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Wednesday, 8 July 2020

सुख

( जीवन की पाठशाला से )
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    बीसवीं सदी के सशक्त क़लमकार कामेश्वर जी की एक रचना "सुख" पढ़ रहा था। जिसमें उद्योगपति जमनालाल बजाज एक मछुआरे ,जो कि अपनी जर्जर नाव की छाँव में आराम से लेट कर बीड़ी पी रहा था, से प्रश्न कर रहे थे। वे उससे कह रहे थे कि यदि तुम अधिक मछलियाँ पकड़ते, तो अमीरी की तरफ बढ़ सकते थे। जैसे ,नाव की जगह मोटरबोट और नायलॉन के जाल खरीद सकते थे। तब तुम्हारी आमदनी काफ़ी बढ़ जाती और तुम बेफ़िक्र हो खुशी से ज़िदगी जी सकते थे। जिसके प्रतिउत्तर में मछुआरे ने उनसे कहा था कि वह ऐसा क्यों करे ? क्योंकि वह तो अब भी खुश है और उनसे ज्यादा सुखी भी है।

     आज़ का मेरा विषय भी यही है। यह सुख क्या है ? मुझे आज़ भी भलीभाँति स्मरण है कि आजीविका की खोज में जब वाराणसी से मीरजापुर आया तो मेरे पास दो जोड़े कपड़े मात्र थे। समाचार पत्र कार्यालय से पारिश्रमिक के रूप में प्रतिदिन चालीस रुपया मिलता था। बनारस से मीरजापुर बस में ढ़ाई घंटे की यात्रा के दौरान मैं दो बड़े-बड़े अनार खरीद कर खा लिया करता था। रात्रि 11 बजे वापस लौटने पर एक ढाबे पर डट कर भोजन करता और  साथ ही एक लीटर दूध सुबह-शाम गटक लेता था। पेट पर हाथ फेरकर डकार लेता और नींद तो इतनी अच्छी आती थी कि आँखें सुबह ही खुलती थीं।धनसंग्रह करने की कोई अभिलाषा नहीं थी। सो,स्वस्थ और प्रसन्न था। दिन भर श्रम करने से जो स्वेद निकलते थे, उनमें मोतियों जैसी मुस्कान थी। 

      कुछ माह पश्चात अख़बार के दफ़्तर में मेरे एक शुभचिंतक ने सलाह दी कि कुछ रुपये इनमें से बचा लिया करो, जिससे तुम्हें इस समाचार पत्र की मीरजापुर एजेंसी मिल सके। इससे तुम्हारा सम्मान और आर्थिक लाभ दोनों बढ़ेगा। मैंने पूछा  कितना तो बताया गया कि कम से कम आठ हजार रुपये और नीचीबाग डाकघर में मेरा बचत खाता भी खोल दिया गया। यह वर्ष 1995 की बात है। मैं समाचार पत्र विक्रेता से अभिकर्ता बन गया। मुझे तीन किस्तों में पैसा संस्थान को देना था। इस धन को अर्जित करने के लिए मैं अपने ख़र्च में कटौती  करने लगा। दो की जगह एक अनार और दूध भी कम कर दिया। जबकि यौवन उफान पर था और अत्यधिक श्रम भी करना पड़ता था, जो इससे पूर्व मैंने कभी किया नहीं था। परिणाम यह रहा कि मेरे स्वास्थ्य में परिवर्तन आना शुरू हो गया। और फ़िर मुझे भविष्य की अनेकानेक चिंताओं ने घेर लिया। विवाह के लिए प्रस्ताव आने लगे, पर मैंने स्पष्ट कह दिया था कि कहा कि धन तो है ही नहीं। तभी अचानक मेरे मन में यह विचार आया कि मुझे किसी भी प्रकार से प्रयत्न करके दस लाख रुपये अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए एकत्र करना है।

 वैसे तो, इस अर्थयुग में पत्रकारिता को भी " जुगाड़ वाला धंधा" समझा जाता है, किन्तु मैं अनैतिक तरीक़े से धन अर्जित करने साहस नहीं जुटा सका, इसलिए मेरे लिए दस लाख रुपये बचत करने का लक्ष्य अत्यधिक कठिन था। इस गुल्लक को भरने के लिए मैं अपनी सारी सुख-सुविधाओं में कटौती कर आजीवन साइकिल से चलता रहा। वर्ष 1998 में असाध्य रोग ने मेरे दुर्बल शरीर पर आक्रमण कर दिया और फ़िर मेरे सारे स्वप्न बिखर गये। हाँ, मैंने कुछ धनसंग्रह अवश्य कर लिया , किन्तु "भविष्य" की चिन्ता में मेरा "वर्तमान"चला गया। मेरी " खुशी" चली गयी। प्रियजनों का वियोग सहना पड़ा।  घर-परिवार विहीन व्यक्ति के लिए उसका स्वास्थ्य  ही सबसे बड़ा धन होता है। अब मेरे पास न तो आजीविका का कोई साधन है और न ही वह खुशी, जिसे लेकर मैं मीरजापुर आया था। संग्रह किया हुआ धन "रोटी" दे सकता है, किन्तु "सुख" नहीं।  
     कुछ लोगों ने स्नेह प्रदर्शन कर छल भी किया।  एकाकी जीवन में ऐसा होता ही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में मेरा हृदय अत्यधिक विकल हो उठा। तत्पश्चात गुरुज्ञान के आलोक में मैंने पाया कि इस जगत के लौकिक संबंधों के प्रति विशेष अनुरक्ति ही भावुक मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता है । वह अपने प्रति किसी के द्वारा दो शब्द सहानुभूति के क्या सुन लेता है , बिना परीक्षण किये ही उसे अपना सच्चा हितैषी समझ लेता है।
      
     इन दिनों मानसिक शांति और स्वास्थ्य के लिए मैं प्राणायाम कर रहा हूँ। अध्यात्मवेत्ता श्री सलिल  पांडेय ने कहा है कि श्वांस को ऊपर से नाभि की ओर धीरे-धीरे नीचे (अपान वायु) की तरफ लाना है। वायु की प्रवृत्ति उर्ध्वगामी होती है । वायु का शरीर में उर्ध्वगामी होना पाचन-क्रिया को बाधित करता है। इसके लिए वायु को अपान स्वरूप ही श्रेष्ठ है। भगवान की पूजा में "पंचवायु" के समन्वय के क्रम में प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा, समानाय स्वाहा का जप करते हुए भगवान को नैवेद्य चढ़ाने का विधान किया गया है। मेडिकल साइंस भी वायु के इन स्वरुपों को मान्यता देता है। रक्तचापमापी यंत्र (स्फाइगनोमैनोमीटर) में पारा जिस प्रकार नीचे की ओर उतरता है, कुछ इसी प्रकार ही श्वांस को नीचे उतारने का प्रयत्न कर रहा हूँ। चरणबद्ध तरीके से ऐसा करना है। क्रमशः सर्वप्रथम सहस्त्रार चक्र (मस्तिष्क के मध्य भाग में), आज्ञा चक्र (नेत्रों के मध्य भृकुटि में), विशुद्ध चक्र (कंठ में),अनाहत चक्र (हृदय स्थल में), मणिपुर चक्र (नाभि के मूल में) से अनुभूति के माध्यम से श्वांस को नीचे नाभि पर केंद्रित करना है। मणिपुर चक्र में श्वांस नीचे उतारते समय मूलाधार (गुदा और लिंग के मध्य में) और स्वाधिष्ठान चक्र(लिंग मूल के चार अंगुल ऊपर ) की आनुभूति भी करनी होती है। तत्पश्चात मणिपुर चक्र से श्वास को ऊर्ध्वगामी ( ऊपर की ओर) सहस्त्रार चक्र की ओर ले जाना है। 
   ऋषियों ने माना है कि शिव शीश में स्थित हैं । पूरा शीश (गर्दन के ऊपर का भाग) ही शिवलिंग है। पंच ज्ञानेन्द्रियाँ इसी भाग में हैं। जबकि शिवा यानी माता पार्वती नाभि में रहती हैं । माँ और संतान का सर्वाधिक गहरा रिश्ता इसी नाभि से ही होता है। सारी तंत्रिका प्रणाली का मुख्य केन्द्र विंदु नाभि और मस्तिष्क ही है। शीश पर्वत है तो नाभि कुंड। उक्त प्राणायाम का आशय है कि शिव नीचे उतर कर पार्वती के पास आते हैं । इस स्थिति में तन स्वस्थ होता है। अपान वायु के जरिए नाभि में आकर जब शिव शिवा को लेकर अपने कैलाश पर्वत शीश में आते हैं तो चिंतन-मनन शिवस्वरूप हो जाता है। मन को शांत और तन को स्वस्थ करने के लिए सलिल भैया ने यह विशेष प्रकार का प्राणायाम मुझे सिखाया है।

        अभी प्रारम्भिक चरण है। जिस सुख की कामना मैं ऐसे योग-प्राणायाम के माध्यम से इस अवस्था में कर रहा हूँ, वह सुख तो मुझे तीन दशक पूर्व सहज ही गुरुदेव  के आश्रम में प्राप्त हो गया था। गुरुकृपा से आश्रम में मिले खड़ाऊँ एवं साधारण वस्त्रों में ही। मैं मोहवश इस 'अमृत कलश ' का त्याग कर ' मदिरापान ' के लिए निकल पड़ा था। परिणाम यह रहा कि उस दिव्य प्रकाश (आनंद) से वंचित हो गया।

    परंतु  मछुआरा बुद्धिमान था, उसे ज्ञात था कि उसकी खुशी किसमें है। इसीलिए उसने बड़ी दृढ़ता के साथ उद्योगपति श्री बजाज को जवाब दिया था - "मैं इसी स्थिति में आपसे अधिक सुखी हूँ।"
     सत्य यही है कि मनुष्य अपने संतोष से सम्राट और अभिलाषाओं से दरिद्र हो जाता है। और हाँ, यदि सुख का एक द्वार जब कभी बंद होता है, तो दूसरा खुल भी जाता है। अतः बंद नहीं इस खुले द्वार की ओर भी देखें। 

-व्याकुल पथिक


    

Wednesday, 1 July 2020

दौर ये कैसा ?


मन के भाव
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प्यार पंछी से जता के
शिकार इंसान का करते हैं।

  दौर ये कैसा देखो यारो 
जहाँ सैयाद मसीहा होते हैं !

आग  घरों में लगा के
जो चैन की नींद सोते हैं।

गज़ब सियासत देखो यारो 
वे  रहनुमा हमारे होते है !

शहतीर पलकों से उठा के
सुई  विषभरी चुभोते  हैं  ।

इंद्रजाल ये कैसा देखो यारो 
हम यहीं मुतमईन होते हैं !

 दुनिया को बहका के जो
 खुद मालामाल होते हैं ।

जमाना ये कैसा देखो यारो
वे ही  पीर-फ़क़ीर होते हैं !

हंगामा खड़ा करके जो  
फ़िर पर्दे में मुसकुराते  हैं।

खेल कलयुग का देखो यारो 
वे सच्चे साहित्यकार होते हैं !

पहचान पथिक इन्हें तनिक ,
 भरोसा इनपे नहीं करते हैं ।

अनजान दर्द से आँखों के 
पर क़लम के महान होते हैं !

- व्याकुल पथिक


     

Monday, 29 June 2020

अंजाम

       मन के भाव
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नक़ाब जब हटता है
और सच सामने आता है

मुखौटे में शैतान देख

रुदन तब मुस्कुराता है

चेहरा जब बदलता है

और शूल बन  चुभता है

दिल का ग़जब हाल देख

बावला वैरागी कहलाता है

उम्मीद जब टूटती  है

चिता अरमानों की सजती है

मरघट पर  मेला देख

भटका दृष्टा बन जाता है

संवेदना तब सिसकती है

जब घात बड़ों की सहती है

पढ़े -लिखो का खेल देख

हंस  बगुला बन जाता है

भावना जब धधकती है

तब काँच  बन पिघलती है

प्रतिशोध की ज्वाला देख

मानव  दानव   बन जाता है

आह तब निकलती है

जब छल मित्र का सहती है

धोखे का अंजाम देख

पारस  लौह बन जाता है !! 

   -व्याकुल पथिक


Wednesday, 24 June 2020

सौदा

मन के भाव
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    "हमारा यह नटखट लल्ला बाबा जी का पक्का भक्त हो गया है। अभी साढ़े तीन साल का है ,पर देखो न ऐसा कपालभाति प्राणायाम करता है कि बड़े-बड़े योग साधक चकित रह जाते हैं..!"

      अमुक प्रतिष्ठान पर खड़ीं उन दोनों महिलाओं का वार्तालाप सुनकर मयंक ने उत्सुकतावश अपनी दृष्टि उस ओर डाली ,तो देखा कि वे औषधीय गुणयुक्त चाय का एक पैकेट खरीद रही थीं। साधारण पोशाक में लिपटी बिना साज- श्रृंगार के ये प्रौढ़ और युवा औरतें आपस में माँ-बेटी थीं। जिनकी निगाहें दुकान में करीने से सजाकर रखे गये बाबा जी के तरह-तरह के स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों पर टिकी हुई थीं। वे दुकानदार से ऐसे कुछ उत्पादों का मूल्य पूछतीं और फ़िर उसकी क़ीमत सुनकर मनमसोस के रह जाती थीं। यहाँ से उन्होंने सिर्फ़  एक पैकेट दिव्य चाय ही लिया था। हाँ, बच्चे के ज़िद करने पर प्रौढ़ महिला अपने बटुए को टटोलती है । उसने पाँच-पाँच के दो सिक्के उसमें से निकाले और आटे से निर्मित बिस्किट का एक छोटा सा पैकेट बच्चे को थमा दिया । वह चाहती तो पाँच रुपये वाला पारले-जी बिस्किट भी उसे दिला सकती थी,पर बाबा जी के उत्पाद पर उसे पूरा भरोसा था । 


         वे माँ-बेटी बाबा जी की सच्ची अनुयायी थीं, जो दुकान पर खड़े एक अन्य योग साधक को बड़े गर्व से बता रही थीं कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य साधारण चाय नहीं पीता है। वे सभी सुबह योग-प्राणायाम कर गिलोय ,तुलसी और कालीमिर्च इत्यादि डाल के बनाये गये काढ़े का सेवन करते हैं। उनका लल्ला भी यह कड़वा काढ़ा मांग कर पीता है। यह उनके लिए जीवन संजीवनी है। बाबा जी ने बताया है।  हाँ,जब कभी घर में कोई अतिथि आता है,तभी वे इस दिव्य पदार्थों से बनी चाय के पैकेट का उपयोग करती हैं। वे उन्हें दूध-चायपत्ती वाली साधारण चाय पिला कर बाबा जी की आज्ञा का उलंघन नहीं कर सकती हैं।

     वे महिलाएँ जिनके पास स्वयं दिव्य चाय पीने का सामर्थ्य नहीं हो ,फ़िर भी गुरु में उनकी ऐसी प्रबल आस्था देख पल भर के लिए मयंक को अपने आश्रम वाले जीवन का स्मरण हो आता है। जहाँ गुरु में उसकी श्रद्धा तो थी,किन्तु उनकी वाणी को तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयत्न करता था। वह स्वयं से सवाल करता था कि ज़ब ईश्वर एक है, तो उस तक पहुँचने का मार्ग बताने वाले धर्मगुरुओं में एक दूसरे की उपासना पद्धति को लेकर इतनी घृणा क्यों है ? वे उपासना के तरीके को लेकर अपने शिष्य के हृदय में "विश्वास परिवर्तन" कराना क्यों चाहते हैं ?  संभवः आस्था की पाठशाला में "तर्क और विज्ञान " जैसे शब्द नहीं हैं,अतः मयंक सच्चा शिष्य नहीं बन सका था। 

     और आज़ भी इन दोनों महिलाओं की गुरु- आस्था को देख वह आनंदित तो हुआ ,लेकिन उनकी आँखों में छिपी ग़रीबी की इस विवशता को पढ़ कर मयंक का संवेदनशील हृदय द्रवित हो उठा था। उसके मन में पुनः अनेक प्रश्न उठ खड़े हुये हैं। लेखन कार्य से जुड़ा होने के कारण वह अनेक गुरुओं के दरबार में गया है। विंध्यक्षेत्र के एक प्रमुख आश्रम में उसने देखा है कि संपन्न भक्तों को गुरु की विशेष कृपा और प्रसाद की बड़ी-बड़ी पोटलियाँ मिलती हैं,जबकि सामान्य भक्त इस सुविधा से वंचित हैं ,चाहे गुरु के प्रति उनमें कितनी भी आस्था क्यों न हो । स्वयं महामाया विंध्यवासिनी के मंदिर में मायापति (वीआईपी) भक्तों के चरणों तले आम दर्शनार्थियों की आस्था कुचली जाती है। ऐसे उपासना स्थलों पर विशिष्ट व धनाढ्य भक्तों की ही पूछ के पीछे व्यापार नहीं तो और क्या है ? फ़िर इन दोनों ग्रामीण महिलाओं की आस्था का क्या मोल है?

यह सवाल आज़ भी उसके लिए यक्ष प्रश्न है! 

  मयंक को नहीं पता कि क्या कभी इन निर्धन महिलाओं में इतना सामर्थ्य होगा कि वे बाबा जी द्वारा निर्मित स्वास्थ्यवर्धक खाद्य सामग्रियों को "गुरु प्रसाद" समझ घर ला सकेंगी। इस अर्थयुग में उसका यह कैसा विचित्र प्रश्न है ?  यह जानते हुये भी कि इस सभ्य संसार में सब-कुछ व्यापार है । अन्यथा ऐसा कोई एक सस्ता स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद तो इन ग़रीब भक्तों के लिए किसी न किसी प्रतिष्ठान पर होता ही , जिसे वे अपने परिवार के लिए आसानी से क्रय कर सकती , किसी सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान पर मिलने वाले राशन की तरह ? काश ! इनके निष्ठा और विश्वास के लिए ऐसी कोई व्यवस्था संभव हो पाती।


     यकायक मयंक को अपने एक संबंधी के उस उपदेश की याद आ गयी थी। जब वह कालिम्पोंग में रहता था। जहाँ उनकी मिठाई की दुकान थी, वहीं पहाड़ की ऊँचाई पर एक सरकारी कन्या विद्यालय भी था। लंच के समय प्रतिदिन उस पहाड़ी से नीचे उतर कर लगभग चालीस- पचास नेपाली छात्राएँ  पचास पैसे का सिक्का लिये उनके प्रतिष्ठान पर आया करती थीं। निर्धन परिवार की ये  लड़कियाँ भूजा (बेसन का नमकीन सेव)  खरीदने आती थीं। पचास पैसे में और कुछ मिलना संभवः भी नहीं था। दुकान पर इनके लिए भूजा के बड़े-बड़े पैकट तैयार कर पहले से रख दिये जाते थे। जिनमें कम से कम एक रुपये का भूजा होता था। मयंक ने स्वयं तोल कर उसे देखा था। वह समझ नहीं पाता था कि दुकान पर यह घाटे का व्यापार क्यों किया जाता है ?  आखिर एक दिन उसने अपने संबंधी से पूछ ही लिया। जिसपर प्रतिउत्तर में उन्होंने कहा था-   
  " हम व्यापारी अवश्य हैं,किन्तु ये बच्चे हमारे लिए 'करेंसी' नहीं हैं ,जो सिक्के का वजन देख कर इन्हें सौदा दिया जाए। देखना ही है, तो भूजा लेने के पश्चात इनके मासूम चेहरे पर मुस्कान देखिये आप.. ।" उनका कहना था कि व्यापार में भी मानवीय संवेदनाएँ  होती हैं। 

     काश ! उनकी यह बात धर्म के तथाकथित उन ठेकेदारों को भी समझ में आ जाती, जो धर्म को ' व्यापार ' और भक्त को 'करेंसी' समझते हैं । जिसके मूल्य के अनुपात में अपना आशीर्वाद भक्त को प्रसाद की छोटी- बड़ी पोटली के रूप में देते हैं। इनमें से कोई भी धर्मगुरु घाटे का व्यापार करना नहीं चाहता है। वे उस बच्चे की तरह खरा सौदा नहीं करना चाहते हैं, जो बाद में गुरु नानक देव बना। कोई भी गुरु नानक, कबीर और रैदास नहीं बनना चाहता है। वे तो मुनाफ़े वाला व्यापार चाहते हैं। फ़िर ऐसे में वे पचास पैसे में एक रुपये का भूजा जैसा कोई उत्पाद ग़रीब भक्तों को कैसे देंगे ..?

   तो क्या इस दुनिया में 'करेंसी' ही अब सब-कुछ है..! धर्म,शिक्षा, चिकित्सा, साहित्य, राजनीति और यहाँ तक की समाजसेवा भी सौदा है..!
आस्था,त्याग समर्पण, संवेदना और भावना जैसे शब्द उसी प्रतिष्ठान के महंगे उत्पादों की तरह सजावट की सामग्री मात्र हैं..! जिन पर निर्धन नहीं सिर्फ़ धनिकों का अधिकार है, क्यों कि व्यवसायिक दृष्टि से वह कागज़ का टुकड़ा भारी है..? 
    परंतु याद रखें जिस दिन हमें हृदय की तुला पर वजन करना आ जाएगा, उन छात्राओं का धातु निर्मित पचास के सिक्के वाला पलड़ा भारी मिलेगा । हम करेंसी से 'इंसान' बन जाएँगे। वे व्यापारी से संत बन जाएँगे,बिल्कुल गुरु नानक देव की तरह हम खरा सौदा कर पाएँगे। 
      
  -व्याकुल पथिक
  

Wednesday, 17 June 2020

अभिभावक-धर्म

 ( जीवन की पाठशाला से )
  
   मैं प्रातः भ्रमण पर था,तभी देखा कि एक युवती संभवतः किसी कॉलेज की छात्रा होगी, अपनी पीठ पर बड़ा सा बैग लटकाए तेज़ क़दमों से स्टेशन रोड की तरफ़ बढ़ रही थी। मार्ग में उसे कोई सवारी वाहन भी नहीं मिला था। वह परेशान थी ।
       इतने में स्कूटर पर सवार अधेड़ उम्र का एक व्यक्ति वहाँ आकर बड़ी आत्मीयता से उसे पिछली सीट पर बैठने को कहता है। उसने जिस अधिकार के साथ युवती को स्कूटर पर बैठने को कहा,उससे प्रतीत हो रहा था कि वह उसके परिवार का ही सदस्य है, परंतु यह क्या ? वह लड़की तो गुस्से से आगबबूला हो उठी थी ।अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुये उसने कहा- " आप पास ही टहल रहे थे,फ़िर भी मुझे स्टेशन छोड़ने के लिए ज़ब स्कूटर नहीं निकाला था ,तो अब बीच रास्ते दुलार दिखलाने क्यों आ गये हैं?"
      उसे यह भ्रम था कि अधेड़ व्यक्ति ने जानबूझ कर उसकी उपेक्षा की है। जिस पर अधेड़ व्यक्ति ने अत्यंत संयम का परिचय देते हुये उसे समझाते हुये कहा -"  बेटा, विश्वास करो ,सच में मैंने नहीं देखा था कि तुम घर से कब निकली हो। "
 फ़िर भी उसके क्रोध का शमन नहीं हुआ। स्कूटर पर बैठने से पुनः इंकार कर वह पैदल ही आगे बढ़े जा रही थी। उधर बिना धैर्य खोये उस व्यक्ति ने मार्ग में तीन स्थान पर उसे रोककर स्नेहपूर्ण उसका संदेह दूर करने का प्रयत्न किया। इस प्रकार वह उस युवती को अपने स्कूटर पर बैठा कर समय से स्टेशन छोड़ आया। तब तक उस नासमझ लड़की को भी अपनी गलती का एहसास हो गया था। उसका अशांत मन हल्का हो गया होगा। आशा करता हूँ कि उसकी यात्रा मंगलमय रही होगी। उस " सच्चे अभिभावक "को देख मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई।   
     आज का मेरा विषय इसी से जुड़ा हुआ है। वस्तुतः 15 से 22 वर्ष के आसपास की यह जो अवस्था है,  किशोर और युवावस्था का वह पवित्र संगम है जिसमें यदि विवेकपूर्वक डुबकी लगा ली तो जीवन में अर्थ,धर्म, काम और मोक्ष सभी सुलभ है,किन्तु संयम खोया नहीं कि यह अवस्था वैतरणी बन निगलने को आतुर मिलेगी।
         यौवन की दहलीज़ पर खड़े बच्चों को इस आधुनिक समाज ने दो नाव पर पाँव रखने को विवश कर दिया है। टेलीविज़न पर  धारावाहिक और विज्ञापनों के माध्यम से युवावर्ग जो कुछ देख रहा है, ऐसी चकाचौंध भरी दुनिया में उसे स्वयं के लिए स्थान बना पाना आसान नहीं है। यह चंद्र खिलौने जैसा है, फ़िर भी वह उसी के पीछे भाग रहा है। वह देख रहा है कि नैतिकता की बातें सिर्फ़ पुस्तकीय ज्ञान है। भ्रष्ट आचरण से पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करने वालों का यहाँ जयगान  है।
       अर्थयुग के इस मकड़जाल से किशोर और युवाओं की सुरक्षा का दायित्व अभिभावकों का है,किन्तु जब कभी अपने बच्चों की ऊर्जा की क्षमता को बिना परखे माता-पिता उससे अपने सपनों के बुझे दीप जलाने का प्रयत्न करते हैं,तो यही विभाजित ऊर्जा उनके कुलदीपक पर भारी पड़ती है।
      ऐसे में बच्चे के समक्ष दो विकल्प शेष होता है,पहला अपने अभिभावक की खुशी अथवा उनके भय से उस निर्णय को स्वीकार करना,जिसका अनुसरण उसके लिए अत्यंत कठिन और अरूचिकर हो और दूसरा विवेक रहित विद्रोह , जिस मार्ग पर चल कर वह स्वयं को ही नष्ट कर बैठता है।
  जबकि अभिभावकों का यह प्रयास  होना चाहिए कि बच्चे को स्वयं उसके उत्तरदायित्व का ज्ञान हो, जो उसका पथ प्रदर्शन कर सके।  जिससे उसकी शारीरिक शक्ति, मानसिक तेज,नैतिक बल और शौर्य को सही दिशा मिल सके।
    पिछले सप्ताह अरुण जायसवाल भैया ने मुझे भोजन पर आमंत्रित किया था। उनका छोटा पुत्र वैज्ञानिक है। वह चेन्नई में रह कर भारत सरकार अर्थात देश की सेवा कर रहा है और बड़ा पुत्र दिल्ली में इंजीनियर है। करोड़ों की चल-अचल सम्पत्ति है। पति-पत्नी और ये दो बच्चे,छोटा सा उनका खुशहाल परिवार है। इन दोनों संतान के उज्जवल भविष्य के पीछे उनका कठोर तप है। दिल्ली में बच्चों को उच्च शिक्षा मिले, जिसके लिए उन्होंने अपनी राजनीति और पत्रकारिता दोनों छोड़ दी। उन्होंने आभूषण निर्माण कराने का व्यापार शुरू किया। इन आभूषणों को लेकर वे स्वयं मोटरसाइकिल से पड़ोसी जनपदों में जाया करते थे। उनका यह व्यवसाय अच्छा चल निकला। 
      भोजन करते वक़्त उन्होंने एक प्रेरक प्रसंग की ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया। स्कूल में एक दिन उनके छोटे पुत्र ने बेंच पर पड़ी एक पैंसिल अपने बैग में रख ली थी। घर पर उसके पास वह पैंसिल देख उन्होंने पूछा --"बेटा,यह तो मैंने तुम्हें दी नहीं थी ?"  लड़के ने कहा --"पापा, समीप बैठी फलां दीदी (अन्य छात्रा) की छूट गयी थी,जिसे मैं उठा लाया हूँ।" उसका उत्तर सुन कर अरुण भैया ने अपने माथे को हाथ से दो बार ठोका। यह देख उस मासूम बालक ने पुनः पूछा --" क्या मुझसे कोई बड़ी गलती हो गयी?"
 जिस पर उन्होंने कहा --"हाँ बेटा, कल दीदी को उसकी पैंसिल वापस दे, सॉरी बोल कर आना।"    
     बेटे ने वैसा ही किया, पुनः ऐसी कोई भूल उससे कभी नहीं हुई और आज वह वैज्ञानिक है।
पिता का इतना आज्ञाकारी कि उसने विदेश की नौकरी ठुकरा दी। रही बात उनके बड़े बेटे की तो मैंने देखा था कि जब अपने कुछ सहपाठियों के कारण वह मार्ग भटक रहा था , तो अरुण भैया ने  उसे तत्काल यहाँ से हटा कर पढ़ने के लिए दिल्ली भेज दिया था।
   हमें यह समझना होगा कि किशोरावस्था में बच्चों पर निगरानी रखने के लिए माता-पिता को उनका मित्र बनना होगा, न कि मुखिया ।
        पिता-पुत्र के इस मधुर संबंधों को देख मुझे जहाँ हर्ष होता है, वहीं स्वयं पर ग्लानि भी होती है,क्योंकि न मैं अपने परिवार के काम आ सका न स्वयं के, लेकिन इसके पीछे भी एक करुण कथा है। कोलकाता में जिस दिसंबर माह में नानी माँ की मृत्यु हुई थी, उसी माह वहाँ मैंने कक्षा छह की पढ़ाई पूर्ण की थी। अगले वर्ष मार्च में वाराणसी में मुझे सीधे कक्षा आठ के बोर्ड की परीक्षा में बैठा दिया गया और जुलाई में हरिश्चंद्र इंटरमीडिएट कालेज में विज्ञान वर्ग का छात्र हो गया। विद्यालय में मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। बनारस हो अथवा कोलकाता सभी जगह कक्षाओं में प्रथम स्थान पर रहने वाला किशोर गणित और विज्ञान की मोटी-मोटी पुस्तकें देख सहम उठा था। वह तो चित्रकार बनना चाहता था। जो अभिभावक उसकी चित्रकला के कभी प्रशंसक थे, उन्होंने ही उसके भविष्य को संवारने के लिए उसके नीचे की स्थिति सुदृढ़ करने की उपेक्षा उसे दो पावदान ऊपर चढ़ा दिया गया,फ़िर यह इच्छा जताई कि वह प्रथम श्रेणी से परीक्षा उत्तीर्ण करे, क्योंकि उसके पिता स्वयं प्रथम श्रेणी प्राप्त करने से वंचित रह गये थे। उस किशोर ने ऐसा ही किया। रात्रि 11-12 बजे तक मेज पर सिर झुकाए गणित के प्रश्नों को सुलझाता रहा, किन्तु उसका स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ता जा रहा था। हाईस्कूल बोर्ड की परीक्षा के पश्चात एक दिन अचनाक उसके सिर के दाहिने भाग में भयानक दर्द शुरू हो गया। गर्दन में अकड़न आ गयी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह प्रयोगात्मक परीक्षा कैसे दे, फ़िर भी उसने दिया। अभिभावकों की इच्छा पूर्ण हुई । गणित के दोनों ही प्रश्नपत्रों में उसे 49-49 अंक प्राप्त हुये। परंतु वह सदैव के लिए सर्वाइकल स्पांडिलाइटिस का रोगी बन गया। उस समय कोई नहीं समझ सका था कि उसके साथ क्या घटित हो रहा है। उसकी दादी उसके सिर के उस भाग में चूना लगा दिया करती थी। अभिभावकों को लगा कि वह बहाना बना रहा है। वह गृहत्याग के लिए विवश हो गया।
परिणाम यह रहा कि यौवनकाल के शक्ति, तेज और प्रफुल्लता की अनुभूति नहीं कर सका।
वह घर, परिवार और स्वास्थ्य तीनों से वंचित हो गया। भूख और बीमारी से निरंतर संघर्ष करते हुये किशोर से प्रौढ़ हो गया है। उसे नहीं पता कि यौवन किसे कहते हैं, क्योंकि अभिभावकों की महत्वाकाँक्षा की वेदी पर वर्षों पूर्व उसकी बलि दी जा चुकी है। आज़ भी वह बैठ कर कुछ भी नहीं पढ़ सकता है।
     मित्रों ! मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि यदि आप " सच्चे अभिभावक" हैं, तो स्कूटर वाले उस अधेड़ व्यक्ति सा अभिभावक-धर्म का पालन करें।
          -- व्याकुल पथिक
    

  

  

Saturday, 13 June 2020

जीवन-संघर्ष

    जीवन-संघर्ष
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   शनैः शनैः  समुद्र के तूफ़ानों से टकरा कर जीवनरूपी यह नाव भी थक कर एक दिन डूब जाएगी, किन्तु इसमें एक " अभियान " होगा। इसीलिए हमें यह समझना होगा कि समुद्र तट जो नावें खड़ी हैं, चक्रवात आने पर जब यह सागर उन्हें भी निगल लेगा, तब क्या इनकी "टाइटैनिक" जैसी पहचान संभव है ? 
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    इन दिनों 68 वर्ष के फ़र्नीचर वाले भैया पहले से कहीं अधिक श्रम करने के बावजूद स्फूर्ति से लबरेज़ हैं। सुबह चार बजे से ही उनका कार्य शुरू हो जाता है। साफ़ सफाई, गमले में पानी देना, कपड़े की धुलाई, अपनी बीमार धर्मपत्नी को स्नान कराना , चाय-जलपान आदि सेवा-सुश्रुषा भी उन्हें ही करनी पड़ती है। सुबह इसी के मध्य वे अक्सर ही समीप स्थित एक वाटिका में चले जाया करते हैं, क्योंकि वे एक योग प्रशिक्षक हैं और वहाँ योगसाधक उनकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। इसके पश्चात प्रातः नौ बजे से रात्रि आठ बजे तक घर में ही स्थित अपने प्रतिष्ठान पर तगड़ी ड्यूटी भी उनकी होती है। इसी प्रकार पिछले कुछ दिनों से प्रतिष्ठान और घर का कार्य वे अकेले ही संभालते आ रहे हैं, क्यों कि अस्वस्थ होने के कारण उनका इकलौता पुत्र अपने उपचार के लिए सपत्नीक बाहर गया हुआ है। उसे ठीक होकर वापस लौटने में दो-ढ़ाई महीने लग सकते हैं। 
     लोकबंदी में डगमगाती अर्थव्यवस्था के मध्य पत्नी के पश्चात पुत्र की बीमारी को उन्होंने हतोत्साहित होने की जगह एक चुनौती के रुप में  लिया है। और इस संकट का मुकाबला करने के लिए स्वयं को मानसिक और शारीरिक रुप से तैयार कर लिया है। भैया कहते हैं कि उन्हें जैसे ही यह सामाचार मिला कि उनके पुत्र को दो महीने तक उपचार की दृष्टि से बाहर ही रहना है, उन्होंने अपनी सारी पीड़ा को झटक दिया है। अब उन्हें आभास नहीं होता है कि उनके घुटने में कभी दर्द भी हुआ करता था।  घर के साथ दुकान का कार्य और ख़र्च दोनों ही उनका बढ़ गया है, किन्तु जीवन संग्राम में यही स्थिरता एक सच्चे योग पुरुष की पहचान है,जिसके लिए जीवन के तिक्त और मधुर क्षण एक समान होते हैं। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों का अगर दृढ़ संकल्प के साथ सामना किया जाए,तो वे हमारे लिए अभिशाप नहीं वरदान बन सकती हैं। विपत्तियों में हमें पराक्रम दिखलाने का अवसर मिलता है। जिससे हमारे जीवन में निखार आता है। ये चुनौतियाँ मनुष्य को उसकी सोयी हुई शक्तियों से परिचित कराती हैं।
   
     मैं इसी संदर्भ में उन्हीं के प्रतिष्ठान पर बैठा चिंतन कर रहा था कि तभी एक अंग्रेज़ी फ़िल्म का स्मरण हो आया। कोलकाता में छोटे नाना जी के घर मैंने इस फ़िल्म को देखी थी। जिसकी कहानी यह है कि एक फ़ौजी राह भटक कर जंगल में चला गया , जहाँ उसका सामना ऐसे विचित्र भयावह जीव से हुआ , जिस पर उसकी राइफ़ल की गोलियाँ निष्प्रभावी थी । यह देख वह सैनिक छद्म युद्ध कर रहा था। उस विचित्र जीव का कई दिनों तक इसी पर  प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष साहसपूर्वक सामना करते हुये वह बूरी तरह से घायल होकर थक गया था। उसे ऐसा लगने लगा था कि उसकी मानवीय शक्ति इस हिंसक प्राणी का मुकाबला नहीं कर पाएगी, फ़िर भी उसने अपनी मृत्यु के समक्ष शुतुरमुर्ग सा नेत्र बंद कर समर्पण नहीं किया। अंततः जब वह युद्ध करने में पूरी तरह से असमर्थ हो जाता है, तो उस विचित्र प्राणी को ललकारा है, मानों अपनी मौत की आँखों में आँखें डाल कह रहा हो - 
 "आ, अब तू मेरा भक्षण कर ले।" 
 और जैसे ही वह प्राणी सैनिक पर हमला करने को होता है। हेलीकॉप्टर की आवाज़ सुनाई पड़ती है, जिसमें बैठे उसके मित्र ने लेज़र गन से उस हिंसक जीव पर प्रहार कर के उसका काम तमाम कर दिया था। सैनिक जीवित बच जाता है। किन्तु दो घंटे की फ़िल्म के प्रारम्भ में सैनिक ने यदि बिना संघर्ष किये ही उसे अपनी मौत समझ घुटने टेक देता तो क्या होता  ? पहला उसकी मृत्यु , क्यों कि उसे खोज रहा उसका मित्र उसतक नहीं पहुँच पाता और दूसरा यह कि एक सैनिक के दुर्दम जिजीविषा भरी यह रोमांचकारी संघर्ष कथा इस चलचित्र पर नहीं होती।

    यदि मैं अपनी बात कहूँ तो , इस लोकबंदी में पिछले दो माह तक मैं सुबह साइकिल से अख़बार वितरण के लिए नहीं निकला। किसी तरह का शारीरिक श्रम भी नहीं किया। परंतु मेरे स्वास्थ्य में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं आया।   वर्ष 1998 में जब से मैं मलेरिया से पीड़ित हुआ हूँ और इसी प्रकार के शारीरिक कष्ट में ही दो दशक तक प्रतिदिन सुबह से दोपहर तक समाचार संकलन और लेखन , पुनः मौसम कैसा भी हो उसी साइकिल से शास्त्रीपुल पर जाना, वहाँ से बस में खड़े होकर औराई जाना, जहाँ अखबार की प्रतीक्षा में आधे-एक घंटे तक सड़क पर प्रदूषित वातावरण में अंधकार में खड़े रहना,पुनः मीरजापुर वापसी, रात्रि दस बजे तक समाचार पत्र का वितरण, अपने लिए भोजन और काढ़ा बनाना, इतने सारे कार्य किया करता था। इसी शारीरिक श्रम के कारण मैं अपनी मानसिक पीड़ा को भूल गया। शुभचिंतकों ने कहा कि तुम अधिक श्रम करते हो, इसलिये स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है,परंतु इस लॉकडाउन में जब मैंने पूर्ण विश्राम किया,तब भी स्वस्थ नहीं हो सका।  
   अतः एक जून से मैं पुनः सुबह चार बजे उठ कर प्रातः भ्रमण को निकल पड़ता हूँ। मार्ग में मांसपेशियों के दर्द से संघर्ष करते हुये अपने चिंतन को गति देता हूँ । मेरा यह असाध्य रोग  उसी हिंसक जीव की तरह मेरे शरीर और मनोबल पर प्रहार करता रहता है। इस युद्ध में कभी-कभी मैं उसे परास्त कर देता हूँ, फ़िर भी वह मुझ पर निरंतर भारी पड़ते जा रहा है। ख़ैर,परिणाम अभी  शेष है।  
    हाँ, इस संघर्ष में जीवन के इस सत्य को समझ गया हूँ कि नाव समुद्र के किनारे खड़ी रहे अथवा उसमें उतरे, उसे डूबना तो है ही, इसीलिए परिस्थितियाँ अनुकूल न भी हो, तब भी क्यों न हम पूरी शक्ति के साथ संघर्ष करें।जीवन-संग्राम से पलायन की जगह अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते जाए। शनैः शनैः  समुद्र के तूफ़ानों से टकरा कर जीवनरूपी यह नाव भी थक कर एक दिन डूब जाएगी, किन्तु इसमें एक " अभियान " होगा। इसीलिए हमें यह समझना होगा कि समुद्र तट जो नावें खड़ी हैं, चक्रवात आने पर जब यह सागर उन्हें भी निगल लेगा, तब क्या इनकी "टाइटैनिक" जैसी पहचान संभव है ? आज इसी संघर्ष के कारण ही मुझे भी इस शहर में एक पहचान और सम्मान मिला है। 

    -व्याकुल पथिक
(जीवन की पाठशाला से)

Saturday, 6 June 2020

मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल -3[ अंतिम भाग]

(जीवन की पाठशाला से)
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       लॉकडाउन -5 ने मुझे लगभग तीन दशक पश्चात यहाँ मीरजापुर में पुनः 'अनलॉक' होने का   स्वर्णिम अवसर दिया है। मैं ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर भी वर्षों से प्रातः भ्रमण का आनंद नहीं उठा पाया रहा था, क्योंकि अपनी संघर्ष सहचरी साइकिल संग अख़बार वितरण के लिए निकलना होता था।
इससे पूर्व 22 वर्षों तक जब रात्रि में समाचारपत्र वितरित करता था, तब भी सुबह होते ही समाचार संकलन की चिन्ता सताने लगती थी,किन्तु लोकबंदी के करीब दो महीने पश्चात एक जून को प्रातः साढ़े चार बजे जैसे ही होटल का मुख्यद्वार खोला, वहाँ खड़ी मेरी साइकिल ने आवाज़ लगाई -" मित्र, आज अकेले ही यात्रा पर,क्या मुझसे नाराज़ हो ? " 
    वे स्नेहीजन जो संघर्ष के साथी रहे हो ,उनके प्रति कृतज्ञता तो पशु भी व्यक्त करते हैं,फ़िर मैं मानव होकर अपनी साइकिल का उपकार कैसे भूल सकता हूँ, इसलिये मैंने उससे कहा - 
" अरी पगली, ऐसा कुछ नहीं है। इस रंग बदलती दुनिया में एक तू ही तो है,जिसने कभी मेरे साथ छल नहीं किया है, लेकिन उम्र के ढलान पर तुझे भी विश्राम की आवश्यकता है। बहुत हो गया यह काम-वाम, अब हम दोनों अपनी मौज़ के लिए साथ निकलेंगे। "
      मित्रता तभी निभती है जब प्रेम दोनों तरफ़ से हो। साइकिल यदि मेरे संघर्ष में सहायिका रही है,तो मैंने भी इसके सम्मान के साथ कभी समझौता नहीं किया है। बड़े से बड़े राजनेताओं से लेकर अफ़सर और उद्योगपतियों तक की पत्रकार वार्ता और पार्टियों में मैं इस पर सवार हो कर गर्व से मस्तक ऊँचा किये जाता रहा हूँ। जहाँ कीमती कार और मोटर साइकिलें खड़ी रहती हैं, उन्हीं के मध्य मेरी साइकिल भी विराजमान रहती है। 
    जो संघर्ष के साथी हो,ऐसे सच्चे हितैषी के स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुँचे, यह हमारा दायित्व है। इसके लिए मैंने कई बार मोटरसाइकिल के प्रलोभन को ठुकराया है,क्योंकि मुझे कभी यह ग्लानि नहीं हुई कि मैं साइकिल वाला पत्रकार हूँ और वे बाइक -मोटर वाले। जिसके पास ईमानदारी का धन होता है, वह अपने संतोष से सम्राट बना रहता है, न कि अभिलाषाओं से दरिद्र,इसीलिये धनी और निर्धन के प्रश्न पर मेरे साथ कभी भेदभाव नहीं हुआ। क्या ये "साइकिल वाले " राजनेता भी ऐसा ही कर रहे हैं ? यहाँ तो मैंने देखा है कि कार वाले बड़े पदाधिकारी हैं और साइकिल वाले दरी बिछा रहे हैं। इनके मध्य स्वामी और दास जैसा संबंध है।
     विडंबना यह भी देखें कि विश्व साइकिल दिवस पर देश की सबसे पुरानी साइकिल कंपनी एटलस के प्लांट पर फ़ैक्ट्री बंद करने का नोटिस लग गया। कोरोना के दंश का सीधा प्रभाव  इस कंपनी और उसके कर्मचारियों पर पड़ा है।
    अनेक राजनेता, समाज सेवक, पर्यावरणविद , कवि और लेखक इस दिन साइकिल की उपयोगिता पर अनेक लच्छेदार बातें करते हैं, किन्तु इनमें से कितने साइकिल की सवारी पसंद करते हैं। इनके लिए साइकिल यात्रा एक फ़ैशन शो से अधिक कुछ भी नहीं है। कैसा आश्चर्य है कि साइकिल समाज के एक बड़े वर्ग की आवश्यकता है, पहचान है, लोकबंदी में इसने कितने ही श्रमिकों को उनके गाँव सुरक्षित पहुँचाया है,किन्तु आज़ यह उनका सम्मान नहीं बन सकी है ! 
     हाँ, यदि राजनेता ,अभिनेता और संपन्न लोग अपनी महंगी मोटर गाड़ी की तरह साइकिल की सवारी करने लगें, तो अवश्य ही यह सर्वसमाज के लिए शानदार सवारी बन सकती है। परंतु ध्यान रहे कि वह लखटकिया बाइसिकल न हो, जिसे सामान्य जन क्रय ही नहीं कर सके।
    हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने खादी को सम्मान दिलवाने के लिए पहले स्वयं उसे धारण किया था, ताकि भारत की ग़रीब जनता खादी से निर्मित वस्त्र पहन कर हीनभावना से ग्रसित न हो। और अब क्या हो रहा है खादी अमीरों की शान है और ग़रीब उससे वंचित हो गये हैं।  
बापू के साबरमती आश्रम में विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति भी चरखा चलाते हैं । और विडंबना देखें कि गांधी आश्रम के नाम से खुले किसी भी वस्त्रालय में खादी की एक सदरी का मूल्य तीन हजार से कम नहीं है। खादी आम आदमी से दूर ख़ास आदमी की पोशाक बन कर रह गयी है। यदि साइकिल के साथ भी ऐसा ही कुछ करना हो, तो उचित यही है कि ये भलेमानुष इसकी सवारी नहीं करें ।  इसे गांधीवाद और समाजवाद नहीं कहते हैं। यह तो सामंतवाद है। ग़रीबोंं की वस्तुओं पर डाका डालना है।
     किसी  विशेष अवसर पर गांधी टोपी तो अनेक भद्रजन सिर पर रख लेते हैं, परंतु समाज पर प्रभाव रखने वाले विशिष्ट लोग क्या कभी टेलीविज़न स्क्रीन पर ऐसे किसी सस्ते उत्पाद का प्रचार-प्रसार करते दिखते हैं, जो स्वास्थयवर्धक हो और जनसामान्य तक उसकी पहुँच हो ? तब गांधी जी के चरखे की याद उन्हें क्यों नहीं रहती है ?
        मैं इन दिनों सुबह ज़िंदगी की आपाधापी से दूर ऐसे ही विचारों में खोया कदमों से सड़कों को नापते रहता हूँ। सच में इस लोकबंदी ने मेरे ऊपर बहुत बड़ा उपकार किया है। मौसम कैसा भी हो नियमित अख़बार लाना और उसे पाठकों तक पहुँचाया, अब मैं इस बंधन से मुक्त हूँ। एक जून से सुबह जो भी प्रतियाँ बंडल में प्राप्त होती हैं,उन्हें प्रातःभ्रमण का आनंद उठाते हुये चुनिंदा पाठकों तक पहुँचा देता हूँ। किसी प्रकार का तनाव नहीं है। मैं आज़ाद हूँ। अपनी खोई हुई वह मुस्कुराहट वापस चाहता हूँ,जिसे कोलकाता के हावड़ा ब्रिज अथवा कालिम्पोंग में छोड़ आया हूँ। बचपन में घोष दादू की उँगली थामे  हावड़ा बृज का भ्रमण किया करता था। वो मेरे जीवन की सबसे ख़ूबसूरत शाम थी और युवावस्था में  कालिम्पोंग की वादियों में सुबह का सैर भला कैसे भूल सकता हूँ। मार्ग में लकड़ी से निर्मित छोटी-छोटी दुकानों पर मोमोज़- ब्लैक टी(काली चाय) आदि लेकर बैठी सरल स्वभाव की नेपाली युवतियाँ मिलती थीं। मैं तो बस एक बड़ा सा सेब लेता था। वहाँ यही मेरा एकमात्र जेबख़र्च था। तब मेरे इस मुस्कान में दर्द नहीं होता था, किन्तु इसके पश्चात यहाँ मीरजापुर में जब भी मुस्कुराया हूँ, दर्द छिपा कर । इसमें आनंद नहीं है , फ़िर भी मैं इसे अनुचित नहीं मानता, क्योंकि वह कहते हैं न-

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।

सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय ।।

   हमारी व्यथा कथा सुनकर सहानुभूति के दो शब्द कहने वाले सच्चे हितैषी हो,यह आवश्यक नहीं है। ग़ैरों के तनिक से स्नेह रूपी आँच में हम  भावनाओं में बह कर मोम सा पिघल जाए और  अवसर पाकर वे हमारा तिरस्कार करें , फ़िर तो हमारी वेदना असीमित हो सकती है। ब्लॉग पर सक्रिय होने के पश्चात यह एक और सबक़ मुझे सीखने को मिला है। 

     मन की यह शिथिलता बाहरी कष्ट से कहीं अधिक प्रभाव दिखलाती है। ऐसे में मनुष्य को स्फूर्ति के लिए अपनी दिनचर्या में वह कार्य भी सम्मिलित करना चाहिए, जिससे उसे आनंद की अनुभूति हो। जब मैं बनारस में अपनों के स्नेह, शिक्षा और व्यवसाय से वंचित हो गया,तो उदासी भरे उन दिनों में  कंपनी गार्डेन से मित्रता कर ली थी। इस सुदंर वाटिका में प्रातः भ्रमण किया करता था। वहाँ बुजुर्ग आपस में जो ज्ञानवर्धक संवाद करते थे,वह मेरे अवसाद का शमन करता था। 
 और यहाँ अब मैं अपने विचारों को शब्द देने का प्रयास कर रहा हूँ। यही मेरी औषधि है। आज सन्त कवि कबीरदास की जयंती है। आत्मबोध के लिए इनके इस संदेश पर मनन आवश्यक है --

  " मोको कहाँ ढूंढें बन्दे,मैं तो तेरे पास में।"


   अर्थात  स्वयं के भीतर विद्यमान प्रकाश के स्त्रोत और शांति की अनुभूति से ही दुःख और अज्ञानता पर विजय संभव है ।

       और रही साइकिल संग मेरी मित्रता,तो जीवन के संध्याकाल में ही सहचरी की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। इसने न सिर्फ़ मेरे पैरों को वरन् मस्तिष्क को भी क्रियाशील रखा है। जो ईमानदारी की झंकार मेरी वाणी में, वह भी इसी से है। यदि साइकिल का त्याग कर मैंने मोटरसाइकिल की सवारी की होती, तो आज़ पुनः भूख से संघर्ष कर रहा होता अथवा भ्रष्टतंत्र के हाथों की कठपुतली बना फिरता। अथक परिश्रम से अर्जित जो कुछ भी धन मैंने संचित कर रखा है, वह बाइक की उदरपूर्ति में ख़र्च हो गया होता।

          - व्याकुल पथिक

    

Monday, 1 June 2020

मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल [ भाग -2]

     
मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल [ भाग -2]
(जीवन की पाठशाला से)

      पिछले लेख की की प्रतिक्रिया में " ब्लॉग जगत की मीरा" की उपाधि से विभूषित कवयित्री मीना दीदी ने मुझे यह एक उपयोगी परामर्श दिया था-" प्रिय शशिभाई, आपकी साइकिल भी आपकी तरह स्वाभिमानी है,आपने स्वयं उसका दर्द समझ लिया तो ठीक वरना वह मौन रहकर सब सहती रहेगी। अब उसको ठीक कराइए। काम के लिए नहीं तो थोड़ा बहुत घूम फिर आने हेतु उसका प्रयोग कीजिए।" 
     उनकी प्रतिक्रिया निश्चित ही मुझे चौंकाने वाली रही।सो,अपने अतीत और वर्तमान को टटोलते हुये स्वयं से यही प्रश्न कर रहा हूँ-"  मैं और यह मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल क्या कभी सुख के साथी भी रहे हैं ?"
   मुझे आश्चर्य हो रहा है कि मैंने ऐसा पहले क्यों नहीं सोचा और सत्य तो यह भी है कि इसने सिर्फ़ मेरे दुःख ही बांटे हैं। मुजफ़्फ़रपुर में जब यह पहली बार मेरे पास आयी तब से लेकर अब तक साइकिल का उपयोग मैंने अपने मनोरंजन के लिए नहीं किया है। साइकिल लेकर कभी किसी धर्मस्थल अथवा पर्यटन स्थल नहीं गया। इसे लेकर स्कूल- कॉलेज जाने का तो प्रश्न ही नहीं था। उस समय साइकिल मेरे लिए एक स्वप्न थी। मैंने इसके पहियों को महज़ अपनी आजीविका के लिए घंटों इन कठोर सड़कों पर घसीटने के अतिरिक्त इसे कभी कोई सुख नहीं दिया है। अतः जो बोया सो काट रहा हूँ, मेरा जीवन भी नीरस और कष्टमय रहा। मेरे लिए यह एक सब़क है। एक अलग प्रकार की अनुभूति है।जैसी क्रिया वैसी ही प्रतिक्रिया यही प्रकृति का मूल सिद्धांत है। जीवन में उत्साह के लिए उत्सव आवश्यक है। सामाजिक एवं धार्मिक पर्वों का सृजन इसीलिए हुआ है। हमें अपने समस्त उत्तरदायित्व के बावजूद अपने मनोविनोद के लिए कुछ वक़्त निकालना ही चाहिए , अन्यथा कहने को फ़िर यही शेष रहेगा- मन पछितैहै अवसर बीते। मैंने ऐसा नहीं किया, इसलिए अपनों से दूर हो गया। 
       साइकिल के प्रति मेरी लालसा की भी एक रोचक कथा है। तब मैं लगभग दस वर्ष का था।  बनारस में मेरे पिता जी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। अतः जहाँ तक मुझे स्मरण है मेरा परिवार रिक्शे का प्रयोग वर्ष में दो बार ही करता था। श्रावण मास में दुर्गा जी-मानस मंदिर और 25 दिसंबर (बड़ा दिन) को सारनाथ जाने के लिए । माता-पिता के साथ हम तीनों भाई -बहन एक ही रिक्शे पर बैठते थे। जिससे रिक्शावाले को जहाँ चढ़ाई होती थी, अधिक श्रम करना पड़ता था और हम पाँचों को भी परेशानी होती थी। रिक्शा चालक के ललाट से टपकते पसीने की बूँदों को देख मेरा बालमन भावुक हो उठा था। जहाँ मेरे परिवार के अन्य सदस्य दर्शन-पूजन,मनोरंजन और वार्तालाप में व्यस्त थें, वहीं मैं गुमसुम इस चिंतन में डूबा हुआ था कि काश ! मेरे पास भी एक छोटी साइकिल होती तो हम दोनों भाई इस पर और वे तीनों रिक्शे पर होते। जिससे न रिक्शावाले को अत्यधिक श्रम करना पड़ता और न ही मेरे परिवार को यात्रा में कठिनाई होती। ऐसा सोच-सोच कर मैं इस "बड़े दिन" पर अपना दिल छोटा किये जा रहा था। मैंने आनंद के उस क्षण को व्यर्थ जाने दिया। परिणाम यह रहा कि बुद्ध की प्रतिमा के समक्ष खड़ा होकर भी बोधिसत्व नहीं बन सका। अपने ही परिवार में मेरी इस करुणा, संवेदना और भावनाओं का कभी मोल नहीं रहा। सम्भवतः इसलिए कि मेरे अभिभावकों के लिए वह आर्थिक संघर्ष का दौर रहा। शिक्षण कार्य के प्रति समर्पित होकर भी पिता जी को श्रम का प्रतिदान नहीं मिल रहा था। यह पीड़ा उनकी झुँझलाहट में परिवर्तित हो गयी थी।  हम बच्चों के हृदय को पढ़ने की अपेक्षा हमारे लिए रोटी की व्यवस्था उनके लिए महत्वपूर्ण थी।
     उधर, जिस अवस्था में बच्चे मनोरंजन के लिए साइकिल की माँग अपने अभिभावकों से करते हैं, इसकी उपयोगिता के प्रति मेरा यह दृष्टिकोण बिल्कुल अलग ही था।  मैंने अन्य मित्रों की तरह कभी अपने अभिभावकों से यह नहीं कहा कि मुझे साइकिल चाहिए। इसके पश्चात कोलकाता ननिहाल चला गया तो वहाँ मोटर कार  देखने को मिला। ऐसे में साइकिल की क्यों आवश्यकता पड़ती,परंतु मेरे नन्हे से हृदय में यह आकाँक्षा कभी नहीं हुई कि मेरे पास भी कार हो।
     वापस बनारस आने के पश्चात जब कक्षा दस का छात्र था, अभिभावकों को बिना बताए कॉलेज परिसर में एक सहपाठी की पहल पर पहली बार साइकिल की सवारी की थी। लेकिन तब तक बचपन पीछे छूट चुका था, फ़िर साइकिल सीखने में वह आनंद कहाँ ? 
   और हाँ मेरे पास स्वयं की अपनी साइकिल तब आयी ,जब मैं दूसरी बार मज़फ़्फ़रपुर गया। यहाँ एक थ्रेसर निर्मित करने वाली फ़ैक्ट्री में पहली बार मुझे स्टोरकीपर की नौकरी करनी पड़ी। यह पुरानी साइकिल मेरे लिए स्व० मौसा जी ने साढ़े तीन सौ रुपये में खरीदा थी, क्योंकि फ़ैक्ट्री काफ़ी दूर थी। बारह घंटे की ड्यूटी थी। मैं सुबह एक घंटे साइकिल चला कर जाता और रात जब लौटता, तो मेरी यह संघर्ष सहचरी और मैं दोनों ही बूरी तरह से थक चुके होते थे। प्रतिदिन सुबह आंगन में खड़ी साइकिल मुझे फ़ैक्ट्री की याद दिलाती थी। मौसा जी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी।सो, आत्मनिर्भरता के लिए मुझे भी कुछ तो करना ही था। परंतु हम दोनों खुश थे, क्योंकि सुबह उठ कर मौसी जी मेरे लिए उबली सब्जी और रोटी बना दिया करती थीं,जो मुझे पकवान से भी अधिक प्रिय थी, जबकि मेरी साइकिल इसलिए प्रसन्न थी, क्यों कि प्रत्येक रविवार मौसा जी उसका ख़ूब सेवा-सत्कार किया करते थे। 
  यह फ़ैक्ट्री शहर से बाहर थी। रात्रि में सुनसान मार्ग से घर वापस लौटते हुये जब मैं भयभीत होता, तो मुझे स्मरण हो आया था कि सारनाथ जाते समय साइकिल की चाह मुझमें स्वयं के मनोरंजन  के लिए नहीं, वरन् अपनों के हित में जगी थी। सो, जैसी कल्पना की थी, वह साकार हो रही है, फ़िर इसप्रकार विचलित और उदास क्यों होऊँ ? हाँ, यह भी सत्य है कि मैं उस साइकिल का आनंद कभी नहीं उठा सका था। वह मेरी संघर्ष सहचरी बन कर रह गयी थी। मेरे सारे स्वप्न बिखर गये थे। हाईस्कूल में गणित में 98 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला छात्र उस फ़ैक्ट्री के स्टोर में बैठकर नटबोल्ट गिना करता था।
   यदि मैंने भावनाओं पर नियंत्रण रखा होता , अपनों के तिरस्कार को गले लगा कर अपनी शिक्षा पूर्ण कर ली होती और घर का त्याग नहीं किया होता ,तो आज़ मेरे पास अपना मकान और   परिवार दोनों होता।
     यही भावुकता ही मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है।घर,परिवार और समाज के मध्य हमें रहना है, तो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना होगा। लोकाचार हमें आना चाहिए, क्योंकि भावना जल है, जिसमें तैरा जा सकता है, किन्तु घर बनाने की आवश्यकता जब भी पड़ेगी, हम विवेकरूपी चट्टान की खोज करेंगे। जिस घर में रहकर हम अधिक सुरक्षित एवं व्यवस्थित होने का अनुभव करते हैं। मैंने अपनी भावनाओं को बुद्धि की कसौटी पर नहीं कसा, विवेकरूपी अंकुश का प्रयोग नहीं किया, इसीलिए सिलिगुड़ी में जन्म लेने के पश्चात बनारस से लेकर कोलकाता, मुजफ़्फ़रपुर, कलिम्पोंग अब इस मीरजापुर में यूँ भटकता रह गया। न अपना आशियाना बना सका न ही घर बसा सका।
      किन्तु ऐसा भी नहीं है कि जीवन में मुझे कुछ भी नहीं प्राप्त हुआ है। जहाँ विष है,वहाँ अमृत भी होता है। मैं अतीत में की गयी अपनी गलतियों को समझ रहा हूँ और विचारों के धरातल को छोड़ कर भावना के आकाश में उड़ने जैसी दुर्बलता से मुक्त होने के लिए प्रयत्नशील हूँ। सच तो यह है कि यह पीड़ा सुकृतियों की पाठशाला है और आत्मपीड़न से आत्मदर्शन प्राप्त होता है।  
 ( क्रमशः)
          - व्याकुल पथिक


Thursday, 28 May 2020

मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल [ भाग -1]

 मेरी संघर्ष सहचरी साइकिल [ भाग -1]
(जीवन की पाठशाला से)

      मैं अनुपयोगी सी खड़ी अपनी पुरानी साइकिल को देख रहा था। जिसने मुझे 'साइकिल वाले पत्रकार भाई' की पहचान दी है। अन्यथा कोई किसी को यह तो नहीं कहता न कि कार वाले पत्रकार -बाइक वाले पत्रकार ? 
    तभी ऐसा लगा कि आज यह मुझे उलाहना दे रही है, क्योंकि पिछले दो महीने से बिना साफ़-सफ़ाई के वैसे ही खड़ी है और पहिए की हवा भी निकल चुकी है । यूँ कहें कि इस लोकबंदी में हम दोनों की स्थिति एक जैसी ही है। हमारी भागती-दौड़ती ज़िदंगी में ठहर गयी है। न मेरे पास कोई काम है और न ही इससे (साइकिल) किसी को काम है। मैं अपनी पूँजी खा रहा हूँ और यह भी यूँ खड़े-खड़े अपने कलपुर्जों को !
     लोकबंदी के पश्चात यदि मैं पुनः अख़बार वितरण प्रारम्भ कर सका,तभी इसका भाग्योदय संभव है ,अन्यथा एक दिन इसे कोई कबाड़ी उठा ले जाएगा। दो माह पूर्व जिस प्रकार मैं समाचार पत्र का बंडल न आने से अपनी आजीविका खोने के भय से काँप उठा था, ठीक वैसी ही स्थिति कबाड़ी के रूप में अपनी मौत से साक्षात्कार होने की कल्पना मात्र से मेरी साइकिल की भी है।फ़र्क हम दोनों में सिर्फ़ यह है कि मैं अपनी वेदना को व्यक्त कर सकता हूँ और यह मौन- निस्सहाय  खड़ी है। 
    हाय ! इसके रुदन को मैंने पहले क्यों नहीं सुना ? किसी ने सत्य कहा गया है कि मनुष्य प्रत्येक संबंध को अपनी आवश्यकतानुसार स्वार्थ के तराजू पर तौलता है। मैं भी यही कर रहा हूँ, जब तक इसकी उपयोगिता थी,तो इसका कितना ध्यान देता था, किन्तु आज़ इसकी भूख की मुझे चिन्ता नहीं है ? इन दो महीनों में इसके प्रति मेरे व्यवहार में ठीक वैसा ही परिवर्तन आया है , जिस तरह आत्मीय जन संबंध में दरार पड़ने पर सम्मुख हो कर भी अज़नबी बन जाते हैं। मैं यह कैसे भूल गया कि मेरे जीवन में आये अनेक तूफ़ानों की यह साइकिल ही एकमात्र साक्षी है। सर्द रात में ज़ब सड़कें भयावह लगती थीं। यह मेरी यह  "संघर्ष सहचरी "साथ होती थी। पूरे पच्चीस वर्ष प्रतिदिन औसत साढ़े तीन घंटे मैंने साइकिल चलाई है। दो घंटे समाचार पत्र वितरण और शेष समाचार संकलन आदि इसी के सहारे तो करता रहा।
   अरे भाई ! साइकिल वाले पत्रकार भाई का सम्मान मुझे ऐसे ही नहीं मिला है,किन्तु इस लोकबंदी में मेरी ही तरह यह भी अनुपयोगी हो चुकी है। वर्ष 1994-95 की बात करूँ, तो मैं एक वर्ष तक इस शहर में पैदल ही अख़बार लिये भटकता रहा। मीरजापुर से रात्रि 12 बजे जब वापस बनारस पहुँचता ,तब अपने पाँव को थामे, सिसकियाँ रोके माँ को पुकारा करता था, यद्यपि यह दर्द उस भूख से बड़ा नहीं था, जिसके लिए ताउम्र काशी छोड़ने को मैं विवश हुआ। महानगरों से मीलों लम्बी पैदल यात्रा कर घर वापस लौट रहे इन प्रवासी श्रमिकों को देख ,मुझे इनकी क्षुधा और पीड़ा की अनुभूति इसीलिए है कि मैंने भी पूरे वर्ष भर प्रतिदिन छह घंटे खड़े-खड़े बस में सफ़र ही नहीं किया, वरन् हाथों में ढेर सारे अख़बार लिये तीन घंटे किसी अनजान शहर में लम्बे-लम्बे डग भरता सड़कें नापा करता था।  तब मेरी एक ही ख़्वाहिश थी कि किसी प्रकार साइकिल रखने की व्यवस्था इस अनजान शहर में कहीं हो जाती। 
   और यहाँ साइकिल से मित्रता होने के पश्चात एक दिन भी (समाचार पत्र कार्यालय में अवकाश के दिन को छोड़कर)  ऐसा नहीं रहा कि मैंने हाथ-पाँव जोड़ कर इसे मनाया न हो। सवारी करने से पूर्व इसकी सीट पर दुलार से थपकियाँ दिया करता था। जरा भी उबड़-खाबड़ स्थल पर इसका पहिया पड़ा नहीं कि अगले दिन सुबह भागा -भागा उसके डॉक्टर के पास जा पहुँचता था,इस आशंका से कि कहीं  रिम डायल न हुआ हो अथवा ट्यूब पंचर तो नहीं है। आज़ इसकी इस स्थिति के लिए दोषी मैं नहीं तो कौन है ?
          ओह ! मैं कैसे इतना निष्ठुर और कृतघ्न हो सकता हूँ कि जो साइकिल वर्षों से मेरी आजीविका में सहयोगी रही। जिसके साथ मैंने जीवन के तिक्त और मधुर क्षण बिताए है। जिसने मेरी दुर्बल काया को अवलंबन दिया।उसकी देख-भाल भी मैंने नहीं की ! इसीलिए न कि यह मेरे लिए अनुपयोगी हो गयी है। जैसे पिछले दो महीनों से मेरे अख़बार का बंडल नहीं आने से यहाँ मेरी कोई उपयोगिता नहीं रही।  संस्थान ने कभी यह नहीं पूछा - " शशि , तुम बाहर रह कर इन दो- ढ़ाई महीने से अपना ख़र्च किस प्रकार चला रहे हो ।"
       मैंने सोचा था कि चलो विज्ञापन और अख़बार का जो बकाया बिल है,उसके ही कुछ रुपये मिल जाएँगे, तब भी काम चल जाएगा। दुर्भाग्य से ऐसा भी नहीं हुआ, मेरे सिर्फ़ दो-तीन  पाठकोंं को ही इसका स्मरण रहा । इस लोकबंदी में यह उनका मेरे ऊपर बड़ा उपकार है, अन्यथा मुझे अपने परिश्रम का धन भी अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। तो क्या मेरे साथ जो कुछ हो रहा है , मैं भी वहीं अपनी इस प्रिय साइकिल के साथ करुँ ? क्या यही मानव धर्म है ? मेरी चेतना मुझे सावधान कर रही थी । 
        अरे हाँ ! कल तो 30 मई (हिन्दी पत्रकारिता दिवस) है। मैं वर्ष 1994 से ही इस अवसर पर मंच से अनेक विद्वान वक्ताओं का यह उपदेश सुनता आ रहा हूँ-
          " पत्रकार केवल समाचार नहीं बेचता है। वह सिर भी बेचता है और संघर्ष भी करता है। उसका कार्य प्रजा के दुःख को सरकार के समक्ष रखना, उसे सही परामर्श देना और आवश्यकता पड़ने पर उसके अन्याय के विरुद्ध अपनी लेखनी को गति देना है। पत्रकार यदि यह कर्तव्य नहीं निभाता है, तो वह भी एक दुकान है,किसी ने सब्जी बेंच ली और किसी ने ख़बर, आदि-आदि..।"
     ऐसे ही आदर्श वाक्यों का प्रयोग हम पत्रकारों ,पत्र प्रतिनिधियों और संवाददाताओं के लिए आज के दिन होता है, किन्तु इस लोकबंदी में जब हम श्रमजीवी पत्रकार अपने संस्थान, समाज और सरकार की ओर इस आशा से टकटकी लगाए हुये थे कि क्या हमें भी किसी प्रकार का आर्थिक सहयोग मिलेगा, तब ऐसे उपदेशक कहाँ चले गये ?
     इन दो माह में पत्रकारिता मुझे अवसाद की  ओर लेती गयी, तन्हाई की ओर लेती गयी। जहाँ प्रवासी श्रमिक तक अपने घरों की ओर भाग रहे थे। मैं जीवन की शून्यता और दर्द को समेटे अपने  आशियाने को ढूंढ रहा था। मेरा कौन है ? मेरे लिए किसी का अपनापन क्यों नहीं है ? क्या मैंने पुरुषार्थ नहीं किया , फ़िर मेरे जीवन की बगिया क्यों नहीं मुस्काई ? क्यों वेदनाओं की कठपुतली बना विदूषक सा औरों का मनोरंजन और ज्ञानवर्धन अपनी लेखनी के माध्यम से करता रहा ? क्या इस सभ्य संसार में निखालिस कुछ भी नहीं है,समय और भाग्य का यह कैसा अत्याचार है ?
      मुझे अपने एक अन्य शुभचिंतक का हितोपदेश स्मरण हो आया है । चार-पाँच वर्ष पुरानी बात है। मैं संदीप भैया की दुकान पर बैठा हुआ था कि भाजपा के वरिष्ठ नेता रामदुलार चौधरी आ गये। वे हमलोगों के साथ हँसी-ठिठोली भी कर लिया करते हैं। सो, सबके समक्ष ही उन्होंने मुझसे कहा था कि पता है,सबरी मुहल्ले में फलां कह रहा था -" ई पगलवा पत्रकार कब-तक साइकिल से अख़बार बाँटता रहेगा ?"
    आरा मशीन संचालक चौधरी साहब मेरा उपहास नहीं कर रहे थे। वे मुझे इस सत्य का बोध करवाना चाहते थे कि अर्थयुग में सिक्के की झंकार ही सब सुनते हैं। उन्होंने कहा था -"समय के साथ चलना सीखों। जरा देखों अपने इर्द-गिर्द , तुम्हारे बाद आये कितने ही रिपोर्टर बिना अख़बार के ही साधन संपन्न हो गये हैं और तुम हो कि हड्डी पर कबड्डी खेल रहे हो।"      
       अत्यधिक श्रम एवं मेरे गिरते हुये स्वास्थ्य को लेकर वे चिंतित थे।  कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति यह नहीं कहेगा कि ऐसा कोई व्यापार करो, जो घाटे का सौदा हो ? पत्रकारिता भी अब मिशन नहीं व्यवसाय है। आज कंधे पर खादी का झोला लटकाए चलने वाले पत्रकार और संपादक नहीं रहे। समाजसेवा, राजनीति, चिकित्सा, शिक्षा और पत्रकारिता भी, यहाँ व्यापार है।
       मुझे नहीं पता कि मेरी साइकिल सही रास्ते पर रही अथवा मार्ग भटक गयी, किन्तु आजीविका खोने के अपने तीन दशक पुराने भय पर इस लोकबंदी में मैंने विजय पा ली है, क्योंकि आज़ मैं बेकार होकर भी भूखा नहीं हूँ । बुभुक्षा एवं तृषा से भरे मेरे जीवन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। 
  ( क्रमशः)
            -व्याकुल पथिक

    

Sunday, 24 May 2020

कोरोना काल की त्रासदी

कोरोना काल की त्रासदी

   पिछले कई दिनों से यहाँ मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर विशेष श्रमिक ट्रेनों का आगमन होता रहा है। घंटों विलंब से पहुँची इन रेलगाड़ियों ने एक बार फ़िर साबित कर दिया कि संकटकाल में भी देश का यह प्रमुख मंत्रालय "इंडियन टाइम" का कितना बड़ा अनुयायी है।  रेलवे स्टेशन  के प्लेटफार्म पर उतरते ही इन प्रवासी श्रमिकों का जिले के वरिष्ठ अधिकारियों ने ताली बजा कर स्वागत किया, किन्तु कैसा करुण दृश्य रहा, जब कोई मासूम बच्चा अपने पिता की उँगली थामे उसे लगभग बाहर की ओर खींचते हुये कह रहा था -" पापा ! अब घर आ गया है ,जल्दी चलो न ?  " और माताएँ अपने ज़िगर के टुकड़े को अपने आँचल में छुपाएँ बाहर खड़ी बस की ओर टकटकी लगाए हुये थीं। रेलवे प्लेटफार्म पर उतरते ही इन सभी प्रवासियों के मलिन मुख पर  चमक सी आ गयी थी । किस तरह से उन्होंने लॉकडाउन के 50-55 दिन महानगरों में एक कैदी की तरह अल्प भोजन करके गुजारे थे, इसे क्या वे आजीवन भूल पाएँगे ? फ़िर भी ये भाग्यवान हैं, जिनके लिए सरकार ने ट्रेन और बसों की व्यवस्था कर दी ,अन्यथा अनगिनत श्रमिक मुम्बई, सूरत, पुणे और अहमदाबाद जैसे महानगरों से ट्रक, आटो और साइकिल से अथवा पैदल ही आये हैं , जिनके स्वागत के लिए मार्ग में अफ़सर नहीं मौत खड़ी थी। इनमें भी कई ऐसे अभागे बीमार लोग थे, जिन्होंने अपने घर के चौखट पर दम तोड़ दिया है। जिनके प्रति शोक संवेदना व्यक्त करने की जगह गाँव वाले उन्हें कोरोना वाहक बता भाग खड़े हुये। अपने जिले का लक्ष्मण माझी भी इनमें से एक था। वह हरियाणा से पहले किसी वाहन और फ़िर पैदल सफ़र तय कर अपने गांव आया था। उसका शरीर ज्वर से तप रहा था। वाहन से गिरने के कारण सिर पर चोट लगी हुई थी। फ़िर भी पूरे धैर्य के साथ  लड़खड़ाती हुई साँसों को संभाले प्रयागराज से विंध्यक्षेत्र की दूरी पैदल ही तय कर उस शाम वह अपने गाँव पहुँचा था । उसने घर के चौखट को चूमा,चार दिन पूर्व दाम्पत्य सूत्र में बंधे अपने पुत्र-पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और कुछ ही घंटों पश्चात लॉकडाउन से ही नहीं जीवन से भी सदैव के लिए मुक्त हो गया। 

         विपत्ति जब आती है,तो मनुष्य को चहुँओर से घेर लेती है।तनिक सोचें जरा उस माँ पर क्या गुजरी होगी, जिसने चलती ट्रेन में रेलवे स्टेशन जबलपुर से पहले बच्ची को जन्म दिया। 23 घंटे तक का माँ-बेटी का साथ रहा। तत्पश्चात इस श्रमिक ट्रेन में ही उसने आँखें बंद कर लीं। यह परिवार ट्रेन से मुम्बई से मुजफ्फरपुर जा रहा था। मीरजापुर रेलवे स्टेशन पर नवजात के शव को बर्फ़ की सिल्ली पर रख उसे परिजनों को सौंप दिया गया।लॉकडाउन में मुंबई में फँसे इस श्रमिक परिवार की आँखों के आँसू भी कष्ट सहते-सहते सूख चुके थे।
       मार्ग में इन प्रवासी श्रमिकों को किस-किस ने नहीं लूटा। ट्रक चालक ने प्रत्येक यात्री से 35 सौ रुपये तक लिए। वह भी एक ट्रक में 70 से अधिक प्रवासी श्रमिक ठूँस दिये गये थे। भूख के समक्ष कैसा सोशल डिस्टेंस ? किस तरह से कर्ज़ मांग कर इन्होंने ये 35 सौ रुपये एकत्र किये, इसकी एक और करुण कथा है। विशेष ट्रेन की बात करें , तो सरकार अपनी पीठ थपथपा रही थी कि सभी प्रवासी श्रमिकों को मुफ़्त में ट्रेन का टिकट दिया गया है। परंतु यात्रियों ने बताया कि पुलिस की उपस्थिति में दलालों ने उनसे 6 सौ से 8 सौ रुपये लिया है। अर्थात उनके पास जो थोड़ा बहुत धन शेष था, वह भी "व्यवस्था" की भेंट चढ़ गया।  
    इधर, राजनीति के अखाड़े में क्या हो रहा है, यही न कि पक्ष-विपक्ष इन श्रमिकों की लाश पर अपनी सियासी रोटी सेक रहे हैं। जबकि इन श्रमिकों का प्रश्न यह है कि लॉकडाउन पार्ट-1 और 2 के दौरान सरकार ने उनको महानगरों से निकाल घर भेजने के संदर्भ में क्या किया ? यदि ऐसा होता तो लॉकडाउन-3 के दौरान धैर्य खो वे इस तरह से कष्ट सहते हुये पैदल ही मीलों सफ़र तय करने को बाध्य नहीं होते। आश्चर्य है कि एक साधारण मज़दूर भी इतनी समझ रखता है।अपनी जान सबको प्रिय है। न जाने क्यों हमारे रहनुमा इसे नहीं समझ सकें कि क्षुधातुर प्राणी को चंद्र खिलौना दिखला कर अधिक देर तक बहलाया नहीं जा सकता है।
  और यह कैसी विडंबना रही कि हममें से अनेक उस समय  पटाखे फोड़ दीपावली मना रहे थे ,जब ये प्रवासी श्रमिक मुंबई जैसे महानगरों में कोराना और भूख से संघर्ष कर रहे थे। वे बेरोज़गार हो गये थे। ऐसे श्रमिकों की क्षुधा तृप्ति के लिए थोड़ा सा छोला और चावल अथवा छह पूड़ी और आलू की सब्जी ,क्या इसे ही सरकारी लंच पैकेट कहते हैं? जबकि टेलीविज़न पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ सावधान कर रहे थे कि ऐसे समय में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए पर्याप्त और पौष्टिक आहार लिया जाए।

  •    आखिर क्यों इन श्रमिकों को कोरोना का आहार बनने के लिए छोड़ दिया गया? काश ! लॉकडाउन पार्ट 1 और 2 में धीरे-धीरे इन श्रमिकों की घर वापसी का प्रयास होता। महाराष्ट्र से प्रवासी श्रमिकों की गुहार यहाँ अपने जिले के अख़बारों के दफ़्तर में पहुँच रही थी। 

" मेरा परिवार  भूखा है। हमारे पास पैसे नहीं हैं।  हमें यहाँ से बाहर निकालो। हमारी जान खतरे में है । प्लीज़ , मदद करो भाई !"
  और उधर टेलीविज़न के स्क्रीन पर विभिन्न दलों के राजनेताओं का आपस में वाकयुद्ध चल रहा था। यदि इस वक़्त कोई आम चुनाव होता, तो पक्ष-विपक्ष के ये ही नेता इन प्रवासी श्रमिकों के दरवाजे पर दस्तक़ देते दिखतें। एक प्रत्याशी आम चुनाव में करोड़ों रुपया उड़ा सकता है, किन्तु ऐसी आपदाओं में वह सिर्फ़ घड़ियाली आँसुओं से काम चलाता है। दूसरी ओर करोड़ों- अरबों में खेलने वाली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लग्ज़री ओबी वैन ने ऐसी करुण पुकार लगाते लोगों का लाइव न्यूज़ तो ख़ूब दिखाया है, परंतु काश ! ऐसी कठिन परिस्थितियों में ये धन संपन्न न्यूज़ चैनलों के स्वामी अपने इसी वैन के साथ एक और वाहन भेज देते, जिसमें पीड़ितों के बच्चों के लिए खाने का कुछ सामान होता। तब इनकी भी संवेदनाओं की परख जनता को हो जाती । अन्यथा यह उक्ति "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" सरनाम है।  स्मरण रहे कि श्रेष्ठ पुरुष वह है, जो पराई पीड़ा को जान कर चुप नहीं बैठता है, बल्कि उनका उपकार करता है।
    शासन-सत्ता में बैठे राजनेता स्वयं ईमानदारी से बताए कि उन सघन इलाके में जहाँ लॉकडाउन के कारण श्रमिक फँसे हुये थे, सोशल डिस्टेंस का ध्यान रख पाना क्या संभव था ? यही कारण है कि अपने मीरजापुर जनपद में दिल्ली से आये तबलीग़ी मरकज़ के तीन जमातियों को छोड़ कर कोरोना के शेष जितने भी मामले आ रहे हैं, सभी का संबंध मुम्बई से है। 
   विद्वानों का कथन है कि राष्ट्र, समाज और परिवार तभी सुखमय होगा, जब हम समस्याओं पर अपने ही नहीं दूसरों के भी दृष्टिकोण से विचार करते हैं। तभी वह हल जो किसी पर थोपा हुआ नहीं लगेगा, बल्कि वह सर्वसम्मति से सबका उत्तर होगा। क्या हमारी सरकार भी ऐसा करती है ?
  वैसे भी श्रमिक तो ऐसे हिम्मती लोग हैं, जो मझधार में पड़े होकर भी तूफान की ताकत को परखते हैं। इनके हौसले को सिर्फ़ भूख ही तोड़ सकती है और यही हुआ है। अतः लॉकडाउन-3 का उल्लंघन किस विवशता में उन्होंने किया, किसकी नादानी से किया, राजनेताओं को इस पर आत्मचिंतन करना होगा । यदि हम इन श्रमिकों के अश्रु को मुस्कान में नहीं बदल सकें,इनके पसीने की बूँदों का मोल नहीं समझ सके , तो यह इनके भाग्य का अभिशाप नहीं,वरन् व्यवस्था का दोष है। 
       अभी तो एक और चुनौती का सामना घर वापसी के  पश्चात प्रवासी श्रमिकों को करना पड़ सकता है। क्यों कि इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि वर्षों बाद महानगरों से वापस घर लौटे श्रमिकों को अपने ही गाँव की माटी का रंग बदला नज़र आए अथवा इनके ही सगे-संबंधी इन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी समझ लें। यह "प्रवासी " होने का तमग़ा ऐसा ही होता हैं। अपने ही देश में एक प्रांत से दूसरे प्रांत में कोई व्यक्ति आजीविका की तलाश में क्या गया कि उसकी पहचान बदल गयी। उसके प्रति अपनों का दृष्टिकोण बदल गया। न वह यहाँ का रहा,न वहाँ का । ऐसा भी होता है। अतः इन प्रवासी श्रमिकों की अगली परीक्षा आजीविका की पुनः खोज होगी। देखना है कि हमारी सरकार इन श्रमिकों को इनके गाँव के आस-पास ही रोज़गार मुहैया करवाने के लिए क्या करती है।
    पूंजीपतियों की नगरी में वापस जाने की कल्पना मात्र से ये मज़दूर काँप उठ रहे हैं। 
महानगरों में ये भोलेभाले इंसान जिस प्रकार स्वार्थ के तराजू पर तौले गये हैं। जिसकी दहशत अब भी उनकी नम आँखों में है, इससे स्पष्ट है कि उनकी वापसी शीघ्र संभव नहीं है। इन्होंने इन महानगरों में अपने जीवन को संवारने का मन में एक काल्पनिक सुंदर चित्र बनाया था, किन्तु वापसी पर मैंने देखा इनके झोले में कुछ बर्तन और वस्त्र के अतिरिक्त कुछ भी कीमती सामग्री न थी। मैंने इन प्रवासी श्रमिकों की मनोस्थिति को समझने की कोशिश की, मानो वह कह रही हो-
" ऐसी दुनिया में मेरे वास्ते रखा क्या है ?"

                        
 - व्याकुल पथिक

Monday, 18 May 2020

अभिशप्त बचपन


अभिशप्त बचपन 
"चल निकाल, दस का फुटकर ! "
  संदीप भैया की आवाज़ सुनकर चारों लड़कियों के मासूम चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है। इनमें जो सबसे छोटी थी वह सिर पर से अपनी पोटली उतार कर ज़मीन पर रखती है और फ़िर एक..दो..तीन ..चार.. कुछ इस तरह बुदबुदाते हुये भीख में मिले सिक्कों की गिनती शुरू कर देती है। मैंने देखा कि उसे गिनती-पहाड़ा तो नहीं आता फ़िर भी हिसाब में पक्की थी। उसने सिक्कों के पाँच ढेर बना कर रख दिये और उन्हीं में से एक ढेर जिसमें एक-एक के दस सिक्के थे ,संदीप भैया को थमा दिया। 
     भैया ने उन चारों को दो-दो सिक्के दिये। वे मुझे बताते हैं कि लॉकडाउन में जब बाज़ार बंद है, तो उन्होंने उन सभी भिखारियों को, जो उनकी दुकान पर आते हैं एक की जगह दो रूपये देने का निर्णय लिया है, जबकि स्वयं उनका कारोबार  ठप्प है। मैंने धंधे में उतार-चढ़ाव को लेकर उन्हें कभी विचलित होते नहीं देखा। जीवन  में परिस्थितियाँ अनुकूल-प्रतिकूल चाहे जैसी ही, उनका यह समभाव मुझे पसंद है, इसी कारण मैं शाम का कुछ वक़्त यहाँ गुजारता हूँ। अपने विकल हृदय को समझाने का प्रयत्न करता हूँ कि स्वास्थ्य, सम्पत्ति और स्वजनों के वियोग को लेकर तू इतना अधीर क्यों है ? क्या जीवन की क्षणभंगुरता का तुझे बोध नहीं है ?
  
    वैसे, आज इन चारों बच्चियों से न जाने क्यों मुझे भी चुहलबाज़ी करने की इच्छा जग गयी थी । 
    मैंने उनसे कहा -" क्यों री ! पता है न लॉकडाउन है ,फ़िर भी तुम सब झुण्ड बनाए घूम रही है। चल तुम्हें पुलिस से पकड़वाता हूँ । "

   अभी मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उनमें से  जो सबसे समझदार थी, वह बिना भयभीत हुये तपाक से बोल पड़ी--  " जा-जा कह दा साब , ऊ पुलिस वाले त हमने के पैसा देत हैन अऊर खाना भी। "
   सच में उन चारों ने अपनी गठरी में खाने का सामान ले रखा था। मैंने अनुभव किया कि  लॉकडाउन भले ही इस सभ्य समाज के लिए अभिश्राप हो, लेकिन इन भिक्षुक बच्चों के लिए यह वरदान है। मैं इसी चिंतन में खोया रहा कि तभी बड़ी वाली लड़की आँखें मटकाते हुये बताती है कि प्रतिदिन पचास-साठ रुपये की कमाई के साथ अब भोजन के पैकेट भी मिलते हैं। 
     इस लॉकडाउन में इन्हें दुत्कार कम और  सामान अधिक मिल रहा है। अतः वे खुश थीं। मैंने इन चारों की ग्रुप फ़ोटोग्राफ़ी की। मेरे मोबाइल के स्क्रीन पर अपना फ़ोटो देख वे खिलखिला कर हँसी और मुझसे मोबाइल की कीमत पूछती हैं।
   मैंने भी  कहा- " बीस हजार , बता तो सही कितना हुआ ? "  
 जिसपर आँखें फाड़े वे कभी मुझे और कभी मोबाइल को देखने लगती हैं। ये बच्चियाँ सौ-पचास रूपये तो जानती हैं, किन्तु इससे अधिक की गिनती नहीं मालूम। हाँ, उन्होंने हजार रुपये का नाम सुन रखा था, पर बताने में असमर्थ थीं।
  उन्हें इसतरह सिर झुकाए देख मैंने आवाज़ ऊँची कर कहा -" स्कूल तो जाती नहीं फ़िर क्या बताओगी ? बस सुबह होते ही निकल पड़ी कटोरा लेकर भीख मांगने। "
  पत्रकार हूँ,तो यहाँ भी ख़बर ढ़ूंढने लगा। सो, अपनी बातों में उलझा कर मैं उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहता था कि क्या उनमें अब भी विद्यालय जाने की अभिलाषा शेष है ? 
मैं देख रहा था कि छोटी वाली बच्ची जिसने सिक्के गिनने के बाद जिस सलीक़े से से पोटली में गाँठ लगायी, उसका यह चातुर्य बालबुद्धि से परे है। जिस अवस्था में बच्चे स्कूल न जाने के लिए सौ बहाने बनाते हैं, उसी उम्र में यह लड़की अपने सिर पर यह छोटी सी पोटली नहीं, वरन् अपने घर-परिवार का बोझ उठा रही है। 

     परंतु मेरी वाणी में आयी इस कठोरता पर वे सहम गयी थी और बिना कुछ कहे गठरी अपने सिर पर रख चलने को हुईं, मैंने उन्हें फ़िर से रोक लिया और कहा- 
 " अच्छा चल यह बता कि तेरे माँ-बाप क्या करते हैं ? वे तुझे पढ़ने क्यों नहीं भेजते है ?

  जिस पर इन चारों लड़कियों ने बताया कि वे शहर के बाहरी इलाके में रहती हैं। उनके पिता कुछ नहीं करते हैं, जबकि महिलाएँ और वे सभी लड़कियाँ भीख मांगती हैं। सुबह होते वे अलग-अलग टोली में शहर की ओर निकल पड़ती हैं। उन चारों में अच्छी पटती है, सो वे एक साथ निकलती हैं। उन्होंने कहा कि वे नहीं जानती कि स्कूल कैसा होता है। हाँ, उन्होंने बच्चों  को स्कूल जाते देखा था और उनकी भी लालसा थी कि वैसा ही पोशाक पहन कर वे भी पढ़ने जातीं, परंतु यह कैसे संभव है।
  " पढ़े बेटियाँ, बढ़े बेटियाँ ", यह जो सरकारी जुमला है , इससे भिखारियों की बच्चियों के लिए साक्षर होना संभवतः नहीं है।
    ख़ैर, बच्चों की भिक्षावृत्ति के संदर्भ में संदीप भैया के संपर्क में आने से पूर्व मेरा दृष्टिकोण यह रहा कि इन्हें भीख देना अनुचित है। ऐसा करके हम इनके विकास का मार्ग अवरुद्ध कर रहे हैं। 
 एकदिन मैंने उनसे भी कहा था- " बूढ़े और अपंग भिखमंगों की टोली में आप इन मासूमों को भी न खड़ा करें, अन्यथा राष्ट्र के ये कर्णधार , भविष्य में उसपर बोझ बन कर रह जाएँगे ? " 
     प्रतिउत्तर में उन्होंने कहा था कि इन बच्चों का भविष्य उज्जवल हो,क्या इसके लिए ऐसी कोई व्यवस्था है ? कम से कम उनके द्वारा दिया गया यह एक-दो रुपया उन बच्चों के उदर को तो तृप्त करता है। इसी पैसे से कोई समोसा खरीदता है, तो कोई केला अथवा चाकलेट भी, अन्यथा इनकी कौन सुधि ले ? 
    उनका कथन अनुचित नहीं है। सरकार और समाज के पास इन बच्चियों के लिए तनिक सहानुभूति के अतिरिक्त और है भी क्या ?

  " भिक्षावृत्ति एक अभिश्राप " ऐसे अनेक निबंध छात्र जीवन में पढ़ने-लिखने को मिला हैं। कई डरावनी कहानियाँ भी पढ़ी थीं कि बच्चा चोर गिरोह किस तरह से छोटे बच्चों को उठा ले जाता है और फ़िर उन्हें भीख मांगने के लिए प्रताड़ित करता है। महानगरों में ऐसा हो सकता है। परंतु अधिकांशतः यही देखने को मिलता है कि भिखमंगे अपने बच्चों से भी यही कार्य करवाते हैं। यही इन कर्महीनों की आजीविका है। जबकि वे भी समझते हैं कि समाज की दृष्टि में भिखारी एक तुच्छ वस्तु है।  
      इस लॉकडाउन की बात करूँ, तो ये बच्चे मेरे जैसे निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति की तरह निर्धन नहीं हैं, जिनके पास इस वैश्विक महामारी में आय का कोई साधन शेष नहीं है। और प्रतिष्ठान अथवा संस्थान के मुखिया ने भी अपनी विवशता बता ,जिन्हें  भाग्य के भरोसे छोड़ दिया है। ये बच्चे उन प्रवासी श्रमिकों की तरह हतभाग्य भी नहीं हैं, जिन्होंने पेट थाम कर कितनी ही रातें गुजारी हैं। और जब भूख की पीड़ा असहनीय हो गयी तो घर वापसी के लिए ऐसे कष्टदायक यात्रा पर निकल पड़े, जहाँ राह में मौत खड़ी थी। 

  मेरा मानना है कि मलिन वस्त्र धारण करने वाले इन बच्चों के पास अब भी दूसरों को देने के लिए वह निश्छल मुस्कान है,जो इस सभ्य समाज के भद्रजनों के पास नहीं है। इन भिखारी बच्चों ने छल का वह चश्मा नहीं पहन रखा है कि मीठी वाणी बोल कर दूसरों के वैभव को हर लें। ये मन के सच्चे बच्चे हैं,नियति ने इन्हें अपनों की आँख का तारा न बनाया हो तो भी, इनके पास अपने परिजनों को देने के लिए धन और भोजन दोनों  है। 
   इनमें आपस में कितना सहयोग का भाव यह भी देखा मैंने , जब संदीप भैया किसी बच्ची से यह पूछते हैं- " क रे ! तू त लिये है न,फ़िर कइसे ?"
 जिस पर संबंधित लड़की दूसरी बच्ची की ओर इशारा कर कहती है-"  हम एके दिलावे आये हय न ।"
    जब तक वह एक का सिक्का नहीं मिलता है, कितने धैर्य के साथ ये चुपचाप खड़ी रहती हैं। और परिश्रम भी क्या ये कम करती हैं । इन्हीं नन्हे पाँवों से ये प्रतिदिन सुबह से शाम तक नगर का एक बड़ा हिस्सा भ्रमण करती हैं। सभ्य समाज के बच्चों की तरह वे किसी प्रिय वस्तु के लिए लोभ नहीं करती हैं। किसी से स्नेह और सहानुभूति के दो शब्द की मांग नहीं करते हैं,  फ़िर भी इनके जीवन-संघर्ष का बिना मूल्यांकन किये, हम कहते हैं कि ये भिखारी हैं ?

  हम यह क्यों भूल जाते हैं कि इन मासूमों के भी कुछ स्वप्न हैं। जिन्हें पूर्ण करने का दायित्व इस सभ्य समाज का है और यदि इस समाज ने इन्हें ऐसा कोई अवसर नहीं दिया है कि वे अपने गुणों का विकास करें,तो इनका तिरस्कार कैसा और क्यों ? जीवन और जगत की यह कैसी विचित्र विडंबना है !!

     - व्याकुल पथिक

   

Monday, 11 May 2020

ड्रिंकिंग डे

ड्रिंकिंग डे

     इस लॉकडाउन में जब धनी-निर्धन सभी आर्थिक रुप से पस्त हैं। रोज़ी- रोटी को लेकर परेशान हैं। ऐसी स्थिति में भी मैं निठल्ला बिना किसी चिन्ता-फ़िक्र के संदीप भैया के प्रतिष्ठान के सामने स्थित देशी- विदेशी मदिरा की दुकानों पर अँगूर की बेटी के प्रभाव और उसके रहस्योद्घाटन में उलझा हूँ।
   मैंने देखा कि भोलेनाथ के प्रिय दिवस सोमवार को जैसे ही लॉकडाउन के तीसरे चरण के प्रथम दिन (4 मई) मदिरालयों का कपाट खुला लम्बी कतार में खड़े पियक्कड़ों में जो पहला ग्राहक था, वह प्रथम पूज्य गणेश बन गया। माला पहना कर उसका स्वागत  शराब विक्रेता द्वारा किया गया। और फ़िर जो यहाँ अद्भुत दृश्य देखने को मिला, उसका वर्णन संभव नहीं है । कोई पैंट के दोनों  ज़ेब सहित कमीज़ के अंदर और दोनों हाथों में बोतल थामे दिखा, तो कोई झोले में भरकर ले जा रहा था। किसी ने अपनी बाइक की डिग्गी को बोतलों से इस प्रकार सजा लिया, जैसे वह शराबी चित्रपट के महानायक की कार की डिग्गी हो। एक ऐसा व्यक्ति भी दिखा, जो मोटर साइकिल से अपनी दस वर्षीया बच्ची के साथ आया था। बच्ची के कंधे पर एक ख़ूबसूरत बैग था। मैंने देखा कि दारू की बोतलें उसके बैग में रखते देख जिज्ञासा वश मासूम लड़की ने सवाल किया था-" पापा ! यह क्या है? " 
  सम्भवतः उससे सोचा हो कि कोल्डड्रिंक है।
   जिसके प्रतिउत्तर में उस व्यक्ति को यह कहते सुना- " चुप कर ! मम्मी को मत बताना, चल तुझे चाकलेट दिलवाता हूँ।"
   हाँ, विदेशी मदिरा के पड़ोस में स्थित देशी शराब की दुकान पर, जहाँ निम्न वर्ग के ग्राहक आते हैं,पहले की तरह चहल-पहल नहीं थी।
इस वर्ग का ज़ेब जो खाली है। अतः जो भी आते दिखा, समझ लें कि वह अपने ही घरवालों के पेट पर डाका डाल कर , हौली पर आया है । 
      सत्य यही है कि शासन से लेकर श्रमिक तक जिसके समक्ष नतमस्तक हैं,उसका नाम शराब है। देश और प्रदेश में भगवान राम को अपना आदर्श मानने वालों की सरकार के लिए भी इस संकटकाल में यह वारुणी ' धनदेवी' बनी हुई है। उसने एक बार पुनःसिद्ध कर दिया है कि सत्ता और समाज पर वर्चस्व उसका ही है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि इस लॉकडाउन में जहाँ देवालयों के कपाट बंद हैं, वहीं मदिरालयों पर रौनक़ क़ायम है।
      अपने मीरजापुर जनपद में चार मई को मदिरालय खुलते ही लोग लगभग एक करोड़ का शराब गटक गये। पियक्कड़ों की एकजुटता के समक्ष सोशल डिस्टेंस का पालन करवाने वालों की ज़ुबान लॉक हो गयी । इस सोमरस के मद का ही प्रभाव है कि ज्ञानी पुरुषों की संवेदनाओं और नैतिकता की परिभाषा बदल गयी है। जिनके हाथों में शासन की शक्ति है और जो उनके अनुयायी हैं,वे शराब की दुकानों को इस वैश्विक महामारी में खोले जाने का यह कहकर समर्थन कर रहे हैं कि यदि सरकारी  ख़ज़ाने में धन नहीं आएगा, तो देश की अर्थव्यवस्था डाँवाडोल हो जाएगी। 
  ख़ैर, शासन ने तो अपने राजस्व प्राप्ति का मार्ग निकाल लिया, किन्तु व्यापारी और जनता के लिए भी क्या मदिरा जैसी कोई जादुई छड़ी है , जिससे इस तालाबंदी में उन्हें भी अर्थ अर्जन का कोई स्त्रोत मिल जाए ?
  मेरा तो मानना है कि चार मई जिसने सरकारी खजाने को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है , इसे तो निश्चित ही " ड्रिंकिंग डे " का सम्मान मिलना चाहिए। किन्तु ऐसा करने से पूर्व  गृहणियों से भी संवाद कर लेना चाहिए। वे हमारे देश के रहनुमाओं को बताएँगी कि लॉकडाउन के मध्य ज़ब वे घोर आर्थिक संकट का सामना कर रही थीं, इस दिन घर की लक्ष्मी का किस प्रकार अनादर हुआ है। घर में जो कुछ धन शेष था, उसमें से भी एक बड़ा हिस्सा ऐसे पुरुषों ने "अंगूरी" की भेंट चढ़ा दिया। 
   मसलन,जनधन खाते में आये पाँच सौ रूपये को ही लें। जिसे बैंक से निकालने के लिए ऐसी महिलाओं ने भगवान भास्कर के प्रचंड ताप को चुनौती देते हुये गृहस्थी का सारा कार्य त्याग कर लम्बी कतारें लगायी थीं। किन्तु चार मई को हुआ क्या ? इस छोटी सी धनराशि में से जो भी पैसा शेष था, उसपर उनके पियक्कड़ पतिदेव ने बलपूर्वक अपना अधिकार जमा लिया। श्रमिकों के बैंक खाते में  सरकार ने जो एक हजार रूपया डाला था, यदि उसमें से कुछ शेष बचा था ,तो वह भी हौली की भेंट चढ़ गया। क्या लॉकडाउन में खुली शराब की दुकानों से पीड़ित ऐसी गृहलक्ष्मियों के प्रति सरकार की कोई संवेदना नहीं है ? भाकपा के वरिष्ठ नेता मो० सलीम जैसे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि घर-परिवार चलाने के लिए उन्होंने जिन ग़रीबोंं का आर्थिक सहयोग किया था, उसमें ऐसे भी निकले जो हौली पर दिखें।
    मज़दूरों और महिलाओं को शासन से मिला हजार-पाँच सौ रूपया भी यदि नशे की भेंट चढ़ जाए, तो सरकार की यह उदारता फ़िर किस काम की ? सत्य ही कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति हर कार्य को निज स्वार्थ की तराजू पर तौलता है। जिसके लिए समाज और शासन दोनों ही बराबरी  का दोषी है। 
   फ़िर भी कथनी और करनी में एकरूपता की परख तभी होती है ,जब चुनौती सामने हो। हिम्मती तो वे लोग ही कहे जाएँगे,जो मझधार में पड़े हो, फिर भी तूफ़ानों को झेलने का हौसला रखते हो।अन्यथा मानवीय कल्याण की बड़ी-बड़ी लच्छेदार बातें करना किसे नहीं पसंद है। इस युग में सबसे बड़ा परोपकारी आदमी पुरोहित  और संत नहीं, वरन् राजनीतिज्ञ होता है, क्यों कि शास्त्रों के जानकार तो हमें स्वर्ग भेजने का आश्वासन मात्र देते हैं, किन्तु राजनेता धरती पर ही स्वर्ग उतार लाने का दावा करता है। 
   आम चुनाव में ग़रीबी हटाओ, शाइनिंग इंडिया और अच्छे दिन जैसे जुमलों के माध्यम से राजनीतिज्ञ धरती पर स्वर्ग के आगमन का आश्वासन ही तो देता है ? लक्ष-लक्ष मानव मन की आकाँक्षाओं के प्रतीक अब ये राजनेता ही हैं, इन्हीं में से किसी एक को योग्य समझ कर जनता उसके हाथों में अपना नेतृत्व सौंपती है। अब चाहे विपत्ति में वे मदिरा पिलाए अथवा दूध ?
   अपने जनपद में 4 से 9 मई के मध्य लगभग दो हजार पेटी अंग्रेजी शराब मूल्य  1 करोड़, चार हजार पाँच सौ पेटी देशी शराब ,मूल्य 1करोड़ 30लाख 50 हजार रूपया और ग्यारह सौ पेटी बियर मूल्य 29 लाख 70 हजार बिकी है।अथार्त अनुमानित मूल्य 2 करोड़ 60 लाख 20 हजार की शराब छहः दिनों में बिकी है। जिसमें से लगभग एक करोड़ की मदिरा 4 मई को ही बिक गयी थी और शेष 1.60 करोड़ की पाँच दिनों में ,अतः इस आंकड़े से स्पष्ट है कि जब पूरा विश्व कोराना जैसी महामारी से जूझ रहा था, उसी लॉकडाउन के मध्य 4 मई 2020 को पियक्कड़ों ने नया इतिहास रच दिया। ऐसे में इस दिवस को " ड्रिंकिंग डे " के नाम से पुकारा जाए, तो इसमें बुरा क्या है ?
   लेकिन, हौली की ओर बढ़ते कदम भी हौले-हौले थमने लगे हैं, क्यों कि ज़ेब फ़िर से खाली हो गया है। और ऐसे में एक बड़ा ख़तरा यह भी है कि नशे की सस्ती और हानिकारक सामग्रियों का प्रयोग किया जाएगा।

  - व्याकुल पथिक