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Friday, 25 May 2018

कोई निशानी छोड़ , फिर दुनिया से डोल



     ब्लॉग लेखन के दौरान जिस तरह से जाने -अनजाने मित्र बंधु और शुभचिंतक मेरा उत्साहवर्धन कर रहे हैं, मैं कभी कभी तो भावविह्वल हो उठता हूं। ढ़ाई दशक पत्रकारिता में गुजारा हूं, परंतु ऐसी अनुभूति कभी नहीं हुई। हां, अखबार से एक पहचान मिली और  अन्य सारे संबंध समयाभाव में टूट गये।इसी पीड़ा को मैंने पहली बार तब सार्वजनिक रुप से व्यक्त किया था, जब इस वर्ष जनवरी में एक वैवाहिक कार्यक्रम में नहीं जा सका था।  जिनके यहां करीब दो वर्षों तक रहा, उन्हीं के इकलौते पुत्र की शादी थी...आपकों बता दूं कि उनकी मौन उलाहना ने मुझे इस तरह व्याकुल कर दिया था कि इस ब्लॉग के जन्म के बाद कुछ अपने तो हंसी ठिठोली में यह भी कह दिया करते है कि  कैसे हो व्याकुल पथिक जी ... एक हताश, निराश और नादान लेखक के तौर पर मैंने तब ब्लॉग लेखन शुरु किया था। इस अवसाद से बाहर निकल अपनी लेखन यात्रा में तनिक आगे बढ़ा तो विचार आया कि पत्रकारिता पर कुछ लिखना चाहिए, कोई तो संदेश दूं युवा पत्रकारों को , फिर मैंने ऐसा ही किया। पर एक बड़ा सवाल मेरे सामने यक्ष प्रश्न बना खड़ा है, वह है हम पत्रकारों पर नैतिकता की भारी गठरी यह समाज लादने को आतुर रहता है, परंतु हमारे पेट की आग कैसे बुझे, गृहस्थी की गाड़ी कैसे पटरी पर बनी रहे। इसे भी कभी सोचा क्या आप सभी ने ...
   हां , अमृत कलश से पहले निकलने वाले हलाहल को किसी न किसी को इस समाज में जनकल्याण के लिये पीना ही पड़ता है। जो , निस्वार्थ भाव से जो ऐसा करता है, वह सुर और असुर  से ऊपर उठ महादेव बन जाता है...
   बता दें कि 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस की तैयारी यहां पत्रकार संगठनों द्वारा चल रही है। एक पत्रकार संगठन जिसमें प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक चैनल और प्रिंट मीडिया  के रिपोर्टर शामिल हैं , ने  मुझे और मेरे मित्र प्रभात भैया से अनुरोध किया कि आप दोनों इस पत्रकार संगठन के संरक्षक बन जाए। वैसे, तो मैं पत्रकारों के संगठनों से दूर रहता हूं। परंतु मनीष और सुरेश भाई के स्नेह भरे अनुरोध को ठुकरा न पाया। हमारे संगठन के संरक्षक मंडल में प्रभात मिश्र राष्ट्रीय सहारा ,शशि गुप्ता गांडीव के अतिरिक्त मनीष सिंह सहारा समय -अध्यक्ष ,प्रशांत यादव अमर उजाला -सचिव,  संजय दूबे जन संदेश-वरिष्ठ उपाध्यक्ष, मेराज खान इंडिया टीवी- कनिष्ठ उपाध्यक्ष, देव गुप्ता हिंदुस्तान- कोषाध्यक्ष व मीडिया प्रभारी चुने गये। बैठक में इंद्रेश पांडेय NDTV ,सुरेश सिंह आज तक,शिव तिवारी लाइव इंडिया,राजन गुप्ता लाइव न्यूज़,जेपी पटेल समाचार प्लस,सुमित गर्ग  न्यूज -18 बृजलाल मौर्य हिंदी खबर,आफताब आलम, इमरान सदस्य हैं। प्रभात जी को छोड़ सभी मुझसे काफी छोटे हैं।
...इस उम्र में हमारा भी कर्तव्य है स्वयं आगे बढ़ने की जगह जो हमसे छोटे मित्र बंधु हैं  , उन्हें आगे बढ़ाये। उनके लिये उचित स्थान और वातावरण तैयार करें। मुझे किसी कार्यक्रम में कोई जबरन आगे का सीट कब्जा करते नहीं  देखेंगे फिर भी जिन्हें पहचानना होता है वे फर्क समझ जाते हैं। अब इस पत्रकार संगठन की ही बात ही लें न सामूहिक फोटोग्राफ लेते समय अध्यक्ष मनीष भाई और संरक्षक प्रभात जी ने पुकारा कि शशि भैया फोट अपने ग्रुप की हो जाए। आप फोटोग्राफ में देख सकते हैं कि मैं उनके साथ था, पर आगे की पंक्ति में जाने के लिये या फिर फोटो में चेहरा दिखलाने को लेकर मुझमें कोई उतावलापन नहीं दिख रहा यहां भी। यही आपकी वरिष्ठता है... युवा पीढ़ी के लिये हम प्रौढ़ लोगों को स्थान छोड़ना ही होगा, अपने अधिकारों में कटौती भी करनी होगी, हमे दर्पण बनना होगा और इनका मार्गदर्शन करना होगा। यह हमारी समाज के प्रति जिम्मेदारी है। इस सूत्र में हर संबंधों की सफलता का राज है। चाहे वह परिवार की हो या फिर समाज ... मेरा मानना है कि एक खूबसूरत मोड़ पर और कोई निशानी छोड़, हमें अपनी जीवन यात्रा पूरी करनी चाहिए। इस ब्लॉग के माध्यम से ऐसा ही एक प्रयास कर रहा हूं। बड़ा प्यारा है यह गीत ..

 दूजे के होंठों को देकर अपने गीत कोई निशानी छोड़ , फिर दुनिया से डोल...
(शशि)

Thursday, 24 May 2018

मानो तो मैं गंगा मां हूं ना मानों तो बहता पानी

      जब गंगा ने मुझे दिया जीवनदान

       मानो तो मैं गंगा मां हूं ना मानों तो बहता पानी
      जो स्वर्ग ने दी धरती को मैं हूं प्यार की वही निशानी..

       बचपन में जब से होश सम्हाला, तभी से यह भक्ति गीत सुनता आ रहा हूं। गंगा के दर्द , पीड़ा, वेदना, उपेक्षा और हम मनुष्यों द्वारा उसके प्रति कृतघ्नता का मुझे हर बार एहसास करता है यह गीत ! आज गंगा दशहरा है। सो, बचपन ना सही , परंतु युवा काल की अनेक यादें गंगा मैया से जुड़ी हुई है मेरी ..जब बालक था, तो सिर के घने केश आगे व पीछे से खड़े हो जाते थें। अभिभावकों ने बताया कि तीन भंवर हैंं तुम्हारे सिर पर। अतः आग, पानी और ऊंचाई से गिरने का खतरा बता कर मुझे इनसे दूर रखा जाता था। लड़के के लिये तड़प रहीं मेरी नानी मां अपने आखिरी मृत पुत्र के रुप में मुझे देखती थीं। तो यहां बनारस घर पर भी करीब ढ़ाई वर्षों तक जब तक छोटे भाई का जन्म नहीं हुआ, मैं ही सबका राजदुलारा था । याद है मुझे कि बचपन में दार्जिलिंग जाते समय पहाड़ी मार्ग पर किस तरह से अचनाक कार का दरवाजा खुल गया और मेरे शरीर का अधिकांश हिस्सा बाहर की ओर निकल आया था। यूं समझे की  खाई  में गिरते गिरते मैं बच गया था। किशोरावस्था तक मैं गंगा से दूर  रहा। परिवार के किसी सदस्य सम्भवतः मौसी - मौसा जी के विवाह के बाद गंगा पूजन के समय, बड़ी सी एक नाव पर सहमा-सहमा बैठा था बचपन में एक बार , इतना ही याद है। जब वाराणसी से कोलकाता आता -जाता था और ट्रेन राजघाट पुल पर से गुजरती थी अथवा किसी भी पुल- पुलिया से, भय से सिहर उठता था। परंतु काशी में रह कर आखिर गंगा से दूर कब तक रहता। जब बेघर सा हो गया था,  पापा के एक मित्र रहें शीतला चाचा जिन्होंने विवाह नहीं किया था, कुछ महीनों तक उन्हीं के विद्यालय में पढ़ाया भी। मुझे याद है कि तब गंगा दशहरा पर पहली बार मैं उनके साथ गंगा स्नान को गया था। उनका हाथ पकड़ मैंने खूब डुबकी लगाई थी। हर हर गंगे का जयघोष हो रहा था काशी के प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर । इसी दिन से ना जाने मेरे मन में कौन सी भावना जगी कि बचपन में गंगा को देख कर भयभीत होने वाला युवक , चुपचाप घर से अकेले ही लोटा लेकर सुबह उसी गंगाघाट पर चला जाया करता था। घाट की सीढ़ियों पर बैठ खूब स्नान करता था। अधूरी शीक्षा और परिवार से दूर होने की जो पीड़ा थी, वह गंगा में समा जाती थी। मन प्रफुल्लित हो जाता था। गंगा से भय धीरे- धीरे कम होने लगा और फिर एक दिन मैं सीढ़ियों पर नीचे और नीचे की ओर बढ़ने लगा। तभी मेरा दायां पांव सीढ़ी से अचानक उठ कर पानी की ओर चला गया। उस समय मेरी मनोस्थिति कैसी थी, वह शब्दों में किस तरह बताऊं। मेरे लिये जीवनदान था गंगा मां का कि तेज लहर के साथ वह पांव वापस सीढ़ी पर आ टिका। फिर भी मैं घबड़ाया नहीं और ना ही किसी को यह बताया ही। दादी को मैं परेशान नहीं करना चाहता था। उन्होंने तो अपना कमंडल तक मुझे दे रखा था। अवस्था मेरी तब करीब 21-22 की होगी, जब इस घटना के बाद मैंने ठान लिया की मुझे भी तैरना सीखना है, पर जेब तो खाली था , न ट्यूब,न टीन या डिब्बा, ऊपर से 58 किलो वजनी शरीर.. पर मेरा जैसा की स्वभाव है कुछ भी ठान लिया, तो पूरा करके ही रहता हूं। सो, सीढ़ी पकड़ के लगा पांव पानी में पटकने। बाद में गायघाट चला आया। यहां कमर तक ही पानी था। डूबने को कोई भय नहीं। दो घंटे सुबह और इतने ही देर तक शाम को इस घाट पर पानी में हाथ पांव मारता रहा। सांसें फूलने लगती थीं और शरीर में पीड़ा भी, परंतु तैराक बनने का मन में जो उत्साह था.. वह अतंतः भारी पड़ा। बरसात से पूर्व ही तैरना आ गया,वह भी बिना किसी के सहयोग से और फिर शरद काल में जब पूरा तैराक बन गया तो क्या होली क्या दीपावली , प्रतिदिन साढ़े चार बजे सुबह पंचगंगा घाट पर जा डटता था। शाम को गाय घाट पुनः चला आता था। बेरोजगार था , तो गंगा स्नान और मृत्युंजय महादेव मंदिर में दर्शन यही दिनचर्या रही मेरी ...अब देखें न इन ढ़ाई दशक में जब से यहां मीरजापुर में हूं एक बार भी गंगा स्नान नहीं किया हूं। हां, शास्त्री पुल पर से गंगा दर्शन तो सप्ताह में 5-6 दिन हो ही जाता है।       अब यदि बात उसके मैल धोने के करुं, तो इस पर कोई तीन दशक से देशी- विदेशी राग सुनता ही आ रहा हूं और इसी बीच गंगा को प्रदूषित करने वाले पापी उद्यमियों की संख्या बढ़ती गयी। उसके सीने पर तप रहें  रेत के बड़े- बड़े टीले आज उसकी पहचान को गंदे नाले में बदलने का षड़यंत्र रच रहे हैं। केंद्र की मोदी सरकार फिर से " नमामि गंगे योजना लेकर आयी है। पता नहीं हम अपनी राष्ट्रीय नदी, उससे भी बढ़ कर मां स्वरूप गंगा के साथ भी उसे स्वच्छ, निर्मल, अविरल करने की यह नौटंकी कब तक करते रहेंगे ! लेकिन हमारी जो भावनाएं हैं न , वह सदैव यही कहती रहेगी कि गंगा तेरा पानी अमृत ।
(शशि)

Wednesday, 23 May 2018

आजा तुझको पुकारे मेरे गीत रे ओ मेरे मितवा



       इंसान को उसके बुरे दिन काफी कुछ सीखा जाता है। यदि मैं अपनी बात करूं, तो उस दौर मैंने जो चिन्तन- मंथन किया हूं, वह " अमृत कलश " के रुप में मेरे समक्ष आज प्रस्तुत है। मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि विगत 25 वर्षों से इस छोटे से शहर की सड़कों पर अखबार बांटने वाले एक दुर्बल काया वाले व्यक्ति को लोग इतना सम्मान क्यों दे रहे हैं। किसी बड़े अखबार का पत्रकार भी तो नहीं हूं ,जो पैरवी आदि करने में उनके काम आता। फिर भी आम और खास दोनों ही तरह के लोग मेरी इज्ज़त करते हैं और स्नेह भी। पुलिस विभाग के लोग जो सबसे अकड़ कर बात करते हैं, वे  भी कब मुझे शशि भैया कहने लगे ,ठीक से याद नहीं। वैभव सम्पन्न राजनेता, माननीय और व्यापारी वर्ग कुछ इसी तरह का मधुर सम्बंध मुझसे रखते हैं। कुछ तो जबर्दस्ती भी करने लगते हैं कि शशि जी अब बहुत चल लिये साइकिल से बस एक छोटी सी स्कूटी स्वीकार कर लें। बटम ही तो दबाना है, भारी भी वजन में नहीं है यह। बाइक वे इसलिए नहीं कहते हैं कि खराब स्वास्थ्य के कारण ,उसे चलाना मेरे लिये तनिक कठिन होगा। खैर, अभी तक तो यह पुरानी साइकिल ही मेरी पहचान है! सच कहूं तो मैं इसे खोना नहीं चाहता ! 
       आज के ब्लॉग लेखन में मैं अपने बुरे वक्त के इकलौते मित्र "कम्पनी गार्डन"की याद में डूब जाना चाहता हूं। बनारस के मैदागिन क्षेत्र में स्थित यह पार्क मेरे लिये एक निर्जीव बगीचा तब भी नहीं था, जब मैं यहां किसी वृक्ष के नीचे बैठ पढ़ा करता था। ननीहाल में जो अत्यधिक प्यार दुलार मिला था। मां के गुजरने के बाद दुबारा अपने घर वाराणसी लौटने पर इन सभी से वंचित सा हो गया था। कक्षा 11-12 में मेरी मुलाकात इस अजीज दोस्त से तब हुई थी, जब बिल्कुल अकेला पड़ता जा रहा था। कोशिश यह थी कि ऐसा कोई शरणस्थल मिले, जहां घर के बोझिल वातावरण से दूर गणिक के सवालों को सुलझाने में खोया रहूं । ठीक से याद नहीं, शायद दादी ही मुझे यहां लेकर आई थी या मैं स्वयं ही खींचा चला आया । कभी यूकेलिप्टस के पेड़ के नीचे, तो कभी शीतला मंदिर के चबूतरे पर या फिर उस रैन बसेरे में जहां सुबह बुजुर्ग रामायण पाठ करते थें, पढ़ा करता था। टूटते पारिवारिक संबंधों के कारण मैं व्याकुल था। पढ़ने के लिये पुस्तक की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। जवां हो रहा था। सो, घर से मिलने वाली दो जून की सूखी रोटी और थोड़ी सी सब्जी मेरे पेट की आग बुझाने में असमर्थ थी। खैर , वह दादी ही थी, जिन्होंने अपने हिस्से का भोजन मुझे कराया था और यह कम्पनी गार्डन मेरा साथी ठंडा पानी पिलाया करता था। कोई डेढ़ वर्ष का साथ रहा, इसका और मेरा।  फिर  परीक्षा दे कलिंपोंग चला गया। जब वहां से वापस मम्मी पापा संग घर लौटा, तो सब कुछ ठीक ही था। किन्तु दुर्भाग्य ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। सो, एक बेरोजगार युवक के रुप में फिर से अपने इस दोस्त की छत्रछाया में मैंने वर्षों गुजारे यहां । यूं कहें कि घर से नाता सिर्फ रात्रि शयन तक सीमित रह गया था। तब मैं निठल्ला क्या करता। न तन पर बढ़िया कपड़े थें, न जेब में पैसा ऊपर से सिर पर तमगा यह लगा था कि मास्टर साहब का लड़का हूं ! सुबह घर से जो निकलता तो देर दोपहर ही इस बाग से लौटता था और शाम चार बजने से पहले ही फिर से बंधु मैं आ गया कि पुकार लगाते यहां पहुंच जाता था । उसी अवसाद भरे दौर में इस बाग में बड़े बुजुर्गों का संग मिला। उनका ज्ञान मिला,स्नेह मिला और सतसंग भी।  मेरे मित्र बड़े भाई प्रभात मिश्र, जो भी पत्रकार हैं, कहते हैं कि एक बात बताओं  कि इतनी जानकारी कहां से पाये तुम, ढ़ाई दशक से तो सुबह से रात तक यहां हाय! पेपर , हाय! समाचार , बस यही रट लगाये हुये हो.. यह तो यदि ब्लॉग लेखन नहीं करते, तो हमलोग जानते भी नहीं कि तुम्हें पत्रकारिता के अतिरिक्त भी कुछ आता है। खैर, यह सब उसी कम्पनी गार्डन में मिले बड़ों का ही आशीर्वाद है। उसी दौर में मैं वाराणसी के कितने ही मठ- मंदिरों और मजार पर शांति की खोज में गया, कितने ही संतों का प्रवचन ध्यान लगा कर सुना था। सो, आज भी जब बनारस जाता हूं, किसी से मिलूं या न मिलूं अपने इस साथी का सानिध्य जरुर पाना चाहता हूं, जिसके बड़े हिस्से की हरियाली भवन बना कर छीन ली गयी है।
   और क्या कहूं अपने इस दोस्त से अपनी मोहब्बत के बारे में, यही कि
   हम तुमसे जुदा हो के मर जाएंगे रो रो के..

    सचमुच इस दोस्त की कम्पनी छोड़ने के बाद फिर कभी मुझे वैसी सुकून भरी जिंदगी नहीं मिली, जो लोग अपने लगे भी, तो वे मुझे रास्ते का पत्थर समझ ठोकर मार आगे बढ़ गये और मैं वहीं पड़ा रह गया... काश ! ऐसा हो पाता कि जीवन की वह आखिरी शाम अपने इस बिछुड़े मितवा के आगोश में होता..
(शशि)

Tuesday, 22 May 2018

वीणा के तार में समाया है हर रिश्ते का संतुलन !



          उस नादान उम्र में पिता के सामने समर्पण न करने का जो भयावह दंड मिल रहा है, ढलता यौवन यह मुझे महसूस कराने लगा है। वह एहसास करवा रहा है कि यदि थोड़ा सा धैर्य रखते तो शिक्षा पूरी कर किसी दफ्तर के साहब होते तुम भी जनाब ..
               देखें न जब से वाराणसी में फ्लाईओवर हादसा हुआ है और जिस कारण मार्ग बंद होने से देर शाम वहां से मीरजापुर के लिये कोई भी यात्री बस नहीं मिल रही है, तभी से सुबह साढ़े चार बजे पेपर (रात वाला) जीप से आ रहा है। सो,चार बजे ही उठ जाना पड़ता है। फिर साढ़े सात बजे तक लगातार  साइकिल चला कर पूरे नगर में पेपर वितरित करता हूं। थका हुआ शरीर जब विश्राम की चाहत रखता है, तो सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी अखबार के लिये समाचार भेजने की होती है। तमाम ताजी घटनाओं की जानकारी लेना, राजनैतिक विशलेषण, सामाजिक गतिविधियां सभी इन सभी समाचारों को मोबाइल पर टाइप करते करते दोपहर बीत जाता है। इन दिनों रात्रि 12 से सुबह 4 बजे  सिर्फ चार घंटे ही शयन को मिल रहा है। बदन पीड़ा से टूट है,आंखें भरी हुई हैं। ऊपर से ब्लॉग लेखन का नया रोग पाल लिया हूं। इतना अधिक श्रम कर पैसा कितना अर्जित कर रहा हूं, यह जान कर आप मुझे पूरा का पूरा विक्षिप्त समझ लेंगे, क्यों कि 5 रुपये का पेपर मैं  90 रुपये महीने में ही दे देता हूं, खरीद मूल्य पर। चार पन्ने का अखबार और पांच रुपया कीमत भला कौन ग्राहक देगा ! और जिन्हें मैं पेपर देता हूं न साहब वे कोई ग्राहक छोड़े ही हैं कि जिनकी जेब पर मैं डांका डालूं। ये सभी मेरे शुभचिंतक हैं, अग्रज हैं, मित्र बंधु हैं, अभिभावक हैंं और मेरे दर्द को अपना समझने वाले हैं। एक पत्रकार ,एक पत्र विक्रेता  से इतर उनके दिल में मेरे लिये एक कोना है। ऐसा मेरा विश्वास है। इसलिए मैं पेपर बंद नहीं कर पा रहा हूं। अन्यथा इस स्थिति में हूं कि बिना शारीरिक श्रम किये ही दो जून की रोटी मस्ती से खा सकता हूं !
             उम्र के इस पड़ाव पर ,जब मैं दुनिया की हर तस्वीर देख चुका हूं और एक जागरूक पत्रकार के रुप में समाज में पहचान भी रखता हूं। जो कुछ लिखता हूं, उसका प्रभाव समाज पर पड़ता है, यह जानता भी हूं । तो ब्लॉग लेखन के दौरान यह मेरी जिम्मेदारी है कि गुमराह होते किशोर और युवा वर्ग को भटकाव की स्थिति में ना ला खड़ा करुं.. उनका सही मार्ग दर्शन हम नहीं , तो फिर कौन करेगा ! बंधुओं मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि माता पिता पर कभी भी दोषारोपण न करें। आज मेरी जो पहचान है, वह पिता जी का अनुशासन ही तो है। उनका स्वाभिमान ही हमारे रगों में रचा बसा है। तभी  तो भटकाव भरी राह पर भी यह स्मरण सदैव रहा कि मैं मास्टर साहब का लड़का हूं। उस शख्स का जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हम सभी को आलू के चोखे में पानी डाल सब्जी की तरह उसे खा लेने की शीक्षा दी थी, फिर भी हाथ किसी रिश्तेदार के सामने पापा को फैलाते कभी नहीं देखा। उस गरीबी में भी हमारे परिवार में सबकुछ ठीक ठाक रहा। हां, दादी अलग रहती थीं। लुक छिप कर हम भाई बहन उनके कमरे की ओर भाग आते थें। पता नहीं क्यों घर में निजी विद्यालय खुलने के बाद इधर हम सभी की आर्थिक स्थिति में सुधार आई और उधर परिवार में बिखराव भी शुरु हो गया। स्नातक की पढ़ाई छोड़ मेरा छोटा भाई घर से दूर दवा कारोबारी के यहां चला गया। छोटी बहन का विवाह मम्मी ने अपनी खास सखी के पुत्र से करवाया था। एक लड़का होने के बाद वह ससुराल से मायके आयी तो फिर कभी जबलपुर नहीं जा सकी। सो, एक नादान किशोर की तरह अपने अभिभावकों को कठघरे में खड़ा करने की जगह मैं नियति के खेल के समक्ष नतमस्तक हूं। जब कभी हृदय की वेदना बढ़ती है, तो बुद्ध से जुड़ी सबक याद आती है।

    "वीणा के तार को इतना मत कसो की सुर बेसुरा हो जाए और इतनी ढील भी मत दो की सुर ही न निकले "

    हर रिश्ते का संतुलन इसी में समाहित है।

(शशि)

Monday, 21 May 2018

काश! पुकारा होता मेरे लाल घर आ जा



         ब्लॉग लेखन करते हुये मन को बार बार कुरेदता हूं, अतीत को टटोलता हूं और स्वयं से भी प्रश्न करता हूं कि नियति ने मुझे जैसे भावुक इंसान को एक यतीम सा जीवन क्यों दिया। बचपन में मुझे आटा गूंथते , सब्जी काटते और कपड़ा प्रेस करते देख महिलायें खुश होकर कहा करती थीं  कि तुझसे जिसकी शादी होगी, वह बड़ी खुशनसीब होगी रे ! रोटी, पूड़ी -पराठे तीनों बनाने के लिया आटा कितना नरम अथवा कड़ा गूंथना है, कोलकाता में ही मां से सीखा था।  रोटी- पराठा, चाय-घुघरी सभी कुछ तो मैं बहुत बढ़िया बनाता था। पर इतना खुशकिस्मत नहीं था कि कोई हमसफर मिलता जो यह कहता..

  तुम ही मेरे मंदिर, तुम ही मेरी पूजा, तुम ही देवता हो
 कोई मेरी आंखों से देखे तो समझे कि तुम मेरे क्या हो...

        हां, ऐसी ख्वाहिशों ने मेरे दर्द को और बढ़ाया जरुर। जिस पीड़ा से बाहर निकलने में मुझे काफी वक्त लगा था कभी।  फिर भी चेहरे पर वहीं  मुस्कान बनी रही, जिसे हासिल करने के लिये मैं उस महान जोकर की फिल्म देखा करता हूं, अपनी भावुकता, संवेदना और प्रेम को उसी रंगमंच पर समाहित करने के लिये, जिसे मैं अपने शब्दों में कर्तव्य पथ कहता हूं। सोचता हूं कि एक सभ्य , संस्कार युक्त और अनुशासित परिवार में पल-बढ़ रहा था। फिर अचानक वह वज्रपात कैसे, क्यों और किसलिये हो गया। युवावस्था की ओर कदम बढ़ा रहा जो किशोर अपने सुनहरे भविष्य को लेकर उत्साह से लबरेज था। अपने कक्षा में अव्वल रहता था, कोई गलत राह पर भी नहीं था साथ ही सबसे बड़ी बात यह रही कि  मेरे अभिभावक भी हम तीनों ही भाई बहन को अच्छी शिक्षा दिलवाने की हर सम्भव कोशिश कर रहे थें। हम बच्चों को अच्छा भोजन व वस्त्र दिया गया। फिर भी संबंधों में यह कड़ुवाहट आखिर क्यों  !  मैं इसके लिये अपने माता - पिता को बिल्कुल भी कठघरे में खड़ा नहीं करना चाहता हूं। बस हमारे बीच की ट्यूनिंग इसलिये सम्भवतः गड़बड़ा गयी, क्यों कि पापा की हर इच्छा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की तरह होता था, जिसकी कोई अपील नहीं थी। जुबां खोलने का मतलब बगावत करना था। हालांकि वे हम सभी की खुशी के लिये कठिन परिश्रम करते थें। जो विद्यालय हमारे अभिभावक ने खोला, उसके लिये कितना श्रम किया था, कितनी ही महत्वाकांक्षा जुड़ी थी उनकी। यह जो महत्वाकांक्षा है न बंधुओं, बड़ा ही खतरनाक परिणाम देता है।अब देखें न कोलकाता में मैं कक्षा 6 पास कर बनारस गया था और पापा ने सीधे कक्षा आठ की परीक्षा में ला बैठाया। कितना घबड़ा गया था, तब मैं। दिसंबर के आखिरी सप्ताह में मां की मौत  हुई थी और तीन माह बाद परीक्षा देनी थी, वह भी आठवीं की। खैर किसी तरह प्रथम श्रेणी से पास हो गया। मैं एक चित्रकार बनना चाहता था, गणित जैसा उबाऊ विषय बिल्कुल नहीं चाहता था। परंतु पापा ने नौ में विज्ञान ही दिलवा दिया। जो छात्र  कक्षा 7 और 8 की शीक्षा प्राप्त ही न की हो, उसका उपहास नयी कक्षा में सहपाठी निश्चित ही उड़ाएंगे। यह मेरे जैसे स्वाभिमानी किशोर को कतई बर्दाश्त नहीं था। सो, दिन रात मैं पढ़ाई में जुट गया। मेरा परिश्रम देख मेरे कोचिंग टीचर सहपाठियों से अकसर कहा करते थें कि यह लड़का भले ही जीनियस नहीं है, परंतु उसने अपने श्रम और संकल्प से तुम सबको पीछे छोड़ दिया है। मैंने शशिकांत सर को निराश नहीं किया। जब 10 वीं की परीक्षा में मुझे गणित में सौ में 98 नंबर मिला,तो उन्होंने सीना चौड़ा कर कहा था कि यह मेरा नामराशि है। इसके वर्षों बाद जब नीचीबाग, वाराणसी में सड़क पर राह चलते मेरी उनसे मुलाकात हुई , मैंने पांव पूछ कर पूछा था कि सर पहचाना मैं शशि हूं ! जिस पर मुस्कुराते हुये उन्होंने कहा था कि तुम्हें कैसे भूल सकता हूं। तुम्हारी मेहनत नजीर रही । मेरी पढ़ाई इस तरह से अधूरी रह जाने की खबर पर वे बिल्कुल उदास हो गये थें। बस इतना कहा था कि तुम बहुत आगे जाते ! मैंने उन्हें बताया था कि गांडीव समाचार पत्र के लिये मैं मीरजापुर से रिपोर्टिंग करता हूं। परंतु यह नहीं बताया था कि सर मैं प्रतिदिन शाम को पेपर का बंडल लेकर वाराणसी से बस पकड़ ढ़ाई तीन घंटे सफर के बाद मीरजापुर जाता हूं। जहां अनजाने शहर की अनदेखी गलियों में रात्रि साढ़े नौ बजे तक पैदल ही अखबार बांटते हुये भटकता हूं। फिर वहां से स्टेशन रोड बस अड्डे पर जा वापसी के लिये बस का इंतजार करता हूं। और यदि बस ना मिली तो सामने रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म है, रात गुजार लेता हूं। मैं उन्हें यह सब बता और दुखी नहीं करना चाहता था !
      पर सवाल जो मैं सदैव ही स्वयं से पूछता आ रहा हूं कि इसका जवाब क्या हो सकता है। पहला बचपन में कोलकाता में मेरे टिफिन बाक्स में महंगा फल और मिठाइयां साथ ही नन्हें राजकुमार जैसी सुख सुविधा देख पापा की नाराजगी कि     उनके एक लड़के की इतनी सेवा ! दूसरा, जब पुनः कोलकाता से किशोरावस्था में कदम रखने और मां की मौत के बाद  बनारस गया, तो अति अनुशासन में रहने की बाध्यता और तीसरा पिता-पुत्र का स्वाभिमान आपस में टकरा जाना। मुझे आज भी याद है कि एक बार पापा मेरी तब तक पिटाई करते रहें, जब तक छड़ी टूट नहीं गयी, मैं झुकने को तैयार नहीं हुआ। बाद में पिता जी के हाथ में दर्द होने लगा था। हां, परिस्थितियां बदल गयी होतीं, यदि हम बाप बेटे में से एक झुक गये होतें।
    काश ! किसी ने यह पुकारा होता..
 ओ मेरे लाल आ जा, तुझ को गले लगा लूं।

बस चाहता यही हूं कि आपका लाल जब किशोरावस्था की दहलीज पर हो, तो उसके साथी बनें, शासक नहीं !
(शशि)

Sunday, 20 May 2018

मेरी मां तुम्हारी कुछ भी नहीं !



          मां तो सबकी मां होती है। हम भारतीय तो अपने राष्ट्र को भी भारत माता कह कर नमन करते हैं। फिर भी हममें से अनेक लोग बातों ही बातों में न जाने क्यों मां-बहन को जोड़ कर अपशब्दों का प्रयोग करते ही आ रहे हैं। मुझे नहीं पता कि इनके प्रति वाणी का यह अनादर किसी तरह से प्रचलन में आया। परंतु थाने पर दरोगा और राह चलते सिपाही जिम्मेदार पद पर होकर भी ऐसा किया करते हैं। पत्रकार हूं, इसीलिये ऐसा आंखों देखी बता रहा हूं। हां, अब सोशल मीडिया का जमाना है। अतः वीडियो कहीं वायरल न हो जाए, इससे खाकी वाले तनिक सावधान ही रहते हैं। फिर भी मेरा मानना है कि सबसे बढ़िया प्रशिक्षण गाली देने की कला की किसी को मिली है, तो वह हमारे इन पहरुओं को ही शायद!
       पिछले दिनों की बात बताऊं, हमारे अमूमन शांतिप्रिय शहर में कुछ जरा अलग हट कर हो गया है, क्यों कि खाकीवालों के विरुद्ध एक कद्दावर खादीवाले की जुबां पर वही मां की गाली आ गई। फिर क्या था कोतवाली के अंदर से इसका वीडियो वायरल हो गया। उधर,युवा दरोगा ने सत्तारूढ़ दल के एक पूर्व सांसद के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवा दिया। अब यह मामला यहां राजनैतिक सुर्खियों में है। लेकिन यह अधूरा सच है, वर्दीवाले जो आये दिन इसी तरह के अपशब्दों का प्रयोग करते हैं थाने में इसका वीडियो कौन जारी करेगा। ये वर्दीवाले ईमानदारी से बताएं कि वे ड्यूटी के दौरान प्रतिदिन कितनी बार औरों की मां -बहन का नाम ले अपशब्दों का प्रयोग करते हैं। जो नेता, अधिकारी, रंगबाज यहां विंध्यवासिनी धाम में मां कल्याण करों की पुकार लगाते हुये जाते हैं। उन्हें इतना भी नहीं पता कि जिसे वे अपने दम्भ में अपशब्द कह रहे हैं, वह इन्हीं जगत जननी का स्वरूप हैं। यह कितनी लज्जा का विषय है कि महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों  की जुबां इस तरह से बेकाबू है। क्या इस पर कोई बड़ा कदम हमारे भाग्य विधाताओं को नहीं उठाना चाहिए। उनके पास पावर है, वे चाहे तो संविधान में इसके लिये और कठोर कार्रवाई तय कर सकते हैं। जब कानून के भय से दलित वर्ग के प्रति अपमानजनक  शब्दों के प्रयोग काफी कम हो सकता है, तो फिर मां-बहनों की अस्मत को ठेस पहुंचाने वाली यह गाली भी निश्चित ही रोकी जा सकती है। पूर्व माननीय और दरोगा के विवाद को उजागर कर मैं इस ब्लॉग की गरिमा गिराना नहीं चाहता, परंतु  "मां "  जैसे आत्मीय सम्बोधन को निजी अहम् की तुष्टि का माध्यम न बनाया जाए, इसके लिये हम सभी को मिल कर आवाज उठानी होगी। यह हमारा नैतिक दायित्व भी है ! (शशि)

Saturday, 19 May 2018

जमाने की ठोकर ने बनाया दर्पण



     जमाने की ठोकरें खाते हुये मैं एक समतल दर्पण बन गया हूं। ऐसा दर्पण जिससे बहुत पक्षपात की उम्मीद कोई नहीं करता।  अपने हित में जुबां से न तो किसी का झूठा गुणगान करता हूं और ना ही निजी खुन्नस में उसकी बुराई करना चाहता हूं। यदि ऐसा करना चाहूं, तब भी नहीं कर सकता। अंदर से कोई आवाज आती रहती है , किसके लिये कर रहे हो यह सब.. तुम्हारा मेला तो कब का पीछे छूट चूका है बंधु..

     सचमुच मैं बिल्कुल बंजारे की तरह से हूं , जहां शरण मिला वहीं रात कट जाएगी अपनी। इस छोटे से शहर में बड़े लोग भी मुझे अत्यधिक स्नेह और सम्मान देने लगे हैं। मंत्री , सांसद विधायक , उद्यमी से लेकर आम आदमी भी मुझ निठल्ले को पसंद करने लगा है । सोचा था कि घरवालों को कभी बताऊंगा कि मैं निकम्मा नहीं हूं, मैंने अपनी पहचान बना ली है। पर कदम ठिठक गये, जहां पैसा की पहचान हो , वहां जाना उचित नहीं समझा।

         इधर, यह कलम है कि मानती ही नहीं, चल ही जाती है अपने ही शुभचिंतकों के भी विरुद्ध।  कितना भी रोकना चाहता हूं, फिर भी जनता का दर्द , मेरी अपनी पीड़ा न जाने क्यूं बन जाती है। समझता हूं कि जो रहनुमा मेरे निजी दुख-दर्द में खड़े रहते हैं, उन्हें इससे तकलीफ होती होगी। फिर भी बड़ी बात यह है कि उन्होंने कभी फोन मेरी खबरों पर नाराजगी नहीं जताई।  कितनों ने कान भरा भी है इनका कि क्यों सांप को दूध पिला रहे हैं !  तब भी अमूमन माननीय मेरे ही समर्थन में कह दिया करते हैं कि शशि भाई हैं ! उन्होंने कुछ डिमांड तो नहीं न किया आपसे या हमसे। जो दो मामले मुझपर दर्ज है, उससे तकलीफ जरुर है। पर सोचता हूं कि महात्मा गांधी को भी तो गोली किसी ने मार ही दी न, मैं तो एक मामूली कलमकार हूं..विश्वास कीजिए मैंने कलम से धन की चाह में किसी को ब्लैकमेल नहीं किया। ढाई दशक से यहां पत्रकारिता कर रहा हूं, कोई एक दिल पर हाथ रख कर बता दे कि जो भी खबरें अच्छी या बुरी मैंने लिखी, उसके बदलें अपने लिये कुछ मांगा ? आज भी उसी पुरानी साइकिल से ही चलता हूं। समाजवादी पार्टी के बड़े नेता यदि अन्यथा न लें तो एक बात कहूं ?  यह जो समाजवाद है न वह हमारे ही जैसे पहरुओं के कारण ही , अब तक संजीवनी पाते आ रहा है, नहीं तो लग्जरी वाहनों में सफर करने वालों ने उस विचारधारा को कब का खा पचा लिया होता।
          हां,चाहता तो मैं भी जेंंटल पत्रकार बन सकता था। अनेक अवसर मिले यहां, पर खुद से ही यह पूछ बैठा था कि किसके लिये ये सब  करुं..
     मां , बाबा और दादी के जाने से मेरी दुनिया बदल चुकी थी। दूर मुजफ्फरपुर में मौसी जी स्वयं संघर्ष के दौर से गुजर रही थीं। घर पर दादी का वह सूना कमरा जब तक मैं वहां था पीड़ा देता ही रहा। रोजाना ताऊ जी के घर जाना उचित नहीं लगता। सो, पेट की आग बढ़ने लगी तो काम की तलाश में भटकने लगा। याद है मुझे गांडीव प्रेस से जब मीरजापुर की और चला था ,तो देर शाम अखबार बांटते हुये यहां की सड़कों पर सफेद रंग के महंगे कोट पैंट और जूते में मेरी मनोदशा भी कुछ- कुछ सपने फिल्म के अदाकारा जैसी ही  थी...
       पले थे जो कल रंग में धूल में
      हुये दर-ब-दर कारवां कैसे- कैसे
       जमाने ने मारे जवां कैसे कैसे...

        पर अब इन पच्चीस वर्षों मैं इतना तप गया हूं कि रास्ते का ठोकर बनने की जगह मील का पत्थर बन समाज के लिये कुछ करना चाहता हूं । देखें न मेरा यह " व्याकुल पथिक " वाला ब्लॉग लोग पसंद कर रहे हैं। दिन भर के भाग दौड़ के थकान के बावजूद कुछ समय मैं इसके लिये चुराया करता हूं।
 प्रयास अपना यही है कि इसे और खुबसूरत बनाता जाऊं। इस गुलदस्ते का हर पुष्प जन उपयोगी हो। अभी तो दो माह का अबोध शिशु ही है हमारा ब्लॉग , जो आप सभी का दुलार पाने की चाहत रखता है।
 (शशि)

Friday, 18 May 2018

दादी को याद कर अपराध बोध से भर आता है मन

 

       दादी नानी से किस्से कहानी अब कहां बच्चे सुन पाते होगें। स्कूल का होमवर्क ही इतना है कि बचपन कब निकल  जाता है, यह सभ्य समाज के लाडलों को क्या पता !  दादी के करीब होते हुये भी, वे उनके दुलार से वंचित रह जाते हैं।  हां, फिल्मों में जरुर उन्होंने
    " दादी अम्मा- दादी अम्मा मान जाओ "
               यह गाना सुना होगा, सवाल यह है कि अपनी दादी की चंपी कितनों ने की होगी। हां, इस मामले में मैं बहुत खुशनसीब था। बचपन में दादी की खटिया पर ढेरों कहानियां जो सुनी है। दादी ने हम बच्चों को खूब सैर कराया है, पापा- मम्मी से चोरी-चोरी।
   स्मृतियों के झरोखे में जब कभी झांकता हूं, तो घर पर अपने संकट काल में दादी को ही सबसे करीब पाता हूं।वहीं, दुर्भाग्य मेरा देखें कि उनकी मृत्यु पर मैं ही उनके समीप नहीं रहा। बाद में मेरे मित्र ने बताया था कि दादी इस उम्मीद से उसके पास आती रहती थी कि मेरा कोई पैगाम आया हो। बार्डर फिल्म की यह मार्मिक गाना घर कब आओगें  ..जब कभी भी संजीदगी से सुनता हूं, तो लगता है कि कहीं दादी तो नहीं पुकार रही है ! इसीलिए जब भी उनका स्मरण करता हूं , दिल बैठने लगता है। जानता हूं मृत्यु के समय नजरें उनकी मुझे ही ढ़ूढ़ती होगीं ! उनकों कंधा न देने का मुझे अफसरों नहीं है, पीड़ा इस बात की है कि जिन्होंने नानी मां की मृत्यु के बाद वर्षों मेरी सेवा की थी, उन्हीं के कारण तो मैं इंटरमीडिएट की परीक्षा दे सका था। कभी कम्पनी गार्डन के शीतला मंदिर के अंदर चबुतरे पर बैठ कर, तो कभी उसके रैनबसेरा में जब भी मैं गणित के प्रश्नों को सुलझाने में जुटा रहता था, दादी पीछे बैठ मेरे सिर पर तेल या नीबूं मला करती थीं।
     घरवालों ने उनके अस्वस्थ होने की सूचना तक नहीं दी थी मुझे ! हां , उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद जरुर एक पत्र आया था घर से, पर जब दादी ही चली गयी तो फिर घर किसके लिये जाता। माता- पिता, भाई - बहन ये सारे रिश्ते दादी के सामने ही टूट चुके थें। मुझे निठल्ला बता , दो जून की रोटी भी तो बाद में वहां छीन ली गयी थी। घर में एक छोटा सा कमरा , इस व्यंग्य बाण के साथ दिया गया था मुझे कि दादा का मकान है, इसीलिये हिस्सा में आधा कमरा तेरा और शेष आधा तेरी दादी का ...मैंने तभी ठान लिया था कि न तो इस मकान से और न ही यहां रहने वालों से नाता रखना है। फिर भी दादी मुझे दूर किसी नाते रिश्तेदार के यहां नहीं जाने देना चाहती थी...जब मैं पुनः घर छोड़ कर मुजफ्फरपुर गया और वहां से होते हुये कालिंपोंग फिर वापस वाराणसी लौटा, तो दादी के छोटे से कमरे को खाली देख तड़प उठा था। बहुत कुछ लिखने की स्थिति में नहीं हूं, अपराध बोध से दब सा जो जाता हूं। बस इतना ही पता चला कि दादी बीमार पड़ गयी, उन्हें अत्यधिक दस्त होने लगा । उनका किसी ने भी प्रयाप्त देखभाल नहीं किया। सो, बड़ी ही खामोशी के साथ कभी भी किसी के सामने नहीं झुकने वाली आत्म स्वाभिमान से भरी मेरी प्यारी दादी खुदा के घर चली गयी.. । कालिंपोंग से लौटने के बाद मैं भारी मन से उनके बिल्कुल छोटे से कमरे को निहारते हुये, अपने खुले कमरे में चला गया था। भोजन मिलने का तो कोई सवाल ही नहीं था। दो - तीन दिन तो सिर्फ पानी और बिस्किट से ही गुजारा था। हालांकि यह भूख मेरे लिये कोई नयी समस्या नहीं थी। फिर करीबी रिश्ते में ताऊ जी के घर गया... वे उस समय हरिश्चंद्र महाविद्यालय में कानून की शीक्षा दिया करते थें। सभी सम्मान में उन्हें वकील साहब बोलते हैं। मैं भी दादी की तरह ही स्वाभिमानी था, सो यह कहने का सवाल ही नहीं था कि ताई जी भूख लगी है। परंतु उनकी नजरों से मेरी भूख भला छिपने वाली थी। अतः कुछ दिनों तक उन्होंने अपने इकलौते पुत्र (अब स्वर्गीय) को पढ़ाने के बहाने ही मुझे घर पर बुलाया, जब तक मुझे काम नहीं मिल गया था। वहां, एक वक्त का भोजन और जलपान से मेरी क्षुधा शांत हो जाती थी और रात दो- तीन गिलास पानी पी कर काट ही लेता था। यही ट्रेनिंग तो आज भी मुझे काम दे रही है कि रात्रि भोजन की आवश्यकता अब महसूस जो नहीं होती है।
    हां चौथी बार जब घर छोड़ा, तो मीरजापुर से वाराणसी शहर में स्थित अपने मकान में हिस्सा मांगने दुबारा लौट कर नहीं गया, इन ढ़ाई दशक में। कुछ  शुभचिंतकों ने कहा भी था कि महंगी अचल सम्पत्ति है, क्यों छोड़ रहे हो अपने दादा का मकान । मुझे हंसी आती है, इन बातों पर कि कैसी सम्पत्ति और कैसा घर ! जहां थाली में दो रोटी रख कर भी नहीं मिला हो ।  याद वह भी दिन है कि दादी अपने भोजन में से आधा निकाल कर चोरी चोरी मुझे खिलाया करती थी। वृद्धा पेंशन का सारा पैसा मुझे ही दे दिया करती थी । यहां तक कि सारे संकोच त्याग कर कोई भी उन्हें खाने की कोई सामग्री देता, उसे आंचल में छिपा कर धीरे से मेरे कमरे में ले आया करती थीं।  और क्या कहूं दादी को, जब उनके लिये कुछ किया ही नहीं !

शशि 19/5/18

जीना उसका जीना है , जो औरों को जीवन देता है



       जीना उसका जीना है , जो औरों को जीवन देता है
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        हमारे एक मित्र हैं अश्वनी भाई। न्यूज, व्यूज और म्यूजिक का अच्छा कलेक्शन रखते हैं। यू़ं समझे कि आलराउंडर हैं जनाब ! ईश्वर की कृपा उनपर है। सो, सुखी गृहस्थ जीवन का भरपूर आनंद ले रहे हैं। आर्थिक व्यवस्था कुछ उनके पास ऐसी है कि झमाझम लक्ष्मी की बरसात भले ही ना हो रही हो, पर ठन ठन गोपाल भी नहीं हैं बंधु मेरे। सो, दिन चढ़ते- चढ़ते मोबाइल हाथ में लिये और कान में ईयरफोन लगाये मीडिया सेंटर में आ बैठते हैं। यहां काम उनका बस यही है कि आते जाते हुये मैं सब पे नजर  रखता हूं ...

   सो, मेरी मनोस्थिति भी उनसे छिपी नहीं है। अश्वनी भाई जानते हैं कि सुबह के 5 बजे से रात्रि 12 बजे तक मानसिक और शारीरिक कार्य करने वाले मुझ श्रमिक को  देर रात्रि बिस्तरे (शैय्या) पर जाते समय थकान मिटाने की कौन सी दवा चाहिए। लिहाजा, मेरे एकाकी जीवन में रंग बिखेरने के लिये वे इन दिनों पुराने गानों का कोई ना कोई खुबसूरत गुलदस्ता रात्रि में मुझे सेंट करना नहीं भूलते हैं। एक ऐसा ही चुनिंदा सदाबहार नगमा कल उन्होंने मेरे व्हाट्सएप पर डाला था । जिसके बोल रहे ---

मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है
जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है...
 
      अब क्या बताऊं आपको तन चाहे कितनी भी थकान से टूट रहा हो पर मन को भावनाओं, सम्वेदनाओं और कल्पनाओं के पंख लग जाते हैं। वह दिन भर के कैदखाने से मुक्त आजाद पक्षी की तरह फुदकने लगता है। जीवन को सार्थक करने के लिये कितना सरल सूत्र इस गाने में छिपा है। हमसभी ऐसा कर सकते हैं, औरों को जीवन दे सकते हैं। जेब से हमारा कुछ भी बर्बाद नहीं होना है । बस झूठी जुबां चलाने की जगह दिल का खजाना हमें थोड़ा लुटाना है। तभी हमें मन की बात समझ में आएगी !
     अब देखें न हम जिस छोटे से शहर मीरजापुर में रहते हैं, यहीं माता विंध्यवासिनी का धाम भी है। कहां- कहां से नहीं आस्था में बंधे दर्शनार्थी यहां खींचें चले आते हैं। मार्ग में पड़ने वाले शास्त्रीपुल को पार कर ही दर्शनार्थियों और यात्रियों सभी को नगर में प्रवेश करना होता है। हां ,गैर प्रांत जाना हो तो सीधे निकल जाएं। परंतु  स्थिति क्या है यहां की ट्रैफिक व्यवस्था की , यही न की यात्री दो- दो घंटे तक खुले आसमान से बरस रहे अंगारे के मध्य देवीधाम पहु़ंचने से पूर्व जाम में फंस अग्नि परीक्षा देने को विवश हैं। अभी किसी वीआईपी के आगमन की सूचना आ जाए, तो फिर देखिए न साहब कैसे कुछ ही मिनटों में हमारे ये ही बहादुर वर्दीवाले भाई फटाफट सड़क को ट्रैफिक विहीन सा कर देगें। हमारे राजनेता भी स्वागत के लिये इस पुल के समीप आ डट जाएंगे। वहीं ,जब आम जनता की बारी आती है, तो उसे  इसी भीषण जाम में बिलबिलाते रहने के लिये तब तक छोड़ दिया जाता है, जब तक होहल्ला नहीं मचता है। सरकारी खटारी बसों में बैठीं माताओं, बहनों और जाम में गर्मी से बिलखते उनके बच्चों की गुहार सुनने फिर भला कौन माननीय यहां आता है। जनसमस्या स्थल पर जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी देखने के लिये आम आदमी की आंखें तरस जाती हैं। ऐसे में 20 से 30 लाख की मंहगी लग्जरी गाड़ियों में घुमने वाले ऐसे माननीयों को फिर कौन याद करेगा पांच साल बाद! जो हैं तो जनप्रतिनिधि पर क्या जन के लिये कितना  !
       इसीलिये तो मुझ जैसे साधारण पत्रकार को जाम में फंसे लोग संदेश भेजते रहते हैं कि शशि जी व्हाट्सएप ग्रुप में चला दें न ! हम सभी बहुत परेशान हैं। मैं जानता हूं कि मेरा यह कार्य यहां के सत्ताधारी राजनेताओं और अफसरों को सदैव ही अप्रिय लगता रहा है। पर सवाल यह है कि सभी अमृत कलश के दौड़ में जुट जाये, तो जहर कौन पिएगा ! सो, जीवन के संध्याकाल आने से पूर्व कुछ तो अपने पेशे का मान रख लूं, फिर तो अंधेरी रात ही मिलेगी ! हमें भी और आपकों !

शशि 15/5/18

Thursday, 17 May 2018

पैसे की पहचान यहां इंसान कीमत कोई नहीं !



           पैसे की पहचान यहां इंसान कीमत कोई नहीं !


        जीवन के इस सफर में तमाम रिश्ते नाते को टटोलते हुये जब कभी अतीत के झरोखे से स्वयं को निहारत हूं, मन पीड़ा से भर उठता है। किन-किन राहों से गुजरते हुये मुझे  मीरजापुर आना पड़ा था ! क्या मैं सचमुच में इतना बुरा और निकम्मा था कि अपनों से दूरी ही मेरी नियति बन गयी। और यहां भी एक पहचान के तमगे के सिवाय और क्या हासिल कर पाया ! परंतु जब स्मृतियों के झरोखे से बाहर आ अपने इर्द गिर्द  देखता हूं, तो मुझसे भी बेबस निगाहें औरों की दिखाई देती हैं । आज तक समझ नहीं पाया हूं कि पैसे और अहम् के आगे सम्वेदनाओं, भावनाओं का क्या कोई मोल नहीं है। युवा क्रांतिकारियों ने देश की इसी आजादी के लिये क्या अपनी जवानी कुर्बान कर दी थी कि आज के जेंटलमैन, नेता और अधिकारियों के हाथों फिर से राष्ट्र गुलाम हो जाए। पिछले ही दिनों बनारस की घटना बेहद दुखद रही । प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के कैंट रेलवे स्टेशन के समीप निर्माणाधीन फ्लाईओवर का स्लैब इस तरह से कैसे ढह गया कि इतनी जानें चली गयीं। कर लें साहब आप भी इस पर थोड़ी राजनीति फिर और दोषियों को सस्पेंड , इससे अधिक और  कुछ नहीं होता है अपने देश में। हां, ऐसे मामलों को लेकर सियासी तमाशा तो जरूर खूब होता है। अफसरों की ऐसी लापरवाही शासन प्रशासन की पहचान सी बन गयी है। पर उन युवाओं को क्या कहें , जो वहां मलबों के ढेर पर खड़े हो सेल्फी ले रहे हैं। यह हमारा और आपका ही दिया संस्कार है, इन बच्चों के पास ! कहां तो बच्चों को उसके अभिभावकों द्वारा  जय कर दो, जय गणेश जी बोलों , प्रणाम करों , चरण स्पर्श करों यह सब सिखाया जाता था और अब कहां एक हाथ हिला कर टाटा बाय-बाय करना ...

       मैं एक पत्रकार हूं, इसलिये समाज के हर तबके के लोगों के बीच उठना बैठना रहा है। अफसर की कुर्सी पर बैठे पढ़े लिखे लोगों की बनावटी मुस्कान मुझे मधुमक्खी के डंक सा दर्द दे जाती है। इसलिये तो मजदूरों का अपना पन कहीं अधिक भाता है। कोलकाता में भी था तो बालीगंज जब कभी जाना होता था तो मुंह बना लेता था। लेकिन लिलुआ जाने को कोई कहता, तो पूछे नहीं कितनी खुशी मिलती थी। मुझे समानता पसंद है, न कि अपने से ऊपर नीचे का भेदभाव। इसलिये तो यहां के पत्रकार संगठनों से मोहभंग हो गया था। सच कहूं तो जातिवाद का एहसास भी यहीं मीरजापुर आकर पत्रकारिता के दौरान हुआ मुझे। अन्यथा कक्षा 6 में जब कोलकाता में पढ़ता था, तो हमारे हिन्दी के अध्यापक ने मेरे एक सहपाठी से जब यह पूछा कि असली शेर है कि नकली, यह सुन मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था कि सर जी यह क्या पूछ रहे हैं। यह तो मीरजापुर में पता चला कि क्षत्रिय के अतिरिक्त कुछ और जातियां भी सिंह लिखती हैं। खैर.. मैंने पत्रकारिता करते हुये जीवन के इस सच को करीब से देखा है कि रंगमंच पर आपकी भूमिका चाहे जितना भी उम्दा हो, परंतु कहलाएंगे विदूषक ही। कचहरी और आला अफसरों के दफ्तरों में रोजाना ही हाकिम हुजूर कह गिड़गिड़ाते निरापराध लोगों के चेहरे के दर्द को भी पढ़ता हूं। परंतु मदद मैं उनकी कुछ भी न कर पाता हूं। पहले जब युवा था , तो कम से कम लेखनी ही सही , उनके नाम कर देता था।  पर अब जो कलम मेरे हाथ में देख रहे हैं न मित्रों वह हाथी के सजावटी दांत की तरह है। कारण अखबारों के मालिकान भी कुशल व्यापारी की तरह खबरों का मोलतोल करने लगे हैं और हम रिपोर्टर की मजबूरी है कि उनकी राह पर उनके अखबार में चलें। और क्या कहूं बंधुओं यही कि सुबह से लेकर रात तक  व्हाट्सएप पर दूसरों  से उधार में लिया ज्ञानगंगा बहाते रहें और खुद  तरमाल गटकते रहें ! आखिर कब तक यह सब चलता रहेगा !  और हमारी अंतरात्मा रोती रहेगी कि..

     पैसे की पहचान यहां इंसान की कीमत कोई नहीं , बच के निकल जा इस बस्ती में करता मोहब्बत कोई नहीं..

       पहचान फिल्म का यह दर्द भरा नगमा सच पूछे, तो हम जैसे अनेक इंसानों की ही एक कहानी है।

शशि 18/5/18पर

Wednesday, 16 May 2018

और भूत भाग गया


               और भूत भाग गया
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           कोलकाता के बाद जिस शहर की ओर भाग चलने के लिये आज भी मेरा मन मचल उठता है, वह पश्चिम बंगाल राज्य के दार्जिलिंग जिले का खूबसूरत पहाड़ी इलाका कालिंपोंग है। दो बार मुझे यहां रहने का अवसर मिला था।  न शोर , न प्रदूषण, न ही दार्जिलिंग की तरह बहुत अधिक ठंड ...मित्रमंडली की भी कोई कमी नहीं। वहां शहर के नेपाली लड़के लड़कियां भले ही पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित तब दिखें। अलग प्रान्त की मांग गोरखालैंड आंदोलन का उन पर प्रभाव था। लेकिन,पहाड़ी  क्षेत्र के वासिंदों का भोलापन मुझे खूब लुभाता था। शाम होते निश्चित ही घंटे भर के लिये घुमने निकल जाया करता था। वहीं सुबह जब एक बड़ा सा ऐपल चबाते हुये दुकान पर पहुंचता था, तो पड़ोसी सैलून और पान की दुकान पर खड़े लोग मेरे स्वास्थ्य में परिवर्तन हुआ देख मुस्कुरा भी पड़ते थें।  जैसा कि बता ही चुका हूं कि इंटर की परीक्षा देने से पूर्व ही घर में सबके होते हुये भी एक दादी को छोड़ दें, तो मैं यतीम ही था ! समय कट नहीं रहा था  ऐसी मनोदशा में मेरा एक अनजान पहाड़ी इलाके में बिल्कुल  अकेले जाने का संयोग बन गया। एक छोटी सी अटैची में कुछ कपड़े साथ ले, ट्रेन पर बैठा और देर रात सिलिगुड़ी रेलवे स्टेशन पर जा उतरा। वहीं रेलवे के विश्रामगृह में गैंगटोक जा रहे एक हमउम्र लड़के से मुलाकात हो गयी।  वह मेरी घबड़ाहट समझ गया। सो, बोला भाई मत परेशान हो, सुबह बता दूंगा कि बस कहां से पकड़नी है। दरअसल , उसी स्थान से दार्जिलिंग, गैंगटोक और कलिंपोंग तीनों ही जगह के लिये बस मिलती थी । जब बस तिस्ता नदी पर बने पुल पर पहुंचा, तो नेपाली चालक ने हम यात्रियों से अपनी भाषा में कुछ कहा था। खैर , मैं कालिंपोंग जा पहुंचा  और छोटे नाना जी की मिठाई की दुकान का नाम पूछता वहां भी आ गया। नाना जी काउंटर पर बैठें हुये थें, मुझे देख कर बड़े प्रसन्न हुये। उन्होंने अपने छोटे वाले पुत्र जो अवस्था में मुझसे छोटे थें, के साथ काफी दूर पहाड़ की चढ़ाई पर स्थित अपने घर पर भेज दिया। जहां नानी जी ने भी मेरा स्वागत उसी अपनत्व के साथ किया। परन्तु मेरे जीवन की जो सबसे बड़ी परीक्षा थी, वह तो रात में शुरू हुई, क्यों कि मुझे सोने के लिये बीच वाली मंजिल पर भेज दिया गया। वहां ऐसा नहीं था कि आप सीढ़ी से झट ऊपर नीचे कर लें। बाहरी पहाड़ी रास्ते से ही दूसरी मंजिल तक पहुंचना था। उतने बड़े फ्लैट में भला अकेले मुझे नींद आती भी तो कैसे! ऊपर से तेज हवा के कारण पहाड़ी वृक्षों की आपस में रगड़ से विचित्र तरह की आवाज भी आ रही थी। पहली बार ऐसे क्षेत्र में मुझे अकेले छोड़ दिया गया था और मैं जानता था कि यदि जोर से भी पुकार लगाऊंगा, तो भी सुनने वाला कोई नहीं है। बचपन में भूतप्रेत, चुड़ैल की बातें दादी और मम्मी करती ही थीं  साथ ही ड्रैकुला वाला कामिक्स भी मैंने खूब पढ़ रखा था। सो, बंद खिड़की के उस पार से आ रही आवाज सुन मन बेहद घबड़ा उठा था। उसी मनोस्थिति में कब अटैची से राम चरित मानस की पुस्तक निकाल कर हाथ में ले ली, पता नहीं। हां, हनुमान चालीसा तो वैसे भी मुझे तब याद था ही। सो , पूरी रात पाठ करते ही गुजर गयी। सुबह जब वहां काम करने वाली नेपाली युवती ने दरवाजे पर दस्तक दी, तो जान में जान आयी थी। लेकिन , मेरे लिये अच्छी बात यह रही कि मेरे मन का भूत उसी रात ही भाग गया। फिर तो वहां  जहां भी रहा , अकेले ही बड़े हालनुमा कमरे में रहा। क्योंकि बाद में बस स्टैंड के पास ही नाना जी के पुराने खाली आवास पर आ गया था। बगल में एक पड़ोसी अंकल से मेरी खूब बनती थी। उसी समय जबर्दस्त भूकंप पहाड़ी क्षेत्रों में आया था। भय से अड़ोस पड़ोस के लोग घर छोड़ बाहर मैदान में आ जुटे थें, एक मैं ही अपने कमरे में खर्राटे भरता पड़ा था। मानों हर भय से मुक्त हो चुका था !
     मैं कोलकाता को खोने के बाद कलिंपोंग बिल्कुल नहीं छोड़ना चाहता था। इसीलिये कुछ वर्षों बाद फिर गया वहां, परन्तु एक बंजारे का भला कहां कोई एक ठिकाना  है !

       यह जान कर भी कि एक एक कर सभी अपनों से दूर होता रहा हूं , फिर भी जिस गाने की बोल दूर से ही सुनकर मैं अब भी चहक उठता हूं, वह है-

चलते चलते मेरे गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना..

शशि 17/5/18

Tuesday, 15 May 2018

प्रणाम बंधुओंं



व्याकुल पथिक

       तुम्हारे हैं तुमसे दया मांगते हैं     
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         मन की व्याकुलता को कम करने के लिये कभी-कभी रात्रि में पुरानी फिल्में थोड़ी बहुत देख लिया करता हूं।  1954 की बनी एक फिल्म है बूट पॉलिश, जिसका एक गाना है -
      तुम्हारे हैं तुमसे दया मांगते हैं..तेरे लाडलों की दुआ मांगते है..यतीमों की दुनिया में हरदम अंधेरा..

    सुन कुछ भावुक सा हो उठा । सोचता हूं कि उन मासूम बच्चों को सही राह दिखलाने वाले एक जॉन अंकल मिल गये थें और बाद में एक दुलारी मां भी।  पर जब सगे मां-बाप ही अपने बच्चों को भिखारी बना रहे हों, तब उन्हें कौन राह पर लाएगा। हमेशा उलझन में रहता हूं कि इन बच्चों के साथ हमलोगों का व्यवहार कैसा होना चाहिए। यदि जॉन अंकल बन भी जाऊं तो फिर इनके पेट की आग कैसे बुझेगी, क्यों कि बाप तो इनका शराबी जो ठहरा। अतः, अब तक किसी निष्कर्ष पर इतने वर्षों में नहीं पहुंच सका हूं।

     वैसे, जीवन में एक समय ऐसा भी आया था कि मैं भी सबकुछ रहते हुये यतीम ही हो गया था। दो दिनों से भूखा था, फिर भी किसी के सामने हाथ नहीं फैल रहा था, आखिर मास्टर साहब का बेटा जो था । चुपचाप मैदागिन में स्थित कम्पनी गार्डन की एक कुर्सी पर सिर झुकाये बैठा था , मैंने अपने युवा काल के कई वर्ष यहां इसी बगीचे में घंटों बिताये हैं। मुझे आज भी याद है कि एक बुजुर्ग महाशय ने मेरे समीप आ अत्यंत ही प्यार से कहा कि बेटा यदि खाली हो तो फलां धर्मस्थल (मजार) पर जाकर प्रसाद चढ़ा देते, मैंने कहा था कि ठीक है बाबा चला जा रहा हूं, परंतु आपको वापस प्रसाद लाकर कहां दूंगा, यहीं ले आऊं क्या ? उन्होंने कहां कि नहीं यह लो पैसा, तुम उसे खा लेना। तेरी बिगड़ी बात बन जाएगी ! (बता दें कि तब भी और आज भी मेरा एक ही मजहब था है,  इंसानियत का ! मंदिर में बजने वाले घंटा- घड़ियाल और मस्जिद में नमाज का वह गंभीर ऊंचा स्वर दोनों ही मुझे कर्णप्रिय लगता है ) इस तरह से दो दिनों बाद मुझे प्रसाद के रुप में भोजन मिल गया था। वैसे, कई रिश्तेदार थें बनारस में लेकिन मैंने किसी से भी नहीं कहा कि मुझे भूख लगी है। आज भी काम की अधिकता के कारण रात का भोजन कहां कर पाता हूं। पत्रकार हूं अतः तमाम शुभचिंतक हैं। जो कहते भी रहते हैं कि शशि जी भोजन कर जाया करें, हम सभी को खुशी होगी। परंतु मुस्कुराते हुये टाल दिया करता हूं।  खैर...

     बच्चों को ही लेकर कालिंपोंग वाले स्वर्गीय नाना जी की एक सबक मुझे आज भी याद है। बात उन दिनों की है जब इंटर की परीक्षा देने के बाद मैं पारिवारिक कारणों से बनारस अपना घर छोड़ कालिंपोंग नानी मां के छोटे भाई के यहां चला गया था। तब वहां की सबसे बड़ी मिठाई की दुकान उनकी ही थी। सामने पहाड़ पर लड़कियों का एक स्कूल । जब इंटरवल होता था, तब ये बच्चियां पहाड़ से नीचे उतर कर सिर्फ इसलिये नाना जी की दुकान पर आया करती थीं कि  बेसन का बना नमकीन सेव शायद उसे भूजा ही नेपाली में वे बोलती थीं, यहां उन्हें मिलेगा। अधिकांश  लड़कियों के पास 50 पैसे का एक छोटा सिक्का तब हुआ करता था। फिर भी नाना जी की हिदायत रहती थी कि सेव की जो पुड़िया इन छात्राओं को दी जाए, वह ठीक -ठाक हो। चालीस- पचास लड़कियां तो आती ही थीं हर दिन । सो, वैसे ही एक दिन मैंने नाना जी से पूछ लिया कि यह तो घाटे का सौदा है न ? पुड़िया तो एक रुपये की रहती है, पर मिलता अठन्नी है ! जानते हैं नाना जी ने क्या कहा था ! उन्होंने कहा था कि इन मासूमों के चेहरे पर सेव लेने के बाद आप जो चमक देख रहे हैं न, उसकी कीमत नहीं लगाई जाती है ! 

      एक सम्वेदनशील व्यक्ति ही समझ सकता है कि उन्होंने कितनी बड़ी बात कह दी थी तब। तभी से जब मैं वहां हाट करने जाता था वहां , तो बड़ी दुकानों से सब्जी तो बिल्कुल ही नहीं लेता । टोकरियों में सब्जी लेकर बैठीं नेपाली  बच्चियों, वृद्ध महिलाओं को मेरी नजरें ढ़ूढ़ती रहती थीं। भाई -दाज्यू ले लो न राम्रो( बढ़िया) है, हम हिन्दी भाषियों को देख वे बोला करती थीं।  आपसे भी मैं वही छोटे  नाना जी वाली बात कहना चाहूंगा कि बच्चे और वृद्ध यदि सड़क पर बाजारों में कोई सामग्री बेचते दिखें, तो कोशिश करें कि उन्हें निराश न किया जाए। सौ -पचास रुपये तो आप जैसे जेंटलमैन के बच्चे चाकलेट खाकर बर्बाद कर देते ही होंगे , फिर बेचारे उस बच्चे का दिल क्यों तोड़ रहे हो,  अपने जूते पर उससे पॉलिश लगा लो न साहब ! भीख तो नहीं मांग रहा है न हमारा यह  लाल  ...

शशि 16/5/18

Monday, 14 May 2018

प्रणाम बंधुओं

व्याकुल पथिक

       जीना उसका जीना है , जो औरों को जीवन देता है
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        हमारे एक मित्र हैं अश्वनी भाई। न्यूज, व्यूज और म्यूजिक का अच्छा कलेक्शन रखते हैं। यू़ं समझे कि आलराउंडर हैं जनाब ! ईश्वर की कृपा उनपर है। सो, सुखी गृहस्थ जीवन का भरपूर आनंद ले रहे हैं। आर्थिक व्यवस्था कुछ उनके पास ऐसी है कि झमाझम लक्ष्मी की बरसात भले ही ना हो रही हो, पर ठन ठन गोपाल भी नहीं हैं बंधु मेरे। सो, दिन चढ़ते- चढ़ते मोबाइल हाथ में लिये और कान में ईयरफोन लगाये मीडिया सेंटर में आ बैठते हैं। यहां काम उनका बस यही है कि आते जाते हुये मैं सब पे नजर  रखता हूं ...

   सो, मेरी मनोस्थिति भी उनसे छिपी नहीं है। अश्वनी भाई जानते हैं कि सुबह के 5 बजे से रात्रि 12 बजे तक मानसिक और शारीरिक कार्य करने वाले मुझ श्रमिक को  देर रात्रि बिस्तरे (शैय्या) पर जाते समय थकान मिटाने की कौन सी दवा चाहिए। लिहाजा, मेरे एकाकी जीवन में रंग बिखेरने के लिये वे इन दिनों पुराने गानों का कोई ना कोई खुबसूरत गुलदस्ता रात्रि में मुझे सेंट करना नहीं भूलते हैं। एक ऐसा ही चुनिंदा सदाबहार नगमा कल उन्होंने मेरे व्हाट्सएप पर डाला था । जिसके बोल रहे ---

मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है
जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है...
   
      अब क्या बताऊं आपको तन चाहे कितनी भी थकान से टूट रहा हो पर मन को भावनाओं, सम्वेदनाओं और कल्पनाओं के पंख लग जाते हैं। वह दिन भर के कैदखाने से मुक्त आजाद पक्षी की तरह फुदकने लगता है। जीवन को सार्थक करने के लिये कितना सरल सूत्र इस गाने में छिपा है। हमसभी ऐसा कर सकते हैं, औरों को जीवन दे सकते हैं। जेब से हमारा कुछ भी बर्बाद नहीं होना है । बस झूठी जुबां चलाने की जगह दिल का खजाना हमें थोड़ा लुटाना है। तभी हमें मन की बात समझ में आएगी !
     अब देखें न हम जिस छोटे से शहर मीरजापुर में रहते हैं, यहीं माता विंध्यवासिनी का धाम भी है। कहां- कहां से नहीं आस्था में बंधे दर्शनार्थी यहां खींचें चले आते हैं। मार्ग में पड़ने वाले शास्त्रीपुल को पार कर ही दर्शनार्थियों और यात्रियों सभी को नगर में प्रवेश करना होता है। हां ,गैर प्रांत जाना हो तो सीधे निकल जाएं। परंतु  स्थिति क्या है यहां की ट्रैफिक व्यवस्था की , यही न की यात्री दो- दो घंटे तक खुले आसमान से बरस रहे अंगारे के मध्य देवीधाम पहु़ंचने से पूर्व जाम में फंस अग्नि परीक्षा देने को विवश हैं। अभी किसी वीआईपी के आगमन की सूचना आ जाए, तो फिर देखिए न साहब कैसे कुछ ही मिनटों में हमारे ये ही बहादुर वर्दीवाले भाई फटाफट सड़क को ट्रैफिक विहीन सा कर देगें। हमारे राजनेता भी स्वागत के लिये इस पुल के समीप आ डट जाएंगे। वहीं ,जब आम जनता की बारी आती है, तो उसे  इसी भीषण जाम में बिलबिलाते रहने के लिये तब तक छोड़ दिया जाता है, जब तक होहल्ला नहीं मचता है। सरकारी खटारी बसों में बैठीं माताओं, बहनों और जाम में गर्मी से बिलखते उनके बच्चों की गुहार सुनने फिर भला कौन माननीय यहां आता है। जनसमस्या स्थल पर जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी देखने के लिये आम आदमी की आंखें तरस जाती हैं। ऐसे में 20 से 30 लाख की मंहगी लग्जरी गाड़ियों में घुमने वाले ऐसे माननीयों को फिर कौन याद करेगा पांच साल बाद! जो हैं तो जनप्रतिनिधि पर क्या जन के लिये कितना  !
       इसीलिये तो मुझ जैसे साधारण पत्रकार को जाम में फंसे लोग संदेश भेजते रहते हैं कि शशि जी व्हाट्सएप ग्रुप में चला दें न ! हम सभी बहुत परेशान हैं। मैं जानता हूं कि मेरा यह कार्य यहां के सत्ताधारी राजनेताओं और अफसरों को सदैव ही अप्रिय लगता रहा है। पर सवाल यह है कि सभी अमृत कलश के दौड़ में जुट जाये, तो जहर कौन पिएगा ! सो, जीवन के संध्याकाल आने से पूर्व कुछ तो अपने पेशे का मान रख लूं, फिर तो अंधेरी रात ही मिलेगी ! हमें भी और आपकों !

शशि 15/5/18