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Monday, 14 May 2018

प्रणाम बंधुओं

व्याकुल पथिक

       जीना उसका जीना है , जो औरों को जीवन देता है
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        हमारे एक मित्र हैं अश्वनी भाई। न्यूज, व्यूज और म्यूजिक का अच्छा कलेक्शन रखते हैं। यू़ं समझे कि आलराउंडर हैं जनाब ! ईश्वर की कृपा उनपर है। सो, सुखी गृहस्थ जीवन का भरपूर आनंद ले रहे हैं। आर्थिक व्यवस्था कुछ उनके पास ऐसी है कि झमाझम लक्ष्मी की बरसात भले ही ना हो रही हो, पर ठन ठन गोपाल भी नहीं हैं बंधु मेरे। सो, दिन चढ़ते- चढ़ते मोबाइल हाथ में लिये और कान में ईयरफोन लगाये मीडिया सेंटर में आ बैठते हैं। यहां काम उनका बस यही है कि आते जाते हुये मैं सब पे नजर  रखता हूं ...

   सो, मेरी मनोस्थिति भी उनसे छिपी नहीं है। अश्वनी भाई जानते हैं कि सुबह के 5 बजे से रात्रि 12 बजे तक मानसिक और शारीरिक कार्य करने वाले मुझ श्रमिक को  देर रात्रि बिस्तरे (शैय्या) पर जाते समय थकान मिटाने की कौन सी दवा चाहिए। लिहाजा, मेरे एकाकी जीवन में रंग बिखेरने के लिये वे इन दिनों पुराने गानों का कोई ना कोई खुबसूरत गुलदस्ता रात्रि में मुझे सेंट करना नहीं भूलते हैं। एक ऐसा ही चुनिंदा सदाबहार नगमा कल उन्होंने मेरे व्हाट्सएप पर डाला था । जिसके बोल रहे ---

मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है
जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है...
   
      अब क्या बताऊं आपको तन चाहे कितनी भी थकान से टूट रहा हो पर मन को भावनाओं, सम्वेदनाओं और कल्पनाओं के पंख लग जाते हैं। वह दिन भर के कैदखाने से मुक्त आजाद पक्षी की तरह फुदकने लगता है। जीवन को सार्थक करने के लिये कितना सरल सूत्र इस गाने में छिपा है। हमसभी ऐसा कर सकते हैं, औरों को जीवन दे सकते हैं। जेब से हमारा कुछ भी बर्बाद नहीं होना है । बस झूठी जुबां चलाने की जगह दिल का खजाना हमें थोड़ा लुटाना है। तभी हमें मन की बात समझ में आएगी !
     अब देखें न हम जिस छोटे से शहर मीरजापुर में रहते हैं, यहीं माता विंध्यवासिनी का धाम भी है। कहां- कहां से नहीं आस्था में बंधे दर्शनार्थी यहां खींचें चले आते हैं। मार्ग में पड़ने वाले शास्त्रीपुल को पार कर ही दर्शनार्थियों और यात्रियों सभी को नगर में प्रवेश करना होता है। हां ,गैर प्रांत जाना हो तो सीधे निकल जाएं। परंतु  स्थिति क्या है यहां की ट्रैफिक व्यवस्था की , यही न की यात्री दो- दो घंटे तक खुले आसमान से बरस रहे अंगारे के मध्य देवीधाम पहु़ंचने से पूर्व जाम में फंस अग्नि परीक्षा देने को विवश हैं। अभी किसी वीआईपी के आगमन की सूचना आ जाए, तो फिर देखिए न साहब कैसे कुछ ही मिनटों में हमारे ये ही बहादुर वर्दीवाले भाई फटाफट सड़क को ट्रैफिक विहीन सा कर देगें। हमारे राजनेता भी स्वागत के लिये इस पुल के समीप आ डट जाएंगे। वहीं ,जब आम जनता की बारी आती है, तो उसे  इसी भीषण जाम में बिलबिलाते रहने के लिये तब तक छोड़ दिया जाता है, जब तक होहल्ला नहीं मचता है। सरकारी खटारी बसों में बैठीं माताओं, बहनों और जाम में गर्मी से बिलखते उनके बच्चों की गुहार सुनने फिर भला कौन माननीय यहां आता है। जनसमस्या स्थल पर जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी देखने के लिये आम आदमी की आंखें तरस जाती हैं। ऐसे में 20 से 30 लाख की मंहगी लग्जरी गाड़ियों में घुमने वाले ऐसे माननीयों को फिर कौन याद करेगा पांच साल बाद! जो हैं तो जनप्रतिनिधि पर क्या जन के लिये कितना  !
       इसीलिये तो मुझ जैसे साधारण पत्रकार को जाम में फंसे लोग संदेश भेजते रहते हैं कि शशि जी व्हाट्सएप ग्रुप में चला दें न ! हम सभी बहुत परेशान हैं। मैं जानता हूं कि मेरा यह कार्य यहां के सत्ताधारी राजनेताओं और अफसरों को सदैव ही अप्रिय लगता रहा है। पर सवाल यह है कि सभी अमृत कलश के दौड़ में जुट जाये, तो जहर कौन पिएगा ! सो, जीवन के संध्याकाल आने से पूर्व कुछ तो अपने पेशे का मान रख लूं, फिर तो अंधेरी रात ही मिलेगी ! हमें भी और आपकों !

शशि 15/5/18

Sunday, 13 May 2018

मिलकर बोझ उठाना....

व्याकुल पथिक

             एक अकेला थक जाएगा मिल कर बोझ उठाना

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         अपने जीवन का अमूल्य ढ़ाई दशक लम्बा समय इस छोटे से शहर में बीताने के बाद इस कूपमंडूक वाली स्थिति से बाहर की दुनिया में झांक ताक एक अवसर ब्लॉग लेखन ने मुझे पुनः मुहैया करवाया है। सो, जिन प्रवासी भारतीयों के लेख,विचारों और कविताओं को मैं अपने बोझिल होमवर्क में से समय चुरा कर जब तब पढ़ ले रहा हूं। उनकी रचनाओं से कहीं अधिक मेरा मन इस लिये आह्लादित हो रहा है कि वतन से सात समुन्दर दूर ये प्रवासी जन किस तरह से अपनी संस्कृति, अपनी पहचान एवं अपने संस्कार के लिये जागरूक हैं। उससे भी बड़ी बात यह है कि यह समूदाय एक दूसरे के उत्साहवर्धन के लिये तत्पर है। रेणु जी जैसी विदूषी गृहिणी जहां से शब्द साधना करते हूं , हम भारतीयों को जगा रही हैं  कि उठो, आगे बढ़ो और अपने अस्तित्व को पहचानों। ब्लॉग लेखन में मेरे जैसे बिल्कुल ही अनाड़ी अजनबी का उन्होंने जिस तरह से सहयोग किया, उस पर एक पत्रकार होने के लिहाज से सोच रहा हूं कि काश ! ऐसी ही सम्वेदनाएं , सहयोग और उससे भी कहीं ऊपर कर्मपथ पर कठिन परिस्थितियों में चलने वाले लोगों के सामाजिक संरक्षण का भाव हमारे देश, हमारे प्रदेश, हमारे शहर और गांव के वासिंदों में भी होता ... तो आज हमारे समाज की हालात ऐसी नहीं होती, हमारी नयी पीढ़ी के नौजवान धनबल, बाहुबल और अब तो एक बार फिर से जाति बल भी , को लेकर इस तरह से व्याकुल नहीं होतें !  जब भी आम चुनाव होता है , हम लोग इन्हीं तीन विषयों को केंद्र में रख वोट डालते हैं।  सफेदपोश बाजीगर भी हमारी इसी कमजोरी का लाभ  वाकपटुता से उठा लेते हैं। वहीं, सामाजिक संरक्षण के अभाव में हमारे ही गली-मुहल्ले का असली समाज सेवक ऐसे अनाड़ियों और बहुरुपियों के सामने समाज की इसी नादानी के कारण अवसाद में डूब जाते हैं, टूट जाते हैं। फिर क्या होता है , जानते है ? कर्मपथ पर अपनी उपेक्षा से वे ना भी हटें, तो उनसे जिस "अमृत कलश" की प्राप्ति की इस व्याकुल समाज को उम्मीद थी, उसे फिर कोई नहीं लाकर देगा आपकों...
      इस दर्द को बेहद ईमानदारी के साथ पत्रकारिता करने के दौरान मैंने समझा है। जेब में इतना पैसा तब नहीं था उस वक्त कि अपनी भी गृहस्थी बसा सकूं। परंतु इस समाज से मिला क्या कोर्ट - कचहरी का दर्द और अपने संस्थान की उपेक्षा का दंश। हालांकि मैं इसलिए इससे विचलित नहीं हुआ हूं कि मैं जानता हूं कि सत्य की ही विजय तय है। परंतु मैंने उस कलम को तोड़ दी है, जो समाज को समर्पित थी। मैं इसीलिये ब्लॉग लेखन शुरु किया हूं कि एकाकी जीवन में  स्वयं ही अपने सवालों का जवाब ढ़ूंढने निकल पड़ूँ...

    गुरुदेव रविंद्रनाथ की ये पक्ति जिसे बचपन में कोलकाता में पढ़ा था, आज भी मुझे याद है -

' जोदि तोर डाक शुने केऊ ना ऐसे तबे एकला चलो रे "

    पर समाज यह चिन्तन करे , वह महाभारत काल के उन महान शस्त्रविद्या के ज्ञानी आचार्य द्रोणाचार्य  का कुछ तो स्मरण करे, जिनके अबोध बालक को वह एक गिलास दूध भी नहीं उपलब्ध करवा सका। कितना भयानक परिणाम हुआ इसका। एक अजेय स्वाभिमानी आचार्य अपने मित्र के हाथों इसी कारण अपमानित होकर टूट गया। उसने कुरुवंश की गुलामी स्वीकार कर ली । जो राजकुमार अयोग्य थें उन्हें भी बलशाली उन्मादी योद्धा बना दिया। परिणाम कितना भयानक रहा,  इसी कारण वह महाभारत युद्ध भी उसी समाज को सहना पड़ा। जिसने आचार्य के पुत्र को एक गिलास दूध नहीं दिया था !

शशि 14/5/ 18

आत्म कथा, प्यारी प्यारी है, ओ मां, ओ मां

व्याकुल पथिक
( आत्मकथा )

        प्यारी प्यारी है, ओ मां ,ओ मां...
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         कल शनिवार को वाराणसी से मीरजापुर के लिये रात्रि के 8 बजे ही बस मिल पाई। तब जा कर अखबार का बंडल लगा।  सो, कम से कम सवा 10 बजे रात्रि तक का समय शास्त्री सेतु पर ही टहल घुम कर मुझे बिताना है, यह तो तय ही था। ऊपर से जाम लगने का अज्ञात भय। बड़े भैया चंद्रांशु जी की कृपा से मिले, उन्हीं के मुसाफिरखाने पर कह कर आया था कि भाई थोड़ा सहयोग करना साढ़े 11 बजे रात्रि तक तो निश्चित ही आ जाऊंगा। चूंकि यूपी में जो सरकार इन दिनों है, वह मेरे नजरिये से नौकरशाहों की सरकार है। अफसर यहां पर नेताओं सा आचरण कर रहे हैं और जनप्रतिनिधियों को पब्लिक की तनिक भी चिन्ता नहीं है, वे अफसरों से पंगा नहीं लेना चाहते हैं। वहीं विपक्षी पार्टियों की इतनी हैसियत नहीं है कि उसके नेता ऐसे अधिकारियों से पंजा लड़ा सकें। ऐसे में हम जैसे श्रमिक वर्ग के लोग अच्छे दिन की चाहत में बेहद ही बुरे दौर से गुजर रहे हैं। मैं एक पत्रकार हूं, करीब ढ़ाई दशक से इस मीरजापुर में हूं। परंतु जीवन में ऐसे बुरे दौर कभी नहीं देखने को मिलें हैं । अमूमन रात में साढ़े 10 बजे तक का समय,इसी शास्त्री पुल पर अनेकों वाहनों के काले धुएं और धूल से दोस्ती निभाने में व्यतीत हो जाता है। ऐसे में मन का व्याकुल होना स्वाभाविक है। यह मानव स्वभाव है। ऐसी मनोस्थिति में कभी कभी अतीत की सुखद स्मृतियां इस पीड़ा के उपचार के लिये जीवन संजीवनी बन जाती हैं। मुझे ही देखें न मैं यहां मीरजापुर के शास्त्रीपुल से पल भर में ही कोलकाता के हावड़ा ब्रिज पर जा पहुंचता हूं। बचपन में मां से जिद्द कर अकसर ही नीचे मिठाई कारखाने के आफिस में बैठें घोस दादू   
के साथ हावड़ा ब्रिज की ओर निकल पड़ता था। कभी -कभी तो पैदल ही पूरा ब्रिज पार कर हावड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाया करता था या फिर ब्रिज से नीचे उतर चार पांवों वाले इस विशाल झुले को अपलक निहारता रहता था...   इसी बीच बंडल लेकर आ गयी बस मुझे झकझोर देती है कि कहां खोया है, यथार्थ तुम्हारे सामने यह अखबार का बंडल है। अब साइकिल उठाओं और अपने कर्मपथ पर बढ़ चलो। बचपन में पढ़ा है न कि वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

    वैसे ,आज तो मदर डे है। हमारे बचपन में मदर और फादर डे  को कोलकाता जैसे महानगर में भी लोग नहीं जानते थें। हां, हम बच्चे अपने प्रियजनों के जन्मदिन पर उन्हें भी कुछ उपहार देने की चाहत जरूर रखते थें। नियति की यह भी कैसी विडंबना है। जिसके पास तीन - तीन मां हो (नानी मां, मौसी मां और मम्मी तो है हीं )  , आज वह एक वक्त के भोजन से ही समय गुजर लेता है, मन ही नहीं होता रात्रि में खाने का।  खुद के हाथ से बने खाने में मां के भोजन जैसा मिठास ही कहां है।  जब भोजन की बात कर रहा हूं, तो याद आती है कि 12 वर्षें की उस अवस्था में मैंने  खाना बनाना भी तो मां से ही सीखा था। तब घर पर तीन लोग ही थें , मां , बाबा और मैं। मां की बीमारी बढ़ने लगी थी, फिर खाना कौन बनाये। सुबह देशबंधु के यहां से जलपान आ जाता था। दोपहरमें इटली- डोसा से हम काम चला लेते थें। परंतु रात में बिना पराठे के बाबा से रहा नहीं जाता था। शुद्ध देशी घी का पराठा और आलू का पराठा बाबा को पसंद था। ऐसे में मां ने ही बेड पर लेटे-लेटे मुझे आटा गुथना सिखाया था। हां पराठे बनाने में थोड़ी कठिनाई जरुर होती थी। सो, मुझे उसमें उलझा देख जब कभी लिलुआ वाली नानी जी यहां मां को देखने आ जाती थीं, तो वे मुझे चल हट किनारे बैठ , कह स्वयं ही पराठा बना देती थीं। उन्होंने अंतिम समय तक मां का साथ नहीं छोड़ा था। वे देर शाम लोकल ट्रेन पकड़ लिलुआ से आती थीं और रात्रि में जब बाबा ऊपर कमरे में आते थें, तब घर वापस जाती थीं। रात्रि के 12 तो बज ही जाते होगें उन्हें अपने घर लिलुआ पहुंचने में, परंतु काफी हिम्मती महिला थीं। इसी तरह से सादी सब्जी बनानी भी मैंने मां से ही सीख ली थी।
     शायद मां को यह आभास हो गया हो कि उनके बाद जीवन भर मुझे अपने ही हाथों का बनाया भोजन खाना है, इसिलिये तो उन्होंने मुझे खाना बनाने का बचपन में ही प्रशिक्षण दे दिया था , ताकि उनका मुनिया भूखा नहीं रहे ...
 
मां को आज के दिन और क्या कहूं कि

 तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है, प्यारी प्यारी है, ओ मां, ओ मां....

क्रमशः

(शशि) 13/5/18

Friday, 11 May 2018

हमारी मुस्कान हमारी पहचान

व्याकुल पथिक

             हमारी मुस्कान हमारी पहचान
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         हर इंसान अपने में एक अलग कहानी है, बिल्कुल सच्ची कहानी है  !  जो हमारे लिये आत्मकथा है, वह औरों के लिये कहानी है। आत्मकथा लेखन हमारे अतीत की न सिर्फ खट्टी मीठी यादों से हमें सराबोर करता है, वरन् हमें आत्मावलोकन का भी भरपूर अवसर देती है। वह एक ऐसे पड़ाव पर हमें ला खड़ा करता है, जहां हम अपने कर्मपथ की दुर्गम राह आसान कर सकते हैं । भूतकाल की गलतियों का भान होने पर हम स्वयं में सुधार लाने के साथ ही दूसरों का मार्गदर्शन भी कर सकते हैं।  पत्रकारिता को लेकर इसीलिए बहुत कुछ मैंने पूर्व में लिखा भी था, क्यो कि ढ़ाई दशक से वहीं तो मेरा सबकुछ है...न बंधु ,न परिवार, न घर, न स्वास्थ्य और ना ही धन ...
       सब-कुछ घर पर छोड़ कर बनारस से 25 वर्ष पूर्व निकला था, तो यहां मीरजापुर में दो चीजें लेकर आया था। एक स्वस्थ तन और दूसरा चेहरे पर मुस्कान। अच्छे स्वास्थ्य ने मुझे पैदल ही मीरजापुर की सड़कों पर, गलियों में भटकने के लिये प्रर्याप्त उर्जा दिया, पर सदैव मुस्कुराते रहने की मेरी आदत ने यहां के लोगों के करीब मुझे लाया। यदि चेहरे पर हमारे मुस्कान है, तो निश्चित ही हमारी वाणी भी मधुर होगी , इसमें संदेह नहीं है। और सारे संबंधों का मूल यह वाणी ही तो है ! इसके अतिरिक्त कर्मपथ पर बढ़ने के लिये दो और गुण हमारे पास होने चाहिए,  सच्चाई और ईमानदारी। असत्य का मायाजाल स्वयं हमकों ही व्याकुल करता रहेगा। इससे एक अज्ञात भय बना रहता है। हम सभी ऐसे दौर से कभी ना कभी गुजरते हैं, परंतु इस झूठ के आवरण का जितना शीघ्र हो सके, त्याग कर देना चाहिए, अन्यथा हमारी मुस्कान हमसे छीन जाएगी। मैं ऐसे सारे अवसाद भरे दौर से गुजर चुका हूं। इसीलिये यह पैगाम बांट रहा हूं कि औरों के सामने मुस्कुराते रहिये ! अनाड़ी पिक्चर का मुकेश साहब का वो गीत याद है न -
   किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में...

    यदि हम दर्द में हैं , तो भी हमें जोकर फिल्म में रंगमंच पर राजकपूर के विदूषक के अभिनय को देख मुस्कुराते रहना सीखना होगा। जीवन के इस रंगमंच पर मैंने भी इस महान विदूषक(जोकर) से बड़ी सीख ली है। हम सभी जानते है कि हमारा दर्द कोई नहीं बांटेगा। फिर क्यों न उसे अपना साथी बना  मुस्कुराते रहें। मुस्कान सच्ची हो, बनावटी हो, थकान भरी हो, दर्द भरी हो ... यह सामने वाले को पता नहीं लगे, यही तो एक अच्छे विदूषक का कर्म है ! वर्ष 1998 में मलेरिया का गलत उपचार होने से अपना स्वस्थ शरीर ही नहीं कई अपनों को भी खोने के बाद आज भी उसी तरह मैं मुस्कुराते आपकों मिलूंगा , जीवन के सफर में यही मेरी पहचान है !

(शशि)12/5/18

Thursday, 10 May 2018

लोभ मुक्त कर्म

व्याकुल पथिक

            लोभ मुक्त कर्म ही हमारी पहचान
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       मेरा स्वयं से एक सवाल सदैव रहा है कि बिना किसी तैयारी, बिना किसी जानकारी के ही मैं नये नये कार्यों में क्यों उलझ जाता हूं। अब देखें न बचपन में मैं एक पेंटर बनना चाहता था। पेंटिंग के अभ्यास के लिये मुझे एक कुशल चित्रकार के यहां भेजा भी गया था। रंगों को हल्का-गाढ़ा कर चित्र पर भाव लाने की उनकी कला मुझे मंत्रमुग्ध किये हुये थी। उन्होंने भी मुझसे कहा था कि निश्चित ही तुम भी एक अच्छे चित्रकार बनोगे, परंतु हाईस्कूल में पिता जी ने मुझे साइंस  दिलवा दिया। तो मेरा मन गणित के सवालों को सुलझाने में उलझ गया। गणित के दोनों पेपर में बराबर अंक मिले। सौ में 98 अंक प्राप्त करना सचमुच मेरी एक बड़ी उपलब्धि ही थी।  परंतु मैं इंजीनियर भी तो नहीं बन सका। पढ़ाई बीच में छूट गयी। परिस्थितियों ने मुझे कलम थमा दिया। हिन्दी से जितना दूर मैं भागता था, वह मुझे जबर्दस्ती अपने पास खींच लायी, जीवन के पच्चीस साल कब इस मीरजापुर की सड़कों पर इस भाग दौड़ में गुजर गये कि कोई खबर छूटने न पाये। मैं कभी किसी से पीछे जो नहीं रहना चाहता था, यहां तक कि भदोही और सोनभद्र की बड़ी घटनाओं की सूचना सबसे पहले प्रेस को दे, वहां बैठें वरिष्ठ जनों को भी चौका देता था। और अब मन की व्याकुलता शांत करने के लिये यूं ही अचानक बिना किसी तैयारी के ब्लॉग लेखन करने लगा। न किसी की आत्मकथा पढ़ी , न ही कोई साहित्य पढ़ा बस लगा अनाड़ियों की तरह मोबाइल फोन का बटन दबाने। इस तरह का दुस्साहस कर मैं अपने उपहास का मार्ग स्वयं ही क्यों प्रशस्त करता हूं, मुझे नहीं पता, बावजूद इसके मेरे कई विद्वान शुभचिंतक  जब यह कहते हैं कि बहुत बढ़िया लिखा, शब्द साधना करते रहो, तो अपनी प्रशंसा सुनकर बड़ी ही लज्जा की अनुभूति होती है। सोच रहा हूं कि काश ! मैं हिन्दी का विद्यार्थी होता,  तो गर्व के साथ अपनी तारीफ पर सिर उठा तो सकता न...
     फिर भी मन की ये जो भावनाएं हैं, वह भला कहां मानती हैं। अपनों की यादें मुझे व्याकुल ही किये जा रही थीं और मैंने  अतीत और वर्तमान दोनों को एक साथ लेते हुये चिन्तन युक्त आत्मकथा लेखन शुरु कर दिया, अपना एकाकीपन दूर करने के लिये। मेरा मानना है कि यदि हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन अपने कार्य में कर रहे हो और उसमें सच्चाई की सुगंध हो, तो सरस्वती की कृपा निश्चित ही प्राप्त होनी है। इसीलिये तो पत्रकारिता में यहां मुझे क्या सम्मान और स्नेह मिला है और उसमें अब तो और वृद्धि भी हो रही है, उसे वे पत्र प्रतिनिधि कभी नहीं समझ सकेंगे , जो जुगाड़ में ही रहते हैं। एक बिल्कुल ही अनजाने शहर में सिर्फ दो रोटी की रोटी के लिये मैं वाराणसी से देर शाम यहां मीरजापुर आ कर पैदल ही अखबार बांट लौट जाया करता था। आज भी मैं उन दिनों को याद करता हूं, तो चकित सा रह जाता हूं कि मेरे किस गुण के कारण लोगों ने मुझे इतना सम्मान और स्नेह दिया ! आज घर-परिवार, स्वास्थ्य सब-कुछ खोने के बावजूद भी मैं एक खुशहाल फकीर क्यों हूं। मेरे चेहरे पर आप अत्यधिक काम के बोझ के कारण थकान तो देख सकते हैं, परंतु इसे लेकर मैं चिन्ता में हूं, यह नहीं कह सकते हैं आप !
      कारण मैंने  महान संत कबीर की एक छोटी सी थ्योरी पढ़ी है,  वह यह है न कि
   रुखा सुखा खाई के, ठंडा पानी पी।
   देख पराई चुपड़ी , मत ललचाओ जी ।।

  बड़े से बड़े  शास्त्रों का ,विद्वानों का ,चिंतकों का सारा का सारा ज्ञान , इसी दो लाइन के दोहे में समाहित है। जरुरत तो इस पर प्रैक्टिकल की है हमें।  और यह प्रयोग हमें स्वयं पर करना है। आज मैं क्यों पूरे आत्मविश्वास के साथ कहता हूं कि मुझमें तनिक भी लोभ नहीं, तो इसके लिये लम्बा अभ्यास भी तो किया हूं। तब जा कर इस स्थिति में अब हूं कि मेरे सामने आप छप्पन भोग ही क्यों न रख दें , परंतु मुझे तो सिर्फ चार सूखी रोटी और थोड़ी सी सब्जी की ही तलाश रहती है । इन मेवा- मिष्ठान से अपने को क्या काम।  यहीं लोभ पर संयम मेरी स्थाई पुंजी है। जिसे मैं इस शहर की गलियों में पच्चीस साल से अखबार बांट कर कमाई है। जिसका परिणाम यह है कि मेरे लिये मजदूर और सेठ में कोई फर्क नहीं है। आज इस समाज में जो मेरा जो सम्मान है न, वह भी कारण है कि मैंने किसी सेठ के सामने हाथ नहीं फैलाया है।

( शशि)11/5/18

Wednesday, 9 May 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
 आत्मकथा
            मेरी दुनिया थी मां तेरे आंचल में
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    मुनिया कहां है...बिल्कुल सुनता नहीं ना...चौधरी देखों इसका...ठीक है जब नहीं रहूंगी तब तकलीफ पाएगा ...
            मां चाहे कितनी भी नाराज हो जाती थी, लेकिन मैं जानता था कि उन्हें कैसे मनाना है। सो, मुझे याद नहीं कि मां की डांट पर कभी मैंने मुंह बनाया हो। उसी तरह से उछलता कूदता रहता था कभी बरामदे में तो कभी सीढ़ियों पर , तो कभी नीचे दूसरी मंजिल पर भाग जाता था । मां को कबूतरों के लिये मेरा घर बनाना पंसद नहीं था । सबसे अधिक डांट उसे लेकर ही पड़ती थी। परंतु इन कबूतरों में रुचि मेरी मां के कारण ही तो जगी थी। जब तक उनमें सामर्थ था, रात्रि में जो भी परेठा बच जाता था या कुछ अधिक ही वे बनाती थीं , उसे छोटे टुकड़ों में तोड़ कर वे बारजे पर जैसे ही डालती थीं, तमाम कबूतर पंख फैलाये चले आते थें। गौरया के लिये भी पानी की व्यवस्था मां नहीं भूलती थी। परंतु मैं पढ़ाई से ज्यादा समय इन कबूतरों के आशियाने पर देने लगा था। मां चाहती थी कि मेरी पढ़ाई कहीं से कमजोर नहीं रहे, ताकि मेरे शिक्षक पिता जी ताना न मारे... बड़ी मुश्किल से दूसरी बार करीब 11- 12 वर्ष की अवस्था में मुझे अपने ननिहाल कोलकाता में रहने देने के लिये वे सहमत हुये थें। दार्जिलिंग में मां के छोटे भाई की पुत्री( रिश्ते में मेरी मौसी) के विवाह में मां और मम्मी के संबंध फिर से मधुर हुये थें। यूं समझे कि मां ने वहां जब मुझे वर्षों बाद देखा, तो स्वयं को रोक नहीं पाईं थीं। बनारस में मैं बहुत दुर्बल हो गया था। वो मम्मी नहीं मां थीं, भला मुझे ऐसे कैसे देख सकती थीं । खैर अहम् त्याग पापा ने एक बार फिर मुझे मां के आंचल में समा जाने का अवसर दिया। मुझे याद है उस गर्मी की छुट्टी में जब मैं परिजनों संग कोलकाता आया था और माह भर बाद मेरी वापसी का टिकट बुक नहीं हुआ, तो मैं किस तरह से खुशी से चहकते हुये मां की गोंद में जा गिरा था। मां ने हिदायत दी थी... ठीक से पढ़ेगा न ! अपने बाब से बेज्जती तो नहीं करवाएगा !
    वैसे,तो वहां मेरे दोनों ही जन्मदिन पर बाबा ने ढेरों उपहार लाकर दिये थें। मां ने कितने ही लोगों को बुलवाया था । मुनिया का बर्थ डे है। हम सभी शाकाहारी रहें,अतः संदेश, काजू, चाकलेट पाउडर और खोवा से निर्मित विशेष तरह का केक नीचे कारखाना से हाड़ी दादू ने बना कर भेजा था। एक जन्मदिन पर मां ने मेरे लिये बंगाली धोती कुर्ता मंगवाया था। वह मेरा आखिरी जन्मदिन मना था, मां के जाने के बाद फिर कभी मैंने अपना जन्मदिन नहीं मनाया। जब मैं मुजफ्फरपुर में था, तो जन्मदिन पर कुछ खास करने के लिये मौसी जी को भी मैंने मना कर दिया।  मां ही नहीं रही , तब जन्मदिन कैसा... मैंने तो मां के बाद कभी होली दीपावली भी नहीं मनाई है।
         फिर वह दिन भी आया जब मैं अपनी मां की परीक्षा में खरा उतरा। अपने क्लास 6 में फस्ट जो आया था। रिजल्ट मिलते ही, सीधे मां के पासा भागा आया, लेकिन मां तो मृत्यु शैया पर पड़ी हुई थी ....
      फिर भी मां के कान में वो शब्द मैंने ही आखिरी बार कहे थें , यदि वे चेतना में रही होंगी, तो निश्चित ही मुझे शाबाशी दी होगीं। मां और बाबा दोनों ही मेरी शिक्षा पर ध्यान देते थें। मास्टर साहब प्रति दिन कोलकाता के बड़ा बाजार स्थित हमारे निवास स्थान पर पढ़ाने आते थेंं। मां बेहद तकलीफ में थीं। कोई भी दवा काम नहीं कर रही थी। ऐसे में मुझे अपनी कक्षा में प्रथम स्थान मिलने का उपहार कौन देता।  बाबा जो वर्षों से मौत को पीछे ढकेल मां को वापस ले आया करते थें। इस बार उनका हर संघर्ष व्यर्थ होता दिख रहा था। मां ने अंतिम बार उन्हें चौधरी कह कर पुकारा था। इसके बाद फिर कुछ न बोली थीं। जिस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उन्होंने नश्वर शरीर को त्याग था , बाबा और लिलुआ वाली नानी जी संग मैं भी कमरे म सहमा- सहमा व्याकुल से नर्स की बातें सुन रहा था।परंतु दुर्भाग्य से मुझे झपकी आ गयी ।  बाबा की चींख सुन जब जगा, तो मेरी दुनिया उजड़ चुकी थी। परिवार के इतने सदस्यों के रहते हुये भी मैं अनाथ हो गया था।  कहां तो मेरे मित्र स्कूल में मानीटर के रुप में मेरे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थें और कहां मुझे फिर  जबर्दस्ती बनारस मम्मी-पापा के साथ भेज दिया गया। मैंने करीब 13 वर्ष की अवस्था में मां को पहली बार कंधा दिया था। हालांकि जो लोग मौजूद थें, वे नहीं चाहते थें कि मैं इस अवस्था में श्मशान घाट हरि बोल कहते हुये जाऊं। पर मेरे जिद के आगे किसी की नहीं चली। इसके बाद आज तक अपने परिवार के किसी भी सदस्य के शव यात्रा में मैं शामिल नहीं हुआ हूं, बाबा,दादी, मौसा जी, बहन और पापा इसी बीच गुजर चुके हैं । मेरी दुनिया तो मां के आंचल में ही थी , सो फिर शेष अब बचा ही क्या रहा ...

(शशि)10/5/18

क्रमशः

Tuesday, 8 May 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
  आत्मकथा
           
         अपनों से वियोग का प्रथम आभास
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         मृत्यु भय से कहीं अधिक अपनों से वियोग  का दर्द होता है। मनुष्य चाहे जितना भी ज्ञान अर्जित कर ले, संत ही क्यों न हो जाए। फिर भी अपनों के बिछुड़ने की पीड़ा उसे निश्चित ही होगी !  बुद्ध के निर्वाण पर आनंद की मनोस्थिति इसका प्रमाण है। हां,  यह और बात है कि हमारा वैराग्य भाव हमारी व्याकुलता कम कर देता है...

        प्रियजनों के दूर जाने की कसक आज भी मुझे है। परन्तु इतना ही सत्य यह भी है कि मृत्यु के समय यदि मैं चैतन्य अवस्था में रहूंगा, तो बुद्ध की तरह ही मोह रहित निर्वाण को प्राप्त करूंगा। ऐसा मेरा विश्वास है। कर्मपथ के आगे जो मुक्तिपथ होता है न , उसकी तैयारी वानप्रस्थ अवस्था में पहुंच कर हमें शुरू कर देनी ही चाहिए। थकान भरे जीवन सफर का यह सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। जो हमें आखिरी मंजिल की ओर ले जाता है। जिसकी तैयारी अब मैं भी शुरू करने वाला हूं। सो, पांव में किसी प्रकार की बेड़ियों को स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं है ! मेरा मन आजाद पंक्षी की तरह खुले आसमान में विचरण करने के लिये मचल रहा है। पत्रकारिता का यह बंधन भी अब सहन नहीं हो रहा है !

      आत्मकथा लेखन के लिये अब जब मैं अपने अतीत में झांक रहा हूं, तो किन स्वजनों की जुदाई पर मुझे अत्यधिक पीड़ा हुयी, यादों की वे सारी तस्वीरें मानों फिर से सजीव हो उठती हैं। समय तेजी से पीछे भागा जाता है। मुझे याद है कि जब मैं वाराणसी में कक्षा पांच में पढ़ता था। संकठा घाट पर गंगा किनारे हमारा विद्यालय था। जिस खिड़की की तरफ कक्षा में मैं बैठा करता था, वहां से गंगा दर्शन भी करता रहता था। उस दिन को याद कर आज भी मैं सिहर उठता हूं। जब पहली बार एक सुंदर , स्वस्थ्य और गौरवर्ण युवक का शव गंगा में बहता देखा था। उसके मृत शरीर पर लाल रंग का गमछा पड़ा था। उस दिन जब तक क्लास रुम में था, मेरी निगाहें उसी शव पर टिकी हुई थी।   करीब दस वर्ष की ही तो अवस्था रही होगी मेरी, जब इस शव ने पहली बार मुझे जीवन के इस सत्य से परिचित कराया की सब कछ नश्वर है। मेरा मन कितना अधिक व्याकुल हो उठा था, इसे बताने के लिये शब्द नहीं है। वह रात मुझे आज भी याद है, जब मैं सोया तो अपनों के समीप ही था , लेकिन पलकें आंसुओं से भींगती ही जा रही थीं। पूरी रात यह सोचता रहा कि क्या दादी, पापा- मम्मी सभी मुझे इसी तरह से छोड़कर चले जाएंगे। मेरी यह मनोदशा कितने दिनों तक बनी रही, यह तो मुझे ठीक से याद नहीं। परंतु मृत्यु से वह मेरा प्रथम साक्षात्कार रहा। फिर भी मैं कोई सिद्धार्थ तो था नहीं कि इस दुख से मुक्ति का मार्ग तलाशने लगता ! अतः मनोस्थिति सहज हो गई होगी मेरी।
     लेकिन , सच तो यही था कि गंगा में युवक का वह शव  यह संदेश दे गया था कि मेरा जीवन ही अपनों से बिछुड़ने के दर्द को सहने के लिये बना है।  और कुछ ही वर्षों में यह प्रत्यक्ष भी हो गया था। जो मुझे सबसे प्रिय था , वह मेरी मां मुझे छोड़ कर चली गयी... मुझे याद है, जब वे मृत्यु शैय्या पर थीं , तो मैंने उनके कान में धीरे से क्या बोला था।  वह शब्द था कि मां सुन रही हैं न आपका मुनिया फस्ट हो गया है और क्लास सेवेन में अब वह मानिटर होगा...पता नहीं मां ने सुना भी था कि नहीं ! हां, लिलुआ वाली नानी जी ने मुझे विश्वास जरुर दिलवाया था कि मां ने तुम्हारी बात सुन ली है।

(शशि) 9/5/18

Monday, 7 May 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
आत्मकथा

भटकती राहों में  स्मृतियों का संबल
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     मैं यह जानता हूं की जीवन के अनमोल उन पच्चीस वर्षों को मीरजापुर की सड़कों पर अखबार बांट कर बरबाद किया हूं। कहीं नौकरी न करने की यह चाहत ने मुझसे मेरे सारे सुनहरे स्वप्नों को छीन लिया है। परंतु इस संघर्ष का भी अपना मजा है। जीवन के जिस कड़ुवे सत्य के करीब मैं हूं, यह अवसर हर किसी को नहीं मिलता है। बहुत सारे बंधन मेरे इसी के कारण टूटे हैं और मेरा विश्वास है कि मृत्यु से पूर्व मन के अन्य विकारों का त्याग भी कर ही लूंगा। इसमें मुझे कोई संदेह तो बिल्कुल भी नहीं है।
       बात जब भी संघर्ष की करता हूं, तो मुझे गर्व होता है स्वयं पर कि न तो कभी टूटा हूं और न ही झूका हूं। स्मृतियों का अनमोल खजाना मेरे पास है, जो मुझे विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी बचपन की पहचान से दूर नहीं होने देता है।
     हमारे मित्र कामरेड मोहम्मद सलीम कहते हैं कि शशि भाई प्यारी स्मृतियों को संजोए रखिए, ये आज आपका संबल है। मेरा भी मानना है कि वे बिल्कुल ठीक कहते हैं। हर व्यक्ति के जीवन में ये स्मृतियों  ही हैं,जो उसका मार्गदर्शन किया करती हैं। मैं जनपद स्तरीय पत्रकारिता जगत  ,जो एक तरह से काजल की कोठरी ही है, में रह कर भी बदनाम आप लोगों के बीच नहीं हूं, क्यों कि बचपन की ही स्मृतियों के कारण  लोभ मुक्त हूं। नहीं तो अपने पेशे में ऐसा लगता है मुझे की पढ़े लिखे भिखमंगों की टीली में शामिल हूं। चौथे पायदान   पर खड़े हमलोगों की पहचान इतनी है कि अफसरों के सामने  काजू- पिस्ते की सामग्री प्लेट में सजी होगीं और आपको घटिया बर्फी समोसा दिया जाएगा। इसलिये मैं अधिकारियों के प्रेसवार्ता में कुछ भी जलपान पसंद नहीं करता हूं। अभी पिछले ही माह तो सूबे के सबसे बड़े नौकरशाह के पत्रकार वार्ता में कुछ ऐसा ही अपमान यहां की मीडिया का हुआ था। जब अफसरों के झूठे प्लेट के सामने ही पत्रकारों के लिये एक  दोने में बर्फी-पकौड़ी रख दी गयी थी। फिर भी अनेक लोग उसी पर टूट पड़े थें । ऐसा अपमान भरा जलपान मैं इसलिए स्वीकार नहीं कर पाता, क्योंकि मुझे आज भी याद है कोलकाता में जब शिशु कक्षा में पढ़ता था, तो मौसी जी मेरा टिफिन बाक्स किसी तरह से सजाती थीं। इस सुखद स्मृति के साथ ही उस बुरी स्मृति को भी मैं भला कैसे भूल सकता हूं , जब मेरे इसी लंच बाक्स के कारण मेरे पिता जी जबर्दस्ती मुझे कोलकाता से खींच कर वाराणसी ले गये और मैं बर्बाद हो गया, उनके इस अहम् के कारण। बिलकुल छोटा बालक था तब , लेकिन वह धुंधली स्मृति आज भी मुझे याद है। जब मैं अपने ननिहाल में रहता था। सम्भवतः चार - पांच वर्ष ही मेरी अवस्था होगी। कितना दौड़ धूप कर मेरा नाम वहां के बड़े इंग्लिश स्कूल में लिखाया गया था। मेरे लिये चमड़े की एक खुबसूरत अटैची स्कूल जाने के लिये आयी थी। जिस पर  सफेद पेंट से मेरा नाम अंग्रेजी में शशि कुमार गुप्ता लिखा गया था। शायद बाबा ने  लिखा था, यह ठीक से याद नहीं है , पर मौसी जी एक अंग्रेजी की कविता मुझे पकड़ कर जबरन रटाया करती थीं, उस पोयम की पहली लाइन अभी भी याद है। मेरे लंच बाक्स में काजू बर्फी और अंगूर तो निश्चित ही होते थें। मैं जैसे ही नीचे दुकान पर कोई नया पानी का बोतल देखता था, पुराने बोतल का ढक्कन, पाइप कुछ न कुछ गायब कर देता था। बाबा फिर नयी बोतल दिलवाने मुझे साथ लेकर जाते थें। मुझे जब एक नौकर गोद में लेकर नीचे स्कूल बस तक पहुंचाने जाता था। मां(नानी) खिड़की में जाकर खड़ी हो जाती थीं, अन्यथा मैं सीढ़ी उतरने वाला नहीं था। हम सभी लोगों को जाते समय जय गणेश जी बोलना सिखाया जाता था। परंतु वह मनहूस दिन भी आया जब पापी- मम्मी मेरे छोटे भाई को लेकर कोलकाता आये। मुझे अच्छी तरह से याद है कि बगल के कमरे में उन्हें ठहराया गया था। उनकी खिदमत में किसी तरह की कमी यहां नहीं की गई थी। वे क्रोधित अधिक होते थें, यह यहां सभी को पता था। पर यह मेरा दुर्भाग्य ही समझे की एक दिन उन्होंने मेरा टिफिन बाक्स देख  लिया। जिसमें महंगे फलों को देख उन्होंने बेहद नाराजगी व्यक्त करते हुये कहां कि एक भाई को इतना सब कुछ और दूसरे को ... मां और मौसी जी ने तब पापा को कितना ही मनाने का प्रयास किया था। मां बार- बार कह रही थीं कि मुनिया ( मेरा नाम) को यदि यह सब टिफिन में न दिया जाए, तो वह भूखे ही रह जाता है। परंतु पापा जबरन मुझे कोलकाता से बनारस ले गये और यहीं से मेरी बरबादी का पटकथा लिखनी शुरू हो गयी। बताया गया मेरे जाने के बाद मां बीमार पड़ गयी। जिगर का टुकड़ा खो गया,इसीलिये हृदय रोगी हो गयीं वो..

(शशि) 8/5/ 18

 क्रमशः

सम्मान कार्यक्रम

Sunday, 6 May 2018

आत्मकथा

व्याकुल पथिक
    आत्मकथा

 बाबा से वो आखिरी मुलाकात
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      जीवन भी कैसी विचित्र पहेली है ! जिसने हम सभी से अत्यंत स्नेह किया हो, सभी के पसंद-नापसंद का ख्याल रखा हो। वह खुशमिजाज शख्स मृत्यु की पीड़ा अकेले ही सहते हुये गुजर गया। मुखाग्नि देने वाला भी कोई अपना नहीं था। बाबा से मेरी आखिरी मुलाकात तब अपने घर वाराणसी में हुई थी, जब उन्हें गंभीर स्थिति में मौसी जी लेकर आई थी। अपने पैरों पर वे खड़े नहीं हो पा रहे थें। शरीर  काला पड़ चुका था। दस्त की शिकायत थी। वर्षों बाद बाबा को देखा भी , तो इस स्थिति में... मैंने और दादी ने भी उनकी हर सम्भव सेवा की थी, परंतु हम दादी-पोता दोनों ही बेरोजगार थें। घर पर मेरी हैसियत तब इतनी ही थी कि दो जून की रोटी मिल जाया करती थी। यहां बाबा दो- तीन दिनों तक ही रहें, क्यों कि जेब में उनके पैसा बिल्कुल भी नहीं था। नियति का यही तो तमाशा है कि हमारे बचपन में जब भी बाबा- मां घर पर आया करते थें। सुबह कचौड़ी-जलेबी की दुकान से लेकर रात्रि में मलाई- रबड़ी की दुकान से इतना अधिक खाने का सामान मंगाते थें कि उनके जाने के बाद ये दुकानदार हम बच्चों से हमेशा पूछा करते थें कि तुम्हारे नाना कब आ रहे हैं ?  पैसे को उन्होंने कभी अपना समझा ही नहीं , सो उसे हम सभी पर उड़ाते रहें। उस जमाने की मंहगी से महंगी सामग्री हम सभी को उन्होंने दिलवाया था। मैं बनारस गया, तो मेरे लिये जेबखर्च तक वे मनीआर्डर करते थें  प्रतिमाह... और जीवन के अंतिम दिनों में परिस्थितियां ऐसी हो गई कि न तो बनारस में और न ही मुजफ्फरपुर में वे अपनी दोनों ही पुत्रियों के घर पर रखे जा सकें।  सो, कोलकाता जाने से पूर्व डबडबाई आंखों से उन्होंने हम सभी से कहा था कि देखा हो गया...।  इससे पहले मैंने उनकी डबडबाई नेत्रों को तब देखा था, जब मां( नानी ) का  निधन हुआ था। मां को बचाने के लिये बाबा ने वर्षों संघर्ष किया था। पूरे कमरे को ही हॉस्पिटल बना दिया था । अतः , मां की मृत्यु पर उनकी जुबां पर एक ही बात रही कि वे चौधरी को बचा नहीं पाये ... बाबा और मां एक दूसरे को चौधरी ही बुलाया करते थें। मां की मृत्यु के बाद कोलकाता में बाबा बिल्कुल अकेले पड़ गये थें। मैं , वहां से बनारस तब बिल्कुल भी जाना नहीं चाहता था। परंतु उनके चचेरे रिश्तेदारों ने जबर्दस्ती मेरी बोरिया-बिस्तर बंधवा ही दिया। परिणाम यह रहा कि बनारस में अपने ही घर में एक परायेपन का एहसास मुझे करवाया जाता था और कोलकाता में बाबा बिल्कुल अकेले पड़ गये। इसी स्वतंत्रता ने उनके आखिरी दिनों को बेहद ही पीड़ादायी बना दिया। अपनों पर अपना सब- कुछ लुटाते रहने वाले हमारे प्यारे बाबा के साथ नियति ने इतनी क्रूरता क्यों दिखलाई, बीमार होने के बावजूद भी मां कितना ख्याल रखती थीं उनका । दोनों ही लोग एक दूसरे के प्रति समर्पित थें।  मां की मृत्यु के समय भी उनकी दोनों ही पुत्रियां मौजूद नहीं थीं और बाबा ने तो बिल्कुल पराये जगह आखिरी सांस ली थी। आज भी मुझे वह मनहूस दिन पता नहीं है, जिस दिन हम सभी से दूर उन्होंने बड़ी ही खामोशी के साथ अपनी आंखें बंद की होगी।  मृत्यु से पूर्व मां की आंखें भी तो अपनों को ढ़ूंढ़ रही थी, लेकिन बाबा तो यह जान ही चुके थें कि अब कोई नहीं आने वाला... । हां, मृत्यु से पूर्व एक पोस्टकार्ड अवश्य मेरे पास आया था, जिसमें लिखा था कि एक बार आ जाओं...पर जिसे घर पर दो जून की रोटी  से अधिक कुछ भी नहीं मिलता हो, वह कहां से पैसे की व्यवस्था कर बाबा के पास जा पाता ...।

(शशि) 6/5/18

क्रमशः

Saturday, 5 May 2018

मृत्यु भय या उत्सव

मृत्यु "भय" या "उत्सव"
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    मैं कोई थ्योरी नहीं लिख रहा हूं, यह सब कुछ प्रैक्टिकल है। मेरा जीवन ही एक प्रयोग है। इस लैब में प्रवेश कर मैंने उच्च, मध्य और निम्न तीनों ही वर्ग के लोगों जैसा जीवन व्यतीत किया है।  कभी बचपन में नौकर गोद में उठा कर स्कूल बस तक मुझे पहुंचाते थें और  फिर मेरे जीवन में एक दौर ऐसा भी आया कि नौकरी की तलाश में भूखे सड़कों पर टहलते हुये , रात्रि में किसी दुकान की पटरी पर सोया हूं।  अब भी ढ़ाई दशक से सड़कों पर ही तो अखबार बांट रहा हूं न। अत्यधिक श्रम के कारण इस अवस्था में जा पहुंचा हूं, जहां से एक स्वस्थ तन को पुनः पाना नामुमकिन है, अतः मैं मृत्यु के आलिंगन के लिये हर्षित मन से स्वयं को तैयार  किये जा रहा हूं। कोई अभिलाषा शेष नहीं रही। बात जब भी उत्सव की होती है, तो पता नहीं हम सभी अपने मृत्यु के उत्सव की आहट मिलते ही , क्यों इस तरह से व्याकुल हो उठते हैं। जबकि यह जीवन का अंतिम उत्सव होता है। मन को इतना निर्बल क्यों बना लेते हैं ,  बुद्ध को जिसने भी समझा होगा, महा निर्वाण के दौरान उन्होंने अपने शिष्य आनंन से क्या कहा और स्वयं भी तथागत ने अपनी मृत्यु का स्वागत किस तरह से किया, यह उस पर थोड़ा भी चिन्तन कर लिया जाए, तो मैं ही नहीं हर मनुष्य मृत्यु भय से मुक्त हो सकता है।  परंतु विडंबना यह है कि सांसारिक कार्यों और अपनों का मोह हमें यह आभास ही नहीं होने देता कि मृत्यु भी पीछे दबे पांव चली आ रही है। मेरे एक शुभचिंतक की मृत्यु गत माह ट्रेन में ही हृदयाघात से हो गयी। उन्होंने अपना व्यापार खड़ा करने में पूरे जीवन संघर्ष किया था। परंतु वानप्रस्थ आश्रम में पहुंचे के पश्चात भी व्यापार से मोह नहीं गया, अत्यधिक भागदौड़ भरे जीवन का परिणाम यह रहा कि मधुमेह के शिकार हो गये और स्वस्थ होने की चाह में दवा ले ट्रेन से लौटते समय, वह सफर उनके जीवन की आखिरी यात्रा बन गई। जीवन उनका धन और परिवार की साधना में गुजर गया। वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम का आनंन लेना तो दूर , अपनी मृत्यु के समय निर्वाण भाव को भी नहीं प्राप्त हो सकें, न ही उसकी आहट पहचान सकें, क्यों कि जीवन के इस आखिरी उत्सव को मनाने की कोई तैयारी उन्होंने कभी शुरु ही नहीं की थी। आज सारा व्यापार उनका वैसा ही चल रहा है, जिस आनंद की खोज में हर इंसान मंदिर-मस्जिद जाता है, पर वह तो उन्हें नहीं मिला न ! अब तो इतनी दुर्घटनाएं हो रही हैं कि पता नहीं किसकी मौत कहां छिपी बैठी हैं।  फिर हम कैसे मनाएंगे अपना निर्वाण उत्सव, कभी इस पर भी हमने चिंतन किया है, जबकि पूरे दिन कुछ न कुछ चिंता ही करते रहते हैं। अतः धीरे धीरे मैं, स्वयं को इस चिन्ता से बाहर निकाल रहा हूं। धन अर्जन का लोभ समाप्त हो चुका है। रही बात भोजन की ,तो परिवार न होने के कारण , उससे भी मुक्त ही हूं। यदि वाणी पर संयम हो भी जाए, तब अगली परीक्षा फिर नेत्र संयम और सबसे कठिन कार्य तो मन पर नियंत्रण है। इन्हें साधने के पश्चात ही हम अपना निर्वाण उत्सव मना सकेंगे। बुद्ध का सानिध्य इसलिये मुझे सदैव आनंदित करता है। महानिर्वाण के समय की उनकी मुद्रा मुझे मृत्यु उत्सव का बोध करवाती है। अतः 1998 में मलेरिया होने के बाद से मित्र बन गये इस ज्वर की पीड़ा और दुर्बल पड़ चुके शरीर के प्रति किसी तरह का मोह अब मुझे नहीं है। वैसे, तो स्वामी रामतीर्थ ने अपने महाप्रयाण के समय क्या कहा था, उस पर भी मैं  चिंतन करता हूं, परंतु मेरी दृष्टि में बुद्ध का महाप्रयाण श्रेष्ठ है। रही बात ब्लॉग पर लेखन की । करीब ढ़ाई दशक से मैं अखबार के पन्ने पर यही तो करते आ रहा हूं। परंतु वहां अपने लिये कुछ कर पाना तो दूर अपनों से भी दूर हो गया हूं मैं। फिर भी बहुत कुछ सीखा हूं, इस रंगमंच पर एकाकी लम्बे सफर में। मेरे जीवन के ये अनुभव कोई किताबी ज्ञान नहीं हैं ! फिर भी यदि तलाश करेंगे तो इसमें आपको अपने काम की कुछ सामग्री मिल ही जाएगी।

(शशि)

6/5/18

Friday, 4 May 2018

कर्ता न बनेंं हम

व्याकुल पथिक

      कर्ता न बनें हम

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   एक कुशल मुखिया में भी यदि "कर्ता "होने का दर्प है , तो वह उसकी ही खुशियों को निर्ममतापूर्वक छीन लेता है। परिवार बिखर जाता है , समाज सहम उठता है और अंततः वह स्वयं ही टूट जाता है।
      " मैं ही हूं "  ऐसा अहंकार योग्य शासक को तानाशाह बना देता है। सिकंदर से लेकर नेपोलियन और हिटलर ने शासन सत्ता में उच्च स्थान तक पहुंचने के लिये , कितना कड़ा श्रम किया था,यह हम सभी जानते है। परंतु स्वयं को विश्वविजेता के रुप में देखने के दर्प का मूल्य इनके साथ समाज को भी चुकाना पड़ा।
         इसीलिये  तो जब एक दिन मेरे एक मित्र सार्वजनिक रुप से युवा अवस्था की ओर बढ़ रहे अपने आज्ञाकारी पुत्र को ऊंची स्वर में डांट रहे थें, तो मैंने उन्हें अपने अतीत का स्मरण करवा सावधान किया था कि पुत्र से एकांत में भी हम यही कह सकते हैं। ऐसा करने से आप पिता-पुत्र के सम्बंधों में कड़ुवाहट नहीं आएगी कभी। परंतु यदि आप यह समझ लें कि मैं तो मुखिया हूं। जिसे चाहे जहां, जो चाहे कह दूं,तो आप अपने परिवार की खुशी कम कर रहे हैं !

      वैसे भी यह मेरा नैतिक धर्म बनता है कि स्वयं जिस गड्ढे में  गिरा हूं, दूसरों को अपने समक्ष तो ऐसा ना ही करने दूं। भले ही मेरा परिवार ना हो, परंतु जब किसी महिला को सुबह दरवाजे पर आ कर अपने पति को प्रेम भरी आंखों से दफ्तर जाने के लिये बिदा करते देखता हूं, तो मैं इतना अनुभव कर ही सकता हूं कि दफ्तर के बोझिल वातावरण में पत्नी की वहीं खामोश मुस्कान पति का आत्मविश्वास बन जाता है या फिर पिता के देर शाम घर लौटने पर उसके मासूम बच्चे पापा आ गये , कहते  दौड़े -दौड़े दरवाजे पर आकर उसकी मोटर साइकिल को पीछे से सहारा देते हूं , घर के अंदर करने का असफल प्रयत्न करते हैं , तब इन बच्चों का यही भोलापन भरा कार्य निश्चित ही उस व्यक्ति की थकान हर लेता होगा । लेकिन, यदि मुखिया में कर्ता होने का अहम आ जाये, तो फिर क्या होगा। तब ये सभी उससे सहमे रहेंगे और समीप आने से बचेंगे।
       मेरे छोटे से खुशहाल परिवार पर इसी " मैं ही हूं " ने तो ग्रहण लगा दिया था। हम सभी बिखर और बिछुड़ गये इसी के कारण। जब पढ़ता था, तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इस तरह से रात्रि  के 11 बजे तक एक बधुआ मजदूर की तरह अखबार बांटना होगा। अब तो धूल, मिट्टी और धुएं में गंगा पुल पर घंटे भर यूं खड़े रहने के कारण पांव की स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि जूता तक नहीं पहन पाता, जिस कारण चप्पल पहन ही काम करना पड़ रहा है। ऐसे मैं वहां खड़े खड़े जब कभी खुले आसमान को निहारते हुये अपनी भी मुक्ति का कामना करता हूं, जब कभी अतीत की याद आती है, तो काफी पीड़ा होती है ,अपने परिवार के बिखरने का। हम सभी की कठिन तपस्या जो कुछ और वर्षों यदि मिला होता, तो पूरा हो भी जाती । उसे इसी " मैं ही हूं " ने कुछ इस तरह से भंग कर दिया कि इसका पहला शिकार मुझे ही बनना पड़ा। फिर बारी आई उस विद्यालय की , जिसे मेरे माता-पिता बड़े ही परिश्रम से खड़ा किया था। मेर छोटी बहन के नाम पर जो ममता शिशु मंदिर गुलजार था , वह भी विरान हो गया। स्व० पिता जी का स्वपन था कि बगल वाला मकान भी खरीद कर विद्यालय का विस्तार करेंगे। हम दोनों भाइयों का विवाह होगा। जो शिक्षित पुत्रवधूएं आएंगी सभी मिल कर ,इस स्कूल को बड़ा पहचान देंगे। परंतु कर्म करने की जगह कर्ता होने का जाने अनजाने में आया "मैं ही हूं का " इस  अहंकार रुपी दानव ने सबकुछ निगल लिया...
    योगेश्वर कृष्ण ने इसीलिए महाभारत के युद्ध में अर्जुन से यह तो कहा कि वे ही कर्ता हैं , परंतु भूमिका उन्होंने सारथी की निभाई थी !

(शशि) 5/5/18

Thursday, 3 May 2018

बुद्ध की खोज

व्याकुल पथिक

      बुद्ध की खोज !
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      बुद्ध पूर्णिमा पर इस बार न जाने क्यों मन की व्याकुल कुछ अधिक ही बढ़ गयी थी। स्वयं से बार बार एक ही सवाल कर रहा था कि कब मुक्त होंगे तुम उस मोह से, जो तुम्हें एक रंगमंच पर कैद किये हुये है। हालांकि यहां भी जो अपने कार्य के प्रति  मेरा प्रेम और समर्पण है, वह मेरे विचार से उत्तम ही है। परंतु यह राह मुझे उस गणतव्य तक कभी नहीं पहुंचा पाएगी, जहां मैं जाना चाहता हूं। सच कहूं तो, मैं बुद्ध को पढ़ना नहीं, बल्कि स्वयं में देखना चाहता हूं ।

         महादेव की समाधि मुद्रा, बुद्ध की ध्यान मुद्रा और कबीर की वाणी इन तीनों ने ही मेरे मन को सदैव आह्लादित एवं आनंदित  किया है।  मैं इनके करीब रहना चाहता हूं। परंतु इनके जैसा हो नहीं पाता। फिर भी प्रयत्न कर रहा हूं। दरअसल होता यह कि जब- तक मन चैतन्य होता है , तब-तक तन की चदरिया मैली ही नहीं पुरानी भी पड़ चुकी होती है। ऐसे में इस पुरानी चादर की अधिक धुलाई करने का प्रयास करेंगे, तो दाग छुटने के स्थान पर चारद के फटने का खतरा अधिक रहता है। सो, मध्य का मार्ग ही हम अपना सकते हैं।

          कभी-कभी सोचता हूं कि सीमित लोगों से अत्यधिक प्रेम करने की अपेक्षा असीमित लोगों में उसे बांटा होता, तो वियोग का वह दर्द होता ही क्यों।  सिद्धार्थ गौतम ने भी तो यही किया था न ! राजमहल, सुंदर पत्नी और नवजात पुत्र के प्रेम से बाहर निकल अपने प्रेम को  सर्वसमाज के लिये समर्पित कर दिया था। इसी समर्पण से एक साधारण सा राजकुमार प्रेम एवं करुणा का प्रतिबिंब बन गया, वह बुद्ध हो गया। विचित्र विडंबना है कि तमाम उपदेशक ज्ञान बांट रहे हैं, मुक्ति का मार्ग बतला रहे हैं, कर्म पथ को परिभाषित कर रहे हैं। कोई इनसे यह पूछे कि  स्वयं भी कभी इन राहों पर चलने का प्रयत्न किया है क्या। सिद्धार्थ ने बुद्ध बन कर तभी उपदेश दिया था, जब उन्हें उस ज्ञान की अनुभूति हो गई थी, जिसकी खोज में वे अपना सारा सांसारिक वैभव त्याग कर निकले थें।
     तभी तो बुद्ध आज भी शुद्ध है... और ये हजारों उपदेशक समाज में कोई भी परिवर्तन लाने में इसीलिए नाकाम हैं, क्यों कि वे चुराया हुआ ज्ञान बांट रहे हैं ! पुस्तकीय ज्ञान के कथावाचन से हम सच्चा उपदेश नहीं बन सकते हैं और न ही औरों को राह ही दिखला पाएंगे। यदि ऐसा सम्भव होता तो, तथागत ने यह नहीं कहा होता -
   " अप्प दीपो भव " ।

    वे भी मोक्षदाता बन जातें, परन्तु यह कार्य उन्होंने हम पर छोड़ दिया है। पर हम मठों में बुद्ध को खोजने लगें, पुस्तकों में उन्हें ढूंढने लगें , इसीलिए एक और बुद्ध फिर नहीं खोज सकें अब तक !

 (शशि) 3/5/18