Followers

Sunday, 19 January 2020

भिखारी


(जीवन की पाठशाला)


मीरजापुर की एक घटना पर आधारित मार्मिक कथा


****************************
   उसका स्वाभिमान मंदिर के चौखट पर कुचल गया..! आज भगवान जी की मूर्ति के समक्ष यह कैसा अन्याय हो गया.. !! भिक्षुकों की टोली में एक नया भिखारी आखिर क्यों शामिल हो गया.. !!!
****************************
【 दृश्य-1】

  सुबह हो चुकी थी ,परंतु ठंड कुछ ऐसी थी कि गरम कपड़ों के अंदर घुसकर हड्डियों को गलाए जा रही थी। बर्फीली हवाओं से बचने केलिए राघव बार-बार साइकिल की गति धीमी कर मफलर को टोपी पर कस रहा था। तभी भिक्षुकों का एक समूह हाथों में कटोरा लिए  " दान-पुण्य " की पुकार लगाते हुये नगर के एक प्रमुख मंदिर के समीप जा पहुँचा । बूढ़े,जवान,महिला और बच्चे सभी इस टोली में शामिल थें। मर्द जहाँ बड़ी- बड़ी गठरियों को बांस के सहारे कंधे से लटकाए हुये थे , तो वहीं स्त्रियों ने भी दान में मिली पुरानी चादरों में गाँठ लगी बड़ी- बड़ी झोलियाँ ले रखी थीं। ये सभी अनाज से भरी हुई थीं और बच्चों के चेहरे की चमक भी देखते ही बनती , इन्हें खाने केलिए भरपूर सामग्री मिल गयी थी।

 इन्हें देख राघव भुनभुनाता है-  " कैसे निर्लज्ज लोग हैं ये ? मानों पुरुषार्थ न करने की कसम खा रखी हो और  मर्द तो खासे हट्टे-खट्टे हैं , फिर भी भिक्षा मांगने में आत्महीनता का भाव उनमें तनिक न है। भीख मांगना उनके लिए बिना श्रम और धन खर्च किये बढ़िया व्यापार है । हाँ, जन्मसिद्ध अधिकार भी !"
     जब भी ग्रहण लगता है, न जाने कहाँ से डेढ़-दो हजार की संख्या में ऐसे लोग शहर में डेरा डाल लेते हैं। मैले-कुचैले वस्त्र , बिखरे केश , मलिन मुख और शरीर से निकलती दुर्गंध , इनके तो समीप से होकर गुजरना भी कष्टकारी है। इन्हें देख राघव को न जाने ऐसा क्यों लगा कि " शाइनिंग इंडिया " की ये सभी सजीव तस्वीर हैं। स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्मसभा में पहुँचने से पहले अपने देश के संदर्भ में विदेशी लोग जो सोच रखते थे। इन्हें देख राघव को लगा कि वे गोरे कुछभी गलत तो नहीं कहते थे।
      उधर, मंदिर के बाहर तिराहे पर अलाव को घेरे भिखारियों के भी क्या ठाठ हैं। कोई टांग फैलाए, तो कोई उकडूँ बैठ हाथ सेक रहा था। जब हाथ में कटोरा हो , तो पेट भरने की फिक्र काहे की ! भगवान का वास्ता दिये बिना भी इनकी रसना यहाँ तृप्त हो जाया करती है।
  राघव ने देखा कि एक धर्मभीरु भक्त सामने वाली चाय की दुकान से इन्हें आवाज लगा रहा है। अबतो चाय के साथ बिस्किट भी इन्हें मिल गये थें । चायवाले ने उसे बताया कि ठंड के मौसम में इन भिखमंगों की मानों लाटरी निकल आती है। एक मौसम में पाँच से सात कंबलों का जुगाड़ मजे से हो जाता है। इसबार तो मंदिर पर आकर जिले के दयालु कप्तान साहब ने अपने हाथों से इनके ठिठुरते बदन पर बढ़िया किस्म का कंबल डाला था। परंतु अगले दिन ये कंबल न जाने कहाँ गायब हो गये थे । ये भिखारी फिर से फटी-पुरानी चादरों में लिपटे मिले । संग्रह की इनकी यही लालसा इन्हें ऐसे सामग्रियों के उपभोग से वंचित कर देती है।

【दृश्य-2】


    मंदिर के दूसरे छोर से एक और पुकार राघव को  सुनाई पड़ती है। उसने देखा सुबह से बोहनी न होने से निराश ठंड से ठिठुरते उस बूढ़े रिक्शावाले की आँखों में एक भद्रपुरुष को देख तनिक चमक- सी आ गयी है। 

 उसने अतिविनम्र भाव से कहा-" सा'ब ! टेशन -बस अड्डा  ? "
  जिसपर उसकी ओर बिन देखे ही भद्रपुरुष ने कहा- " नहीं । "
" तो सा'ब जी जहाँ आप कहो ?" रिक्शावाले ने तनिक दीनता प्रदर्शित करते हुये पुनः अनुरोध किया।
   परंतु यह क्या ?  इसबार उस भद्रपुरुष की भावभंगिमा कुछ ऐसी थी कि मानों बिल्ली ने रास्ता काट दी हो।
  उसने झुंझलाते हुये कहा - " जहन्नुम में जाना है,  चलोगे? एक तो पैसे भी अधिक लोगे और चाल बैलगाड़ी-सी भी नहीं..!"
    तभी ई-रिक्शे का हार्न सुन वह उसपर सवार हो निकल लेता है ।
  बेवस निगाहों से बूढ़ा कभी अपने रिक्शे तो कभी ई-रिक्शे की गति को देखते रह जाता है  और फिर मंदिर की ओर निगाहें उठा कर कुछ बुदबुदाता है ।
  शायद विधाता से पूछ रहा हो कि उसके पुरुषार्थ का कोई मोल नहीं ?
    अबतो उससे यहाँ ठहरा नहींं जा रहा था। फिरभी जाड़े से संघर्ष करने केलिए वह शरीर पर पड़े पुराने शाल को और कसकर लपेट लेता है।
    सवारी की प्रतीक्षा में पिछले दो घंटे रिक्शे पर बैठे-बैठे उसके हाथ-पांव को मानों पाला मार दिया हो । बदन थरथराने लगा था। वह कभी मंदिर तो कभी सड़क की ओर दृष्टि उठाके देखे रहा था। इन भिखमंगों को देख उसे कुढ़न हो रही थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि दयामयी ईश्वर के दरबार में उसके साथ यह पक्षपात क्यों हो रहा है।  भिखारियों को बिना तन डोलाए ही नाना प्रकार के भोज्यपदार्थ मिल रहे हैं और रिक्शा खींच कर भी उसके पेट में न जाने क्यों आग लगी रहती है।
  आज तो उसे ऐसा लग रहा था कि उसके स्वाभिमान को यह ठंड ग्रहण बन निगलने को आतुर है। पौ फटने से पहले उसने यह सोचकर रिक्शा निकाला था कि चार-छह चक्कर मार लेगा तो सुबह की चाय और कचहरी के पास वाले ठेले से बाटी-चोखा मिल जाता। बोहनी न होने से वह स्वयं पर यह कह झल्लाता है- " ससुरा ! ई पापी पेट बुढ़ापे में भी हलकान किये है। "
   पर वह जानता है कि पेट केलिए मजूरी तो करनी ही है और नहीं तो दिनभर ई-रिक्शा और आटो की धमाचौकड़ी के सामने उसके बूढ़े रिक्शे की सवारी कौन भलामानुष पसंद करेगा।
  परंतु आज तो बाबू-भैया की हाँक लगाते- लगाते उसकी जुबां थक चुकी थी । अपने श्रम के इस उपहास पर किसकी अदालत में अपील करता वह ?

【 दृश्य-3 】


    अचानक गरम हलवे की सुगंध ने उसे फिर से बेचैन कर दिया था । सुबह से चाय भी तो नहीं पी रखी थी। सुर्ती मलकर तलब मिटाने की कोशिश नाकाम हो चुकी थी। रिक्शे की सीट पर घुटने को  छाती से चिपकाए बैठे इस वृद्ध की निगाहें एक बार फिर अलाव के समीप हो रहे कोलाहल की ओर जाती है । यहाँ एक समाजिक संस्था के मुखिया के जन्मदिन पर मंदिर के बाहर बैठे भिक्षुकों को हलवा-घुघरी परोसा जा रहा था।

   राघव ने देखा कि मीडिया के लोग भी पहुँच चुके हैं। जिन्होंने मुखिया जी के इस " दरिद्र नारायण सेवा " वाली कई खूबसूरत तस्वीरें ली ,वीडियोग्राफी भी हुई है । तभी मुखियाजी के कानों में ये मीडियावाले कुछ फुसफुसाते हैं और फिर प्रसाद संग एक-एक लिफाफा इनसभी के हाथों में होता है।  अब यह पक्का था कि उनकी यह तस्वीर कल के अखबारों में समाजसेवा की मिसाल बनेगी। 
       ललचायी आँखों से उसने खाली हो रहे हलवे के भगौने को फिर से देखा। अबतक संस्था के किसी कार्यकर्ता में यह भलमनसाहत नहीं थी कि इधर आकर उससे कहता कि बाबा, तुम भी मुखिया जी की लम्बी आयु केलिए दुआएँ  करो और यह लो हलवा-घुघरी। उनमें तो सेल्फी लेने की होड़ मची हुई थी।
    धीरे-धीरे कोलाहल थमने लगा था। याचना भरे नेत्रों से उसने मंदिर में विराजमान भगवान की ओर भी देखा। मुखिया जी ने आज विशेष श्रृंगार करवा रखा था। नाना प्रकार के मेवा-मिष्ठान मूर्ति के समक्ष रखे हुये थें।
 अबतो उससे बिल्कुल ही रहा नहीं जा रहा था।उसकी समस्त इंद्रियाँ जवाब देने को थीं, यद्यपि उसका स्वाभिमान किसी के समक्ष उसे हाथ पसारने नहीं दे रहा था । भीख ही मांगनी होती तो क्यों इस बुढ़ापे में रिक्शा चलाता वह।  जिंदगीभर की कमाई यूँ ही चली जाए,यह उसे मंजूर न था । उसने एकबार फिर से चारों ओर निगाहें दौड़ाई। काश! कोई सवारी मिल जाए और वह यहाँ से दूर चला जाता।
 उफ!  नियति भी उससे आज ये कैसा खिलवाड़ कर रही है। पुरखों को वह क्या मुँह दिखाएगा ? वह अपने इच्छाओं के प्रवाह को बलपूर्वक रोके हुये था।
  और अचानक .. उसके दुर्बल काया में तेज कंपन होती है। इससे पहले कि वह रिक्शे पर से नीचे गिरता ,उसने किसीतरह स्वयं को संभाल लिया । उसके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था और पांव अलाव की ओर बढ़ते चले गये।  चेतनाशून्य हो वह उन भिक्षुकों के बीच जा बैठा था ।
  तभी मुखिया जी की आवाज उसके कान में पड़ती है -" अरे देखो ! एक तो छूट ही गया। इसके लिए भी दो दोने लेते आना जरा ? "
    यह देख वह जोर से चिल्लाना चाहता था - " भिखमंगा नहीं रिक्शेवाला हूँ मैं..।"
  लेकिन, गला उसका रुँध गया ...।
  उसका स्वाभिमान मंदिर के चौखट पर कुचल गया..!आज भगवान जी की मूर्ति के समक्ष यह कैसा अन्याय हो गया.. !! भिक्षुकों की टोली में एक नया भिखारी आखिर क्यों शामिल हो गया.. !!!
    रिक्शावाले के श्रम का प्रतिदान  ...यह भीख  ?   कैसे हैं हम और हमारी सामाजिक व्यवस्था.. !!!!
   
        - व्याकुल पथिक

Friday, 17 January 2020

ये कैसी पिपासा !

   ( एक सत्यकथा )
  *************
    होटल के रिसेप्शन से लेकर चौराहे तक खासा मजमा लगा हुआ था।  दरोगा और सहयोगी सिपाही एक वृद्ध व्यक्ति को गिरफ्तार कर समीप के कोतवाली ले जा रहे थें। साथ में एक महिला पुलिसकर्मी थी और  उसकी उँँगली थामे वह मासूम बच्ची बिल्कुल डरी-सहमी कभी उस वृद्ध को तो कभी अपने इस नये अभिभावक को देख रही थी ।
    तभी तमाशाइयों की भीड़ में शामिल एक आदमी बुदबुदाता है- " अरे !  कैसा घिनौना मिथ्या आरोप !!  सत्तर साल का बुड्ढा और आठ साल की यह लड़की..  !!! "
  लगता है कि धूर्त होटल मैनेजर से कोई तकरार हो गयी होगी , जिसका ऐसा प्रतिशोध उसने लिया है। अन्यथा बेचारा यह बाबा तो पड़ोसी प्रांत  मध्यप्रदेश से इस कन्या का दवा-दारू कराने यहाँ  आया करता था । बड़ी भलमनसाहत से सबसे मिलता था । एक से बढ़ कर एक ज्ञान की बातें बताया करता था।
   कैसा अंधेर है ! इस भले आदमी को शैतान बता दिया, अबतो नेकी का ..।
      उसने अपना संदेह तनिक इस दार्शनिक अंदाज में व्यक्त किया कि मौजूद लोगों में से  अन्य कई भद्रजन भी सुर में सुर मिला कर गुटूर गू करने लगते हैं- " हाँ , भाई ! आज कल ऐसा ही जमाना है। "
   यदि पुलिस न होती तो बाबा के प्रति उनकी यह अंधभक्ति उस होटल मैनेजर पर भारी  पड़ सकती थी। दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों ही यहाँ एक साथ चोंच भिड़ाए खड़े थें। मानों मैनेजर से उनकी कोई पुरानी खुन्नस हो  ?
    सत्य का अन्वेषण इनमें से कोई नहीं करना चाहता था। बकबक करने वालों में से किसी को भी लड़की के भयाक्रांत मुखमण्डल की ओर देखने की फुर्सत न थी, यद्यपि वे सभी अंतर्जामी बने मैनेजर को पानी पी-पी कर कोस रहे थें..।
    आखिर क्या कसूर था  होटल के उस अनुशासनप्रिय मैनेजर का ..?
 जो उससे प्रतिशोध लेने केलिए भद्रजन यूँ  हुंकार लगा रहे थे ..!
 उस बाबा को तो कोई नहीं कह रहा था  - " मारो ऐसे पापी को।"
  ऐसी क्या अंधभक्ति है  ?
 बाबा, ज्ञानी- ध्यानी था इसलिए ?
  और  उस अबोध बच्ची की आपबीती भला जानते भी कैसे ये भलेमानुस  ।
    यदि कानून अपना काम नहीं करे तो ऐसे ढोगी बाबाओं की जय जयकार होती रहे ?
    मीडियावाले भी पहुँच चुके थे। ऐसी घटनाएँ उनके लिए मसालेदार खबर तब भी थी और आज ढ़ाई दशक बाद भी है ।
   ये पत्रकार  दनदनाते हुये सीधे होटल की गैलरी में जा पहुँचे थे । यहीं मैनेजर , कर्मचारी और होटल का मालिक सभी एकत्र थे। कोई होटल के अंदर तो कोई बाहर जा कर मौका मुआयना कर रहा था। मैनेजर का बयान भी लिया गया ।
    और तभी बाबा का वह धनाढ्य अनुयायी  इनके समक्ष पुनः प्रगट होता है । वह कनखियों से इशारा कर एक पत्रकार को बुला उसके कान में कुछ फुसफुसाया है ।  उसके चेहरे पर  कुटिल मुस्कान फिर से आ जाती है। उसे लगता है कि उसकी योजना सफल होगी। भला घर आयी लक्ष्मी को कौन ठुकराता है ?
      मीडियाकर्मियों के पास होटल मालिक से हिसाब चुकता करने का यह एक सुनहरा अवसर था ; क्यों कि स्वामीभक्त मैनेजर ने उनके मेहमानों को ठहरने केलिए कभी मुफ्त में एक कमरा तक नहीं दिया था । वे चाहते तो खबर को ट्विस्ट (विकृत) कर सकते थें। लेकिन, तब की पत्रकारिता में वह गंदगी नहीं थी।
  एक ने कोशिश की भी, तो अन्य सहयोगियों का असहयोग देख डर गया कि कहीं अखबार का सम्पादक तलब न कर ले।
    वैसे, आज का दौर भी बुरा नहीं है। सोशल मीडिया अपना काम बखूबी कर रहा है । यदि इसका दुरुपयोग न हो तो यह जनता केलिए सच उगलने की मशीन है।
    हाँ तो,  मैनेजर ने बताया कि यह बाबा उस बच्ची के साथ होटल में बराबर आता रहा है,परंतु  उसको इलाज केलिए कमरे के बाहर कहीं ले जाते कभी नहीं देखा गया , फिरभी उसपर संदेह करना आसान तो नह था ; क्योंकि एक तो उसकी अवस्था और दूसरा उसकी धार्मिक प्रवृत्ति दीवार बने खड़ी थीं ।
  अतः काफी धर्मसंकट में था वह ।
कमरे के अंदर की गतिविधि जानने की मैनेजर की उत्सुकता ने उसकी राह आसान कर दी।
 बाबा जिस कमरे में ठहरता था , उसकी खिड़की में जहाँ कुलर रखा था ,वहीं एक सुराख था।
  और उस रात उसी से उसने यह कैसा घिनौना दृश्य देखा था !
   बिस्तर पर बेसुध पड़ी वह बच्ची और उसके मुख में मदिरा उड़ेलता बाबा !
 अरे ! अब यह क्या ?
 छी-छी ! धूर्त बूढ़े ने अपनी पिपासा शांत करने का यह कैसा माध्यम बनाया है ..!
    राम ! राम!! कमीना कहीं का..।

   क्रोध से भरे मैनेजर की ललकार सुनते ही अन्य कर्मचारी दौड़ पड़े, फिर क्या था, दरवाजा खुलवा ढोगी बाबा की लात-घूंसे से खातिरदारी शुरू हो गयी।
   और जब उसने देखा कि प्राणरक्षा केलिए कोई उपाय शेष नहीं है ,तब बाबा के चोंगे से शैतान बाहर आ गया।
  पुलिस ने भी बताया कि बाबा ने अपराध स्वीकार कर लिया है कि वह बच्ची के साथ  कुकृत्य किया करता था।
    थानेदार का बयान आते ही बाबा का वह भक्त चुपचाप खिसक लेता है और तमाशाई मैनेजर की  वाहवाही करते हुये अपने रास्त..।
    यह घटना पिछले दिनों बातों ही बातों में मैनेजर ने जब मुझे बतायी, तभी से मैं इस चिंतन में खोया हूँ कि शारीरिक रूप से असमर्थ और विवेकशील होकर भी बाबा ऐसा घृणित कर्म करने को विवश क्यों था ?
     यह कैसी पिपासा है..!!!
  मैं तो अब तक यह समझता रहा हूँ कि पिपासा तृप्त होने की वस्तु नहीं है । यह संवेदनशील मानव हृदय की वह आग  है, जिसे पानी की नहीं घृत की आवश्यकता है, जिससे यह और भड़के । तब तक भड़के जब तक मनुष्य  बुद्ध न हो जाए;
 क्योंकि मानव जीवन एक पिपासा ही तो है। शिशु के जन्म के साथ ही जैसे ही उसे  ज्ञान का बोध होता है , उसकी पिपासा अपना कार्य  करने लगती है।
   किन्तु ज्ञान पिपासा, प्रेम पिपासा ही नहीं , काम पिपासा भी तो है  और यही तृष्णा हमारे सारे सद्कर्मों का क्षण भर में भक्षण कर लेती है।
   अतः तृष्णा हमारे दुख का कारण है।  शरीर के लिए आवश्यक वस्तुओं के उपभोग को तृष्णा नहीं कहते हैं । जब वस्तुओं की लालसा बढ़ने लगती है , तो यह मनुष्य के जीवन में विषय वासना उत्पन्न कर उसे पथभ्रष्ट कर देती है।
    हाँ, रक्त पिपासुओं ने भी मानवता को कम आघात नहीं पहुँचाया है।

        -व्याकुल पथिक
 
 



    

Sunday, 12 January 2020

तुम ऐसे क्यों हो

  जीवन की पाठशाला से
*******************
नज़रों में न हो दुनिया तेरी
हौसले को गिराते क्यों हो

यादों के दीये जलाओ मगर
रोशनी से  मुंह छिपाते क्यों हो

 तेरी नज़्मों में अश्क हो गर
 ग़ैरों को ज़ख्म दिखाते क्यों हो

 इंसानों की नहीं ये बस्ती है
 मुर्दों  को जगाते क्यों हो

 तेरी क़िस्मत में मंज़िल नहीं
 दोस्ती को आजमाते क्यों हो

 है सफर में अभी मोड़ कई
 पथिक ! राह भुलाते क्यों हो

 वक्त के साथ यूँ बढ़ते चलो
 ग़म को प्यार जताते क्यों हो

जो न हुये थे कभी अपने
दिल उनपे  लुटाते क्यों हो

    - व्याकुल पथिक




    

Monday, 6 January 2020

ज़ख्म दिल के (जीवन की पाठशाला)

कांटों पे खिलने की चाहत थी तुझमें,

राह जैसी भी रही हो चला करते थे ।


न मिली मंज़िल ,हर मोड़ पर फिरभी

अपनी पहचान तुम बनाया करते थे।


है विकल क्यों ये हृदय अब बोल तेरा

दर्द ऐसा नहीं कोई जिसे तुमने न सहा।


ज़ख्म जो भी मिले इस जग से तुझे

समझ,ये पाठशाला है तेरे जीवन की।


शुक्रिया कह उसे ,जिसने ये दर्द दिये

तेरी संवेदना सुंगध बन,जो महकती है।


पहचान उन्हें भी जो न थें अपने कभी

ग़ैर हैं जो उनके लिये,न रोया करते हैं।


करे उपहास-तिरस्कार न हो फ़र्क़ तुझे

इस सफर में मुसाफिर तो चला करते हैं।


माँ को ढ़ूँढो नहीं इस तरह पगले उनमें

तेरी आँसुओं पे वाह-वाह किया करते हैं।


न तू अपराध है न पाप फिर से सुन ले

कहने दे गुनाह, दोस्ती को न समझते हैं।


तेरी बगिया नहीं वीरान है फूल खिले

तेरे कर्मों की पहचान,ये दुआ करते हैं


बात ऐसी भी न कर ये राही खुद से

जीत की बाजी यूँ न गंवाया करते हैं ।


है चिर विधुर तू, न तेरा कोई पर्व यहाँ

विधाता की नियत पे,नहीं शक करते हैं।

- व्याकुल पथिक

Saturday, 4 January 2020

मेरी वेदना - मेरी संवेदना ( जीवन की पाठशाला )


************************
  और हृदय को दहलाने वाली वह आवाज आज फिर मैंने सुनी। ऐसी करुण पुकार सुन मुझे ग्लानि होती है कि मैं इनकी रक्षा केलिए कुछ भी नहीं कर पाता हूँ...
************************
   नववर्ष के प्रथम दिन सुबह होते ही यह सुनने को मिला कि ईसाई हो या हिन्दू.. !
   मैंने सोचा , चलो अच्छा हुआ कि किसी ने मुसलमान तो नहीं कहा और कह भी देता तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता मुझपर, जब हम यही मानते हैं कि सबका मालिक एक है, तो फिर मजहब को लेकर यह बखेड़ा क्यों ? 
    मुझे नहीं पता ऐसे व्यर्थ के खुचड़ निकालने वाले लोग अपने सारे कार्य क्या हिन्दी पंचांग से करते हैं ? हिन्दी महीने और तिथियों की इनमें से कितने को जानकारी है ।भारतीय पंचांग के  अनुसार संवत, नक्षत्र, तिथि, दिन, घटी, दण्ड, पल, मुहूर्त आदि के संदर्भ में आप इनसे प्रश्न करके देख लें। 
    वैसे, मेरा भी यही मत है कि अपनी संस्कृति, संस्कार, पर्व और भाषा का संरक्षण करना चाहिए, परंतु इसतरह से शोर मचा कर उन्माद फैलाने वालों से मुझे घृणा है। वाराणसी के दंगाग्रस्त क्षेत्रों में मेरा बचपन गुजरा है और कर्फ्यू लगने पर किस तरह की कठिनाइयों का सामना हमें करना पड़ा, उसे ये क्या समझ सकेंगे ?
  अतः मैंने सभी मित्रों एवं शुभचिंतकों को नववर्ष की पूर्व संध्या पर यह शुभकामना संदेश प्रेषित किया-"वैमनस्यता से दूर हम सभी अपने हृदय को सद्भाव रुपी जवाहरात से भरे, मानसिक,  आध्यात्मिक एवं शारीरिक उन्नति करें, ऐसी कामना नववर्ष की पूर्व संध्या पर करता हूँ।"
        हम हिन्दीभाषी सच पूछे तो परिस्थितिजन्य कारणों से दो नावों की सवारी के आदती हो गये हैं और हमारे पास अध्यात्म, साहित्य, संस्कृति एवं संस्कार का विपुल भण्डार होकर भी ऐसा क्यों लगता है कि अपना कुछ भी नहीं है !
    खैर, अपनी दिनचर्या के अनुरूप प्रतिष्ठित ब्लॉग पर टिप्पणी संग शुभकामना संदेश देने के पश्चात मैं पौने पाँच बजे सुबह होटल राही की चौथी मंजिल से जैसे ही नीचे उतरा , मुख्यद्वार पर सामने ही आलिंगनबद्ध बंदरों की टोली मिल गयी। इस ठंड के मौसम में यह सुखद आलिंगन उन्हें उष्मा प्रदान कर रहा था। सत्य तो यही है कि आलिंगन ही सृष्टि का वह अनमोल उपहार है ,जो न सिर्फ सृजन करता है, वरन् प्रत्येक प्राणी को स्नेह और प्रेम से सराबोर कर जीवन को सार्थकता प्रदान करता है।
    अभी कुछ आगे बढ़ा ही था कि मुकेरी बाजार तिराहे पर गोवंशों पर दृष्टि टिक गयी। ये सभी बिल्कुल शांत बैठे हुये थें। उनमें न काले,गोरे और चितकबरे होने को लेकर मतभेद था, न ही भूमि के स्वामित्व केलिए संघर्ष। 
    काश ! हम मनुष्य भी इनसे कुछ सीख पाते। मैं आज अपने चिंतन को बिल्कुल भी विराम नहीं देना चाहता था। चिंतन, अध्ययन और लेखन ये तीनों ही अवसाद से हमें दूर रखते हैं। हम इनमें जितना डूबेंगे ,हमारे विचारों में उतनी ही अधिक उर्जा संचित होगी। सो, मार्ग में जो भी मिल रहा था,उसपर निरंतर विचार किये जा रहा था। भले ही बुद्ध न बन सकूँ, फिर भी शुद्ध तो हो ही सकता हूँ। 
  इतने में कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनाई पड़ती है। मैंने देखा एक कुत्ता दुम दबाये भागा जा रहा था और चार-पाँच कुत्ते उसे घेरे हुये थे। मैं समझ गया कि पहले वाले कुत्ते ने अनाधिकृत रूप से इन पाँचों के इलाके में जाने-अनजाने में घुसने का दुस्साहस किया है। अतः स्वजातीय होकर भी उसपर तनिक भी रहम वे पाँचों नहीं कर रहे थे। इनका व्यवहार कुछ ऐसा ही है, जैसा दो शत्रु राष्ट्रों की सीमा पर घुसपैठ को लेकर हम इंसानों का। इसीबीच प्रातः भ्रमण पर निकले कुछ बच्चों ने इनपर ईंट-पत्थर चला दिया। फिर क्या था,  पें- पें करते ये सभी वहाँ से भाग खड़े हुये और भूमि वहीं की वहीं रह गयी।  मुझे स्मरण हो आया कि अपने कबीर बाबा ने यही तो कहा है - 
 " ना घर तेरा ना घर मेरा चिड़िया रैन । "
    न जाने क्या हो गया था आज सुबह से ही मुझे कि जो भी प्राणी सामने दिखा , मैं उसकी क्रियाकलापों को अपने " जीवन की पाठशाला " का एक अध्याय समझता गया । 
   हाँ तो , इसी क्रम में गणेशगंज में नाली के समीप शिकार (चूहा) की प्रतीक्षा में बैठी बिल्ली मौसी दिख गयी। बिल्कुल कान खड़ा कर अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किये हुये , साथ ही अपने शत्रु ( कुत्ता ) के आहट से भी सतर्क थी वह। यह आवश्यक नहीं है कि उसे इस तप का फल(चूहा) मिल ही जाए , परंतु प्रतिदिन सुबह मैं इन बिल्लियों को नगर के विभिन्न गलियों और सड़क किनारे बनीं नालियों के समीप शिकार पकड़ने केलिए प्रयत्न करते देखता हूँ। यह देख मैंने स्वयं से पूछा -  " बंधु ! क्या तुमने भी कभी लक्ष्य प्राप्ति केलिए इतना कठोर अभ्यास किया है ? यदि नहीं तो फिर फल न मिलने पर इतने विकल क्यों हो । "
  और आगे वासलीगंज में मैंने क्या देखा वह भी बता दूँ  ? मैंने देखा एक कुतिया अपने बच्चों को दूध पिला रही थी और समीप ही एक पिल्ला मृत पड़ा था। मैं समझ गया कि वह ठंड नहीं सह सका है। यहाँ भी दो बातें सीखने को मुझे मिलीं। पहला तो यह कि प्रकृति (परिस्थिति) के अनुरूप स्वयं को ढाल लेने का सामर्थ्य हममें होना चाहिए अन्यथा इसी पिल्ले की तरह मृत्यु (अवसाद ) को प्राप्त होंगे और दूसरा उस कुतिया कि तरह जिसे  अपने मृत बच्चे के प्रति तनिक मोह नहीं था,  उसका कर्तव्य तो बचे हुये बच्चों की देखभाल करना है।  मनुष्य यदि मृत अतीत को गले लगा कर बैठा रहेगा, तब वह वर्तमान का पोषण किस प्रकार करेगा ?
   और हृदय को दहलाने वाली वह आवाज आज फिर मैंने सुनी। ऐसी करुण पुकार सुन मुझे ग्लानि होती है कि मैं इनकी रक्षा केलिए कुछ भी नहीं कर पाता हूँ। 
       मुझे ऐसा महसूस होता है कि सम्भवतः कत्ल से पूर्व रुदन करते हुए पशु-पक्षी अपने पालक से यह पूछते हो कि कलतक जिन हाथों ने उन्हें स्नेह भरा स्पर्श और दाना-पानी दिया , आज उसमें छूरा क्यों है? 
 क्या कसूर है उनका ?  
क्या उन्होंने अपने पालक से किसी प्रकार का विश्वासघात किया अथवा उनके आचरण में ऐसा कोई परिवर्तन आया ? 
बिना अपराध बताए किस कारण उन्हें  सजा-ए- मौत मिल रही है ? 
   मैंने देखा कि नये साल पर इनके गोश्त की मांग बढ़ गयी थी और वधिक इन निरीह प्राणियों के गर्दन पर दनादन छूरा चलाये जा रहा था। उसके हृदय में इतनी कोमलता नहीं थी कि वह मृत्युपूर्व इनकी इस आखिरी इच्छा का समाधान करता।      हाँ , इन निरीह प्राणियों की चीत्कार पर मुझे वेदना भी हुई और उनकी मूढता पर तरस भी आया। 
  मैंने लगभग डपटते हुये उनसे कहा_ " अरे मूर्खों  !  यह जल्लाद तुझपे क्यों मुरौवत करेगा
 । मुझसे सुन , ऐसे पालक के प्रति यह "अति विश्वास" है न जो , वहीं तेरी सबसे बड़ी भूल है।  बावले , इस झूठे जगत में कोई अपना नहीं होता। जो चतुर हैं,वे अपने मनोविनोद अथवा आर्थिक हित में हमजैसे भावुक प्राणियों का गर्दन हो या हृदय , छूरा घोंपने में तनिक न संकोच करते हैं । व्यर्थ वफादारी की शपथें ले और अश्रुपात न कर , मत फड़फड़ा , शांत हो जा सदैव केलिए शांत..! 
  ये तमाशबीन भी तेरी मदद नहीं करेंगे। अरे पगले , ये तेरे गोश्त के ग्राहक हैं, स्नेहीजन नहीं निष्ठुर और कपटी हैं। ये तेरे मांस को अपनी निगाहों से तोल रहे हैं । तूने क्या सोचा की वे तेरे मित्र हैं ! फिर न कहना इन्हें दोस्त ।
   मैं जानता हूँ तेरे पास वक्त कम है, परंतु यह भी सुनता जा , कुर्बान होने से पहले यह संकल्प ले  कि पुनर्जन्म होने पर ध्येय के प्रति अपना विश्वास ,अपनी निष्ठा सौंपते समय सजग रहेगा । "  
यूँ समझ लें- " जीवन की पाठशाला" में इस कठोर सत्य की अनुभूति आभासी दुनिया से हुई है।      और आपसभी कहा चलें जनाब ! तनिक ठहरे  !! 
    संक्षिप्त में ही तो नववर्ष के प्रथम दिन का आँखों देखा हाल बयां कर रहा हूँ। क्या पता मेरी फालतू बातों में कुछ आपके मतलब की भी निकल जाए। 
   जब सड़कों को नापता वापस लौटा तो  देखा कि मेरे एक बुजुर्ग मित्र बेहद उदास थे । उनकी जीवनसंगिनी का कुछ दिनों पूर्व निधन जो हुआ था । भरापूरा परिवार है। परंतु नववर्ष की सुबह का जलपान किये घर से निकले क्या थे कि फिर दोपहर भोजन पर घर जाने की इच्छा ही नहीं हुई। काफी कुरेदने पर उन्होंने लम्बी सांस भर बुझे मन से कहा -- "वो (पत्नी) होती तो कितनी ही बार फोन आ गया होता, अब कौन ?"
     मैं उनका दर्द समझ सकता हूँ। नववर्ष पर मेरे लिए भी कहीं से टिफिन नहीं आता है । दूध, दलिया और ब्रेड यही अपने रसोईघर का साथी है। सो,जो था उसे ग्रहण किया और न्यूरोलॉजिस्ट द्वारा लिखी दवाइयों को ली और फिर रात्रि के दस बजते- बजते निंद्रा देवी के आगोश में समा गया । 
     सत्य तो यह भी है कि मैंने भावनाओं की दुनिया से दूर खुली आँखों से इंसान को पहचानना नहीं सीखा है, अन्यथा मित्रता का आघात नहीं सहता। 
  हाँ , नववर्ष पर मेरा उत्साह बढ़ाया दर्शन, साहित्य एवं अध्यात्म में हस्तक्षेप रखने वाले एसपी सिटी श्री प्रकाश स्वरूप पांडेय ने, जिन्होंने मेरे ब्लॉग की सराहना की और पुलिस अधीक्षक डा0 धर्मवीर सिंह से पत्रकार से इतर एक संवेदनशील लेखक के रूप में मेरा परिचय करवाया। यह मेरे लिए बड़ी बात थी। 
  इस अवसर पर उनके द्वारा दी गयी गीता-दैनन्दिनी संग कलम और पुष्प नववर्ष पर एक ब्लॉगर के रूप में मेरे लिए अबतक का सबसे श्रेष्ठ उपहार रहा। 
    हाँ, एक बात और कहना चाहूँगा कि वेदना ने मुझे वह संवेदना दी, जिससे मैं औरों के दर्द को समझ पा रहा हूँ । साहित्यिक भाषा का ज्ञाता न होकर भी मैं उनकी पीड़ा को शब्द देने की कोशिश करता हूँ।   वैसे, मैंने कोई नया संकल्प इस वर्ष नहीं लिया । नेताओं-सा वायदों की झड़ी लगानी मुझे नहीं आती,अभी तो पुराने काम ही अधूरे थें कि स्नेह की दो बूँद की ललक में कष्टदायी अंधकूप में जा फिसला था । कैसी विचित्र दुनिया है यह , जहाँ विशुद्ध प्रेम को भी धूर्तता समझते है लोग.. !!!

        - व्याकुल पथिक
   








  

Sunday, 29 December 2019

पथिक! काहे न धीर धरे( जीवन की पाठशाला )


----आत्म उद्बोधन----


 ज़िदगी में ग़म है

  ग़मों  में  दर्द है
  दर्द  में मज़ा है
  मज़े  में हम  है..

    वर्ष 2019 का समापन मैं कुछ इसी तरह के अध्यात्मिक चिंतन संग कर रहा हूँ , परंतु ऐसा भी नहीं है कि इस ज्ञानसूत्र से मेरा हृदय आलोकित हो उठा है। असत्य बोल कर क्यों कथनी और करनी का भेद करूँ। यथार्थ और आदर्श में सामंजस्य होना चाहिए।

    वस्तुतः जिस होटल में मेरा ठिकाना है , वर्ष के अंत में यहाँ तीन दिवसीय ध्यान शिविर लगता है। जिसे " मनस पूजा " कहा जाता है। इस उपासना पद्यति में साधक ध्यान के माध्यम से अपने ईष्ट को हृदय में धारण करने का प्रयत्न करता है। हर वर्ष इसी तरह के कड़ाके की ठंड में विभिन्न जनपदों से इनका आगमन होता है। इनके लिए गुरु की सत्ता यहाँ सर्वोपरि है।यथा-

 ऐसे गुरु पर सब कुछ वारु।

 गुरु ना तजूं हरि तज डारु।।

   यहाँ मैं यह देख रहा हूँ कि इनकी संख्या में निरंतर कमी होती जा रही है, क्योंकि वृद्ध साधकों की मृत्यु के पश्चात युवापीढ़ी इस रिक्तता को भरने में असमर्थ है।

        इस भौतिक युग में युवाओं को नीरसता पसंद नहीं है, उन्हें तो तनिक मनोरंजन चाहिए, भले ही पूजापाठ ही क्यों न हो। अब तो शवयात्रा में भी सेल्फी एक्सपर्ट सक्रिय रहते  हैं।
       वैसे भी मनुष्य आदिकाल से पशुपक्षियों तक को ही नहीं स्वयं मानव को भी अपने मनोरंजन का साधन समझते रहा है।
      और फिर जब ऐसे सजीव खिलौने से मन भर जाता है,तब वह उसके निर्मल, निश्छल एवं निःस्वार्थ स्नेह का कभी उपहास करता है और कभी तिरस्कार । उसे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उसकी ऐसी निष्ठुरता किसी संवेदनशील व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक पीड़ा में वृद्धि कर सकती है।
  पर हाँ,मानव को ऐसी ही किसी वेदना के पश्चात सत्य का बोध होता है और अध्यात्म के चौखट पर पथिक दस्तक दे पाता है। वेदना में वह शक्ति है जो दृष्टि देती है।
   कुछ लोगों की आदत होती है- " वे मीठी-मीठी बात बोलते, दोस्ती करते एवं सुनहरे सपने दिखाते हैं। इंसान उनकी मृदुता में चतुराई को बहुत बादमें समझ पाता है।"
    फिर भी यह घाटे का सौदा नहीं ,क्योंकि हमें दुनियादारी का ज्ञान होना चाहिए।
    मुझे ऐसा विश्वास है कि दूसरों को अपने मनोविनोद का साधनमात्र समझने वाला व्यक्ति चाहे जितना भी चतुर हो, उसके द्वारा किये गये छल और कपट पर से आवरण न भी हटे ,तो भी ये एक दिन उसे आत्मग्लानि के उस अंधकूप  में डुबो देंगे, जिससे बाहर निकलना उसके लिए आसान नहीं होता है।
   उसके छल से पीड़ित मनुष्य बद्दुआ न दे ,तबभी हर क्रिया की प्रतिक्रिया तय है । यह प्रकृति का शाश्वत नियम है।
    भौतिक चकाचौंध से प्रभावित अनेक व्यक्ति ऐसा नहीं भी मानते हैं,परंतु धैर्य धारणकर   निहित स्वार्थ के लिए दूसरों को कष्ट देने वाले प्रपंची लोगों और उनके परिजनों पर आप लम्बे समय तक दृष्टि जमाएँ रखें, हमारे हर प्रश्नों के उत्तर मिलने लगेंगे , अन्यथा संत कबीर यह नहीं कहते-

“दुर्बल को ना सताइये, वां की मोटी हाय |

बिना साँस की चाम से, लौह भसम होई जाय ||”
   
      मैंने एक दिन दर्प से अकड़ी एक मिश्री की डली को समीप पड़े एक उपेक्षित पत्थर के टुकड़े से यह कहते हुये सुना  -  " अरे तुझसे मेरी कैसी मित्रता !  देखता नहींं कितना आकर्षण है मुझमें - तभी तो मेरे इर्द-गिर्द इतने चींटे मंडरा रहे हैं -और तुम ठहरे पाषाण - रास्ते के ठोकर बने पड़े हो - आज से हमारी- तुम्हारी दोस्ती हुई समाप्त । "
     मिश्री की डली के इस तिरस्कार भरे स्वर के  प्रतिउत्तर में बेचारे पत्थर ने किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की।  हाँ, पाषाण होकर भी उसका हृदय भर आया ,यद्यपि उसने इसे अपना प्रारब्ध समझ संतोष कर लिया , क्यों कि विभिन्न प्राणियों के पांव तले वह पहले से ही कुचला जाता रहा है।
   और फिर एक दिन मैंने देख - वहीं पाषाण पथप्रदर्शक यानी कि मील का पत्थर बना सड़क किनारे खड़ा है। भटके हुये यात्रियों को वह राह दिखला रहा है । तिरस्कृत होना उसके लिए उपहार बन गया ।
       उधर , उसके पास पड़ी मिश्री की वह डली दिखाई नहीं पड़ी । मैंने सोचा कि सम्भव है कि उसे और भी ऊँचा ओहदा मिल गया हो, वह किसी सिंहासन पर विराजमान हो,दरबारियों  से घिरी हो, मेरी दृष्टि उसतक नहीं पहुँच पा रही हो । इसी उत्सुकतावश मैंने जब उसकी खोज-खबर ली, तो दुखद समाचार यह मिला कि जिन चींटों पर मिश्री की डली को बड़ा गुमान था,उन्होंने ही उसका भक्षण कर लिया है।
    हाँ, अस्तित्व खोने से पूर्व उसे यह पश्चाताप अवश्य रहा कि जिसे उसने पाषाण कहा , जिसके संग मैत्री से उसे कोई खतरा न था, उसे वह समझ नहीं सकी और वहीं ये चींटे.. ?
    मैं समझ गया कि हमें परिस्थितियों का निरंतर अध्ययन करते रहना चाहिए- सीखने केलिए,जानने केलिए, दुनिया को समझने केलिए,  इस प्रक्रिया से गुजरकर एक दिन निश्चित ही आनंद मिलेगा,ऐसा विश्वास हृदय में रखना चाहिए।
  साथ ही हमें यह भी याद रखने की आवश्यकता है कि अनिश्चित मनः स्थिति मनुष्य के मानसिक,चारित्रिक ,सामाजिक एवं आध्यात्मिक विकास में बड़ी घात सिद्ध होती है। इससे आत्मविश्वास का ह्रास होता है।
    अतः हे हृदय ! तू अपने निश्चय पर अटल क्यों नहीं रहता। तेरा मेला पीछे छूट चुका है और अब कोई झमेला नहीं है । समझ न बंधु ! जीवन का सबसे बड़ा  सत्य है अपूर्णता और यह भी सुन ले तू, इस अधूरेपन का सदुपयोग ही जीवन की सबसे बड़ी कला है। तुझे पता है न कि सारे दर्द मनुष्य अकेले ही भोगता है।
  और हाँ, सर्वव्यापित होकर भी ईश्वर अकेला ही है।

     - व्याकुल पथिक







    

Tuesday, 24 December 2019

माँ ! एक सवाल मैं करूँ ? ( जीवन की पाठशाला )

***************************
   इस सामाजिक व्यवस्था के उन ठेकेदारों से यह पूछो न माँ - "  बेटा-बेटी एक समान हैं , तो दो- दो बेटियों के रहते बाबा की मौत किसी भिक्षुक जैसी स्थिति में क्यों हुई.. क्रिसमस की उस भयावह रात के पश्चात हमदोनों के जीवन में उजाला क्यों नहीं आया.. ?
****************************
(एक मार्मिक सत्यकथा)
--------------

माँ - ओ माँ !

 सुन रही हैं न !!
  " आज मटर-आलू की पूड़ी बनाएँ न ?  और हाँ, साथ में कलाकंद भरकर मीठा परांठा भी चाहिए.. चटनी किस चीज की बनाएँगी .. मेरे लिए तो टमाटर की मीठी और खट्टी दोनों ही चटनी बना दें आप । "
  अपनी डिमांड को लेकर मुनिया शोर मचाए ही जा रहा था -  " अच्छा माँ, ठीक है मैं ठाकुरबाड़ी की साफ-सफाई कर सभी भगवान जी का पुष्प- श्रृंगार कर देता हूँ .. लाल-सफेद चंदन पीसकर उन्हें लगा देता हूँ और बेलपत्र पर चंदन से राम-राम भी लिख दे रहा हूँ.. बस आप आरती करने आ जाना..। "
    वह जानता था कि माँ को पूजा की तैयारी करने में दो घंटे का समय लगता है। अतः उनके स्वास्थ्य को देखते हुये बारह वर्ष की अवस्था में ही यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी।
   और मुनिया की ऐसी रोज-रोज की फरमाइश कोई नयी बात तो थी नहीं कि माँ उसपर झल्लाती। वे जानती थीं दादू-नाती दोनों को मटर-आलू के परांठे पसंद हैं। वे साथ में मेवे और केसर डाल खीर भी बना दिया करती थीं ।
   सच तो यही है कि मुनिया केलिए माँ से ही उसका घर-संसार था। माँ उसे अपनी अभिलाषाओं के उड़नखटोले में बैठा तरह-तरह की बातों से कुछ इसतरह सैर कराती थीं कि मानों समय को पंख लग गये हो।
   वे जब भी खुश दिखती , उसे दुलारते हुये कहती- "  मुनिया! तू जल्दी बड़ा हो जा न, तेरा विवाह कर यह धरोहर ..नाक में पड़े खानदानी हीरे के चमकीले काँटे और चाँदी के चाभी गुच्छे की ओर संकेत करते हुये, अपनी बहू को सौंप मैं भी अपने दायित्व से मुक्त हो जाऊँ..पता नहीं कब..? "
     उनकी बात अभी पूरे ही नहीं होती कि मुनिया उनके मुख पर हाथ रख झगड़ने लगता था.. और फिर माँ को उसे मनाने केलिए उसका   मनपसंदीदा कोई व्यंजन बनाना पड़ता था।
  माँ-बेटे ( नानी और नाती) की सारी खुशियाँ मानों एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं।

 मजरूह सुलतानपुरी का वह गीत है न -


  अब तो है तुमसे हर खुशी अपनी

    तुमपे  मरना है  ज़िंदगी अपनी ..

  लेकिन, वह मनहूस दिसंबर महीने की पच्चीस तारीख, जिसे  बड़ा दिन कहते हैं ..उस क्रिसमस डे पर उसके घर के बाहर बड़ा बाजार में जहाँ क्रिसमस ट्री सजाये लोग जहाँ जश्न मना रहे थें..वहीं माँ बिस्तर पर कुछ इसतरह से निढाल पड़ी हुई थी कि बाहर निकलने को आतुर उभरी हुई उनकी दोनों आँखों को देख बाबा और लिलुआ वाली बड़ी माँ अनिष्ट की आशंका से भयभीत थें.. ऐसा लग रहा था कि उस शाम माँ मृत्युशैया पर अपनी दोनों बेटियों ( मुनिया की मम्मी और मौसी ) को ही इसतरह ढ़ूंढ रही थीं..।

   जीवन के अंतिम समय संभवतः मनुष्य अपने समक्ष प्रियजनों की उपस्थिति चाहता है। गंभीर रुप से अस्वस्थ बाबा ने भी अपने आखिरी दिनों में बनारस से कोलकाता वापस लौटते समय बेहद दर्द भरे स्वर में कहा था - " देखा हो गया ( बंगाल की भाषा), अच्छा अब चलता हूँ ! "
    परंतु दोनों पुत्रियों से यह कह अनजान डगर ( तब उनका कोई घर नहीं था , कोई सम्पत्ति नहीं थी ) की ओर बढ़ रहे दोनों पांवों से अपाहिज हो चुके बाबा के हृदय की भाषा किसी ने नहीं पढ़ी..।
  हाँ, बड़ी पुत्री के घर से जाने के पूर्व इनसभी प्रियजनों के तिरस्कार एवं उपहास से उपजी वेदना एवं ग्लानि से उनके जीवन की झोली भर चुकी थी ..इनके कड़वे बोल साक्षात मृत्यु बन उन्हें निगलने को आतुर था.. बाबा बुरी तरह से टूट  चुके थें ..उनकी आँखें बरबस बरसने लगी थीं .. फिर भी उनका धैर्य देखते ही बना..।
 मानों वे स्वयं को यह समझा रहे हो - " दोष बस अपना और अपने प्रारब्ध का है।"
  मुनिया जो अब समझदार हो चुका था , वह बाबा के अश्रु बुंदों का संदेश समझ  कांप उठा था .. ।
   उस दिन तो उसकी दादी से भी न रहा गया और उन्होंने भी स्वजनों से अनुरोध किया था - " अरे ! किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती कर दो समधी जी को..घर में न रखना चाहते हो ना सही .. इस हाल में बाबा को ट्रेन पकड़ा आओगे .. तनिक भी लज्जा नहीं आती .. ! "
 फिर वे धीरे से बुदबुदाई थीं -  " जल्लाद हैं ये सब ! "
 इससे अधिक प्रतिरोध दादी-पोता और क्या करते भी..।  मुनिया और उसकी दादी की घर में हैसियत सिर्फ दो जून के भोजन तक सीमित थी।

  हाँ, आखिरी विदाई के वक्त बाबा अपने प्यारे (मुनिया) पर अपार स्नेह लुटाते गये ..क्यों कि उसने उनके मलिन वस्त्रों को न सिर्फ स्वच्छ किया था , वरन् अपनी नयी लुंगी भी उन्हें पहनाई थी..उसने बाबा के वदन पर जमे मैल को रगड़-रगड़ खूब साफ किया था .. तेल मालिश से उनकी दुर्बल काया में कुछ निखार आ गया था..।

 काश ! उन्हें किसी भी सगे- संबंधी के यहाँ शरण मिल गया होता..।
   लेकिन, दोनों पुत्रियों ने अपनी विवशता पहले ही प्रगट कर दी।
  बाबा चले गये, फिर कभी नहीं लौट के आने केलिए.. उनकी मृत्यु कोलकाता में कहाँ हुई.. कैसे हुई..किस दिन हुई और किसने उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी .. उनकी दोनों ही लाडली बेटियों को इसकी जानकारी नहीं है !
        ....आज माँ मैं इसी संदर्भ में आपको खत लिख रहा हूँ।

  पूज्य माँ,

  सादर प्रणाम ।

      माँ ! आज के जेंटलमैनों का जुमला हैं कि लड़का-लड़की एक समान.. उचित है, भारतीय संस्कृति ने सदैव इसका समर्थन किया  कि इनके लालन-पालन में भेदभाव नहीं होना चाहिए, परंतु क्या आपको पता है माँ कि जब आपके हृदय का स्पंदन मंद पड़ता जा रहा था और खामोश होने से पहले आपनी तरसती निगाहें अपनी पुत्रियों को ढ़ूंढ रही थीं, तो वे कहाँ थीं..? अंततः डाक्टर ने आँखें खराब न हो जाए ,इस आशंकावश उसपर रूई का फाहा रख दिया था ..।

   और फिर बेटियों से मिलन की उम्मीद के टूटते ही आँखों के सामने छायी कालिमा ने अगले दिन ब्रह्ममुहूर्त में आपको हम सबसे दूर कर दिया।
  बताएँ माँ, यदि पुत्रवधू होती तो क्या यूँ ही आप तड़पती..  कोई तो आसपास होता न ..।
    क्यों इन बेटियों केलिए अपना घर ( ससुराल ) ही प्राथमिकता हो जाती है..?
 और फिर मृत्यु के पश्चात आपकी गृहस्थी का क्या हुआ..।
   मुझे भलीभांति याद है - एक चम्मच तक आप जीवित रहते इधर से उधर होते नहीं देख सकती थीं।
 और उसदिन जब मैं , बाबा और अन्य संबंधी आपके साथ महाश्मशान पर गया था , तब आपकी चचिया सास ( बड़ी दादी) , जिन्हें मैंने प्रथम बार अपने घर पर देखा था.. उन्हें आपके समानों से छूत की बीमारी का कुछ ऐसा भय हुआ कि आपका बेड, रजाई, तकिया और बिछावन सभी बड़ाबाजार के रोड पर फेंकवा दिया गया.. क्या आपकी पुत्रवधू होती ,तो उन्हें इसतरह का मनमाना आचरण करने देती .. ?
  और माँ, अगले दिन रोती बिलखती आपकी बेटियाँ आयीं .. वे भी मायके की गृहस्थी को सहेज नहीं सकीं..। हाँ , वापस जाते समय ठाकुरबाड़ी में रखी भगवान जी कि पीतल की दर्जन भर से अधिक बड़ी- छोटी मूर्तियों और भोग लगाने की सामग्रियों को न सिर्फ उन्होंने आपस में बांट लिया, वरन् आपकी गृहस्थी की अनेक सामग्री भी लेती गयीं, क्यों कि ये सब बाबा के किस काम की थीं..।
   बड़ी दादी ने यह फैसला  सुनाया था कि मुनिया को उसके मम्मी-पाप वापस अपने घर ले जाए और बाबा के लिए टिफिन उनके घर से आ जाएगा। दोपहर यह टिफिन आता और उसी में दिन और रात दोनों वक्त का भोजन ..!
 जिस बाबा को आप तरह- तरह के व्यंजन परोसा करती थीं.. जो बाबा अपनी पुत्रियों के ससुराल जाने पर मलाई, रबड़ी , दही और दूध सहित विविध प्रकार के भोज्यपदार्थों से हम सबका हिक भर देते थें.. उन्हीं बाबा को एक वक्त   के टिफिन से गुजारा करना पड़ेगा.. !
    यह जानकर भी आपकी पुत्रियाँ बड़ी दादीजी के स्वार्थपूर्ण निर्णय पर मौन क्यों रह गयी.. उन्हें प्रतिकार करना चाहिए कि नहीं..।
  क्या आपकी मृत्यु के पश्चात दोनों पुत्रियाँ बारी- बारी से बाबा के पास नहीं रह सकती थीं.. ?
   आपकी पुत्रियाँ मुझसे पूछ सकती है कि यह भी मेरा कैसा अजीब सवाल है ..।
  ससुराल में अपनी जिम्मेदारियों को छोड़ वे बाबा के पास कैसे रह सकती थीं..।
    और फिर सुने माँ , आगे क्या हुआ.. हम सबसे दूर अकेले पड़ गये बाबा टूटते गये.. स्नेह के दो बोल केलिए..किसी अपने संग दुःख-दर्द बांटने केलिए..किसी के हाथ के बने भोजन की थाल केलिए.. बुढ़ापे की जंग लड़ने की बारी आयी तो कोई संग न था..।
 यदि किसी आश्रयदाता की तलाश में , उनके पांव डगमगा गये , तो भी क्या कसूर था बाबा का बोलो माँ..?
   वाह रे ! स्वार्थी सभ्य समाज के भद्रलोग हालात से मजबूर एक टूटे हुये इंसान को दिया तो कुछ भी नहीं और अपने मान- सम्मान की बलिवेदी पर बाबा की आहुति दे डाली..।
    माँ, मैंने देखा था , बाबा आपके प्रति कितने समर्पित थें और घर को ही अस्पताल बना कर रख दिया था.. क्यों कि हॉस्पिटल आप जाना नहीं चाहती थीं ,फिर बाबा को एक जीवित पुत्र आपने क्यों नहीं दिया और उस आखिरी पुत्र के भी जन्म लेते संग हुई मृत्यु के पश्चात जब आपने अपनी बड़ी पुत्री के प्रथम संतान यानीकि मुझे अपना मुनिया समझा , तो फिर क्यों नहीं अपनी मृत्यु से यह कहा -  "  हे मौत की देवी  ! तू थोड़ा और ठहर क्यों नहीं जाती। इस घर की गृहलक्ष्मी को आ तो जाने दे। "
   मेरा छोड़ों माँ, मैं तो आवारा हूँ , दुत्कार सहने का आदती हो चुका हूँ.. पर स्वाभिमानी बाबा केलिए आपने एक बैसाखी तक न छोड़ी..ताकि जब वे अपने पांवों पर न खड़े हो सकें , तो उसका सहारा मिलता  ..।
    माँ, बाबा ने तो आपके पार्थिव शरीर का लाल चुंदरी , सोने के नथ और नाना प्रकार से श्रृंगार करवा कर अंतिम संस्कार किया था। जब हम आपको लेकर  राजाकटरा से " हरि बोल " कहते हुये महाश्मशान की ओर निकले थें , तो मार्ग में जिसकी भी दृष्टि आपके मुखमंडल पर पड़ती थी.. वह साक्षात देवी समझ आपको नमन करता गया..किन्तु आपने बाबा संग क्या यही न्याय किया .. ?
    उन्हें दो वक्त की रोटी मिले ,इसके लिए एक पुत्रवधू की व्यवस्था क्यों नहीं की.. ?
  मैं कोई मनगढ़ंत कथा नहीं गढ़ रहा हूँ , आईना झूठ नहीं बोलता ..।
  आपही इस सामाजिक व्यवस्था के उन ठेकेदारों से यह पूछो न माँ - "  बेटा-बेटी एक समान हैं , तो दो- दो बेटियों के रहते बाबा की मौत किसी भिक्षुक जैसी स्थिति में क्यों हुई.. ? जीवन का वह अंतिम क्षण उन्होंने किस तरह से गुजारा होगा.. !
   क्रिसमस की उस भयावह रात के पश्चात हमदोनों के जीवन में उजाला क्यों नहीं आया.. ? एक विकलांग की मौत की कथा यहाँ तुम्हें सुनाई है और दूसरा भी इसी राह पर बढ़ रहा है ..।
    माँ, आज तुम्हारा यह मौन मेरे सब्र की परीक्षा न ले.. अभी बहुत कुछ बातें और कहनी है..।
               आपका मुनिया
                 ********
  -व्याकुल पथिक

 

 
 

 











    

Wednesday, 18 December 2019

चश्मा उठाओ, फिर देखो यारो ( जीवन की पाठशाला)


************************************

   हम घर बैठ चाहे ठंड पर कितनी ही कविताएँ और कहानियाँ लिख ले, पर यह कभी नहीं समझ सकते हैं कि इस हाड़कंपाऊ ठंड में जैसे ही कंबल इस बांसफोर  परिवार के वृद्ध सदस्यों और उनके बच्चों को मिला, उनके चेहरे पर किस तरह की मुस्कान थी,साथ में दुआएँ भी, इसमें किसी तरह की कृत्रिमता नहीं थी।
 *************************************

कहता है जोकर सारा ज़माना
 आधी हक़ीकत आधा फ़साना
चश्मा उठाओ, फिर देखो यारो
 दुनिया नयी है  , चेहरा पुराना..

 ब्लॉगिंग का अपना सफर तो कुछ यूँ ही चल रहा है। कभी अपनी अनुभूतियों का जिक्र करता हूँ, तो कभी अपने चिंतन और दर्द को शब्द देने का प्रयत्न , एक पत्रकार होने के लिहाज से समाज में जो कुछ दिख जाता है, वह मेरे लिए खबर होती है। अतः थोड़ा नमक-मिर्च लगा उसे अखबार के पन्ने पर परोस आता हूँ। ढ़ाई दशक से अधिक तो यही काम करते हुये गुजार दिया है और अब कोई दूसरा धंधा करने की योग्यता खो भी चुका हूँ। जहाँ तक समाचारपत्र का सवाल है, तो वहाँ मैं अपनी पीड़ा नहीं लिख सकता , इसलिए गत वर्ष ब्लॉग पर आया , परंतु जो लिखता हूँ वह  फ़सान (काल्पनिक) नहीं है।
  वैसे यह मेरे पसंदीदा गीतों में से एक है, क्योंकि मुझे लगता है कि  " चश्मा" आँखों पर पड़े पर्दे से भी घातक है। धर्म , राजनीति और पारिवारिक - सामाजिक संबंधों का सटीक विश्लेषण करने केलिए हम इसी स्वार्थ रूपी  चश्मे का प्रयोग करते हैं। मुझे पता नहीं है कि हम दूसरों को धोखा देने केलिए ऐसा करते हैं अथवा स्वयं को !
सच तो यह है कि विदूषक चाहे अपनी कला में कितना भी निपुण हो, वह कोई भी वेष बना ले,फिर भी उसकी सच्चाई एक दिन सामने आनी ही है।
   अब सीधे मुद्दे पर आता हूँ -  क्या " गरीबी  हटाओ " से लेकर " सबका साथ - सबका विकास " जैसे करिश्माई जुमले ने कामनमैन को मुस्कुराने का अवसर दिया है ?
    पूस का महीना है और अपनी बात यहीं से शुरू कर रहा हूँ। बचपन में जब दार्जिलिंग में था तो  निश्चित ही बर्फबारी का आनंद हमसब बच्चों ने भी खूब उठाया था। लेकिन,अब भलीभांति समझता हूँ कि उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्यों में ठिठुरन के साथ ही गलन का  जनजीवन पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ता है।
  अपने मीरजापुर जनपद में विगत दिनों हुये बरसात के पश्चात ठंड अपने शैशवावस्था से युवावस्था में प्रवेश कर चुका है।
  धर्म, साहित्य, समाजसेवा और राजनीति के प्रति भीड़तंत्र से जरा हट कर अपना मत प्रस्तुत करने वाले बड़े भैया सलिल पांडेय जी के शब्दों में कहूँ , तो पूस-माघ का यह दो महीना कम्बल-अवतार उदारमनाओं' के दर्शन-उपदेश का है। यह 'महानुभाव' 'प्रख्यात समाजसेवी', 'उदारमना' आदि से अलंकृत होने का महीना होता है ।  वे सौ रुपए से भी कम का थोक में कम्बल जुटातेे हैं । इसके बाद बड़ा सा जलसा, महोत्सव, सेवा कैम्प आदि लगता है । बड़ा सा मंच शोभायमान होता है । क्लास वन और क्लास टू श्रेणी के लोग बुला लिए जाते हैं तथा फोर्थ श्रेणी का यह कम्बल बांटा जाता है, फिर भी खूब तालियाँ बजती हैं ।
 क्या आप बता सकते हैं कि सभ्य समाज के ऐसे जेंटलमैनों को क्या कहा जाए.. ? अतः सरकारी अफसर हों या राजनीति के माननीय । वे मंच पर अतिथि-मुख्य अतिथि बनने से पहले कम्बल की क्वालिटी जांच लें । झुर्रीदार चेहरे को कुछ ऐसा कम्बल दें कि इसे पाने की खुशी में उनकी एकाध झुर्री कम हो सके । प्रायः जो कम्बल बांटा जाता है पहली ही बार झटकने पर उसका रेशा-रेशा गठबन्धन वाली पार्टी की तरह अलग-अलग होने लगता है ।
 सच तो यही है कि इस आधुनिक युग में भी ठंड गरीबों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है , भिक्षुओं को तो कंबल मिल जा रहा है।  सामाजिक संस्थाएंँ अपने मंच से उन्हें गर्म वस्त्र दे स्वयं को संवेदनशील कहलाने का प्रमाण पत्र समाचार पत्रों के माध्यम से ले लेती हैं,  परंतु वे लोग जो श्रम के पुजारी हैं और किसी के समक्ष हाथ नहीं फैलाते हैं, यह ठंड उनके स्वाभिमान की परीक्षा लेती रही है । पिछले दिनों हुई बरसात ने ठंड को बढ़ा दिया है।  ठिठुरन से श्रमिक वर्ग परेशान है। रही बात अलाव की तो वह कुछ प्रमुख स्थानों पर  अथवा सरकारी कागजों पर ही जलते हैं ? जरा घर से बाहर निकल कर हम देखें तो सही किसी-किस चट्टी चौराहे पर प्रशासन ने अलाव जलवाया है या फिर किसी सामाजिक संगठन में यह पुण्य कार्य कर रखा है.. ?
 हम पत्रकारों को इसपर बहस करना चाहिए। यहीं हमारा धर्म-कर्म है। परंतु टीवी स्क्रीन पर एंकर अपनी कम्पनी के हितों का ध्यान रखते हुये कुछ कथित भद्रजनों ( राजनीतिज्ञ / गैर राजनीतिज्ञ )  को लाभ देने केलिए जिस तरह से किसी समसामयिक विषय  को तोड़मरोड़ कर बहस करते- कराते हैं, उसे देख मुझे लगता है कि पत्रकारिता का स्तर कितना नीचे गिरता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या हो गया है , हम पत्रकारों की निष्पक्षता को !  मीडिया को व्यवसाय क्यों बना दिया गया है ?
 और फिर यह साफ-साफ कह क्यों नहीं दिया जाता कि मीडिया भी एक धंधा है ।

     पिछले दिनों मैं अपने साथी पत्रकार नितिन अवस्थी के साथ समाचार संकलन के लिए निकला था। मार्ग में एक जनसेवक का क्षेत्र मिल गया। कड़ाके की ठण्ड के बीच भगवान भास्कर बादलों की ओट में छिपे हुये थें । सड़क किनारे ठंड की पहली बारिश से पानी ठहर गया है। उसके पास ही दर्जन भर प्लास्टिक के तम्बू तने हुये दिखें। जिसके आसपास बच्चों का झुंड खेलने में मग्न था ।  मानों ये बच्चे गरीबी और ठण्ड से लड़ रहे हो। यहीं कुछ लोग बांस को छीलकर पतली- पतली फरहटी  निकालते दिखें। महिलाएँ उसे अपने हुनर से दउरी(टोकरी) का स्वरुप देने में तल्लीन थीं। दीवारों पर लगने वाली पेंटिंग की तरह का नजारा डीआईजी आफिस के आगे ग्राम सिरसी गहरवार में देख बाइक के ब्रेक पर दबाव बढ़ गया। हमदोनों काम में लीन इन ग्रामीणों के पास पहुँचे, तो इनकी जो व्यथा कथा सामने आयी, वह दबे- कुचले वर्ग की रहनुमाई का दावा करने वालों  के लिए आईना है ।  जिसे देखने के लिए छप्पन इंच के कलेजे  से ऊपर उठ कर मानवीय संवेदना की जरुरत है । यहाँ जो लोग हमें मिले, वे अपनी मेहनत से कमाने और दो वक्त की रोटी के लिए बांस से सामान बनाने के कारण बांसफोर कहे जाते हैं। फटे चादर के बीच अपने तन को सर्द हवाओं से बचाने का प्रयास कर रहे वृद्ध की जुबां से वार्तालाप के मध्य, उसका यह दर्द फूट पड़ा -" काश ! एक कम्बल मिल जाता तो इस ठिठुरनसे राहत मिल जाती। "
   यानी कि उसकी स्थिति कुछ ऐसी ही थी, जैसाकि हिंदी साहित्य में निम्न तबके के दर्द से वाकिफ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद्र ने मौसम की मार झेलते एक बेबस किसान को पूस महीने में तड़पते देखा, तो उन्होंने तीन रुपए के कम्बल का इंतजाम न कर पाने के वाकए को इस कहानी में चित्रित किया था । इस कहानी का मुख्य पात्र हलकू पूस की रात में जबरा कुत्ते के साथ खेत की रखवाली करता तो है लेकिन कम्बल के रूपए साहूकार के ले लेने से वह कम्बल नहीं खरीद सका । ठंडक के चलते नीलगायों से खेत की रखवाली नहीं कर सका । जब वह पूस की रात में खेत चरते जानवरों की ओर घास-फूस की अलाव छोड़कर जाता तो शीतलहरी से हिम्मत न पड़ती और हलकू फिर अलाव के पास लौट आता रहा ।
 भोजन केलिए संघर्ष के दौर में बनारस जाने वाली आखिरी बस छूटने पर जब मैंने पूस की वह रात मीरजापुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर गुजारी थी,  मुझे आज भी याद है कि अपने पास बचे हुये अखबारों को खोलकर चादर की तरह उसे शरीर पर डाल लिया था और घुटने को छाती से सटा रखा था।
     इस वृद्ध के पुकार में भी कुछ ऐसा ही दर्द था, जो  सरकार की तमाम योजनाओं की हकीकत का झलक दिखला गया।
      अपने घर गाजीपुर से 180 किलोमीटर दूर सिरसी गहरवार में आकर रहने वाले इन भूमिहीन बांसफोर के बच्चों को सरकारी विद्यालय में दाखिला महज इसलिए नहीं मिला कि उनके पास बच्चों का आधार कार्ड नहीं था। सरकार के तमाम प्रयास के बावजूद अगर उसकी योजना पात्रों तक नहीं पहुँच पा रही हैं तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाना भी आवश्यक है। जिले का मुखिया जिलाधिकारी है, तो सबसे छोटी इकाई गाँव का बड़का साहब ग्राम विकास अधिकारी होता है ।  इसके बावजूद कमी किस स्तर से है उसकी तलाश करने वाला वाला कोई नहीं है। फिर कैसे होगी रामराज्य(सुशासन) की स्थापना?  ताकि हमसभी गर्व से कह सकें- "रामराज्य बैठे त्रिलोका, हर्षित भयऊ गये सब शोका । "
  लिहाजा, मीडिया को हकीकत का आईना दिखलाते रहना चाहिए। समाचार प्रकाशन के बावजूद भी पात्र तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुँच रहा हो तब भी ।
    बहरहाल, यहाँ रामविलास, कमलेश, बबलू और गुड्डू का परिवार रहता है। लगभग तीस की संख्या में सदस्य हैं। जिनमें से 15 -16 बच्चे हैं।
इनमें से सिर्फ दो बच्चे ही समीप स्थित जय माँ विद्यामंदिर में पढ़ते हैं। शेष दिन भर धमाचौकड़ी मचाया करते हैं। ये बांसफोर यहाँ दउरी बनाते हैं। दिन भर में तीन दउरी ही बन पाती हैं। 80 से 100 रुपये में एक दउरी बनती है। तीन दउरी बनाने में एक कच्चा बांस लगता है। जो 100 रुपये में मिलता है।आप बताएँ जरा कि इनके श्रम का उपहास है कि नहीं, दिन भर काम कर डेढ़-दो सौ रुपये की कमाई से क्या ये अपने परिवार का विकास कर सकते हैं। ये बांसफोर लोग जो गाजीपुर से रोजी-रोटी की तलाश में यहाँ आये हैं,  इनके पास  न जमीन है, ना ही घर। ये सभी झोंपड़ी में रहते हैं। सभी सरकारी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। हमने देखा गरम वस्त्र के नाम पर उनके पास कुछ भी नहीं है । बारिश में पुआल , जो इनका बिछावन था, वह भी भीग गया था । क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि छोटे बच्चों के साथ महिलाएँ इन झोपड़ियों में ठंड भरी रातें किस तरह से काट रही हैं ?
   जीवकोपार्जन के लिए कर्म तो वे भी करते हैं प्रतिदिन, परंतु उनके श्रम का यह आधुनिक सभ्य समाज उपहास उड़ा रहा है। जनप्रतिनिधियों की संवेदनाएँ यहाँ परखी जा सकती है जो विभिन्न मंचों से अपनी वाह-वाह करवाया करते हैं।
  लेकिन, इन बांसफोर की पीड़ा समाचारपत्र में प्रकाशित करने के बाद हमदोनों पत्रकारों को खुशी तब मिली जब गौसेवक राज महेश्वर ने मेरे फेसबुक पर इस पोस्ट को देखा और मुझसे कहा कि वे चौबीस घंटे के अंदर इनसभी केलिए गरम वस्त्र की व्यवस्था कर रहे हैं। रोटरी क्लब डायमंड के अध्यक्ष पंकज खत्री ने भी मुझसे संपर्क किया,इसलिए ऐसा नहीं है कि मीडिया सिर्फ शोर मचाता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि  गौसेवक राज महेश्वरी ने अपने कथनानुसार चौबीस घंटे के अंदर इन सभी बांसफोर लोगों को उनके निवासस्थान पर जाकर सस्नेह कंबल प्रदान किया, इसके लिए उन्होंने मंच सजाकर दानदाता होने का प्रदर्शन नहीं किया। यही तो है , एक सच्चे समाजसेवा का धर्म।
हम घर बैठ चाहे ठंड पर कितनी ही कविताएँ और कहानियाँ लिख ले, पर यह कभी नहीं समझ सकते हैं कि इस हाड़कंपाऊ ठंड में जैसे ही कंबल इस बांसफोर  परिवार के वृद्ध सदस्यों और उनके बच्चों को मिला, उनके चेहरे किस तरह की मुस्कान थी,साथ में दुआएँ भी थीं। इसमें किसी तरह की कृत्रिमता नहीं थी।

    अतः हम पत्रकारों का कार्य सिर्फ समाचार बेचना नहीं है , वरन हमारा कर्तव्य है अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाना। पीड़ित की सहायता करना , चाहे उसके लिए कुछ भी मूल क्यों न अदा करना पड़े।  एक सच्चा पत्रकार वर्तमान सरकार की नाराजगी जाने के लिए तैयार रहता है।  वह सरकार के अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता।  यदि वह अपना कर्तव्य नहीं निभाता , तो उन दुकानदारों की तरह है कि किसी ने सब्जी बेच दी तो किसी ने खबर।

     - व्याकुल पथिक

Sunday, 15 December 2019

ख़ामोश होने से पहले ( जीवन की पाठशाला )

ख़ामोश होने से पहले हमने


देखा है दोस्त, टूटते अरमानों


और दिलों को, सर्द निगाहों को


सिसकियों भरे कंपकपाते लबों को


और फिर उस आखिरी पुकार को


रहम के लिये गिड़गिड़ाते जुबां को


बदले में मिले उस तिरस्कार को


अपनो से दूर एकान्तवास को


गिरते स्वास्थ्य ,भूख और प्यास को


सहा है मैंने , मित्रता के आघात को


पाप-पुण्य के तराजू पे,तौलता खुद को


मौन रह कर भी पुकारा था , तुमको


सिर्फ अपनी निर्दोषता बताने के लिये


सोचा था जन्मदिन पर तुम करोगे याद


ढेरों शुभकामनाओं के मध्य टूटी ये आस

ख़ामोशी बनी मीत,जब कोई न था साथ


दर्द अकेले सहा ,नहीं था कोई आसपास


चलो अच्छा हुआ तुम भी न समझे मुझको


अंधेरे से दोस्ती की ,दीपक जलाऊँ क्यों !!


- व्याकुल पथिक

Friday, 13 December 2019

दुःख तो अपना साथी है ( जीवन की पाठशाला)


***********************
   मैं स्वयं को यह समझाने का प्रयास कर रहा हूँ कि जब कोई ऐसा दुःख हमारे चित में समा जाता है,जिसे हटाना असम्भव- सा लगता है। हमें ऐसे महापुरुषों के जीवनचरित्र पर दृष्टि डालनी चाहिए। सच तो यह है कि दुःख जीवन का सबसे बड़ा रस है,सबको मांजता है। हृदय में जमा यह बूँद-बूँद दर्द ही मानव की मानसमणि है ।
***********************
    वैसे तो इनदिनों मैं सुबह के भोजन में दलिया - दाल से काम चला ले रहा हूँ और रात  दूध संग दलिया अथवा ब्रेड से कट जाती है।
  मेरे भोजन की थाली का स्वाद तो माँ (नानी) की मृत्यु के पश्चात ही छिन गया था और फिर तबसे  बड़े-बुजुर्ग का यह ज्ञानोपदेश ही काम आ रहा है - " दाल-रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ । "
जिसका अभिप्राय यह है कि मनुष्य के जीवन में परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हो, परंतु संतोष रूपी धन का त्याग उसे नहीं करना चाहिए। हम अपने संतोष से अमीर और अभिलाषाओं से दरिद्र हैं ।
    फिर भी विगत रविवार को यह इच्छा हो ही गयी कि क्यों न दाल-रोटी संग मौसी जी द्वारा दिया गया नींबू अचार खाया जाए। वैसे, यह मेरी  लालसा ही थी,जो मुझपर भारी पड़ी , क्योंकि  आटा गूंथने के पश्चात जैसेही रोटी बेलना प्रारंभ किया, बाएँ हाथ के अँगूठे वाले हिस्से की झुनझुनी के कारण बेलन को ठीक से संभाल  नहीं पाया। परिणाम यह रहा कि रोटियाँ फूलने की जगह जल गयीं। कभी तो सभी मेरी तारीफ  किया करते थें कि रोटी बनाने की कला में तुम इतने निपुण कैसे हो ,परंतु अब इन जली रोटियों को देख हृदय में खिन्नता हुई कि क्या यह नयी बीमारी मुझे विकलांगता की ओर ले जाएगी ?
  बचपन में कोलकाता में था , तो अस्वस्थ माँ ने मुझे पाकशास्त्र का ककहरा सीखाया था,जब रोटी अथवा परांठे ठीक से नहीं बनते अथवा जल जाया करते थें , माँ मुस्कुराते हुये मेरा उत्साह बढ़ाती थी । तब मैं बारह वर्ष का ही था और आज जीवन में अर्धशतकीय पारी खेलते हुये , उसी स्थान पर पहुँच गया हूँ, जहाँ से सीखना प्रारम्भ किया था । हाँ,अब माँ नहीं हैं, जो मुझे ढांढस दे। दिसंबर माह का वह 26 तारीख और कोलकाता का वह महाश्मशान मैं कैसे भूल सकता हूँ । वर्षों गुजर गये , इसके पश्चात मैं किसी भी प्रियजन की अंतिम संस्कार  यात्रा में सहयोगी नहीं हुआ और यह भी जानता हूँ कि मेरी मृत्यु के पश्चात मेरा भी ऐसा कोई रक्त संबंध नहीं है जो मुझे मुखाग्नि दे , परंतु इसके लिए मेरे पास मित्रों की टोली है।
 खैर, इन जली हुई रोटियों को थाल में डाली और क्षुधा शांत करने में जुट गया।  तभी मुझे टीवी पर आने वाले धार्मिक धारावाहिक महाकाली  में भगवती का यह कथन, "अंत ही आरम्भ है" का स्मरण हो आया। महामाया की इस ओजस्वी वाणी ने मार्गदर्शन किया और मैं महाभारत काल के एक पात्र एकलव्य के जीवनसंघर्ष पर विचार करने लगा। जिसकी धनुर्विद्या कला से अर्जुन ही नहीं उसके गुरु द्रोणाचार्य भी स्तब्ध थें और उसे अँगूठा विहीन कर दिया था, उसी एकलव्य ने अपने दृढनिश्चय से  तर्जनी और मध्यमा अंगुली का प्रयोग कर तीर चलाना सीख लिया। यहीं से धनुर्विद्या के आधुनिक तरीके का जन्म हुआ।
      मेरे लिये यह उद्धरण इसलिए मायने रखता है कि मैं भी सिर्फ उँगलियों से बेलन संभालना सीख लूँ।  विपरीत परिस्थितियों में ही आत्मबल की परीक्षा होती है। यह आत्मबल ही है जो हमसे कहता है- " उठो, अपने पूरे सामर्थ्य से निरंतर उठो और अपनी मंजिल को हासिल करो।"
 सत्य यही है कि यदि हम अपने आत्मबल को झुकने न दें,तो कोई अपमान हमें गिरा नहीं सकता है और न कोई दंड हमें पीड़ित कर सकता है।
 मैं कुछ ऐसा ही आध्यात्मिक चिंतन कर रहा था कि मेरे मित्र नितिन अवस्थी आ गये । हमदोनों समाचार संकलन के लिए टांडा जलप्रपात की ओर निकले , परंतु मार्ग में बथुआ गांधीघाट स्थित अघोरेश्वर बाबा कीनाराम का आश्रम दिख गया। वहाँ हुई विशेष सजावट और आश्रम में बंगाल ,  चंदौली, वाराणसी,जौनपुर एवं सोनभद्र समेत विभिन्न जनपदों से आये अघोरियों और भक्तों की भीड़ देख हम भी वहाँ पहुँच गये। सामने मुख्यद्वार पर खड़े मेरे एक दिव्यांग मित्र दीपू भाई ने आवाज लगाई - भैया आइए , इस आश्रम को सुव्यवस्थित करने वाले बाबा दीनानाथ राम के परिनिर्वाण दिवस पर आज भंडारे का आयोजन है। सो, हमदोनों ने भी बाबा के समाधि स्थल को नमन कर प्रसाद ग्रहण किया। प्रसाद स्वरूप मिले हलवे एवं घुघरी ने हमारी क्षुधा को तृप्त कर दिया। यहाँ किसी भी प्रकार का आडंबर मैंने नहीं देखा। अघोरियों की टोली ने मुझे फोटोग्राफ लेते देख टोका कि उनका फोटो न लिया जाए, परंतु जब मैंने बताया कि हम पत्रकार है और समाचार संकलन के लिए आए हैं, तो उन्होंने ऊँचे स्वर में कहा कि ठीक है फोटो ले लो और साथ ही अपने समाचारपत्र के माध्यम से उनका यह संदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक अवश्य पहुँचा दिया जाए कि वे सभी कैलाश मानसरोवर का दर्शन करना चाहते है।
   आश्रम की व्यवस्था संभाले शीतलाराम बाबा और उनके सहयोगी प्रवीणराम बाबा ने बताया कि वर्ष 1994 - 95 में बाबा दीनानाथ राम का पदार्पण यहाँ हुआ था । उन्होंने आश्रम को सुरक्षित रखने के साथ ही सैकड़ों वृक्ष रोपित किये जो आज पूरे आश्रम को हरा-भरा बना अपनी छाया प्रदान करते हुए पर्यावरण को संरक्षित रख रहे हैं । उन्होंने कहा कि गुरुपरंपरा के तहत उनके विचारों को आगे बढ़ाने में संतसमाज लगा हुआ है ।
  इसीबीच एक वाहन आश्रम में प्रवेश करता है साथ ही भक्तगण अनिलराम बाबा का जयघोष करते हुए उनका आशीर्वाद लेने के लिए उनके चरणों में झुकते हैं। बाबा का आश्रम पड़ाव (काशी) में है। अत्यंत मृदुल स्वभाव के बाबा अनिलराम से जब हमने पूछा कि आपकी उपासना पद्धति क्या है ? तो प्रतिउत्तर में उन्होंने कहा कि गुरु द्वारा बताए गये मंत्र का निरंतर जाप वे सभी करते हैं और साथ ही कुछ सामाजिक कार्य भी, पुनः मैंने प्रश्न किया कि औघड़ों का भोजन सादगीपूर्ण क्यों नहीं होता ?
 उन्होंने कहा कि जो भूखा है, विकल्प के अभाव में उसके समक्ष जो भी खाद्यसामग्री होगी, वह उसे ग्रहण करेगा ही..?
  अघोरियों के भोज्यपदार्थ को लेकर सवाल उठता है ,लेकिन सत्य तो यह है कि वे इस ढकोसले से मुक्त हैं कि अमुक दिन मांसभक्षण करना चाहिए और अमुक दिन इसलिये नहीं, क्योंकि वह किसी देवी- देवता के पूजा- आराधना से जुड़ा है। जैसे नवरात्र, सावन अथवा मंगल - वृहस्पतिवार आदि।
   अनिलराम बाबा के साथ इटली से आए गुरु बाबा भी थें। ये सभी अवधूत भगवान राम के प्रिय शिष्य हैं।
 चित्र बाबा यहाँ की व्यवस्था संभाले हुये थें। भंडारे में दूरदराज से आए भक्तों की सेवा में जटा बाबा, दीपू, राजू, गुलाब, नंदन, रवि, विनोद , शशि सिंह डॉक्टर बिंदु आदि लगे हुये दिखें । बाल भोग के बाद भंडारे में प्रसाद ग्रहण करने के बाद संतों में कंबल वितरित किया गया।
   बताते चलें  कि अनिलराम बाबा ने ही अवधूत भगवान राम को अपना एक गुर्दा दिया था । उन्होने कहा कि गुरु के लिए शीश भी कटाना पड़े तो यह उसका परम सौभाग्य है। यह बात वर्ष 1988 की है ,जब बाबा अवधूत भगवान राम न्यूयॉर्क में भर्ती थें । उनकी बीमारी के दौरान उन्हें चिकित्सकों ने गुर्दा प्रत्यारोपण का सुझाव दिया । अनिलराम बाबा को लाखों भक्तों के मध्य अपनी एक किडनी सहर्ष देने का परम सौभाग्य मिला। उनका गुर्दा निकालकर अवधूत भगवान राम को लगाया गया । जिसके पश्चात अघोरेश्वर कई वर्षों तक अपने शिष्यों पर कृपा बरसाते रहें। बाबा की मृत्यु 29 नवंबर 1992 में मैनहट्टन, न्यूयार्क में हुई। वाराणसी के पड़ाव स्थित आश्रम के समीप उनकी भव्य समाधि है। अघोर सम्प्रदाय के अनन्य आचार्य, संत कानीराम (जन्म  1693) के पश्चात अवधूत  भगवान राम ( जन्म 1937) का ही विशेष उल्लेख है।
   काशी में अघोरेश्वर भगवान राम के अंतिम संस्कार के समय मैं मालवीय पुल (तब राजघाट पुल,) पर खड़ा था और अपार जन समुदाय को देख आश्चर्यचकित भी था। यह वह दौर था, जब घर पर दादी के अतिरिक्त मेरा अपना कोई नहीं था और मैं घर से पैदल ही विभिन्न धर्मस्थलों  और दरगाहों पर जाया करता था। इसी क्रम में अपने घर कतुआपुरा( विशेश्वरगंज ) से पड़ाव स्थित अघोरेश्वर के आश्रम भी धीरे-धीरे घूमते-टहलते पहुँच जाता था। जेब मैं पैसा तो था नहीं,अतः वहाँ जो भी  प्रसाद मिलता , ग्रहण कर लेता था ।
------------------------------------
   संक्षिप्त में कहा जाए तो -" सबकुछ का अवधूनन कर, उपेक्षा कर ऊपर उठ जाना ही अवधूत पद प्राप्त करना है।"
------------------------------------
     यहाँ मेरे चिंतन का विषय यह है कि ऐसे सिद्ध पुरुष भी सृष्टि के नियम को नहीं बदलते हैं। हाँ, वे अपनी आत्मशक्ति से स्वयं को शारीरिक कष्टों से  ऊपर उठा लेते हैं।
   गुर्दा प्रत्यारोपण के पश्चात जब अवधूत भगवान राम पुनः गंभीर रुप से अस्वस्थ होने के कारण उपचार के लिए अमेरिका गये ,तब भी वे पद्मासन में ध्यानमुद्रा में झूमते और कुछ- कुछ बुदबुदाते रहते थें।
   स्वामी विवेकानंद को ही लें । उल्लेख है कि जॉन पी फॉक्स को एक पत्र लिखते वक्त स्वामी विवेकानन्द कहते हैं - "मुझे साहस और उत्साह पसन्द है। मेरे समाज को इसकी बहुत ज़रूरत है। मेरा स्वास्थ्य कमज़ोर हो रहा है और बहुत समय तक मुझे ज़िन्दा बचने की उम्मीद नहीं है।"
   स्वामी विवेकानन्द को पता था कि उनकी  मृत्यु कब होगी। उनकी चेतना समय के साथ बढ़ती जा रही थी। इस बढ़ती चेतना को शरीर का संभाल पाना संभव नहीं था। विवेकानन्द कहते थें कि एक वक्त ऐसा आएगा जब उनकी चेतना अनन्त तक फैल जाएगी। उस वक्त उनका शरीर इसे संभाल नहीं पाएगा और उनकी मृत्यु हो जाएगी। कहा यह भी जाता है कि 39 वर्ष की अवस्था में ही स्वामी जी को 30 बड़ी गम्भीर बीमारियाँ हुईं। इसके बाद भी  स्वामी विवेकानन्द दैनिक कार्य किया करते थे। महानिर्वाण के पूर्व तीन घंटे तक उन्होंने योग किया था।
 स्वामी विवेकानंद जी के गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस तो सिद्ध पुरुष ही थें। वे कैंसर से पीड़ित थें, परंतु माँ काली से स्वयं केलिए कभी कोई कामना नहीं की ।
  जबकि स्वामी रामतीर्थ को उनके छोटे से जीवनकाल में  ही एक महान् समाज सुधारक, एक ओजस्वी वक्ता, एक श्रेष्ठ लेखक, एक तेजोमय संन्यासी और एक उच्च राष्ट्रवादी का दर्जा प्राप्त हुआ। स्वामी जी ने अपने असाधारण कार्यों से पूरे विश्व में अपने नाम का डंका बजाया। मात्र 32 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने प्राण त्यागे थें ।  इस अल्पायु में उनके खाते में जुड़ी अनेक असाधारण उपलब्धियाँ यह साबित करती हैं कि अनुकरणीय जीवन जीने के लिए लम्बी आयु नहीं, ऊँची इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। उनका स्वास्थ्य भी काफी बिगड़ गया था और वर्ष 1906 को दीपावली के दिन  गंगास्नान करते समय उन्होंने जलसमाधि ले ली | इनका जन्म और देह त्याग दोनों ही दीपावली के दिन हुआ था |
    मैंने अपनी माँ को ही देखा था कि वे गंभीर रुप से दमा सहित अन्य बीमारियों से पीड़ित थीं। उनका एक पांव भी जाता रहा। वे खड़ी नहीं हो सकती थीं। फिर भी उनकी इच्छाशक्ति इतनी दृढ़ थी कि वे मचिया पर बैठ कर खिसक-खिसक कर नित्यकर्म करती थीं। वे ठाकुरबाड़ी को पुष्पों से प्रतिदिन सजाती थीं। बेलपत्रों पर चंदन से रामनाम लिखती थीं । असाध्य रोगों ने उन्हें असहनीय कष्ट दिया, परंतु वे न तो कभी क्रोधित हुईं , न ही विचलित।  वे नियमित रुप से सुबह 6बजे ट्रांजिस्टर पर भजन सुनने के पूर्व मुझे जगाकर पढ़ने भेजती थीं।  बाबा को अपने काम से फुर्सत नहीं था और मैं सिर्फ 12 वर्ष का ही था। विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने जीवन के संध्याकाल को जिस प्रकार से ईश्वर को समर्पित किया, वह मेरे लिये प्रेरणास्रोत है कि मैं भी झुनझुनी भरे अपने बायें हाथ से अपने अनिश्चित भविष्य को लेकर विकल होने के स्थान पर नित्यकर्म करने का अभ्यास कर लूँ , ताकि नेत्रों की मंद होती ज्योति मुझे उस दिव्यप्रकाश से वंचित न कर सके,जिसकी अनुभूति मुझे ऐसे अध्यात्मिक विषयों पर चिंतन करते समय होती है। नियति ने मेरे लिये जो भी तय कर रखा है , उसे उपहार समझ स्वीकार कर लूँ।
  अतः मैं स्वयं को यह समझाने का प्रयास कर रहा हूँ कि जब कोई ऐसा दुःख हमारे हृदय में समा जाता है,जिसे हटाना असम्भव- सा लगता है, तो हमें ऐसे महापुरुषों के जीवनचरित्र पर दृष्टि डालनी चाहिए। जिनके पृष्ठों पर हमारे जैसे अनेक दुःख मिलेंगे, परंतु साथ ही बराबर जीवन में अग्रसर होते जाने का उल्लेख भी मिलेगा।
 " हृदय में जमा बूँद-बूँद दर्द ही मानव की पारसमणि है और यही दुःख जीवन का सबसे बड़ा रस है,सबको मांजता है। "
  अपनी बात स्वामी रामतीर्थ के इस शक्तिदायी  विचार के साथ समाप्त कर रहा हूँ-
" दुःखी व्यक्ति को चुपचाप अपना दुख भोग लेना चाहिए। बाहर धुआँ उड़ाने से क्या लाभ ? भीतर ही जब धुआँ प्रकाश में न बदल जाए तब तक किसी से कुछ कहना व्यर्थ है । धुएँ के बाद अग्नि अवश्य जल उठेगी- यह प्रकृति का नियम है।"


   --व्याकुल पथिक

Monday, 9 December 2019

माँ तुझे ढ़ूंढता रहा अपनों में

रिश्ते न संभाल पाया जीवन के

माँ , तुझे ढ़ूंढता रहा अपनों में


बीता बसंत एक और जग में

जो पाया सो खोया मग में ?


माँ, स्नेह फिर से न मुहँ खोले

अरमान सभी कुचल दे उर के


दिल झर झर न बरसे सावन में

मुक्ति दे चिर विधुर जीवन से।


दिये असीम प्यार उपहार तुमने

बस एक और वरदान मुझे दे ।


बन गगन का टिमटिमाता दीपक

वह दुलार तेरा फिर से पाऊँ माँ !


तुझ जैसे कुछ लोग मिले जब

पवित्र स्नेह था उनके हिय में ।


अपराधी हूँ मैं उनका भी अब

यह तिरस्कृत जीवन हर ले माँ !


माँ , क्षमादान दिलवाना उनसे

बस इतना कहलाना इनसे ।


दुख जीवन में अनेक उठाये

माँ के प्यारे तुम सो जाओ ।


माँ , अब ना धैर्य बंधाना मुझको

मंजिल नयी न दिखाना मुझको।


करता विलाप विकल मन मेरा

प्यार से तू ही मुनिया कह दे ।


माँ , देखो आज जन्मदिन मेरा

क्यों रुलाता व्यर्थ ये सबेरा ?


तुझ बिन कौन मनाये इसको

सूना पड़ा यह दिल का बसेरा।


अस्थि- पंजर से लिपट कर माँ

कब तब तड़पू आहें भर- भर !


न मिला हँसने का अधिकार मुझे

बना पाप- अपराध जीवन भर ।


माँ ,ये हृदय मधु-कोष जो मेरा

विषधर-सा क्यों लगता सबकों ?


लुटा कर सर्वस्व जीवन अपना

न दे सका अमृत बूंद किसी को !


ना कुर्ता न पैजामा है माँ

बाबा ने ना कुछ भेजा है माँ ।


हाड़ी दादू केक न लाते

लिलुआ से बड़ी माँ न आती।


माँ , मौसी भी दूर हुई जबसे

बिखर गयी खुशियाँ जीवन से


अँखियों में अंधियारा छाया

लेखनी थम गयी जीवन की ।


पत्थर के दिल मोम न होंगे

हँसते हैं ये सब जग वाले ।


अब तो आ के गले लगा ले

देश पराया और लोग बेगाने ।


    -व्याकुल पथिक
    28 जुलाई 2019

( जीवन की पाठशाला )