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Sunday, 24 May 2020

कोरोना काल की त्रासदी

कोरोना काल की त्रासदी

   पिछले कई दिनों से यहाँ मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर विशेष श्रमिक ट्रेनों का आगमन होता रहा है। घंटों विलंब से पहुँची इन रेलगाड़ियों ने एक बार फ़िर साबित कर दिया कि संकटकाल में भी देश का यह प्रमुख मंत्रालय "इंडियन टाइम" का कितना बड़ा अनुयायी है।  रेलवे स्टेशन  के प्लेटफार्म पर उतरते ही इन प्रवासी श्रमिकों का जिले के वरिष्ठ अधिकारियों ने ताली बजा कर स्वागत किया, किन्तु कैसा करुण दृश्य रहा, जब कोई मासूम बच्चा अपने पिता की उँगली थामे उसे लगभग बाहर की ओर खींचते हुये कह रहा था -" पापा ! अब घर आ गया है ,जल्दी चलो न ?  " और माताएँ अपने ज़िगर के टुकड़े को अपने आँचल में छुपाएँ बाहर खड़ी बस की ओर टकटकी लगाए हुये थीं। रेलवे प्लेटफार्म पर उतरते ही इन सभी प्रवासियों के मलिन मुख पर  चमक सी आ गयी थी । किस तरह से उन्होंने लॉकडाउन के 50-55 दिन महानगरों में एक कैदी की तरह अल्प भोजन करके गुजारे थे, इसे क्या वे आजीवन भूल पाएँगे ? फ़िर भी ये भाग्यवान हैं, जिनके लिए सरकार ने ट्रेन और बसों की व्यवस्था कर दी ,अन्यथा अनगिनत श्रमिक मुम्बई, सूरत, पुणे और अहमदाबाद जैसे महानगरों से ट्रक, आटो और साइकिल से अथवा पैदल ही आये हैं , जिनके स्वागत के लिए मार्ग में अफ़सर नहीं मौत खड़ी थी। इनमें भी कई ऐसे अभागे बीमार लोग थे, जिन्होंने अपने घर के चौखट पर दम तोड़ दिया है। जिनके प्रति शोक संवेदना व्यक्त करने की जगह गाँव वाले उन्हें कोरोना वाहक बता भाग खड़े हुये। अपने जिले का लक्ष्मण माझी भी इनमें से एक था। वह हरियाणा से पहले किसी वाहन और फ़िर पैदल सफ़र तय कर अपने गांव आया था। उसका शरीर ज्वर से तप रहा था। वाहन से गिरने के कारण सिर पर चोट लगी हुई थी। फ़िर भी पूरे धैर्य के साथ  लड़खड़ाती हुई साँसों को संभाले प्रयागराज से विंध्यक्षेत्र की दूरी पैदल ही तय कर उस शाम वह अपने गाँव पहुँचा था । उसने घर के चौखट को चूमा,चार दिन पूर्व दाम्पत्य सूत्र में बंधे अपने पुत्र-पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और कुछ ही घंटों पश्चात लॉकडाउन से ही नहीं जीवन से भी सदैव के लिए मुक्त हो गया। 

         विपत्ति जब आती है,तो मनुष्य को चहुँओर से घेर लेती है।तनिक सोचें जरा उस माँ पर क्या गुजरी होगी, जिसने चलती ट्रेन में रेलवे स्टेशन जबलपुर से पहले बच्ची को जन्म दिया। 23 घंटे तक का माँ-बेटी का साथ रहा। तत्पश्चात इस श्रमिक ट्रेन में ही उसने आँखें बंद कर लीं। यह परिवार ट्रेन से मुम्बई से मुजफ्फरपुर जा रहा था। मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर नवजात के शव को बर्फ़ की सिल्ली पर रख उसे परिजनों को सौंप दिया गया।लॉकडाउन में मुंबई में फँसे इस श्रमिक परिवार की आँखों के आँसू भी कष्ट सहते-सहते सूख चुके थे।
       मार्ग में इन प्रवासी श्रमिकों को किस-किस ने नहीं लूटा। ट्रक चालक ने प्रत्येक यात्री से 35 सौ रुपये तक लिए। वह भी एक ट्रक में 70 से अधिक प्रवासी श्रमिक ठूँस दिये गये थे। भूख के समक्ष कैसा सोशल डिस्टेंस ? किस तरह से कर्ज़ मांग कर इन्होंने ये 35 सौ रुपये एकत्र किये, इसकी एक और करुण कथा है। विशेष ट्रेन की बात करें , तो सरकार अपनी पीठ थपथपा रही थी कि सभी प्रवासी श्रमिकों को मुफ़्त में ट्रेन का टिकट दिया गया है। परंतु यात्रियों ने बताया कि पुलिस की उपस्थिति में दलालों ने उनसे 6 सौ से 8 सौ रुपये लिया है। अर्थात उनके पास जो थोड़ा बहुत धन शेष था, वह भी "व्यवस्था" की भेंट चढ़ गया।  
    इधर, राजनीति के अखाड़े में क्या हो रहा है, यही न कि पक्ष-विपक्ष इन श्रमिकों की लाश पर अपनी सियासी रोटी सेक रहे हैं। जबकि इन श्रमिकों का प्रश्न यह है कि लॉकडाउन पार्ट-1 और 2 के दौरान सरकार ने उनको महानगरों से निकाल घर भेजने के संदर्भ में क्या किया ? यदि ऐसा होता तो लॉकडाउन-3 के दौरान धैर्य खो वे इस तरह से कष्ट सहते हुये पैदल ही मीलों सफ़र तय करने को बाध्य नहीं होते। आश्चर्य है कि एक साधारण मज़दूर भी इतनी समझ रखता है।अपनी जान सबको प्रिय है। न जाने क्यों हमारे रहनुमा इसे नहीं समझ सकें कि क्षुधातुर प्राणी को चंद्र खिलौना दिखला कर अधिक देर तक बहलाया नहीं जा सकता है।
  और यह कैसी विडंबना रही कि हममें से अनेक उस समय  पटाखे फोड़ दीपावली मना रहे थे ,जब ये प्रवासी श्रमिक मुंबई जैसे महानगरों में कोराना और भूख से संघर्ष कर रहे थे। वे बेरोज़गार हो गये थे। ऐसे श्रमिकों की क्षुधा तृप्ति के लिए थोड़ा सा छोला और चावल अथवा छह पूड़ी और आलू की सब्जी ,क्या इसे ही सरकारी लंच पैकेट कहते हैं? जबकि टेलीविज़न पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ सावधान कर रहे थे कि ऐसे समय में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए पर्याप्त और पौष्टिक आहार लिया जाए।

  •    आखिर क्यों इन श्रमिकों को कोरोना का आहार बनने के लिए छोड़ दिया गया? काश ! लॉकडाउन पार्ट 1 और 2 में धीरे-धीरे इन श्रमिकों की घर वापसी का प्रयास होता। महाराष्ट्र से प्रवासी श्रमिकों की गुहार यहाँ अपने जिले के अख़बारों के दफ़्तर में पहुँच रही थी। 

" मेरा परिवार  भूखा है। हमारे पास पैसे नहीं हैं।  हमें यहाँ से बाहर निकालो। हमारी जान खतरे में है । प्लीज़ , मदद करो भाई !"
  और उधर टेलीविज़न के स्क्रीन पर विभिन्न दलों के राजनेताओं का आपस में वाकयुद्ध चल रहा था। यदि इस वक़्त कोई आम चुनाव होता, तो पक्ष-विपक्ष के ये ही नेता इन प्रवासी श्रमिकों के दरवाजे पर दस्तक़ देते दिखतें। एक प्रत्याशी आम चुनाव में करोड़ों रुपया उड़ा सकता है, किन्तु ऐसी आपदाओं में वह सिर्फ़ घड़ियाली आँसुओं से काम चलाता है। दूसरी ओर करोड़ों- अरबों में खेलने वाली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लग्ज़री ओबी वैन ने ऐसी करुण पुकार लगाते लोगों का लाइव न्यूज़ तो ख़ूब दिखाया है, परंतु काश ! ऐसी कठिन परिस्थितियों में ये धन संपन्न न्यूज़ चैनलों के स्वामी अपने इसी वैन के साथ एक और वाहन भेज देते, जिसमें पीड़ितों के बच्चों के लिए खाने का कुछ सामान होता। तब इनकी भी संवेदनाओं की परख जनता को हो जाती । अन्यथा यह उक्ति "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" सरनाम है।  स्मरण रहे कि श्रेष्ठ पुरुष वह है, जो पराई पीड़ा को जान कर चुप नहीं बैठता है, बल्कि उनका उपकार करता है।
    शासन-सत्ता में बैठे राजनेता स्वयं ईमानदारी से बताए कि उन सघन इलाके में जहाँ लॉकडाउन के कारण श्रमिक फँसे हुये थे, सोशल डिस्टेंस का ध्यान रख पाना क्या संभव था ? यही कारण है कि अपने मीरजापुर जनपद में दिल्ली से आये तबलीग़ी मरकज़ के तीन जमातियों को छोड़ कर कोरोना के शेष जितने भी मामले आ रहे हैं, सभी का संबंध मुम्बई से है। 
   विद्वानों का कथन है कि राष्ट्र, समाज और परिवार तभी सुखमय होगा, जब हम समस्याओं पर अपने ही नहीं दूसरों के भी दृष्टिकोण से विचार करते हैं। तभी वह हल जो किसी पर थोपा हुआ नहीं लगेगा, बल्कि वह सर्वसम्मति से सबका उत्तर होगा। क्या हमारी सरकार भी ऐसा करती है ?
  वैसे भी श्रमिक तो ऐसे हिम्मती लोग हैं, जो मझधार में पड़े होकर भी तूफान की ताकत को परखते हैं। इनके हौसले को सिर्फ़ भूख ही तोड़ सकती है और यही हुआ है। अतः लॉकडाउन-3 का उल्लंघन किस विवशता में उन्होंने किया, किसकी नादानी से किया, राजनेताओं को इस पर आत्मचिंतन करना होगा । यदि हम इन श्रमिकों के अश्रु को मुस्कान में नहीं बदल सकें,इनके पसीने की बूँदों का मोल नहीं समझ सके , तो यह इनके भाग्य का अभिशाप नहीं,वरन् व्यवस्था का दोष है। 
       अभी तो एक और चुनौती का सामना घर वापसी के  पश्चात प्रवासी श्रमिकों को करना पड़ सकता है। क्यों कि इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि वर्षों बाद महानगरों से वापस घर लौटे श्रमिकों को अपने ही गाँव की माटी का रंग बदला नज़र आए अथवा इनके ही सगे-संबंधी इन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी समझ लें। यह "प्रवासी " होने का तमग़ा ऐसा ही होता हैं। अपने ही देश में एक प्रांत से दूसरे प्रांत में कोई व्यक्ति आजीविका की तलाश में क्या गया कि उसकी पहचान बदल गयी। उसके प्रति अपनों का दृष्टिकोण बदल गया। न वह यहाँ का रहा,न वहाँ का । ऐसा भी होता है। अतः इन प्रवासी श्रमिकों की अगली परीक्षा आजीविका की पुनः खोज होगी। देखना है कि हमारी सरकार इन श्रमिकों को इनके गाँव के आस-पास ही रोज़गार मुहैया करवाने के लिए क्या करती है।
    पूंजीपतियों की नगरी में वापस जाने की कल्पना मात्र से ये मज़दूर काँप उठ रहे हैं। 
महानगरों में ये भोलेभाले इंसान जिस प्रकार स्वार्थ के तराजू पर तौले गये हैं। जिसकी दहशत अब भी उनकी नम आँखों में है, इससे स्पष्ट है कि उनकी वापसी शीघ्र संभव नहीं है। इन्होंने इन महानगरों में अपने जीवन को संवारने का मन में एक काल्पनिक सुंदर चित्र बनाया था, किन्तु वापसी पर मैंने देखा इनके झोले में कुछ बर्तन और वस्त्र के अतिरिक्त कुछ भी कीमती सामग्री न थी। मैंने इन प्रवासी श्रमिकों की मनोस्थिति को समझने की कोशिश की, मानो वह कह रही हो-
" ऐसी दुनिया में मेरे वास्ते रखा क्या है ?"

                        
 - व्याकुल पथिक

Monday, 18 May 2020

अभिशप्त बचपन


अभिशप्त बचपन 
"चल निकाल, दस का फुटकर ! "
  संदीप भैया की आवाज़ सुनकर चारों लड़कियों के मासूम चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है। इनमें जो सबसे छोटी थी वह सिर पर से अपनी पोटली उतार कर ज़मीन पर रखती है और फ़िर एक..दो..तीन ..चार.. कुछ इस तरह बुदबुदाते हुये भीख में मिले सिक्कों की गिनती शुरू कर देती है। मैंने देखा कि उसे गिनती-पहाड़ा तो नहीं आता फ़िर भी हिसाब में पक्की थी। उसने सिक्कों के पाँच ढेर बना कर रख दिये और उन्हीं में से एक ढेर जिसमें एक-एक के दस सिक्के थे ,संदीप भैया को थमा दिया। 
     भैया ने उन चारों को दो-दो सिक्के दिये। वे मुझे बताते हैं कि लॉकडाउन में जब बाज़ार बंद है, तो उन्होंने उन सभी भिखारियों को, जो उनकी दुकान पर आते हैं एक की जगह दो रूपये देने का निर्णय लिया है, जबकि स्वयं उनका कारोबार  ठप्प है। मैंने धंधे में उतार-चढ़ाव को लेकर उन्हें कभी विचलित होते नहीं देखा। जीवन  में परिस्थितियाँ अनुकूल-प्रतिकूल चाहे जैसी ही, उनका यह समभाव मुझे पसंद है, इसी कारण मैं शाम का कुछ वक़्त यहाँ गुजारता हूँ। अपने विकल हृदय को समझाने का प्रयत्न करता हूँ कि स्वास्थ्य, सम्पत्ति और स्वजनों के वियोग को लेकर तू इतना अधीर क्यों है ? क्या जीवन की क्षणभंगुरता का तुझे बोध नहीं है ?
  
    वैसे, आज इन चारों बच्चियों से न जाने क्यों मुझे भी चुहलबाज़ी करने की इच्छा जग गयी थी । 
    मैंने उनसे कहा -" क्यों री ! पता है न लॉकडाउन है ,फ़िर भी तुम सब झुण्ड बनाए घूम रही है। चल तुम्हें पुलिस से पकड़वाता हूँ । "

   अभी मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उनमें से  जो सबसे समझदार थी, वह बिना भयभीत हुये तपाक से बोल पड़ी--  " जा-जा कह दा साब , ऊ पुलिस वाले त हमने के पैसा देत हैन अऊर खाना भी। "
   सच में उन चारों ने अपनी गठरी में खाने का सामान ले रखा था। मैंने अनुभव किया कि  लॉकडाउन भले ही इस सभ्य समाज के लिए अभिश्राप हो, लेकिन इन भिक्षुक बच्चों के लिए यह वरदान है। मैं इसी चिंतन में खोया रहा कि तभी बड़ी वाली लड़की आँखें मटकाते हुये बताती है कि प्रतिदिन पचास-साठ रुपये की कमाई के साथ अब भोजन के पैकेट भी मिलते हैं। 
     इस लॉकडाउन में इन्हें दुत्कार कम और  सामान अधिक मिल रहा है। अतः वे खुश थीं। मैंने इन चारों की ग्रुप फ़ोटोग्राफ़ी की। मेरे मोबाइल के स्क्रीन पर अपना फ़ोटो देख वे खिलखिला कर हँसी और मुझसे मोबाइल की कीमत पूछती हैं।
   मैंने भी  कहा- " बीस हजार , बता तो सही कितना हुआ ? "  
 जिसपर आँखें फाड़े वे कभी मुझे और कभी मोबाइल को देखने लगती हैं। ये बच्चियाँ सौ-पचास रूपये तो जानती हैं, किन्तु इससे अधिक की गिनती नहीं मालूम। हाँ, उन्होंने हजार रुपये का नाम सुन रखा था, पर बताने में असमर्थ थीं।
  उन्हें इसतरह सिर झुकाए देख मैंने आवाज़ ऊँची कर कहा -" स्कूल तो जाती नहीं फ़िर क्या बताओगी ? बस सुबह होते ही निकल पड़ी कटोरा लेकर भीख मांगने। "
  पत्रकार हूँ,तो यहाँ भी ख़बर ढ़ूंढने लगा। सो, अपनी बातों में उलझा कर मैं उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहता था कि क्या उनमें अब भी विद्यालय जाने की अभिलाषा शेष है ? 
मैं देख रहा था कि छोटी वाली बच्ची जिसने सिक्के गिनने के बाद जिस सलीक़े से से पोटली में गाँठ लगायी, उसका यह चातुर्य बालबुद्धि से परे है। जिस अवस्था में बच्चे स्कूल न जाने के लिए सौ बहाने बनाते हैं, उसी उम्र में यह लड़की अपने सिर पर यह छोटी सी पोटली नहीं, वरन् अपने घर-परिवार का बोझ उठा रही है। 

     परंतु मेरी वाणी में आयी इस कठोरता पर वे सहम गयी थी और बिना कुछ कहे गठरी अपने सिर पर रख चलने को हुईं, मैंने उन्हें फ़िर से रोक लिया और कहा- 
 " अच्छा चल यह बता कि तेरे माँ-बाप क्या करते हैं ? वे तुझे पढ़ने क्यों नहीं भेजते है ?

  जिस पर इन चारों लड़कियों ने बताया कि वे शहर के बाहरी इलाके में रहती हैं। उनके पिता कुछ नहीं करते हैं, जबकि महिलाएँ और वे सभी लड़कियाँ भीख मांगती हैं। सुबह होते वे अलग-अलग टोली में शहर की ओर निकल पड़ती हैं। उन चारों में अच्छी पटती है, सो वे एक साथ निकलती हैं। उन्होंने कहा कि वे नहीं जानती कि स्कूल कैसा होता है। हाँ, उन्होंने बच्चों  को स्कूल जाते देखा था और उनकी भी लालसा थी कि वैसा ही पोशाक पहन कर वे भी पढ़ने जातीं, परंतु यह कैसे संभव है।
  " पढ़े बेटियाँ, बढ़े बेटियाँ ", यह जो सरकारी जुमला है , इससे भिखारियों की बच्चियों के लिए साक्षर होना संभवतः नहीं है।
    ख़ैर, बच्चों की भिक्षावृत्ति के संदर्भ में संदीप भैया के संपर्क में आने से पूर्व मेरा दृष्टिकोण यह रहा कि इन्हें भीख देना अनुचित है। ऐसा करके हम इनके विकास का मार्ग अवरुद्ध कर रहे हैं। 
 एकदिन मैंने उनसे भी कहा था- " बूढ़े और अपंग भिखमंगों की टोली में आप इन मासूमों को भी न खड़ा करें, अन्यथा राष्ट्र के ये कर्णधार , भविष्य में उसपर बोझ बन कर रह जाएँगे ? " 
     प्रतिउत्तर में उन्होंने कहा था कि इन बच्चों का भविष्य उज्जवल हो,क्या इसके लिए ऐसी कोई व्यवस्था है ? कम से कम उनके द्वारा दिया गया यह एक-दो रुपया उन बच्चों के उदर को तो तृप्त करता है। इसी पैसे से कोई समोसा खरीदता है, तो कोई केला अथवा चाकलेट भी, अन्यथा इनकी कौन सुधि ले ? 
    उनका कथन अनुचित नहीं है। सरकार और समाज के पास इन बच्चियों के लिए तनिक सहानुभूति के अतिरिक्त और है भी क्या ?

  " भिक्षावृत्ति एक अभिश्राप " ऐसे अनेक निबंध छात्र जीवन में पढ़ने-लिखने को मिला हैं। कई डरावनी कहानियाँ भी पढ़ी थीं कि बच्चा चोर गिरोह किस तरह से छोटे बच्चों को उठा ले जाता है और फ़िर उन्हें भीख मांगने के लिए प्रताड़ित करता है। महानगरों में ऐसा हो सकता है। परंतु अधिकांशतः यही देखने को मिलता है कि भिखमंगे अपने बच्चों से भी यही कार्य करवाते हैं। यही इन कर्महीनों की आजीविका है। जबकि वे भी समझते हैं कि समाज की दृष्टि में भिखारी एक तुच्छ वस्तु है।  
      इस लॉकडाउन की बात करूँ, तो ये बच्चे मेरे जैसे निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति की तरह निर्धन नहीं हैं, जिनके पास इस वैश्विक महामारी में आय का कोई साधन शेष नहीं है। और प्रतिष्ठान अथवा संस्थान के मुखिया ने भी अपनी विवशता बता ,जिन्हें  भाग्य के भरोसे छोड़ दिया है। ये बच्चे उन प्रवासी श्रमिकों की तरह हतभाग्य भी नहीं हैं, जिन्होंने पेट थाम कर कितनी ही रातें गुजारी हैं। और जब भूख की पीड़ा असहनीय हो गयी तो घर वापसी के लिए ऐसे कष्टदायक यात्रा पर निकल पड़े, जहाँ राह में मौत खड़ी थी। 

  मेरा मानना है कि मलिन वस्त्र धारण करने वाले इन बच्चों के पास अब भी दूसरों को देने के लिए वह निश्छल मुस्कान है,जो इस सभ्य समाज के भद्रजनों के पास नहीं है। इन भिखारी बच्चों ने छल का वह चश्मा नहीं पहन रखा है कि मीठी वाणी बोल कर दूसरों के वैभव को हर लें। ये मन के सच्चे बच्चे हैं,नियति ने इन्हें अपनों की आँख का तारा न बनाया हो तो भी, इनके पास अपने परिजनों को देने के लिए धन और भोजन दोनों  है। 
   इनमें आपस में कितना सहयोग का भाव यह भी देखा मैंने , जब संदीप भैया किसी बच्ची से यह पूछते हैं- " क रे ! तू त लिये है न,फ़िर कइसे ?"
 जिस पर संबंधित लड़की दूसरी बच्ची की ओर इशारा कर कहती है-"  हम एके दिलावे आये हय न ।"
    जब तक वह एक का सिक्का नहीं मिलता है, कितने धैर्य के साथ ये चुपचाप खड़ी रहती हैं। और परिश्रम भी क्या ये कम करती हैं । इन्हीं नन्हे पाँवों से ये प्रतिदिन सुबह से शाम तक नगर का एक बड़ा हिस्सा भ्रमण करती हैं। सभ्य समाज के बच्चों की तरह वे किसी प्रिय वस्तु के लिए लोभ नहीं करती हैं। किसी से स्नेह और सहानुभूति के दो शब्द की मांग नहीं करते हैं,  फ़िर भी इनके जीवन-संघर्ष का बिना मूल्यांकन किये, हम कहते हैं कि ये भिखारी हैं ?

  हम यह क्यों भूल जाते हैं कि इन मासूमों के भी कुछ स्वप्न हैं। जिन्हें पूर्ण करने का दायित्व इस सभ्य समाज का है और यदि इस समाज ने इन्हें ऐसा कोई अवसर नहीं दिया है कि वे अपने गुणों का विकास करें,तो इनका तिरस्कार कैसा और क्यों ? जीवन और जगत की यह कैसी विचित्र विडंबना है !!

     - व्याकुल पथिक

   

Monday, 11 May 2020

ड्रिंकिंग डे

ड्रिंकिंग डे

     इस लॉकडाउन में जब धनी-निर्धन सभी आर्थिक रुप से पस्त हैं। रोज़ी- रोटी को लेकर परेशान हैं। ऐसी स्थिति में भी मैं निठल्ला बिना किसी चिन्ता-फ़िक्र के संदीप भैया के प्रतिष्ठान के सामने स्थित देशी- विदेशी मदिरा की दुकानों पर अँगूर की बेटी के प्रभाव और उसके रहस्योद्घाटन में उलझा हूँ।
   मैंने देखा कि भोलेनाथ के प्रिय दिवस सोमवार को जैसे ही लॉकडाउन के तीसरे चरण के प्रथम दिन (4 मई) मदिरालयों का कपाट खुला लम्बी कतार में खड़े पियक्कड़ों में जो पहला ग्राहक था, वह प्रथम पूज्य गणेश बन गया। माला पहना कर उसका स्वागत  शराब विक्रेता द्वारा किया गया। और फ़िर जो यहाँ अद्भुत दृश्य देखने को मिला, उसका वर्णन संभव नहीं है । कोई पैंट के दोनों  ज़ेब सहित कमीज़ के अंदर और दोनों हाथों में बोतल थामे दिखा, तो कोई झोले में भरकर ले जा रहा था। किसी ने अपनी बाइक की डिग्गी को बोतलों से इस प्रकार सजा लिया, जैसे वह शराबी चित्रपट के महानायक की कार की डिग्गी हो। एक ऐसा व्यक्ति भी दिखा, जो मोटर साइकिल से अपनी दस वर्षीया बच्ची के साथ आया था। बच्ची के कंधे पर एक ख़ूबसूरत बैग था। मैंने देखा कि दारू की बोतलें उसके बैग में रखते देख जिज्ञासा वश मासूम लड़की ने सवाल किया था-" पापा ! यह क्या है? " 
  सम्भवतः उससे सोचा हो कि कोल्डड्रिंक है।
   जिसके प्रतिउत्तर में उस व्यक्ति को यह कहते सुना- " चुप कर ! मम्मी को मत बताना, चल तुझे चाकलेट दिलवाता हूँ।"
   हाँ, विदेशी मदिरा के पड़ोस में स्थित देशी शराब की दुकान पर, जहाँ निम्न वर्ग के ग्राहक आते हैं,पहले की तरह चहल-पहल नहीं थी।
इस वर्ग का ज़ेब जो खाली है। अतः जो भी आते दिखा, समझ लें कि वह अपने ही घरवालों के पेट पर डाका डाल कर , हौली पर आया है । 
      सत्य यही है कि शासन से लेकर श्रमिक तक जिसके समक्ष नतमस्तक हैं,उसका नाम शराब है। देश और प्रदेश में भगवान राम को अपना आदर्श मानने वालों की सरकार के लिए भी इस संकटकाल में यह वारुणी ' धनदेवी' बनी हुई है। उसने एक बार पुनःसिद्ध कर दिया है कि सत्ता और समाज पर वर्चस्व उसका ही है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि इस लॉकडाउन में जहाँ देवालयों के कपाट बंद हैं, वहीं मदिरालयों पर रौनक़ क़ायम है।
      अपने मीरजापुर जनपद में चार मई को मदिरालय खुलते ही लोग लगभग एक करोड़ का शराब गटक गये। पियक्कड़ों की एकजुटता के समक्ष सोशल डिस्टेंस का पालन करवाने वालों की ज़ुबान लॉक हो गयी । इस सोमरस के मद का ही प्रभाव है कि ज्ञानी पुरुषों की संवेदनाओं और नैतिकता की परिभाषा बदल गयी है। जिनके हाथों में शासन की शक्ति है और जो उनके अनुयायी हैं,वे शराब की दुकानों को इस वैश्विक महामारी में खोले जाने का यह कहकर समर्थन कर रहे हैं कि यदि सरकारी  ख़ज़ाने में धन नहीं आएगा, तो देश की अर्थव्यवस्था डाँवाडोल हो जाएगी। 
  ख़ैर, शासन ने तो अपने राजस्व प्राप्ति का मार्ग निकाल लिया, किन्तु व्यापारी और जनता के लिए भी क्या मदिरा जैसी कोई जादुई छड़ी है , जिससे इस तालाबंदी में उन्हें भी अर्थ अर्जन का कोई स्त्रोत मिल जाए ?
  मेरा तो मानना है कि चार मई जिसने सरकारी खजाने को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है , इसे तो निश्चित ही " ड्रिंकिंग डे " का सम्मान मिलना चाहिए। किन्तु ऐसा करने से पूर्व  गृहणियों से भी संवाद कर लेना चाहिए। वे हमारे देश के रहनुमाओं को बताएँगी कि लॉकडाउन के मध्य ज़ब वे घोर आर्थिक संकट का सामना कर रही थीं, इस दिन घर की लक्ष्मी का किस प्रकार अनादर हुआ है। घर में जो कुछ धन शेष था, उसमें से भी एक बड़ा हिस्सा ऐसे पुरुषों ने "अंगूरी" की भेंट चढ़ा दिया। 
   मसलन,जनधन खाते में आये पाँच सौ रूपये को ही लें। जिसे बैंक से निकालने के लिए ऐसी महिलाओं ने भगवान भास्कर के प्रचंड ताप को चुनौती देते हुये गृहस्थी का सारा कार्य त्याग कर लम्बी कतारें लगायी थीं। किन्तु चार मई को हुआ क्या ? इस छोटी सी धनराशि में से जो भी पैसा शेष था, उसपर उनके पियक्कड़ पतिदेव ने बलपूर्वक अपना अधिकार जमा लिया। श्रमिकों के बैंक खाते में  सरकार ने जो एक हजार रूपया डाला था, यदि उसमें से कुछ शेष बचा था ,तो वह भी हौली की भेंट चढ़ गया। क्या लॉकडाउन में खुली शराब की दुकानों से पीड़ित ऐसी गृहलक्ष्मियों के प्रति सरकार की कोई संवेदना नहीं है ? भाकपा के वरिष्ठ नेता मो० सलीम जैसे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि घर-परिवार चलाने के लिए उन्होंने जिन ग़रीबोंं का आर्थिक सहयोग किया था, उसमें ऐसे भी निकले जो हौली पर दिखें।
    मज़दूरों और महिलाओं को शासन से मिला हजार-पाँच सौ रूपया भी यदि नशे की भेंट चढ़ जाए, तो सरकार की यह उदारता फ़िर किस काम की ? सत्य ही कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति हर कार्य को निज स्वार्थ की तराजू पर तौलता है। जिसके लिए समाज और शासन दोनों ही बराबरी  का दोषी है। 
   फ़िर भी कथनी और करनी में एकरूपता की परख तभी होती है ,जब चुनौती सामने हो। हिम्मती तो वे लोग ही कहे जाएँगे,जो मझधार में पड़े हो, फिर भी तूफ़ानों को झेलने का हौसला रखते हो।अन्यथा मानवीय कल्याण की बड़ी-बड़ी लच्छेदार बातें करना किसे नहीं पसंद है। इस युग में सबसे बड़ा परोपकारी आदमी पुरोहित  और संत नहीं, वरन् राजनीतिज्ञ होता है, क्यों कि शास्त्रों के जानकार तो हमें स्वर्ग भेजने का आश्वासन मात्र देते हैं, किन्तु राजनेता धरती पर ही स्वर्ग उतार लाने का दावा करता है। 
   आम चुनाव में ग़रीबी हटाओ, शाइनिंग इंडिया और अच्छे दिन जैसे जुमलों के माध्यम से राजनीतिज्ञ धरती पर स्वर्ग के आगमन का आश्वासन ही तो देता है ? लक्ष-लक्ष मानव मन की आकाँक्षाओं के प्रतीक अब ये राजनेता ही हैं, इन्हीं में से किसी एक को योग्य समझ कर जनता उसके हाथों में अपना नेतृत्व सौंपती है। अब चाहे विपत्ति में वे मदिरा पिलाए अथवा दूध ?
   अपने जनपद में 4 से 9 मई के मध्य लगभग दो हजार पेटी अंग्रेजी शराब मूल्य  1 करोड़, चार हजार पाँच सौ पेटी देशी शराब ,मूल्य 1करोड़ 30लाख 50 हजार रूपया और ग्यारह सौ पेटी बियर मूल्य 29 लाख 70 हजार बिकी है।अथार्त अनुमानित मूल्य 2 करोड़ 60 लाख 20 हजार की शराब छहः दिनों में बिकी है। जिसमें से लगभग एक करोड़ की मदिरा 4 मई को ही बिक गयी थी और शेष 1.60 करोड़ की पाँच दिनों में ,अतः इस आंकड़े से स्पष्ट है कि जब पूरा विश्व कोराना जैसी महामारी से जूझ रहा था, उसी लॉकडाउन के मध्य 4 मई 2020 को पियक्कड़ों ने नया इतिहास रच दिया। ऐसे में इस दिवस को " ड्रिंकिंग डे " के नाम से पुकारा जाए, तो इसमें बुरा क्या है ?
   लेकिन, हौली की ओर बढ़ते कदम भी हौले-हौले थमने लगे हैं, क्यों कि ज़ेब फ़िर से खाली हो गया है। और ऐसे में एक बड़ा ख़तरा यह भी है कि नशे की सस्ती और हानिकारक सामग्रियों का प्रयोग किया जाएगा।

  - व्याकुल पथिक
  


    

Monday, 4 May 2020

बेबसी


 लॉकडाउन बढ़ने के तीसरे चरण की घोषणा होते ही विपुल के माथे पर चिन्ता की लकीरें लकीरें और गहरी हो चली थीं। खाली बटुए को देख वह स्वयं से प्रश्न करता है कि अब क्या करें ? यद्यपि शहर में हितैषी तो कई हैं ,पर वर्षों से उसने किसी के समक्ष हाथ नहीं फैलाया था। उसका यह स्वाभिमान भी खंडित होने को था ,किन्तु तभी उसकी चेतना ने सावधान करते हुये कहा- " जानते हो न कि ऐसे वक़्त में किसी से आर्थिक सहयोग की मांग, आपसी संबंधों को लॉक करने जैसा है।"
   जीवन ने उसकी यह कैसी विचित्र परीक्षा लेनी शुरू कर दी है ? हाँ, राशनकार्ड पर उसे सरकार की मेहरबानी से मुफ़्त में चावल मिल गया था। अतः दाल अथवा साग-भाजी न हो तो भी चलेगा,परंतु मुन्ने के दूध के लिए पैसा कहाँ से लाए ? अभी उसने अपनी तीन साल बड़ी बहन गुड्डी की तरह मांड-भात खाना नहीं सीखा है। ऊपर से कमरे का तीन महीने का किराया सिर पर आ चढ़ा था। भवन स्वामी सहृदयी है,फ़िर भी कुछ तो देना ही था, अन्यथा भविष्य में यही बकाया पैसा पहाड़ जैसा लगेगा। अतः सेठ से वेतन के मिले आठ हजार रूपये में से आधा तो किराया चुकाने में निकल गया था। 

    परिवार का मुखिया होने के कारण पत्नी और बच्चों की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति करना उसका नैतिक कर्तव्य है,परंतु अब तो इस लॉकडाउन में ' दाल-रोटी' स्वप्न-सी प्रतीक हो रही है। इसी चिन्ता में घुला जा रहा विपुल समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर वह क्या करे ? सेठ ने स्पष्ट कह दिया था-- " देखो विपुल ! माना कि तुम मेरे प्रतिष्ठान के विश्वसनीय कर्मचारी हो और इसी से मैंने मार्च का तुम्हारा पूरा पगार आठ हजार गिन दिया है,किन्तु मेरी भी परिस्थितियों को समझते हुये तालाबंदी के दौरान वेतन के संदर्भ में कोई बात नहीं करना , शेष जब दुकान खुलेगी तब देखा जाएगा।"
    स्पष्ट था कि लॉकडाउन की अवधि का वेतन नहीं मिलेगा। समझदार के लिए इशारा काफ़ी है। प्रतिष्ठान स्वामी के इस रूखे व्यवहार से आहत अपने हृदय को विपुल कुछ यूँ समझाता है--"  देख भाई ! सेठ का कथन अनुचित नहीं है । व्यवसायियों के पास पैसे घर में होते ही कहाँ हैं। उनका धन उनके व्यापार में लगा होता है। उसी में से जो कुछ आता है,उसे वे महाजनों की देनदारी, नौकरों की तनख़्वाह, सरकारी टैक्स , बीमा , बच्चों की महँगी शिक्षा और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर ख़र्च करते हैं। ये सेठ-महाजन कोई दानवीर कर्ण नहीं हैं कि घर फूँक तमाशा देखें। "

    वैसे, छोटे शहर में अधिकांश प्रतिष्ठान ' सफ़ेद हाथी' की तरह होते हैं। समान चाहे जितना रख लो, फ़िर भी बोहनी की प्रतीक्षा में दिन चढ़ जाता है। उसके सेठ ने भी लगन-विवाह को देख लाखों का माल मंगा रखा था। जिससे आमदनी तो दूर , बक़ाये का भुगतान भी मुश्किल है, क्योंकि लॉकडाउन के बाद वैश्विक स्तर पर आर्थिकमंदी तय है। वे ख़र्च का बोझ कम करने के लिए कर्मचारियों की छंटनी कर सकते हैं। यदि उसने और दबाव बनाया तो क्या पता कि पहला नंबर उसी का हो ।
  " नहीं-नहीं ! वह बेरोज़गार होना नहीं चाहता।"
 --विपुल ऐसी कल्पना मात्र से सिहर उठता है। वह सोनाली से अपनी व्यथा कथा कह मन हल्का कर सकता था ,किन्तु पत्नी को और व्यथित करना नहीं चाहता था । विवाह के पश्चात अपनी जीवनसंगिनी को उसने दो संतानों के अतिरिक्त और दिया ही क्या है? बेचारी नोन-तेल की चिन्ता में उलझी रहती है।  यह एक कमरा ही उसका घर है। इसी में  शयनकक्ष और रसोईकक्ष दोनों हैं। ऐसे में कभी कोई मेहमान आ जाए तो सोनाली शर्मसार हो उठती है। किसी प्रकार ईंट के सहारे पलंग को थोड़ा ऊँचा कर , उसके नीचे गृहस्थी के सारे समान छिपाकर वह रखा करती है। कमरे को सजा-सँवार कर रखने का पत्नी का यह हुनर देख वह चकित रह जाता है। उसने प्रयास किया था कि कोई ऐसा मकान मिले, जिसमें किचन  अलग से हो। पर क्या करे वह , ढ़ाई हजार से अधिक किराए का कमरा लेने का उसमें सामर्थ्य नहीं है। अरे हाँ ! इसी जुलाई से गुड्डी को किसी स्कूल में दाख़िला दिलवाना है। लेकिन पैसे की व्यवस्था कैसे हो ? कमरे का किराया देने के पश्चात वेतन के शेष बचे हुये रूपये में से हजार-बारह सौ मुन्ना के दूध का होता है। उसके इस मामूली पगार में से भी सोनाली कुछ रूपये ऐसी ही आपाताकालीन परिस्थितियों के लिए कतर-ब्योंत कर बचा लेती थी ।  बच्चे यदि बीमार हो जाए तो उन्हें गोद में उठाए जिला अस्पताल की दौड़ हो अथवा  सरकारी गल्ले की दुकान से राशन लाना, गृहस्थी से संबंधित सारे कार्य बिना किसी शिकायत के सोनाली किया करती थी, क्योंकि वह सुबह निकला तो फ़िर सेठ की दुकान  बंद करवा कर ही रात्रि को लौटता था। अपनी  ड्यूटी के प्रति ज़िम्मेदार जो था । 

    विवाह के पश्चात बीते सात वर्षों से सोनाली कुशल गृहिणी की तरह सबकुछ संभाल रही है। सोनाली चाहती है कि घर पर ही कोई  काम मिल जाए, जिससे बच्चों की देखभाल के साथ ही गृहस्थी की नैया पार लगाने में विपुल की सहायिका बन सके। पत्नी की यह जिजीविषा और उसकी मुस्कान की मृदुलता ही इस दौड़ती-भागती संघर्षमय ज़िदगी में विपुल की औषधि है। किन्तु इसबार की होली उन्हें ख़ासी महंगी पड़ी है। उसी के कहने पर सलोनी ने न चाहकर भी वह कुछ रुपया जो संचित कर रखा था, सभी के नये वस्त्र और मिष्ठान आदि पर ख़र्च दिया था। तब उसे क्या पता था कि ऐसी भी कोई वैश्विक महामारी आ जाएगी कि हाथ पर हाथ रख घर बैठना पड़ेगा। 
     
     आज भगौने ने सिर्फ़ चावल देख विपुल अधीर हो उठा था। पत्नी का स्नेहिल स्पर्श उसके मन के ताप को कम नहीं कर पा रहा था। अपनी इस दीनता पर वह स्वयं को धिक्कारता और सवाल करता कि कर्मपथ पर होकर भी उसके श्रम का कोई मोल क्यों नहीं है ? उसका पुरुषार्थ व्यर्थ है। समय और भाग्य का यह अत्याचार उसके लिए असहनीय था। 
 वह स्वयं से कहता है- " वाह ! क्या नाम रखा था घरवालों ने विपुल ! और यहाँ दरिद्रता सुरसा की तरह मुँह फैलाए खड़ी है।"

     रात के बारह बज चुके थे ,किन्तु आँखों में नींद की जगह उसका उद्विग्न हृदय प्रकृति और मनुष्य की न्याय व्यवस्था के प्रति विद्रोह का शंखनाद कर रहा था। उस जैसे निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति के साथ इस विपत्ति में भी यह पक्षपात क्यों हो रहा है ? क्या श्रमिकों से उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी है ? इस संकट में सरकार, उसके किसी जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह बोध क्यों नहीं हो रहा है कि   उनका ज़ेब भी खाली है। सरकार की तरह उनके प्रतिष्ठान स्वामी उन्हें तालाबंदी के दौरान वेतन नहीं दे सकते है। अतःश्रमिकों और किसानों की तरह निम्न-मध्यवर्गीय लोगों की मदद के लिए  सरकार कब आगे आएगी ? क्या ये रहनुमा इतने अबोध हैं, जो इनके यह कहने मात्र से कि लॉकडाउन में कर्मचारियों का वेतन न काटा जाए , ये सेठ -महाजन मान जाएँगे? शासन-सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों का यह राजधर्म नहीं है कि निम्न-मध्यम वर्ग को भी सरकार से मदद प्राप्त हो ?क्या वे भी अपने स्वाभिमान को ताक पर रख हाथ फ़ैलाये सड़क पर उतर आए ,तभी सरकार की दृष्टि में वे ग़रीब समझे जाएँगे ? क्या इसीलिए वह अपना गाँव छोड़ शहर आया है कि उसकी आँखों के समक्ष उसकी पत्नी नमक, तेल संग चावल खाकर दिन गुजारे। धिक्कार है ऐसी शिक्षा पर कि पेट की चिन्ता उसकी चिता बनती जा रही हो ।  
   वह अनपढ़ ही क्यों नहीं रह गया। अपने गाँव में चाहे जैसे भी रह लेता। खेती- किसानी अथवा मज़दूरी कुछ भी कर लेता। परंतु ऐसे बूरे दिन नहीं आते । उसे स्मरण है कि यहाँ शहर के एक कॉलेज से डिग्री लेने के पश्चात अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्न किया था,किन्तु एक ग़रीब किसान के पुत्र को इस अनज़ान डगर में कोई मार्गदर्शक नहीं मिला। भाग्य ने भी छल किया। सीढ़ी- साँप के खेल में वह सफलता के करीब पहुँच कर भी फिसलता रहा। और फ़िर एक दिन जब उसे यह आभास हुआ कि सरकारी नौकरी मिलने की कोई संभावना शेष नहीं रही ,तो अपने सेठ की दुकान पर आजीविका की तलाश में जा पहुँचा। एक साधारण कर्मचारी से अब मैनेज़र के पद पर आसीन है , किन्तु वेतन आठ हजार ही है। इस छोटे शहर में इससे अधिक की उम्मीद किसी भी प्रतिष्ठान से नहीं की जा सकती है। 
     यद्यपि आज वह न धनिक है ,न श्रमिक है और न ही अपनी सरकार , प्रतिष्ठान स्वामी और सामाजिक संगठनों की दृष्टि में सहानुभूति का पात्र है। वे सभी इस लॉकडाउन में सच्चे जनसेवक का तमग़ा लेने के लिए दलित-मलिन बस्तियों की ओर दौड़ रहे हैं। श्रमिकों को तलाश रहे हैं। ऐसे वर्ग के साथ ग्रुप फ़ोटोग्राफ़ी से उनके यश में वृद्धि  होगी और जनता उन्हें 'कोरोना योद्धा' कह सम्मानित करेगी। उधर, वह ठहरा निम्न-मध्यवर्गीय ,बिना घर से बाहर निकले , बिना दीनता प्रदर्शित किये, बिना फ़ोटोग्राफ़ी कराए कौन करेगा उसकी मदद ?  उसके वार्ड में कई राजनेता-समाजसेवी है। आश्चर्य तो यह है कि इनमें से किसी ने भी उसके द्वार पर यह पूछने के लिए दस्तक नहीं दी कि विपुल भाई कैसे हो ! 
   
   उसका अशांत चित प्रश्न किये जा रहा था--
  "ओह ! विपुल ,कितने नासमझ हो तुम, जो गाँव छोड़ शहर चले आए । पाषण निर्मित ये ख़ूबसूरत इमारतें तुम्हारी विवशता नहीं समझ सकती हैं। इन ऊँची चारदीवारियों के उस पर तेरी मौन पुकार कोई नहीं सुनेगा। "
  
  विपुल बुदबुदाता है- "  काश ! वह पुनः किसान और मजदूर पुत्र बन कर गाँव वापस लौट पाता। शासन के रिकॉर्ड में उसकी कोई तो प्रमाणिक श्रेणी होती , ताकि इस विपत्ति से उभरने के लिए दिये जा रहे सरकारी अनुदान में उसका भी  हिस्सा तय होता। "
   परंतु वह जिस जीवनधारा में बह रहा है, शायद   उसका किनारा नहीं है। उसके कठोर श्रम, अनुशासित जीवन और स्वामिभक्ति का मूल्य नहीं है।वह आजीविका के लिए ऐसा कार्य करने को विवश है जिसमें आत्मनिर्भरता नहीं है। विपत्ति में किसी से सहयोग की आशा नहीं है। ऐसा जीवन संघर्ष देख वह स्वयं पर से विश्वास खोता जा रहा है। निर्धनता से उत्पन्न लज्जा, ग्लानि और कुंठा ने उसे तेजहीन कर दिया था। 
 निम्न-मध्य वर्ग की यह कैसी बेबसी है ?

      ---व्याकुल पथिक
    
चित्रः गूगल से साभार
  

Tuesday, 28 April 2020

नया सवेरा

 (जीवन के रंग)
  लॉकडाउन ने क्षितिज को गृहस्वामी होने के अहंकार भरे " मुखौटे" से मुक्त कर दिया था, तो शुभी भी इस घर की नौकरानी नहीं रही। प्रेमविहृल पति-पत्नी को आलिंगनबद्ध देख मिठ्ठू  पिंजरे में पँख फड़फड़ाते हुये..
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     क्षितिज कभी मोबाइल तो कभी टीवी स्क्रीन पर निगाहें गड़ाए ऊब चुका था। ड्राइंगरूम के ख़ूबसूरत फ़िश बॉक्स में मचलती रंगबिरंगी मछलियाँ और पिंजरे में उछलकूद करता यह मिठ्ठू भी आज उसका मनबहलाने में असमर्थ था । बड़ी बेचैनी से वह बारजे में चहलक़दमी कर रहा था,किन्तु उसकी मनोस्थिति को समझने वाला यहाँ कोई नहीं था। इस खालीपन से उसकी झुँझलाहट बढ़ती जा रही थी। न जाने क्यों उसे अपना ही आशियाना बंदीगृह सा दिखने लगा था, परंतु लॉकडाउन में जाए भी तो कहाँ ?

     अबतक वर्षों से क्षितिज अपने व्यवसाय में इसतरह से उलझा रहा कि देश-दुनिया की उसे कोई ख़बर ही न रहती।रात वापस जब घर लौटता तो पिता की प्रतीक्षा में उदास दोनों बच्चे  निद्रादेवी के आगोश में होते , किन्तु शुभी गैस चूल्हे पर तवा चढ़ाए अपने पति परमेश्वर का बाट जोहती,अर्धांगिनी जो थी। भले ही उसे इस पतिप्रेम का प्रतिदान न मिला हो। स्वयं को गृहस्वामी समझने का क्षितिज का दम्भ उसके दाम्पत्य जीवन के पवित्र रिश्ते पर भारी था । प्रतिष्ठित व्यवसायी होने के दर्प में मुहल्ले में किसी से दुआ- सलाम तक न था। यूँ कहें कि विवशता में कुछ संस्थाओं को चंदा देने के अतिरिक्त सामाजिक सरोकार से उसे मतलब नहीं था। व्यवसाय के लाभ-हानि को ध्यान में रखकर सगे- संबंधियों के यहाँ आना-जाना भी कम ही था।
      पिता की मृत्यु के पश्चात सारी चल-अचल सम्पत्ति का इकलौता वारिस क्या बना कि व्यापार के विस्तार की महत्वाकाँक्षा सिर चढ़ बोलने लगी और फ़िर सौ- निन्यानबे के चक्रव्यूह में ऐसा जा फँसा , मानो उसके लिए व्यवसाय के अतिरिक्त सारे संबंध गौण हो। न मनोरंजन , न पत्नी और बच्चों के संग कभी किसी रमणीय स्थल का सैर ।  यहाँ तक कि मोनू और गोलू के स्कूल में जब पैरेंट्स मीटिंग होती,तो शुभी ही जाया करती थी। शुभी से विद्यालय के प्रधानाचार्य और कक्षाध्यापक यह प्रश्न करते कि उसके पति के पास अपने ही बच्चों के लिए थोड़ा भी वक़्त नहीं है ,तो सिर नीचे किये बहाना बनाने के अतिरिक्त वह भला और क्या उत्तर देती ? अब तो बच्चे भी घर की परिस्थितियों को समझने लगे थे और अपनी माँ की यह विवशता उन्हें अच्छी नहीं लगती थी। परिणाम स्वरूप पिता के प्रति उनका आदरभाव नहीं रहा, फ़िर भी क्षितिज को अपने व्यापार के अतिरिक्त कुछ नहीं दिख रहा था।
    इस लॉकडाउन में जब उसके प्रतिष्ठान पर ताला लटका है, तो वह घर पर बैठकर क्या करे ? व्यवासायिक कामकाज ठप्प होने से उसका मोबाइल फोन भी साइलेंट है। किसी क़रीबी ने उसकी हाल ख़बर नहीं ली थी, क्योंकि ऐसे मधुर संबंधों को उसने अपनी व्यवसायिक व्यस्तता के कारण कब का लॉक कर रखा था। 
   घर में उसकी सर्वगुण संपन्न पत्नी शुभी और दो मासूम से बच्चे मोनू और गोलू थे। पैसे की कोई कमी नहीं थी। उसके पास यह एक सुनहरा अवसर था कि अपने बच्चों संग वक़्त गुजर सके, किन्तु यह क्या ? बच्चे थे कि उसके समीप तनिक देर ठहरते ही नहीं । वह आवाज़ देता रहता , किन्तु  आया पापा कह न जाने वे कहाँ चले जाते और उधर पाकशाला में शुभी सबकी फ़रमाइश पूरी करने में व्यस्त रहती। वर्षों से उसकी यही दिनचर्या है कि सबके लिए अलग-अलग पसंद का व्यंजन तैयार करना ,फ़िर टिफ़िन पैक करना ,बच्चों को स्कूल भेजना इत्यादि अनेक कार्य ।
    लॉकडाउन में गोलू और मोनू पहले से ही मीनू तय कर रखते थे कि नाश्ते और भोजन में कौन सा व्यंजन बनना है। चाइनीज फूड, केक और दक्षिण भारतीय व्यंजन की उनकी डिमांड पूरी करते -करते कब सुबह से रात हो जाती , शुभी को पता ही नहीं चलता। उसे अपने श्रीमान जी के पंसद का भी तो ध्यान रखना पड़ता था।  समय पर चाय-नाश्ता और लंच- डिनर की पूर्ति के लिए वह हाज़िर थी। फुर्सत में बच्चों को पढ़ाती भी थी। उसे इस लॉकडाउन में भी अपने श्रीमान के सामने पड़ी खाली कुर्सी पर बैठने का कहाँ वक़्त होता था।       
       अपने ही कारोबार में खोये रहने वाला क्षितिज इन दिनों अपने ही घर में इस सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंस) को सहने में न जाने क्यों असमर्थ था।  वह चाहता था कि दोनों बच्चे तो कम से कम उसके साथ बैठा करें। शुभी ने एक -दो बार गोलू और मोनू को डाँट भी पिलाई कि जाओ पापा के पास रहो, लेकिन वे दोनों मासूम से बच्चे यह कह कर -- मम्मी ! आप भी न --हमें स्कूल का काम करने दो, जैसे सौ बहाने बनाते थे।
    यह देख क्षितिज से बिल्कुल रहा नहीं जा रहा था। उसके हृदय में कृत्रित एवं स्वाभाविक भाव में द्वंद तेज होता जा रहा था। जिसकी झलक उसके आँखों में भी दिखने लगी थी। उसे समझ में आने लगा था कि इस व्यवसायिक जीवन में उसने क्या खोया और क्यों उसके परिवार के हँसते-मुस्कुराते जीवन को उसकी महत्वाकाँक्षा निगल रही है। जिस कारण आज उसे अपना यह आशियाना बंदीगृह जैसा लग रहा है। वह सोच रहा था कि ऐसी दौलत किस काम की , जब वह अपनी ही संतानों की दृष्टि में सम्मान का पात्र न हो। उनमें उसके लिए अपनत्व भाव न हो। उसके समीप बैठना भी उन्हें पसंद न हो।
        यह संताप उसके अहम पर भारी पड़ने लगा था। हाँ ,वह स्वयं से प्रश्न कर रहा था कि इसमें इन मासूम बच्चों का क्या क़सूर ,इन्हें उसने कभी एक पिता का स्नेह दिया ही कहाँ है ? कभी इनके साथ बैठ कर लूडो , कैरमबोर्ड नहीं खेला। न कभी इनके संग स्कूल गया और न ही किसी टूर पर और शुभी के साथ उसने क्या किया है ? वह तो जब से ससुराल आयी है , उनसभी की सेवा में ही लगी है। मायके भी कभी किसी विशेष आयोजन में कुछ देर के लिए जाना हुआ,तो बच्चों संग स्वयं ही चली जाती थी। उसके संग वह(क्षितिज) नहीं , वरन् उसका ड्राइवर कार लेकर जाया करता था। फ़िर भी शुभी ने अपने घरवालों के समक्ष उसके सम्मान पर कभी न आँच आने दी। 
     आज क्षितिज की अंतरात्मा उससे प्रश्न कर रही थी कि एक पति और एक पिता के रूप में उसका कर्तव्य क्या था,मात्र इनसभी के लिए भौतिक संसाधनों की व्यवस्था ? उसकी यह हवेली इतने वर्षों से शुभी के लिए कारागार की तरह ही तो नहीं थी ? वह अपने व्यवसाय में इसतरह से क्यों रमा रह गया कि पत्नी और बच्चों की सारी आकाँक्षाओं की बलि चढ़ा दी ? 
 " यह कैसी महत्वाकाँक्षा थी तुम्हारी ,बोलो क्षितिज बोलो ! ", उसका अंतर्मन उसे बुरी तरह से झकझोर रहा था। शुभी के रूप में उसे कितनी सुंदर, सुशील और सुघड़ पत्नी मिली थी। हाँ,याद आया विवाह के पश्चात पिता जी ने एक दिन उससे कहा -" बेटे, दुर्भाग्य से अपनी माँ की ममता से तो तू बचपन में ही वंचित रह गया है ,किन्तु ये मेरी शुभी बिटिया है न, तेरी इस कमी भी पूरी कर देगी।"
 और उसने क्या किया इसके पश्चात ,यही न कि उसके मायके वालों की निर्धनता का सदैव उपहास उड़ाया। गृहस्वामिनी के स्थान पर वह एक नौकरानी की तरह दिन-रात उसकी सेवा को तत्पर रह कर भी डाँट-फटकार सहती रहती ।
  पति के द्वारा तिरस्कार की यह वेदना जब शुभी के लिए असहनीय होती तो उसके नेत्रों से बहने वाली अश्रुधारा का भी उसके लिए कोई मोल नहीं था। इसे त्रियाचरित्र से अधिक उसने कुछ न समझा।
     बारजे पर खड़ा क्षितिज  मन ही मन स्वयं को धिक्कारते हुये कह रहा था- " ओह ! शुभी मैंने तुम्हारे साथ कितना अन्याय किया। तुम्हारे व्यथित हृदय को दुत्कार के सिवा आज तक मैंने दिया ही क्या , फ़िर भी तुम विनम्रता की मूर्ति बनी प्रेम का गंगाजल छलकाती रही । बोलो कभी उफ़ ! तक क्यों नहीं किया?"  
    वर्षों बाद क्षितिज को अपनी भूल का आभास हुआ था। उसे शुभी में एक स्त्री के पत्नीत्व, मातृत्व और गृहिणीत्व  जैसे सभी रूपों की अनुभूति हो रही थी। मानो प्यासे को ठंडे पानी की झील मिल गयी हो।
   ढलती हुई आज की शाम क्षितिज के हृदय में प्रेम की ज्योति जला गयी थी। वह कमरे की ओर आता है। उसने देखा कि शुभी छत पर सूखे हुये  वस्त्र लेने गयी है। यह जानकर क्षितिज आहिस्ता-आहिस्ता किचन की ओर बढ़ता है,और फ़िर जैसे ही शुभी आती है। ट्रे में चाय की प्याली लिये वह नटखट बच्चे की तरह मुँह छिपाये उसके पीछे जा खड़ा होता है। 
 " सरप्राइज़ ..!" 
    यकायक क्षितिज की यह चौकने वाली आवाज़ सुन शुभी जैसे ही उसकी ओर मुख करती है , वह विस्मित नेत्रों से उसे देखते ही रह गई । 
    विवाह के इतने वर्षों पश्चात क्षितिज ने पहली बार चाय बनायी थी। सो, वह जैसी भी बनी हो, किन्तु  इसमें जो चाह भरी थी , उसे देख शुभी के  आँखें बरसने लगी थीं, किन्तु आज ये अश्रु मुस्कुरा रहे थे। उधर,क्षितिज रुँधे कंठ से सिर्फ़ इतना ही कह पायी थी - "शुभी! मुझे माफ़ कर दो..।"
 " बस-बस अब अधिक कुछ भी न कहो जी । "
- उसकी होंठों पर अपनी कोमल उँगली रख शुभी   क्षितिज से जा लिपटती है। उन दोनों के झिलमिलाते आँसुओं के पीछे प्रेम का इंद्रधनुष लहरा उठा था। 
      लॉकडाउन ने क्षितिज को गृहस्वामी होने के अहंकार भरे " मुखौटे" से मुक्त कर दिया था, तो शुभी भी इस घर की नौकरानी नहीं रही। प्रेमविहृल पति-पत्नी को आलिंगनबद्ध देख मिठ्ठू  पिंजरे में पँख फड़फड़ाते हुये गोलू-मोनू  का नाम ले जोर-जोर से आवाज़ लगता है।
     यह देख क्षितिज पिंजरे का द्वार खोलकर कहता है -" जा मिठ्ठू ! आज से तू भी आज़ाद पक्षी है।"
    वह क़ैदखाने का दर्द समझ चुका था। उसने यह निश्चय कर लिया था कि शुभी हो या मिठ्ठू , किसी को भी अब वह यह नहीं कहने देगा--पिंजरे के पक्षी रे, तेरा दर्द न जाने कोई। 

    - व्याकुल पथिक
    

Friday, 24 April 2020

लॉकडाउन की बातें

लॉकडाउन की बातें
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  यहाँ मुझे एक ही प्रतिष्ठान के दो छोर पर एक ही वक़्त दो अलग- अलग दृश्य ही नहीं विचार भी दिखें । एक ओर सैकड़ों रुपये ख़र्च कर माला-फूल और अंगवस्त्र मंगाये गये और दूसरी ओर बोरा भर खीरा। एक तरफ़ तामझाम तो दूसरी तरफ़ निःस्वार्थ पशु सेवा ..
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   इस लॉकडाउन में इन दिनों शाम की चाय की तलब मुझे संदीप भैया के प्रतिष्ठान तक खींच ले जाती है। दरअसल चीनी, चायपत्ती और दूध  आदि की व्यवस्था कर पाना मेरे लिये भोजन पकाने से भी अधिक कठिन कार्य है। अतः घर जैसी चाह भरी चाय के लोभ में अक्सर ही सायं पाँच बजे से पूर्व वहाँ पहुँच जाता हूँ। साथ में विष्णुगुप्त चाणक्य और उपनिषद् ज्ञान से संबंधित दो टीवी धारावाहिक भी देख ले रहा हूँ। तबतक ऊपर घर से चाय भी आ जाती है। वो कहा गया है न कि एक पंथ दो काज।
     संदीप भैया व्यवसायी होकर भी जुगड़तन्त्र से दूर रहते हैं। वे सहृदयी और समाजसेवी हैं। सो, हम दोनों की विचारधारा एक जैसी है ,यदि कोई भेद है, तो वह राजा और रंक का है। विगत वृहस्पतिवार को भी मैं उनके प्रतिष्ठान पर गया। वहाँ देखा कि मुहल्ले के कुछ उत्साही युवक कोरोना वीरों के स्वागत की तैयारी में जुटे हैं। जब पूरे जिले में ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहर के भी वार्ड-मुहल्ले में पुलिस अधिकारियों का स्वागत हो रहा है। माल्यार्पण के साथ उनपर पुष्पवर्षा हो रही हो, तो वे क्यों पीछे रहतें। सो,यहाँ भी कुछ देर पश्चात पुलिस अधिकारियों के आते ही फ़ोटोग्राफ़ी के साथ ही तालियाँ बजनी शुरू हो गयी थीं।     
    तभी मैंने देखा कि श्री सत्य साईं सेवा संगठन का एक सदस्य बोरे में खीरा भरकर लाया ।जिसे दुकान के दूसरे छोर पर डालकर ,वह जैसे ही स्नेहपूर्वक 'आवो-आवो 'की आवाज़ लगाता है, देखते ही देखते क्षुधातुर गोवंश दौड़े चले आते हैं। वे खीरे पर टूट पड़ते हैं। जिसे देख वह गौसेवक आनंदविभोर हो उठा था। बिना किसी तरह की फ़ोटोग्राफ़ी किये, वह जैसे आया था, वैसे ही चुपचाप चला गया। उस युवक की निःस्वार्थ सेवा देख मुझसे रहा नहीं गया। मैंने जेब मोबाइल निकाल कर दूर से एक फ़ोटो ले ही लिया । ऐसे सच्चे समाजसेवियों की पहचान हम पत्रकार को भी रखनी चाहिए ।
   यहाँ मुझे एक ही प्रतिष्ठान के दो छोर पर एक ही वक़्त दो अलग- अलग दृश्य ही नहीं विचार भी दिखें । एक ओर सैकड़ों रुपये ख़र्च कर माला-फूल और अंगवस्त्र मंगाये गये और दूसरी ओर बोरा भर खीरा। एक तरफ़ तामझाम तो दूसरी तरफ़ निःस्वार्थ पशु सेवा। ज़ाहिर है कि ये माल-फूल कुछ देर पश्चात पाँवों तले कुचले जाएँगे और दूसरी ओर बोरे भर खीरे ने मूक जीवों की प्राणरक्षा की।आप बताएँ असली कर्मवीर इनमें से कौन हैं ? हम उन्हें न भी पहचाने  तो भी वे सूर्य बन प्रगट हो ही जाएँगे। 

 इन यूनिक इंडिया सोसाइटी के कार्यकर्ताओं के लिए भी ऐसे माला वीरों को ध्यान देना चाहिए जो अपने नगर के गंगातट के पास सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए बच्चों को दूध पिला रहे हैं। इस आपदा की घड़ी में बच्चों के साथ ही उनकी माताएँ भी इनके माध्यम से दूध प्राप्त कर रही हैं। सोसाइटी के कार्यकर्ता बड़े ही सेवा भाव से यह कार्य करते दिखें। 

     किन्तु यह क्या ?  मालार्पण और पुष्पवर्षा के लोभ में जिले के कछवां में आयोजकों के साथ पुलिस ने भी सोशल डिस्टेंस की धज्जियाँ उड़ा दीं। ऐसे माला वीरों को देख जनता ने कम चुटकी नहीं ली थी। ऐसे स्वागत कार्यक्रम लॉकडाउन के पश्चात भी किये जा सकते हैं। लेकिन, प्रशासन का सामीप्य और फ़ोकस में आने का अवसर हम कैसे छोड़ सकते हैं ।

     ख़ैर,जैसा की मैंने पिछले पोस्ट में लिखा था , जिन निम्न-मध्यवर्गीय स्वाभिमानी लोगों के पास राशनकार्ड नहीं है, वे क्या करें ? ऐसे में एक प्रश्न यह भी है कि सभासद क्या कर रहे थे ? सत्तापक्ष के बूथ अध्यक्षों से लेकर जनप्रतिनिधियों की भी तो कुछ ज़िम्मेदारी होती है , क्या वे सिर्फ़ वोटों के सौदागर हैं ? राशनकार्ड बनवाने का दायित्व इनमें से किसी का नहीं था ? 
     ऐसी ही एक और विधवा युवती बड़ी माता मुहल्ले से आती है।उसके पास राशन कार्ड नहीं था। इस लॉकडाउन में वह अपना और अपने बच्चे का पेट कैसे भरे।पहले माता-पिता तत्पश्चात पति की मृत्यु। मायके में उसे सिर छुपाने का स्थान मिल गया था ।अबतक नियति से संघर्ष कर रही यह युवती अपने स्वाभिमान की रक्षा कैसे करे ? यदि क्षेत्रीय सभासद को अपने वार्ड के ऐसे निर्धन लोगों की तनिक भी चिन्ता होती, तो आज उसके पास राशनकार्ड होता। उसके सहयोग के लिए मैंने उसी अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय के प्रबंधक के पास संदेश भेजा । सो, फ़िलहाल उसका काम चल गया है। उसके स्वाभाविक की रक्षा हो गयी , लेकिन कब तक ?
    बिना राशनकार्ड धारकों को निःशुल्क सरकारी गल्ला( चावल) के संदर्भ में मेरे पिछले पोस्ट को पढ़ कर गांव- गरीब नेटवर्क के संयोजक सलिल पांडेय ने जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से वार्ता की थी,तो जानकारी मिली कि मीरजापुर जिले 45 हजार लोगों के पास राशनकार्ड नहीं है, परंतु शासन की ओर से ऐसा कोई गाइडलाइन नहीं है कि सरकारी गल्ले की दुकानों से इन्हें भी कार्ड धारकों की तरह निःशुल्क चावल मिले। प्रशासन ऐसे लोग भूखे नहीं रहे ,इसके लिए जन सहयोग से इन्हें अनाज उपलब्ध करवा रहा है, परंतु कितना ? इनके नागरिक अधिकार और दया में अंतर है की नहीं ?
      इसके लिए सभासदों से लेकर ग्रामप्रधानों को स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या वे वास्तव में अपने क्षेत्र में जनता के प्रतिनिधि हैं ? इसीलिए स्वार्थ के तराजू पर तोले गये ऐसे रिश्ते स्थाई नहीं होते हैं।
      अंतर्राष्ट्रीय वैश्य सम्मेलन के प्रदेश पदाधिकारियों संग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में वृहस्पतिवार की देर शाम संगठन के प्रदेश अध्यक्ष व लखनऊ के विधायक नीरज बोरा की उपस्थित में प्रदेश के आयुष मंत्री अतुल गर्ग को मीरजापुर के संदर्भ में संगठन की ओर से चंद्रांशु गोयल ने बताया कि निम्न - मध्यवर्ग के अनेक लोग हैं, जिनके पास राशनकार्ड नहीं है। इस समय उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय है। फ़िर भी इस समस्या का निराकरण नहीं हुआ। 
  बहरहाल ,अपना काम तो जागते रहो की पुकार लगाना है, आगे राम जाने।  

              - व्याकुल पथिक


    

Tuesday, 21 April 2020

मदद की गुहार

बिना राशनकार्ड कैसे भरेगा पेट 

    किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार..
इस वैश्विक महामारी में शासन-प्रशासन और 
 आमजन सभी की कुछ ऐसी ही मंशा है और होना भी चाहिए। वह मनुष्य ही क्या जिसके हृदय में ऐसी विपत्ति में भी संवेदना न जगे। वह मानव ही क्या जो भूख से संघर्ष कर रहे लोगों का किसी प्रकार से सहयोग नहीं कर सके। धन से न सही, तो वाणी अथवा लेखनी से भी हम ऐसे असहाय लोगों के लिए कुछ कर सकते हैं। इन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ किस प्रकार से मिले, यह मार्गदर्शन भी इनके लिए किसी संजीवनी से कम नही है ? लेकिन , इसके लिए सियासी व्यापार से ऊपर उठकर जनप्रतिनिधियों को पहल करनी होगी।
      विडंबना यह है कि अभी तक लंचपैकेट पैकेट बाँटने अथवा भोजन करवाने के अतिरिक्त अन्य कोई ठोस प्रयास किसी ने नहीं किया है। परंतु इससे न तो ऐसे वर्ग के स्वाभिमान की रक्षा होगी ,न ही उसकी क्षुधा तृप्त होगी। आप स्वयं विचार करें कि एक वक़्त के लंच पैकेट से क्या होगा ?
      अब चलते हैं सरकारी योजनाओं की ओर, क्यों कि लॉकडाउन के दौरान कोई भी भूखा न रहे, इसके लिए उत्तरप्रदेश सरकार ने मुफ़्त अनाज योजना शुरू की है। जिसके अन्तर्गत इसी महीने की 15 तारीख़ से राशनकार्ड पर प्रति यूनिट पाँच किलोग्राम चावल निःशुल्क दिया जा रहा है। मानों यह ग़रीबों के लिए किसी दुर्लभ निधि से कम नहीं है। 
    सरकार ने कहा है कि किसी को भूखे रहने नहीं दिया जाएगा,किन्तु जिनके पास राशनकार्ड नहीं है ,उनका क्या होगा ? यदि उसे इस मुफ़्त चावल योजना का लाभ तत्काल नहीं मिलेगा,तो क्या वह भूखे नहीं रहेगा ? भूख क्या राशनकार्ड वालों को पहचानता है ? ऐसे व्यक्तियों के मन को खंगालने की कोशिश यदि जनप्रतिनिधि करते, तो आज सरकारी अनाज के लिए वे यूँ न भटकते, किन्तु इन्हें ढांढ़स देने वाला कोई नहीं है।  
     शोर तो यह भी मचा है कि जिनके पास राशनकार्ड नहीं है, सरकार उन्हें भी निःशुल्क चावल देगी। पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है। जिला प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी इस संदर्भ में कोटेदारों को प्राप्त नहीं है। 
    अपने मीरजापुर जनपद में इन दिनों क्या हो रहा है।यही न कि जिन असहाय लोगों के पास राशनकार्ड नहीं है ,वे आधार कार्ड लेकर भटक रहे हैं। इस उम्मीद से कि शायद उन्हें भी मुफ़्त अनाज का लाभ मिल जाए अथवा वे इस ग़लतफ़हमी के शिकार हैं कि आधार कार्ड दिखला देने से उन्हें निःशुल्क चावल मिल जाएगा?
  ग़रीबी और बेकसी की ज़िंदा तस्वीर बने ऐसे मेहनतकश लोगों के समूह से कोटेदार परेशान हैं, ज़िम्मेदार अफ़सर पहली बुझा रहे हैं और जनप्रतिनिधि मौन हैं। किसी भी रहनुमा के पास इतनी भी फुर्सत नहीं है कि वे ऐसे ज़रूरतमंद लोगों के संदर्भ में शासन- प्रशासन से वार्ता करें। यदि राशनकार्ड नहीं है, तो क्या इन्हें भूखे छोड़ दिया जाए ? 

    मैं जिस होटल में रहता हूँ , वहाँ काम करने वाले युवक मुकेश अपने मुहल्ले की एक विधवा स्त्री और एक पुरूष को साथ ले गत मंगलवार को मेरे पास आया। महिला के चार बच्चे हैं।इनमें से एक दिव्यांग है। जीविकोपार्जन के लिए वह कुछ घरों में मज़दूरी करती है। किराये के मकान में रह कर पाँच लोगों का पेट पालना आसान तो नहीं होता न ? उसके पास जो राशनकार्ड से संबंधित कागज़ात  हैं ,वह किसी कारण मान्य नहीं है। अब क्या करे यह लाचार महिला ? वार्ड के सभासद से लेकर उन तथाकथित समाजसेवियों और राजनेताओं ने इतना भी पहल इस महिला के लिए नहीं किया कि उसके राशनकार्ड की वैधता में जो भी औपचारिकता शेष है, उसको पूर्ण कराने लिए जिलापूर्ति विभाग से वार्ता करतें । वे फ़िर क्या ख़ाक समाजसेवा कर रहे हैं ? कब होगा इन्हें अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान ? 
      वहीं, दूसरे निर्धन व्यक्ति के पास राशनकार्ड नहीं था,वह आधार कार्ड लेकर भटक रहा है। लेकिन,कोटेदार क्या करें ? बिना किसी सरकारी आदेश के वह चावल कैसे दे सकता है ?
  तो फ़िर क्या ऐसे व्यक्तियों को सरकार के विशाल अन्नभंडार से कोई लाभ नहीं मिलेगा ? क्या ऐसी विपत्ति में देश के एक नागरिक के रूप में सरकारी गल्ले पर इन दोनों का अधिकार नहीं ? यह  कैसी विडंबना है। ऐसे ही राशनकार्ड विहीन कुछ लोग आपूर्ति विभाग गये ,तो वहाँ यह कह उन्हें वापस कर दिया गया कि यह आपदा विभाग का मामला है। होटल स्वामी चंद्रांशु गोयल जो नगर विधायक के प्रतिनिधि भी हैं, ने इस संदर्भ में नगर मजिस्ट्रेट से वार्ता की' जिसपर उन्होंने बताया कि इनके लिए आपदा विभाग से ऐसे कोई सुविधा नहीं है। हाँ, ऐसे निर्धन वर्ग के लोग शहरी क्षेत्र में नगरपालिका के अधिशासी अधिकारी कार्यालय और ग्रामीण क्षेत्रों में उप जिलाधिकारी के दफ़्तर पर जाकर फ़ार्म भर दें। उन्हें एक हजार रुपये मिलेगा। इस जानकारी पर श्री गोयल ने नगरपालिका अध्यक्ष मनोज जायसवाल से वार्ता की , तो उन्होंने बताया कि 16 अप्रैल तक सभी 34 सौ ऐसे फ़ार्म भरे जा चुके हैं।  अब क्या करे ये दोनों ? क्या भूखे रहे या दूसरों की दया पर निर्भर रहे ? 
   है कोई ऐसी सरकारी मदद जिससे इन्हें तत्काल ससम्मान अन्न मिले ?  इस यक्ष प्रश्न पर आप सभी विचार करें। हर जनप्रतिनिधि इस पर चिंतन करे कि यदि राशनकार्ड नहीं है, तो कोई ज़रूरतमंद क्या करें ?  क्या प्रशासन, पुलिस और समाजसेवियों के द्वारा कभी-कभार प्राप्त एक लंचपैकेट से इनका काम चलेगा ? क्या वे लोग जो अकर्मण्य और कायर नहीं हैं, इस लॉकडाउन में भिक्षुकों सा व्यवहार करें ? क्या इनकी इस समस्या का कोई समाधान नहीं ?
कुछ तो बोलें ज़नाब ! आप भी ?

      इन दिनों ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए कि जो भी व्यक्ति अपना आधार कार्ड लेकर जाए, उसे उसी वार्ड के कोटेदार से तत्काल पाँच किलोग्राम चावल निःशुल्क मिल जाए। कोरोना के साथ भूख से भी तो जंग इन्हें लड़ना है। 

       फ़िलहाल, मैं इन दोनों के लिए इतना ही कर सका कि एक समाजसेवी को इनकी समस्या से अवगत करवा दिया। उन्होंने चावल, दाल और नमक का पैकेट लेकर स्वयं मेरे पास आए। वे नगर के एक प्रमुख अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय के स्वामी हैं। और अपने सेवाकार्य के प्रचार- प्रसार से दूर रह कर ऐसे संकट के समय में अनेकों निराश्रित लोगों की सहायता कर रहे हैं। ऐसे सच्चे जनसेवकों को मेरा नमन । अन्यथा मेरे जैसे एक साधारण पत्रकार में इससे अधिक क्या सामर्थ्य, किन्तु हृदय व्यथित है कि हजारों लोग जिनके पास राशनकार्ड नहीं है, उनपर और उनके मासूम बच्चों पर इन दिनों क्या गुजर रहा होगा ? निस्सहाय हो ग़ैरों के समक्ष वे हाथ क्यों फैला रहे हैं? जिससे उनका स्वाभिमान आहत हो। इस तरह दूसरों पर आश्रित होना भौतिक ही नहीं मानसिक पराधीनता भी है।
  तो क्या जीना इसी का नाम है कि वे यह कह ईश्वर को पुकारे -
   जाएँ तो जाएँ कहाँ 
 समझेगा, कौन यहाँ, दर्द भरे दिल की ज़ुबाँ..। 
    
  है कोई ऐसा सच्चा कर्मयोगी ,जो इनकी इस समस्या का निराकरण करे ? लॉकडाउन में इनके जीवन पर छाए कष्टों का अनुभव करे।

            -व्याकुल पथिक
    

Saturday, 18 April 2020

सोशल डिस्टेंस में मजबूरियाँ


              
           
   लॉकडाउन के दौरान सड़कों पर पसरे सन्नाटे के मध्य सफ़ेद चाक से बने सुरक्षा घेरे में दूर तक केवल पादुकाएँ ही दिख रही थीं। पेट की आग,तपती सड़क और बिलबिलाते ग़रीब लोगों के लिए उनकी पादुकाओं ने जहाँ एक तरफ़ सोशल डिस्टेंस की ज़िम्मेदारी बख़ूबी संभाल रखी थीं ,तो दूसरी तरफ़ वह-- "हुजूर ! मैं हाज़िर हूँ की पुकार लगा कर अपने स्वामी की उपस्थिति भी बैंक में दर्ज करवा रही थीं।"
     कोरोना संकट के कारण तालाबंदी को देखते हुये श्रमिक वर्ग के आर्थिक सहयोग के लिए  सरकार ने उनके जनधन खाते में जो छोटी सी रक़म भेजी है , उस धन की निकासी के लिए पिछले कई दिनों से पुरुष विशेषकर महिलाओं की लंबी कतारें बैकों के बाहर लगी हुई हैं। ये महिलाएँ सोशल डिस्टेंस के लिए चाक से बने सफ़ेद घेरे में खड़ी-खड़ी इस चिलचिलाती धूप को जब सहन नहीं कर पातीं ,तो वे वहाँ अपनी चप्पल अथवा ईंट रख , स्वयं तनिक छाँव में हो लेती थीं। उनका नंबर आने में घंटों लग रहा था। ऐसे में बैंक के इर्द-गिर्द जहाँ भी धूप से बचाव दिखता वे जा बैठती थीं। 

    भगवान भास्कर के ताप से स्वयं की रक्षा के इस कशमकश में वे स्वयं सोशल डिस्टेंस का पालन करने में असमर्थ थीं। छाँव युक्त थोड़े से स्थान पर दर्जनों लोग बैठे अथवा खड़े थे। ऐसा नहीं है कि इन अनपढ़ महिलाओं को कोरोना का भय नहीं था, किन्तु इसके अतिरिक्त इनके समक्ष और कोई विकल्प नहीं था।वहाँ ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों की माने तो इन महिलाओं से सामाजिक दूरी की बात मनवाना अत्यंत कठिन कार्य हो गया है । पुलिस इन लोगों में कई बार दूरी स्थापित करती , समझाती और डराती-धमकाती भी थी, किन्तु कुछ देर पश्चात जब सूर्य की तीक्ष्ण किरणें इन्हें पीड़ा देने लगतीं , तो वे पुनः एकत्र होकर उसी छायादार स्थल पर पहुँच जातीं । इतनी संख्या में आगन्तुक खाताधारकों को संभालना बैंक कर्मियों के लिए भी अत्यंत कठिन कार्य था। 
   इस अव्यवस्था को देख उधर से गुजर रहे सुदर्शन के पाँव ठिठक जाते हैं। वैश्विक महामारी में नगर की सड़कों पर नारीशक्ति का यह विचित्र संघर्ष देख कर उसका मन तड़प उठा और मस्तिष्क सवाल करता है-- काश !  ऐसी कोई टोकन व्यवस्था ही इन ग़रीबों के लिए यहाँ होती कि जिसका भी नम्बर आता लाउडस्पीकर के माध्यम से उसे सूचित कर दिया जाता। ऐसे में  छायेदार स्थान पर दूर-दूर खड़े भी रहते और सोशल डिस्टेंस की सरकार की हर मंशा भी पूरी हो जाती। वैसे तो मोबाइल कैश वैन से घरों तक पैसा पहुँचाया जा सकता था। तब समझ में आता कि सोशल डिस्टेंस के प्रति हमारे रहनुमा संवेदनशील हैं।
    नेता, अफ़सर और बुद्धिजीवी सभी लॉकडाउन को लेकर ज्ञान बाँट रहे हैं। जो महाकवि डॉ. हरिवंशराय बच्चन की यह कविता वाच रहे हैं -
शत्रु ये अदृश्य है
विनाश इसका लक्ष्य है
कर न भूल, तू जरा भी ना फिसल
मत निकल, मत निकल, मत निकल..।

  वे बैंकों की इस व्यवस्था पर मौन क्यों हैं? इन हजारों खाताधारकों द्वारा किये जा रहे सोशल डिस्टेंस के उल्लंघन का दोषी कौन है ?
    सुदर्शन इसी चिंतन में डूबा हुआ था कि तभी हल्के के दरोगा जी की आवाज़ इसे सुनाई पड़ती है--  "  अरे पत्रकार जी ! कहाँ खोये हुये हैं। देखें तो धूप कितनी चटख़ है और आपने टोपी तक नहीं लगा रखी है। "
      दरोगा जी पहचान वाले थे, सो आगे बढ़ कर बड़े आत्मीयता से हाथ मिलाते हुये कहते हैं कि देखें स्वास्थ्य तो वैसे भी आपका ठीक नहीं रहता, दुपहरिया में जरा सावधानी से निकलें तो अच्छा है।  बात काटते हुये सुदर्शन उनसे भी यही प्रश्न करता है कि इन दुर्बल काया वाली महिलाओं को देख रहे हैं न आप,किस तरह चंद रुपयों के लिए वे अपनी जान दाँव पर लगाए हुये हैं। क्या धूप और कोरोना का भय इन्हें नहीं है ? अभी  घोंटूराम के सरकारी गल्ले की दुकान से होकर लौट रहा हूँ। वहाँ भी कोलाहल मचा हुआ था।पाँच किलो मुफ़्त चावल जो मिल रहा था। सो, राशनकार्ड धारकों की भीड़ गली के दूसरे छोर तक जा पहुँची थी। इस लॉकडाउन में आमदनी का ज़रिया बंद होने गृहस्थी का ख़र्च तो नहीं रुकता न ? अतः मुफ़्त सरकारी चावल भला कौन नहीं लेना चाहेगा ? किन्तु यह क्या अँगूठा लगाने के बाद ई- पॉस मशीन के स्क्रीन पर एरर बताने लगा। यह देख कोटेदार झुँझला कर कह रहा था--"बाबा ! सर्वर फ़ेल हो गया,मैं क्या करूँ ?" इसे लेकर वहाँ कोटेदार और कार्डधारकों में ख़ूब नोंकझोंक हो रही थी। वहाँ भी सोशल डिस्टेंस के लिए जो सफ़ेद सुरक्षा घेरा बना था,जो इस अव्यस्था के पाँव तले कुचला गया। एक बात और यह कि इस समय राशनकार्ड अथवा बायोमेट्रिक पहचान की अनिवार्यता यदि मेहनतकश पूरा न कर सके अथवा उनके अँगूठे का मिलान नहीं हो पाया तो क्या उन्हें मुफ़्त राशन से वंचित कर दिया जाय ?

        तभी एक और सूचना आती है कि अमुक मोहल्ले में ट्यूबवेल खराब होने से पेयजल की आपूर्ति ठप्प है। जैसे ही वहाँ जलकल विभाग से टैंकर पहुँची, महिलाएँ खाली बाल्टी लिये दौड़ पड़ीं। कहाँ गया सोशल डिस्टेंस ? 

      सीमावर्ती क्षेत्र से ख़बर मिली है कि तिरपाल से ढके एक डीसीएम ट्रक से लगभग 50 सवारियों को जगह- जगह उतारा गया है। लॉकडाउन में फँसे लोगों ने ट्रक वालों के इस जुगाड़तंत्र का सहारा गंतव्य तक पहुँचने के लिया है, क्योंकि लॉकडाउन के प्रथम चरण में जब उन्हें घर भेजने की कोई व्यवस्था नहीं हुई तो वे अत्यधिक किराया देकर ,यह जोख़िम भरा सफ़र तय कर रहे हैं। सोशल डिस्टेंस और लॉकडाउन का उल्लंघन वे किस विवशता में रहे हैं ?  

      किन्तु सुदर्शन की ये साधारण सी बातें वहीं समीप खड़े उक्त बैंक के एक बड़े खाताधारक सेठ तोंदूमल को बिल्कुल समझ में नहीं आ रही थीं। वह बैंक के इर्दगिर्द जुटी महिलाओं की भीड़ देख भुनभुनाते हुये कहे जा रहा था-- " छी-छी ! कैसे गँवार लोग हैं ?  सरकार ने कितना समझाया है। लेकिन ये हैं कि सोशल डिस्टेंस में पलीता लगाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। इन ससुरों को तो लॉकअप में डाल देना चाहिए। " 

     और तभी सामने स्थित तोंदूमल के आलीशान बंगले से आधा दर्जन महिला-पुरुष एक छोटे बालक को कंधे पर डाले बदहवास सड़क के उस ओर भागे जा रहे थे, जिधर अस्थिरोग विशेषज्ञ का नर्सिंगहोम है। 
  अरे! क्या हुआ मेरे गोलू को ? ऐसा चीत्कार करते हुये तोंदूमल भी उनके साथ हो लेता है।लॉकडाउन में इन लोगों को एकजुट देख ड्यूटी पर मौजूद पुलिस कर्मी टोकता है - "क्यों भीड़ लगाए हो, दूर- दूर हो जाओ ? "

   इतना सुनते ही तोंदूमल आगबबूला हो उठता है। वह चींख कर कहता है -- " दीवान जी, कैसे नासमझ हो, मेरा इकलौता पौत्र सीढ़ी से गिर पड़ा है। उसके सिर से रक्तस्राव हो रहा है और तुम्हें सोशल डिस्टेंस की पड़ी है ? "

    सुदर्शन , सोशल डिस्टेंस के प्रति सेठ के विचार में आये इस परिवर्तन पर मन ही मन मुस्कुराते हुये कहता है, ‘जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’ । 
           
              - व्याकुल पथिक

    

Wednesday, 15 April 2020

लॉकडाउन का बोझ

लॉकडाउन का बोझ
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     जो मानवता मरूस्थल में परिवर्तित हो गयी थी, अब उसपर इन विपरीत परिस्थितियों में स्नेह रूपी बादल उमड़ने लगे हैं। हाँ, गरजने के साथ -साथ वे बरसते  कितने हैं,इसकी परख शेष है।
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       प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन को बढ़ा कर 3 मई तक कर दिया है। जिससे जो लोग अन्य प्रांतों में फँसे हुये हैं, इस संकटकाल में अपने घर-परिवार में पहुँचने की उनकी उम्मीद जाती रही। सुदूर  जनपद का एक शख़्स यहाँ के एक होटल में फँसा हुआ है। वहाँ उसकी माँ बीमार है, बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल है, परंतु घर पर पत्नी के अतिरिक्त और कोई नहीं है । जरा विचार करें कि यदि वह ज़ेब से बिल्कुल खाली होता तो ग़ैर ज़िले में इन दिनों को कैसे गुजर पाता। उसे प्रतिदिन सिर्फ़ भोजन और जलपान पर ही ढ़ाई सौ रुपया  ख़र्च करना पड़ रहा है। प्रदेश के विभिन्न जनपदों में ऐसे अनेक लोग फँसे पड़े हैं। स्वास्थ्य संबंधित जाँच पूरी कर इन्हें घर भेजने की कोई तो व्यवस्था होनी चाहिए ? किन्तु कोरोना के विरुद्ध जंग में जहाँ हो,जैसे हो,बस वहीं पड़े रहो, इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प सरकार के पास नहीं है।
       40 दिनों के इस लॉकडाउन में निम्न-मध्यवर्गीय लोगोंं की आर्थिक स्थिति कितनी भयावह हो गयी है और उससे भी कहीं अधिक सड़कों पर विचरण करने वाले भूखे निराश्रित पशुओं की , इसपर भी तनिक चिंतन करें। इनकी सहायता किस प्रकार से की जाए? है क्या कोई ठोस योजना हमारी सरकार और दानदाताओं के पास अथवा हम सिर्फ़ वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर "भूख" पर काव्यपाठ करते रहेंगे ? 
         गत 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री के संबोधन के कुछ देर पश्चात मेरे मित्र नितिन अवस्थी के पास एक संदेश आया कि अमुक मोहल्ले में संतुलाल के घर का चूल्हा नहीं जला है। आधा दर्जन लोगों का परिवार है। संतु एक मिठाई की दुकान पर काम करता था। प्रतिदिन उसे दो सौ रुपया पारिश्रमिक मिलता था। बच्चे पढ़ते हैं। लॉकडाउन में मदद की गुहार लगाने पर प्रतिष्ठान के स्वामी ने मात्र सौ रुपये देकर उसे टरका दिया। आधा दर्जन लोग और एक सौ का नोट ,यह कोई दौपद्री का भोजन पात्र थोड़े ही है कि इससे 21 दिनों तक भोजन की व्यवस्था कर पाता। बाद में उसकी पत्नी राशनकार्ड लेकर सरकारी गल्ले की दुकान पर गयी। चार यूनिट का कार्ड  है। कोटेदार ने पर्ची बनायी, जिसके साथ नमक का एक पैकेट लेना अघोषित रूप से अनिवार्य था, किन्तु इस महिला के पास 50-60 रुपये भी नहीं थे कि राशन उठा सके। सो, पर्ची लेकर खाली हाथ वह वापस चली आयी। फ़िर कैसे जलता घर में चूल्हा ?
    ख़ैर, हमारे होटल मालिक चंद्रांशु गोयल तक जैसे ही यह जानकारी पहुँची , उन्होंने कोटेदार को फ़ोन कर अपने पास से पैसा दिया और इस परिवार के लिए अन्न की व्यवस्था हुई। साथ ही विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ नेता मनोज श्रीवास्तव जो असहाय वर्ग में निरंतर अनाज वितरित कर रहे हैं, उनके माध्यम से संतुलाल को आटा, चावल , दाल, आलू और तेल की बोतल भी दिलवा दिया गया। ऐसे कितने ही संतु हैं , जिनका स्वाभिमान उन्हें हाथ फैलाने से रोक रहा है, क्योंकि यही हाथ कभी उक्त प्रतिष्ठान पर प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को जलपान कराया करता था, वही हाथ आज याचना कैसे करे ? इस विपत्ति में ऐसे लोगों की पहचान करना ही बड़ी चुनौती है। 
      वैसे, इसमें संदेह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहे, इसके लिए हमारी सरकार निरंतर   प्रयत्न कर रही है। यहाँ के जिलाधिकारी ने भी फूड बैंक का मोबाइल नंबर जारी कर रखा है। पुलिस-पब्लिक अन्नपूर्णा बैंक भी अपना फ़र्ज़ निभा रहा है।  15 अप्रैल से  किसी भी तरह के राशन कार्ड पर प्रति यूनिट पाँच किलोग्राम चावल मुफ़्त मिलने लगा है। परंतु इसपर नज़र रखने की ज़रूरत है, क्यों कि ऐसी भी शिकायतें मिलने लगी हैं कि कम चावल देकर ही टरकाने का प्रयास हो रहा है। सरकार ने कह रखा है कि
 प्रशासन की निगरानी में यह मुफ़्त राशन वितरित हो। परंतु यदि भाजपा चाहती तो अपने वार्ड अध्यक्षों को इस पर निगरानी रखने का दायित्व सौंप सकती थी। भाकपा माले के वरिष्ठ नेता मो0 सलीम की शिकायत रही कि समीप का ही एक कोटेदार ऐसा है कि कमजोर वर्ग के राशनकार्ड धारकों संग मनमानी कर रहा है। 
    अनेक प्राइवेट स्कूल के अध्यापकों को दो- तीन  माह से वेतन नहीं मिला है। नौकरी जाने के भय से वे शिकायत भी नहीं करते हैं और फ़िर करे भी तो किससे ?नगरपालिका क्षेत्र में श्रमिक वर्ग के साथ ही ठेला, रिक्शा और आटो आदि चलाने वालों को सरकार की तरफ़ से एक-एक हजार रुपया दिया जाना है। पात्र व्यक्ति के चयन के लिए नगरपालिका के कर्मियों को लगाया गया है, क्योंकि कतिपय सभासदों ने मनमानी तरीक़े से अपात्रों का नाम भी इसी सूची में डाल दिया है। यह कैसी विडंबना है कि यहाँ भी वे वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं। अब भला एक कर्मचारी किसी अनजान वार्ड में पात्र -अपात्र में अंतर कितना कर पाएगा, जब उसे देखते ही दर्जनों लोग घेर लेते हो। दबाव भी बनाया जा रहा हो। 
     और उस निम्न-मध्यवर्ग की पहचान के लिए अब तक सरकार ने क्या किया ? जिन्हें दो माह से वेतन नहीं मिला हो। उन छोटे दुकानदारों के लिए क्या किया, जिनके प्रतिष्ठान के शटर चालीस दिनों तक नहीं उठेंगे। 
  और कोई सरकार इनके लिए कुछ करे भी कैसे ? जब उसने आज़ादी के बाद इतने वर्षों में भी इनकी पहचान नहीं करवाई है, क्यों कि यह वर्ग किसी भी राजनैतिक दल का ठोस वोटबैंक नहीं है। इस वर्ग को पाँच किलोग्राम मुफ़्त चावल के अतिरिक्त और क्या सरकारी सुविधाएँ मिलेंगी , हमारी सरकार कुछ तो बोले। ऐसे परिवार को इस संकटकाल में प्रतिमाह कम से कम पाँच हजार रुपये देना सरकार का नैतिक कर्तव्य बनता है, क्यों कि लॉकडाउन का फ़रमान उसका है। उसे प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे असंगठित लोगों की पीड़ा
को समझना होगा। ऐसे लोगों के लिए आगामी कुछ महीने आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक चुनौती भरे होंगे।   
      सरकारी रहनुमा बताए कि क्या ये स्वाभिमानी लोग प्रशासन और समाजसेवियों द्वारा वितरित किया जा रहा लंच पैकेट लेने घर से बाहर निकलेंगे ? 
     अभी पिछले ही दिनों समाजसेवा में स्वयं को समर्पित कर रखे  एक संगठन प्रचारक का मार्मिक संदेश मनोज श्रीवास्तव के पास आया था कि लॉकडाउन में उसके परिवार की छोटी सी दुकान बंद होने के बाद उसके वृद्ध माता-पिता के समक्ष भोजन का संकट है।  प्रचारक के स्वाभिमानी अभिभावक भोजन के लिए प्रशासन और समाजसेवियों के समक्ष कैसे हाथ पसारते । ख़ैर विहिप नेता मनोज श्रीवास्तव ने इस परिवार के लिए प्रयाप्त खाद्यान्न की व्यवस्था करवा दी। लेकिन, हरकोई इतना सौभाग्यशाली नहीं है। 

     यह चालीस दिनों का लॉकडाउन अपनों को तौल रहा है,जो मानवता मरूस्थल में परिवर्तित हो गयी थी, अब उसपर इन विपरीत परिस्थितियों में स्नेह रूपी बादल उमड़ने लगे हैं। हाँ, गरजने के साथ -साथ वे बरसते कितना हैं,इसकी परख  शेष है।आम चुनावों में पाँच-दस करोड़ रुपये यूँ ही उड़ाने वाले राजनेता ,माननीय यदि मेघदूत बन जाए, तो यह बंजर मरूभूमि अवश्य तृप्त हो जाएगी, किन्तु अभी तक इन्होंने सिर्फ़ विधायक और सांसद निधि का ही ढोल बजा रखा है।

          - व्याकुल पथ

Sunday, 12 April 2020

सच्चे समाज सेवक

                          
             
   
 शहर के एक कोतवाली में लॉकडाउन से जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अधिकारी आपस में मंत्रणा कर रहे थे कि तभी दस वर्षीया एक बच्ची अपना गुल्लक लेकर वहाँ आती है। लड़की कहती है --

   " अंकल ! यह लें मेरा गुल्लक और इसमें जो भी रूपये हैं, उसे प्रधानमंत्री मोदी को कोरोना से जंग के लिए दे दें।"
 बालिका के इतना कहते ही ये अफ़सर अचम्भित से रह गये थे ; क्योंकि उसने यह भी बताया था कि पूरे एक वर्ष से वह इस गुल्लक में साइकिल खरीदने के लिए पैसा एकत्र कर रही थी। अधिकारियों ने गिनती की तो गुल्लक में चार हजार तीस रूपये मिले ।
  मैं भी इस बच्ची की मनोस्थिति को समझने का प्रयत्न कर रहा हूँ। मुझे मुंशी प्रेमचंद्र जी की कहानी " ईदगाह " का पात्र हामिद और उसका चिमटे याद आ रहा है। हामिद ने अपने अन्य मित्रों की तरह खिलौने अथवा मिठाइयाँ कुछ भी नहीं खरीदी थीं , किन्तु रोटी बनाते समय दादी की उँगलियाँ न जले , इसके लिए ईदगाह मेले से चिमटा खरीद लाया था। जिसे देख सजल नेत्रों से उसकी दादी ने जो दुआएँ की , उसका सौवाँ अंश भी बड़े से बड़े धर्मस्थल पर जाकर नहीं प्राप्त होगा। मेरा मानना है कि माँ भारती ने भी इस बच्ची को कुछ इसी प्रकार का आशीर्वाद दिया होगा।
      सुहानी चाहती तो इससे साइकिल खरीद सकती थी। जिसके लिए उसने एक वर्ष से अपने जेबखर्च का एक-एक रुपया उसी गुल्लक में डाल रखा था। लेकिन,उसने ऐसा नहीं किया ; क्योंकि उसे लगा कि इस लॉकडाउन में साइकिल खरीदने से कहीं अधिक इन पैसों की आवश्यकता उसके देश और असहाय लोगों को है। गुल्लक सौंपते समय  इस बच्ची ने अपने मन को किस तरह से बाँधा होगा। इस पर विचार कर कोतवाली में हरकोई इस परोपकारी बच्ची को सैल्यूट कर रहा था। नगर मजिस्ट्रेट ने कहा कि प्रधानमंत्री राहत कोष में रुपया जमा कर उसका रसीद उसके घर पहुँचा दिया जाएगा। 
   सरैया (घंटाघर) निवासी मध्यवर्गीय परिवार के 
सचिननाथ गुप्ता की कक्षा पाँच में पढ़ने वाली पुत्री सुहानी ने कोई मीडिया मैनेज़ नहीं किया था। जिससे ऐसा लगे कि वह फ़ोकस में आना चाहती है। फ़िर भी इस छोटी सी अवस्था में ज़रूरतमंदों के प्रति उसकी यह संवेदना सुर्ख़ियों में रही। उसने स्कूल जाने के लिए साइकिल खरीदने की अपनी अभिलाषा का त्याग मानवता की रक्षा के लिए जो किया था। 
   उसका यह कर्तव्य भाव देख मुझे एक बोधकथा का स्मरण हो आया है । राम- रावण युद्ध के पूर्व समुद्र पर सेतु निर्माण के समय भी कुछ ऐसा ही दृश्य उपस्थित हुआ होगा ,जब एक नन्ही गिलहरी बार-बार जल और रेत की ओर दौड़ लगाती थी और पुनः निर्मित हो रहे सेतु पर आ अपने गीले शरीर पर लगे उस रेत को वहाँ डाल देती थी, ताकि भगवान के कोमल चरणों को कठोर शिलाखण्ड से कष्ट नहीं पहुँचे। 
      जब भगवान राम के करकमलों का स्नेहिल स्पर्श उसे प्राप्त हुआ, तो जिन बलशाली वानरों को अपने कर्म पर दर्प था, वह जाता रहा। 
 इस लॉकडाउन के दौरान भी एक तरफ़ वह सुहानी जैसी नन्ही गिलहरी है और दूसरी तरफ़ वानरों की तरह ही समाजसेवियों की विशाल टोली। इनमें से किसी के भी महत्व को नकारा नहीं जा सकता , किन्तु तुलनात्मक रूप से पलड़ा    सुहानी जैसे निष्काम भाव वाले जनसेवकों का ही भारी रहेगा। इस पर भी तनिक विचार करें।

      शहर के चौबेघाट निवासी रोहित यादव को ही लें। स्नातक का छात्र रोहित भी मध्यवर्गीय परिवार से है। लॉकडाउन में वह अपनी मित्रमंडली के साथ जनसेवा में लगा हुआ है। ये सभी लड़के पहले राशन एकत्र करते हैं, फ़िर उससे भोजन तैयार कर ग़रीब लोगों की बस्तियों में उसका वितरण भी स्वयं करते हैं। इन्हें अपने सेवाकार्य का ढ़िंढ़ोरा पीटना पसंद नहीं है। अतः इन्होंने फ़ोटोग्राफ़ी पर पाबंदी लगा रखी है। पिछले दिनों मेरे एक मित्र सच्चिदानंद सिंह को किसी ने असहायजनों में वितरित करने के लिए खाद्यान्न सामग्री दी थी। तभी उन्हें रोहित का स्मरण हो आया । सूचना मिलते ही वह साइकिल से दौड़ा आया। हमारे मित्र के पुत्र संस्कार सिंह ने सारा सामान बोरे में भर कर उसकी साइकिल के कैरियर से बाँधा और उसे लेकर वह सेवास्थल की ओर रवाना हो गया। उसके पास अन्य समाजसेवियों की तरह इस लॉकडाउन में कोई प्रशासनिक परिचय पत्र (पास) नहीं है, इसलिए मार्ग में पुलिस से भी मोर्चा लेना पड़ सकता है। लेकिन ,समाजसेवा का इनका जुनून  पुलिसिया भय पर भारी है। यह देख मैंने जेब से मोबाइल फोन निकाला और दूर से ही उसका एक फ़ोटो ले लिया। 

   जनसेवा की ललक की एक और मिसाल देखें।   मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर तैनात आरपीएफ जवान विभूति नारायण सिंह दोहरा कर्तव्य निभा रहे हैं। वे स्टेशन पर अपनी ड्यूटी करने के बाद घर आते ही मास्क बनाने में जुट जाते हैं। वे कपड़ों की कटिंग करते हैं तो उनकी धर्मपत्नी मीरादेवी सिलाई करती हैं। घर में वस्त्रों को सिलने के लिए लायी गयी मशीन अब ग़रीब और ज़रूरतमंदों की आवश्यकता बन गयी है। यह दम्पति सैकड़ों मास्क तैयार कर निःशुल्क ग़रीबों में बांट चुका है। पति के साथ जनसेवा में लगी मीरा बिना थके गृहस्थी का काम करने के साथ ही मास्क निर्माण करके प्रसन्नता का अनुभव कर रही हैं।
   मन के सच्चे, कर्म के पक्के ऐसे व्यक्तियों जिसमें बच्चे भी हैं,का उत्साहवर्धन हम पत्रकारों का धर्म है । और कुछ नहीं तो अपनी लेखनी का ही सदुपयोग किया जाए ।     
    अन्यथा बड़े आश्चर्य की बात है कि इस लॉकडाउन में सबसे अधिक फ़ोन अथवा मैसेज यदि किसी का आ रहा है ,तो वह कथित समाजसेवियों का है। इनमें से हर कोई अपने सेवा का मेवा चाहता है। जिसके लिए प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग हो रहा है। कोई लंच पैकेट बांटते हुए तो कोई राहत कोष में चेक भेजते हुए अपना फ़ोटो चाहता है। यूँ भी कह ले कि स्वार्थ की प्रचुरता के कारण मूल्याकंन की दृष्टि भी बदली है। मीडिया भी इससे अछूता नहीं है।  व्यापार और सेवा में क्या अंतर है,हम भी यह भूल बैठें हैं। अतः इस भीड़ में ऐसे ज़रूरतमंदों की आवाज़ दब जा रही है, जिसे याचक के रूप में फ़ोटोग्राफ़ी से परहेज़ है। फ़िर भी ऐसे दानदाता हैं जिन्हें ऐसे स्वाभिमानी निम्न मध्यवर्गीय लोगों की चिन्ता है। सच कहूँ तो यदि मेरे पास जब भी कोई संदेश आता है कि अमुक व्यक्ति को अनाज की आवश्यकता है,तो मैं भी ऐसे ही सच्चे समाजसेवियों को ही याद करता हूँ, ताकि यह फ़ोटोग्राफ़ी वाला झमेला न रहे।  ख़ैर, इस लॉकडाउन में किसी भी तरह असहाय लोगों तक मदद पहुँचे प्राथमिकता यही होनी चाहिए ।  फ़िर भी ऐसे सच्चे समाज सेवकों की ख़बर भी हमें होनी चाहिए जो प्रचारतंत्र से दूर है। 
   और हाँ, सुहानी जैसे बच्चों का मनोबल बढ़ाने के लिए किसी विशेष अवसर पर उनका अभिनंदन भी होना चाहिए। 

         - व्याकुल पथिक