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Thursday, 10 May 2018

लोभ मुक्त कर्म

व्याकुल पथिक

            लोभ मुक्त कर्म ही हमारी पहचान
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       मेरा स्वयं से एक सवाल सदैव रहा है कि बिना किसी तैयारी, बिना किसी जानकारी के ही मैं नये नये कार्यों में क्यों उलझ जाता हूं। अब देखें न बचपन में मैं एक पेंटर बनना चाहता था। पेंटिंग के अभ्यास के लिये मुझे एक कुशल चित्रकार के यहां भेजा भी गया था। रंगों को हल्का-गाढ़ा कर चित्र पर भाव लाने की उनकी कला मुझे मंत्रमुग्ध किये हुये थी। उन्होंने भी मुझसे कहा था कि निश्चित ही तुम भी एक अच्छे चित्रकार बनोगे, परंतु हाईस्कूल में पिता जी ने मुझे साइंस  दिलवा दिया। तो मेरा मन गणित के सवालों को सुलझाने में उलझ गया। गणित के दोनों पेपर में बराबर अंक मिले। सौ में 98 अंक प्राप्त करना सचमुच मेरी एक बड़ी उपलब्धि ही थी।  परंतु मैं इंजीनियर भी तो नहीं बन सका। पढ़ाई बीच में छूट गयी। परिस्थितियों ने मुझे कलम थमा दिया। हिन्दी से जितना दूर मैं भागता था, वह मुझे जबर्दस्ती अपने पास खींच लायी, जीवन के पच्चीस साल कब इस मीरजापुर की सड़कों पर इस भाग दौड़ में गुजर गये कि कोई खबर छूटने न पाये। मैं कभी किसी से पीछे जो नहीं रहना चाहता था, यहां तक कि भदोही और सोनभद्र की बड़ी घटनाओं की सूचना सबसे पहले प्रेस को दे, वहां बैठें वरिष्ठ जनों को भी चौका देता था। और अब मन की व्याकुलता शांत करने के लिये यूं ही अचानक बिना किसी तैयारी के ब्लॉग लेखन करने लगा। न किसी की आत्मकथा पढ़ी , न ही कोई साहित्य पढ़ा बस लगा अनाड़ियों की तरह मोबाइल फोन का बटन दबाने। इस तरह का दुस्साहस कर मैं अपने उपहास का मार्ग स्वयं ही क्यों प्रशस्त करता हूं, मुझे नहीं पता, बावजूद इसके मेरे कई विद्वान शुभचिंतक  जब यह कहते हैं कि बहुत बढ़िया लिखा, शब्द साधना करते रहो, तो अपनी प्रशंसा सुनकर बड़ी ही लज्जा की अनुभूति होती है। सोच रहा हूं कि काश ! मैं हिन्दी का विद्यार्थी होता,  तो गर्व के साथ अपनी तारीफ पर सिर उठा तो सकता न...
     फिर भी मन की ये जो भावनाएं हैं, वह भला कहां मानती हैं। अपनों की यादें मुझे व्याकुल ही किये जा रही थीं और मैंने  अतीत और वर्तमान दोनों को एक साथ लेते हुये चिन्तन युक्त आत्मकथा लेखन शुरु कर दिया, अपना एकाकीपन दूर करने के लिये। मेरा मानना है कि यदि हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन अपने कार्य में कर रहे हो और उसमें सच्चाई की सुगंध हो, तो सरस्वती की कृपा निश्चित ही प्राप्त होनी है। इसीलिये तो पत्रकारिता में यहां मुझे क्या सम्मान और स्नेह मिला है और उसमें अब तो और वृद्धि भी हो रही है, उसे वे पत्र प्रतिनिधि कभी नहीं समझ सकेंगे , जो जुगाड़ में ही रहते हैं। एक बिल्कुल ही अनजाने शहर में सिर्फ दो रोटी की रोटी के लिये मैं वाराणसी से देर शाम यहां मीरजापुर आ कर पैदल ही अखबार बांट लौट जाया करता था। आज भी मैं उन दिनों को याद करता हूं, तो चकित सा रह जाता हूं कि मेरे किस गुण के कारण लोगों ने मुझे इतना सम्मान और स्नेह दिया ! आज घर-परिवार, स्वास्थ्य सब-कुछ खोने के बावजूद भी मैं एक खुशहाल फकीर क्यों हूं। मेरे चेहरे पर आप अत्यधिक काम के बोझ के कारण थकान तो देख सकते हैं, परंतु इसे लेकर मैं चिन्ता में हूं, यह नहीं कह सकते हैं आप !
      कारण मैंने  महान संत कबीर की एक छोटी सी थ्योरी पढ़ी है,  वह यह है न कि
   रुखा सुखा खाई के, ठंडा पानी पी।
   देख पराई चुपड़ी , मत ललचाओ जी ।।

  बड़े से बड़े  शास्त्रों का ,विद्वानों का ,चिंतकों का सारा का सारा ज्ञान , इसी दो लाइन के दोहे में समाहित है। जरुरत तो इस पर प्रैक्टिकल की है हमें।  और यह प्रयोग हमें स्वयं पर करना है। आज मैं क्यों पूरे आत्मविश्वास के साथ कहता हूं कि मुझमें तनिक भी लोभ नहीं, तो इसके लिये लम्बा अभ्यास भी तो किया हूं। तब जा कर इस स्थिति में अब हूं कि मेरे सामने आप छप्पन भोग ही क्यों न रख दें , परंतु मुझे तो सिर्फ चार सूखी रोटी और थोड़ी सी सब्जी की ही तलाश रहती है । इन मेवा- मिष्ठान से अपने को क्या काम।  यहीं लोभ पर संयम मेरी स्थाई पुंजी है। जिसे मैं इस शहर की गलियों में पच्चीस साल से अखबार बांट कर कमाई है। जिसका परिणाम यह है कि मेरे लिये मजदूर और सेठ में कोई फर्क नहीं है। आज इस समाज में जो मेरा जो सम्मान है न, वह भी कारण है कि मैंने किसी सेठ के सामने हाथ नहीं फैलाया है।

( शशि)11/5/18

Wednesday, 9 May 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
 आत्मकथा
            मेरी दुनिया थी मां तेरे आंचल में
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    मुनिया कहां है...बिल्कुल सुनता नहीं ना...चौधरी देखों इसका...ठीक है जब नहीं रहूंगी तब तकलीफ पाएगा ...
            मां चाहे कितनी भी नाराज हो जाती थी, लेकिन मैं जानता था कि उन्हें कैसे मनाना है। सो, मुझे याद नहीं कि मां की डांट पर कभी मैंने मुंह बनाया हो। उसी तरह से उछलता कूदता रहता था कभी बरामदे में तो कभी सीढ़ियों पर , तो कभी नीचे दूसरी मंजिल पर भाग जाता था । मां को कबूतरों के लिये मेरा घर बनाना पंसद नहीं था । सबसे अधिक डांट उसे लेकर ही पड़ती थी। परंतु इन कबूतरों में रुचि मेरी मां के कारण ही तो जगी थी। जब तक उनमें सामर्थ था, रात्रि में जो भी परेठा बच जाता था या कुछ अधिक ही वे बनाती थीं , उसे छोटे टुकड़ों में तोड़ कर वे बारजे पर जैसे ही डालती थीं, तमाम कबूतर पंख फैलाये चले आते थें। गौरया के लिये भी पानी की व्यवस्था मां नहीं भूलती थी। परंतु मैं पढ़ाई से ज्यादा समय इन कबूतरों के आशियाने पर देने लगा था। मां चाहती थी कि मेरी पढ़ाई कहीं से कमजोर नहीं रहे, ताकि मेरे शिक्षक पिता जी ताना न मारे... बड़ी मुश्किल से दूसरी बार करीब 11- 12 वर्ष की अवस्था में मुझे अपने ननिहाल कोलकाता में रहने देने के लिये वे सहमत हुये थें। दार्जिलिंग में मां के छोटे भाई की पुत्री( रिश्ते में मेरी मौसी) के विवाह में मां और मम्मी के संबंध फिर से मधुर हुये थें। यूं समझे कि मां ने वहां जब मुझे वर्षों बाद देखा, तो स्वयं को रोक नहीं पाईं थीं। बनारस में मैं बहुत दुर्बल हो गया था। वो मम्मी नहीं मां थीं, भला मुझे ऐसे कैसे देख सकती थीं । खैर अहम् त्याग पापा ने एक बार फिर मुझे मां के आंचल में समा जाने का अवसर दिया। मुझे याद है उस गर्मी की छुट्टी में जब मैं परिजनों संग कोलकाता आया था और माह भर बाद मेरी वापसी का टिकट बुक नहीं हुआ, तो मैं किस तरह से खुशी से चहकते हुये मां की गोंद में जा गिरा था। मां ने हिदायत दी थी... ठीक से पढ़ेगा न ! अपने बाब से बेज्जती तो नहीं करवाएगा !
    वैसे,तो वहां मेरे दोनों ही जन्मदिन पर बाबा ने ढेरों उपहार लाकर दिये थें। मां ने कितने ही लोगों को बुलवाया था । मुनिया का बर्थ डे है। हम सभी शाकाहारी रहें,अतः संदेश, काजू, चाकलेट पाउडर और खोवा से निर्मित विशेष तरह का केक नीचे कारखाना से हाड़ी दादू ने बना कर भेजा था। एक जन्मदिन पर मां ने मेरे लिये बंगाली धोती कुर्ता मंगवाया था। वह मेरा आखिरी जन्मदिन मना था, मां के जाने के बाद फिर कभी मैंने अपना जन्मदिन नहीं मनाया। जब मैं मुजफ्फरपुर में था, तो जन्मदिन पर कुछ खास करने के लिये मौसी जी को भी मैंने मना कर दिया।  मां ही नहीं रही , तब जन्मदिन कैसा... मैंने तो मां के बाद कभी होली दीपावली भी नहीं मनाई है।
         फिर वह दिन भी आया जब मैं अपनी मां की परीक्षा में खरा उतरा। अपने क्लास 6 में फस्ट जो आया था। रिजल्ट मिलते ही, सीधे मां के पासा भागा आया, लेकिन मां तो मृत्यु शैया पर पड़ी हुई थी ....
      फिर भी मां के कान में वो शब्द मैंने ही आखिरी बार कहे थें , यदि वे चेतना में रही होंगी, तो निश्चित ही मुझे शाबाशी दी होगीं। मां और बाबा दोनों ही मेरी शिक्षा पर ध्यान देते थें। मास्टर साहब प्रति दिन कोलकाता के बड़ा बाजार स्थित हमारे निवास स्थान पर पढ़ाने आते थेंं। मां बेहद तकलीफ में थीं। कोई भी दवा काम नहीं कर रही थी। ऐसे में मुझे अपनी कक्षा में प्रथम स्थान मिलने का उपहार कौन देता।  बाबा जो वर्षों से मौत को पीछे ढकेल मां को वापस ले आया करते थें। इस बार उनका हर संघर्ष व्यर्थ होता दिख रहा था। मां ने अंतिम बार उन्हें चौधरी कह कर पुकारा था। इसके बाद फिर कुछ न बोली थीं। जिस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उन्होंने नश्वर शरीर को त्याग था , बाबा और लिलुआ वाली नानी जी संग मैं भी कमरे म सहमा- सहमा व्याकुल से नर्स की बातें सुन रहा था।परंतु दुर्भाग्य से मुझे झपकी आ गयी ।  बाबा की चींख सुन जब जगा, तो मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी। परिवार के इतने सदस्यों के रहते हुये भी मैं अनाथ हो गया था।  कहां तो मेरे मित्र स्कूल में मानीटर के रुप में मेरे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थें और कहां मुझे फिर  जबर्दस्ती बनारस मम्मी-पापा के साथ भेज दिया गया। मैंने करीब 13 वर्ष की अवस्था में मां को पहली बार कंधा दिया था। हालांकि जो लोग मौजूद थें, वे नहीं चाहते थें कि मैं इस अवस्था में श्मशान घाट हरि बोल कहते हुये जाऊं। पर मेरे जिद के आगे किसी की नहीं चली। इसके बाद आज तक अपने परिवार के किसी भी सदस्य के शव यात्रा में मैं शामिल नहीं हुआ हूं, बाबा,दादी, मौसा जी, बहन और पापा इसी बीच गुजर चुके हैं । मेरी दुनिया तो मां के आंचल में ही थी , सो फिर शेष अब बचा ही क्या रहा ...

(शशि)10/5/18

क्रमशः

Tuesday, 8 May 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
  आत्मकथा
           
         अपनों से वियोग का प्रथम आभास
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         मृत्यु भय से कहीं अधिक अपनों से वियोग  का दर्द होता है। मनुष्य चाहे जितना भी ज्ञान अर्जित कर ले, संत ही क्यों न हो जाए। फिर भी अपनों के बिछुड़ने की पीड़ा उसे निश्चित ही होगी !  बुद्ध के निर्वाण पर आनंद की मनोस्थिति इसका प्रमाण है। हां,  यह और बात है कि हमारा वैराग्य भाव हमारी व्याकुलता कम कर देता है...

        प्रियजनों के दूर जाने की कसक आज भी मुझे है। परन्तु इतना ही सत्य यह भी है कि मृत्यु के समय यदि मैं चैतन्य अवस्था में रहूंगा, तो बुद्ध की तरह ही मोह रहित निर्वाण को प्राप्त करूंगा। ऐसा मेरा विश्वास है। कर्मपथ के आगे जो मुक्तिपथ होता है न , उसकी तैयारी वानप्रस्थ अवस्था में पहुंच कर हमें शुरू कर देनी ही चाहिए। थकान भरे जीवन सफर का यह सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। जो हमें आखिरी मंजिल की ओर ले जाता है। जिसकी तैयारी अब मैं भी शुरू करने वाला हूं। सो, पांव में किसी प्रकार की बेड़ियों को स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं है ! मेरा मन आजाद पंक्षी की तरह खुले आसमान में विचरण करने के लिये मचल रहा है। पत्रकारिता का यह बंधन भी अब सहन नहीं हो रहा है !

      आत्मकथा लेखन के लिये अब जब मैं अपने अतीत में झांक रहा हूं, तो किन स्वजनों की जुदाई पर मुझे अत्यधिक पीड़ा हुयी, यादों की वे सारी तस्वीरें मानों फिर से सजीव हो उठती हैं। समय तेजी से पीछे भागा जाता है। मुझे याद है कि जब मैं वाराणसी में कक्षा पांच में पढ़ता था। संकठा घाट पर गंगा किनारे हमारा विद्यालय था। जिस खिड़की की तरफ कक्षा में मैं बैठा करता था, वहां से गंगा दर्शन भी करता रहता था। उस दिन को याद कर आज भी मैं सिहर उठता हूं। जब पहली बार एक सुंदर , स्वस्थ्य और गौरवर्ण युवक का शव गंगा में बहता देखा था। उसके मृत शरीर पर लाल रंग का गमछा पड़ा था। उस दिन जब तक क्लास रुम में था, मेरी निगाहें उसी शव पर टिकी हुई थी।   करीब दस वर्ष की ही तो अवस्था रही होगी मेरी, जब इस शव ने पहली बार मुझे जीवन के इस सत्य से परिचित कराया की सब कछ नश्वर है। मेरा मन कितना अधिक व्याकुल हो उठा था, इसे बताने के लिये शब्द नहीं है। वह रात मुझे आज भी याद है, जब मैं सोया तो अपनों के समीप ही था , लेकिन पलकें आंसुओं से भींगती ही जा रही थीं। पूरी रात यह सोचता रहा कि क्या दादी, पापा- मम्मी सभी मुझे इसी तरह से छोड़कर चले जाएंगे। मेरी यह मनोदशा कितने दिनों तक बनी रही, यह तो मुझे ठीक से याद नहीं। परंतु मृत्यु से वह मेरा प्रथम साक्षात्कार रहा। फिर भी मैं कोई सिद्धार्थ तो था नहीं कि इस दुख से मुक्ति का मार्ग तलाशने लगता ! अतः मनोस्थिति सहज हो गई होगी मेरी।
     लेकिन , सच तो यही था कि गंगा में युवक का वह शव  यह संदेश दे गया था कि मेरा जीवन ही अपनों से बिछुड़ने के दर्द को सहने के लिये बना है।  और कुछ ही वर्षों में यह प्रत्यक्ष भी हो गया था। जो मुझे सबसे प्रिय था , वह मेरी मां मुझे छोड़ कर चली गयी... मुझे याद है, जब वे मृत्यु शैय्या पर थीं , तो मैंने उनके कान में धीरे से क्या बोला था।  वह शब्द था कि मां सुन रही हैं न आपका मुनिया फस्ट हो गया है और क्लास सेवेन में अब वह मानिटर होगा...पता नहीं मां ने सुना भी था कि नहीं ! हां, लिलुआ वाली नानी जी ने मुझे विश्वास जरुर दिलवाया था कि मां ने तुम्हारी बात सुन ली है।

(शशि) 9/5/18

Monday, 7 May 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
आत्मकथा

भटकती राहों में  स्मृतियों का संबल
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     मैं यह जानता हूं की जीवन के अनमोल उन पच्चीस वर्षों को मीरजापुर की सड़कों पर अखबार बांट कर बरबाद किया हूं। कहीं नौकरी न करने की यह चाहत ने मुझसे मेरे सारे सुनहरे स्वप्नों को छीन लिया है। परंतु इस संघर्ष का भी अपना मजा है। जीवन के जिस कड़ुवे सत्य के करीब मैं हूं, यह अवसर हर किसी को नहीं मिलता है। बहुत सारे बंधन मेरे इसी के कारण टूटे हैं और मेरा विश्वास है कि मृत्यु से पूर्व मन के अन्य विकारों का त्याग भी कर ही लूंगा। इसमें मुझे कोई संदेह तो बिल्कुल भी नहीं है।
       बात जब भी संघर्ष की करता हूं, तो मुझे गर्व होता है स्वयं पर कि न तो कभी टूटा हूं और न ही झूका हूं। स्मृतियों का अनमोल खजाना मेरे पास है, जो मुझे विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी बचपन की पहचान से दूर नहीं होने देता है।
     हमारे मित्र कामरेड मोहम्मद सलीम कहते हैं कि शशि भाई प्यारी स्मृतियों को संजोए रखिए, ये आज आपका संबल है। मेरा भी मानना है कि वे बिल्कुल ठीक कहते हैं। हर व्यक्ति के जीवन में ये स्मृतियों  ही हैं,जो उसका मार्गदर्शन किया करती हैं। मैं जनपद स्तरीय पत्रकारिता जगत  ,जो एक तरह से काजल की कोठरी ही है, में रह कर भी बदनाम आप लोगों के बीच नहीं हूं, क्यों कि बचपन की ही स्मृतियों के कारण  लोभ मुक्त हूं। नहीं तो अपने पेशे में ऐसा लगता है मुझे की पढ़े लिखे भिखमंगों की टीली में शामिल हूं। चौथे पायदान   पर खड़े हमलोगों की पहचान इतनी है कि अफसरों के सामने  काजू- पिस्ते की सामग्री प्लेट में सजी होगीं और आपको घटिया बर्फी समोसा दिया जाएगा। इसलिये मैं अधिकारियों के प्रेसवार्ता में कुछ भी जलपान पसंद नहीं करता हूं। अभी पिछले ही माह तो सूबे के सबसे बड़े नौकरशाह के पत्रकार वार्ता में कुछ ऐसा ही अपमान यहां की मीडिया का हुआ था। जब अफसरों के झूठे प्लेट के सामने ही पत्रकारों के लिये एक  दोने में बर्फी-पकौड़ी रख दी गयी थी। फिर भी अनेक लोग उसी पर टूट पड़े थें । ऐसा अपमान भरा जलपान मैं इसलिए स्वीकार नहीं कर पाता, क्योंकि मुझे आज भी याद है कोलकाता में जब शिशु कक्षा में पढ़ता था, तो मौसी जी मेरा टिफिन बाक्स किसी तरह से सजाती थीं। इस सुखद स्मृति के साथ ही उस बुरी स्मृति को भी मैं भला कैसे भूल सकता हूं , जब मेरे इसी लंच बाक्स के कारण मेरे पिता जी जबर्दस्ती मुझे कोलकाता से खींच कर वाराणसी ले गये और मैं बर्बाद हो गया, उनके इस अहम् के कारण। बिलकुल छोटा बालक था तब , लेकिन वह धुंधली स्मृति आज भी मुझे याद है। जब मैं अपने ननिहाल में रहता था। सम्भवतः चार - पांच वर्ष ही मेरी अवस्था होगी। कितना दौड़ धूप कर मेरा नाम वहां के बड़े इंग्लिश स्कूल में लिखाया गया था। मेरे लिये चमड़े की एक खुबसूरत अटैची स्कूल जाने के लिये आयी थी। जिस पर  सफेद पेंट से मेरा नाम अंग्रेजी में शशि कुमार गुप्ता लिखा गया था। शायद बाबा ने  लिखा था, यह ठीक से याद नहीं है , पर मौसी जी एक अंग्रेजी की कविता मुझे पकड़ कर जबरन रटाया करती थीं, उस पोयम की पहली लाइन अभी भी याद है। मेरे लंच बाक्स में काजू बर्फी और अंगूर तो निश्चित ही होते थें। मैं जैसे ही नीचे दुकान पर कोई नया पानी का बोतल देखता था, पुराने बोतल का ढक्कन, पाइप कुछ न कुछ गायब कर देता था। बाबा फिर नयी बोतल दिलवाने मुझे साथ लेकर जाते थें। मुझे जब एक नौकर गोद में लेकर नीचे स्कूल बस तक पहुंचाने जाता था। मां(नानी) खिड़की में जाकर खड़ी हो जाती थीं, अन्यथा मैं सीढ़ी उतरने वाला नहीं था। हम सभी लोगों को जाते समय जय गणेश जी बोलना सिखाया जाता था। परंतु वह मनहूस दिन भी आया जब पापी- मम्मी मेरे छोटे भाई को लेकर कोलकाता आये। मुझे अच्छी तरह से याद है कि बगल के कमरे में उन्हें ठहराया गया था। उनकी खिदमत में किसी तरह की कमी यहां नहीं की गई थी। वे क्रोधित अधिक होते थें, यह यहां सभी को पता था। पर यह मेरा दुर्भाग्य ही समझे की एक दिन उन्होंने मेरा टिफिन बाक्स देख  लिया। जिसमें महंगे फलों को देख उन्होंने बेहद नाराजगी व्यक्त करते हुये कहां कि एक भाई को इतना सब कुछ और दूसरे को ... मां और मौसी जी ने तब पापा को कितना ही मनाने का प्रयास किया था। मां बार- बार कह रही थीं कि मुनिया ( मेरा नाम) को यदि यह सब टिफिन में न दिया जाए, तो वह भूखे ही रह जाता है। परंतु पापा जबरन मुझे कोलकाता से बनारस ले गये और यहीं से मेरी बरबादी का पटकथा लिखनी शुरू हो गयी। बताया गया मेरे जाने के बाद मां बीमार पड़ गयी। जिगर का टुकड़ा खो गया,इसीलिये हृदय रोगी हो गयीं वो..

(शशि) 8/5/ 18

 क्रमशः

सम्मान कार्यक्रम

Sunday, 6 May 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
    आत्मकथा

 बाबा से वो आखिरी मुलाकात
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      जीवन भी कैसी विचित्र पहेली है ! जिसने हम सभी से अत्यंत स्नेह किया हो, सभी के पसंद-नापसंद का ख्याल रखा हो। वह खुशमिजाज शख्स मृत्यु की पीड़ा अकेले ही सहते हुये गुजर गया। मुखाग्नि देने वाला भी कोई अपना नहीं था। बाबा से मेरी आखिरी मुलाकात तब अपने घर वाराणसी में हुई थी, जब उन्हें गंभीर स्थिति में मौसी जी लेकर आई थी। अपने पैरों पर वे खड़े नहीं हो पा रहे थें। शरीर  काला पड़ चुका था। दस्त की शिकायत थी। वर्षों बाद बाबा को देखा भी , तो इस स्थिति में... मैंने और दादी ने भी उनकी हर सम्भव सेवा की थी, परंतु हम दादी-पोता दोनों ही बेरोजगार थें। घर पर मेरी हैसियत तब इतनी ही थी कि दो जून की रोटी मिल जाया करती थी। यहां बाबा दो- तीन दिनों तक ही रहें, क्यों कि जेब में उनके पैसा बिल्कुल भी नहीं था। नियति का यही तो तमाशा है कि हमारे बचपन में जब भी बाबा- मां घर पर आया करते थें। सुबह कचौड़ी-जलेबी की दुकान से लेकर रात्रि में मलाई- रबड़ी की दुकान से इतना अधिक खाने का सामान मंगाते थें कि उनके जाने के बाद ये दुकानदार हम बच्चों से हमेशा पूछा करते थें कि तुम्हारे नाना कब आ रहे हैं ?  पैसे को उन्होंने कभी अपना समझा ही नहीं , सो उसे हम सभी पर उड़ाते रहें। उस जमाने की मंहगी से महंगी सामग्री हम सभी को उन्होंने दिलवाया था। मैं बनारस गया, तो मेरे लिये जेबखर्च तक वे मनीआर्डर करते थें  प्रतिमाह... और जीवन के अंतिम दिनों में परिस्थितियां ऐसी हो गई कि न तो बनारस में और न ही मुजफ्फरपुर में वे अपनी दोनों ही पुत्रियों के घर पर रखे जा सकें।  सो, कोलकाता जाने से पूर्व डबडबाई आंखों से उन्होंने हम सभी से कहा था कि देखा हो गया...।  इससे पहले मैंने उनकी डबडबाई नेत्रों को तब देखा था, जब मां( नानी ) का  निधन हुआ था। मां को बचाने के लिये बाबा ने वर्षों संघर्ष किया था। पूरे कमरे को ही हॉस्पिटल बना दिया था । अतः , मां की मृत्यु पर उनकी जुबां पर एक ही बात रही कि वे चौधरी को बचा नहीं पाये ... बाबा और मां एक दूसरे को चौधरी ही बुलाया करते थें। मां की मृत्यु के बाद कोलकाता में बाबा बिल्कुल अकेले पड़ गये थें। मैं , वहां से बनारस तब बिल्कुल भी जाना नहीं चाहता था। परंतु उनके चचेरे रिश्तेदारों ने जबर्दस्ती मेरी बोरिया-बिस्तर बंधवा ही दिया। परिणाम यह रहा कि बनारस में अपने ही घर में एक परायेपन का एहसास मुझे करवाया जाता था और कोलकाता में बाबा बिल्कुल अकेले पड़ गये। इसी स्वतंत्रता ने उनके आखिरी दिनों को बेहद ही पीड़ादायी बना दिया। अपनों पर अपना सब- कुछ लुटाते रहने वाले हमारे प्यारे बाबा के साथ नियति ने इतनी क्रूरता क्यों दिखलाई, बीमार होने के बावजूद भी मां कितना ख्याल रखती थीं उनका । दोनों ही लोग एक दूसरे के प्रति समर्पित थें।  मां की मृत्यु के समय भी उनकी दोनों ही पुत्रियां मौजूद नहीं थीं और बाबा ने तो बिल्कुल पराये जगह आखिरी सांस ली थी। आज भी मुझे वह मनहूस दिन पता नहीं है, जिस दिन हम सभी से दूर उन्होंने बड़ी ही खामोशी के साथ अपनी आंखें बंद की होगी।  मृत्यु से पूर्व मां की आंखें भी तो अपनों को ढ़ूंढ़ रही थी, लेकिन बाबा तो यह जान ही चुके थें कि अब कोई नहीं आने वाला... । हां, मृत्यु से पूर्व एक पोस्टकार्ड अवश्य मेरे पास आया था, जिसमें लिखा था कि एक बार आ जाओं...पर जिसे घर पर दो जून की रोटी  से अधिक कुछ भी नहीं मिलता हो, वह कहां से पैसे की व्यवस्था कर बाबा के पास जा पाता ...।

(शशि) 6/5/18

क्रमशः

Saturday, 5 May 2018

मृत्यु भय या उत्सव

मृत्यु "भय" या "उत्सव"
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    मैं कोई थ्योरी नहीं लिख रहा हूं, यह सब कुछ प्रैक्टिकल है। मेरा जीवन ही एक प्रयोग है। इस लैब में प्रवेश कर मैंने उच्च, मध्य और निम्न तीनों ही वर्ग के लोगों जैसा जीवन व्यतीत किया है।  कभी बचपन में नौकर गोद में उठा कर स्कूल बस तक मुझे पहुंचाते थें और  फिर मेरे जीवन में एक दौर ऐसा भी आया कि नौकरी की तलाश में भूखे सड़कों पर टहलते हुये , रात्रि में किसी दुकान की पटरी पर सोया हूं।  अब भी ढ़ाई दशक से सड़कों पर ही तो अखबार बांट रहा हूं न। अत्यधिक श्रम के कारण इस अवस्था में जा पहुंचा हूं, जहां से एक स्वस्थ तन को पुनः पाना नामुमकिन है, अतः मैं मृत्यु के आलिंगन के लिये हर्षित मन से स्वयं को तैयार  किये जा रहा हूं। कोई अभिलाषा शेष नहीं रही। बात जब भी उत्सव की होती है, तो पता नहीं हम सभी अपने मृत्यु के उत्सव की आहट मिलते ही , क्यों इस तरह से व्याकुल हो उठते हैं। जबकि यह जीवन का अंतिम उत्सव होता है। मन को इतना निर्बल क्यों बना लेते हैं ,  बुद्ध को जिसने भी समझा होगा, महा निर्वाण के दौरान उन्होंने अपने शिष्य आनंन से क्या कहा और स्वयं भी तथागत ने अपनी मृत्यु का स्वागत किस तरह से किया, यह उस पर थोड़ा भी चिन्तन कर लिया जाए, तो मैं ही नहीं हर मनुष्य मृत्यु भय से मुक्त हो सकता है।  परंतु विडंबना यह है कि सांसारिक कार्यों और अपनों का मोह हमें यह आभास ही नहीं होने देता कि मृत्यु भी पीछे दबे पांव चली आ रही है। मेरे एक शुभचिंतक की मृत्यु गत माह ट्रेन में ही हृदयाघात से हो गयी। उन्होंने अपना व्यापार खड़ा करने में पूरे जीवन संघर्ष किया था। परंतु वानप्रस्थ आश्रम में पहुंचे के पश्चात भी व्यापार से मोह नहीं गया, अत्यधिक भागदौड़ भरे जीवन का परिणाम यह रहा कि मधुमेह के शिकार हो गये और स्वस्थ होने की चाह में दवा ले ट्रेन से लौटते समय, वह सफर उनके जीवन की आखिरी यात्रा बन गई। जीवन उनका धन और परिवार की साधना में गुजर गया। वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम का आनंन लेना तो दूर , अपनी मृत्यु के समय निर्वाण भाव को भी नहीं प्राप्त हो सकें, न ही उसकी आहट पहचान सकें, क्यों कि जीवन के इस आखिरी उत्सव को मनाने की कोई तैयारी उन्होंने कभी शुरु ही नहीं की थी। आज सारा व्यापार उनका वैसा ही चल रहा है, जिस आनंद की खोज में हर इंसान मंदिर-मस्जिद जाता है, पर वह तो उन्हें नहीं मिला न ! अब तो इतनी दुर्घटनाएं हो रही हैं कि पता नहीं किसकी मौत कहां छिपी बैठी हैं।  फिर हम कैसे मनाएंगे अपना निर्वाण उत्सव, कभी इस पर भी हमने चिंतन किया है, जबकि पूरे दिन कुछ न कुछ चिंता ही करते रहते हैं। अतः धीरे धीरे मैं, स्वयं को इस चिन्ता से बाहर निकाल रहा हूं। धन अर्जन का लोभ समाप्त हो चुका है। रही बात भोजन की ,तो परिवार न होने के कारण , उससे भी मुक्त ही हूं। यदि वाणी पर संयम हो भी जाए, तब अगली परीक्षा फिर नेत्र संयम और सबसे कठिन कार्य तो मन पर नियंत्रण है। इन्हें साधने के पश्चात ही हम अपना निर्वाण उत्सव मना सकेंगे। बुद्ध का सानिध्य इसलिये मुझे सदैव आनंदित करता है। महानिर्वाण के समय की उनकी मुद्रा मुझे मृत्यु उत्सव का बोध करवाती है। अतः 1998 में मलेरिया होने के बाद से मित्र बन गये इस ज्वर की पीड़ा और दुर्बल पड़ चुके शरीर के प्रति किसी तरह का मोह अब मुझे नहीं है। वैसे, तो स्वामी रामतीर्थ ने अपने महाप्रयाण के समय क्या कहा था, उस पर भी मैं  चिंतन करता हूं, परंतु मेरी दृष्टि में बुद्ध का महाप्रयाण श्रेष्ठ है। रही बात ब्लॉग पर लेखन की । करीब ढ़ाई दशक से मैं अखबार के पन्ने पर यही तो करते आ रहा हूं। परंतु वहां अपने लिये कुछ कर पाना तो दूर अपनों से भी दूर हो गया हूं मैं। फिर भी बहुत कुछ सीखा हूं, इस रंगमंच पर एकाकी लम्बे सफर में। मेरे जीवन के ये अनुभव कोई किताबी ज्ञान नहीं हैं ! फिर भी यदि तलाश करेंगे तो इसमें आपको अपने काम की कुछ सामग्री मिल ही जाएगी।

(शशि)

6/5/18

Friday, 4 May 2018

कर्ता न बनेंं हम

व्याकुल पथिक

      कर्ता न बनें हम

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   एक कुशल मुखिया में भी यदि "कर्ता "होने का दर्प है , तो वह उसकी ही खुशियों को निर्ममतापूर्वक छीन लेता है। परिवार बिखर जाता है , समाज सहम उठता है और अंततः वह स्वयं ही टूट जाता है।
      " मैं ही हूं "  ऐसा अहंकार योग्य शासक को तानाशाह बना देता है। सिकंदर से लेकर नेपोलियन और हिटलर ने शासन सत्ता में उच्च स्थान तक पहुंचने के लिये , कितना कड़ा श्रम किया था,यह हम सभी जानते है। परंतु स्वयं को विश्वविजेता के रुप में देखने के दर्प का मूल्य इनके साथ समाज को भी चुकाना पड़ा।
         इसीलिये  तो जब एक दिन मेरे एक मित्र सार्वजनिक रुप से युवा अवस्था की ओर बढ़ रहे अपने आज्ञाकारी पुत्र को ऊंची स्वर में डांट रहे थें, तो मैंने उन्हें अपने अतीत का स्मरण करवा सावधान किया था कि पुत्र से एकांत में भी हम यही कह सकते हैं। ऐसा करने से आप पिता-पुत्र के सम्बंधों में कड़ुवाहट नहीं आएगी कभी। परंतु यदि आप यह समझ लें कि मैं तो मुखिया हूं। जिसे चाहे जहां, जो चाहे कह दूं,तो आप अपने परिवार की खुशी कम कर रहे हैं !

      वैसे भी यह मेरा नैतिक धर्म बनता है कि स्वयं जिस गड्ढे में  गिरा हूं, दूसरों को अपने समक्ष तो ऐसा ना ही करने दूं। भले ही मेरा परिवार ना हो, परंतु जब किसी महिला को सुबह दरवाजे पर आ कर अपने पति को प्रेम भरी आंखों से दफ्तर जाने के लिये बिदा करते देखता हूं, तो मैं इतना अनुभव कर ही सकता हूं कि दफ्तर के बोझिल वातावरण में पत्नी की वहीं खामोश मुस्कान पति का आत्मविश्वास बन जाता है या फिर पिता के देर शाम घर लौटने पर उसके मासूम बच्चे पापा आ गये , कहते  दौड़े -दौड़े दरवाजे पर आकर उसकी मोटर साइकिल को पीछे से सहारा देते हूं , घर के अंदर करने का असफल प्रयत्न करते हैं , तब इन बच्चों का यही भोलापन भरा कार्य निश्चित ही उस व्यक्ति की थकान हर लेता होगा । लेकिन, यदि मुखिया में कर्ता होने का अहम आ जाये, तो फिर क्या होगा। तब ये सभी उससे सहमे रहेंगे और समीप आने से बचेंगे।
       मेरे छोटे से खुशहाल परिवार पर इसी " मैं ही हूं " ने तो ग्रहण लगा दिया था। हम सभी बिखर और बिछुड़ गये इसी के कारण। जब पढ़ता था, तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इस तरह से रात्रि  के 11 बजे तक एक बधुआ मजदूर की तरह अखबार बांटना होगा। अब तो धूल, मिट्टी और धुएं में गंगा पुल पर घंटे भर यूं खड़े रहने के कारण पांव की स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि जूता तक नहीं पहन पाता, जिस कारण चप्पल पहन ही काम करना पड़ रहा है। ऐसे मैं वहां खड़े खड़े जब कभी खुले आसमान को निहारते हुये अपनी भी मुक्ति का कामना करता हूं, जब कभी अतीत की याद आती है, तो काफी पीड़ा होती है ,अपने परिवार के बिखरने का। हम सभी की कठिन तपस्या जो कुछ और वर्षों यदि मिला होता, तो पूरा हो भी जाती । उसे इसी " मैं ही हूं " ने कुछ इस तरह से भंग कर दिया कि इसका पहला शिकार मुझे ही बनना पड़ा। फिर बारी आई उस विद्यालय की , जिसे मेरे माता-पिता बड़े ही परिश्रम से खड़ा किया था। मेर छोटी बहन के नाम पर जो ममता शिशु मंदिर गुलजार था , वह भी विरान हो गया। स्व० पिता जी का स्वपन था कि बगल वाला मकान भी खरीद कर विद्यालय का विस्तार करेंगे। हम दोनों भाइयों का विवाह होगा। जो शिक्षित पुत्रवधूएं आएंगी सभी मिल कर ,इस स्कूल को बड़ा पहचान देंगे। परंतु कर्म करने की जगह कर्ता होने का जाने अनजाने में आया "मैं ही हूं का " इस  अहंकार रुपी दानव ने सबकुछ निगल लिया...
    योगेश्वर कृष्ण ने इसीलिए महाभारत के युद्ध में अर्जुन से यह तो कहा कि वे ही कर्ता हैं , परंतु भूमिका उन्होंने सारथी की निभाई थी !

(शशि) 5/5/18

Thursday, 3 May 2018

बुद्ध की खोज

व्याकुल पथिक

      बुद्ध की खोज !
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      बुद्ध पूर्णिमा पर इस बार न जाने क्यों मन की व्याकुल कुछ अधिक ही बढ़ गयी थी। स्वयं से बार बार एक ही सवाल कर रहा था कि कब मुक्त होंगे तुम उस मोह से, जो तुम्हें एक रंगमंच पर कैद किये हुये है। हालांकि यहां भी जो अपने कार्य के प्रति  मेरा प्रेम और समर्पण है, वह मेरे विचार से उत्तम ही है। परंतु यह राह मुझे उस गणतव्य तक कभी नहीं पहुंचा पाएगी, जहां मैं जाना चाहता हूं। सच कहूं तो, मैं बुद्ध को पढ़ना नहीं, बल्कि स्वयं में देखना चाहता हूं ।

         महादेव की समाधि मुद्रा, बुद्ध की ध्यान मुद्रा और कबीर की वाणी इन तीनों ने ही मेरे मन को सदैव आह्लादित एवं आनंदित  किया है।  मैं इनके करीब रहना चाहता हूं। परंतु इनके जैसा हो नहीं पाता। फिर भी प्रयत्न कर रहा हूं। दरअसल होता यह कि जब- तक मन चैतन्य होता है , तब-तक तन की चदरिया मैली ही नहीं पुरानी भी पड़ चुकी होती है। ऐसे में इस पुरानी चादर की अधिक धुलाई करने का प्रयास करेंगे, तो दाग छुटने के स्थान पर चारद के फटने का खतरा अधिक रहता है। सो, मध्य का मार्ग ही हम अपना सकते हैं।

          कभी-कभी सोचता हूं कि सीमित लोगों से अत्यधिक प्रेम करने की अपेक्षा असीमित लोगों में उसे बांटा होता, तो वियोग का वह दर्द होता ही क्यों।  सिद्धार्थ गौतम ने भी तो यही किया था न ! राजमहल, सुंदर पत्नी और नवजात पुत्र के प्रेम से बाहर निकल अपने प्रेम को  सर्वसमाज के लिये समर्पित कर दिया था। इसी समर्पण से एक साधारण सा राजकुमार प्रेम एवं करुणा का प्रतिबिंब बन गया, वह बुद्ध हो गया। विचित्र विडंबना है कि तमाम उपदेशक ज्ञान बांट रहे हैं, मुक्ति का मार्ग बतला रहे हैं, कर्म पथ को परिभाषित कर रहे हैं। कोई इनसे यह पूछे कि  स्वयं भी कभी इन राहों पर चलने का प्रयत्न किया है क्या। सिद्धार्थ ने बुद्ध बन कर तभी उपदेश दिया था, जब उन्हें उस ज्ञान की अनुभूति हो गई थी, जिसकी खोज में वे अपना सारा सांसारिक वैभव त्याग कर निकले थें।
     तभी तो बुद्ध आज भी शुद्ध है... और ये हजारों उपदेशक समाज में कोई भी परिवर्तन लाने में इसीलिए नाकाम हैं, क्यों कि वे चुराया हुआ ज्ञान बांट रहे हैं ! पुस्तकीय ज्ञान के कथावाचन से हम सच्चा उपदेश नहीं बन सकते हैं और न ही औरों को राह ही दिखला पाएंगे। यदि ऐसा सम्भव होता तो, तथागत ने यह नहीं कहा होता -
   " अप्प दीपो भव " ।

    वे भी मोक्षदाता बन जातें, परन्तु यह कार्य उन्होंने हम पर छोड़ दिया है। पर हम मठों में बुद्ध को खोजने लगें, पुस्तकों में उन्हें ढूंढने लगें , इसीलिए एक और बुद्ध फिर नहीं खोज सकें अब तक !

 (शशि) 3/5/18

Wednesday, 2 May 2018

श्रमिक धर्म

व्याकुल पथिक

               श्रमिक धर्म !

     ताकत और पैसे से यदि स्थाई पहचान खरीदी जा सकती , तो हम जैसे लोगों को कौन पूछता। यदि हम अपने कार्य के प्रति समर्पित हैं, तब कहीं भी अपनी पहचान बना सकते हैं, एक मजदूर के रुप में भी। यह तो सभी जानते है न मित्रों कि किसी किसी पान और चाय वाले की भी बड़ी पहचान हो जाती है। क्यों कि ग्राहकों को पता रहता है कि वहां बढ़िया सामान मिलेगा... हमारे जैसे लोग भी इस समाज के दर्पण बन सकते हैं । हो सकता है कि नयी पीढ़ी हमसे भी प्रेरणा ले। स्वयं को श्रमिक पत्रकार कह कर यदि मैंने अपने जैसे तमाम मजदूरों के हक अधिकार की आवाज उठाई है, तो इससे पहले अपने भी अंदर खूब झांक ताक किया हूं। तभी पूरे आत्मविश्वास के साथ ललकार कर कहता हूं कि हां, हूं मैं एक सच्चा श्रमिक । अन्यथा यूं ही मजदूर दिवस पर इंकलाब जिंदाबाद का यह उद्घोष न किया होता । हमारी मांग है कि हमें हमारे काम का उचित पारिश्रमिक मिले। हम यह तो नहीं कह रहे हैं न कि हमें  मोटर - बंगला मिले। परंतु परिवार चलाने भर का पैसा तो मिलना चाहिए ना । यह सवाल आप पूछ सकते हैं कि मेरा श्रमिक धर्म क्या है ? साथियों वह यह है कि अखबार वितरण को लेकर पाठकों को अपनी तरफ से कोई कष्ट ना दूं। वे अखबार लेते हैं और समय से बिल का भुगतान करते हैं। सो, यह मेरी जिम्मेदारी है कि परिस्थिति चाहे कैसी रहे, फिर भी समाचार पत्र उन तक पहुंच जाए। अब इसमें समर्पण क्या है, वह यह है कि भले ही जाम लगा हो और पेपर रात्रि आठ बजे की जगह  10 बजे भी आये, तब भी  मैं धैर्य रखते हुये बस के इंतजार में शास्त्री सेतु पर खड़ा रहूं। फिर जहां तक सम्भव हो सके साइकिल दौड़ाते हुये उसे ग्राहकों तक पहुंचा दूं। लेकिन, भाई मेरे यदि ग्राहकों का स्नेह भी हमें चाहिए, तो थोड़ा श्रम और करना होगा,  वह यह कि समाचार पत्र को साइकिल से फेंक कर देने कि जगह उसे पाठकों के हाथ में थमाना होगा या निश्चित स्थान पर उसे  रखना होगा। कभी कभी तो ऐसा होता है कि ग्राहक हमारे सम्मान में स्वयं हाथ आगे बढ़ा कर पेपर ले लेते हैं। इसी आत्मीय संबंध का परिणाम है कि  पेपर रात्रि 11 बजे भी देता हूं, तो भी ग्राहक लेने से इंकार नहीं करतें । क्या आप श्रमिक भी ऐसा ही कर रहे हैं , अपने अपने कार्यों के प्रति ! या फिर बस पैसे से मतलब है और कर लिया टाइम पास ! तो मित्रों बिना समर्पण भरे परिश्रम के हम सफल हो ही नहीं सकते हैं।  मैं बताऊं कि जब अखबार मेरे हाथ में रहता है, तो किसी मित्र की पुकार पर थोड़ा रुक कर चाय पीना तो दूर पैंट के जेब से मोबाइल फोन तक बाहर नहीं निकालता हूं। चाहे तो कोई भी फोन कर अजमा लें, जाहिर है कि  ग्राहक देवता की सेवा तब मेरा प्रथम कर्तव्य है। सो, ऐसे समय फोन करने वाले से मैं बेझिझक कह देता हूं -
  राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहां विश्राम...
 काम के प्रति यही समर्पण मुझे ग्राहकों का प्रिय बनाये हुये हैं, वे अखबार का नहीं शशि का मान रखते हैं।

(शशि)2/5/18

Tuesday, 1 May 2018

मजदूर हो पर मजबूर ना बनों...

व्याकुल पथिक
 

   मजदूर हो पर मजबूर ना बनों...

     आज अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस है। हक अधिकार की जंग में श्रमिकों के विजय का दिन। मजदूरों की रहनुमाई करने वाले राजनैतिक और गैर राजनैतिक संगठन दोनों ही एक मई  के दिन तरह तरह के कार्यकर्मों के माध्यम इनके हित की बातें उठातें हैं।  मैं भी तो एक श्रमिक पत्रकार ही हूं और अपनी इस पहचान पर मुझे गर्व है। यहां न कोई बेईमानी है, न ही घोटालेबाजी। मजदूर हूं जरूर, पर मजबूर नहीं बनना चाहता हूं । हमारी  आवाज भले ही कोई ना उठाएं, पर हम यूं  क्यों हार जाएं । एक श्रमिक पत्रकार के रुप में सुबह से देर दोपहर सवा तींन बजे तक समाचार संकलन और फिर उसे मोबाइल फोन पर टाइप करना होता है। पोस्टमार्टम, कचहरी, पुलिस आफिस, सदर अस्पताल कहां कहां नहीं दौड़ना होता है। और फिर शाम ढलते ही अखबार लाने और देर रात 11 बजे तक उसके वितरण का कार्य भी करता हें। आप समझ सकते हैं कि आठ घंटे कि जगह 18 घंटे की डबल ड्यूटी करता हूं।  फिर भी पारिश्रमिक कितना पाता हूं ? जब युवा था तो इसी मीरजापुर में ही स्वजातीय जनों ने विवाह की बात उठाई थी। पर जेब में कहां इतना पैसा था।  40 रुपये ही रोज की मजदूरी पाता था।सो, क्या हुआ कि दिल की अरमा आंसुओं में बह गई ...

         एक हमसफर न सही फिर भी आज मुझे चाहने वाले अनेक हैं। इस मजदूर ने अपने रंगमंच पर अपनी पहचान तो बनाई है।
             श्रमिक दिवस क्यों मनाया जाता है, इस पर भी भाषणबाजी आज  खूब होती है। परंतु सवाल बड़ा यह है कि तमाम ऐसे संगठनों ने दशकों के लम्बे संघर्ष के बाद हम कामगार लोगों के लिये क्या किया है, अपने देश में !  हम जैसे तमाम क्षेत्रों के श्रमिकों की निगाहें कब से उस रहनुमा को ढूंढने में लगी है, जो  इस मजदूर वर्ग को मान सम्मान और स्वाभिमान  के साथ रोटी का अधिकार दिलाएगा। दो जून की रोटी, स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा यह तो मौलिक अधिकार है न भाई। रोटी, कपड़ा और मकान यह पुरानी मांग है हरेक इंसान की। हम जिस देश में रहते है, उसके झंडे के समक्ष सिर झुकाते हैं, उसके आन-बान-शान की रक्षा का संकल्प लेते हैं।  तो बदले में यह भी तो चाहते हैं कि हमारी सरकार कम से कम हमारे लिये रोजगार और  न्यूनतम वेतन की व्यवस्था करवा ही दे कि काम से लौटने के बाद घर का चूल्हा जलता हुआ दिखें। पत्नी का चेहर मुरझाया हुआ न हो और बच्चे अपने स्कूल का होमवर्क कर रहे हों। एक मजदूर कभी राजा बनने के लिये तो इंकलाब जिंदाबाद नहीं बोलता है। वह बस काम का अधिकार और उसका मूल्य चाहता है। क्या सरकार इतना भी नहीं देना चाहती है, तो फिर वोट क्यों मांगती है। क्यों कि कोई भी राजनैतिक दल हो वह मजदूर तबके के वोटों से ही सत्ता में आती है। दरअसल  यह " मजदूर "  शब्द जिसका संबोधन हेय दृष्टि से  जेंटलमैन करते हैं, उसका दायरा मेरे नजरिये से बहुत बड़ा है।  सिर्फ बेलदारी करने वाले ही मजदूर नहीं होते हैं। मैं अखबार बांट रहा हूं, रात्रि 11 बजे तक शहर की सड़कों और गलियों में  घूम घूम कर तो श्रमिक नहीं तो और क्या हूं। प्राइवेट प्रतिष्ठान में सुबह नौ बजे से रात दस बजे तक सिर्फ पांच हजार रुपये प्रतिमाह वेतन पर अपनी और अपने परिवार की सारी इच्छाओं को दबा कर ड्यूटी करने वाला शख्स, जो अपने मालिक की हर आज्ञा का पालन करता है। उसकी दुकान से लेकर घर गृहस्थी का सारा सामान लाता है, पानी पिलाता है, उसकी गाड़ी साफ करता है, मेम साहब की खिदमत करता है। उनके बच्चों की फरमाइश पूरी करता है। क्या ऐसा नौकर मजदूर नहीं है। आबादी का तीन चौथाई हिस्सा ऐसे ही लोगों का है। जिन्हें हम मजदूरों की श्रेणी में रख सकते हैं।  परंतु इन्हें न्यूनतम वेतन मिले, जिससे इनके परिवार का खर्च चल जाए । किसी भी सरकार ने इसपर कभी कोई सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इस महंगाई में जिसका अपना कोई आशियाना नहीं है, उसे.गृहस्थी की गाड़ी खिंचने के लिये कम से कम 15 हजार रुपये प्रतिमाह चाहिए ही।  सो, यह सरकार की जिम्मेदारी है कि बेरोजगारों से किस तरह से  काम ले और उसे वेतन दें। अब तो उच्च शिक्षा की डिग्री  रखने वाले श्रमिक युवकों की तादाद भी बढ़ने लगी है। ऐसे युवक जिन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिली है , वे रोजी रोटी की तलाश में हर तरह की मजबूरी करने को तैयार हैं, लेकिन उचित मेहनताना तो उसे मिले। यदि सरकार सबका साथ , सबका विकास चाहती है, तो उसे एक और नारा देना होगा , वह है सबको काम, सबकों रोजगार....।

(शशि) 1/5/18

Monday, 30 April 2018

व्याकुल पथिक

ये कहांँ आ गये हम...

व्याकुल पथिक
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ये कहाँँ आ गये हम...

  यह कैसी पत्रकारिता होती जा रही है, न कोई मिशन ना ही कोई सम्मान ही अब शेष बचा है। जिले की पत्रकारिता में स्वयं को तोप समझने वाले ऐसे उन कुछ मित्रों पर मुझे खासा तरस आ रहा है, जिनके सामने ही अफसरों की जूठी तश्तरी पड़ी हुई थी और हममें से अनेक उनका दिया दोना चाटते रहें ! कहीं आप को यह तो नहीं लग रहा है न कि मैं अपनी पत्रकार बिरादरी का उपहास कर रहा हूँँ। हम पत्रकार तो बड़े ही ज्ञानी, ध्यानी और स्वाभिमानी होते हैं ! फिर ऐसी अपमानजनक स्थिति कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।
    परंतु भाई साहब , क्या करूंँ यह कलम है कि मानती ही नहीं। अपनों पर भी चल ही जाती है। हाँँ , फिर कोई डंक न मार बैठै,  इसलिये अखबार की जगह अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूँँ। स्वयं को वरिष्ठ कह 56 इंच का सीना दिखलाने वाले  पत्रकारों को उनका ही दिया आईना दिखलाने की धृष्टता कर रहा हूँँ। आगे -आगे जब लपक के कुर्सी ताने बैठे थें, तो अपनी बिरादरी की नाक का तनिक ख्याल कर लिया होता भैया जी...।
  या तो अफसरों की उन जूठी थालियों को हटवा दिया होता अपने सामने से या फिर उनका दिया दोना न चाटा होता।   बात यहाँ सूबे के एक बड़े नौकरशाह की पत्रकारवार्ता की कर रहा हूँँ। जहाँ मातहत अफसरों संग मीटिंग के तत्काल बाद पत्रकार वार्ता शुरू हो गयी थी ।
   पर इस दौरान हर पत्रकार की कुर्सी के सामने मेज पर एक जूठा प्लेट रखा पड़ा था  साथ ही छाछ और पानी के डिब्बे- बोतल भी, तरह-तरह के तरमाल को समीक्षा बैठक के दौरान अफसरों की जमात ने गटका था । उन्हीं की जूठन पत्रकारों के सामने मेज पर पड़ी थी। कुछ देर बाद पत्रकारों के लिये भी सिल्वर कलर के बंद छोटे से दोने में कुछ जलपान सामग्री आ गई। लेकिन, जूठा प्लेट किसी ने नहीं हटाया। मैंने ढ़ाई दशक की अपनी पत्रकारिता में किसी भी ऐसे महत्वपूर्ण प्रेसवार्ता के दौरान इसतरह का उपहास मीडियाकर्मियों संग होते पहले कभी नहीं देखा था।  खैर , शुक्र है कि पत्रकारों की इस भीड़ से मैं अलग हूँँ। मेरा मानना है कि भोजन हो या जलपान किसी ऐसे स्थान पर नहीं ग्रहण करना चाहिए, जहाँँ दोयम दर्जे का व्यवहार हो। स्व० रामचंद्र तिवारी जी , जिनसे पत्रकारिता का नैतिक ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ है, वे इसीलिये अफसरों के कार्यक्रम में जलपान से परहेज करते थें। अच्छा हुआ कि देर से ही सही मुझे भी यह सबक अब भलीभांति याद है। सो, हम पत्रकारों का यह हाल-खबर आपको बतला रहा हूँँ।
  मैं पत्रकारिता में आया भले ही रोटी की तलाश में था। परंतु प्रयास मेरा यही था कि बड़ों ने जो राह दिखलाई है। उसी कर्मपथ पर बढ़ता रहूँँ। अब अपने कर्मक्षेत्र की स्थिति जो हैं, वह हमारे जैसे पत्रकारों को इस अखबारी दुनिया से अलविदा कहने को कह रहा है।
   मित्रों, मैं स्वयं भी इस घुटन से मुक्त होना चाहता हूँँ। सोशल मीडिया हमें पुकार रहा है। आजाद पँछी की तरह उसके विशाल नेटवर्क रुपी खूले आसमान में मैं विचरण करना चाहता हूँँ।जहांँ न उम्र की सीमा है , न काम का कोई बंधन है।

शशि 30/4/ 18
क्रमशः