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Sunday, 26 May 2019

काकी माँ..




काकी माँ..
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   काकी माँ तो सचमुच बड़े घर की बेटी हैं।   संकटकाल में भी वक्त के समक्ष न तो वे नतमस्तक हुईं , न ही अपने मायके एवं ससुराल के मान- सम्मान पर आंच आने दिया । वे संघर्ष की वह प्रतिमूर्ति हैं ।
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     काकी माँ.. ! यह प्यार भरा सम्बोधन आज भी स्मृतियों में आकर मुझे आह्लादित कर जाता है। हाँ , इतने बड़े घर में एक काकी माँ ही तो थीं। जिनके समक्ष हुड़दंगी बच्चों की भी बोलती बंद हो जाया करती थी , फिर भी उनके चौखट पर हाजिरी देने परिवार के सारे बच्चे आया करते थें। आर्थिक परिस्थितियाँ चाहे जैसी रहीं हो, लेकिन काकी माँ न जाने कहाँ और किस तिजोरी से बिस्किट-टॉफी का जुगाड़ इन शैतानों के लिये किये रहती थीं। इनके जन्मदिन पर भी कुछ न कुछ वे देती ही थीं। कोई दर्जन भर बच्चे तो घर के ही थें।

   वैसे मैंने स्वयं किसी को कभी काकी माँ नहीं कहा है। परंतु बचपन में इस कर्णप्रिय शब्द को उस घर-आंगन में गूंजते हुये देखा है। जिसका अब अस्तित्व ही नहीं है। वहाँ न संयुक्त परिवार रहा,न बच्चे रहें और नहीं ही काकी माँ । अब तो वे नानी माँ बन गयी हैं।
    मैं यहाँ जिस भद्र महिला की बात कर रहा हूँ । विवाह के पूर्व वे बड़े घर की बेटी जैसी ही थीं । महानगर में रहती थीं  और अपने माँ- बाप की लाडली बिटिया थीं। जिस परिवार से तब वे संबंध रखती थीं, वे धनिक थें। बंगला, गाड़ी और नौकर भी सेवा में हाजिर रहते थें। वैसे तो, काकी माँ के पिता उतने संपन्न नहीं थें , क्यों कि जब वे छोटे थें तभी माँ की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्ति का बंदरबांट हो गया था । फिर भी रहन-सहन उनका धनिकों से कम नहीं था , यूँ  कहें कि वे दिल से अमीर थें । उनकी दो पुत्रियों में काकी माँ छोटी  हैं। हर कार्य में निपुण और व्यवहारिक ज्ञान ऐसा है कि  कई प्रांतों में फैले सगे सम्बंधियों से आत्मीयता आज भी कायम है।
     हाँ, जिनके बीच वे रहती थीं , उस सोसाइटी के अनुरूप जरा बन संवर के रहना पड़ता था। बनावट, दिखावट और मिलावट ,भद्रजनों की यह एक गंभीर बीमारी है । वे समाज में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करना चाहते हैं। अतः उनके साथ उठते- बैठते काकी माँ ने भी अपने ऊपर यह आवरण डाल रखा था।  सम्भवतः यदि वे ऐसा न करती तो हीन भावना से ग्रसित हो सकती थीं , उन्हें वह सम्मान नहीं मिलता और इन जेंटलमैनों की सोसायटी में कोई उन्हें स्वीकार नहीं करता ।
   इतने सम्पन्न परिवार के मध्य उनका अविवाहित जीवन ठीक-ठाक गुजर रहा था।  एक नटखट बालक कुछ वर्षों तक इस परिवार का अंग रहा। वह अपनी नानी माँ और मौसी माँ का राजदुलारा था । कोलकाता जैसे महानगर के पहचान वाले कान्वेंट स्कूल में उसे दाखिला दिलाया गया था। काकी माँ उसे अंग्रेजी की कविता रटवाया करती थीं।
   उन्हें पता था कि  हिन्दी भाषी तभी जेंटलमैन कहे जाते हैं, जब विलायती बोली उनकी जुबान पर हो। लेकिन , दो बंगालियों को आपस में अपनी भाषा छोड़  अंग्रेजी बोलते उन्होंने भी कम ही सुना होगा ।
  खैर वह शैतान बालक पढ़ने की जगह कमरे से लेकर बरामदे तक दौड़ लगाया करता था। माँ -बाबा( नाना-नानी ) तो उसे डांटते न थें कभी , ऐसे में काकी माँ की तिरछी नजरों से ही वह तनिक घबड़ाता था। वही क्या हर बच्चा काकी माँ की आँखों का इशारा समझता था। मायके और ससुराल दोनों ही जगह जब बच्चे शैतानी करते थें ,तो काकी माँ की सेवा ली जाती थी। ऐसे हठी बच्चों को रास्ते पर लाने के लिये  डांट- फटकार एवं  पिटाई की कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी काकी माँ को। वे तो बस आँखें तरेरती थीं और स्टेच्यू बनकर खड़े हो जाते थें, ये सारे हुड़दंगी बच्चे । मानो वे अनुशासन की पाठशाला थीं  । जिसने इसमें  प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया । वह अडानी- अंबानी परिवार के मध्य पहुँच कर भी अपनी परवरिश पर गर्व कर सकता है। फिर भी उस नटखट बालक को यह औपचारिकता पसंद नहीं थी। बचपन से ही उसे दुनिया की हर दौलत से कहीं अधिक प्रिय था ,अपनों से मिलने वाला प्यार - दुलार। इसी स्नेह और अपनत्व के लिये न जाने क्यों आज प्रौढ़ावस्था में भी वह उसी बालक सा  मासूमियत लिये मचलता है ?
    वह नादान ,जिन्हें अपना समझता है, उसी से जब कभी दुत्कार मिलता है। तो अस्वस्थ तन से कहीं अधिक उसका मन आहत हो उठता है। अपनी इस निर्लज्जता पर वह क्या कहे ! संत बनने की चाहत है और भिक्षुक बना स्नेह की याचना करता है। उसकी अंतरात्मा उसे झकझोरती है कि धिक्कार है उसके जीवन पर , संकल्प में जिसके बल न हो ।
    क्या यह विकल इंसान वही बालक है ,जो डिनर टेबल पर  प्लेट से चम्मच का टकराव न हो, काकी माँ  के इस फरमान को रद्दी टोकरी में डाल, कभी यह कहता था कि ऐसे भद्रजनों के मध्य उसका क्या काम ? उस बालक की निर्भिकता , स्पष्टवादिता एवं आत्म स्वाभिमान के समक्ष जब ऐसे जेंटलमैन मौन रहते थें, तो आज वह आत्मबल कहाँ चला गया उसका ?  सम्भवतः इसीलिये कहा गया है , " समय होत बलवान  "
   लेकिन, काकी माँ तो सचमुच बड़े घर की बेटी हैं।   संकटकाल में भी वक्त के समक्ष न तो वे नतमस्तक हुईं , न ही अपने मायके एवं ससुराल के मान- सम्मान पर आंच आने दिया । वे संघर्ष की वह प्रतिमूर्ति हैं , जो अपनी माँ , पिता , श्वसुर एवं पति की मृत्यु के पश्चात भी न टूटी और न झुकी ही।  तब ऐसे संकटकाल में भी अपने धनाढ्य सगे सम्बंधियों से  आर्थिक सहयोग उन्होंने नहीं मांगा था।
   विवाह के बाद जब तक उनकी माँ जीवित थीं , ससुराल आना-जाना लगा रहता था। पति उच्च शिक्षा प्राप्त थें, परंतु दुर्भाग्य से अथवा अपनों के छल से, उनका व्यवसाय ठीक से चला नहीं। फिर भी मायके की छत्रछाया  में उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय थी। लम्बी प्रतीक्षा के बाद एक नन्ही परी का आगमन उनकी माँ के रहते ही हो गया था। माँ ने तो पहले से ही नाती हो या नातिन  सारी व्यवस्था कर रखी थी। लेकिन, काकी माँ के धैर्य की कठोर परीक्षा तब शुरू हुई , जब माँ का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। ऐसे में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी बमुश्किल ही हो पा रहा था । काकी माँ को तेल और नमक से चावल खाते कभी सगे- संबधियों ने नहीं देखा । कभी- कभी इस मुट्ठी भर चावल के लिये भी पैसे नहीं होते थें। उन्हें हल्दीराम का भुजिया और समोसा अत्यंत प्रिय है। कोलकाता में थीं, तो बाबा दिन भर तरह तरह के चाट और महंगे फल भेजा करते थें। शाम को वह बूढ़ा नौकर  भेलपुरी बनवा कर लाता था। मलाई गिलौरी, मलाई लड्डू, काजू एवं पिस्ता बर्फी से लेकर संदेश, राजभोग , खीरमोहन और वह शुद्ध देशी घी का सोनपापड़ी तो नीचे कारखाने से ही  आ जाया करता था। लेकिन यह ससुराल में अपने मुहल्ले के चौक पर स्थित प्रसिद्ध दुकान से वह बड़ा वाला समोसा जो, तब पचास पैसे में मिलता था , उस एक छोटे सिक्के की व्यवस्था भी कठिन थी।
     परंतु उनका व्यक्तित्व इतना विराट था कि दरवाजे पर लटके पर्दे के पीछे के अपने जीवन संघर्ष की भनक तक उन्होंने अपने संयुक्त परिवार को लगने नहीं दिया। उनके हाथ की बिना घी लगी रोटी , कभी कड़ी नहीं हुआ करती थी। छोटी सी लौकी से वे रसेदार सब्जी इतना स्वादिष्ट बनाती थीं कि पकवान का स्वाद तक फीका पड़ जाता था।  दीपावली - होली जैसे पर्व घर आने वाले मेहमानों को उनके हाथों से बने व्यंजन इस तरह पसंद थें कि सबसे पहले वे काकी माँ के दरवाजे पर ही उनके पति अथवा पुत्री का नाम लेकर आवाज लगाया करते थें। कांजीबड़ा, दहीबड़ा, मालपुआ सहित तरह - तरह के पकवान बनाने की व्यवस्था वे कैसे कर लेती थीं, यह रहस्य उनके दिवंगत पति भी नहीं जान सके थें।
  हाँ,उनके शरीर पर से गहने एक-एक कर कम होते चले गये, फिर भी अपनी इस उदासी को पर्दे के उस पार नहीं जाने दिया। वह बालक जो समझदार हो गया था, उसे जब कभी वे अपने खाली हुये शरीर के उन अंगों को दिखलाती थीं, जिनपर मायके से मिले स्वर्णाभूषण शोभा बढ़ता थें, तो काकी माँ की डबडबाई आँखों में जिस दर्द को उसने देखा है, उसे कोई बड़े घर की बेटी ही सहन कर सकती है। फिर भी औरों के यहाँ आयोजित मांगलिक कार्यक्रमों में वे खाली हाथ कभी नहीं गयीं। बाद में एक दौर वह भी आया ,जब काकी माँ  को सुबह से शाम तक चौका - बर्तन करते देखा गया। मायके में जिन हाथों से वे झाड़ू पोछा तक नहीं करती थीं। उन्हीं नाजुक कलाइयों से वे घंटे भर चटनी और मसाला  पीसा करती थीं , क्यों कि उनके पति का व्यापार जब चौपट हो गया, तो पिता ने उन्हें नालायक समझ अपनी दुकान में मालिक नहीं, वरन् अघोषित सेवक के रुप में जगह दे रखी थी। सो, श्वसुर और उनकी मित्र मंडली के भोजन की सारी व्यवस्था काकी माँ ही किया करती थीं। श्रम उनका था और धन ससुर जी का।
   देखें न नियति को यह भी कहाँ मंजूर था। ससुर जी ने जैसे ही आँखें बंद की , उनके पति को अपने ही सगे सम्बंधियों ने पिता की दुकान से बेदखल कर दिया। यह घृणित कार्य करते हुये , तनिक भी नहीं पसीजे थें, उनके भाई- भतीजे। बिल्कुल सड़क पर आ गया यह दम्पति। जीवकोपार्जन के लिये किसी तरह से एक छोटे से विद्यालय में नौकरी मिली थी उनके पति को। घर पर काकी माँ भी छोटे बच्चों  को पढ़ा लिया करती थी। एक चिन्ता और थी उन्हें , पुत्री के लिये योग्य वर की खोज पूरी नहीं हो पा रही थी। उन्होंने तो बड़े घर की नातिन और अपने इकलौती संतान के लिये कितने ही स्वप्न संजोये थें। काकी माँ योग्य जमाता के लिये अनगिनत बार ईश्वर से प्रार्थना करती थीं,पर उन्हें क्या पता कि अग्नि परीक्षा तो अभी बाकी है और एक दिन ठंड के मौसम में विद्यालय जाते समय उनके पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। जो पिता सुबह से रात तक स्कूल-कोचिंग पढ़ा अपनी पुत्री के हाथ पीले करने का स्वपन साठ वर्ष की अवस्था में देख रहा था। वह सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया। बाहदुर पुत्री ने ही तब पिता का अंतिम संस्कार किया था, क्यों कि सम्पन्न होकर भी सगे सम्बंधियों ने कभी भी उनकी आर्थिक स्थिति समझने का प्रयत्न नहीं किया । अतः बेटी ने पुत्र बन पिता को मुखाग्नि दी थी। वह बालक जिसे काकी माँ ने बचपन में बड़ा दुलार दिया था। वह भी उनके संकट में काम नहीं आया। वह तो किसी दूसरे प्रांत में दो वक्त की रोटी के लिये गुलामी कर रहा था।
   अब बचीं माँ - बेटी । काकी माँ अपने जर्जर मकान में  छोटे बच्चों को पढ़ाया करती थीं और उनकी पुत्री ने भी एक निजी विद्यालय में नौकरी कर ली। तब उनके मन में एक ही प्रश्न था कि किस अपराध का दण्ड मिला है। अपने मांग का सिंदूर तो उजड़ गया , परंतु पुत्री के हाथ पीले कैसे हो। अनेक प्रांतों में अति सम्पन्न रिश्तेदार जिसके हो , जिसने कितनी ही शादियों में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करवाई है। उसके आंगन में शहनाई बजवाने वाला कोई नहीं  !
    डगमगाने लगा था उनका स्वाभिमान। तभी एक चमत्कार सा हुआ और एक उच्चकुल के सुशील लड़के ने उनकी पुत्री का हाथ थाम लिया। इस तरह से काकी माँ के संघर्षपूर्ण जीवन का धुंध छंट गया। अब वे अपनी पुत्री, जमाता और सुंदर से नाती के साथ रहती हैं। इस अवस्था में भी दुर्बल तन को किसी तरह संभाल वे घर का काम काज किया करती हैं।       अब वह प्यारा चंचल बालक जब नानी- नानी पुकारते हुये खिलखिलाता है , तो अतीत के आईने में काकी माँ को उसी का मुखड़ा नजर आता है। उस बच्चे के परवरिश में वे अपनी सारी वेदनाओं को न जाने कब का भूल चुकी हैं। काकी माँ अब बेहद खुश हैं, परंतु वृद्धावस्था ने अपना प्रभाव दिखलाना शुरू कर दिया है। फिर भी वे कोलकाता वाले उस शैतान बालक को भुला नहीं पायी हैं।

                          - व्याकुल पथिक


  यहाँ काकी माँ कोई काल्पनिक पात्र नहीं हैं। वे आज भी जीवित हैं और प्रकाश स्तंभ के रूप में अपने परिजनों के कर्म पथ का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं-प्रणाम

Friday, 24 May 2019

ए ग़लीचा ! वहम ये रहने दो..


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ए ग़लीचा ! वहम ये रहने दो..
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(संदर्भः ग़लीचे को उद्बोधन)

कर के बदरंग तुम अपनों को
ग़ैरों को क्यों रंग दिया करते हो ?

जन्मे कामगारों की बस्ती में
अब महलों में इठलाया करते हो !

उलझी थी दुनिया कच्चे धागे में
बन  काती  अश़्क बहाया करते थें ।

जिन हाथों ने संवारा था तुझको
 उनसे क्यों फ़ासले बढ़ाया करते हो ?

मैंने देखा उन उजड़ी झोपड़ियों में
चूमते थें माथ तेरा वे क़िस्मत कह के

  इन अमीरों के ऐशगाहों में
पांव तले कैसे मुस्कुराया करते हो ?

रंग बदलना इंसानों की फ़ितरत है
  तुम क्यों पहचान बदलते हो ?

ग़ैरों पे रहम अपनों पे सितम
 यह जुल्म किया क्यों करते हो ?

उनमें और तुझमें हो कुछ तो फ़र्क
  ए ग़लीचे !  वहम ये रहने दो ?

ज़िंदगी में कभी वो दौर भी थें
 स्वपनों का ग़लीचा बुना करते थें ।

जब से बदली हैं निगाहें उनकी
यादों का ग़लीचा  हम सिलते हैं ।

जिन ताने-बाने में खुशियाँ थीं मेरी
 पैबंदों से उसे अब ढका करते हैं।

वे तो शहर छोड़ चले गये कबके
  हम उनकी राह तका करते हैं  !!
     
                  - व्याकुल पथिक

 (काती - ग़लीचा बनाने में प्रयुक्त होने वाल धागा, जो भेड़ के ऊन से बनता है ) 

Saturday, 18 May 2019

रुदन से मोक्ष की ओर !

रुदन से मोक्ष की ओर !
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    किसी स्नेहीजन के कड़वे संवाद अथवा व्यवहार से हृदय  जिस दिन रुदन करता है एवं अंतरात्मा की धिक्कार से जब अत्यधिक ग्लानि की अनुभूति होती है , तब स्वतः ही वैराग्य का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
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    आज मैं अपने उस आदर्श पात्र को आप सभी के सम्मुख रख रहा हूँ । जिनके विषय में दांवे के साथ यह कहा जा सकता है कि वे गृहस्थ हो कर भी विरक्त हैं। उनका शयनकक्ष ही उनका मंदिर और साधना स्थल है। करोड़ों की अचल सम्पत्ति है। उम्र के उस पड़ाव पर , जहाँ लोग वरिष्ठ नागरिक कहे जाते हैं , वे पुरुषार्थी हैं एवं परिवार की समस्त आवश्यकताओं का निर्वहन करते हैं, फिर भी एक साधारण गृहस्थ की तरह उनकी दिनचर्या है। वे ऐसे साधक , साधू  एवं गृहस्थ हैं ,जिनकी कठिन दिनचर्या को देख हर कोई, उनके समक्ष नतमस्तक है।
    जीवन संगिनी के द्वारा किन्हीं परिस्थिति में मृत्यु का वरण किये जाने के पश्चात , बच्चों का लालन-पालन , उनकी शिक्षा और फिर विवाह सभी कार्य उन्होंने कुशल अभिभावक की भांति सम्पन्न किया। लोक व्यवहार में उनकी तुलना समाज के श्रेष्ठ जनों में होती है। सुबह नित्य गंगा स्नान कर वे अपने परिवार के जीवकोपार्जन के लिये घर से कर्मस्थान पर जाते हैं। लक्ष्मी की कृपा है , परंतु दो वक्त के साधारण भोजन के अतिरिक्त , उन्हें कभी भी किसी ने अमीरों जैसे  खानपान , मनोरंजन एवं वेशभूषा पर धन का उपयोग/ दुरुपयोग करते नहीं देखा है।
    पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बच्चों का ध्यान रख, दूसरा विवाह नहीं किया था। विमाता को लेकर एक संदेह जो मन में रहती है।  मनोरंजन की सामग्रियों से दूर हैं ,  साथ ही उनमें परस्त्री गमन , मदिरापान , ध्रूमपान  सहित एक भी  अवगुण नहीं है।
   उन्हें  हँसी-ठहाका लगाते कभी किसी ने नहीं देखा है। न ही वे एकांत में रुदन करते और न तो अपना दर्द किसी को बताते हैं। मन की वेदना ही नहीं,  शारीरिक पीड़ा को भी, वे हृदय में दबाये रहते हैं। जीवकोपार्जन के लिये जो व्यवसाय विरासत में मिला है। उसे अपने परिश्रम से संभाले हुये हैं। जाड़ा, गर्मी और बरसात मौसम कोई भी हो, अपने ड्यूटी के बिल्कुल पक्के हैं। शेष समय उनका पूजन, होम , मंत्र जाप एवं अध्यन में गुजरता है।  उनके सानिध्य में रह कर पथिक को यह अनुभूति हुई कि घर में भी आश्रम का सृजन सम्भव है। जिस माध्यम से स्नेह की राह में भटकते, अटकते एवं तड़पते मानव हृदय को उस स्वर्णिम पथ की ओर अग्रसर किया जा सकता है, जहाँ शांति है, वैराग्य है और मोक्ष भी है।
     वैसे उनका भी मानना है कि पति- पत्नी से ही गृहस्थ जीवन के सारे सुख हैं। उन्होंने एक दिन भोजन की थाली देख बताया था कि अब इसके स्वाद के बारे में वे कभी नहीं सोचते हैं। इस थाली का स्वाद तो पत्नी की मृत्यु के साथ चला गया। सो,खाने में आज क्या बनेगा अथवा बना है ? इतनी सम्पन्नता के बावजूद, यह पूछते उन्हें कभी नहीं देखा गया ।
    मन, भावना एवं मोह पर उनकी नियंत्रण क्षमता  देख,  पथिक यहीं से अपने मुक्ति पथ की खोज पुनः शुरू  की थी, परंतु उसकी एक  दुर्बलता यह है कि पथ में यदि कहीं  स्नेह एवं अपनत्व मिल जाता है, तो वह ठहर जाता है। उसे ऐसा लगता है कि निश्छल हृदय से किसी ने मैत्री के लिये हाथ बढ़ाया है।
   जबकि उस नादान को यह पता होना ही चाहिए कि जो अपने नहीं हैं ,वे सदैव ही ऐसा आचरण उसके साथ नहीं करेंगे ? वह किसी की जिम्मेदारी नहीं है, किसी का प्रेम अथवा प्रियतम भी नहीं है। ऐसे में जब उसकी उपेक्षा होती है , उसे पुनः आघात लगता है  ।
     किसी स्नेहीजन के कड़वे संवाद अथवा व्यवहार से हृदय  जिस दिन रुदन करता है एवं अंतरात्मा की धिक्कार से जब अत्यधिक ग्लानि की अनुभूति होती है , तब स्वतः ही वैराग्य का मार्ग प्रशस्त हो जाता है । माया-मोह रुपी घूँघट का पट खुलते ही इस स्नेह रुपी भूलभुलैया से बाहर निकल कर पथिक पिया मिलन अथार्त मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर हो जाता है। फिर कभी किसी लौकिक स्नेह एवं अपनत्व की आवश्यकता उसे नहीं होती। न ही उसे याचकों की तरह इसके(स्नेह) लिये गिड़गिड़ाना- छटपटाना पड़ता है। उसकी सारी लालसा इस वैराग्य में विलीन हो जाती है।
 अपनों के लिये भटक रहा उसा चित्त शांत हो जाता है । मीरा की तरह उसका मन आनंदित हो उठता है -

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई
जाके सर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई...

      हाँ , इसके लिये दृढ संकल्पित होना आवश्यक है। मेरा मानना है कि ऐसी कोई भी घटना जिससे आपका स्नेह आहत हुआ हो , लक्ष्य  प्राप्ति के लिये सहायक होती है ।      अतः जिस किसी ने भी कड़वी वाणी का प्रयोग कर हमारे निर्मल एवं स्नेहयुक्त हृदय पर आघात किया है , उन्हें धन्यवाद दिया जाए। उनके ये कठोर शब्द और आचरण हमारे ऊपर एक ऋण है , मोह युक्त स्थिति से मोह मुक्त होने तक।
   तभी यह ज्ञात होगा कि यह स्नेह एवं अपनत्व इस संसार रुपी माया नगर में एक स्वप्न है। जो असत्य था।  सच तो यह है कि आदमी अकेला आया है और वैसे ही चला जाएगा। यह मानव जीवन उसका तृप्त तभी होगा , जब वह विरक्त भाव का स्वामी हो ।
       सावधानी इतनी रखनी है कि इस भाव को पुनः हृदय से जाने न दें। कहीं ऐसा न हो की किसी की थोड़ी सी सहानुभूति हमारे मन को पुनः पिघला दे उसमें स्नेह का संचार कर दे और फिर जब कभी उपेक्षा का वही दंश सहना पड़े , तो यह विवेक है न,वह धिक्कारने लगता है । बार-बार उलाहना देता है कि तुमने वर्षों के परिश्रम से पांव जमा कर एक-एक सीढ़ी चढ़ी थीं । लेकिन, देखो तो सही अपनत्व की तुम्हारी इस क्षुधा ने फिर से तुम्हें उसी स्थान पर ला पटका है।
      कैसे संभल कर एक बार पुनः खड़ा होंगे पथिक , है कोई विकल्प ? जाओ जाकर ढ़ूंढो उन्हें , जिन्होंने तुम्हें सच्ची एवं पक्की मित्रता का आश्वासन दिया था। वे तो चल दिये अपनी दुनिया में  और जाते -जाते तुम्हारी वेदना पर स्नेह का तनिक मरहम भी नहीं लगा गये।
      ऐसी ही स्थिति को कहते है कि न माया मिली , न राम मिले । जब मुक्ति पथ के लिये साधक को शून्य से अपनी यात्रा  बार-बार शुरु करनी पड़ेगी , तो वह सीढ़ी- सांप के खेल में अटक- भटक जाएगा। उसे हर कोई झटक देता है । उसका जीवन उपहास बन कर रह जाएगा। साधना अधूरी रह जाएगी। वह बुद्ध कभी नहीं बन पाता है। बताएँ कैसे शुद्ध  होगा उसका जीवन  ?
       बुद्ध पूर्णिमा पर इसी चिंतन में डूबा पथिक आज अत्यधिक व्याकुल है। उसका विकल हृदय उससे यह प्रश्न किये ही जा रहा है कि रे मूर्ख  !  तू ही बता स्नेह के बदले  मिला क्या कुछ तुझे  ?  किस लिये अपनेपन की चाहत रखता है । इस संसार में तो झूठा व्यापार है। जो अपनी इच्छानुसार तुझसे जुड़ते हैं , यदि उनके आचरण में बदलाव आ जाता है ,तो तुम क्यों अश्रु बहा रहा है। सारे संबंध ही चार दिनों के है -

 मात-पिता सूत नारी भाई
 अंत सहायक नाही
 दो दिन का जग में मेला
 सब चला चली का खेला ..।
     
     - व्याकुल पथिक

Tuesday, 14 May 2019

तुम खुश हो न..

तुम खुश हो न ..
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देकर तनिक प्यार दुलार
बंद हो जाते सबके द्वार
पथिक फिर करता पुकार
 बोलो ! तुम खुश हो न ?

 दे दो पल बातों का साथ
करते  हैं वे  क्यों उपहास
विकल हृदय करता चीत्कार
बोलो ! तुम खुश हो न ?

दोस्ती पर करके विश्वास
करता वह जिनका इंतजार
  मिलता जब उनसे दुत्कार
बोलो! तुम खुश हो न ?

सपनों का मंदिर हो वीरान
भ्रमित है जिसका पुरुषार्थ
तेजहीन-बलहीन  वो इंसान
बोलो ! तुम खुश हो न ?

कौन है ऐसा निगेहबान
 रंज-ओ- ग़म में देता साथ
दिल में जगी ये कैसी आस
बोलो ! तुम खुश हो न ?

न प्यार भरे आंचल का छांव
न हमदर्दी के  मीठे बोल
अश्रु भी  है उसके ढोंग !
बोलो ! तुम खुश हो न ?

सह न सका वो यह परिहास
 झूठे अनुबंधों का साथ
हिय में लगी फिर कैसी आग
बोलो ! तुम खुश हो न ?

मन में दृढ़ता का हो प्रकाश
 कर जोगी सा वह सिंगार
किया तप्त शिला पर प्रवास
  बोलो ! तुम खुश हो न ?

कांप उठा तब दुर्बल काया
कठोर कर्म उसे न भाया
लौट के  बुद्धू वापस आया
 बोलो ! तुम खुश हो न ?

था आँखोंं में अंधेरा छाया
स्नेहिल स्पर्श फिर ना पाया
 मृत्यु ने उसको ठुकराया
 बोलो ! तुम खुश हो न ?

     - व्याकुल पथिक

Saturday, 11 May 2019

तुम ऐसी क्यों हो..

तुम ऐसी क्यों हो..
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    क्या अंतर है उस असभ्य लड़की और इनमें ..? नारी में तो साक्षात देवी का स्वरूप होता और आंचल में स्नेह । वह पुरुषों से भिन्न होती है ! बोलो , फिर तुम ऐसी क्यों हो  ?
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     आज सुबह वह फिर नज़र आ गयी। हमेशा की तरह गुटखा चबाते हुये। पुराने लिबास में भी एक आकर्षक था उसमें। न जाने क्यों जब भी मैं उसे देखता हूँ , मन में उसके प्रति घृणा और दया , यह मिश्रित  भाव आ ही जाता है।
   उस लड़की में शालीनता, लज्जा एवं शिष्टाचार , जिसे यह सभ्य समाज नारी का आभूषण बताता है, ऐसा भाव मैंने कभी नहीं देखा । बिल्कुल मुँहफट है और गाली तो उसकी जुबां पर है। मुझे तो लगता है कि भले ही " ककहरे " का ज्ञान उसे ठीक से न हो, परंतु अपशब्दों के प्रयोग में मास्टर की डिग्री अवश्य ले रखी है। पता नहीं किन परिस्थितियों में उसने यह ट्रेनिंग ली हो।
   अब तो उसका यौवन भी निखार पर है, किन्तु क्या मजाल कि कोई मर्द उसकी ओर नजर उठा के देख भी ले।
     यहाँ तक कि गलियों में मंडराने वाले मनचले उसकी परछाई देख रास्ता बदल देते हैं कि कहीं वह शुरू न हो जाए..।
    फिर भी एक कमजोरी है उसमें, जो हर प्राणियों में होती है। वह है पेट की आग । मुझे अनुभूति है इसकी कि यह  ऐसी भूख है कि यदि वक़्त पर दो रोटी न मिले तो , आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति के मान, सम्मान और स्वाभिमान को यह हज़म कर जाती है।
  कोलकाता में बड़े घर में पलने के बाद और वाराणसी में मास्टर साहब का पुत्र होकर भी, जब इस अंजान शहर में गांडीव हाथ में लिये भटक रहा था। तो घर पर मुझे भी घृणा की दृष्टि से परिजन देखते थें कि मैं अखबार बांट रहा हूँ , इसीलिये मैंने वाराणसी को अपना अपना कर्मक्षेत्र नहीं बनाया था।
    दो वक़्त की रोटी बिना किसी के समक्ष सिर झुकाए मिल जाए , इसी आस में एक विद्यालय के संचालक का पुत्र होने का गर्व भुला कर यहाँ चला आया था।
     अतः जिसे मैं तब असभ्य लड़की समझ रहा था, सम्भव है कि उसके साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है।
 नियति कहाँ लेकर जाएगी , किसे पता। उसकी यही क्षुधा उसे  चारित्रिक पतन की राह पर भी ले जा सकती है !
   वैसे , तीन वर्ष पूर्व इस लड़की के प्रति मेरा नज़रिया तब बदला था। जब मैंने एक किराना दुकान के स्वामी संग उसकी वार्तालाप सुनी थी।
    वह पूछ रही थी , " कमला भैया! आज शाम गंगा घाट मंदिर पर भंडार है न ? "
  मैं समझने का प्रयास कर रहा था कि यह मुस्लिम लड़की, जो तब किशोरावस्था के अंतिम पावदान पर खड़ी थी , वह शिव मंदिर के समीप भंडारे के संदर्भ में इस तरह से क्यों पूछ रही है ? उस दुकान पर वह अकसर ही  गुटखा खरीदने आती थी ।  उस दिन से पूर्व इसका मुझे तनिक भी आभास नहीं था कि यह लड़की अपने पापी पेट को लेकर इस तरह से व्याकुल है कि एक रुपये का गुटखा खाकर अपने भूख को मार रही है। लेकिन उस दिन उसका सब्र टूटने लगा था। इसी कारण उसे आधा किलोमीटर दूर भंडारा स्थल पर बन रही कोहड़े की सब्जी एवं मीठी बुंदियां  की सुगंध आने लगी थी।
    सो, उसने अपनी बात आगे बढ़ाते हुये दुकानदार से पुनः विनती भरे स्वर में कहा  ,
   "भैया ! चली तो जाऊँ मैं भी वहाँ पूड़ी खाने, परंतु भंडारे में इतने सारे मर्दों के बीच बैठ कर खाने में शर्म आएगी मुझे। ऐसा नहीं हो सकता है कि मुझे भंडारा स्थल पर बैठना नहीं पड़े ।आप वहाँ से एक पत्तल में कुछ कचौड़ियाँ, सब्जी और बुंदियां  दिलवा दें। मैं घर ले जाकर आपके भगवान जी का यह प्रसाद खा लूंगी।  "
    दुकानदार थोड़ा दयालु प्रवृत्ति का था। सो, इस लड़की को भी वह अपनी पुत्री जैसा ही समझता था। अतः उसने लड़की की बात मान ली और कहा कि दो घंटे बाद वह स्वयं भंडारे की व्यवस्था देखने जाएगा। तब वह भी चली आए।
     इस सृष्टि में भूख और प्यास के सम्मुख मानव द्वारा निर्मित मज़हब व धर्म की मजबूत दीवार  कहाँ टिक पाती है ? इंसान विवश हो जाता है ।
  अभी पिछले ही माह जब हमारे होटल के सामने शीतला माता का भंडारा था, तो पुनः यह लड़की दिखाई पड़ी थी । उसमें अब वह झिझक नहीं दिख रही थी मुझे। फिर अगले दिन मैंने देखा कि वह एक होटल पर मैनेजर से नौकरी मांग रही थी। जिसमें उसे कामयाबी नहीं मिली। बेचारी करे भी क्या ,जब उसकी ज़ुबान ही ऐसी है कि खुलते ही फिसल जाती है।
 अभी पिछले ही दिनों फिर से वह बूढ़ेनाथ मंदिर के समीप दिख गयी। अब तो उसकी आँखों में भी मुझे अजीब सी भूख दिख रही है और यह शहर हो या गाँव भूखे भेड़ियों को इसी की प्रतीक्षा रहती है !  उसके लिये मैं खुदा खैर करे , बस यही दुआ कर सकता हूँ ।
   इस लड़की को देख मेरा मन अशांत इसलिये हो जाता है, क्यों कि  27 वर्ष पूर्व कालिम्पोंग की उस घटना को आज भी कहाँ भुला पाया हूँ । एक सुंदर नेपाली लड़की छोटे नाना जी के मिष्ठान की दुकान पर आया करती थी। हम सभी उसे कुछ खाने को दे दिया करते थें। एक दिन सुबह कारखाने के पीछे वाले मार्ग  पर काफी भीड़ जुटी हुई थी।  देखा तो पता चला की यह वही लड़की है , जो सुबह से ही शारीरिक कष्ट से छटपटा रही है। दरिंदों ने रात के अंधेरे में उसे कुछ खिलाने के बहाने बुला कर न सिर्फ उसके अस्मत से खेला था, वरन उसके मखमली जिस्म पर भी कम अघात नहीं किया था। इस हादसे के बाद फिर कभी नहीं दिखी वह लड़की।  मुस्कुराता हुआ धुंधला सा उसका चेहरा और वह रुदन आज भी मुझे याद है।
    यहाँ मीरजापुर आने के बाद ऐसे अनेक हृदयविदारक दृश्य मैंने देखें और खबरें भी लिखी हैं । इसी शहर में दो सगी बहनों के साथ दुष्कर्म और पिता संग उनकी निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी ,वह दृश्य दहलाने वाला रहा। इसके पश्चात पत्रकारिता से जुड़कर मैंने मुखौटे वाले अनेक भद्रजनों को देखा और इस तरह मैं भी धीरे- धीरे पत्थर दिल इंसान होता गया। फिर भी इस बनावटी, मिलावटी और दिखावटी दुनिया में एक सच्चे मित्र की खोज में भटकता रहा।
     हाँ,कुछ और याद आ रहा है। जब मीरजापुर आया तो एक और युवती कचहरी, कलेक्ट्रेट और घंटाघर पान की दुकान पर दिखती थी। वह मुँह में पान घुलाएँ कुछ बनठन के घर से निकलती थी। तब उसके कितने ही आशिक थें । भले ही वह सम्पन्न घर की नहीं थी हो , परंतु ऐसा भी न था कि उपवास करना पड़े । सो, परिस्थितियाँ जो भी रही हो। लेकिन, आज वक्त से पहले उसका यौवन ढल चुका है और उसके पास कोई फटकना नहीं चाहता है। उसके स्थूलकाय शरीर एवं उदास चेहरे को देख मेरा हृदय वेदना से भर उठता है । सोचता हूँ कि जीवन का यह धूप-छांव भी कितना अजीब है और यौवन ढलते कहाँ वक़्त लगता है।
      जब इस जनपद आया था,तो एक जिला सूचना अधिकारी मुझसे अत्यधिक स्नेह करते थें। उन्होंने पत्रकारिता जगत में मुझे स्थापित करने में सहयोग भी किया। एक दिन उनके कार्यालय में एक महिला दरोगा मिली। अधिकारी महोदय ने हम दोनों का आपस में परिचय करवाया। उस समय सांध्य कालीन गांडीव का पुलिस विभाग में दबदबा सा था। अतः दरोगा साहिबा ने मेरा बड़ा सम्मान किया। उनका शिष्टाचार देख , खाकी वालों के प्रति मेरे मन में विशेष   आदर का भाव जागृत हो गया। लेकिन, एक दिन देखा कि वही महिला उपनिरीक्षक किसी युवक को पीट रही थी और साथ ही अपशब्दों का बौछार किये जा रही थी।
   ऐसे गंदी गालियाँ उस विधवा महिला पुलिस अधिकारी के मुख से सुन , जिसे मैं सभ्य समाज का प्रतिनिधि समझता था, हतप्रभ रह गया।
   उनसे बात करने की  मुझे फिर बिल्कुल इच्छा नहीं हुई। उन्हें देख बिना दुआ- सलाम के ही आगे बढ़ जाता था।     लेकिन, एक दिन उन्होंने मुझे रोक ही लिया। उन्होंने कहा कि शशि भाई एक चाय पी लो मेरी तब जाना। वार्तालाप के दौरान मैं गुस्से में कह ही दिया कि आप मर्द पुलिसकर्मियों पर भी भारी हो। उस मनचले की पिटाई तो समझ में आती है, परंतु ऐसी भद्दी गालियाँ..?
       तब उन्होंने अपनी रामकहानी मुझे सुनाई और यह भी कहाँ कि अपनों के बीच छिपे घड़ियालों से नौकरीपेशे वाली महिलाओं को सतर्क रहना पड़ता है। सो, ये भद्दी गालियाँ एवं इसी लहजे में हँसी. ठिठोली ही उनका सुरक्षा कवच है। इसे अन्यथा न लें, किसी दिन क्वार्टर पर आये न  .. !
     खैर, उनसे वार्तालाप कर मुझे लगा कि तुम ऐसी क्यों हो..? इसका तर्क संगत उत्तर मुझे मिल गया है।
   परंतु एक दिन छात्रसंघ चुनाव के दौरन मैंने देखा कि कालेज में जहाँ दो महिला पुलिस अधिकारी खड़ी थीं, उनके मध्य से एक दुबला- पतला युवक अंदर परिसर में जा घुसा। अनजाने में अथवा अत्यधिक भीड़ देख , उसने यह दुस्साहस कर लिया हो ।
    तभी सिल्वर स्टार लगा रखीं एक मोहतरमा के ये शब्द ,  "बच्चा, पढने- लिखने की उम्र में ही बीच का रास्ता खोज रहा है तू । "
  मैं आज तक इसे नहीं भूल पाया हूँ। साथ ही यह प्रश्न भी मेरा अधूरा है कि तुम ऐसी क्यों हो.. ?
   और एक बात कहूँ इस सभ्य समाज की शिक्षित युवती एवं महिलाएँ  किसी निर्मल हृदय वाले पुरुष को मित्र बना कर , जब कभी उसके स्नेह की उपेक्षा करती हैं। कल तक उनकी वाणी में जो अपनत्व था , वह जब उसी निर्दोष पुरुष मित्र के लिये मात्र औपचारिकता में परिवर्तित हो जाता है, तब भी यह आहत हृदय चीत्कार कर उठता है कि तुम ऐसी तो न थी?         क्या अंतर है उस असभ्य लड़की और इनमें ..?
    नारी में तो साक्षात देवी का स्वरूप होता और आंचल में स्नेह । वह पुरुषों से भिन्न होती है ! बोलो ,फिर तुम ऐसी क्यों हो ?

         - व्याकुल पथिक

Sunday, 5 May 2019

श्रम का यह कैसा उपहास !

श्रम का यह कैसा उपहास !
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काश !  कोई जुगाड़ अपना भी होता कि मैं भी सांताक्लॉज जैसा बन जाता और मेरी झोली में ऐसा कुछ होता कि बिन बताएँ इनका सहयोग करते हुये ,अपनी निजी वेदना को भुला कर यह गुनगुनाते फिरता-
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      मैं बाजीराव कटरा स्थित अपने आशियाने( होटल ) के ठीक सामने प्रिय मित्र घनश्याम जी की दुकान पर चाय पी रहा था। इस प्रंचड गर्मी में समाचार संकलन के लिये कलेक्ट्रेट, कचहरी,एसपी दफ्तर, अस्पताल और पोस्टमार्टम हाउस का चक्कर मारने के बाद पूरे पांच घंटे मोबाइल पर आँखें फोड़ होमवर्क कर लौटा था । सो , मित्र महोदय के यह कहने पर कि लोहा लोहे को काटता है,चाय पीने ठहर गया।
    तभी  एक युवक फटे- पुराने वस्त्रों में एक हाथ ऊपर किये, जिसकी उंगलियों मेंं ढेर सारे रंग बिरंगे चाबी का गुच्छे लटके हुये थें ,  सामने से गुजरा। दिन भर उसने पैदल ही नगर की गलियों में आवाज लगायी थी। उसका मलीन चेहरे इस बात का गवाह था कि अच्छे दिन लाने का, जो सब्जबाग देश की जनता को आजादी के बाद से दिखाया जा रहा है, उसका सच क्या है ?
 किसी ने गरीबी हटाने की बात की , अब उसके वंशज गरीबी मिटाने के लिये 72 हजार रुपये सालाना आमदनी की प्लानिंग लेकर आये हैं। चुनाव है न साहेब , तो सियासी बिसात पर लोकलुभावने वायदों का महल खड़ा किया जा रहा है, एक बार फिर से ताकि वोटों की फसल अच्छी रहे।

   खैर गरीबी के मामले में सुदामा का प्रतिविम्ब लग रहे इस व्यक्ति ने जेब को टटोला। जो एक पांच का सिक्का निकला , उससे उसने भी चाय पी अपने पेट की भूख शांत की। ब्रेड- ,मक्खन खाने वालों की तरफ निगाहें उठा कर देखा तक नहीं। सम्भवतः गरीबी की आग में उसने अपनी इन इच्छाओं को तपा कर मिटा लिया हो ,यह भी हो सकता है कि उसे अपनी बीवी - बच्चों की याद आ रही हो कि वे भी तो सूखी रोटियों से ही काम चला रहे हैं।
     मुझे अनुभूति है, जब करीब 27 वर्ष पूर्व मैं कालिम्पोंग से दूसरी बार अपने घर वाराणसी वापस लौटा था। बेरोजगार था , तो ठंडा पानी अथवा चाय पी कर इसी तरह से कितने ही दिनों भूख पर लगाम लगाता था।
    घनश्याम भाई ,जिनकी छोटी सी दुकान है, पर हैं दिल के अमीर , ने कहा कि देखें श्रम का यह कैसा उपहास है । दिन भर यह व्यक्ति इसी तरह एक हाथ ऊपर किये चाबी के गुच्छों को झुलाये फटफटा रहा है। क्या हाथ दर्द नहीं करता होगा ? परंतु पूरी निष्ठा  के साथ किये गये श्रम के प्रतिदान में उसे क्या मिला ? किसी- किसी दिन तो वह सौ रुपये भी नहीं कमा पाता है।
  तभी उधर से एक भिखारी गुजरा। उसने कटोरा बढ़ाया एक- दो के सिक्के आने लगे उसने। इसके बाद सामने पेड़ के नीचे अपनी पोटली खोल वह तरमाल ( कचौड़ी एवं मिठाई ) गटकने लगा। बाबू- भैया कर यह भिखारी रोजाना सौ- डेढ़ सौ की आमदनी कर लेता है साथ ही भोजन अलग से ।
   एक बूढ़ी काकी प्रतिदिन उस ठेलागाड़ी को धक्का दे, सड़क किनारे ले जाती है। जिसके टायर फटे हैं। उस पर जगह-जगह  रस्सी लिपटी है। ऐसे ठेले को किस तरह से वह ढकेलती होगी , कभी आप भी हाथ लगा कर देखें न..।
      वह इस पर खीरा रख कर बेचती है । एक और बूढ़ी मैया शहर कोतवाली के मोड़ पर एक छोटे से परात में पापड़ रख दिन भर बैठी रहती है। मुझे आलू के पापड़ पसंद है। सो, वहाँ ठहर जाता हूँ। डबडबाई आँखों से बुढ़िया माँ बार-बार बिक्री के उन चंद सिक्कों को सहेजते रहती है। वह  कहती है - " बेटवा , तेल, आलू और जलावन लकड़ी सब का दाम बढ़ गया है। महंगाई सुरसा डाइन बनी खड़ी है। लेकिन, बिक्री घट गयी है। अब बच्चे पैकेट वाला कुरकुरे खाते हैं। बेटा कुछ दूसरा काम हो तो बता न।"
   क्या उत्तर दूँ इस वृद्ध माता को, यह कि अच्छे दिन आ गये हैं। हमारे राष्ट्र के कर्णधार तो यही कहते हैं कि तस्वीर बदल गयी है। अभी पिछले ही दिनों एक सम्पन्न किसान पड़ोसी जनपद से कुछ मजदूरों को फसल काटने लाया था। उसमें एक किशोरी भी थी। यौवन का सौंदर्य भला गरीबी में भी कहाँ छिपता है। लेकिन, किसान की कामाग्नि ने इस मज़दूर बाला को फूल बनने से पूर्व ही राख में तब्दील कर दी है।  अब  कानून व्यवस्था अपेक्षाकृत कुछ सख्त है । अतः ऐसे मामलों में मुकदमा कायम हो भी जाता है। अन्यथा ग्रामीण क्षेत्रों में पेट की आग ने कितनी ही महिला मज़दूरों के अस्मत का सौदा किया है। सहमति से नहीं बात बनी तो जोर जबर्दस्ती भी। कुछ फार्म हाउस ऐसे ही अय्याशी के ठिकाने थें। नारीशक्ति जहाँ अबला नारी बनी पांव तले कुचली जाती रही । क्या इन सभी मज़दूरों के श्रम का यही पुरस्कार है ?
  परिश्रम एवं पुरुषार्थ को लेकर बड़ी- बड़ी बातें तो होती हैं, परंतु नियति के समक्ष वह विवश है। जब कभी क्रांतिदूत जन्म लेते हैं, तो वे अवश्य प्रतिकार करते हैं । हिंसक या अहिंसक माध्यम जो भी हो । वे बलिदान भी देते हैं। लेकिन, उनके संघर्ष पर यह गरीबी बार-बार मजबूरी बन पर्दा करती रहती है।
   काश! कभी सत्ता में शीर्ष पर बैठे ये राजनेता अपने लग्जरी वाहन से नीचे उतर, सिपहसालारों को पीछे छोड़ , दबे कदम  गरीबी की प्रतिमूर्ति इन सजीव पात्रों की दिनचर्या पर दृष्टि डालते और फिर कुम्भकर्णी निद्रा में सो रही अपनी संवेदना को बलात जगाते , तब उन्हें समझ में आता कि देश से गरीबी हटाने में वे कितना सफल हुये हैं। विडंबना यह है कि वे तो सरकारी कागजों पर गरीबों को मिटा रहे हैं।
             ये रहनुमा बड़े तामझाम के साथ किसी दलित के घर भोजन कर  मीडिया के माध्यम से हीरो तो बन जाते हैं। लेकिन कभी किसी गरीब मज़दूर के घर बिन बुलाये मेहमान की तरह पहुँच कर उसका बटुआ नहीं टटोलते हैं । जिससे उन्हें पता चल सके कि शाम के भोजन के लिये उसके पास क्या व्यवस्था है।
    बीते सप्ताह श्रमिक दिवस (1 मई ) से एक बार पुनः मैं अपने चिन्तन- मंथन से उस अमृत कलश की खोज में जुटा  हूँ ,जो तमाम मजदूरों के चेहरे पर खुशी, संतुष्टि, आत्मनिर्भरता और आत्मा सम्मान का भाव ला सके।

इस बार लोकसभा चुनाव होने के कारण जिला मुख्यालय पर सन्नाटा छाया था, अन्यथा पूर्व के वर्षों में यहाँ कलेक्ट्रेट में खासी गहमा गहमी रहती थी। श्रमिकों के दो वर्ग यहाँ दिखते थें। आम भाषा में इन्हें सरकारी एवं गैर सरकारी श्रमिक कहा जाता है। सरकारी नौकरियों में हैं, उनको तो मोटी तनख्वाह मिलती है। ऐसे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को मैं मज़दूर नहीं मानता और वे मजबूर भी नहीं है। उनका यूनियन बड़ा ही शक्तिशाली है।
    मजदूर को लेकर एक बात मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि ऐसे लोग जो सरकार से बढ़िया वेतन पा रहे हैं । दिन भर सुरती मला करते हैं या अपने मुंह में पान घुलाएँ रहते हैं, उन्हें श्रमिक कहूँ अथवा ऊपर जिन पात्रों पर प्रकाश डाला है उनको ?
    एक और तबका है , जिनके श्रम का उपहास होता है। आप ने दुकानों पर सेल्समैन तो देखा है न ? वह सुबह साढ़े नौ बजे अपनी ड्यूटी पर आ जाता है और छुट्टी नौ बजे के बाद ही मिलनी है। इनका वेतन पाँच हजार के आसपास है।
 उच्च शीक्षा प्राप्त अनेक अध्यापक भी साधारण विद्यालयों में लगभग इतना ही तनख्वाह पाते हैं। ऊपर से विद्यालय प्रशासक इतना सख्त होता है कि कुर्सी पर बैठने की जगह ब्लैकबोर्ड के समक्ष खड़े - खड़े ही पूरा समय गुजरता है।
 ऐसे निम्न- मध्य वर्ग के लोग महत्वाकांक्षी होते हैं। अपने परिवार को खुशहाल रखने के लिये कोचिंग अथवा घर- घर जाकर बच्चों क़ पढ़ाते हैं,फिर भी दस हजार रुपये के आसपास ही इनकी आमदनी होती है।
  इनके परिश्रम का भी यह कैसा उपहास है की सरकारी प्राथमिक पाठशालाओं में शिक्षक का वेतन जहाँ करीब चालीस है और इनका पांच हजार। फिर क्यों कहा जाता है कि यह संसार परिश्रम का है।

  मेरे जैसे जनपद स्तरीय अन्य श्रमजीवी पत्रकारों, जिनके पास आजीविका के लिये अतिरिक्त आर्थिक स्त्रोत नहीं है,उनकी दयनीय स्थिति को पर्दे में ही रहने दें , तो बेहतर है।  कहने को हम मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। परंतु यदि इधर- उधर से धन का जुगाड़ न करें न, तो फिर पारिवारिक कर्तव्यों की पूर्ति सम्भव नहीं है। इसी भय ने युवावस्था में मुझे वैवाहिक बंधन से मुक्त रखा। यह कैसा चौथा स्तंभ है ? अन्य तीन खम्भे तो द्वारिकाधीश की तरह वैभव सम्पन्न हैं और यह सुदामा बना उसी कृष्ण के द्वार पर नतमस्तक है । एक शासक के रुप में जिसके गुण- दोष की उसे समीक्षा करनी है। लेकिन वह तो मित्रता और सहयोग की उम्मीद लिये वहाँ पहुँचा है ?
    फिर भी पुरुषार्थ की यह तारीफ शास्त्रों में वर्णित है कि
ललाट पर लिखे विधि के लेखों को धोने की क्षमता तुम्हारे ललाट के पसीने की बूँदों में ही है। मैं तो यही कहूँगा कि जीवित रहते न सही कम से कम मृत्यु के पश्चात तो पुरुषार्थ करने वाले  को सम्मान मिले।
   राजनीति में दिन प्रतिदिन निष्ठावान, कर्मठ और ईमानदार कार्यकर्ताओं का अभाव क्यों हो रहा है , इसीलिये न कि हमारी नयी पीढ़ी यह समझ चुकी है कि चुनाव लड़ने के लिये टिकट प्राप्त करने का अब यह पैमाना नहीं रहा। यहाँ, तो दलबदलुओं, दागदार और जातीय- मजहबी भावनाओं को आहत करने वाले सफेदपोश बन झटपट जनप्रतिनिधि बन जा रहे हैं। वे  जनता की अदालत में अपने जुगाड़ तंत्र का डंका बजाते हुये सर्वोच्च सदन तक पहुँच जाते हैं। वे ही हमारे माननीय हैं अब । हमारे पथप्रदर्शक हैं।
      इस व्यवस्था को हम कैसे बदल पाएँगे ? इस बार भी चुनाव में एक-एक उम्मीदवार कितने ही करोड़ रुपया खर्च कर रहा है। लेकिन, इस अभागे चाभी के गुच्छे बेचने वाले इंसान को एक कुल्हड़ चाय पीने के लिये जेब टटोलना पड़ रहा है।
     काश !  कोई जुगाड़ अपना भी होता कि मैं भी सांताक्लॉज जैसा बन जाता और मेरी झोली में ऐसा कुछ होता कि  बिन बताएँ इनका सहयोग करते हुये ,अपनी निजी वेदना को भुला कर यह गुनगुनाते फिरता-

मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है
जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है..।
   जिस स्नेह को पाने से मैं वंचित रह गया और न कभी किसी ने मेरे उस स्नेह को समझा । उसे ऐसे लोगों में बांट पाता। फिर जीवन अपना सफल कर जाता !
                                  -व्याकुल पथिक

Thursday, 2 May 2019

सबक़

सबक़
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दर्द  जो सीने में है
उसे दिखाया न कर

ख़ामोशी जो दिल में है
उसे बताया  न कर

 है रात रंगीन जिनकी
उनसे दिल न लगा

तेरी उदासी पर हँसेंगे
नहीं  कुछ तेरा वहाँ

रंग बदलती दुनिया में
दोस्ती कर संभल के

 ऐसे भी हमदर्द  यहाँ
ज़ख्म बन जाते नासूर

 मख़मली एहसासों को
 न अपनी ख़्वाहिश बना

गर्द जम चुकी इश्क़ पे
क़ब्र में कराह रहा वो

गुजर गये जो दिन
वे  लौटते फ़िर कहाँ ?

वाह-वाह की महफ़िल में
तेरे लिये नहीं कुछ वहाँ

पूछ देंगे तुझे वे अपनी
 हसीन रातों में से दो पल ?

हाथी के दांत दिखाने के
 खाने के कुछ और

है ये सबक़ तेरे लिये
वैरागी बन, जी न जला

       - व्याकुल पथिक
       

Tuesday, 30 April 2019

आज श्रमिक दिवस है..


आज श्रमिक दिवस है
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ये दोस्त सुन लो तुम भी
यह दुनिया नहीं रहम की
करते रहो श्रम , मगर
अधिकार के लिये लड़ों भी

तक़दीर से लड़ो तुम
 तस्वीर को बदल दो
उन्नत है भाल तेरा
है भुजाओं में  दम भी

मज़दूरी नहीं शरम है
कृष्ण ने कहा ये कर्म है
 श्रम का करो अभिनंदन
 पुरुषार्थ है तेरा वंदन

परिश्रम से तेरे निर्मित
यह  पथ  और  महल है
टिकी है ये जो धरती
श्रमिकों का ही बल है

क़िस्मत में जिनके धन है
वे करते है तुझसे छल भी
 स्वामी नहीं  वे तेरे
 न सेवक हो तुमभी उनके

कर्म ही तेरी  पूजा और
संघर्ष  ये  तेरा धर्म है
खुशियाँ  हैं  इनमें  तेरी
न पीछे  हटे कदम फिर

मृगतृष्णा में न  फंसना
श्रमधार में बहते रहना
श्रमिकों की है ये दुनिया
सागर और  अम्बर भी

हैं  पकवान  ये उनके
पर रोटी  में तेरे दम है
ईमान  है इसमें  तेरा
बेइमान  हैं वे  वतन के

न काले गोरे का फ़र्क़ है
न आडम्बरों का भ्रम है
तेरी पीड़ा हो या आँसू 
दुख-अभाव सब सम है

हो रात स्याह जितनी
दीपक सा जलते रहना
रहबर बनो जगत में
तुम श्रम के प्रतिबिंब हो

फुटपाथ हो घर तेरा
और उनके लिये महल है
मेहनतकश हो तुम भी
ले कर रहो जो हक़ है

अधिकार के लिये जिसने
  खायी है गोली तन पे
नमन करो तुम उनको
आज श्रमिक दिवस है

न भूलों  हे क्रांतिवीरों
 यह जो जनतंत्र है
बलिदान पर टिका है
 इसमें भी तेरा रक्त है
 
    - व्याकुल पथिक



Friday, 26 April 2019

वेदना से हो अंतिम मिलन


वेदना से हो अंतिम मिलन

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प्रीत का पुष्प  बन न सका

तू कांटों का ताज मुझे दे दो

खुशियों की नहीं  चाह मगर

वो दर्द का साज़ मुझे दे दो

न सपनों का  संसार मिला

तन्हाई हो वो रात मुझे दे दो

न प्यार मिला न इक़रार मिला

वो ज़ख्म जहां का मुझे दे दो

आंचल का तेरे  न छांव मिला

वेदना और संताप मुझे दे दो

 न  स्नेह की चाहत है तुझसे

   वो वैराग्य हमारा मुझे दे दो

यादों में अब ना आया करों

 एक और आघात मुझे दे दो

 वे न कहें इक भूल हैंं हम

  तिरस्कार तुम्हारा मुझे दे दो

कोमल न हो ये हृदय अपना

 यह वज्राघात मुझे दे दो

उपहास सहा,अब उपवास सहूं

तृप्त रहूँ, ये स्वांग मुझे दे दो

लूटे हुये अरमानों की कसम

  तुलसी-गंगा जल मुझे दे दो

जहाँ  फिर न कोई मीत मिले

  मरघट सा पावन तीर्थ दे दो

जलती हुई एक चिता हूँ मैं

 और भस्म हमारा उसे दे दो

वेदना  से हो  ये अंतिम मिलन

अब अनंत की राह मुझे दे दो

                - व्याकुल पथिक


Wednesday, 24 April 2019

वेदना


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        वेदना जीवन की वह पाठशाला है , जिसके माध्यम से आत्मदर्शन प्राप्त होता है और हम अपने कर्मपथ, धर्मपथ यहाँ तक कि वैराग्य भाव के साथ मुक्ति पथ (निर्वाण) को प्राप्त कर सकते हैं।
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     इस बार का हमारा विषय है वेदना ।  यह वह मानसिक कष्ट, संताप है, जिससे मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही कभी- कभी बिखर जाता है। जब कभी स्नेह आहत होता है, किसी प्रियजन से वियोग होता है अथवा कटु वचन से स्वाभिमान को ठेस पहुँँचता है, तब हृदय में इसकी अनुभूति होती है।
      मेरा मानना है कि जिस भी मनुष्य में संवेदना है , उसमें वेदना निश्चित होगी। जब सिद्धार्थ ( महात्मा बुद्ध) को वृद्ध मनुष्य और शवयात्रा ने , वर्द्धमान (महावीर स्वामी ) को जातीय भेद, पशु बलि और अन्य सामाजिक कुरीतियों ने , महर्षि दयानंद सरस्वती को सतीप्रथा ने तथा मोहनदास कर्मचंद गांधी  को रेलयात्रा के दौरान अंग्रेजों की रंगभेद मानसिकता ने विकल कर दिया , तब इनके हृदय की इसी वेदना ने, इन्हें धर्म प्रवर्तक एवं महात्मा बना दिया।
  विवाह के पश्चात मूर्ख कालीदास को विदुषी पत्नी विद्योत्तमा के व्यंग्य वचन तथा तुलसीदास को  पत्नी रत्नावली के तिरस्कार ने इस तरह से वेदना दी कि इनका अन्तर्मन जागृति हो उठा। ध्रुव के साथ भी यही हुआ, सौतेली माँ के व्यंग्य वचन से उन्हें जो मानसिक कष्ट पहुँचा, उसका ही परिणाम रहा कि एक नन्हा बालक तप कर सर्वश्रेष्ठ नक्षत्र बन गया। एक वेदना वह भी है,जो भृतहरि को जन्म देती है। राग से विराग की उनकी यात्रा वेदना से मुक्ति के लिये एक प्रकाश स्तम्भ है।
   अतः वेदना हमें अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर कर सकती है। वह हमें शीर्ष पर पहुँचाने का सामर्थ्य रखती है। जबकि हँसी- ठिठोली में लिप्त मनुष्य जनप्रिय हो सकता है, फिर भी विदूषक की श्रेणी में ही उसकी गिनती होगी, क्यों कि मानव के सर्वश्रेष्ठ गुण करुणा से वह वंचित है।
अतः यह संवेदना होनी चाहिए, हम मनुष्यों में-

 किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वासते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है..।

  इस तरह से देखें , तो मनुष्य में वेदना  मानवीय गुणों का विकास करती है।
   वेदना तब भी होती है, जब किसी अप्रत्याशित घटना में हम  अपने किसी प्रियजन को खो देते हैं। हमारे निर्मल स्नेह अथवा प्रेम के साथ छल, विश्वासघात और उपहास होता है, तब भी अत्यधिक कष्टदायी मानसिक पीड़ा होती है।
   यदि विरह वेदन की बात करूँ, तो इसे सूरदास ने  कृष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों  के माध्यम से कुछ इस तरह से परिभाषित किया है -

      उधौ मन नाहिं दस बीस ,
एकहु  तो सो गयो श्याम संग ,
को अराध तू ईस। (अब काहू राधे ईस )..
भई अति शिथिल  सबै माधव बिनु ,
यथा देह बिन सीस ,
स्वासा अटक रहे ,आसा लगि ,
जीव ही कोटि बरीस (वर्षों ).
तुम तो सखा श्याम सुन्दर के
सकल जोग के ईस !
सूरजदास (सूर श्याम )रसिक की बतियाँ ,
पुरबो (पूरा करो )  मन जगदीस।

    वेदना की यह शीर्ष स्थिति है। बिना अनुभूति के इसे समझना अत्यधिक कठिन है। उद्धव जैसे ज्ञानी पुरुष भी इसके समक्ष नतमस्तक हैं।
         मेरा मानना है कि वेदना जीवन की वह पाठशाला है , जिसके माध्यम से आत्मदर्शन प्राप्त होता है और हम अपने कर्मपथ, धर्मपथ यहाँ तक कि वैराग्य भाव के साथ मुक्ति पथ (निर्वाण) को प्राप्त कर सकते हैं। अपनी अनुभूतियों के आलोक में वेदना में वैराग्य का वह पथ दिख रहा है , जिसपर से गुजरने पर मग में क्या खोया और क्या पाया का बोध नहीं होगा।  आदि शंकराचार्य के निर्वाण-षटकम का यह श्लोक-

नमे मृत्युशंका नमे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म
 न बंधू: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम |

      सदैव मेरा मार्गदर्शन करता है।  21वर्ष पूर्व जब मैं अत्यधिक अस्वस्थ था। अभिभावक के रूप में कोई नहीं था। अस्वस्थ्य शरीर के बावजूद कठोर श्रम करना पड़ता था। मेरी मनोस्थिति को समझ पत्रकारिता जगत में मुझे स्थापित करने वाले मेरे गुरु स्व० रामचंद्र तिवारी  ने कैसेट आदि शंकराचार्य का यह "अद्वैत दर्शन , जिसको पंडित जसराज ने रागों के राजा राग दरबारी में गाया है, मुझे लाकर दिया था।
    फिर भी मित्रों यह कहना चाहूँगा कि विरह वेदन का  उपचार इससे भी सम्भव तब तक नहीं है, जब तक हम वेदना के शीर्ष तक नहीं पहुँच जाएँ।  विचित्र मनोदशा है यह, जिस पीड़ा को कम करने के लिये रुदन आवश्यक प्रतीत होता है मुझे। रुदन ही हमें ऐसी वेदना में घुटन से बाहर निकालता है।
     वियोग अथवा स्नेह का तिरस्कार दोनों ही परिस्थितियों में  रुदन चित को शांति प्रदान करता है।
  " गबन " में प्रेमचंद  की लेखनी विस्मित कर देती है मुझे  , उन्होंने लिखा है -

" रुदन में कितना उल्लास, कितनी शांति, कितना बल है। जो कभी एकांत में बैठ कर किसी की स्मृति में, किसी के वियोग में, सिसकसिसक और बिलखबिलख कर नहीं रोया, वह जीवन के ऐसे सुख से वंचित है, जिस पर सैकड़ों हँसिया न्योछावर है। उस मीठी वेदना का आनंद उन्हीं से पूछो, जिन्होंने यह सौभाग्य प्राप्त किया है। हँसी के बाद मन खिन्न हो जाता है। आत्मा क्षुब्ध हो जाती है। मानो हम थक गये हों। पराभूत हो गये हो। रुदन के पश्चात एक नवीन स्फूर्ति, एक नवीन जीवन , एक नवीन उत्साह का अनुभव होता है।"
   
   इसलिये मैंने सदैव रुदन का समर्थन किया है। यह हर वेदना के लिये अचूक औषधि है। रुदन के पश्चात जो शांति और विरक्ति है। उसे वैराग्य की ओर ले जाना चाहता हूँ।
      अपनों के स्नेह से वंचित व्यक्ति अकसर देखा गया है कि दूसरों से प्रीति कर बैठता है। परंतु स्मरण रहे कि जो अपने नहीं है, हम यदि उनसे स्नेह करेंगे, तो  वे अपनी सुविधानुसार हमारे प्रति अपनत्व का प्रदर्शन कर भी दें, तब भी हम उनकी प्राथमिकता नहीं हैं। जैसा कि अकसर ही हम समझ लेते हैं। यही से एक वेदना जन्म लेती है। इस उपेक्षित स्नेह का उपचार रुदन के पश्चात विरक्ति ही है।
      पिछले कुछ दिनों यह विरक्त भाव मुझे कुछ इस तरह से मानसिक शांति प्रदान कर रहा है कि मानस पटल पर स्नेह एवं वेदना के वे पल चलचित्र की तरह छाये हुये हैं, फिर भी हृदय उसे ग्रहण नहीं कर रहा है। मन में यदि कुछ है,तो वह अपने आश्रम का सुखद स्मरण एवं गुरु की वाणी-
          माया महा ठगनी हम जानी...
    यदि सचमुच ऐसा ही है,तो मैं यह कहना चाहूँगा कि वेदना हमारे लिये वैराग्य पथ है। यही शांति पथ है।

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- व्याकुल पथिक

Sunday, 21 April 2019

हाँ , मैंने देखा श्रवण कुमार

 हाँ , मैंने देखा श्रवण कुमार
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     पढ़े लिखे सभ्य समाज में  हम पति-पत्नी और हमारे एक या दो बच्चे यह भावना , सयुंक्त परिवार पर भारी पड़ रही है। सो, उसके बिखरते ही  इस छोटे कथित खुशहाल परिवार की संवेदनाओं में कमी आती जा रही है।
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     आज सुबह मैंने श्रवण कुमार को देखा। उस युवक की मातृभक्ति देख कर मेरा पांव अचानक तेलियागंज तिराहे पर ठिठक गया। मेरे जैसे यतीमों के लिये उस खुशी की अनुभूति कर पाना फिलहाल सम्भव नहीं है और कल्पनाओं में जाकर कुछ लिखने की अपनी आदत नहीं है। पत्रकारिता धर्म ही कुछ ऐसा है कि हम सभी को अमूमन आँखों देखा हाल बताना पड़ता है। फिर भी जब कभी ऐसे दृश्य राह चलते देखने को मिल जाते हैं ,  तो अपने विरक्त हृदय से कहता हूँ कि मित्र कुछ पल के लिये ही सही दूसरों की खुशियों के साक्षी तुम भी बन जाओ।
    इस अर्थ युग में संयुक्त परिवार का बिखराव जिस तरह से हुआ है। उसमें हम दोनों और हमारे बच्चे ,यह सोच विकसित हो गयी है। माता- पिता और भाई- भतीजे के लिये स्थान इस तथाकथित सुखी परिवार के दायरे में नहीं है।
  कभी पति की नौकरी, तो कभी बच्चों की पढ़ाई , कारण जो भी हो ,लेकिन वृद्ध सास-ससुरा अपनी पुत्रवधू के हाथों से निर्मित भोजन से अंततः वंचित तो हो ही जाते हैं , जबकि हर सास की जो पहली इच्छा रहती है, वह यही न कि बहू आएगी तो उसकी सेवा करेगी। सास- बहू के लड़ाई- झगड़े अलग बात है।
    लेकिन, आज मैंने जिस श्रवण कुमार को देखा वह अपनी वृद्ध माँ को व्हील चेयर पर बैठा कर प्रातः भ्रमण करवा रहा था नगर की सड़कों पर। मैं कभी उस माँ को , तो कभी उस लायक पुत्र को अपलक निहार रहा था, जब तक वे रतनगंज की ओर बढ़ न गये। सोचता हूँ कि उसकी माँ के आशीष की वर्षा होती होगी उसपर ? वृद्ध माता- पिता के लिये थोड़ा समय निश्चित ही होना चाहिए उनके बच्चों के पास । प्रतिदिन एक और दृश्य संकटमोचन मार्ग पर देखता हूँ, वह यह कि एक वृद्ध व्यक्ति का हाथ पकड़ सम्भवतः उसकी पुत्री  प्रातः भ्रमण पर निकलती है। वह बहुत ही सावधानी के साथ इस वृद्ध को उस क्षेत्र का भ्रमण कराती है।
 मानों यह संदेश दे रही हो कि बेटा नहीं तो क्या बेटी भी किसी से कम नहीं है।  कभी- कभी मन होता है कि ऐसे दृश्यों को कैमरे में कैद कर , उसे समाचार पत्र में प्रकाशित करूँ, परंतु न जाने क्यों , किस संकोच में पांव ठिठक जाते हैं। परंतु अधिकांश अखबारों में भी ऐसी भावनात्मक खबरों को कहाँ स्थान मिलता है। वहाँ तो फुलझड़ी- पटाखे चाहिए, इलेक्शन है न, तो राजनीति के ऐसे मसाले हम जैसे पत्रकारों को ढ़ूंढने पड़ते हैं। अन्यथा पाठक कहेंगे की मजा नहीं आया , आज तुम्हारे मीरजापुर पेज वाले कालम को पढ़ कर।
      परंतु आज मेरा मन सुबह जहाँ इन वृद्ध जनों के "श्रवण कुमार" को देख आह्लादित रहा, वहीं शाम होते होते वह अपने बचपन , अपने अभिभावकों की स्मृतियों में डूबने लगा। माँ के प्रति तो मैंने अपने सारे कर्तव्य पूरे किये, परंतु बाबा और दादी के लिये कुछ नहीं कर सका था मैं । यहाँ तक की मैं उनके अंतिम संस्कार के समय मौजूद भी नहीं रहा । वैसे तो मैं अपने मौसा जी , पिता जी और छोटी बहन का भी अंतिम दर्शन नहीं कर पाया था । परंतु दादी और बाबा के प्रति मेरा विशेष कर्तव्य था और उस दायित्व का निर्वहन तब मैं नहीं कर सका , जब लगभग 20-21 वर्ष का एक बेरोजगार युवक था । मान- सम्मान भरे जीवन की तलाश मैं कालिम्पोंग और मुजफ्फरपुर चला गया था।

  अतः मुझे यह आशीष अब देने वाला कोई नहीं है -

तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा
मेरा नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राज दुलारा
मैं कब से तरस रहा था, मेरे आँगन में कोई खेले
नन्ही सी हँसी के बदले, मेरी सारी दुनिया ले ले
 तेरे संग झूल रहा है, मेरी बाहों में जग सारा
आज उँगली थाम के तेरी, तुझे मैं चलना सिखलाऊँ
कल हाथ पकड़ना मेरा, जब मैं बूढ़ा हो जाऊँ
तू मिला तो मैंने पाया, जीने का नया सहारा
मेरे बाद भी इस दुनिया में, ज़िंदा मेरा नाम रहेगा
जो भी तुझ को देखेगा, तुझे मेरा लाल कहेगा
तेरे रूप में मिल जायेगा, मुझको जीवन दोबारा
मेरा नाम करेगा रौशन...

      मेरा अस्तित्व, मेरी पहचान, मेरी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाएगी। अकसर हास्य परिहास में मित्रगण कहते हैं कि तुम्हारा अंतिम संस्कार कौन करेगा ? तो मैं मुस्कुराते हुये जवाब देता हूँ कि जब मैं  अपनी माँ की मृत्यु के बाद किसी की शवयात्रा में सम्मिलित ही नहीं हुआ, तो मेरा भी कोई मत करना। जल प्रदूषण के लिहाज से माँ गंगा के गोद में  लवारिस शवों को अब फेंका नहीं जाता । हाँ , इच्छा तो है कि पारसी जनों की तरह ही मेरे शव को मांसाहारी पशु- पक्षियों को सौंप दिया जाए, परंतु यह भी कौन करेगा। अतः नेत्रदान के पश्चात बिजली वाले शवदाह गृह में उसे दे दिया जाए। मृत्यु के पश्चात दावत भोज मुझे पसंद नहीं है। मेरा मानना है कि यह उत्सव उसके लिये हो, जो महावीर और बुद्ध की तरह महानिर्वाण को प्राप्त करता है। जिसने जन कल्याण के लिये कुछ किया ?
      मैं अभी तक वैराग्य के पथ पर अग्रसर नहीं हो सका हूँ। इस जीवन में रह-रह कर न जाने क्यों भ्रमित हो जाता हूँ कि कोई मुझसे भी स्नेह करता है, जबकि ऐसा है नहीं । मैं किसी की जिम्मेदारी नहीं हूँ। मैंने कितनी ही रातें बिना भोजन के गुजार दिये। उस तन्हाई में किसी की आवाज नहीं सुनाई दी। मैं भलिभांति जानता हूँ कि मेरे स्नेह का कोई महत्व नहीं है, किसी व्यक्ति विशेष के लिये। जब भी कभी मैं यह सोच लेता हूँँ कि कोई मेरा भी ध्यान रख रहा है,एक नयी वेदना हृदय में जन्म लेती है, क्यों कि औरों के लिये मैं एक भूल से अधिक कुछ भी नहीं हूँ।
     इधर, कुछ दिनों से मुझमें पुनः वैराग्य का भाव जागृत हो रहा है। मानो वह कह रहा हो, अब मत भटको।
  लेकिन, इस मोहजाल से मुक्ति मुझे किसी आश्रम में जाकर ही मिल सकती है। परंतु गुरु की कृपा बार- बार नहीं होती। मैंने यह अवसर खो दिया है। हर व्यक्ति को उसकी नियति एक अवसर अवश्य देती है ,ताकि लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
   पत्रकारिता में भी मुझे एक अवसर मिला था, जब मैं लखनऊ अथवा दिल्ली जैसे महानगरों में जा अपनी प्रतिभा  परखता। तब मुझे अपने उस अखबार से मोह हो गया था,जिसने मुझे बेरोजगार कहलाने के कलंक से मुक्त किया था।  यह सब उल्लेख मैं इसलिये करता हूँ कि मेरी अनुभूति किसी का मार्गदर्शन कर सके, तो यही मेरा मुक्ति पथ होगा ?

       आज सुबह जब कलयुग में श्रवण कुमार का दर्शन किया, तब संयुक्त परिवार की भी याद हो आई। वह एक - डेढ़ वर्ष जो मुजफ्फरपुर में मैंने बिताया था। मौसा जी चार भाई थें और सभी का काम-धंधा और चूल्हे अलग होने के बावजूद भी संयुक्त परिवार सा ही वातावरण था। मैं हाईस्कूल के बाद अपनी मौसी के यहाँ चला गया था। कितने ढेर सारे बच्चे थें हमलोग वहाँ,  बबलू भैया, पप्पू, गुड़िया, राजेश , अमित, राखी, वंदन, रंजना, गोलू, रिक्की और सोनी और स्वीट , सभी के नाम आज भी मुझे याद है। छत पर हम खूब खेला करते थें । गुड़िया से मेरी अधिक पटती थी। मैं किसी भी मौसी के कमरे में निःसंकोच चला जाया करता था। और मौसी जी के सास- ससुर का भी अच्छा दबदबा था। छठ, होली और दीपावली जैसे पर्व- त्योहार पर तो पूछे ही नहीं कि एक साथ रहने के कारण वे कितने आनंद के दिन थें।
     परंतु पढ़े लिखे सभ्य समाज में  हम पति- पत्नी और हमारे एक या दो बच्चे यह भावना , सयुंक्त परिवार पर भारी पड़ रही है । सो, उसके बिखरते ही  इस छोटे कथित खुशहाल परिवार की संवेदनाओं में  कमी आती जा रही है। ऐसे जेंटलमैनों से मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि सुखी जीवन के इस नये फार्मूले से वह खुशियाँ नहीं मिलेगी, जिससे लगे कि मानव जीवन एक उत्सव है ?
    अन्यथा तो फिर-

मुट्ठी बाँधके आनेवाले हाथ पसारे जायेगा
धन दौलत जागीर से तूने क्या पाया क्या पायेगा
चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता है ढल जायेगा ..

        उस स्त्री की तरह जिसे मैं पुरानी अंजही में प्रतिदिन सुबह घर के समीप टहलते देखता हूँ। उसकी उदासी ने उसे समय से पूर्व वृद्धावस्था में ला खड़ा किया है। वह अविवाहित है ।भाई-भाभी और उनके बच्चे सभी हैं, फिर भी मनमीत के बिना जीवन उसका उत्सव पर्व नहीं बन सका है। बिल्कुल गुमशुम रहती है वह।

                         - व्याकुल पथिक

Friday, 19 April 2019

याद आई एक कहानी भूली बिसरी



आम ,टिकोरा और गुरम्मा में छिपा वो स्नेह
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"आम का गुरम्मा बनाएँ न आप , देखें तो बाजार में कच्चा आम आ गया है।"
      बनारस में था तो जैसे ही घर के समीप सब्जी मंडी में आम का टिकोरा दिखता था। घर पर मेरी यह जिद्द शुरु हो जाती थी। भले ही टिकोरा गुरम्मा ( गुड़म्बा ) बनाने के उपयुक्त न हो तब भी।
     माँ, मम्मी और मौसी  तीनों को ही पता था कि मुझे मिठाइयों से भी अधिक प्रिय गुरम्मा लगता है। हाँ,नियति का यह भी एक उपहास है कि उसी गुरम्मा के स्वाद को अब लगभग भूल ही चुका हूँ। अपनी स्मृति को टटोल रहा हूँ , जिह्वा  से पूछ रहा हूँ  कि मित्र याद आया कुछ, उस गुरम्मे की मिठास तो तुझे बहुत पसंद था न ?
   मैं भी न .. इस बेचारे को किस धर्मसंकट में डाल रखा हूँ। घर- परिवार है कहाँ , जो उसे गुरम्मा का स्वाद याद रहे। इसे यही समझाने में पिछले वर्ष से लगा हूँ -

रूखी सूखी खाय कै ठंडा पानी पीव ।
देख पराई चूपरी मत ललचावे जीव  ॥

  और समझता हूँ कि परिस्थितिजन्य कारणों से ऊपर उठ कर मेरी स्वाद इंद्री ने इसे स्वीकार कर ली है । किसी तरह के स्वादिष्ट व्यंजन  की कोई अभिलाषा नहीं है मुझे। दो वक्त की रोटी न हो, तो भी दूध- ब्रेड से काम चल जाता है।

   लेकिन,  टिकोरे पर रचना मांगी गयी, तो यह पाजी मन फिर से बचपन की मधुर स्मृतियों को छेड़ने लगा। टिकोरे से लेकर आम  तक की अनेक दास्तान चेहरे पर क्षणिक मुस्कान के साथ गहरी उदासी ले आयी। वह भूली बिसरी जीवन की कहानी फिर याद हो आई।
    अपनी बात बनारस से ही शुरू कर रहा हूँ , तब हम सभी को घर में घड़े का ठंडा पानी , आम के टिकोरे की चटनी,  गुरम्मा और  पन्ना आदि का सेवन तब तक वर्जित था, जब तक शीतला अष्टमी ( बसौड़ा) का पूजन नहीं हो जाता था। यह पर्व होली के पश्चात पड़ता है। अतः गुरम्मा खाने के लिये मुझे धैर्य रखना पड़ता था। प्रतीक्षा की घड़ी बसौड़ा के दिन जैसे ही समाप्त होती थी, मैं गुलगुले और गुरम्मा पर टूट पड़ता था । इस दिन बासी भोजन की मान्यता है। अतःभोर होने से पूर्व ही  कच्चा- पक्का दोनों ही तरह के विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार हो जाता था।
    शीतला माता , जो की स्वास्थ्य की देवी हैं , के पूजन तब वैज्ञानिक महत्व था,जब आधुनिक स्वास्थ्य चिकित्सा उपलब्ध नहीं था।  उनके पूजन के लिये  हेतु दो  छोटे -छोटे घड़ों को खूब सुंदर सजाया जाता था। साथ ही उनसे सटाकर दो लोढ़ा भी रखा जाता था।नयी साढ़ी एवं चुंदरी से महिला जैसी दो आकृति तैयार कर हल्दी, सिंदूर , पुष्प सहित अन्य सामग्रियों से इन्हें भी सजाया जाता था। बाद में एक साड़ी मम्मी और दूसरी दादी ले लिया करती थीं। कोलकाता (ननिहाल) से  हम दोनों भाइयों को सोने  की सिकड़ी मिली थी साथ ही शीतला माता की आकृति वाले सोने का लाकेट भी जो लाल डोरे में था। पूजा के बाद जब मैं उसे पहनता था तो खुशी से उछलते हुये कितनी ही बार दरवाजा खोल घर से बाहर जाने का प्रयास करता था। जिसके लिये डांट भी पड़ती थी । अभिभावकों को भय था कि कहीं बाहर इन आभूषणों को कोई छीन न ले मुझसे। जिस दिन हम दोनों भाइयों की और अपनी भी सिकड़ी तुड़वा कर मम्मी ने अपने लिये कंगन बनवा लिये थें, उस दिन मन मेरा कितना उदास था पूछे नहीं, क्यों कि इसमें माँ का प्यार था, यही उनके द्वारा दिया गया आखिरी आभूषण था, परंतु मम्मी की भी अपनी आवश्यकता थी न। यह बात उन दिनों घर पर अपना विद्यालय नहीं खुला था। आर्थिक स्थिति पापा की बहुत अच्छी नहीं थी। एक प्राइवेट स्कूल में वे शिक्षक थें और ट्यूशन पढ़ाया करते थें।
    ऐसे में हम तीनों भाई- बहन को प्रतिदिन आम मिलना कठिन था। सो, छोटे देशी अधपके आम को पापा लाते थें और हम उसे पुआल में रख देते थें। पकने पर बड़े स्वादिष्ट होते थें वे आम।
   हाँ , जब कोलकाता में था, तो आम शुरु से अंत तक प्रतिदिन बाबा भेजा करते थें। बीमार माँ किसी तरह से आधा पराठा और आम के कुछ टुकड़े खा लिया करती थीं। माँ को बहुत पसंद था आम। याद है मुझे अब भी की वहाँ गुलाब खास प्रजाति का आम जैसे ही बाजार में आता था। घर पर उसे आना ही था। लंगड़ा आम से कहीं अधिक हेमसागर आम सभी को पसंद था। बाबा मुझे इसे लगड़े का बाप- दादा कह कर चिढ़ाया करते थें, क्यों कि मैं तो बनारसी लगड़ा आम  का प्रेमी था। यहाँ मीरजापुर में दशहरी आम अधिक पसंद किया जाता है। इसके पश्चात चौसा आम आता है।
   मुजफ्फरपुर में था, तो मौसी जी भी मेरे लिये गुरम्मा बना दिया करती थी। कुछ वर्षों पूर्व जब वे आयी थीं, तो आम का खट्ट मिठा आचार भी लेकर आयी थी। प्यारे ( मेरा उपनाम) के लिये यह उनका विशेष स्नेह रहा।
    खैर, अब गुरम्मा तो नहीं मिलता , लेकिन आम जो उपलब्ध है , उसमें भी मुझे रूचि नहीं है। लगता है कि विपरीत परिस्थितियों में यह सम्वेदनशील हृदय स्वयं के लिये पाषाण सा बन गया है और जीवन का सारा मिठास नियति के पांव तले कुचलते चला गया।
वह गीत है न-
 एक हसरत थी कि आँचल का मुझे प्यार मिले
मैने मंज़िल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले
ज़िन्दगी और बता तेरा इरादा क्या है
मुझको पैदा किया संसार में दो लाशों ने
और बरबाद किया क़ौम के अय्याशों ने
तेरे दामन में बता मौत से ज़्यादा क्या है
जो भी तस्वीर बनाता हूँ बिगड़ जाती है
देखते-देखते दुनिया ही उजड़ जाती है
मेरी कश्ती तेरा तूफ़ान से वादा क्या है
 तूने जो दर्द दिया उसकी क़सम खाता हूँ
इतना ज़्यादा है कि एहसाँ से दबा जाता हूँ
मेरी तक़दीर बता और तक़ाज़ा क्या है
मैने जज़्बात के संग खेलते दौलत देखी
अपनी आँखों से मोहब्बत की तिजारत देखी
ऐसी दुनिया में मेरे वास्ते रखा क्या है...

         मुकेश द्वारा गाये इस गाने को बार- बार सुनने की इच्छा,मानो मेरी कभी समाप्त  ही नहीं होती है।

       लेकिन , इस दर्द से ऊपर अपना पत्रकारिता धर्म है। आमजन से जुड़े मुद्दे को अपनी लेखनी के माध्यम से उठाता रहूँ । हमारा कर्म पथ चाहे कितना भी कठोर हो, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुये , जब हम अग्निपथ से होकर गुजरेंगे , तभी धर्मपथ की प्राप्ति होगी। इस सृष्टि में जो जीवधारी हैं, उनके प्रति  हृदय में संवेदना हो। यह मानवीय धर्म कायम रहे। नियति से इतनी ही प्रार्थना है ।

   फिर भी जब अपनों के लिये यह मन बावलों की तरह छटपटाहट है,तो उसे याद दिलाना पड़ता है, कुछ इस तरह -

वहाँ कौन है तेरा,मुसाफ़िर, जायेगा कहाँ
दम लेले घड़ी भर, येछैयां, पायेगा कहाँ
बीत गये दिन, प्यार के पलछिन,सपना बनी वो रातें
भूल गये वो, तू भी भुला दे, प्यार की वो मुलाक़ातें
सब दूर अन्धेरा ,मुसाफ़िर जायेगा कहाँ
कोई भी तेरी, राह ने देखे, नैन बिछाए न कोई
दर्द से तेरे, कोई ना तड़पा, आँख किसी की ना रोई
कहे किसको तू मेरा, मुसाफिर जाएगा कहाँ
कहते हैं ज्ञानी,दुनिया है फ़ानी, पानी पे लिखी लिखायी
है सबकी देखी, है सबकी जानी, हाथ किसी के न आयी
कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफ़िर जायेगा कहाँ..

    स्नेह, अपनत्व एवं समर्पण की भावना से वंचित मनुष्य के नेत्रों में छिपी अश्रुधारा को हंसी- ठिठोली करने वाले भद्रजन कभी नहीं देख सकेंगे । उनकी मित्रता आपके लिए चार दिनों की चांदनी वाली साबित होगी और फिर जब आपको यह आभास होगा कि उनमें आपके प्रति किसी तरह की संवेदना नहीं थी। आप उनके लिए एक मनोरंजन के साधन मात्र थें। तब  जो अंधकार आपके हृदय पर छा जाएगा, वह
रात की इस तन्हाई में और भी भयावह होता जाएगा, कुछ इस तरह-

रौशनी हो न सकी लाख जलाया हमने
तुझको भूला ही नहीं लाख भुलाया हमने
 मैं परेशां हूँ मुझे और परेशां न करो
  किस कदर जल्द किया मुझसे कनारा तुमने
 कोई भटकेगा अकेला ये न सोचा तुमने
 छुप गए हो तो कभी याद ही आया न करो
 मुझ को इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो
 जिसकी आवाज़ रुला दे मुझे वो साज़ न दो
 आवाज़ न दो...

   जीवन में जो खुशियाँ हैं,वह अपने परिवार के सदस्यों संग ही मिलती हैं। अन्यथा आप किसी अन्य की जिम्मेदारी नहीं हैं । गुरम्मा की बात तो छोड़े , कोई आपसे यह भी नहीं पूछेगा कि आज दो वक्त रोटी मिली या नहीं , चाहे आप उससे कितना भी स्नेह करते हो , फिर भी वो गीत है न-

वो औरत है मैं महबूबा
वो सब कुछ है मैं कुछ भी नहीं..।

 शुभ रात्रि,फिर मिलेंगे।

                 - व्याकुल पथिक

Tuesday, 16 April 2019

जियो और ​जीने दो

 
जियो और ​जीने दो
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  भगवान महावीर स्वामी की जयंती को दृष्टिगत कर  यह लेख मैंने पिछले तीन दिनों से लिख रखा है । आज ब्लॉग पर इसे पोस्ट कर रहा हूँ। यह मेरे मन का एक भाव है। कृपया इसे किसी धर्म अथवा व्यक्ति विशेष पर कटाक्ष न समझें  ।
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      नगर के संकटमोचन मंदिर मार्ग पर पिछले दिनों सुबह पुनः वध से पूर्व किसी मुर्गे की आखिरी पुकार सुन मेरा हृदय कुछ पसीज सा गया। यह जानते हुये भी कि नियति ने हर प्राणी के लिये मृत्यु दण्ड तय कर रखा है। वह उसी तरह से निष्ठुर है , जिस तरह से कोई वधिक जो कि बकरे का पालन पोषण तो करता है, परंतु अपने हित में उसके गर्दन पर छूरा भी चलाता है, तब उसके हृदय में तनिक भी संवेदना नहीं जगती।  बेचारे बकरे को पता भी नहीं चल पाता कि उसके पीठ को सहलाने वाले हाथ कब उसके मुख को जकड़ लेते हैं । मौत का खूंखार पंजा भी ऐसा ही होता है ? इन अबोध जानवरों की तरह हम मनुष्य भी उसे देख - समझ नहीं पाते हैं।
      नवरात्र पर्व समाप्त होते ही ,मांस- मछली की दुकानों पर ग्राहकों की पुनः बढ़ी चहल-पहल को देख, वहीं  एक प्रश्न फिर से मेरे मन में उठा कि यह कैसे देवी भक्त हैं ।  यदि वे अपने अधिकांश आराध्य देवों को निरामिष भोज्य सामग्री प्रसाद के रुप में अर्पित करते हैं , स्वयं भी विशेष पर्व और प्रमुख दिनों जैसे मंगलवार, वृहस्पतिवार अथवा शनिवार मांस- मदिरा से दूर रहते हैं, सात्विक आचरण का प्रदर्शन करते हैं। तो सामान्य  दिनों में वे ऐसे पदार्थों को ग्रहण कैसे करते हैं। वे जीव हत्या के निमित्त क्यों बनते हैं। उन्हें मांस - मछली खरीदते समय वध के दौरान क्या कभी इन निरीह प्राणियों की करार और छटपटाहट का एहसास नहीं होता है ? अन्य बहुत से धर्मों की बात इसलिये मैं नहीं करता ,क्यों कि वहाँ किसी उपासना पर्व अथवा दिन मांसाहारी भोजन सम्भवतः वर्जित नहीं है। साथ ही कुछ धर्म का मानना है कि मनुष्य को छोड़ अन्य प्राणी में रूह नहीं रहता। लेकिन, हिन्दू धर्म तो चौरासी लाख योनियों की बात करता है। जीवात्मा इनमें भटकती है, फिर  पशु वध क्यों ?
      मुझे ऐसे लोगों से चिढ़न सी होती है, जो पूजा- पाठ तो खूब करते हैं और विशेष दिनों को छोड़ मांस-  मदिरा का सेवन करते हैं।
   कालिम्पोंग में था, तब वहाँ एक कश्मीरी पंडित पड़ोस में रहा करते थें। महाराष्ट्र की उनकी पत्नी अत्यंत धार्मिक थीं । लेकिन पति परमेश्वर के लिये मुर्गा पकाया करती थीं। मैं अकसर कहता था उनसे कि क्या अंकल आप भी कितने विचित्र हैं, कभी तो सोचा करें कि आंटी जी को कैसा महसूस होता है। वे चम्मच ,कांटे और चिमटे से किसी तरह से मांस को पकड़ कर उसे पकाया करती थीं। मांस के टुकड़े को हाथ लगाने में उन्हें मानसिक कष्ट पहुंचता था। लेकिन शाम को जब अंकल मस्ती में होते थें, तो कहते थें कि तुम दोनों बिल्कुल पागल हो , कभी टेस्ट कर के देखों इसकी यह टांग , बढ़िया से बढ़िया भोजन भूल जाओगे।
     अपनी ही पत्नी की भावनाओं के प्रति उनमें मानो कोई संवेदना थी ही नहीं। बड़े- बुजुर्गों से मैंने भी यही सुना है कि मांसाहारी लोगों के हृदय में वैसी कोमलता, दूसरों के प्रति संवेदना और   अन्य प्राणियों के प्रति दया का भाव नहीं रहता है। दूसरों के दर्द और उसके रूदन का वे यह कह उपहास उड़ाते हैं कि खाओ पियो ऐश करो । मुझे नहीं पता ऐसी धारणा में कितनी सच्चाई है।

वहीं , "  जीवो जीवस्य भोजनम् " की बात कह  मांसभक्षी लोग अकसर ही यह कुतर्क कर बैठते हैं कि इसके लिये तो शास्त्र भी अनुमति देता है।
     खैर , मैं भी चुटकी लेता था कि अंकल जी क्यों नहीं फिर इसे प्रसाद के रुप में ठाकुर बाड़ी में चढ़ा आते हैं। आपके भी देवी- देवता प्रसन्न हो जाएँगें न ? और अंकल जी का गुस्सा फिर देखते ही बनता था ।
    आज भी मैं अपने ऐसे कुछ मांसाहारी मित्रों से, जो मंगलवार , शनिवार अथवा नवरात्र का नाम लेते हैं, से कहता हूँ कि सत्तर चूहे खा कर बिल्ली बनी भक्तिन ।
    हममें यह हँसी- ठिठोली होती रहती है आपस में ।

  अपने विंध्यक्षेत्र  की बात करूँ, तो जब मानव सभ्यता विकसित नहीं हुई थी। मांसाहार पर ही जीवन निर्वहन करना पड़ता था ,तब पशुओं का वध कर स्थानीय कोल- भील उसे अपने स्थानीय देवी- देवता को अर्पित करने लगे थें। लेकिन, जब मानव सभ्यता- संस्कृति का विकास हुआ और धर्म ग्रंथों की रचना हुई ,तो सात्विक गुणों को मानव जीवन में प्रमुखता दी गयी ।
 पशुओं की बलि काली और भैरव को दी जाती है। यह वाममार्गी पूजन बिल्कुल अलग है । इससे जुड़े साधक  नवरात्र में महानिशा पूजन  करते हैं। वे पंच मकार विधि (मांस , मदिरा, मत्स्य ,मुद्रा, मैथुन) से अपनी अधिष्ठात्री देवी को प्रसन्न करते हैं । वैसे, वाममार्गी उपासना स्थल प्रमुख रूप से 4 हैं . जिन्हें चार सिद्ध पीठ कहा जाता है। जिनमें  से राम गया घाट ,विंध्याचल के शिवराम में है। महिवग्राम  बिहार में , श्रीरामपुर  बंगाल में और  मणिकर्णिका घाट वाराणसी का उल्लेख है। यहां रामगया घाट के समीप ही दक्षिणाभिमुख भगवती तारा देवी का मंदिर है ।यह तंत्र साधना स्थल है । यहां गंगा नदी का किनारा , श्मशान भगवती शिवलिंग और बिल्वपत्र भी है एकांत स्थान है। कामरूप कामाख्या माया बंगाल नगरी के बाद विंध्याचल स्थित तारा देवी पीठ , भैरव कुंड एवं काली खोह तंत्र साधना के अद्भुत एवं फलप्रद स्थल हैं । ऐसी मान्यता है कि तारा देवी महालक्ष्मी रूपा विंध्यवासिनी देवी की सेवा करती हुई उनके भक्तों को आकर्षण एवं विकर्षण जैसे अलौकिक एवं तांत्रिक भव बाधाओ से मुक्ति दिलवाती हैं। वाममार्ग में सर्वोत्तम तंत्र श्रीयंत्र को माना जाता है। साधक श्री यंत्र की ज्यामिति रचना करके उसकी विधिवत पूजन करते हैं । वैसे तो प्राचीन काल में निशा पूजन में नरबलि तक की मान्यता थी परंतु अब बकरा, मुर्गा, कबूतर ,नारियल, जायफल, कोहरा आदि की बलि दी जाती है। वैसे , यहाँ विंध्यवासिनी धाम में भी प्रतिदिन एक पशु की बलि आज भी दी जाती है।
    बचपन में हम सभी ने सिद्धार्थ( महात्मा बुद्ध ) उनके चचेरे भाई देवदत्त ,जिसके तीर से घायल हंस की कथा पढ़ी ही है। हंस पर जब अधिकार की बात हुई ,तो न्याय मंच पर बैठे राजा ने बालक सिद्धार्थ के इस कथन को स्वीकृति दे दी कि मारने वाले से बचाने वाले का अधिकार अधिक होता है।
   आज भी मुझे याद है कि अपने पाठ्य पुस्तक में इस कहानी को पढ़ते समय और उसके चित्र देख मेरी आँखें नम हो आयी थीं। पशुवध चाहे , वह बलि के रूप में ही क्यों न हो मुझे स्वीकार नहीं है। गंभीर रुप से जब अस्वस्थ हुआ तो , यहाँ के सीएमओ  जो कि मुझसे स्नेह करते थें , उन्होंने अनेक बार मछली के सेवन को कहा। हमारे मध्य एक अधिकारी और पत्रकार का संबंध नहीं था। अतः वे मुझे स्वस्थ देखना चाहते थें। उनके बहुत कहने पर मैंने अण्डे का सेवन किया ,परंतु अंतरात्मा ने उसे स्वीकार नहीं किया और मैंने निश्चय कर लिया कि अब अण्डा नहीं खाना है। वैसे , तो कोलकाता में जब था,वहाँ  लहसुन- प्याज भी वर्जित था। वापस बनारस लौटने पर पिताजी की पिटाई के भय से इनसे निर्मित सब्जी का सेवन करना पड़ा।
    मांसाहारी तो वाराणसी में भी मेरे परिवार में कोई नहीं था।  मेरा स्पष्ट रुप से मत है कि जब क्षुधापूर्ति के लिये अन्य भोज्य सामग्री उपलब्ध हैं ,तो फिर किसी जीव की हत्या क्यों ?

   बचपन  में मुझे याद है कि घर में बरसात के मौसम में बड़ी- बड़ी काली चींटियाँ खूब निकला करती थीं। वे हम सभी को कांट लेती थीं। तो दादी उन्हें लकड़ी के एक तख्त से रगड़ - रगड़ कर मार देती थीं। देखा देखी मैं भी तब चीटियों , तितलियों और चूहों को सताने लगा। लेकिन, बचपना समाप्त होते ही मुझे आभास होने लगा कि मैंने इन प्राणियों के साथ उचित नहीं किया। वैसे बाद में भी मैं भयवश कनखजूरे को मार दिया करता था। मुझे लगता है कि भय अथवा क्षुधा के कारण किसी पशु की हत्या और अपने जिह्वा के स्वाद के लिये उसे मारने में अंतर है , फिर भी किसी की हत्या करते समय मन में कठोरता का भाव आना निश्चित है।
     प्राचीन काल में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर की 17 अप्रैल को जयन्ती है। भगवान महावीर ने अहिंसा को जैन धर्म का आधार बनाया। उन्होंने तत्कालीन हिन्दू समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था का विरोध किया और सबको एक समान मानने पर बल दिया ।उन्होंने " जियो और ​जीने दो "के सिद्धान्त पर जोर दिया। सबको एक समान नजर में देखने वाले भगवान महावीर अहिंसा और अपरिग्रह के साक्षात मूर्ति थें । वे किसी को भी कोई दु:ख नहीं देना चाहते थें।
  भगवान महावीर ने अहिंसा, तप, संयम, पाँच महाव्रत, पाँच समिति, तीन गुप्ती, अनेकान्त, अपरिग्रह एवं आत्मवाद का संदेश दिया। उन्होंने यज्ञ के नाम पर होने वाली पशु-पक्षी एवं नर की बाली का विरोध किया । सभी जाती और धर्म के लोगों  को धर्म पालन का अधिकार बतलाया। उन्होंने उस समय जाती-पाति और लिंग भेद को मिटाने के लिए उपदेश दिये।
        वैसे तो  " अहिंसा परमो धर्मः " इस नीति वचन पर महाभारत  के वन पर्व में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। भगवान महावीर एवं महात्मा बुद्ध के बाद महात्मा गांधी को अहिंसा का पुजारी कहा गया। संयुक्त राष्ट्र संघ  ने तो बापू के सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर रखा है। यह  "अहिंसा" पशु वध  तक सीमित नहीं है , यह एक आदर्श है।
    व्यवहार में मानव इसका कितना पालन करता है, इसके लिये उसे परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार है, क्यों कि अन्याय का उन्मूलन कर के सत्य पर आधारित धर्म की स्थापना के लिए क्रांति, रक्तपात तथा प्रतिशोध शास्त्र विहित साधन माने गए हैं। इसीलिए बूट्स की तलवार पवित्र है, शिवाजी का बाघनख वंद्य  है, इटली की क्रांति का रक्तपात मंगलमय है, विलियम टेल का बाण दिव्य है और चार्ल्स शिरच्छेद सत्कर्म है।
     फिर भी ,दया ही धर्म का मूल तत्व है। इससे करुणा और प्रेम का भाव विकसित होता है। जब-तब हम अपनी हंसी ठहाके वाली दुनिया से बाहर निकल दूसरों की पीड़ा को नहीं समझते हैं। इसकी अनुभूति सम्भव नहीं है।

                                  - व्याकुल पथिक