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Saturday, 7 April 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 8/ 4/18

आत्मकथा

     कर्मपथ पर आगे बढ़ने के लिये किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसका एहसास अब मुझे होने लगा है। अचनाक यह परिवर्तन क्यों कि एक व्याकुल पथिक को गणतव्य तक पहुंचने का मार्ग दिखने लगा...
    मित्रों ,  जब से मैं अपने पत्रकारिता जीवन के संघर्ष काल के संस्मरणों को , व्यथा कथा को लिखने लगा। व्याकुलता बढ़ने लगी । अपनों के वियोग और एकाकीपन का एहसास होने लगा। वैराग्य की तलाश में मन भटकने लगा। कोई ऐसा साधक तो हूं नहीं कि पद्मासन या सिद्धासन में आंखें बंद कर बैठ जाऊं और मस्तिष्क को संज्ञा शून्य कर दूं। अभी इस वैराग्य भाव के अभ्यास में वर्षों लगेंगे। तो फिर पत्रकारिता जीवन के संघर्ष भरे इस पच्चीसवें वर्ष में आखिर कौन सा अमृत कलश मुझे मिल गया कि अशांत मन को कुछ तसल्ली हुई है। धन का लोभ तो मुझे है नहीं । सो, कुछ मित्रों की तरह कोई मदिरालय की लाटरी भी नहीं निकली है ,मेरे नाम । मैं तो पूरा खाटी पत्रकार ठहरा । फिर मदिरा की दुकान खोल कर नये लड़कों को यह पत्रकार धर्म बताना तौबा-तौबा। हां, यदि ऐसा कोई धंधा घर गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिये कर भी लेता, तो उसी दिन से पत्रकारिता छोड़ देता। ताकि युवा पीढ़ी की पत्रकारिता दिशाविहीन तो न होने पाये। अरे भाई !  पत्रकारिता के क्षेत्र में अमृत रुपी मदिरा कलश जब पा ही गये हो, तो धन की समस्या अब रही नहीं, मिशन तुम्हारा समाज के प्रति कोई है नहीं, फिर क्यों पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हो। जो लोग हमारे पेशे को पवित्र समझते हैं, उसे अपावन करने की अब ऐसी क्या जरूरत।  हर उन लोगों से मेरा विनम्र अनुरोध है कि यदि पत्रकारिता में आकर अपना मनचाहा अमृत कलश पा गये हों , तो कृपया प्रस्थान करें, इस रंगमंच से । अब देखें न जब से राजनीति में बाहुबलियों, धनबलियों , माफियाओं का साम्राज्य स्थापित हो गया है, हमारे जिले के जुझारू कामरेड सलीम भाई जैसे तेजतर्रार पुराने नेताओं को  माननीय कहलाने जैसे अमृत फल की प्राप्ति हो ही नहीं  सकी । वे छोटे बैनर तले अपने सिद्धांतों की लड़ाई लड़ जरुर रहे हैं। परंतु जब कोई पावर हाथ में होगा , तब न विचारों को कार्य में परिणित करने का अवसर मिलेगा। तभी उनकी परख होगी कि कितना अच्छा दिन ला पाते हैं , वे भी। पर यहां तो अनाड़ी को खिलाड़ी बनाया जा रहा है। यही स्थिति पत्रकारिता की भी है। राजनीति का ककहरा नहीं जानने वाले धन सम्पन्न दागदार लोगों की इंट्री होते ही, उनसे विज्ञापन और धन प्राप्ति के लोभ में हम उनका बस्ता ढोने लगते हैं। सो, यह कहां तब याद कि सलीम भाई भी मैदान में खड़े हैं। विचार करें कि आज की पत्रकारिता कहां जा रही है ? आंखें शर्म से नीचे क्यों नहीं झुकती हमारी , जब हम हत्या अपहरण, रंगदारी वसूली जैसे मामलों में शामिल सफेदपोश माफियाओं के यहां दरबारी बने खड़े रहते हैं। आज कल एक नया शब्द पत्रकार प्रयोग करने लगे हैं , वह यह कि संस्थान को व्यवसाय चाहिए, इसलिए " चमेली का तेल " लेकर निकला हूं...
   खैर , आज के लेखन का मेरा मूल विषय यह रहा कि ढ़ाई दशक के पत्रकारिता जीवन के संघर्ष में मुझे कौन सा अमृत कलश मिल गया ! तो वह है, यह " व्याकुल पथिक ब्लाग "।  इस ब्लाग पर मैं अपना हर अनुभव, पीड़ा और संघर्ष आसानी से व्यक्त कर पा रहा हूं। कुछ मित्रों ने कहा कि यह सब लिख कर समय क्यों व्यर्थ कर रहे हो। इस अर्थ युग में किसे फुर्सत है कि तुम्हारी व्यथा कथा में वह रुचि ले। परंतु मेरा नजरिया  उन प्रसिद्ध कथावाचक संत की तरह है, जिन्होंने टाउनहाल, वाराणसी के एक रामकथा में कहा था कि मान लो कि दिन रात मैं राम नाम का माला फेर रहा हूं। और यदि ईश्वर का अस्तित्व नहीं हो, तो क्या मेरा यह मंत्रजाप व्यर्थ हो गया ? जानते हैं कथावाचक संत जी का अगला वाक्य क्या था । उन्होंने कहा था कि ऐसी परिस्थिति में भी मंत्र जाप  का फल व्यर्थ नहीं है। मंत्र जाप से तुम्हारा मन एकाग्र होगा। मस्तिष्क में अनावश्यक विचार नहीं आएगा । तब मैं इंटर की कक्षा में था। बाद में जब कुछ माह एक आश्रम में रहा, तो वहां " सतनाम " जपते रहने को कहा गया। आज भी जब व्याकुलता बढ़ती है, तो मैं तेजी से इस नाम का जाप करता हूं। जबकि कुछ वर्षों से मैं नास्तिक जैसा हूं।
    तो भाई  यह जो मैं लिख रहा हूं न , वह भी इसी मंत्र जाप की तरह ही है, क्या फर्क पड़ता है यह औरों के लिये उपयोगी नहीं हो। अब किसी पुस्तक पर आप ढेरों राम - राम लिखते जा रहे हैं, तो उसे ही कौन पढ़ता है। परंतु उससे आपके मन को शांति मिलती है कि नहीं ? इसी तरह से इस ब्लाग पर यह लेखन मेरे लिये अच्छा टाइम पास होगा, जब मैं पत्रकारिता छोड़ दूंगा। (शशि)

क्रमशः
व्याकुल पथिक 7/4/18

आत्मकथा

    पत्रकारिता में विद्वत्ता ही प्रमुख पहचान नहीं होती है। सवाल यह बना रहता है कि हम किसके लिये लिखते हैं, क्या लिखते हैं और कितना लिखते हैं। यदि हम लोभ में आकर चाटूकारिता भरी पत्रकारिता करेंगे, तो भले ही कितनी भी बड़ी बड़ी डिग्री क्यों न लिये हो, पोल खुलना तय है। यह पब्लिक है न जो, वह सब जानती है। अब देखें न तमाम इलेक्ट्रॉनिक चैनल हैं  और उसके पत्रकार भी। लेकिन आम आदमी का सुपरस्टार कौन हैं, इस क्षेत्र में, तो नाम रवीश कुमार का स्वतः ही जुबां पर आ जाएगा। समयाभाव के कारण मैं टेलीविजन तो नहीं देख पाता। फिर भी स्क्रीन पर पांच -सात बार रवीश कुमार को खास अंदाज में जनहित के मुद्दे उठाते देखा हूं। बढ़िया लगा। नहीं तो सलमान-सलमान के शोर में पूरे दिन टीवी बुक ही रहा। लेकिन समाज को क्या संदेश मिला। मेरे एक अनुज जो विंध्याचल क्षेत्र के हैं, को मेरी सादगी भरी पत्रकारिता पसंद है। उनका कहना रहा कि आपके ही तरह  बनना चाहता हूं। तो मेरा उनसे यही कहना है कि लेखनी का उपयोग उन लोगों के लिये न करें, जिन्होंने समाज की व्यवस्था को चोट पहुंचाई हो। भले ही वे अपने बाहुबल, जातिबल और धनबल से स्टार बन गये हो। लगदक खादी पहन कर लग्जरी गाड़ियों के काफिले से निकल रहे हों। माननीय भी बन गये हो। फिर भी पहचान उनकी नहीं बदल सकती, न ही सोच ही । भले ही भय और स्वार्थ से लोग उनके सामने नतमस्तक होते हैं। इस जनपद में ऐसे अनेक बाहुबलि सफेदपोश बन कर आयें। परन्तु मैंने अपनी कलम से उनका महिमामंडन नहीं किया। यदि किसी को विज्ञापन देना था, तो उसका पेज अलग था। उसके साथ वह अपनी सामग्री भले ही प्रकाशित करवा ले। परंतु मैं अपनी कलम से तभी कुछ लिखूंगा, जब आप कुछ अच्छा करें। और जो लिखूंगा वह भी ऐसे लोगों के पुराने इतिहास को ध्यान में रखकर। इसी कारण तो समाज में मेरी पहचान पत्रकारिता जगत में अलग रही। आखिर हम पत्रकार क्या संदेश देना चाहते हैं , अपनी लेखनी से ऐसे दागदार राजनेताओं को जन नायक बना कर। बड़ा कठिन डगर है एक खाटी पत्रकार की , मेरे भाई। तमाम अपराधों में लिप्त गुंडों, अवैध कारोबार से जुड़े लोगों को यदि आप समाजसेवी बता देंगे, अखबार के अपने कालम में, तो फिर क्या खाक पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाएंगे। सो, जब तक अखबार है, चैनल है तभी तक जनता में आपकी पहचान रहेगी। उसके बाद आपका पर्दे के पीछे वाला पत्रकार धर्म लोगों को याद रहेगा। इसीलिए मित्रों यदि  पत्रकार  बनना है, तो लोभ, चाटूकारिता और जुगाड़ वाला लेखन तो छोड़ना ही पड़ेगा । चाहे परिणाम उसका कुछ भी हो।अतः पत्रकार यह आत्मावलोकन करते रहें कि आमजन के हित में कितने कालम की खबर सप्ताह -पखवाड़े भर में लिखते हैं। और पत्रकार धर्म क्या यह कहता है कि हम अपना अधिकांंश समय किसी वरिष्ठ अधिकारी को पटा कर अधिनस्थ कर्मचारियों को मनचाहे स्थान पर तैनाती दिलवाने में जाया करें ? या जिसने हमारी इच्छा की पूर्ति नहीं की हम उनकी शिकायत करते रहें। सो, मित्रों पत्रकारों का मंच सजाना और बात है, लेकिन एक पत्रकार के रुप में पहचान बनाना हंसी खेल नहीं है। किसी वरिष्ठ अधिकारी को खुश करने के लिये हम कलम तोड़ लेखनी चलाएंगे, तो यह जनता बेवकूफ तो है नहीं। मैं किसी को कठघरे में खड़ा करने के लिये यह सब नहीं लिख रहा हूं । हां यदि पत्रकार कहलाना है, तो इन सभी लोभ से ऊपर उठना ही होगा । ऐसा मैंने करने का प्रयास किया, तभी आज अखबार बांटने के बावजूद भी अपने क्षेत्र में  कुछ तो अलग पहचान रखता ही हूं। सो, कुछ पाया है, तो बहुत कुछ खोया भी। लक्ष्य हासिल करने के लिये त्यग करना ही पड़ता है। अब आप ठेकेदार, कोटेदार ,सरकारी मास्टर, राजनेता, व्यापारी भी हैं और पत्रकार भी हो जाना चाहते हैं , तो दो नाव की सवारी भला कैसे करोंगे... (शशि)

क्रमशः

Friday, 6 April 2018

व्याकुल पथिक 6/4/18
   आत्मकथा

     संघर्ष से ही व्यक्ति शुद्ध होता है और बुद्ध बनता है। संघर्ष की राह में सहयोग भी है, तो प्रलोभन भी। सो,पत्रकारिता के संघर्ष में प्रलोभन , उत्पीड़न और सहयोग एक प्रमुख विषय है। अब तो अपने मालिकान के लिये भरपूर विज्ञापन संकलन की जिम्मेदारी भी हम जिला प्रतिनिधियों की होती है। हां, बड़े अखबारों में ब्यूरोचीफ प्रेस की तरफ से आता जाता है। सो, उसका वेतन पक्का है। लेकिन, स्थानीय पत्रकारों को काफी कम पैसा उसका प्रेस देता है। फिर भी हमें अपने ईमान पर चलना है । बनारस से यहां आया तो चालीस रुपया रोज मुझे मिलता था। बाद में दो हजार रुपया महीने में मिलने लगा। स्थिति तब वर्ष 1995 में मेरी यह रही नहीं कि स्कूटर- बाइक रख लूं। उस समय के एक उदार दिल वाले जिले के वरिष्ठ युवा अधिकारी जिनके आवास पर मैं साइकिल से ही जाया करता था। वे मेरे परिश्रम , समाचार संकलन की ललक और उसे सत्य के करीब रख कर प्रकाशन से काफी प्रभावित थें। रात्रि में उन्हें गांडीव का इंतजार रहता था। संवेदनशील अधिकारी थें, तो स्वभाविक है कि उन्हें यह लगा हो कि पत्रकारिता जगत में बनारस से अखबार लाकर और फिर उसे यहां वितरण करना काफी कठिन काम है। खैर, एक दिन उनके एक कनिष्ठ राजपत्रित पुलिस अधिकारी ने मुझे बुलाया। उनसे भी मेरी खूब बनती थी। उन्होंने धीरे से मुझे बताया कि साहब की इच्छा है कि आप भी बाइक से हो जाएं। इससे पत्रकारिता करने में आपको सहूलियत मिलेगी। यह कोई प्रलोभन नहीं बल्कि सहयोग भाव रहा साहब (आला अफसरों  को हम पत्रकार तब साहब ही कहते थें) का। दरअसल इस विभाग में गाड़ियां अकसर ही समय समय पर निलाम हुआ करती हैं। सो, मेरी व्यवस्था भी हो रही थी । यह मेरे पत्रकारिता जीवन का पहला बड़ा तोहफा था और जो साहब इसकी व्यवस्था करवाना चाहते थें, उनकी छवि भी उस समय ईमानदार अफसर की थी। मेरा युवा मन मचल रहा था। मानो चंद्र खिलौना मेरे पास आने वाला हो...

   यहीं मेरे पत्रकारिता धर्म की बड़ी परीक्षा थी। मन कह रहा था कि अन्य पत्रकारों की तरह तुम भी बाइक से चलोगे, तो बड़ी इज्ज़त मिलेगी, पर अन्तर्रात्मा की आवाज थी कि जब तुमने लाखों की अपनी अचल सम्पत्ति (घर) यूं ही छोड़ दी है, तो इतना बड़ा कोई गिफ्ट ना लो कि फिर उसी की खुशी में तिरोहित हो जाओ। वैसे भी बचपन से लेकर अब तक मेरा जीवन कटी पतंग की तरह ही है... कहीं से तनिक भी खुशी मिली, यह मेरी नियति को स्वीकार नहीं है।  फिर से मुझे उसी निराशा हताश भरे दलदल में खींच लाती है वह । सो,  मन को मुंशी प्रेमचंद की बाल मन से जुड़ी हृदयस्पर्शी कहानी ईदगाह के पात्र हामिद की तरह समझाता रहा कि मोटर साइकिल लेकर क्या करोंगे भाई ,कहां से लाओगे तेल। इसमें क्या जनहित है और यह साइकिल तुम्हारी असली पहचान है, आदि आदि...
   खूब समझाया था तब मैंने , उससे कहा था कि जानते हो न कि यह सहयोग तुम्हें कितना महंगा पड़ेगा।दो हजार की नौकरी में अपने साथ अब बाइक का भी पेट कैसे भरोगे भाई । लेकिन, इसका भी एक विकल्प था , क्यों कि कतिपय पत्रकारों को एक पर्ची जब तब किसी पेट्रोल पम्प की मिल जाया करती थी। जाहिर है कि यह पर्ची थामना एक पत्रकार के नैतिक धर्म के विपरीत था। इतना तो घर से संस्कार लेकर निकला ही था। सो, उस ब्रेक के बादलों आज तक साइकिल से ही चल रहा हूं। क्योंकि बात गाड़ी के उसी तेल खर्च की आकर फंस जाती है। पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं धन सम्पन्न लोगों, व्यापारियों और राजनेताओं से भी अच्छा परिचय हैं। तमाम लोग अपनत्व का भाव भी रखते हैं। उन्होंने मेरा भी निःस्वार्थ भाव से सहयोग किया है। आज भी मैं जो राही लाज में शरण ले रखा हूं। वह क्या है , सहयोग ही तो है। कहां सहयोग है और कहां आपकी कलम को बंधक बनाया जा रहा है, इस पर भी विचार करना पड़ता है एक पत्रकार को। मेरी लेखनी अच्छी थी, तो स्वहित में उसका उपयोग भी लोग उठाना चाहते थें। तब अखबार भी खूब मार्केट में था। लेकिन, मैंने किसी की पार्टी और लंच-डिनर अनावश्यक स्वीकार नहीं किया । इसकी प्रेरणा मुझे अपने गुरु जी स्व० पं0 रामचंद्र तिवारी जी से मिली थी। वे गांडीव के विशेष सम्वाददाता थें। परंतु अपने से स्वयं कुछ भेजते नहीं थें। जो खबर होती थी, वह मुझे बताया सिखाया करते थें। शाम को अखबार बांटते हुये मैं उनकी स्टेशनरी की दुकान पर शहर कोतवाली के सामने जा खड़ा होता था। इससे पहले एनआईपी के वरिष्ठ पत्रकार लल्लू चाचा को भी लालडिग्गी में उनकी दुकान पर अखबार देता था। जैसा कि बता ही चूका हूं कि सुबह यहीं उनके आवास पर बैठ कर समाचार लिखता था। मेरी पत्रकारिता पर इन दोनों ही विपरीत स्वभाव के वरिष्ठ गुरुजनों का काफी प्रभाव पड़ा है। सो, मैंने बेधड़क प्रलोभन रहित समाचार लेखन किया। साथ ही निश्चित भी रहता था कि यदि कहीं फंसा, तो लल्लू चाचा तो हैं ही। रही बात दबाव की तो मुझसे बलपूर्वक आज तक कोई भी कुछ लिखवा छपवा नहीं सका है।(शशि)

क्रमशः

Thursday, 5 April 2018

व्याकुल पथिक 5/4/ 18

आत्मकथा

 मित्रों , यह न समझे कि मैं यह आत्मकथा जो लिख रहा हूं वह सिर्फ व्यथा कथा है अथवा ऐसा कर मैं इस समाज की सहानुभूति प्राप्त करना चाहता हूं, या फिर किसी से कोई मदद सहयोग चाहता हूं। मैंने अपने जीवन शैली को इतना साधारण बना लिया हूं कि आर्थिक सहयोग तो अब किसी से लेने की बिल्कुल ही जरुरत नहीं है मुझे। ढ़ाई दशक से श्रमिकों से भी कहीं अधिक पसीना बहा रहा हूं, तो दो जून की रोटी ईमानदारी से संचित धन से मिलना तय है। फिर क्यों लिख रहा हूं, यही सवाल हो सकता है न आपका। तो सुनें मेरे भाई , मैं यह आत्मकथा अपने उन साथी मित्र पत्रकारों के लिये लिख रहा हूं , जो ईमानदारी की राह पर चल कर एक अच्छा पत्रकार बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। उन्हें बताना चाहता हूं कि जिले में रह कर पेशे के प्रति सिर्फ ईमानदार होने से ही सफलता नहीं मिलती है, इस अर्थ युग में। बड़ा सवाल है कि आपके प्रेस का मालिक क्या चाहता है। जाहिर है कि आपकी ईमानदारी में उस समाज की कोई भूमिका तो शामिल रहेगी नहीं। जिसके लिये आप यह जहर निगल रहे हैं। यदि आप किसी मामले में फंसे, तो यही समाज आपको बेचारा कह किनारे हो लेगा। वह आपके लिये आगे नहीं आएगा, क्योंकि आप कोई स्टार राजनेता  अभिनेता अथवा प्लेयर तो है नहीं। जो की लोग आपके लिये सड़कों पर उतर आयें। फिर आपको जो बड़ी उम्मीद रहती है, इस संकट काल में कि प्रेस के मालिकान अपकी मदद करें। परंतु मेरा विश्वास करें मित्रों कि यदि आप यह सोचते है कि आपका सम्पादक आपकी मदद करेगा, आर्थिक सहयोग करेगा, वह यह समझेगा कि आपको साजिश के तहत विरोधियों ने फंसाया है, क्योंकि आप एक ईमानदार , कर्मठ और स्वाभिमानी सम्वाददाता रहे हैं। आपने किसी प्रलोभन के सामने घुटना अपने लम्बे पत्रकारिता जीवन में नहीं टेका है। आपने धन की चाहत में अखबार नहीं बदला है । आपकी खबरें वर्षों से पाठकों में पसंद की जा रही है। आपने कलम के अतिरिक्त जीवनयापन के लिये और किसी धंधे का सहार  भी नहीं लिया है। और सबसे बड़ी बात की आपने खबर गलत नहीं लिखी है। मीडिया का यह जो व्यवसायीकरण है, इस दौर में आपका सम्पादक कुछ भी दलील आपकी सूनने को तैयार नहीं होगा साथियों। उलटे वहां भी आपकों तिरस्कार मिलेगा, अपमान मिलेगा, चेतावनी मिलेगी कि मामला जल्दी सुलटा लो। क्यों बवाल पालते हो बेजा। परंतु आपकों जिले स्तर की इस पत्रकारिता में आपके प्रेस मालिक की तरफ से मुकदमा लड़ने के लिये धन छोटे अखबारों  से फिर भी नहीं मिलेगा। फिर क्या करोंगे आप , कैसे लड़ोगे केस ? पहले से ही आप व्यथित हैं कि साजिशन फंसाये जो गये हैं। और अब पैसे की तंगी। मैं इसलिये आपकों सचेत कर रहा हूं। फिर फलां अखबार या चैनल के पत्रकार का तमगा आपका कितना सहयोग करेगा। इन ढ़ाई दशक में मेरे ही आंखों के सामने से कितने ही तपे तपाये पत्रकार गुमनाम से हो गये हैं। कुछ कब चले गये इस दुनिया से ,पता भी नहीं चला। तो मित्रों सोच लो फिर से कि ईमानदार पत्रकार बनना चाहते हो  या फिर जुगाड़ू । इन दिनों जिला प्रतिनिधि भी अपने को ब्यूरोचीफ ही कहने लगे हैं। इस शब्द में कहीं अधिक हनक है। पर कोई ब्योरा कर रहा है, तो वह भी जगजाहिर है। छुपा कुछ भी नहीं है मेरे भाई। मैं भी चाहता तो जुगाड़ू पत्रकार बन सकता था। युवाकाल में पुलिस महकमे से जुड़ी मेरी खबरों की हनक वाराणसी आईजी दफ्तर तक होती थी। इसी कारण कितने ही एसपी रात में होमगार्ड थाने पर भेज कर गांडीव मंगाना नहीं भुलते थें। हां मैंने अच्छे अफसरों की मदद भी की है। परंतु काम किसी से कोई नहीं करवाया। यदि उस तपे हुये बाजार में मैं चाहता तो दलाली न सही बीमा का काम तो कम से कम आसानी से कर ही लेता। कई साथी पत्रकार इस धंधे से मालामाल हुये भी हैं। परंतु ऐसे ऑफर मुझे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं थें। मैं सिर्फ पत्रकार ही बने रहना चाहता था, ताकि कोई यह न कहे कि यह तो पत्रकारिता का नकाब पहने बीमा कर्मी है। यह अपने पहचान और पावर का दुरुपयोग कर रहा है। एक आईएएस बहुत उदार थें पत्रकारों के प्रति , सो उन्होंने मेरा परिश्रम देख स्नेह से बड़े भाई की तरह समझाया भी कि कुछ अपने लिये भी सोचा है। तब पत्रकार कम हुआ करते थें। ऐसे आला अधिकारी उनकी हर सम्भव मदद को भी तैयार रहते थें। पर मेरा एक ही जवाब रहता था कि साहब हॉकर और पत्रकार के अतिरिक्त और कोई पहचान नहीं चाहता....
(शशि)
क्रमशः

Wednesday, 4 April 2018

व्याकुल पथिक आत्मकथा

व्याकुल पथिक 4/4/18

(आत्मकथा)

   एक बात तो मैं साफ साफ बता देना चाहता हूं कि जिस संघर्ष भरी पत्रकारिता को मैंने झेला है। अब उससे मुक्ति चाहता हूं। एकांत चाहता हूं। वैराग्य चाहता हूं। इसीलिये किसी भी विवाद में खुद को उलझाने में तनिक भी रुचि नहीं है। न ही समाजसेवी कहलाने जैसे तमगे की ख्वाहिश है। अतः आरक्षण  आदि समसामायिक विषयों पर खामोश हूं। हां एक अखबार का प्रतिनिधि हूं, तो आधा पेज खबर भेजनी पड़ती है। सो , बच बचा कर भेज देता हूं। यह पत्रकारिता धर्म के प्रति ईमानदारी नहीं है, जैसा मैं था। परंतु मैं जब तक हूं , मेरा प्रयास रहेगा कि जनहित में जितना भी हो सके, लिखता रहूंगा।  ऐसी पत्राकारिता नहीं करनी है, तो आप इस मीरजापुर में भूल से भी न ठहरें । यहां सड़ जाएंगे, अवसाद ग्रस्त हो जाएंगे। आज जो मुकदमें समाचार लेखन में मैं झेल रहा हूं न , यह बिरादर भाइयों की ही बड़ी साजिश रही, मुझे उस अखबार से बाहर निकलवाने की। मैं ईमान पर था, सो निकला तो नहीं, परंतु मुकदमे का फंदा अभी भी गले में पड़ा है। जिस कारण मैं इस पत्रकारिता को त्याग भी नहीं पा रहा हूं । जिसकों अब मैं करना ही नहीं चाह रहा हूं। यहां एक बात यह भी बतला दें कि दो नहीं मैं एक साथ तीन नाव की सवारी इस पत्रकारिता जगत में विगत ढ़ाई दशक से कर रहा हूं। समाचार लिखना,  फिर बंडल लाना और रात्रि में साढ़े 10 से 11 बजे तक पेपर का वितरण। 12 बजे के बाद बिस्तर पर जाना और सुबह 5 बजे उसे त्याग देना।  दिन भर परिश्रम का परिणाम क्या मेरा यही है कि सिर्फ पांच घंटे ही सोने को मिले। सिर में दर्द होता है, तो सांईं मेडिकल जिन्दाबाद है। सनी भाई कोई टिकिया दे ही देते हैं। सो ,मेरा मत है कि एक अच्छे खिलाड़ी के लिये खेल जगत से सबसे अच्छा सन्यास लेने का समय वही है, जब उसका प्रदर्शन उम्दा रहे , लेकिन उसे यह आभास होने लगे कि इस जज्बे को और बहुत दिनों तक वह कायम नहीं रख सकता। मेरी सोच तो कुछ यही ही है। क्योंकि मैं व्यापारी नहीं हूं, बल्कि एक पत्रकार हूं। अखबार बांट सकता हूं, बंडल ढो सकता हूं। परंतु विज्ञापन के लिये हर किसी के सामने हाथ नहीं फैला सकता हूं। न ही इसके लिये खबरों से समझौता ही कर सकता हूं। थोड़ा बहुत चलेगा, लेकिन बहुत नहीं। एक विधान सभा चुनाव की बात बताऊं । तब पेड न्यूज का युग था। नगर विधान सभा का चुनाव था।  एक राष्ट्रीय दल के प्रत्याशी की चुनावी फिजा बनाने पड़ोसी जिले से कई धुरंधर पत्रकार आये हुये थें। यहां के एक भव्य होटल में पनीर पकौड़ा कट रहा था। स्थानीय पत्रकारों के ईमान धर्म की डीलिंग हो रही थी। मुझे भी बुलाया गया। यहां से अच्छा विज्ञापन मिलता था। उस पार्टी के प्रत्याशी और अन्य स्थानीय नेता मुझसे स्नेह भी करते थें। सो, बुलावे पर मैं गया। साहब फिर क्या हुआ जानते हैं। पड़ोसी जनपद से आये एक युवा पत्रकार ने मुझसे भी कहा कि देखो भाई, मैटर मैं दूंगा। तुम्हारा चार- पांच सौ अखबार भी शाम को लूंगा। शर्त यही है, जो दूं उसे ही छपवाना है।बोलों सौदा पक्का की नहीं। सभी परिचित थें। कुछ बड़े अखबार मोटे हेडिंग में यह छाप भी रहे थें कि इस पार्टी के उम्मीदवार से अन्य सब प्रत्याशी लड़ रहे हैं। सो, दबाव मेरे ऊपर भी बहुत था। जबकि मैं साफ साफ देख रहा था कि इस पार्टी का उम्मीदवार पहले दूसरे स्थान की लड़ाई में है ही नहीं। फिर कलम कैसे बेच देता। तो मैंने विनम्र निवेदन किया कि भाई साहब मेरा पत्रकार धर्म यह  इजाजत नहीं दे रहा है। आप मुझे विज्ञापन देते आये हैं। सो, मैं इतना लिख सकता हूं कि आपके उम्मीदवार का व्यक्तित्व उमदा है। और उनकी चुनावी फिजा बनाने का जोरदार प्रयास शुरु है। तो कार से चलने वाले एक पत्रकार थोड़े नाराज भी हुयें। और कहा कि और बड़े अखबार वाले और हमलोग क्या बेवकूफ हैं। तूम तो अभी बच्चे ठहरे। अखबार बांटने वाला एक मामूली व्यक्ति भला मैं बड़े पत्रकारों से कहां पंगा ले सकता था। सो, सिर झुकाये चला आया। लेकिन, पेड न्यूज नहीं ही लिखा। चुनाव परिणाम आया, तो जाहिर था कि उन्हें पराजय हाथ लगी । चौथे नंबर पर जो प्रत्याशी था, उससे कुछ ही वोट उन्हें अधिक मिला।उन  बड़े समाचार पत्रों की जनता ने तब खूब हंसी उड़ाई और मैं साइकिल से देर रात तक अखबार बांटने वाला पत्रकार सीना ताने चल रहा था। मुंह छिपाने की जरुर नहीं पड़ी , उस पेड न्यूज युग वाले आम चुनाव में भी।(शशि)

क्रमशः

Tuesday, 3 April 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 3/4/18


पत्रकारिता में यदि मैं झोलाछाप  डाक्टर होकर भी आप पाठकों का स्नेह पा सकता हूं तो चिकित्सा जगत में भी ऐसे कर्मठ झोलाछाप डाक्टरों का मेरे नजरिये से गरीब वर्ग के लिये अपना अलग महत्व तो है ही।  मेरा मतलब है कि जो असली डिग्री धारी डाक्टर हैं, वे ही कहां कलयुग के भगवान रहे हैं अब। मरीज के आते ही महंगी दवा और जांच जब बाहर  से सरकारी डाक्टर लिख रहे हो, तो फिर प्राइवेट नर्सिंग होम और क्लीनिक खोल रखे डाक्टरों की तो पूछे ही मत,  फिर गरीब किसके पास जाए। हां ,झोलाछाप डाक्टरों को लोभ में आकर अपनी सीमा रेखा का उलंघन नहीं करना चाहिए। मुझे ही लें पत्रकारिता के लिये कोई खास अंग्रेजी नहीं आती, संस्कृत और उर्दू भी ज्ञान नहीं है। पर सरल हिन्दी भाषा में तो जनता के हितों की बात कर ही सकता हूं। बस काम और मिशन के प्रति ईमानदारी होनी चाहिए।  और एक बात जो मुझे समझ में आयी, वह यह है कि यह जो बुद्धिजीवी तबका है न , वह अपने हितों के लिये कुछ भी कर सकता है। चाहे समाज पर उसका प्रतिकूल प्रभाव क्यों न पड़े। आज पत्रकारिता के क्षेत्र में भी यही तो हो रहा है। वरिष्ठ कहलाने वाले तमाम पत्रकार अपने और अपने संस्थान के हित में अपने कलम को तोड़ मरोड़ ले रहे हैं। अखबारों का राजनीतिकरण भी हो गया है।  अब जनता के हितों के संरक्षण के लिये कलम कहां चल रही हैं।  हां अखबार के व्यवसायिक हितों को ध्यान में  रख कलम खूब चल रही है। मैंने ऐसा नहीं किया, भले ही सारे सम्बंधों कि बलि इस रंगमंच पर चढ़ा चुका हूं। यह इस त्यग का ही परिणाम है कि पत्रकारिता जगत में झोलाछाप हो कर भी इस रंगमंच पर अब  भी डट चमक रहा हूं।
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हमार नैतिक दायित्व ...

       क्या अब भी हम आप कोई सबक नहीं लेंगें। कुछ तो नैतिक दायित्व हमारा भी बनता है। समाज के प्रति और अपने गांव, शहर और देश के प्रति। हमारी आपकी जरा सी इसी गलती से ही एक हंसती खिलखिलाती बच्ची को इस तरह से  निर्मम मौत मिला है। जिसके लिये उस बोरवेल को खुला छोड़ने वाला शख्स ही नहीं हम सभी जागरूक वर्ग के लोग भी जिम्मेदार है। क्या गांव के लोग , प्रधान और  अन्य पहरुये इसकी शिकायत समय रहते नहीं कर सकते थें। और हम मीडिया वाले भी किसी हादसे के बाद ऐसे स्थानों पर अपने मतलब की खबर के तलाश में ही धमकते हैं। जबकि अखबार में हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के स्क्रीन पर कम से कम ऐसी जनसमस्याओं को तो प्रमुखता से उठाते ही रहना चाहिए।  कहां जर्जर तार लटक रहा है। आटो रिक्शे पर दर्जन भर से अधिक सवारी क्यों बैठे हैं। कहां गड्ढा खोद कर छोड़ दिया गया है। सरकारी बसें यात्रियों को समय से मिल रहे हैं कि नहीं।  आपूर्ति विभाग, सरकारी अस्पताल, समाज कल्याण विभाग से लेकर किसानों की समस्याओं पर अब  कितने कालम की खबरें लिखी जाती हैं, जरा पन्ना उलट कर बतायें। और जब लिखी भी जाती हैं तो यह जुगाड़ लगाया जाता है कि सम्बंधित विभागीय अधिकारी रिपोर्टर के प्रभाव में आ जाये और साहब फिर तो घोड़ा घास की आपस में दोस्ती हो जाती है।(शशि)

क्रमशः

Monday, 2 April 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 2/4/18
 आत्मकथा

      वैसे,पत्राकारिता के क्षेत्र में मैं स्वयं को एक झोलाछाप डाक्टर से अधिक कुछ नहीं समझता हूं। एक पत्रकार कहलाने के लिये मेरे पास कुछ भी तो नहीं है। न ही कोई  डिग्री है, न ही उच्च शिक्षा प्राप्त किया हूं। इस अर्थ युग के हिसाब से कोई तामझाम भी नहीं कि देखने में मैं स्मार्ट रिपोर्टर जैसा लगूं। पहले पैदल चलता था और अब साइकिल से। फिर भी लोग मुझसे और मेरी खबर से पता नहीं क्यों प्रभावित रहें। जबकि उस समय कई वरिष्ठ पत्रकार थें, समाचार पत्र भी। सम्भवतः मेरी सारी कमजोरियों को सत्य के करीब रहकर समाचार लिखने का प्रयास ढक लेता था। क्योंकि न तो इस पत्रकारिता जगत में यहां मेरा कोई गॉड फादर रहा, न ही कोई ऐसा पत्रकार संगठन , जिसके सहारे मैं ऊंचा उठ पाता। पत्रकार जिसे चौथा स्तम्भ मुझे बताया गया था, वे भी गुटबाजी और  जातिवाद से जकड़े हुये है, इसे मैंने यहीं आ कर करीब से देखा समझा। हालांकि मुझे हर किसी का स्नेह तब मिला। शायद यह पत्रकार बिरादरी भी मेरे परिश्रम से प्रभावित रहा हो !

क्रमशः


व्याकुल पथिक

       मोह को मैं अब तक अपने जीवन में कोई स्थान नहीं देना चाहता, न ही अर्थ प्राप्ति के लिये कोई नया कर्म ही। सो, मैं लोगों के बीच रहते हुये भी सबसे दूर रहने का भाव अपने हृदय में लाने का प्रयास कर रहा हूं। यहां तक कि अपने शरीर के प्रति भी मोह का त्याग करने का प्रयास कर रहा हूं। जब युवावस्था में पहुंचा था, तो इस शरीर को बनाने और सजाने के लिये क्या क्या नहीं प्रयत्न किया। भले ही अखबार बांटता था। परंतु स्वेटर मेरा वाराणसी के कंबल घर का होता था। जूता  बाटा, एक्शन अथवा किसी महंगी  कम्पनी का। कपड़े भी उसी तरह से। परन्तु वर्ष 1998 में असाध्य मलेरिया से जैसे ही पीड़ित हुआ सबसे पहले शरीर खो दिया। आज तक उसमें सुधार नहीं ला सका। फिर और कोई मोह इस माटी के पुतले के लिये क्यों करुं। हां स्वस्थ रहना चाहता हूं। तो इतना ध्यान रखना ही होगा कि आहार अनुकूल रहे। मैंने एक मोह से मुक्त आहार का चार्ट बना रखा है। जिससे शरीर का काम तो चल जाएगा पर स्वाद का लोभ भी नहीं रहेगा यहां। अपनी प्रिय वस्तुओं का लोभ भी नहीं रखना चाहता हूं। सारे पहचानों से मुक्त हो जाना चाहता हूं। इसी पहचान के मोह ने ही तो मुझे इतने लंबे समय तक एक ही रंगमंच पर कैद कर रखा है। पर अब व्याकुलता बढ़ते ही जा रही है। अपनों की हर यादों से मुक्ति चाहता हूं । सोचता हूं कि मेरा मस्तिष्क ही संज्ञा शून्य हो जाए। पर आनंन में तो दो ही लोग रहते हैं एक फकीर और दूसरा जिसे हम पगला कहते है। फर्क यह है कि फकीर को उस आनंन सुख की अनुभूति होती है, लेकिन दूसरे को नहीं। ऐसे में चैतन्य तो रहना ही होगा।  हां,  मैं जंगल में विचरण करने वाला वैरागी तो नहीं ही बनना चाहूंगा। जहां खोने के लिये.कुछ है ही नहीं, वहां त्याग फिर कैसा। अब जब ऐसे विचार मेरे मन में उठने लगे हो, तो फिर मैं अपने पत्रकारिता धर्म के प्रति ठीक से न्याय नहीं कर पा रहा हूं। मैं किसी की आलोचना करने से बचने जो लगा हूं। आप यदि एक सच्चे पत्रकार हैं, तो व्यवस्था में खामियों को आपकों उजागर करना ही होगा। यहां आपका कर्मपथ तय है। मैंने स्वयं तब तक ऐसा किया, जब तक मुझे लगा कि एक सच्चे  पत्रकार की तरह ही मुझे इस रंगमंच पर आखिरी शो करके अलविदा कहना है। परंतु  अब अंतरात्मा से यह आवाज उठ रही है कि बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा ना ....।

Sunday, 1 April 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक 1 / 4 / 18

आत्मकथा

    जनता से जुड़े किसी चुनाव को करीब से देखने और उससे कहीं अधिक उस पर अपनी कलम चलाने का यह मेरा पहला अवसर था। लगभग दो वर्षों की पत्रकारिता में मैं तब इतना तो अनुभवी हो गया था कि मुझे कहां,क्या और कैसे लिखना है। सो, अरूण दादा और कामरेड साथियों का भाषण कुछ अधिक गौर से सुनता था। उस समय पोस्टर वार जबर्दस्त हुआ। नागरिक संगठन की भी इसमें विशेष भूमिका थी। भाजपा को घेरने के लिये बड़े ही सटीक मुद्दे उछाले जा रहे थें। जो मुझे सही प्रतीत हो रहा था। सो, स्वतः ही मेरी लेखनी चल गई इस मीरजापुर के गांधी पर । पता नहीं  राजनीति से जुड़ी हलचलों को लिखना अचानक ही क्यों तब मुझे इतना भाने लगा कि एक समय बाद में ऐसा भी आया कि गांडीव का मीरजापुर वाला कालम पाठकों की नजर में राजनीति का अखाड़ा बन गया। तमाम राजनेताओं ने तब गांडीव लेना इसीलिए शुरु कर दिया था ।इसलिये शायद कि वे जिले की सियासत से पूरी तरह से अपडेट हो जाते थें ,गांडीव पढ़ कर । तब सोशल मीडिया का युग तो था नहीं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी स्थानीय समाचार इतना कहां दिखलाते थें। एक बात यह भी रही कि यहां के लोग  इतना तो कहते ही थें कि यदि शशि ने लिखा है, तो उसमें सच्चाई होगी ही। पाठकों का यही विश्वास था। जबकि मुझे राजनीति का ककहरा तक नहीं पता था, फिर भी जिज्ञासा प्रबल रही। अतः मैं तब जो वरिष्ठ पत्रकार, राजनेता और बुद्धिजीवी रहें, उनसे पूछता भी था। मैं इस मामले में भाग्यशाली हूं , जिसे सर्वप्रथम यहां पं० रामचंद्र तिवारी( अब स्वर्गीय) और वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्रनाथ जायसवाल जिन्हें सभी लल्लू बाबू कहते हैं, का सानिध्य प्राप्त हुआ। बाद में आज अखबार के जिला प्रतिनिधि रहें  सलिल भैया का स्नेह भी मिला। क्राइम की खबर में तब दैनिक जागरण देख रहें सुरेश चंद्र सर्राफ  जी का भरपूर सहयोग मिलता था।  साथ ही धुंधीकटरा स्थित राजमोहन भैया के यहां भी जाता था। वहां संतोष श्रीवास्तव मास्टर साहब  ,जो कभी गांडीव भी देखते थें, वे भी मेरा उत्साहवर्धन करते ही थें। बाद में पत्रकारिता के क्षेत्र में भरपूर जानकारी रखने वाले सर्वेश जी के यहां भी गया। परंतु अखबार बांटने और प्रतिदिन बनारस आने जाने के कारण मेरे पास पढ़ने लिखने और किसी के सानिध्य में बैठ कर समाचार लिखने का समय कम ही था। हां , वरिष्ठ पत्रकार लल्लू चाचा के घर पर तब सुबह पहुंच जाया करता था। करीब एक-दो घंटे वहीं बैठ कर समाचार लिख लिया करता था। निर्भिक पत्रकारिता मैंने उन्हीं से सीखीं है और गंभीर पत्रकारिता अपने गुरु जी यानि   स्व० रामचंद्र तिवारी जी से। उत्साहवर्धन मेरा सलिल भैया ने खूब किया। सरदार भूपेंद्र सिंह डंग मुझे जनसत्ता पढ़ने को देते ही थें। इस तरह से राजनीति की खबर लिखने में मुझे रुचि बढ़ती ही गई। दरअसल  ऐसी खबरों कि चर्चा भी खूब होती थी। शाम ढलते ही लोग गांडीव तलाशने लगते थें। ऐसे में जब मैंने अपने कालम में अरुण दादा की खबरों को प्रमुखता देना शुरू कर दिया। उन्हें चेयरमैन की कुर्सी का प्रबल दावेदार बतला दिया, तो हमारे डाक इंचार्ज मधुकर जी थोड़ा चौंके, शायद सोचा हो कि इस लड़के को हो क्या गया है। वे मीरजापुर रह चुके थें। यहां तमाम उनके परिचित भी थें। सो, मेरी एक खबर पर उन्होंने टोक ही दिया कि जनसंघ के गढ़ में मुहं टेढ़े को जीता रहे हो ! मैंने भी पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया कि सर उनकी जीत कोई रोक नहीं सकता। अब आप समझ लें कि भाजपाइयों से अच्छी मित्रता के बावजूद मैंने अपने कलम के साथ यह पहला न्याय किया।  किसी प्रलोभन में फंसा नहीं। उस समय गांडीव का यहां शहर में कुछ तो प्रभाव था ही। पेपर मार्केट में थें ही कितन। दैनिक जागरण, आज, राष्ट्रीय सहारा, भारतदूत और गांडीव तथा अंग्रेजी का अखबार एनआईपी । इसके अतिरिक्त जो पेपर थें कोई खास चर्चा में नहीं थें। हां, अमृत प्रभात , स्वतंत्र भारत, जनवार्ता के पत्रकार भले ही दमदार थें। बहरहाल, मेरी समीक्षा सही निकली और दादा लगभग 6 हजार मतों से विजयी हुयें। इसके बाद से अब तक मेरी कोई समीक्षा गलत नहीं हुई है। हालांकि चुनाव आयोग की पाबंदी के कारण विगत कई चुनावों से हार जीत की समीक्षा मतदान के पूर्व मीडिया नहीं करती है। नहीं तो इसे लेकर भी कलम को धन सम्पन्न प्रत्याशी खरीद लेते थें। एक बार एक बड़ा प्रलोभन भरा प्रस्ताव मेरे समक्ष भी आया था।

क्रमशः

Saturday, 31 March 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 1 /4/18

 कल रात्रि 11 बजे तक शास्त्रीपुल पर अखबार के बंडल की प्रतीक्षा में खड़ा था। लेकिन, फिर भी बस नहीं आई तो खाली हाथ वापस लौट आया। आज रविवार है, तो पेपर आना नहीं है। ग्राहकों की शिकायत रहेगी की भैया आपसे स्नेह के कारण  अखबार ले रहा हूं, अन्यथा....। अब आप यह समझ नहीं सकते कि कितनी पीड़ा मुझे होती है। सुबह ही सवा पांच बजे इसलिये उठता हूं कि समय से मोबाइल पर समाचार टाइप कर प्रेस को भेज दूं। इस दौरान अपने ऊपर बस इतना ही समय देता हूं कि सुबह दैनिक कर्म से निवृत्त हो  दलिया पका और खा सकूं। फिर कचहरी, अस्पताल पोस्टमार्टम आदि जगह जा समाचार संकलन में दोपहर के ढ़ाई- तीन तो बज ही जाते हैं अमूमन। दोपहर बाद  करीब साढ़े तीन -चार बजे जब मुसाफिरखाने पर पहुंचता हूं, तो भूख लगी रहती है। बाहर का सामान अब मैं ग्रहण करता ही नहीं, न रात्रि में ही भोजय करता हूं। सो, यहां प्रेम भवन आते ही सब्जी बनाने की तैयारी में लग जाता हूं। उबली सब्जी लेता हूं। अतः ज्यादा समय इसे बनाने में नहीं लगता है। रोटी की व्यवस्था भी राही लाज में ही हो गई है। ऊपर अनिल बनवा दिया करते हैं। भोजन के बाद सिर्फ एक घंटे का समय अपने ऊपर दे पाता हूं। इसके बाद चिन्ता यह लगी रहती है कि बनारस से बस कितने बजे पेपर का बंडल लेकर  निकली है। अमूमन सायं 6 बजे के बाद ही बस चलती है। कल तो साढ़े 7 बजे बंडल लगा था। बस जब 11 बजे रात्रि भी नहीं आई, तो इस चिन्ता में वापस लौटना पड़ा कि आप सभी ग्राहकों से क्या कहूंगा।  जिस मार्ग पर जाम लगता है। उसे लेकर पुलिस की अपनी बहानेबाजी रहती है। वह यह कह बच निकलती है कि सड़क खराब है। जबकी कल पूर्णिमा था। कितने ही हजार दर्शनार्थी इसी मार्ग से विंध्याचल   आते है। परंतु कहां थी टेढ़वा और औराई के मध्य पुलिस की व्यवस्था। इन अफसरों को सोशल मीडिया पर चेहरा चमकाना पसंद है। परंतु बस यात्री कल मध्य में तीन चार किलोमीटर के जाम के कारण वाराणसी और जौनपुर से बाया गोपीगंज होते हुये पांच से छह घंटे में मीरजापुर पहुंच रहे थें। उन्हें जाम से मुक्ति दिलाने की कोई ठोस पहल उन्होंने की क्या। पूरी व्यवस्था ही ध्वस्त हो गई है। और मुझे जो लग रहा है कि वर्तमान सरकार में ये अधिकारी परम स्वतंत्र होते जा रहे हैं। मैं तो इसे नौकरशाही का राजनीतिकरण ही मानता हूं।  सो ,आप झेलो , परेशान हो हर छोटी छोटी समस्याओं को लेकर। इस पीड़ा का अनुभव मैं शास्त्रीपुल पर खड़ा खड़ा कल रात्रि 11 बजे तक कर रहा था। सोचा, तो यह था कि एक अनुशासित पार्टी के नेताओं के हाथ प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता आई है ,तो कुछ तो परिवर्तन व्यवस्था में दिखेगा ही। तो साहब यही परिवर्तन है कि सात बजे चली बस दो घंटे में यहां पहुंचने की जगा पता चला कि साढ़े 12 बजे रात आई थी। कितने ही दर्शनार्थी चैत पूर्णिमा पर्व के कारण बसों में थें, जो मार्ग में फंसे हुये थें। जबकि दो जनपदों की सीमा पर जाम लगा था। चील्ह और औराई पुलिस चुस्त रहती तो ऐसा नहीं होता। ट्रैफिक पुलिस भी लापता रहती है। ऐसे मौके पर, ऐसा मैं अनुभव कर रहा हूं। अब यात्रीगण इस अपना अच्छा दिन , समझे या बुरा। परंतु इस सरकार के बारे में मेरी मत बिल्कुल साफ है....

क्रमशः

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक 31/3/18

 मैं यह नहीं साबित करना चाहता कि  ईमानदारी से पत्रकारिता करके मैंने कोई बढ़ा गुनाह किया है। मैं सिर्फ नये व युवा पत्रकारों को यह बताने का प्रयास कर रहा हूं कि यह राह कितना कठिन है। चकाचौंध भरी इस दुनिया में आप भी ऐसा ही कर कहीं अवसाद की ओर न बढ़ जाएं। क्यों इस रंगमंच पर आकर मैं जब सभी अपनों से दूर होता चला गया, तो उस एकाकीपन से उबरने के लिये मुझे कठिन संकल्प लेंने ही पड़ रहे हैं। संतोष इस बात का है कि मैं इसमें सफल हो रहा हूं। क्योंकि मैं अपने पेशे के प्रति अपनी ईमानदारी को यूं तो अवसादग्रस्त होकर जाने नहीं दूंगा। ताकि कल को लोग यह कहें देखों जरा इस पागल को भाई ,बड़ा ईमानदार पत्रकार बन रहा था ! अतः संकल्प शक्ति से मैं वैराग्य के मार्ग पर बढ़ कर अपनी पीड़ा से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर रहा हूं। भले ही रंगमंच का पात्र वही रहूं, परन्तु यह न कहना पड़े कि जीना यहां मरना यहां , इसके सिवा जाना कहा...। सो,  हर आसक्ति से परे होने का संकल्प लिया है। इसी कारण मैंने  प्रेम भवन में अपना नया आशियाना बनाया। तो एक बार फिर से मोह ग्रस्त होने का जब कुछ एहसास और मन में भारी पन भी हुआ, तो मैं राही लाज चला आया। चंद्रांशु भैया ने इसकी मुझे आजादी दे रखी है कि मैं यहां वहां कहीं भी रह सकता हूं। हां, यहां राही लाज में कोई भी सामग्री ऐसी मेरी नहीं है कि उससे आसक्ति बढ़े । सो, बिलकुल ही मुसाफिर सा हूं और आनंदित भी। अब किसी अपने ठिकाने के प्रति मोह मुझे कैसे जकड़ेगा ?

 रही बात आत्मकथा लेखन कि तो मैंने इसके रविवार का दिन चयन किया है अथवा फुर्सत में कभी भी । शेष अन्य दिन समय मिलना मुश्किल है। आज रात्रि तो वाराणसी से साढ़े सात बजे पेपर ही लगा है। बस साढ़े नौ बजे से पहले नहीं आएंगी। फिर अखबार बांटने में भी दो घंटे तो लग ही जाते हैं। अब साढ़े 11 बजे रात मुसाफिरखाने पर वापस  लौट कर आऊंगा, तो लिखूंगा क्या।(शशि)

क्रमशः

Friday, 30 March 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक
31/3/18

 रात्रि में लेखन कार्य मेरे लिये काफी कठिन प्रतीत हो रहा है। कल जो कुछ लिखा,आज सुबह जब देखा तो कुछ भाषाई अशुद्धियां थीं। क्यों कि निंद्रा का प्रभाव बढ़ता जाता है। दो तीन घंटे के कठोर श्रम से शरीर भी थका रहता है। ऐसे में यदि 11 बजे के आसपास कुछ लिखने बैठेंगे,तो स्वभाविक है कि जिस गंभीरता की उम्मीद अपनी लेखनी से चाहता हूं, वैसा हो नहीं पाता। सो, इसके लिये रविवार अथवा अवकाश का दिन कहीं अधिक उचित रहेगा। (शशि)

व्याकुल पथिक आत्मकथा

व्याकुल पथिक
30/ 3/ 18

  शास्त्रीपुल पर धूल भरे तेज आंधी का करीब एक घंटे तक मुकाबला और फिर साइकिल से दो घंटे पूरा शहर घुम कर अपने कुशल हॉकर धर्म को निभाते हुये वापस मुसाफिर खाने आया, तो वहां एक शुभचिंतक ने मेरे केश, चेहरे और वस्त्र पर जमी सफेदी ( बालू और धूल) की परत की और ध्यान दिलाई,  हाथ मुंह पानी से साफ करने को कहा। मेरा यहां और कहीं भी कोई घर परिवार तो नहीं कि तुरंत आवाज लगाता और तौलिया तथा कपड़े आ जाते।  खैर , छोड़े इन बातों का क्या ? यह तो मेरी नियति है।

              मैं जो कहना चाहता हूं, वह यह है कि जो ईमानदार पत्रकार शब्द का प्रयोग लोग अमूमन मेरे लिये करते हैं, यह अब और न करें। यह तमगा मुझे अत्यधिक पीड़ा देता है। इस  एक अवगुण के कारण आज मैं  राजकपूर साहब की "आवारा"  फिल्म की तरह  चेहरे पर झूठा मुस्कान लिये यह गुनगुनाता फिर रहा हूं कि घरबार नहीं संसार नहीं, मुझसे किसी को प्यार नहीं...।

 एक भूखा नंगा इंसान यदि ईमानदारी का जहर पीने चलेगा तो यही तो होगा न। अरे साहब, डाक्टर, इंजीनियर, पुलिस और प्रशासनिक सेवा के अफसर , राजनेता  , मंत्री, सरकारें ईमानदार तो इन्हें होना चाहिए। पर आप एक छोटे से अखबार के जिला सम्वाददाता हो, न उचित वेतन का पता, न मंजिल का और लगें शोर मचाने कि मैं तो लोभ मुक्त होकर पत्रकारिता करूगा।  तो मैं ललकार के कहता हूं कि जिलास्तरीय कौन ऐसा पत्रकार है , जिसने अपने पेशे का लाभ स्वहित में कमोवेश न लिया हो। यदि नहीं लिया होगा, तो वह भी आज मेरे ही जैसा एकाकी होगा। इसी अवसाद से बचने के लिये मैं जबरन मन की दिशा मोड़ रहा हूं। मैं पत्रकारिता में क्यों आया, इसीलिए न की भूखा था और किसी अपने के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहता था। पर जब पत्रकारिता से मुझे रोटी कमाने का बढ़िया मौका मिलने को हुआ तो मैं इस कमाई के माध्यम को पीत पत्रकारिता बता उससे मुंह मोड़ बैठा।  कितने ही अधिकारियों ने स्नेह भरे शब्दों में मुझे छोटे भाई और पुत्रवत समझाया था, तब कि जीवन के इस कड़ुवे सत्य को समझो  कि धन से ही घर परिवार है। कल को तुम्हारे भी बीबी बच्चे होंगे तो क्या करोगे ?  ईमानदारी के इस झूठे तमगे के जूनून में मैंने अपने गुरु जी का यह सबक भी भूला दिया था कि यदि समाज में रहना है तो धन चाहिए, नहीं तो संयासी बन कर वन की राह पकड़ लो। और आज जब मन व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि मन की पीड़ा मस्तिष्क में कहीं विस्फोट न कर जाए, तो इससे मुक्ति का एक ही आसान राह है कि मस्तिष्क को संज्ञा शून्य बना देना। सो, मैं भी अवसाद की जगह मन को वैराग्य की ओर ढकेल रहा हूं। अच्छे स्वादिष्ट भोजन की चाहत मुझे भी थी। परंतु इसी पत्रकारिता के मोह में जब अपने लिये बढ़िया भोजन भी समयाभाव के कारण नहीं पका पाया, तो इस वर्ष एक संकल्प के तहत ऐसे सभी स्वादिष्ट भोजय पदार्थों को त्याग दिया। धन का लोभ मुझे है नहीं और ढाई दशक के संघर्ष ने मुझे मृत्यु भय से भी मुक्त कर दिया है, यह मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं।

           खैर मैं बता रहा था कि यहां  पत्रकारिता में मुझे पहचान बनाने का जो पहला अवसर मिला,वह रहा नगरपालिका परिषद अध्यक्ष वर्ष 1995 का चुनाव। मुझे इस पर रिपोर्टिंग करनी थी। इस भगवा गढ़ में मेरे  अखबार के तमाम ग्राहक भाजपाई थें। तब भाजपा उम्मीदवार रहें बैजनाथ केशरवानी भी मेरा अखबार  कम से कम एक वर्ष से तो लेते ही रहे होंगे। और भी भाजपा व्यापारी नेता तब तक गांडीव के अच्छे पाठक हो गये थें। उन दिनों करीब साढ़े 6 बजे  मैं वाराणसी से पेपर का बंडल लेकर मीरजापुर आ ही जाता था। और उस समय भी पैदल ही शहर में घुम घुम कर पेपर बांटा करता था। मेरी लेखनी चलने लगी थी।  जो कुछ त्रुटियां रहती भी थी, तो वहां डाक देख रहें कमलनयन मधुकर जी या फिर अत्रि अंकल उसमें सुधार कर मुझे बताया सिखाया करते ही थें। पुलिस विभाग में यहां मेरी पकड़ कैसे बढ़ी और क्यों तब के अधिकारी इस अनाड़ी कलम के नौसिखिये सिपाही से भय भी खाते थें और सम्मान तो देते ही थी। इस पर बाद में चर्चा करुगां। डा० राधारमण चित्रांशी जी का व्यापक प्रभाव तब वाराणसी जोन.के पुलिस महकमे पर था। अतः एस एन साबत साहब जब यहां के कप्तान थें, तो उनका भी काफी स्नेह मिला। हां, तब भी छोटे बड़े पुलिस अधिकारी यह बात अच्छी तरह से समझ गये थें कि अन्य नये पत्रकारों की तरह मेरे किसी कड़ुवे समाचार पर वे मुझ पर आंखें नहीं तरेर सकते हैं। खैर , पुलिस और अपनी पत्रकारिता के संदर्भ में खास बातें फिर कभी करुंगा। अभी तो नगर निकाय चुनाव पर बता रहा था कि भगवा गढ़ में किस तरह से उसके प्रत्याशी की पराजय का संकेत मैंने बेखौफ अपनी लेखनी से कर दी थी। उस चुनाव में प्रतिद्वंद्वी के रुप में बतौर निर्दल प्रत्याशी अरुण कुमार दूबे  जिन्हें दादा सम्मान से लोग कहते थें खड़े थें। तब नागरिक संगठन और भाकपा माले के नेता जैसे अरुण कुमार मिश्रा, मो० सलीम, शरद मेहरोत्रा आदि ने , जो एक चर्चित सियासी जुमला उछला था, वह रहा "अरुण नहीं यह आंधी हैं मीरजापुर का गांधी है"।  इस नारे का यहां के मजदूर तबके और युवाओं पर खासा प्रभाव पड़ा। अखबार बांटते हुये मैं भी इनकी नुक्कड़ सभाओं में पहुंच जाता था।(शशि)

क्रमशः

Thursday, 29 March 2018

व्याकुल पथिक

व्याकुल पथिक
29/3/ 18

   सफर की बात जब कर ही रहा हूं, तो पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरी यात्रा की पहली परीक्षा वर्ष 1995 का नगरपालिका परिषद मीरजापुर चुनाव रहा। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि अपने कार्य के प्रति निष्ठा मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। मैं जो ठान लेता हूं , वह कर भी लेता हूं।  जैसे ब्लॉग पर प्रतिदिन मुझे कुछ लिखना है, तो फिर आंखें नींद से कितनी भी भरी क्यों न हो , चंद शब्द लिखूंगा जरूर। पर आज बिल्कुल थका हुआ हूं। अभी थोड़ी देर पहले ही अखबार बांट कर आया हूं। सुबह साढ़े पांच बजे से पहले  उठ जाता हूं। कल मुकदमे की तारीख भी तो हैं। तो जेब भी टटोलना पड़ता  है। खैर , मैं बात नगरपालिका परिषद अध्यक्ष पद  के  चुनाव से जुड़े पत्रकारिता की कर रहा हूं। जिसमें मैं सौ फीसदी अंक प्रयास करने में  सफल रहा। यही से मेरे अखबार के दफ्तर में बतौर पत्रकार मेरा कद ऊंचा हुआ था।....

क्रमशः