिये इसकी व्यवस्था में पीछे न रहीं। मुजफ्फरपुर की होली में तब संयुक्त परिवार का उल्लास देखते ही बना । भले ही सभी का चूल्हा अलग था, परंतु संबंध आपस में मधुर थें। रंग खेलने.के लिये छोटे- बड़े ढेर सारे बच्चों की टोली तो घर पर ही थी। कलिम्पोंग की होली भी एकाकी ही बीती उसकी, लेकिन फिर भी भावी जीवन को लेकर एक उल्लास , उमंग और मनमीत की आश थी, जो पेट की भूख की आग, कठोर श्रम और समयाभाव  के कारण मीरजापुर की इन अनजान गलियों में कहीं गुम हो गयी। यहाँ वह ढ़ाई दशक से है, फिर भी  खुशियों से नाता कुछ इस तरह से टूट गया है कि किसी भी पर्व पर न जाने क्यों मन उदास हो जाता है और फ़िर तो कुछ यूं ही गुनगुनाते रहता है वह -

चल अकेला चलअकेला चल अकेला
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला
हजारों मील लम्बे रास्ते तुझको बुलाते
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुःख ना झेला...

  वैसे, गत वर्ष इसी मार्च माह में जब वह ब्लॉग पर आया था, तो व्याकुल पथिक बन कर, विरक्त भाव की चाहत में , परंतु इस लक्ष्य प्राप्ति  को लेकर अब बहुत उतावला नहीं है, क्यों कि वह जीवन का एक रहस्य तो समझ गया है कि पता नहीं यह नियति फिर से सर्प बन कब डस ले , सीढ़ी बन उसने कभी सहयोग तो किया नहीं, फिर भी धन्यवाद उसे , इस एकांत के लिये, जो पथिक को सृजन का अवसर दे रहा है। हाँ, इस आभासीय दुनिया में भी उसके कुछ शुभचिंतक हैं , जिन्होंने होली पर उसे भुलाया नहीं। यह भी पथिक के लिये बड़ी उपलब्धि है। भले ही वह टूटे हुये साज़ से बसंतोत्सव न मना सका हो और न फागुन के गीत उसकी जुबां पर हो, फिर भी वह दर्द को चंद शब्द दे सकता है।

होली के रंग में मिर्ज़ापुर के जैंटलमैन

बुरा न मानो होली है

होली के रंग में मिर्ज़ापुर के जैंटलमैन






रंग बरसेss मैडम  दुआर , बुआ-भतीजा तरसे ...
******************************

मिर्चपुर। ऐसी मारी पिचकारी सबकी डूबी लुटिया..रंग बरसे मैडम दुआर , रंग बरसे...
इहा सेंटर मनिस्टर अनुपिया के भरहुरा वाले पार्टी दफ्तरवा में चुनावी होली शुरु होई गवा बा । माननीय दम्पति क जुगलबंदी देखे बदे जवनकन से लइके बुढ़वन तक अगवाड़ - पिछवाड़ एक किये हयन । लहर नापे वाली मशीन बतावत बा की  "अनुप्रिया विकास ब्रांड"  चाय अऊरो मोदी क गुड़हवा जेलबी इ मीरजापुरियन की जीभ पर लासा की तरह लगल बा।अबही इ पता नही बा की चींटा लगी की मक्खी। तउनो पर मटक चटक के साथ आपन चेहरा देखाई की गुणावली गाने वालन क चउचक भीड़ जुटल बा । अउर एक बात इ बा की इहा क मलिकार आशीष फ़टेल का इंजीनियरिंग पावर देख बड़कन क सोशल इंजीनियरिंग फेल बा। इहे टीम में बुढ़ऊ चचा रमाकांत फटेल , मिनिस्टर क मीडिया  सलाहकार रामकुमार विश्वासकर्मा उऊरो नितिन विश्वासी, स्टोर कीपर संजय फटेल क रंग चोख बा।  मिनिस्टर साहिबा विकास का रंग गुलाल लेकर अपने बड़का भाई सांसद रामशकल अउरो छनवर क दुलरुआ विधायक राहुल परकाश कउल संग होली खेले निकले बाटिन। इहा उत्सव भवन में मोदनवाल बिरादरी क छुटका चउदली घनश्याम हेलुआई शोर मचायल बायन ' होरी खेलब मोदी संग यार ,
बलम तरसे मैडम कs रंग बरसे.. ।
मत खिसियाओ बबुआ हमार,
बुआ- भतीजा दुनो तरसे, वोट बरसे।
-------------
भोंपू हमार बरियार बा..
**********
मिर्चपुर। भोंपू हमार बरियार बा, नाम मोदी ब्रांड बा। सर्जिकल स्ट्राइक क बहार बा , अऊर मोदी के पार्टी क पो पो  बा। इहे शोरगुल में बुआ- भतीजे, बबुआ क दुलरिया बहिन क मसखरी गुम बा । काहे कि देश भर क पब्लिक " हई वाला ले " कह इन बड़कन नेतवन क एफ-16 की तरह लखेदत मारत बा। भगवा खोंस पलंग तोड़ तांडव जनता करत बा ।  हाल इ बा अपने जिला क कि कउनो भड़ैती विपक्षी दलन क खोंकी बंद नहीं कर पावत बा । अउरो सुना इ मोदी बैंड पार्टी इन बड़कन विपक्षी नेतवन का इ कह के परिहास करत बा कि जाओ- जाओ - जाओ किसी वैद्य की बुलाओ , तू है सत्तालोभी,मोदी- जोगी को बुलाओ...।  इ बैंड पार्टी क दो गो बड़का सरदार रत्नाकर मिसरी अउर रमाशंकर फटेल त हयन साथ में बिजिनेस मैन बंधु विश्वनाथ और बंशीधर अग्रवालिन भी झुमका गिरा रे, मोदी के बाजार में गा ठुमका लगावत हइन। संग में इ नचनिया बैंड पार्टी के थियेटर क मलिकार नीरज अगरवाल अउरो राही होटुल क गोकुल चंद्रांशु गो यल भी दुई  ढोलची भाई ज्ञानचनदर और सतीश अगरवाल  के साथ लइके पिछवाड़े से जोगीरा सा रा रा.. मोदी मारे पिचकारी का  चिल्ल- पों मचावत सबके मोदी रंग से तराबोर करइ में लगा हयेन । भयवा अब देखा रंग चढ़त बा की बुखार।
--------------

सरकार  केहू क होखे , हमके कहाँ बिसराम बा..
****************************

कविपुरम । "भइया ई इलेक्शन बा, जगाऊँ ब और ढकेलब हमार काम बा। अउर इलेक्शन बाद सलेक्शन  केहू क होई , हमके कहां बिसराम बा। काहे से कि हमार नम वईं डा0 विश्राम बा,ई समय प्रतापगढ़ हमार ठेकान बा "
   ....बलिया के कलक्टर से उत्कृष्ट सेवा सम्मान से जगमग अपने साहब का भौकाल सगरो टाइट बा। उ गाना बा न कि मोरे लचके ला कलमिया, त काशी , बलिया हिले ला। अपने इ मीरजापुर में जब बिसराम साहब एसडीएम रहलन , त जेहर-जेहर खोंखलन वहर के बड़कन नेतवन के काली खांसी होगइल। नाहीं पतियात है, तो गवाह में  छोटू फटेल भइया सामने खड़ा हैन। अबकि होली में इहो डाक्टेर साहब का पलंग तोड़ प्रोग्राम बा। उहे अमरदीप भइया क नयका रिट्रीट होटल में उनकर पुरुषार्थ क सम्मान बा, जेकरे बिलुका में धीर प्रताप जायकेवाल, ठाकुर ज्ञान परताप जइसन  कइयो जेंटलमैन लोगन क कारोबार बा , इहे देख गैलेक्सी होटल क रजी मियां खिसियान बायन , काहे से की इ टीम उनकरे होटल का पुरान मेहमान बा। त भइया पलंग तोड़े पुरुषार्थ सम्मान समारोह में जाये से पहिले , पतली गली क रस्ता हेरे के पड़ी। अउरो सुनी रउवा विशिष्ट मेहमान  रसड़ा क दमदार विधायक  उमाशंकर ठाकुर जी क हाल इ  चुनाव में उभयलिंगी बा । काहे से कि उनकर कारखास सोनू ठाकुर के पास जोगी सरकार क एगो गुप्त पैगाम बा। ठकुरसुहाती त बोले के पड़ी, शिक्षकन क सरदार पदमदेव दुवेदी क इहे निक सलाह बा ।
----------------
छोटा बच्चा जान के हमको....
*********************

मिर्चपुर। पालिटिक्स प्लेटलेट्स केकर बढ़ल - घटल बा, इ कुल नापे कs हम लइ कनक नाही काम बा, काहे से की बउआ हमार नाम बा...।
इ इलेक्सन में गुलाब जामुन, मलाई - रबड़ी , राजभोग क बहार बा ,पर हमने क हाल " ठनठन गोपाल बा " ।  तरमाल चापे के ना ही केऊ जुगाड़ बा। वइसे मंत्री त हमहूँ रहली अखिलेश भैया के राज में,कइलाश चउलसिया नाम सरनाम रहल। लेकिन , पांच बरस पहीले मोदी के अखाड़े में ताल का ठोकली की हाल इहे हो गइल बा कि डाइपर बेबी कही- कही के संगी दोस्त हमने के लुलुआत बा।  लेकिन इ मनोज भयवा के का भयल कि अपनही सरकार में लंगोटी ढील बा। जबकि घंटाघर क सरताज हयन । लगत बा उहो केहु के बिल - बिलुक्का में उंगली किये हयन।  रउवा संतोष इहे बात क बा कि हमरे टीम में जवाहर मोरिया, अब्दुल्लाह भाई  , सिद्धनाथ ठाकुर, आशीष गुझिया , मनोज खंड लवाल, संदीप गुप्त जइसन  धुरंधरों छुछुआत हैन । इ किस्मत क खेल बा, वइसे हमनी के अबकि जनता क  दुलरुआ बने के बा। जिन मिले रबड़ी- मलाई, इहे दुधवा पी कर हमनियों मोटात हई। उ गनवा बा न कि छोटा बच्चा जान के न कोई आंख दिखाना रे।  डुबी डुबी डब डब। अकल का कच्चा जानके हमको न समझाना रे...।