दोहरा मापदंड
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" पैसे तो पूरा लेते हो और दूध बिल्कुल गंगाजल। तुम्हें रोज़ाना टोकते हुये अब मुझे ही लज्जा आती है। बंद करो ये मिलावट या फिर कल से दूध मत देना । "
-- मालती ने झल्लाते हुये एक ही साँस में ग्वाले को आज खूब खरीखोटी सुनाई थी।
और उधर ग्वाला रामू सिर झुकाए बड़ी दीनता से चिरौरी किये जा रहा था कि मालकिन इस महंगाई में चालीस रुपये लीटर भैंस का शुद्ध दूध वह कहाँ से लाकर दे। इससे कहीं अधिक तो उसे दूध की दुहाई देनी पड़ती है। उसके भी अपने बाल-बच्चे हैं। सुबह-शाम दोनों व़क्त गांव-शहर साइकिल से एक किये रहता है। तब किसी तरह से उसके परिवार के पाँच जनों के पेट की आग बुझती है ।
उसका कथन सत्य था , फिर भी पचास रुपया लीटर में दूध लेने को मालती तैयार नहीं थी और शुद्धता की गारंटी भी चाहती थी ।
वह बड़बड़ाए जा रही थी कि न जाने कब ऐसे लोगों की धन-लिप्सा कम होगी। अब ये गरीब कहाँ रहे, पूरे ठग हैं ठग..। न मालूम कब इन मिलावटखोरों की ख़बर लेगा प्रशासन। ये अपने को भगवान कृष्ण का वंशज कहते हैं। लेकिन ,दूध-पानी एक करने से बाज नहीं आते, मिलावटखोर कहीं के.. !
और तभी उसकी पुत्री स्नेहा हाँफते हुये तेजी से घर में प्रवेश करती है।
" अरे ! स्नेह क्या हुआ ? इतनी घबड़ाई क्यों हो ? कालेज में कुछ हुआ तो नहीं ? "
-- मालती स्वयं भी पुत्री की यह दशा देख चिंतित एवं तनिक भयभीत भी हो उठी थी ।
स्नेहा -- " मम्मी ! वो ताऊजी की दुकान है न। वहाँ रेड पड़ा है । निखिल भैया को वे लोग साथ ले गये हैं । वहाँ तमाशाइयों की बड़ी भीड़ लगी हुई है।"
मालती -- " पर.. क्यों, कुछ बताओगी भी अब !"
स्नेहा - " वे लोग कह रहे थे कि भैया की दुकान से ढेर सारे मिलावटी और नकली सामान पकड़े गये हैं । कई बड़ी कम्पनियों के अधिकारियों ने यह शिकायत की थी कि भैया काफी दिनों से डुप्लीकेट सामान बेचकर उनकी कंपनी को ही नहीं, सरकार को भी राजस्व की क्षति पहुँचा रहे हैं और ग्राहकों को ठग रहे हैं।अच्छा हुआ कि मेरी सहेलियों को नहीं मालूम था कि यह मेरे चचेरे भाई की दुकान है, नहीं तो मुझे बहुत लज्जा आती। तभी तो वे लोग इतनी जल्दी अमीर हो गए हैं न मम्मी ? "
" अरे ! चुप कर , तू अब एक शब्द भी नहीं कहेगी। जानती नहीं है क्या कि सोसायटी में जगह बनाने के लिए कुछ इधर-उधर करना ही पड़ता है। सत्यवादी हरिश्चंद्र बनने से काम नहीं चलता। भूल गयी क्या पिछले रक्षाबंधन पर्व पर निखिल ने तुझे सोने का कंगन दिया था। और हमें भी जब आवश्यकता होती है तो उसकी कार मंगा लेते हैं। वे तेरे विवाह में भी कम मदद नहीं करेंगे। दोनों परिवार में तू ही इकलौती लड़की है । हाँ ,और सुन इसे बड़े लोग मिलावटखोरी नहीं बिजनेस कहते हैं। बड़ा आदमी बनने के लिए बड़ा दांव लगाना पड़ता है। "
-- पुत्री को तनिक झिड़कते हुये मालती ने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर दिया था।
" परंतु मम्मी अभी तो थोड़ी देर पहले ही आप रामू काका को मिलावटखोर कह डाँट रही थी। मैंने घर में प्रवेश करते हुये सुना था। कठिन परिश्रम के कारण काका के ढीले पड़े कंधे, आँखों के नीचे गड्ढे और माथे पर शिकन भी आपको भला कहाँ दिखे थे। क्या उनकी धन-लिप्सा निखिल भैया से अधिक है। यह कैसा दोहरा मापदंड है आपका.. !"
-- यह बुदबुदाते हुये स्नेहा अपने कक्ष की ओर बढ़ चली, क्योंकि शब्द नहीं अनेक प्रश्न टंगे हुये थे उसके चेहरे पर । निखिल के लिए मालती का यह प्रशस्तिगान उसके कानों को भारी पड़ रहा था।
-व्याकुल पथिक
भाईचारा
शहर का वातावरण बिल्कुल सामान्य था। सभी अपने दिनचर्या के अनुरूप कार्यों में लगे हुये थे। यहाँ के शांतिप्रिय लोगों के आपसी भाईचारे की सराहना पूरे प्रदेश में थी। बाहरी लोग इस साँझा विरासत को देख आश्चर्यचकित हो कहते थे - "वाह भाई! बहुत खूब ,आपके शहर की इस गंगा- जमुनी संस्कृति को सलाम ।"
और उधर नेताजी इसे लेकर ख़ासे परेशान थे। वे नहीं समझ पा रहे थे कि इतने सुलझे हुये नगरवासियों के मध्य कैसे फूट डाली जाए । उन्हें अपनी राजनीति की रोटी जो सेकनींं थी । अब तो आम चुनाव की आहट भी सुनाई पड़ने लगी थी और हाल यहाँ यह था कि चुनावी लहर नापने वाली मशीन का पारा तनिक भी ऊपर नहीं खिसक रहा था।
सतारूढ़ दल के राजनेता काम बोलता है का जुमला उछाले हुये थे,तो विपक्ष ने इन्हीं कथित विकास कार्यों पर घेराबंदी कर रखी थी, पर वोटर ख़ामोश थे, क्योंकि जनता को किसी ने भी फीलगुड का एहसास नहीं करवाया था । अतः दोनों ही तरफ के राजनेता स्वार्थ भरे प्रेम का गंगाजल छलका कर हार मान चुके थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि पिटे हुये इन पासों से चुनाव में जीत कैसे हासिल करे।
मंत्रणा कक्ष में हितैषियों संग नेताजी सिर झुकाए बैठे हुये थे। और तभी एक कुटिल मुस्कान उनके चेहरे पर आती है। जिसके साथ ही सभा विसर्जित हो जाती है।
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दो दिन पश्चात एक बड़े धार्मिक समारोह में जुलूस के साथ एक मज़हब के लोग दूसरे संप्रदाय बाहुल्य क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। अचानक धार्मिक नारा लगाने वालों के स्वर की तल्खी बढ़ जाती है। कुछ ही देर में पत्थरबाजी और आगजनी भी होने लगती है। जुलूस संग धार्मिक दुर्व्यवहार की ख़बर तेजी से पूरे शहर में फैलती है। युवाओं का एक बड़ा तबका दोनों तरफ से मोर्चा संभालने के लिए सड़कों पर आ डटता है। आपसी भाईचारे पर सीना फुलाने वाले लोग अब हिंदू और मुसलमान में बंटे हुये होते है । जिधर देखो भय की परछाई आंखों में डोल रही थी । दम तोड़ते छटपटाते जिस्मों को देख मानवता चीत्कार कर उठी थी। स्थिति नियंत्रण के लिए कई स्थानों पर उपद्रवियों संग पुलिस का संघर्ष जारी था।
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और उधर ,नगर के उस प्रसिद्ध कॉफी-हाउस में नेताजी टीवी स्क्रीन पर नज़र टिकाए चुस्कियाँ ले रहे थे। अब उनका काम सचमुच बोल रहा था..।
तभी विपक्षी दल के प्रत्याशी की भी उसी कॉफी-हाउस में एंट्री होती है। जैसे ही दिनों की निगाहें मिली हैं, उनमें आक्रोश के स्थान पर अद्भुत आत्मीयता दिखती है। "भाई साहब " और "भाई जान" के अभिवादन के साथ दोनों एक ही मेज पर आमने-सामने बैठ ठहाका लगा रहे होते हैं। वे कहते हैं - " जनाब ! इस बेवकूफ़ जनता के लिए हम-आप क्यों अपने रिश्ते खराब करे। इलेक्शन कोई जीते ,पर यह कॉफी हाउस वाला हमारा भाईचारा कायम रहना चाहिए ..!"
पर जनता इन दोनों प्रतिद्वंद्वी नेताओं के ख़ामोश भाईचारे से कल भी अंजान थी और आज भी है..!!
-व्याकुल पथिक
चित्रः गूगल से साभार
ऊर्जा
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पिछले पखवाड़े भर से टारगेट
(लक्ष्य) पूरा करने के लिए विज्ञापनदाताओं के चौखट पर दस्तक़ देता रहा। वर्ष में एक बार झोली फैलाता हूँ , अतः इंकार कोई नहीं करता है। कितने ही घरों से तो तीन पीढ़ियों का मेरा संबंध इसी समाचारपत्र के कारण जुड़ा हुआ है। जब आया था तो पुत्रवत स्नेह मिला, कुछ वर्षों पश्चात उनके पुत्रों के लिए अनुज जैसा हो गया और अब उनके भी बच्चे युवा हैं , जो मुझे चाचा कह के बुलाते हैं। अपना तो सबकुछ पीछे छूट चुका है। अब पूरी तरह से मुसाफ़िर हूँ और सौभाग्य से वैसा ही उपयुक्त आशियाना भी मिल गया है। जो कुछ अपना है, इसी शहर में शेष है।
ख़ैर ,पिछले वर्षों की तरह होली का कार्टून बनवाना , संबंधित लेख लिखना और इसके पश्चात ढेर सारे समाचारपत्रों का वितरण करना और करवाना , इतना सब करने के पश्चात होली पर्व की पूर्व संध्या पर जब वापस लौटा तो पाँव लड़खड़ाने लगे थे, परंतु पद्मदेव द्विवेदी जी ने रोक कर घर के बने हुये आलू के पापड़ के साथ बढ़िया चाय पिलाई , जिससे कुछ राहत मिल गयी थी । यहाँ यही मेरी कमाई है।
होटल पर पहुँच कर साइकिल किनारे खड़ी की और उससे कहा कि मित्र दो दिनों तक तू भी जरा आराम कर ले और मैं भी सुस्ता लूँ , हम दोनों के लिए होली,दीपावली और दशहरा जैसे पर्व इस लिहाज़ से ख़ास मायने रखता है, क्यों कि भरपूर विश्राम जो मिल जाता है। ऊपर कमरे की ओर बढ़ने को था कि कुछ मित्रों ने पूछा , " शशि भाई, क्या इस बार गुझिया नहीं खिलाओगे ? पूर्व में तो राजनेताओं के यहाँ से तुम्हारे पास कई डिब्बे मिठाइयाँ आया करती थीं। "
जिस पर मैंने तनिक मुस्कुराते हुये कहा कि पिछले वर्षों की तरह इस बार इलेक्शन (आम चुनाव) नहीं है मेरे भाई ,जो मेरे जैसे छोटे समाचारपत्र के प्रतिनिधि की खोज- ख़बर लिया जाए। उन्होंने अख़बार के लिए विज्ञापन दे दिया, यही मेरे लिए कम नहीं है। हाँ, सपा के नये जिलाध्यक्ष देवीप्रसाद चौधरी और पूर्व राज्यमंत्री कैलाश चौरसिया ने एक- एक डिब्बा गुझिया दी, जिन्हें दोस्तों में बाँट दिया । परिस्थितियाँँ सदैव सभी की एक जैसी नहीं होती हैं। मेरे लिए तो आपसभी का स्नेह ही काफी है। मैं तो वैसे भी नहीं खाता हूँ।
मेरा ज़वाब सुनकर वे वही पुराना सबक़ मुझे याद दिलाते हैं कि यार , तुम दुनियादारी को कब समझोगे ? जब अवसर आता है , तो सौदेबाज़ी में पीछे रह जाते हो और घर आया धन भी ठुकरा देते हो। इन्हें कैसे समझाऊँ मैं कि यदि सौदा ही करना होता, तो अपने पुश्तैनी घर को यूँ क्यों जाने देता ।
वैसे आज सुबह भी नींद समय से खुल गई थी चर्चा मंच पर कामिनी जी ने मेरे होली हुड़दंग वाले कार्टून को स्थान दे रखा था । अतः मैंने वहाँ जाकर टिप्पणी की और पुनः रजाई तान ली ।बूँदा-बाँदी से मौसम खराब होने के बावजूद भी बाहर सड़क पर होली खेलने वालों की टोली मौजूद थी। प्रथम बार आसमान को होली खेलते मैंने देखा। लेकिन बच्चों एवं युवाओं पर ठंड का असर नहीं रहा ।
प्रशासन का होमवर्क अच्छा रहा। जिससे किसी तरह का उपद्रव नहीं हुआ और आपसी " भाईचारा " कायम रहा। वैसे तो यह पर्व भी भाईचारे का है। होली कहती है कि आग से न जल पाने का वरदान प्राप्त होने के बावजूद छल-छद्म और असत्य रूपी हिरण्यकश्यप का साथ देने की वजह से वह जल गयी । इसीलिए मैंने बनावट, दिखावट और मिलावट इन तीन शब्दों का सदैव विरोध किया है।
तभी अनिल जायसवाल जी का फोन आया कि भैया होटल पर हैं न , नास्ता लेकर आ रहा हूँ। मैंने उसी से सुबह - दोपहर का काम चला लिया। पर्व तो वैसे भी मेरे लिए उपवास के लिए बने हुये हैं , इसीलिए तो दोनों ही दिन दूधिये ने भी हाथ खड़ा कर दिया । जहाँ सुबह से किसी अपने का फोन नहीं आया , वहीं ग़ैर होकर भी अनिल भाई द्वारा अपने घर से होली की सुबह नास्ता लेकर आना, यह मेरे लिए किसी उपहार से कम नहीं था।
हाँ ,शाम को हरियाणा से रेणु दी ने अवश्य मुझे होली पर्व की शुभकामनाएँ दीं। इन तीन दशक में अपने घर- परिवार से दूर हो मैं अपनी जड़ से पूरी तरह से कट चुका हूँ। फिर भी यदि मैं यह उम्मीद करूँ कि परिवार के सदस्य मेरा ध्यान रखें ,तो यह मेरी एक और बड़ी मूर्खता होगी। इस छोटे से शहर में मुझे जो पहचान मिली है, वहीं मेरे श्रम और मेरी ईमानदारी का पुरस्कार है। यही मेरे जीवन का आधार है। यहाँ हिन्दू- मुस्लिम, निर्धन-धनिक और कुलीन-अकुलीन सभी वर्ग के लोगों में मेरा बराबरी का सम्मान और अधिकार है। जबकि मेरा बचपन वाराणसी के दंगाग्रस्त क्षेत्र में गुजरा है ,परंतु मैं यह कैसे भूल जाऊँ कि हमारा राष्ट्र आदिकाल से " विश्व बंधुत्व " का उद्घोष करता रहा है। यह भाव मेरे आंतरिक ऊर्जा का स्त्रोत है।
कोलकाता में माँ की मृत्यु के पश्चात ही मैंने होली- दीपावली जैसे पर्वों से लगभग दूरी ही बना ली थी और अब तो उसकी कोई औपचारिकता भी नहीं रही है। हृदय में भले ही उदासी हो कोई बात नहीं, परंतु सोशल मीडिया पर शुभकामनाएँ तो देनी ही पड़ती है। सुबह से मैं भी यही कर रहा हूँ, यह सामान्य शिष्टाचार है। इसे कृत्रिम नहीं कहा जा सकता है , क्यों कि औरों की खुशियों को बदरंग करने का हमें कोई अधिकार नहीं है।
दो दिनों के विश्राम के पश्चात मेरी तीव्र इच्छा यही है कि किसी प्रकार से मैं अपने इस कठोर शारीरिक एवं मानसिक श्रम ,परंतु अत्यंत सीमित आय वाले व्यवसाय से मुक्त हो जाऊँ। कल से पुनः उसी प्रकार सुबह साढ़े चार बजे अपनी साइकिल लेकर नगर भ्रमण पर निकलना पड़ेगा। मौसम भी ख़राब है और मेरे रुग्ण शरीर की स्थिति ठीक उसी प्रकार है ,जैसा मैं सुबह देखा करता हूँ कि किसी दुर्बलकाय खच्चर के पीठ पर उसकी क्षमता से अधिक ईंट का बोझ रख दिया जाता है और जब वह थक कर अड़ता है , तो चाबुक की मार ऊपर से सहनी पड़ती है। परंतु कब तक, एक दिन तो उसके पाँव लड़खड़ाते ही हैं और गिरने के पश्चात वह फिर कभी नहीं उठता। वह मुक्त हो जाता है इस बोझ और अपने जीवन से भी।
तभी स्मरण हो आया कि पिछले महीने अत्यधिक ठंड के मौसम में जब इतनी सुबह प्रतिदिन ढ़ाई घंटे साइकिल चलाने की मुझे बिल्कुल भी हिम्मत नहीं पड़ रही थी और उच्चरक्तचाप के कारण सिर फटा जा रहा था, तब मैंने इन्हीं सड़कों पर उस बूढ़े बाबा को रिक्शा खींचते देखा था। जिसके पाँव मुझसे कहीं अधिक लड़खड़ा रहे थे। परंतु संकटमोचन मंदिर के समक्ष बैठ भीख मांगना उसे स्वीकार नहीं था ।
और मैंने उन अब्दुल चाचा को भी देखा था जो नियमित इसी प्रकार सुबह की नमाज़ के लिए लाठी का सहारा लिए आहिस्ता- आहिस्ता मस्जिद की ओर पाँव बढ़ाये जा रहे थे। ऐसे ही कर्मयोगी मेरे लिए " ऊर्जा " के केंद्र हैं। जिनका नित्य दर्शन इन्हीं सड़कों पर मुझे हुआ करता है। इनमें से किसी ने भी अभी तक अपनी पराजय स्वीकार नहीं की है ,तो फिर मैं कैसे पीछे हट जाऊँ ?
- व्याकुल पथिक
मोदी कs मुरचहुउवा पिचकारी टाईट हो गइल..
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. इहो होलिया पे मोदी ब्रॉड पिचकारी कs डिमांड तेज बा.. बुढ़वन से लइके जवनकन तक ई वाला ले... कही-कही के बौराए हैन..। पता त इहो चलल बा की भगवा खोल पार्टी कs प्राइवेट प्रैक्टिस अपने विधायक मिसिर जी के रत्नाकर होटल के पिछवे शुरू बा..
अउर इहाँ होली खेले के जउन भी मनसेधू- मेहरारू आवत हैन , उनके दिमाग कs बल्ब फ्यूज करें के खातिर जिले कs दुलरुआ बिजली मिस्त्री .. मिनिस्टर रमाशंकर फटेल लगायल गयन हैन..। काहे से की प्लानिंग ई बा कि सीएए के लइके विरोधी दलन कs खजुराहट ठंडा करे के लिए इहे होली में उनके घेरी-घेरी के भोलेबाबा कs केसरिया बरफी अउर ठंडईया खिलाए पियाए के टुन्न करेके बा.. .. दस लाख लोगन के चोली भगवा मय करे कs टारगेट मिलल बा..। पार्टी के होम मिनिस्टर कs इहे हुकुम जारी भईल बा कि खाली घरे बइठ के मोदी ब्रांड गिलौरी गटके से काम नाही चले के बा ..। तs बिग्रेड कs जितने भी लखैरुआ अउर खदेड़ुवा सरदार हैन , ऊ सब अपनी मुरचहुउवा पिचकारी के होलिया के पहिले बहरे निकाल के सर्विसिंग कराई ले ..। तेल और पानी लगाई के टनाटन्न पकरे रहे, काहे से कि प्रधानी से लइके यूपी के चुनउवा तक एकरा के टाइट रखे के बा..। शरीरिवा से बरियार मिसिर जी क कहना बा कि जब उनकरे पार्टी में ई बड़का फाइन सेंसर ज्ञानचंदर अगरवाल, विश्वनाथ अगरवाल , नीरज अगरवार, बंशीधर अगरवाल, सतीश अगरवाल , शैम्फूड स्कूल कs टुनटुन गुरु, विवेक भरनवाल , दुलरुआ लइका चंद्रांशु गो-गो-यल अउर भौकाली योगगुरू संदीप गुप्त हैन... तs चिन्ता काहे करी.. फिरो जे न मानी त धइ के खाटे प अइसन मसकल जाई की ऊ सीधे घाटे पर नजर आई ..। नाही तs मिनिस्टर फटेल भइयो त हैन न मोदी ब्रांड पेठा खीयावे खातिर..।

फटफटईया से मारे पिचकारी, ई तीन सवारी..
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इहाँ के एक्स मिनिस्टर अनप्रिया के विकास ब्रांड कप- प्लेट कs ई प्रताप बा कि लहर मापे कs मशीन का पैरामीटर उनकरे चुनाव में बेजान रहल .. बम्पर वोट कs बरसात तs भयल ही.. अउर पर्टियो अब बरियार बा..।
एमएलसी आशीष फटेल कs सोशल इंजीनियरिंग अइसन कमाल देख उनकरे दुआरे इहे ढोल बजत बा --
फटफटईया से मारे पिचकारी
भैया-भौजी संग देवरों करे छेड़खानी
तनिक देख ला ई तीन सवारी
.रउवा , बउराई गयलन कs....
पर हाँ, ऊ मंत्री ना भइन एकर मलाल मीरजापुरीयन के बा..। लोग इहे विचार करत हैन कि वोट लेवे के लिए तs भाइयों- बहनों कही के नेकुरा रगड़त रहलन इहा.. अउर जब देवे कs बारी आइल तs अपने जिले के ई फटफटइया गाड़ी कs " बत्ती " गुल हो गइल..।इहाँ के सुपरफास्ट विकास गाड़ी के मालगाड़ी बना देहलन..। इहे अच्छे दिन कs भोंपू बजा के गयल रहलन कि अपने तो दुबारा पीएम बन गईलन और इहाँ का कइलन.. बाबा जी कs ठुल्लू ? रउवा ई खाली कप - प्लेट में तोहरे ब्लैक टी से काम न चली.. ..।
झूठ बोले कौवा काटे.. ई माई विंध्याचली कs दरबार बा.. इहाँ बड़कन- बड़कन अइसन ठुनकिया गइलन कि कखते फिरत रहेन..।
एक बात इहो बा कि एक्स मंत्री के दफ्तर कs गुड़हवा जलेबी खाइके उनकरे फस्ट पाली में मोटायल रहेन नेतवन कs दाल ई बार नाही गलत बा.. ऊ फटेहाल कउने बिल -बिलुक्का में घुसल हैन , एकर तलाश होत बा..। इहाँ त ए गो नयका लेमनचूस बाबा आइ गयल हैन..जउन कभो मीडिया बिरादरी कs रहल ..लेकिन अब त पत्रकारन कs फोन उठाएँ में भी अइसन शरमात हैन, जैसे नयकी बहुरिया ..उनकर कउनो जरुरतों नाही बा..डीलिंग त बड़के दरबार में होत है..। नाही तs अपने दुलरुआ विधायक राहुल हैन न..!
बौरउवा एवार्ड से नवाजे जाएंगे डा0 बिसराम
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अपने जिला में कभो सिटी मजिस्टर रहलन डा0 बिसराम साब को बौरउवा एवार्ड मिले कs बा..।
वइसे साब कs प्रयागराज में बाजार चउचक टाइट बा.. आप उहवाँ सरकारी रेवन्यू कलेक्शन सेंटर कs बड़का पैरोकार हैन .. अउर अइसन कड़क अफ़सर बायन की बड़कन- बड़कन के नेकुरा रगड़े के पड़त बs.. नाही त ऊ कोर्ट कचहरी में खोंखते फिरत हैन..। इनकर बारे में इहे सरनाम बा कि चाहे केतनो लावा- दूध चढ़ावा , लेकिन भयवा इनकर होत सरकारी खजाने के केऊ उँगलिया न पइबा.. ई समझले रहा..नाही त टें हो जइबा..। त भयवा , इनकर लीला कs बखान मीरजापुरी , बनारसी, बलिया अउर प्रतापगढ़ी करते रहेन , अब सरकारी माल पचाये में नंबर एक रहलन ई इलाहाबदियन कs पैजमवा फटल जात बा.. बिचार ई भइल बा कि इनकर पुरुषार्थ के बिसराम देवे के लिए मीरजापुरी अखाड़ेबाजन के लगायल जाए..अउर होली के भोरीहरिया में डाक्टर साहब के इहाँ बौरउवा एवार्ड देवे खातिर अमरदीप भैया के रिसार्ट रिट्रीट में बुलायल जाए..। काहे से की बड़कन- बड़कन हथियारबंद पुरुषार्थीयन कs पिचकारी इहे मैरिज हाल में अठन्नीवा कुलफी की तरह चुचुक गइल बा..। अब डाक्टर साहब शक्ति परीक्षण कs बारी बा.. पर सवाल ई फंसल बा कि ठंडाई में ऊ समान मिलाए कs काम केके सौंपल जाए.. त इकरे लिए सिक्रेट टीम बनल बा .. जेमे नामित मेंबर हैं गैलेक्सी होटल कs बजनिया रजी मियां, शक्ति मंच कs पुरनका अखाड़ेबाज ठाकुर सिद्धन भैया, सत्येंद्र फटेल, ठाकुर ज्ञानप्रताप गुड़गोबर अउर गुरुवर भगवा पछाड़ पद्मदेव दुरवेदी ..।
इहे दिन रसड़ा नरेश बाबू उमाशंकर विधायक के भी बुलउवा बा.. काहे से की फाइनेंसर त उहे हैन ..जिनकरे प्रताप से कभो बलिया ही नाही यूपी कsबड़कन से लइके लटकन तक चिचियात रहेन .. एकरे लिए विधायक बाबू कs दुलरुआ भौकाली सरदार सोनू सिंह के ठुनकियायल जात बा..।
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अफीमची हई कs रे ! अइसन हूरा हूर देइब न ...
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पिछले अखिलेश सरकार में मनिस्टर रहलेन अपने कैलाश चउलसिया भइया न जाने कउन अफीम ई समाजवादी नेतवन के चटा दिहले हैन कि लोहवा ट्रस्ट के नउका सरदार चउदली देवी परसाद , प्रदेश सचिव जोहाजिर लाल मोरिया उअर सहकारी बैंक क पूर्व फेयरमैन सुरंग फटेल एडवोकट कs बौराहट बढ़ते जात बा... ।
बिल- बिलुक्का छोड़ अब त ई अइसन फुंफकारत हैन की इनकर जोड़दारन कs पैजमवे तर होइ जात बा..। मंत्री जी कs एगो इहे कहानी बा कि हम कउनो गांधी बाबा क ऊ बंदर नाही हईं कि आँख -कान मूंद के मुहँवा पे ताला मार लेई.. ई फोटू में तोहरा के लउकत बा न कि हम के हई.. ? त भयवा हमके बऊवा समझे क तनिको भूल न करें .. हम त हल्ला बोल पार्टी क मेंबर हई... अइसन हूरा हूर देइब न कि चुनउवा तक निपटते रह जइबे..। अउर दवाई खातिर पप्पू भाई कs डायल मेडिकल पर गिड़गिड़इते रहबा.. काहे से कि उहो ठन-ठन गोपाल हैन ई घरी..। अउर इहो जानत रहा कि हमार संगी है आयरन मैन धीर प्रताप जायकेवाली , कामिक्स में त इनके पढ़ले होबा न..। वइसे त सेक्युलर फ्रंट पर अउरो पर्टियन कs मूषक चंद्र मास्टर हमारे संग हैन.. जइसे कांग्रेस कs ई दू गो सरदार आशीष बुधुआ अउर मनोज खंड- खंड वाले तोहे लउकत है की नाही..।
.... भयाकुल पथिक
सच्चा सम्मान
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर नगर के कई स्थानों पर सम्मान समारोह आयोजित था। ऐसी गोष्ठियों में नारी सशक्तिकरण पर बढ़-चढ़कर चर्चा हो रही थी। समाजसेवा सहित अन्य क्षेत्र में पहचान रखने वालीं महिलाएँ, आयोजक एवं मंच संचालक पूरी तैयारी से आये हुये थे। आधी आबादी के समर्थन में , उनके विकास, समानता के अधिकार और मान-सम्मान पर हो रहे आघात के लिए शेष आधी आबादी के तथाकथित दोषियों के विरुद्ध आग उगलते एक से बढ़कर एक शब्दबाणों ने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिये थे। जिससे तालियों की गड़गड़ाहट से कार्यक्रम स्थल गुंजायमान हो उठा था।
मुख्य अतिथि से सम्मान पत्र लेने के लिए कार्यक्रम में सभ्य समाज की आमंत्रित महिलाओं के चेहरों पर मुसकान था। संचालक प्रत्येक का नाम पुकारता और फिर जैसे ही वह उनके सामाजिक कार्यों का वर्णन करता; कक्ष एक बार पुनः इनके जयघोष से गूंज उठता था। इस सफल कार्यक्रम से सभी हर्षित थे। सेल्फी और ग्रुप फोटोग्राफी के माध्यम से इन यादगार पलों को तत्क्षण सोशल मीडिया में साझा किया जा रहा था।
इन महिलाओं के मध्य एक भी स्त्री ऐसी नहीं दिखीं, जो श्रमिक वर्ग से हो, जिनके श्रमजल अश्रु बन मुसकाते हो , क्योंकि यहाँ भी जुगाड़तंत्र का कड़ा पहरा था, तो फिर इस वर्ग की महिलाओं की खोज की आवश्यकता ही किसे थी कि उन्हें भी महिला दिवस पर सम्मान मिले।
उधर, इस आयोजन से दूर शहर के मध्य स्थित सभ्य जनों की रैदानी कालोनी के समीप एक अस्सी वर्षीया वृद्धा गिट्टी तोड़ रही थी। ऐसे किसी समाजसेवक की दृष्टि उसकी ओर नहीं गयी थी। उसके श्रम को पुरस्कृत करना तो दूर, सम्भवतः किसी ने उसे सम्मान से पुकारा भी न होगा। इनमें से किसी को भी उसमें कोई रुचि नहीं थी। वह बुढ़िया सिर झुकाएँ पत्थर तोड़े ही जा रही थी।
अचानक आज का दिन उसके लिए तब विशेष हो गया, जब मंडलीय अस्पताल चौकी प्रभारी रामवंत यादव की नज़र पड़ गयी । धूप में ईंट-पत्थर तोड़ती वृद्धा को पूरे जोश के साथ अपने बुढ़ापे को चुनौती देते देखकर वे बिल्कुल चकित रह गये।
यह सोचकर कि वह निराश्रित होगी, इसी जिज्ञासा में उन्होंने उससे प्रश्न किया- " मैया , क्या घर पर कोई नहीं है ? "
"नाही दरोगा बाबू , सबलोग हैय अउर ऊ हमके मानत भी हैन ..।"
वृद्धा की ये बातें उपनिरीक्षक श्री यादव को पहेली-सी लगी। अतः उन्होंने उससे इस अवस्था में अर्जुनपुर गाँव से शहर आकर इतना कठोर परिश्रम करने का कारण जानना चाहा।
वृद्धा ने स्वाभिमान से कहा- ''जब तक भुजाओं में बल है , तब तक वह मेहनत- मशक्कत से पीछे क्यों हटे।"
नारी दिवस पर उस अनपढ़ वृद्धा की कर्मठता के समक्ष दरोगा जी नतमस्तक थे । वे मन ही मन बुदबुदाते हैं कि "काश ! किसी विशेष दिवस पर ऐसी भी महिलाओं को प्रतिष्ठित मंच से सम्मान मिलता।"
और तभी श्री यादव को ख्याल आता है कि वृद्धा भूखी भी हो सकती है। प्रतिउत्तर में जब उसने सकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाया तो चौकी प्रभारी श्री यादव ने बड़ी आत्मीयता से उस वृद्ध मैया को भोजन ग्रहण करवाया । इस पर बुढ़िया की आँखें छलक उठीं। वह दरोगा बाबू को अपने संतानों से भी कहीं अधिक दुआ देती है।
आज नारी दिवस पर किसी स्त्री का एक पुरूष के हाथों यह सबसे बड़ा सम्मान था।
- व्याकुल पथिक
सूना आँगन
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बाहर बाजार में ख़ासी चहलपहल है। सभी अपने सामर्थ्य के अनुरूप ख़रीदारी करने में व्यस्त हैं । कार एवं बाइक से पत्नी और बच्चों के संग पुरुष नगर के छोटे-बड़े वस्त्रालय की ओर निकल पड़े हैं। जिनकी आय बिल्कुल सीमित है , ऐसे परिवार की महिलाएँ भी फुटपाथ पर लगे कपड़े की दुकानों पर दिख रही हैं। पर बच्चों की विशेष रुचि तो रंग एवं पिचकारियों में ही होती है।
वे ज़िद मचाए हुये है -" पापा वहाँ चलिए, यह देखिए ,मुझे तो इसे ही लेना है। "
गृहणियों ने पहले से ही गुझिया एवं मालपुआ बनाने के लिए पतिदेव से खोवा और मेवा लाने की फ़रमाइश कर रखी है। हाँ, अनेक सम्पन्न घरों में होली के ऐसे ख़ास पकवान भी अब तो बने बनाए ही किसी प्रतिष्ठित मिष्ठान भंडार से आ जाते हैं। भले ही उसमें घर जैसे स्नेह भरा स्वाद न हो, पर क्या फ़र्क पड़ता है। यह कृत्रित युग है। बस जेब खाली न हो।
और उधर,पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त अर्पित अपने हृदय के सूने आँगन को टटोल रहा था । उसके पास और है भी क्या काम ? ऐसे पर्व पर अपने जीवन के दर्द और शून्यता को समेटने में उसे स्वयं से कठिन संघर्ष करना पड़ता है। वह कभी महापुरुषों की तरह अपने व्याकुल मन को समझाता है, तो कभी किसी विदूषक-सा खिलखिलाने का स्वांग रचता है और जब फिर भी मन-आँगन का सूनापन दूर नहीं होता है, तो उसे अश्रुबुंदों से तृप्त करने का असफल प्रयत्न भी करता है।
तभी उसे अचानक अपने घर की याद आती है। वह आशियाना जिसे छोड़े तीन दशक हो गये
हैं। फिर भी जब कोई उससे पूछता, तब अपना स्थाई पता-ठिकाना बताने में उसे गर्व की अनुभूति होती रही कि इस मुसाफ़िरखाने से इतर वहाँ उस शहर में उसका अपना भी एक पुश्तैनी मकान है।
कितनी ही होली एवं दीपावली उसकी इसी घर में गुजरी हैं। वह आँगन जहाँ कृष्णजन्माष्टमी और सरस्वती पूजन पर्व पर अर्पित अपने कलाकौशल को भगवान जी के श्रीचरणों में समर्पित किया था । हाँ, वहीं आँगन जहाँ ग्रीष्म ऋतु में पानी भरे टब के समीप अपने भाई-बहनों के साथ बैठकर खूब शरारतें किया करता और वर्षा ऋतु में उसकी नाली बंद कर कागज की नाव चलाता था । काश.. ! वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी लिए उसका निश्छल बचपन फिर से वापस लौट आता।
अपने घर-आँगन का स्मरण कर अर्पित का मन भारी होने लगा था। विकल हो वह अपने सिरहाने रखी पानी की बोतल उठाता है। परंतु समय तेजी से पीछे भाग रहा था।
अरे हाँ ! अभी घर पर होता तो गुझिया बन रही होती । नये वस्त्र साथ में पिचकारी और रंग इत्यादि सामग्री अब तक आ गयी होती । इसी आँगन में तो छोटा ड्रम भर कर रंग घोलकर दिया करते थे,पिताजी। तीन घंटे तक घर के बाहर वाली गली में रंग डालने की छूट मिलती थी और ठीक बारह बजे फिर से वे दोनों भाई उसी आँगन में स्नान के लिए हाज़िर होते थे । मुख पर लगे रंग छुड़ाने में कुछ अधिक ही व़क्त लगता था। वह बार-बार आईना देखा करता था । तभी माता जी की आवाज़ सुनाई पड़ने लगती थी- " चलो, ऊपर आ जाओ तुम सभी । भोजन का समय हो गया है। "
अभिभावकों का अनुशासन कुछ अधिक ही था। अतः ना-नुकुर करने की गुंजाइश कम होती थी। दहीबड़ा, कांजीबड़ा सहित अनेक पकवान सामने देख दोनों ही भाइयों एवं बहन के चेहरे पर चमक क्या आती थी कि उनके अभिभावकों की खुशी पूछे मत।
परंतु ,अबतो इन तीन दशक में घर के भोजन की थाली का स्वाद कैसा होता है , यह अर्पित भूल चुका है और ऐसे विशेष पर्व उसके लिए अनेक बार व्रत-उपवास की दृष्टि से उपयोगी साबित हुये हैं।
ख़ैर, वह व़क्त उसके अभिभावकों के लिए संघर्ष भरा था। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी , परंतु कठोर श्रम , अर्जित धन का अपव्यय न करना एवं अनुशासन , इन तीन गुणों के कारण उसका परिवार खुशहाल था।
जिसका परिणाम रहा कि उस सरस्वती मंदिर की स्थापना ,जिससे उसके अभिभावकों को अपने जीवन में प्रथम बार धनलक्ष्मी की प्राप्ति हुई थी। जिस कारण उनके जीवनशैली एवं विचारों में भी परिवर्तन आने लगा , वहीं अर्पित ने भी किशोरावस्था से आगे की ओर पाँव बढ़ा दिया था।
आधुनिक सभ्य समाज के तीन प्रमुख गुण मिलावट, बनावट एवं दिखावाट से दूर रहने के कारण अर्पित अभिभावकों के स्वभाव में हो रहे इस बदलाव को सहन नहीं कर पा रहा था। अतः अपने कालेज का मेधावी विद्यार्थी होकर भी उसकी शिक्षा अधूरी रह गयी।
वह अपने घर-आँगन से दूर ममता के सागर की खोज में निकल पड़ा। और समय के साथ जमाने भर की ठोकर ने उसे कटी और फटी पतंग बना तमाशाइयों के पाँव तले कुचलने को विवश कर दिया था ।
परंतु अर्पित न थका- न रुका , वह संघर्ष का पर्याय बन गया था , क्योंकि उसके हृदय- आँगन में आशा की एक किरण जगमगा रही थी और आँखों में एक सपना तैर रहा था कि इस खूबसूरत दुनिया के झिलमिल सितारों भरे आँगन में कोई तो ऐसी भी प्रेम की गली होगी जिसमें उसका भी अपना छोटा-सा घर होगा।
स्नेह के इसी दो शब्द के लिए वह इस जग में जहाँ माँ जैसा ममत्व की तलाश में था , तो वहीं यह सभ्य समाज उसे अपने स्वार्थ के तराजू पर तौलते रहा । उसकी मासूमियत उसके लिए अभिश्राप बन गयी। उसके मन का आँगन सूना ही रह गया। उसकी सारी खुशियाँ उसकी माँ की चिता की राख जैसी बन चुकी थी और अब तो यही उसका अपना आभूषण है। यही नहीं , उसका वह पुश्तैनी घर भी अपना नहीं रहा। पिछले माह ही तो यह दुःखद सूचना मिली थी कि उसे भगोड़ा बता कर उसके परिवार के शेष सदस्यों ने मकान को बेच दिया है।
अथार्त वह पूरी तरह से बंजारा हो चुका है। इस समाचार के मिलते ही उसकी वेदना चरम पर पहुँच चुकी थी। जिस घर को विशेष पर्व पर वह स्वयं सजाया करता था। आँगन के पीछे स्थित उसका शयनकक्ष, जिसमें रखी अटैची, अलमारी और वह कमंडल जो उसकी दादी की आखिरी निशानी थी । सबकुछ छोड़ कर ही तो वह घर से निकला था,तो अब क्यों उसका हृदय चीत्कार कर रहा है ? इसलिए न कि जिस घर के आँगन ने उसके परिवार के चार-चार सदस्यों के पार्थिव शरीर को अपना हृदय पत्थर -सा कठोर कर संभाला था , उनके ही प्रियजनों ने उसका सौदा कर दिया ।
उह ! इतनी भी निष्ठुरता क्यों ? उसने तो कभी भी अपने घर के आँगन का बँटवारा नहीं चाहा था। वह अपना अधिकार तक इसपर से तीन दशक पूर्व छोड़ कर चला गया था, क्यों कर दिया गया फिर पूर्वजों की इस आखिरी पहचान का सौदा ?
अबतो अर्पित के शुभचिंतक तक उसे बुद्धू कह कर उसके इस त्याग पर परिहास कर रहे हैं। उनका कहना है कि तुम्हें भगोड़ा भी बता दिया गया, बावजूद इसके तुमने इस पैतृक सम्पत्ति में से अपने अधिकार को पाने के लिए कोई संघर्ष नहीं किया। हाँ, तभी तो तुम सच में भगोड़े हो.. भगोड़े । इसलिए जीवन में कुछ नहीं पाया और सुनो.. ! तुम्हारे मन का यह सूना आँगन इसीप्रकार हर पर्व पर तुम्हें तड़पाता, तरसाता एवं रुलाता रहेगा । कभी नहीं बसेगा इसमें किसी का प्यार।
- व्याकुल पथिक
झुठ्ठा... !
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( दृश्य -1)
नये साहब ने आते ही ताबड़तोड़ छापेमारी कर जिले को हिला रखा था.. उनका एक पाँव दफ़्तर में तो दूसरा फ़ील्ड में होता .. जिस भी विभाग में पहुँचते ,वहाँ के अफ़सर से लेकर स्टॉफ तक पसीना पोंछते दिखते.. उपस्थिति पंजिका और भंडारगृह पर उनकी पैनी निगाहें थीं ..।
जनाब ! ग्रामीण क्षेत्र में लगे हैंडपंपों की पाइप तक निकलवा बोरिंग की जाँच करवाने लगते..उनकी हनक की धमक अगले दिन अख़बारों की सुर्ख़ियाँ होतीं..।
वे फरियादियों और मातहतों से धर्म-कर्म की बातें भी गज़ब की किया करते थे ..।
उधर, नये हाकिम की ईमानदारी के किस्से सुनकर नेकराम ख़ुशी से फूला न समा रहा था..।
उसे पूरा विश्वास हो गया था कि उसके मुहल्ले में चल रही तेल,घी और मसाले की नकली फैक्ट्री का भंडाफोड़ ऐसे ही अफ़सर कर सकते हैं..।
वैसे तो , सेठ दोखीराम के काले धंधे को जानते सभी थे ..लेकिन , क्या मज़ाल कि उसके कारख़ाने की ओर भूल से किसी परिंदे ने भी पर मारा हो..।
उधर, नये साहब की इस धुँआधार छापेमारी के समाचार के मध्य नेकराम रोज़ाना ही यह बाट जोहता कि उनका पदार्पण उसके मुहल्ले में कब होगा ..। अब तो उनको आये भी माहभर होने को था, पर उसे आश्चर्य इस बात पर था कि उसके इलाक़े में न तो उनका खौफ़ दिख रहा है और न ही दोखीराम के काले क़ारोबार पर कोई आँच आ रही है ..।
वह समझ गया कि सेठ के जुगड़तंत्र ने उसके धंधे की भनक को नये अधिकारी को नहीं लगने दिया है..और फिर एक दिन नेकराम ने हिम्मत जुटा कर बिल्ली के गले में घंटी बांधने की ठान ली..वह सीधे जा पहुँचा नये हाकिम के दफ़्तर..।
अफ़सर - " हाँ , तो बोलो क्या बात है ? "
नेकराम -" साहब , सबके सामने न बोल पाऊँगा , इसमें लिखा है...। "
उसने हाथ में ले रखे पर्ची की ओर संकेत किया..।
" हूँ ..! "
- अफ़सर उससे वह कागज़ ले बड़े ग़ौर से देखता है ..। उसकी आँखों में एक चमक- सी आ जाती है..।
" साब ! मेरा नाम गुप्त रहे.. ' जल में रह मगर से बैर' लेने की मेरी औक़ात नहीं ..।"
- हकलाते हुये नेकराम ने अपनी चिन्ता जाहिर की थी ..।
" अरे भाई ! चिन्ता न कर.. कल मैं स्वयं आऊँगा..। "
- शाबाशी देते नये साहब ने उसकी पीठ थपथपाई थी..।
- साहब के ठोस आश्वासन और मुखमुद्रा पर मुस्कान देख नेकराम को पूरा विश्वास हो गया था कि अब सेठ दोखीराम के बुरे दिन आने को है । अतः उसने जोश में आकर इस कॉकस में सम्मिलित कई कनिष्ठ अधिकारियों के नाम वाला दूसरा चिट्ठा भी उन्हें सौंप दिया था..।
( दृश्य- 2 )
हाकिम की पूरी टीम को लिए आधा दर्जन गाड़ियाँ दनदनाती हुई अलसुबह ही फैक्ट्री में जा घुसी , छापेमारी से पूर्व किसी को भनक तक नहीं लग सकी थी..।
सेठ दोखीराम का चेहरा सफेद पड़ गया था..। देर शाम तक मीडियावाले भी बाइट के लिए डटे रहे ..। ख़ासा मजमा लगा हुआ था मुहल्ले में..।
तमाशाइयों में कोई कहता कि आज तो गया यह सेठ काम से.. सुना है कि बड़ा कड़क अफ़सर है नया साहब ..। सरकारी वेतन को छोड़ ऊपरी कुछ लेता नहीं..।
तो वहीं कुछ बुद्धिमान लोग मुस्कुराते हुये इनसे सवाल करते कि हाथी के खाने का दाँत देखा है क्या तुमने ?
छापेमारी टीम के प्रस्थान के पश्चात नेकराम रातभर इसी सोच में करवटें बदलता रहा कि जरा देखा तो जाए कि सेठ के विरुद्ध पुलिस ने क्या मामला दर्ज किया है..।
( दृश्य-3)
अगले दिन सुबह समाचार पत्रों को देखते ही नेकराम का मुख मलिन पड़ जाता है..।
" हे भगवान ! यह कैसे हो गया.. ? नहीं - नहीं ऐसा नहीं हो सकता है.. !!"
- नेकराम बुदबुदाता है..।
उसी नये अफ़सर के हवाले से छपी इस ख़बर
' आल इज ओके ' के साथ उसे यह भी पढ़ने को मिला था कि किसी पड़ोसी ने द्वेष भावना से धर्मात्मा सेठ के विरुद्ध झूठी शिकायत की थी..।
साथ ही समाचार पत्रों में आगे यह भी लिखा हुआ था कि सेठजी का नागरिक अभिनंदन ' भ्रष्टाचार मिटाओ ' संस्था के बैनर तले किया जाएगा.. जिस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्वयं नये साहब ही होंगे..और दोखीराम जी नये साल में अपनी फैक्ट्री की ओर से किये जाने वाले धर्मार्थ कार्यों जैसे निर्धन कन्याओं का विवाह , गरीब मेधावी छात्रों को आर्थिक मदद और मुहल्ले में स्थित मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए मोटी रक़म देने की घोषणा इसी मंच से करेंगे..।
पासा उलटा पड़ा देख , नेकराम अज्ञात भय से सिहर उठा था ..।
सप्ताह भर बाद नेकराम पर दुष्कर्म का मामला दर्ज हो जाता है.. हालाँकि उसपर लगा आरोप बिल्कुल झूठा था ..परंतु वह जेल चला जाता है.. बंदीगृह में विक्षिप्त- सा हो गया था नेकराम.. जुगाड़तंत्र ने उसके स्वाभिमान को बड़े ही निर्दयता से कुचल दिया गया था.. ।
यहाँ तक कि कोर्ट-कचहरी के खर्च और आरोप लगाने वाली महिला से सुलह- समझौता करने में उसका घर तक बिक जाता है..।
घर खाली कर जब वह जा रहा होता है..तो मुहल्ले वाले तंज़ कसते है.. बड़ा तोप बन रहा था ससुरा..।
राम - राम ! ऐसे धर्मात्मा सेठ को फंसा रहा था..अब भुगते अपने करनी का फल..।
मुहल्लेवासियों के मुख से ऐसे कठोर वचन सुन नेकराम की आँखें डबडबा गयी थीं..उसका हृदय यह कह चीत्कार कर उठा था कि उसने तो सबकी भलाई के लिए ही इतना बड़ा खतरा मोल लिया .. और उसके साथ हुये इस अन्याय का प्रतिकार न सही, पर यह तिरस्कार क्यों कर रहे हैं ये सभी ..?
..अपने ही मुहल्ले में पल भर ठहरना भी अब उसके लिए भारी पड़ रहा था..।
वह समझ चुका था कि नये साहब की ईमानदारी पर उसका विश्वास ही झूठा था .. !
अन्यथा यह तथाकथित सभ्य समाज उसे " झुठ्ठा " क्यों कहता...?
- व्याकुल पथिक
क्यों कैक्टस बना ?
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मरुस्थल में पला
काँटों से बना
कैक्टस-सा बढ़ा
औषधि से हूँ भरा।
पतझड़ में रहा अड़ा
वैसे ही अचल खड़ा
वक़्त जैसा भी रहा
रंग मेरा सम रहा ।
सही प्यास उर की
तपिस से नहीं डरा
हर सांस लड़ता रहा
ज़िंदा पर मैं रहा ।
दुष्काल जब पड़ा
आहार तब मैं बना
फिर ऐसा क्या हुआ ?
बेगानों में था खड़ा ।
झूठा-सा सबकों लगा
आँखों में उनकी गड़ा
छल अपनों का सहा
क्यों मैं कैक्टस बना ?
फूल मुझपे भी रहा
लाल रक्त-सा खिला
बागवां न कोई मिला
संघर्ष क्यों व्यर्थ गया ?
उपकार से रहा भरा
सबकी बुराई को हरा
दुत्कार फिर भी सहा
अभिनंदन से दूर रहा ?
दाना-पानी के बिना
भूरे वन में रहा हरा
जिजीविषा येही मेरी
एक सुंदर सच रहा..!!!
- व्याकुल पथिक
मेहंदी के रंग..
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केश कटाने के बाद उसपर सफेदी कुछ अधिक ही झलक रही थी। सो, वर्षों बाद प्रफुल्ल ने स्वयं अपने हाथों से मेहंदी लगा ली .. ।
दर्पण में इन चमकीले बालों को देख एक फीकी मुस्कान संग वह स्वयं में खो गया था कि तभी किसी ने पुकारा ..।
वो हैंडसम ! ..आज तो बड़े स्मार्ट दिख रहे हो .. कहीं कोई ..?
अरे ! ये किसने टोका..सकुचा सा गया था प्रफुल्ल ..। मानों चोरी पकड़ी गयी हो। वह पलट कर देखता है , परंतु कोई तो न था वहाँ.. जो अपने थे , वे कब के उसे छोड़ चले ..।
उफ ! ये स्मृतियाँ भी न..।
फिर से उसका मन कसैला हो उठा था। वही भूली बिसरी यादें टीस बन उसके हृदय को कुतरने लगी थीं..।
ये हिना भी कैसे रंग बदलती है.. । बचपन में तीज- करवाचौथ पर्व पर वह अपनी माँ के दाहिने हाथ पर मेंहदी रचता था..तो उसे ढेरों आशीष मिलता था ..। उस समय कोई ब्यूटीपार्लर था नहीं । घर में और कोई महिला भी नहीं थी। अतः माँ के दाँए हाथ का सूनापन उसकी ही चित्रकारी से दूर होता था.. खुश होकर वो कहतीं कि तेरी दुल्हनिया तो सिर-आँखों पर तुझे बैठा कर रखेगी।
पर मम्मी आपको पापा क्यों नहीं मेंहदी लगा देते हैं ? उस दिन तो रामायण पढ़ते समय आप कह रही थीं कि वन में भगवान राम ने माता सीता का पुष्पों से श्रृंगार किया था..।
उसकी पेंचीदगी भरे ऐसे सवालों का भला क्या जवाब देतीं वे भी ? बस इतना कहती थीं --चल हट यहाँ से -- सब तेरे जैसे नहीं हैं ।
प्रफुल्ल की कोशिश यही होती थी कि वह अपनों को प्रसन्न रखे। स्नेह भरे संबंधों पर कृत्रिमता का रंग न चढ़ने पाए और वह बिल्कुल हिना के रंग की तरह सुर्ख हो..।
लेकिन, बचपन में हथेली पर रची मेहंदी के चटख रंग के मामले में बाजी उसके बहन-भाई के हाथ लगती थी । यह देख उसका मन डूबने लगता था .. क्यों कि घर की महिलाओं को उसने यह कहते सुना था कि जिसके हाथों पर मेंहदी खिलती नहीं, उसे प्रेम करने वाला जीवनसाथी नहीं मिलता..। उस जमाने में दाम्पत्य जीवन में प्रीति की यह मेहंदी भी एक परीक्षा जैसी ही थी..।
और समय के साथ उसकी आशंका सत्य में परिवर्तित होती गयी। जैसे-जैसे मेहंदी का रंग कृत्रित होता गया..उसके वे सभी अपने जो उसे औरों से अलग बताते थे .. उसे बुरे इंसान का खिताब दे चलते बने..।
काश ! उसे भी बाजारों में मिलने वाली मिलावटी, बनावटी और सजावटी मेहंदी की तरह दो-चार दिनों में ही रंग बदलना आ गया होता..
परंतु उसे तो उस उपवन की सुंगधित मेहंदी की चाह थी , जहाँ वह अपनी दादी संग जाया करता था.. वह हिना जो एक बार हाथों पर चढ़ जाती , तो उसकी लालिमा उतरती न हो .. ।
हाँ, इसके लिए सिल-बट्टे पर अपने स्नेह भरे हाथों से उसे रगड़ना पड़ता था..।
प्रफुल्ल ने भी अपने ऐसे संबंधों को इसी प्रेम भाव से संभालना चाहा था..।
लेकिन, वह भूल गया कि यह कृत्रित मेहंदी का युग है..।
" यूज एंड थ्रो ..! ओह ! तभी उसे भी ऐसा ही समझा गया ..। "
- भारी मन से कुछ ऐसा ही बुदबुदाते हुये प्रफुल्ल बिस्तर पर जा गिरता है ।
रात होते-होते उसका सिर भारी हो गया । पेट में ऐंठन होने लगी । बुखार से शरीर तपने लगा था । वह समझ गया कि वर्षों बाद मेहंदी का स्पर्श उस पर पुनः भारी पड़ा है..।
हाँ , पहले यह हिना उसके मन को छलती थी,..किन्तु इसबार उसके दुर्बल तन से भी उसने भरपूर वैर निकाल लिया ..।
उसकी( प्रफुल्ल) खुशियों से उसे इतनी घृणा क्यों है.. ? फिर क्यों वह ही मेहंदी को मान दे। बाजार में उसके लिए कृत्रिम रंगों की क्या कोई कमी है..?
तो क्या वह भी औरों की तरह हो जाए..भावुक व्यक्ति के अंतर्मन का यह द्वंद भी कैसा विचित्र है !!
- व्याकुल पथिक
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विश्वास
" हमारे पास इतनी सकारत्मक उर्जा है कि वह आपकी नकारात्मकता दूर कर देगी .. । "
एक भद्र महिला का मैसेज देख सुधीर पशोपेश में पड़ गया ..।
उसे तनिक भी लालसा नहीं थी कि वह किसी स्त्री से बात करे.. पहले से मिली चोट पर नश्तर रखना कितनी बुद्धिमानी है ? उसका हृदय गवाही नहीं दे रहा था..।
सो, उसने सामान्य शिष्टाचार का प्रदर्शन कर संवाद समाप्त करने का प्रयत्न किया..।
और एक दिन फिर संदेश आया - " लगता है कि आपको हमसे वार्तालाप में कोई रुचि नहीं है, हम ही व्यर्थ में ये लालसा रखते हैं..।"
इस बार उस स्वर में ऐसी आत्मीयता थी कि सुधीर की आँखें भर आयी थीं..।
उसे रुँधे गले से कहा -- " नहीं-नहीं , ऐसा न कहे, बस डरता हूँ --सच्चे इंसान कम हैं दुनिया में ।"
" परंतु मैं तो वैसी नहीं हूँ । विश्वास करें और मुझे अपना अच्छा मित्र समझें ..। "
मधुरिमा की शहद घुली वाणी से सुधीर के नेत्रों में अश्रुधारा बह चली.. ।
कुछ ही दिनों में मधुरिमा उसके अभिभावक की भूमिका में थी। ऐसा वह स्वयं भी कहती थी । अतः वह आज्ञाकारी बालक की तरह सिर झुकाए उसकी डांट को भी स्नेह का उपहार समझता । और हाँ, समय का मारा सुधीर मधुरिमा की तनिक सी नराजगी पर अधीर हो उठता था।
उसके भय पर मुस्कुराते हुये वह महिला मित्र विश्वास दिलाती -
" क्यों व्यर्थ में डरते हो। मैं स्वतः ही आप से बात कर रही हूँ न और यह जानती हूँ कि अन्य पुरुषों से आप अलग हो और मुझे आपसे कभी कोई परेशानी नहीं होगी..। "
उसका कहना था कि शुभचिंतक सदैव साथ रहते हैं और जो अपने नहीं हैं , वे साथ छोड़ने पर पलट कर देखते तक नहीं । मेरे शुद्ध स्नेह पर विश्वास करो, यह औपचारिकता मात्र नहीं है.. ।
सुधीर जब कभी मोबाइल पर वार्ता के दौरान उसके बच्चों को मम्मी -मम्मी पुकारते सुनता, उसे भी अपनी माँ के छाँव का एहसास होता ।
वह अपने नये अभिभावक से खुश था .. बहुत खुश ।
और एक दिन ..सुधीर अस्पताल में पड़ा था। अन्य मरीजों के तीमारदारों को देख उसका मन भी पवित्र स्नेह के दो शब्द के लिए न जाने क्यों मचल उठा..।
फिर क्या , विश्वास का यह डोर कच्चे धागे से कमजोर निकली .. सुधीर अपना अपराध पूछता रह गया था..।
और एक दिन फोन पर क्रोधित मधुरिमा ने उसे धिक्कारते हुये कहा -
" मुझे अपनी प्रेमिका समझ लिया था ? तुम तो बिल्कुल वैसे नहीं हो ।"
" हे ईश्वर ! संदेह का यह कैसा भँवरजाल ? क्या इसे ही विश्वास कहते हैं ? " - काँप उठा था सुधीर का अंतर्मन ।
उसके भावुक हृदय ने दुनियादारी जो नहीं सीख रखी थी ,परंतु हाँ इतना अवश्य जानता है कि विश्वास किसे कहते हैं..।
अतः वह ★ विश्वास ★ जो मित्रता के समय उसके प्रति मधुरिमा को था , उसे कायम रखने के लिए सुधीर ने अपनी वेदना पर प्रतिशोध के भाव को कभी भी भारी नहीं पड़ने दिया..।
पर जब इस तिरस्कार की पीड़ा असहनीय होती है, तो अपने दिल को समझाने के लिए यूँ गुनगुनाता है -
दुनिया ने कितना समझाया
कौन है अपना कौन पराया
फिर भी दिल की चोट छुपा कर
हमने आपका दिल बहलाया..।
- व्याकुल पथिक
गुरु पद पदुम पराग ...
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जीवन की पाठशाला से
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प्रेम दिवस ( वैलेंटाइन डे ) का आकर्षण इस छोटे से शहर में भी है। भँवरों का झुंड पराग की चाह में फूलों पर यूँ मडरा रहा है, मानों प्रणय के लिए कामदेव ने रति का आह्वान किया हो। बसंत की इस मादकता में कंचन एवं काँच की पहचान करना युवावर्ग के लिए जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा है।
परंतु ये कलियाँ क्यों इठला रही हैं, अभी तो परिपक्व भी नहीं हुई हैं , फिर प्रेम और वासना में भिन्नता को कैसे समझेंगी ?
सत्य तो यह है कि प्रेम का संबंध आत्मा से है न कि प्रकृति से। प्रकृति से जुड़े जीतने भी संबंध हैं , वह वासना है और प्रकृति तो परिवर्तनशील है, ऐसे में बाह्य संबंध किस तरह से स्थायी होंगे। जरा विचार करें आप भी।
वहीं, आत्मा अमर है, इसलिए जब हम ईश्वर को अपना प्रेम समर्पित करते हैं, तो उसमें निरंतर वृद्धि होती है और अंततः मीरा अपने आराध्य कृष्ण में समाहित हो जाती है , क्यों कि प्रेम में जयपराजय नहीं होती है। यहाँ दो का भेद नष्ट कर एकाकार हो जाता है। परंतु हम ऐसे कृत्रिम जीवन के अभ्यस्त हो गये हैं कि सहज प्रेम के निर्मल भाव को समझ ही नहीं पाते हैं।
पर मुझे क्या , जब ये कलिया असमय ही पराग एवं अनुराग से वंचित हो जाएँगी , तब स्वतः ही इश्क की खुमारी उतर जाएगी, नहीं आएगा इनके समीप फिर कोई भँवरा।
पास न आते भँवरे जिन फूलों के पास पराग नहीं
मिलन व्यर्थ है छलक सके जो आँखों से अनुराग
नहीं...
' महावीर प्रसाद ' मधुप ' की यह कविता संभवतः इन्होंने नहीं पढ़ी है ।
पत्रकार होने के कारण कुछ अधिक ही चिंतनशील हो गया हूँ।
और तभी यह गंभीर वाणी सुनाई पड़ती है - " पर उपदेश कुशल बहुतेरे..."
अरे ! ऐसा किसने कहा मुझसे , मैं तो इस स्नेह लोक का प्राणी नहीं रहा अब .. ?
" मूर्ख ! ये तो तुम्हारे गुरुदेव हैं। पहचना नहीं क्या इन्हें। "
-अंतर्मन के इस फटकार पर मैं चैतन्य हो गया था ।
हाँ, साक्षात गुरु महाराज ही तो हैं ये। वैसा ही श्वेत वस्त्र , केश रहित विशाल ललाट, मुखमंडल पर अद्भुत तेज एवं मंद-मंद मुस्कान ..।
प्रश्न उनका वही था -- लगभग तीन दशक पूर्व ' पराग और अनुराग ' के लिए तुमने मेरा आश्रम क्यों त्यागा था।
क्या तेरी यह खोज पूरी हुई ?
सत्य तो यही है कि मैंने जिस अनुराग के लिए आश्रम त्यागा था , उस लौकिक स्नेह के लिए जीवनपर्यन्त भटकता रह गया । जहाँ अनुराग ही न हो , वहाँ परागण ( पुष्प में परागकण का नर भाग से मादा भाग में स्थानांतरण ) क्या सम्भव है ? अतः परागकण की कामना निर्रथक रह गयी।
काशी में वह लघु आश्रम जीवन मेरी जिंदगी का एक ऐसा सुखद पड़ाव रहा है, जिसकी स्मृति मात्र से हृदय में पवित्रता , निश्छलता एवं निर्लिप्तता जैसे सकरात्मक भावों का संचार होने लगता है, चाहे वह क्षणिक ही क्यों न हो।
महापुरुषों की संगत एवं उनकी वाणी में ऐसा कौन सा ' पराग ' होता है , जो हमें अपरिष्कृत लौह से फौलाद ( इस्पात ) बना देता है ,यह तत्काल समझ में नहीं आता है। इसके लिए तपना होता है। गुरु के प्रति समर्पण और विश्वास होना चाहिए ।
जिसप्रकार गोस्वामी तुलसीदास को रहा-
बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ।
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू ।।
( मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है)
अन्यथा गुरु की कृपा शिष्य को नहीं मिलती है। जब मैं प्रस्थान कर रहा था ,तो गुरु ने भी मुझे नहीं रोका। हाँ ,यह कह सजग अवश्य किया था कि माया का बंधन अत्यंत प्रबल होता है, अनुराग और पराग के पीछे मत भाग ।
हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि सद्गुरु कम बोलते हैं और जब भी बोलते हैं ,तो उसमें शिष्य का हित निहित होता है। हम किसी भी संत-महात्मा की शरण में जाए , तो उनकी वाणी को आत्मसात करने करने का प्रयत्न करे, यहाँ तर्क को प्रधानता न दिया जाए। सेवा, आज्ञापालन एवं संग ये तीन गुण हममें होना चाहिए। जो उपदेश उन्होंने दिया उसका अनुसरण करना चाहिए ।
ऐसा न करने के कारण ही मैं ' गुरु पद पदुम पराग ' से वंचित रह गया।और अब मुझे यह दृढ़ विश्वास है कि गुरु के पास वह दिव्य दृष्टि होती है , जिससे वे शिष्य के भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों से अवगत होते हैं।
अतः मेरी अभिलाषा है कि मैं एक बार अवश्य अपने आश्रम स्थल पर जाऊँ और उस चबूतरे को जहाँ गुरुदेव का निवास था , नमन कर आऊँ।
धर्मशास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि तपोस्थली पर सदैव ऊर्जा प्रभावित होती है।
सम्भव है कि वह रज ( पराग) मेरे विकल हृदय में उस नवपुष्प का सृजन करे , जिसमें मानवता की सुगंध हो और जिस अनुराग से मैं वंचित रह गया , उसकी प्राप्ति हो जाए।
परंतु इसके लिए हमारा कर्म एवं उद्देश्य भी महान होना चाहिए।
- व्याकुल पथिक
प्रीति का ये कैसा रंग ..!
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" जान ! ये मेरा आखिरी वैलेंटाइन डे है।"
मोबाइल पर बात करते हुये सोनाक्षी कुछ इसतरह रुआँसी हो गयी थी कि सुमित तड़प उठा था।
उसने खुद को संभालते हुये कहा- " यूँ उदास न हो ,मेरे मनमंदिर में तुम सदैव रहोगी।"
सोनाक्षी- " मैं तो अगले वर्ष बहुत दूर चली जाऊँगी, परंतु तुम..?"
सुमित- " तुम्हारी ये तस्वीर है न..ताउम्र साथ निभाएगी .. । "
सोनाक्षी- " तुम भी न जान , पागल कहीं के .. काश ! मैं हमेशा केलिए तुम्हारी हो पाती ..।"
【 ठीक एक वर्ष बाद पुनः वैलेंटाइन डे पर..】
उदास सुमित मन की थकान मिटाने एक कॉफी हाउस में इंट्री करता है। तभी उसकी निगाहें पीछे की कुर्सी पर बैठी बादामी रंग का शूट पहने एक युवती पर जा टिकती हैं । हाथ में कॉफी का कप लिये खिलखिला रही उस लड़की को वह फटी आँखों से देखते रह जाता है..।
" अरे ! ये तो सोनाक्षी ही है। और साथ में यह युवक कौन है ? "
" केशव के फोटो से तो इसकी शक्ल मिलती नहीं है.. फिर कौन है ? "
जो दृश्य वहाँ देखा उसपर विश्वास नहीं कर पा रहा था सुमित..।
और फिर अगले दिन हृदय के बोझ को कम करने केलिए वह सोनाक्षी को फोन करता है।
" अच्छा- अच्छा , तो तुम हमारी जासूसी करने लगे हो..।"
क्रोध से तमतमाई सोनाक्षी का ऐसा कठोर स्वर सुनकर स्तब्ध रह गया था सुमित..।
सोनाक्षी - " अब देख ही लिया ,तो सुनो ..ये मेरा नया ब्वॉयफ्रेंड है..।"
" पर- पर , तुमने तो कहा था कि मेरे अलावा और किसी से बात तक नहीं करती हो.. तुम्हारी तो केशव से शादी होनी है ? .. और मुझे जो जान कह ' आई लव यू ' कहा करती थी , वह सब .. ? "
भारी हताशा में सुमित ने एक ही सांस में सारे प्रश्न पूछ डाले..।
किन्तु प्रतिउत्तर में सोनाक्षी जोर से ठहाका लगाती है.. ।
" क्यों बच्चों जैसी बात करते हो जासूस महोदय ..तुम मेरे हो कौन यह सब पूछने वाले.. ?
एक बात कान खोल कर सुन लो , यह जो मेरा नया ब्वायफ्रेंड है न , मैं इसकी बीवी भी नहीं बनने जा रही हूँ ..मेरा विवाह तो उसी बड़े घराने में होगा , जहाँ अभिभावकों ने तय कर रखा है। इकलौती बेटी और अपने घर की इज्ज़त जो हूँ मैं ?
और हाँ, सुनो यार ! ..यह दुनिया मौज मस्ती की है। तुम भी मेरे लिए टाइम पास थे और यह भी है .. ओपेन मांइड के हैं हम ..। "
सोनाक्षी ने बिना किसी ग्लानि के जिस उपहास भरे लहजे में उसके निर्मल प्रेम का पोस्टमार्टम कर दिया , उस वेदना से तड़प उठता था सुमित..।
उसके जीवन में अब फिर कभी वैलेंटाइन डे नहीं आएगा ..।
-© व्याकुल पथिक