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Monday, 10 September 2018

आपके कर्मों की ज्योति अब राह हमें दिखलायेगी

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कुछ यादें कुछ बातें, जिनकी पाठशाला में मैं बना पत्रकार
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एक श्रद्धांजलि श्रद्धेय राजीव अरोड़ा जी को

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किया था वादा आपने कभी हार न मानेंगे
बनके अर्जुन जीवन रण में जीतेंगे हार न मानेंगे
जीवन-मरण के खेल में नियति के हाथों हार गये
चढ़ा प्रत्यंचा गाड़ीव में,क्यूँ अंत समय में हार गरे
आपके कर्मों की ज्योति अब राह हमें दिखलायेगी
यादें मचलेंगी आँखों में अधरों पे मुस्कान खिलायेगी
 

       देर शाम कमरे पर काढ़ा तैयार कर  था , तभी अचानक अपने गांडीव कार्यालय, वाराणसी से फोन आता है  कि भैया जी नहीं रहें। मैंने स्तब्ध सा रह गया, सो पलट कर पूछा कि अरे कब  !  वैसे तो हम सभी को पता था कि इस अप्रिय संदेश का एक दिन आना तय है, परंतु इतनी शीघ्रता भी क्या थी... भले ही गंभीर रुप से अस्वस्थ रहें वे, फिर भी हम सभी के लिये वटवृक्ष थें।  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डा० भगवान दास अरोड़ा जिनकी त्याग एवं तपस्या से गांडीव के रुप में जो निर्भीक सांध्यकालीन समाचार पत्र काशी के वासिंदों की आवाज बन गया था ,  उनके सुपुत्र राजीव अरोड़ा जी ने उसका और भी विस्तार कर उसे बनारस वासिंदों की धड़कन बना दिया था। पाठकों की कैसी भी खबर हो , प्रेस विज्ञप्ति, जनसमस्या, शोक समाचार, मांगलिक समाचार, कविताएं और लेख सभी को गांडीव में सम्मान मिलता था। उन्होंने गांडीव का उदारवादी चेहरा पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया था।  यही नहीं पाठक मंच के लिये भी एक बड़ा कालम होता था अपने अखबार में। सो, यदि किसी ने गांडीव कार्यालय पर अपनी विज्ञप्ति दी है, तो उसे इतना विश्वास रहता था कि उसका समाचार निश्चित  प्रकाशित होगा।
         अब यदि अपनी बात कहूँ तो आज पत्रकार के रुप में मेरा जो सम्मान, पहचान है, जो इस आजीविका से कहींं अधिक मूल्यवान है मेरे लिये, यह सब उन्हीं का तो दिया है।  हमारे समाचार पत्र सांध्य दैनिक गांडीव के निवर्तमान सम्पादक राजीव अरोड़ा जी को हम सभी भैया जी ही कहते थें। जिनका गत शनिवार की शाम निधन हो गया है । वे काफी दिनों से गंभीर रुप से अस्वस्थ रहें। फिर भी जब वे विगत वर्षों यहाँ मीरजापुर आये थें और होटल राही इन में ठहरे थें, तो वापस लौटते समय हम सभी से कह गये थें ,   "इतनी जल्दी जाने वाला मैं नहीं हूँ। हाँ , स्वास्थ्य ठीक न होने से कार्यालय नहीं जा पा रहा हूँ। "  इसके बाद भैया जी से आखिरी मुलाकात उनके घर पर ही हुई थी। मेरे दस्तक पर दरवाजा भी उन्होंने ही खोला था। न्यायालय के एक मामले में उनका मेडिकल रिपोर्ट लेने के लिये मैं गया था तब। मुझे देखते ही उन्होंने हाल समाचार पूछा , फिर कहा कुछ जलपान। जब मैंने ना में सिर हिला दिया , तो कहा कि अच्छा यह सत्तू पी कर जाइए । मुझे याद है मैं जब भी बनारस जाता था। कार्यालय में मुझ पर नजर पड़ते ही उनका पहला सवाल रहता था कि जलपान किया है कि नहीं ? वे हम सभी को " आप "कह कर ही सम्बोधित करते थें। किसी भी खबर पर मुझे डांट पड़ी हो या मेरा समाचार रोक दिया हो उन्होंने, मुझे याद नहीं है। एक बार यहां के एक विधानसभा क्षेत्र से एक प्रभावशाली मंत्री चुनाव लड़ रहे थें। मतदाताओं में साड़ियाँ बांटते हुये उनके चुनाव प्रचार वाहन को पकड़ लिया गया। फिर क्या था माननीय के सिपहसालारों ने मीडिया मैनेजमेंट शुरू कर दिया। मेरी खबर भी रोकने की जानकारी  मुझे मिल गयी, तो उदास मन से मैंने सीधे सम्पादक जी को  अपना वह समाचार दिया और सारी बातें बता दी। फिर क्या था, प्रबंध सम्पादक / उप सम्पादक तक को भनक नहीं लगी और सायं प्रथम पृष्ठ पर खबर लग ही गयी। उस शाम मुझे अपने अखबार पर एवं अपने सम्पादक जी पर कितना गर्व महसूस हुआ था, पूछे ही मत। आप समझ सकते हैं, इससे कि उन्हें जुगाड़ तंत्र की राजनीति समाचार के क्षेत्र में बिल्कुल भी पसंद न थी। सफेद पायजामा- कुर्ता और खादी का झोला, इस वेशभूषा में प्रेस के स्वामी कम  बिल्कुल खाटी पत्रकार दिखते थें वे। समाचार डेस्क पर सभी के पास वे जाते थें, साथ ही पूछते रहते थें कि कुछ लिख रहे हैं क्या विशेष। मेरी खबरें भी उन्हें पसंद थी, बस इतना कहते थें कि थोड़ा और पढ़ लिया करें, ताकि अशुद्धियाँ न हो। परंतु पत्रकार होकर भी मेरे पास पढ़ने का समय था ही कहाँ। समाचार संकलन,  उसे लिखना, बंडल लेने जाना और फिर वितरण भी, सुबह 6 से रात 10 बजे तक घड़ी की सुई के संग- संग  चलना ही मेरी नियति हो गई थी। फिर भी ऐसा भी नहीं है कि मैं समाचार के मामले में बैकफुट पर कभी था। उस दौर में बेखौफ लिखता था मैं , तभी तो शशि और गांडीव एक दूसरे के पर्याय हैं,  ऐसा भी पाठक यहाँ कहने लगे थें।
 पैसा, ताकत और जुगाड़ के बल पर मेरा समाचार कोई कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो भैया जी से कह कर दबवा तो नहीं ही सकता था, इतना मुझे विश्वास था। हालांकि मैं पुलिस और प्रशासन के विरुद्ध जब अधिक मुखर हो जाता था, तो वे कुछ चिन्तित भी हो जाते थें कि लड़का मीरजापुर में अकेले रहता है। सो, मेरे पास किसी सहयोग से अप्रत्यक्ष संदेश भेजा करते थें। फिर भी मैंने तब तक दब कर नहीं लिखा, जब तक अपनों के ही षड़यंत्र का शिकार नहीं हुआ।
     वाराणसी स्थित अपने घर से गांडीव कार्यालय और वहाँ से मीरजापुर आ कर पत्रकारिता करने की मेरी दास्तान पेट की आग और सम्मान से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1994 की बात है। जब मैं दुबारा कलिम्पोंग से लौट कर वाराणसी आया, तो मेरी पहली प्राथमिकता रही दो जून की रोटी , क्यों कि कहींं नौकरी मुझे जमी नहीं। दादी भी न थी कि भोजन के लिये कुछ व्यवस्था कर देती। ऐसे में गांडीव परिवार का मैं सदस्य बना। मुझे एक बिल्कुल अंजान शहर मीरजापुर की जिम्मेदारी दी गयी। साफ शब्दों में बताया गया था कि बनारस से सायं अखबार को मीरजापुर ले जाना, उसका वितरण,  समाचार संकलन एवं लेखन , यह चारों ही कार्य तुम्हें स्वयं करना है। अपने निठल्लेपन के कलंक को धोने की चाह में मेरा एक पांव बनारस तो दूसरा मीरजापुर में होता था। मेरे लिये समाचार लेखन एक बड़ी समस्या थी उन दिनों। इसके लिये मेरे पास न कोई डिग्री थी, न ही प्रशिक्षण । फिर भी इतना प्रेस में भी सभी जानते थें कि मैं नकलची सम्वाददाता नहीं हूँ।अतः सम्पादक जी को मुझ पर विश्वास था और मुझे जब पत्रकारिता का ककहरा भी नहीं आता था, तभी से भैया जी के स्नेह से मेरी बाइलाइन खबर  गांडीव के प्रथम पृष्ठ पर लगने लगी थी। यहां मीरजापुर में जब बड़े समाचार पत्रों के क्षेत्रीय कार्यालय खुलने लगे थें, तो मेरे समक्ष भी उनसे जुड़ने का प्रस्ताव आता रहा , फिर भी गांडीव छोड़ कर मैं कहीं नहीं गया और जाता भी कैसे , भूख, बेगारी, बदहाली, बेरोजगारी और उससे भी अधिक अपनों के परायेपन के दर्द से मुझे इसी समाचार पत्र के चौखट पर मुक्ति जो मिली है। हाँ, लम्बी बीमारी से अब मेरा भी शरीर थक चुका है। अतः यहीं से मैं भी पत्रकारिता जगत से अपनी विदाई चाहता हूँ, कुछ यूँ  हंसते,मुस्कुराते और गुनगुनाते हुये-

 रोते रोते ज़माने में आये मगर
हँसते हँसते ज़माने से जायेँगे हम ...

    यह इसलिये की थोड़ी बहुत तो मैंने भी अपनी पहचान बना ही ली है, इस अनजाने शहर में पत्रकारिता की डगर पर । यह सम्मान मुझे अपने पूर्व सम्पादक जी के सानिध्य में ही प्राप्त हुआ है। - शशि


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन
धन्यवाद
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Friday, 7 September 2018

मेरे खुदा कहाँ है तू , कोई आसरा तो दे


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साहब ! यह जोकर का तमाशा नहीं , नियति का खेल है। हममें से अनेक को मृत्यु पूर्व इसी स्थिति से गुजरना है । जब चेतना विलुप्त हो जाएगी , अपनी ही पीएचडी की डिग्री पहचान न आएँगी और उस अंतिम दस्तक पर दरवाजा खोलने की तमन्ना अधूरी रह जाएगी।
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खिलौना जानकर तुम तो, मेरा दिल तोड़ जाते हो
मुझे इस हाल में किसके सहारे छोड़ जाते हो ...

    ठीक से याद नहीं की बचपन में कोलकाता में यह खिलौना फिल्म परिजनों संग किस छविगृह में देखा था, पर सवाल  मन में था कि यह पागल क्या होता है और यह इस तरह की हरकतें क्यों करता है ? कोलकाता हो या बनारस हम बच्चों को अनावश्यक घर के बाहर नहीं निकलने दिया जाता था, इसलिये भी मैं सड़कों पर विचरण करने वाले इन विक्षिप्त जनों से कम ही परिचित था। लेकिन, यहाँ मीरजापुर में जब सुबह पौने पांच बजे आशियाने से निकलता हूँ, तो प्रातः दर्शन जिन लोगों का होता है, उनमें चार से पांच ऐसे विक्षिप्त भी होते हैं। एक महिला तो मुझे पखवारे भर से होटल का मुख्य द्वार खोलते ही इन दिनों दिखाई पड़ जाती है , कभी सामने चाय की दुकान के समीप, तो कभी मुकेरी बाजार तिराहे पर ।  मैं अखबार लगाने के बाद जैसे ही मोबाइल जेब से बाहर निकालता हूँ, क्यों कि ईयरफोन लगा कर अपने मनपसंद गीतों को सुनने की जो आदत सी है , तो वह भी कभी- कभी मुझे ध्यान से देखती है । इधर पिछले दो - तीन दिनों से वह दिखाई नहीं पड़ रही है। पता किया तो मेरे मित्र घनश्याम दास जी ने बताया कि कभी उसका भी घर- संसार था। इसी मुहल्ले में तो दुल्हन बन कर आई थी वह । किसी कारण जहां वह मानसिक रुप से कुछ कमजोर हो गयी, वहीं उसके पतिदेव को अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु पर चपरासी की सरकारी नौकरी मिल गई। वो गाना है न कि साला मैं तो साहब बन गया..। सो, चपरासी बाबू ने अपनी जीवन संगिनी का उपचार कराने की जगह उसे  पागल घोषित कर घर से बाहर का रास्ता दिखला दिया। अभी युवा  ही है यह महिला, किसी न किसी दुकान के चबूतरे पर रात गुजारती है। मुझे इस बात का भय रहता है कि औराई में जो घटना एक अन्य महिला के साथ हुआ थी, उसकी पुनर्रावृत्ति न हो जाए, कहीं भी ऐसी किसी  मंदबुद्धि स्त्री के साथ । एक दिन पता चला था कि गर्भवती हो गई थी , वह औरत। फिर वहाँ दिखी भी नहीं। ऐसे पुरुष इस तरह से भेड़िए क्यों हो जाते हैं कि मैले -कुचैले वस्त्र में लिपटी एक विक्षिप्त स्त्री भी उनके लिये हवस  मिटाने का खिलौना बन जाती है। जेंटलमैनों आप भी जरा विचार करें कि हम किस दुनिया में जी रहे हैं।
    . याद हो आया है मुझे वर्षों पहले का एक दृश्य और भी, जब एक महिला किस तरह से एक घर की खिड़की के बाहर से टकटकी लगाये अपने जिगर के टुकड़ों को देखा करती थी। घर में उसका प्रवेश वर्जित था। विक्षिप्त होना उसका अपराध था। लेकिन , एक माँ का ममत्व उसमें था, इसलिये सामने चबूतरे पर बैठ अपने छोटे बच्चों को टुकुर- टुकुर ताकने के सिवाय , वह अभागी और कर भी क्या सकती थी। गौरवर्ण था उसका, नाक नक्शा भी तो ठीक ही तो था। बस सिर पर बालों का घोसला कुछ अजीब सा था। बिल्कुल श़ांत स्वभाव की थी वह। फिर भी बच्चे कभी उसके पास नहीं आते थें। आखिर वे धनिक व सभ्य परिवार के जो ठहरें। मां है, तो क्या हुआ , थी तो पगली ही न !  कभी यह नहीं देखा मैंने कि उसे इस घर से खाने के लिये कुछ मिला हो। फिर भी वह आती थी ...

   वैसे, आगे इमामबाड़े पर एक जनाब ऐसे भी मिलते हैं। जो टोपी लगाये  और कुर्ता -पैजामा पहने रहते हैं। अधेड़ावस्था है उनकी,उछल कूद कर नृत्य करते दिखते हैं। परिवार के सदस्य लगता है ,उनका काफी ख्याल रखते हैं। ये पूर्णतः विक्षिप्त नहीं हैं , परंतु वहाँ मौजूद कुछ लोग एक विदूषक की तरह   इनका उपयोग अपने मनोरंजन के लिये करते हैं।  छी ! कितना घटिया सोच है, हम इंसानों की भी । जो मानसिक रुप से कमजोर व्यक्ति को यूँ उकसा कर नचवा रहे हैं ।
 काश ! ये परिहास करने वाले ऐसे व्यक्तियों से कह पाते कि

मैं तो हूँ एक पागल, पागल क्या दिल बहलाएगा
जिसे अपनी खबर ना हो किसी को क्या समझाएगा...

साहब ! यह जोकर का तमाशा नहीं , यह नियति का खेल है। हममें से अनेक को मृत्यु पूर्व इसी स्थिति से गुजरना पड़ेगा। जब चेतना विलुप्त हो जाएगी , अपनी ही पीएचडी की डिग्री पहचान न पाएंगे और उस अंतिम दस्तक पर दरवाजा खोलने की तमन्ना अधूरी रह जाएगी। अतः हम इतना तो कर ही सकते हैं कि कोई इनका उपहास न उड़ाए। यदि शरारती लड़के कहींं इन्हें घेर कर परेशान कर रहे हैं, तो उन्हें नैतिक ज्ञान दें।

    अब अपनी कहूँ तो एक पागल मुझे कलिम्पोंग में मिल गया था। छोटे नाना जी की बड़ी सी मिठाई की दुकान , वहाँ थी। सो, घर छोड़ा तो वहीं शरणार्थी बन गया था। स्नेह सभी करते थें, लेकिन मेरी निगरानी से दुकान में चोरी और मनमानी दोनों ही बंद हो गयी थी।  सो, कुछ नेपाली युवकों ने एक विक्षिप्त व्यक्ति को ढ़ाल बना, मुझे निशाना बनाया। मैं जब कैश काउंटर पर बैठा था उसने एक शीशे का गिलास खींच मारा। मेरे होंठ के ऊपर का हिस्सा बिल्कुल अलग ही हो गाया था। कई टांके लगे थें तब ,फिर डाक्टर साहब ने आश्वासन दिया कि मूंछें थोड़ी बड़ी रख लेना भाई।

     सवाल यह है कि विक्षिप्त जनोंं के लिये हमारी सरकार, हमारा समाज क्या कर रहा है। नियति ने तो इनसे इनकी पहचान छीन ली है। लेकिन, हैं तो वे एक इंसान ही न ? क्या वे इसी तरह से सड़कों पर विचरण करते रहें। रात्रि में इन्हें ठीक से नींद भी कहाँ आती है। भोर होने से पहले ही वे सड़कों पर तमाशा बने दिख जाएँगें। सड़कों पर किसी अज्ञात वाहन के पहिये के नीचे आ अपनी इस घिनौनी जिंदगी से मुक्ति पा लेंगे। अकसर ऐसा ही होता जब कोई अज्ञात व्यक्ति सड़कों पर मरा पड़ा मिलता है और हम पत्रकार पुलिस से कुछ विवरण मांगते हैं, तो रटा रटाया जवाब मिलता है कि भाई वह विक्षिप्त था, शव को पोस्टमार्टम के लिये भेज दिया गया है। ऐसे अभागों का अंतिम संस्कार भी कम ही हो पाता है, इन्हें तो दबे पांव गंगा मैया के हवाले किया जाता है।
  फिर जरा यह भी विडंबना देखें न कि छुट्टा पशुओं के लिये हमारी सरकार अब पशुशाला बनवाने की बात करती है, पर इन विक्षिप्त इंसानों के लिये खुला आसमान है। कहीं भी पटरियों पर रात गुजार लेते हैं, अच्छा है इन्हें इसकी समझ नहीं है। अन्यथा अपनी उस काली रात को मैं भूल नहीं पाया हूँ। आशियाने के होकर भी न होने की वेदना , समझ सकते हैं न आप !  पर इस बावले मन को क्या कहूँ , गैर और अपनों का फर्क फिर भी समझ ना पाया वो। खैर ...
      पागलखानों का हाल तो हम सभी जानते ही हैं। वहाँ भी जुगाड़ तंत्र होना चाहिए। और एक बात बताऊँ मानसिक रुप से कमजोर ऐसे इंसानों की श्रम शक्ति का कुछ लोग बड़ी चतुराई से अपने हित में उपयोग भी करते हैं। जैसे की एक गांव है कुछ दूर पर ही, जिसके बारे में शोहरत यह है कि यहाँ मानसिक रोगी स्वस्थ हो जाते हैं। सो, दर्जन भर से अधिक मंदबुद्धि वाले लोग यहाँ मुफ्त में चाकरी करते मिलेंगे आपको। जिनसे  यहाँ के ग्रामीण एवं किसान मनचाहा काम लेते हैं, वह भी सिर्फ दो जून की रोटी देकर।
   और बात यदि पागलपन की ही करें, तो हम भी क्या कम हैं,कोई दौलत, कोई सोहरत, तो कोई मुहब्बत की चाहत में विक्षिप्त ही तो है। ऐसे में इन निरीह प्राणियों में भी मुझे एक पैगाम नजर आता है -

जमाने के ग़म भूल वह ठहाका लगाता है
न जाने किस खोज में आँखें झपकाता है
बेशक वह चीखता और चिल्लाता है , फिर भी
दरिया-ए- अश्क़ में डूबे देखा क्या किसी ने उसे
दौलतमंदों के कदमों में दुम  तो ना हिलाता है
वह पागल है, तो इंसान किसे कहते है यारो...



Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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Tuesday, 4 September 2018

एक अकेला इस शहर में,आशियाना ढूँढता है

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मैं कुछ ठीक से समझ नहीं पा रहा हूँ कि ये यादों की पोटली मुझे संबल प्रदान करती है या जंजीर बन मेरे पांवों को जकड़े हुये है
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" एक अकेला इस शहर में,रात में और दोपहर में
 आब-ओ-दाना ढूँढता है, आशियाना ढूँढता है ।
जीने की वजह तो कोई नहीं, मरने का बहाना ढूँढता है ...
 
   मेरे पसंदीदा गीतों में से एक है यह। मन को बहलाने के लिये लाख प्रयत्न करूँ, फिर भी तन्हाई का भारी पड़ना तय है, ऐसे पर्व- त्योहारों पर। हाँ , यदि अध्यात्म एवं दर्शन शास्त्र में रूचि होती ,तो आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर निश्चित ही नटखट नंदकिशोर के कर्मयोग वाले पक्ष को आत्मसात करता। परंतु मैं तो उनके बालपन का अनुरागी हूं। सच कहूँ तो अपने बचपन में मैं जिस तरह से इस पर्व पर को लेकर उत्साहित रहता था और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता था, मुझे याद नहीं कि होली, दीपावली और दशहरे पर भी मुझे इतनी खुशी होती होगी।  यह मेरी ही जिद्द रही कि वहां बनारस स्थित अपने घर पर जन्माष्टमी सजने लगी। सारी जिम्मेदारी मेरी ही रहती थी, अन्यथा इससे पूर्व सिर्फ कृष्ण जन्म ही हुआ करता था। कोलकाता में जब मां के यहाँ था कृष्ण जन्माष्टमी पर कुछ खास नहीं होते देखा था। हाँ , मुजफ्फरपुर में जब मौसी जी के घर पर था, तो वहाँ जब संयुक्त परिवार रहा, तब सजावट भले ही नहीं होती थी, फिर भी प्रसाद बनते थें। मुझे तो सिंघाड़े का हलवा अतिप्रिय है , आज भी है,अन्तर सिर्फ इतना है कि मैं अपनी हर पसंदीदा सामग्रियों का त्याग करते जा रहा हूँ। जैसे, छोला- भटूरा , इटली- डोसा, आलू का पराठा एवं पूड़ी- कचौड़ी इत्यादि। यह हठ है मेरा कि जब आँखें बंद हो , उसमें खालीपन हो, कोई अभिलाषा शेष तब न हो, किसी को खोने का ग़म न हो, न ही किसी का इंतजार ही हो। पर जिसे त्याग नहीं पा रहा हूँ वह है यादों की पोटली । अटल जी की वो एक कविता है न कि
" क्या खोया, क्या पाया जग में,
 मिलते और बिछुड़ते पग में ,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में ,
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!"

मैं कुछ ठीक से समझ नहीं पा रहा हूँ कि ये यादों की पोटली मुझे संबल प्रदान करती है या जंजीर बन मेरे पांवों को जकड़े हुये है यह , ताकि सामने जो मुक्ति पथ दिख रहा है, मैं उस तक पहुँच ही ना पाऊँ एवं इसी भूलभुलैया मैं उलझा रहूँ। अभी पिछले ही दिनों राष्ट्र संत जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज के 51 वर्ष की अवस्था में निधन का समाचार सोशल मीडिया पर मिला। उनके कड़वे प्रवचन जीवन को दिशा देने वाले हैं। यहाँ मैं हूँ कि इंसान बनने की दिशा में पहले ही पायदान पर अटका फंसा पड़ा हूँ, जबकि अवस्था मेरी भी पचास की होने को है और शरीर भी तो रोगग्रस्त है। क्या पाया इस जीवन में व्याकुल हृदय सदैव प्रश्न करता है स्वयं से, तमाम प्रयासों के बावजूद मैं उसे रोक नहीं पाता हूँ। उसे समझाता हूँ कि

" कहाँ तक ये मन को अंधेरे छलेंगे,
उदासी भरे दिन कहीं तो ढलेंगे,
कभी सुख कभी दुख, यही ज़िंदगी हैं,
ये पतझड़ का मौसम घड़ी दो घड़ी हैं ..."

फिर भी यह जो मन है न, वह उपहास करता है मुझपर। तभी तो मुझे फिर से दशकों पूर्व घर का वो आंगन याद हो आया है। जहाँ मैं कृष्ण जन्माष्टमी की झांकियाँ सजाया करता था। छोटे भाई- बहन मेरा सहयोग करते थें। बुरादे को तरह - तरह के रंगों में रंगने का कार्य दो दिन पूर्व ही कर लेता था। खिलौने  हमारे पास कम नहीं थें। बड़े जतन से सभी को सुरक्षित रखता था। एक सुंदर सा पालना भी था, जिसकी सजावट मम्मी किया करती थीं, क्यों कि पूजन एवं मध्य रात्रि कृष्ण जन्म का कार्य वे ही सम्पन्न करती थीं।  मैं तो आजके दिन बिल्कुल बावला ही हो जाया करता था। सुबह आँखें खुलते ही कम्पनी गार्डेन भागा जाता था। उन दिनों पैसे उतने नहीं थें, अतः वहाँ से ही पुष्प और पेड़ की कुछ डालियाँ ले आया करता था। पहला कार्य मेरा एक बड़ा सा पहाड़ बनाने का होता था। जिसके  झाँवा ( भट्टे की पकी काली ईंट) कहाँ से लाता ।  कोलकाता में होता तो बाबा टोकरी भर खिलौना लाकर दे देते थें। लेकिन, बनारस में इतना खुशनसीब नहीं था, ना ही मेरी भावनाओं का कोई मोल था वहाँ , फिर भी न जाने क्यों कृष्ण जन्माष्टमी से एक लगाव था। ऐसे में पहाड़ बनाने के लिये मैंने एक विकल्प तलाश लिया था। छत पर पड़े ईंट और बांस के पतले टुकड़ों से पहाड़ का ढ़ाचा बनाता।उस पर सफेद चादर को डाल उसे पहाड़ की आकृति देता। लेकिन, हमें को हिमाचल पर्वत तो बनाना नहीं था। ब्रजमंडल में तो गोवर्धन है न। अतः मिट्टी, ईंट के चूर्ण , घास और पुष्प से उसकी सफेदी छिपा देता था। उस पर चीनी मिट्टी के भगवान शंकर विराजमान होते थें । जिनकी जटा से जल प्रवाह के लिये पाइप लगाने की व्यवस्था करनी पड़ती थी और वह पानी एक जलाशय में जाए उसका भी निर्माण करना होता था। फिर कारागार, कृष्ण दरबार और भी के खिलौनों के लिये उचित स्थान का चयन करता था। रात्रि में तब ताऊ जी भी आते थें। उन्हें इस तरह से मेरे द्वारा पहाड़ के निर्माण का तरीका पसंद था साथ ही जितनी सफाई से मैं लाल, हरे और पीले रंग वाले बुरादे से फर्श तैयार करता था, उसे देख वे मुझे पूरे अंक देते थें। सच कहूँ तो सजावट का मुझे बचपन से ही बेहद शौक था । दीपावली हो , जन्मदिन हो , सरस्वती पूजन हो या फिर रथयात्रा( कोलकाता में) यह जिम्मेदारी मेरी ही थी। विडंबना यह है कि अपने जीवन को खुशियों के रंग से नहीं सजा सका।  फिर भी प्रयास यह है कि इस जीवन अपने चिन्तन से , सुविचारों से, दूसरों के दर्द से, उनसे मिले स्नेह से एवं वैराग्य से सजाकर प्रस्थान करूं। अन्यथा अभी तो यह चंचल मन कभी-कभी यह पुकार उठता है-

" कोई नहीं है फिर भी है मुझको
 क्या जाने किसका इंतज़ार हो ओ ओ...
 ये भी ना जानूँ लहरा के आँचल
 किसको बुलाये बार बार..."


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Sunday, 2 September 2018

हार के ये जीवन , प्रीत अमर कर दी



तेरे मेरे दिल का, तय था इक दिन मिलना
जैसे बहार आने पर, तय है फूल का खिलना
ओ मेरे जीवन साथी...
   
      यौवन की डेहरी पर अभी तो इस युगल ने ठीक से पांव भी नहीं रखा था। वे पड़ोसी थें, अतः बाली उमर में ही प्रेम पुष्प खिल उठा। बसंत समीर को कितने ही महीने लगे होंगे इस पुष्प को खिलाने में ,लेकिन समाज के ताने, प्रेम के शत्रु , कहीं आश्रय न मिलने से पुनः वियोग के भय ने लू का झोंका बन उसे हमेशा के लिये जला कर राख कर दिया, वह भी इस पावस ऋतु में , यह कैसा मिलन हुआ इनका ।
      अपने जनपद में पिछले महीने की आखिरी तारीख को  बिजली के खम्भे से एक ही दुपट्टे से लटके इस युगल के चित्र  मोबाइल पर देख मन भर आया। अवस्था इनकी मात्र सत्रह-अठारह वर्ष ही रही होगी । ग्रामीण लड़का-लड़की थें, गरीब थें और स्वजातीय भी थें, फिर भी समाज और अभिभावकों को इनके मधुर संबंध पसंद नहीं थें। सो, दोनों परिवारों में तलवारें तन गयीं। तय हुआ कि दोनों ही परिवार अपने - अपने बच्चे पर कड़ाई से नियंत्रण रखेगा। लड़के को काम के बहाने पुणे उसके मामा के यहां भेज दिया गया । परंतु युवाओं का प्रेम तो अब मोबाइल फोन पर पलता-बढ़ता है। सात समुन्दर की दूरी ही क्यों न हो इनमें ,  फिर भी दो सच्चे प्रेमियों के दिल में एक जैसी तड़प बनी ही रहती है। कभी अनुभव किया क्या आपने भी जब प्रिय के वियोग, दिल यूँ पुकार उठता है -

दिन ढल जाये हाय, रात ना जाय
तू तो न आए तेरी, याद सताये
ऐसे में किसको, कौन मनाये...

   इसी बीच लड़के का पुनः अपने गांव पर आना होता है और फिर एक दिन  अपने प्रेम बंधन को अजमाने के लिये यह युगल साथ जीने- मरने का कसम ले घर से भाग निकलता है, इतनी बड़ी दुनिया में एक आशियाने की तलाश में , कितने ही हसीन ख्वाबों को संजोये हुये होगा यह मासूम युगल , कुछ ऐसा ही -

तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं
हो जहाँ भी ले जाएं राहें, हम संग हैं
ओ मेरे जीवन साथी…

  पर इन नादानों को क्या पता था कि दुनिया का रंग - रुप कैसा है और पैसा ही यहां किस्मत है। अतः जिस काल्पनिक प्रेम नगर के लिये वे अपना घर त्याग कर निकले थें, वह कहीं ना मिला। उधर, अभिभावकों का फोन लगातार आ रहा था। दबाव बढ़ते जा रहा था और भय भी , कहीं कोई आश्रय नहीं मिला। जेब खाली होने को था। लड़की के पर्स में मात्र 520 रुपये मिले और लड़के का एक मामूली कीपैड वाला मोबाइल फोन । यही इनकी जमापूंजी शेष रही। वे प्रेम के इस खेल में बाजी हार चुके थें, फिर भी जुदाई मंजूर नहीं थी। मां को आखिरी संदेश दिया था उसने की अब मुंह दिखलाने नहीं आऊँगी , फिर मोबाइल पर घंटी होती रही किसी ने नहीं उठाया , क्यों कि जहां वे पले बढ़े थें, जहां उन्होंने दो परिवारों के बीच की दीवार को फांदा था,  उसी गांव में प्रेम की बलिवेदी पर वे अपना प्राण न्योछावर कर चुके थें । इनका निष्प्राण शरीर बिल्कुल एक दूसरे के करीब था। मानों एक दूसरे से कह रहा हो यही कि

 तेरे दुख अब मेरे, मेरे सुख अब तेरे
लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा
आ के मेरे हाथों में, हाथ न ये छूटेगा
ओ मेरे जीवन साथी…

 हम पत्रकार हैं, अतः हमारे अखबारों के लिये प्रथम पृष्ठ का समाचार रहा यह। सो, अपनी सारी सम्वेदनाओं को ताक पर रख, घटनाक्रम को लेखनी से विस्तार देने में जुट गये। हमारे लिये यह कोई पहली दुखद घटना नहीं हैं। मधुर संबधों में प्रेमपथ पर चलने वाले कितने ही युगल की कहानी हमने लिखी होगी। पर अब  जबकि पत्रकारिता से एक पायदान और ऊपर आ चढ़ा हूं, तो हमारी चिन्तन शक्ति हृदय की भावनाओं को कलमबद्ध करने को मचल रही है। अतः स्वयं से फिर से यह प्रश्न पूछ रहा हूँ कि जीवन के इस वरदान को यूँ ही नष्ट कर देना कितना उचित है ? वहीं मेरे जैसा भावुक एवं सम्वेदनशील व्यक्ति ऐसे प्रेम को हेय दृष्टि से देख भी नहीं सकता है। अपने प्रेम के लिये जीवन न्योछावर करने का सामर्थ्य क्या हर किसी में होता है ? भला अपने प्राण किसे प्रिय नहीं है। अब प्रश्न यह है कि फिर ऐसे प्रेमी युगल द्वारा आत्महत्या कर लेने की घटना को हम- आप और हमारा यह सभ्य समाज किस नजरिए से देखे । इसे अमर प्रेम समझ कर नमन करे अथवा इनके इस प्रेम को शारीरिक आकर्षक बता , इस नादानी के लिये इनकी मृत आत्माओं को धिक्कारे , पर कब तक  ? मन की विकलता सवाल पर सवाल दागे जा रही है। जवाब की खोज में जैसे ही अपने पत्रकार मित्र प्रभात जी के कार्यालय पर बैठा आत्मचिंतन कर ही रहा था कि कामरेड सलीम भाई आ गये एक प्रेस विज्ञप्ति लेकर । वे प्रखर वक्ता हैं एवं अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक भी। आते ही उन्होंने भी यही प्रश्न किया कि शशि भाई ! प्रेम के प्याले को विषाक्त करने वालों का अस्तित्व क्या कभी समाप्त नहीं होगा ? प्यार के दुश्मनों के पाषाण हृदय में सम्वेदनाओं का अंकुरण किस तरह से हो। क्या प्रतिउत्तर देता उन्हें मैं, जिस प्रेम को पाने, उस पर बलात् अधिकार  एवं उसे मिटाने के लिये इंसान अपनी हर सीमा तोड़ता आ रहा हो। बोझिल मन से कार्यालय से नीचे उतर ही रहा था कि सामने पड़ गये भवन के स्वामी से दो बातें मेरी इसी विषय पर हो गयी। उन्हें भी यह सुनकर कष्ट हुआ। धनिक और सभ्रांत परिवार से होकर भी गृहस्वामी का कहना है कि अपने बच्चों की खुशी के लिये हमें अपनी सोच बदलनी होगी । जीवन अनमोल है यह जानते हुये भी हम अभिभावक अपने अहंकार , अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा एवं जातीय भावना का त्याग नहीं कर पाते, परिणाम प्रत्यक्ष है। उन्होंने कहा कि चार लड़के हैं उनके,सभी से कह रखा हूं कि यदि कभी अपना दिल कहींं लगा बैठे, तो यह न समझना कि तुम्हारा पिता राह रोके खड़ा मिलेगा। वह समाज का हर ताना सह लेगा,लेकिन तुम जान की बाजी मत लगा लेना। ये बच्चे भी यूँ न टूट चुके होते , यदि उनका सही मार्गदर्शन होता। मृत्यु को गले लगाने से कुछ घंटे पूर्व तक वे अपने अभिभावकों के सम्पर्क में थें , फिर भी यह विश्वास उन्हें कोई नहीं दिला सका कि अब तुम्हें जुदाई  नहीं सहन करनी पड़ेगी। वैसे तो आज के बच्चे जिस प्रेम पथ पर चल रहे है, वह उनके लिये मृगमरीचिका है। जो अवस्था शिक्षा पाने के लिये बनी है। स्वयं को गृहस्थ जीवन के योग्य बनाने के लिये बनी है। उसका किस तरह से ये दुरुपयोग कर बैठ रहे हैं। पर इसके लिये यह परिवेश दोषी है। फिर भी हम यदि हठ करेंगे, तो प्रेम की गली में मौत की यह दस्तक कोई नयी बात तो नहीं है ! इसकी तो बस एक ही रीत है-

न उमर की सीमा है न जनम का है बंधन
 जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन...


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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धन्यवाद
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Thursday, 30 August 2018

तुम मुझे यूँ समझ ना पाओगे



जाने वालों ज़रा, मुड़ के देखो मुझे
एक इन्सान हूँ मैं तुम्हारी तरह
जिसने सबको रचा, अपने ही रूप से
उसकी पहचान हूँ मैं तुम्हारी तरह ...

       कभी आपने अपनी गलियों में या फिर सड़कों पर बिखरे कूड़ों के ढ़ेर में से कबाड़ बटोरती महिलाओं को देखा है , नहीं देखा , तो दरबे से बाहर निकलिए। समाज के निचले पायदान पर खड़े लोगों की तस्वीर जरा करीब से देखिये न मित्रों ! कल्पनाओं में इन पर रचनाएं न लिखें । पहले इनसे जुड़े जो कबाड़ी को बेचने योग्य कुछ वस्तुओं को अपनी बड़ी सी झोली में घंटों इधर- उधर घुम टहल कर समेटती रहती हैं। उनके बच्चे भी कुछ ऐसा ही करते हैं। यह हमारी शाइनिंग इंडिया की एक अलग तस्वीर है।इनकी भी अपनी दुनिया है। ये कोई भिक्षुक नहीं हैं और न ही मैं इनकी गरीबी को यहां फोकस करना चाहता हूँ। मैं तो इनके स्वाभिमान का कायल हूँ । मौसम चाहे जो भी हो,जिस तरह से मैं अपनी ड्यूटी का पक्का हूँ , उसी तरह से ये भी पौ फटने से काफी पूर्व ही अपने कार्य में तल्लीन मुझे दिखती हैं। बस हमारे उनमें अंतर इतना ही रहता है कि मुझे गलियों में अवारा कुत्ते तंग नहीं करते और उन्हें वे अंधकार में संदिग्ध समझ दौड़ा लेते हैं, उनकी झोली को देख कर । ये कुत्ते भी कितने पाजी होते हैं आज कल के, चोर इनके सामने से ही तर माल गटक कर चला जाता है, फिर भी वे तनिक ना गुर्राते हैं। याचकों की टोली देख कर भी वे मौनव्रत तोड़ते नहीं, लेकिन जैसे ही कूड़ा बिनने वाले किसी बच्चे को अकेले देख लेते हैं, बस फिर क्या मोर्चाबंदी कर लेते हैं, वैसे ही जैसे ईमान के पक्के किसी व्यक्ति की घेराबंदी इस जुगाड़ तंत्र में होती है। इसके बावजूद ये बहादुर बच्चे अपनी बोरी को इस तरह से चहुंओर घुमा कर उन्हें पास नहीं आने देते , मानो वह उनका सुदर्शन चक्र हो। मैं भी कभी-कभी ठिठक कर कुत्तों और इन बच्चों का संघर्ष देखता हूं। हालांकि मेरे आने पर अकसर ही कुत्ते भाग खड़े होते हैं। भोर में हम दोनों का अपना मौज है,  इन खाली पड़ी अंधकार भरी सड़कों पे। सो, थोड़ा मुस्कुरा उठता हूं, जब कानों में लगा ईयरफोन कुछ यूं सुनाता है-

ये ना सोचो इसमें अपनी
हार है कि जीत है
उसे अपना लो जो भी
जीवन की रीत है
ये जीवन है
इस जीवन का
यही है, यही है, यही है रंग रूप
थोड़े ग़म हैं, थोड़ी खुशियाँ
यही है, यही है, यही है छाँव धूप...

  हाँ, प्रातः भ्रमण करने वालों की दखलअंदाजी होती रहती है। सच कहूं, तो सड़कों पर कबाड़ बिनने वालों के प्रति मेरा अपना नजरिया है। मुझे इन्हें देख गर्व महसूस होता है कि हम दोनों ने ही किसी के समक्ष हाथ नहीं फैलाया है। बस फर्क इतना हैं कि मैं जब अखबार बांट रहा होता हूं, तो ये फटे- चिथड़े अखबार सड़कों पर से बिन-बटोर रहे होते हैं। कितने निश्छल हैं ये बच्चे , इस बनावटी- दिखावटी दुनिया से बिल्कुल अलग। क्या आपने कभी इनके चेहरे पर उदासी देखी है। इन्हें बीमार पड़ता भी मैंने नहीं देखा है ।  अपने देश में इन दिनों  स्वच्छता अभियान को लेकर क्या-क्या नहीं हो रहा है। बड़े राजनेता और अधिकारी तक झाड़ू थामे फोटो शूट करवा रहे हैं। मानों फैशन शो के माडल हो एवं रैम्प पर अपना जलवा बिखेर रहे हों। फिर भी वे जब तब अस्वस्थ हो ही जाते हैं। लेकिन, गंदगी के ढ़ेरों में पलने- बढ़ने वाले इन बच्चों को देखिये तो जरा , प्रकृति ने किस तरह से इनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति मजबूत कर रखी है। यदि स्वाभिमान की बात करूं तो हम ढ़ूढ़ते रह जाएंगे फिर भी इनमें से किसी बच्चे को किसी गैर के समक्ष हाथ फैलाते कभी नहीं देखेंगे। ये तो स्वयं ही अपने अभिभावकों को सहारा देते हैं। ये निठल्ले नहीं हैं ,उन पढ़े लिखे बेरोजगार युवकों की तरह जो अपने खून पसीने की  कमाई खाने की जगह जरायम की दुनिया में पांव रख देते हैं। ये लोग उन सफेदपोशों की तरह भी नहीं है, जो गरीबी हटाओ या फिर अच्छे दिन लाने का बस वादा ही करते रहते हैं, ना ही  समाज सेवा के नाम पर जनता का पैसा डकारने वाले जनसेवक हैं वे। ये ना ही सफेद खादी के पोशाक में लकदक हैं । वे तो मैले-कुचैले वस्त्र पहने मिलते हैं , अपने नगर की गलियों में, फिर भी वह दागदार नहीं है । ऐसी ही महिलाएं और उनके बच्चों की टोली को मैं अकसर ही अपने मुसाफिरखाने के सामने सड़क उस पार हंसी ठिठोली करते देखता हूं। सभी सामने की दुकान से चाय संग बिस्कुट खाते दिखते हैं, क्यों कि सुबह के सात बजते- बजते इनकी झोली में जो कुछ आया ,वहीं इस दिन की उनकी कमाई है। दिन में वे इसे किसी कबाड़ी को बेच देंगे। वैसे, इन दिनों इनके हाथ कुछ तंग हैं, कारण यह है कि  प्लास्टिक की थैलियों सहित बहुत सी अन्य सामग्री पर सरकार ने प्रतिबंध जो लगा दिया है। बस दुख मुझे इस बात का है कि ये बच्चे पढ़े लिखे नहीं हैं । ये बेईमानों को भी साहब कह कर बुलाएंगे। वैसे तो कोई बड़ी डिग्री मेरे पास भी नहीं है। लेकिन, मैंने अपने परिश्रम से इसकी कमी पूरी की है। सो, आज अनेक लोग मेरे लिये  सम्मान सूचक सम्बोधित का प्रयोग करते हैं । वे मुझसे चाहते हैं कि समाज की सही तस्वीर हम प्रस्तुत करें। अतः ऐसे लोगोंं के और कुछ न कर सकते हो यदि हम , तो इतना तो दुआ कर ही सकते हैं इनके लिये कि

मंज़िल न दे चराग न दे हौसला तो दे,
तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे...

         हम एक पत्रकार हैंं  , इसीलिये हमारा लेखन कार्य चुनौतियों से भरा होता है। हमें कल्पनाओं की उड़ान भरने की अन्य रचनाकारों की तरह अनुमति नहीं है। हमें तो धरातल पर पांव टिका कर अपनी बातों को पूरे प्रमाण एवं तार्किक ढ़ंग से  पाठकों के समक्ष रखना होता है।  सत्य को सामने लाने की हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। ऐसे में हम अच्छे रचनाकार किस तरह से बन सकते हैं। पत्रकारिता में हमें तो भूत और वर्तमान को ध्यान में रख कर ही भविष्य पर अपने विचार रखने की शिक्षा दी गयी है। हां, अब पेड न्यूज का जमाना है। सो, हमारी लेखनी भी जब तब फिसलती रहती है। कभी संस्थान के लिये, तो कभी अपने लिये , हमलोग अनाड़ी को खिलाड़ी बना कर अखबारों के कालम रंगा करते हैं। लेकिन, यह ब्लॉग एक दर्पण है मेरे लिये, अतः मेरी जो सम्वेदनाएँ हैं, भावनाएं हैं वे जज़्बाती न हो, इस पर सदैव ही मैं अंकुश लगाते रहने का प्रयास करता हूं। अपने अंधकारमय जीवन में प्रकाश के लिये एक दीपक की तलाश में हूं, जो कभी मेरे बिल्कुल करीब होता है , तो कभी दूर जाता दिखता है। मानो लुकाछिपी खेल रहा हो मुझसे ,कुछ इस तरह से यह भी ...

 ये पल पल उजाले, ये पल पल अंधेरे -
 बहुत ठंडे ठंडे, हैं राहों के साये
 यहाँ से वहाँ तक, हैं चाहों के साये -
 ये दिल और उनकी, निगाहों के साये -
 मुझे घेर लेते, हैं बाहों के साये...

यह लेख मेरा उन जेंटलमैनों (भद्र पुरुष)के लिये है , जो ऐसे स्वाभिमानी बच्चों को देख न जाने क्यों नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं। मैं जानता हूं आप उनमें से नहीं हैं। एक सच्चे रचनाकार का सम्वेदनशील हृदय सदैव जो भावनाओं से भरा होता है।


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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Monday, 27 August 2018

अपने पे हँस के जग को हँसाना, ग़म जब सताये सीटी बजाना

     
परिश्रम यदि हमने निष्ठा के साथ किया है, तो वह कभी व्यर्थ नहीं जाता। भले ही कम्पनी की नजरों में हम बेगाने हो, तब भी समाज हमारे श्रम का मूल्यांकन करेगा। किसी को धन , तो किसी को यश मिलेगा ।

****************

      मिसाइल मैन डा0 एपीजे अब्दुल कलाम का एक सदुपदेश पिछले दिनों सोशल मीडिया पर पढ़ा था। जैसा की मेरी आदत है कि मैं हर नसीहत को अपनी कसौटी पर कसता, तौलता और परखता  हूं , तब उस चिन्तन को आगे बढ़ाता हूं।  यहां मुझे अपनी गलतियों का एहसास  हुआ है , लेकिन देर हो गयी है मुझसे । लिहाजा, कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी ! फिर भी पथिक को सम्हलना, चलना एवं मंजिल तक पहुंचना ही है । सो,

ग़म जब सताये, सीटी बजाना
पर मसखरे से दिल न लगाना
कहता है जोकर सारा ज़माना
आधी हक़ीकत आधा फ़साना
चश्मा उतारो फिर  देखो यारों
दुनिया नयी है चेहरा पुराना

    इस मन को बहलाने का यह मेरा अपना अंदाज है, आप सभी का कुछ न कुछ होगा , पर मेरा एक ही तो है, इस जहां में  मित यह जोकर। कुछ साथी कहते हैं कि तुम कुछ अच्छा लिख सकते हो, कोशिश तो करो ?  लेकिन मैं ऐसा नहीं  सोचता। यह सांप- सीढ़ी का खेल मुझे नहीं खेलना। जिन गीतों के सहारे मैंने कितनी ही तन्हाई भरी रातें गुजारी हैं। लेखन कार्य के दबाव में मैं उस वफादार दोस्त को क्यों छोड़ दूं। परखे हुये हमदर्द की उपेक्षा कर किसी नये व्यक्ति/ वस्तु की चाहत कभी नहीं करनी चाहिए हमें। यह कटु अनुभव है मेरा। अतः ब्लॉग पर जो कच्चा - पक्का ( अपनी बात ) लिखता भी हूं , तो यह सोच कर नहीं कि वह किसी को पसंद आया, नहीं आया, कमेंट बाक्स में प्रतिक्रिया आई की नहीं आई । बस मन की भावनाओं को व्यक्त कर देता हूं। रेणु दी का यह सुझाव मुझे अच्छा लगा कि सप्ताह में दो- तीन पोस्ट बहुत है, मेरे स्वास्थ्य एवं कार्य के लिहाज से । ब्लॉग की दुनिया में उन्हीं की प्रेरणा से मैं चंद कदम चल पाया हूं एवं यहां स्नेह भी आप सभी का मिला है, नहीं तो यह सफर अधूरा रह जाता।अखबार के लिये रोजाना पांच-सात घंटा समाचार संकलन एवं लेखन के लिए चाहिए। सच कहूँ तो भागदौड़ भरी दुनिया का यह मेला कितना अजीब है मुझ अकेले इंसान के लिये यहां तो, -

धक्के पे धक्का, रेले पे रेला
है भीड़ इतनी पर दिल अकेला
अपने पे हँस कर जग को हँसाया
बनके तमाशा मेले में आया

मेरे भाई !  इस दुनिया में इन सभी गम से एक साथ मुस्कुरा कर संघर्ष करना पड़ता है। अन्यथा हमारा मुहर्रमी चेहरा भला किसे पसंद आएगा। लोग मनहूस पत्रकार जो कहेंगे। फिर भी जब हम एकाकी हैं ,  स्मृतियां अठखेलियाँ करेंगी ही। मैं अपनी बात कहूं, कोई तीन दशकों से भटकती आत्मा ही तो हूं, वहां से यहां तक घुमता फिर रहा हूं। मैं सब कुछ देख रहा हूं। भले ही मुझे बहुत कम लोग देखे-समझ पाते हो । हां, इस दौरान कभी- कभी थोड़ी खुशियाँ आ भी गयी थीं इस जीवन में,जो दर्द एवं तन्हाई दे गयीं , ऐसे में  इन्हीं गीतों के गुलदस्ते ने अनेकों बार मेरे हृदय के जख्म को भरा है। अत्यधिक काम के बोझ तले मैंने जीवन की सबसे बड़ी गलती की है । जो मुझे स्नेह करते थें , उनके लिये मेरे पास समय जो नहीं था। सदैव अपनी कक्षा  में अव्वल रहा , परिश्रमी रहा, कभी घबड़ाया नहीं , उसी शख्स को निठल्ला कहलाने के भय, काम के प्रति मोह , अति उत्साह और भूख ने कितना निष्ठुर बना दिया था । अपनो के यहां शहनाई बजी या अर्थी सजी, ऐसे हर्ष एवं विषाद के अवसर पर उसमें शामिल होने के लिये  क्यों तनिक भी वक्त नहीं रहा मेरे पास ? फिर क्यों न तब मैंने अपने ललाट पर गुलाम होने का ठप्पा ही लगवाया था या छोड़ा क्यों नहीं यह काम । आत्मग्लानि तो नहीं महसूस करता न अपने देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के इस सदुपदेश को पढ़ कर । पिछले कुछ दिनों से मेरा ही मन मुझे ही धिक्कार रहा है। मैं उसे किस तरह से समझाऊँ कि ढ़ाई दशक के मेरे इतने कठोर संघर्ष पर यूं उपहास तो न करों। काम की आपाधापी में कभी इस विषय पर मैं गंभीर हुआ ही नहीं।
          आप भी यदि नौकरी पेशे में हैं तो ठहर कर  डा0 कलाम के इस संदेश पर गौर करें, उन्होंने कितनी साफगोई से  लिखा है कि आप अपने कार्य से प्यार करें, कम्पनी से नहीं, क्यों कि आपको नहीं मालूम कि कम्पनी कब आपको प्यार करना छोड़ देगी। आगे यह भी लिखा है कि समय से कार्यालय छोड़े, क्यों कि कार्य एक कभी समाप्त न होने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने कहा है कि जब कभी आप जीवन में निराश होंगे तो आपका बॉस नहीं , बल्कि आपका परिवार और मित्रगण आपकी सहायता के लिये आगे आएंगे।कहा है कि जीवन निरर्थक न बनाएं, समाजिकता, मनोरंजन, आराम एवं  अभ्यास के लिये भी समय हो। उन्होंने कहा है कि जीवन को यंत्र / मशीन  बनाने के लिये कठिन अध्ययन एवं कड़ा संघर्ष नहीं किया है हमने। मिसाइल मैन ने जो चेतावनी दी है , अपने जीवन संघर्ष की कसौटी पर मैंने उसे अक्षरशः सही पाया। इसीलिये जीवन में पथ प्रदर्शक का होना आवश्यक है।  मैंने उस रंग मंच का चयन किया था। जहां सप्ताह में एक भी दिन अपने लिये नहीं मिलता था। यह तो अब दो- ढ़ाई वर्षों से रविवार का अवकाश मिल रहा है। नहीं तो सुबह से दोपहर तक समाचार संकलन और लेखन, फिर बंडल लेने जिले से बाहर पहले वाराणसी फिर औराई जाना , चौराहे पर डेढ़-दो घंटे खड़ा रहना , देर शाम सवारी वाहन की तलाश , पुनः मीरजापुर आ कर रात्रि  में अखबार का वितरण करना एवं करवाना । पूरे 6 बजे सुबह से रात्रि 10 बजे की ड्यूटी रही मेरी। आप ऐसे समझ लें कि जिस दिन सायं मेरे मौसा जी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हुई। मुजफ्फरपुर से बहन का फोन आने के बावजूद बस से अखबार का बंडल उतारने के लिये औराई चौराहे पर इस तरह से  डटा खड़ा था, मानों सीमा पर मोर्चा सम्हाले खड़ा हूं। इसके पहले उसकी शादी में भी नहीं गया था मुजफ्फरपुर। यह तो एक बानगी है, मैंने जीवन में अपनी खुशियों के सारे अवसर अखबार के कार्य में गंवा दिये। फिर भी यह दर्द बना रहेगा मुझे कि जब मेरे ऊपर संकट आया तो कितनी मदद मिली संस्थान से ? हालांकि कलाम साहब के इस चिन्तन में मैं एक छोटा संशोधन करना चाहूँगा कि परिश्रम यदि हमने निष्ठा के साथ किया हो, वह कभी व्यर्थ नहीं जाता। भले ही कम्पनी की नजरों में हम बेगाने हो, तब भी समाज हमारे श्रम का मूल्यांकन करेगा। आज इस शहर में कितने ही आम और खास लोग , जिन्होंने सड़कों पर मेरे श्रम को देखा है, वे मुझे स्नेह देते है, सम्मान देते हैं और पहचान भी देते हैं। मेरा एक पैगाम  सदैव उनके लिये रहा है-

हिन्दू न मुस्लिम, पूरब ना पश्चिम
मज़हब है अपना, हँसना हँसाना
कहता है जोकर सारा ज़माना …

 इसलिये न मुझे फासिस्ट पसंद हैं , न सेकुलर ठेकेदार। ये राजनीति के शब्द हैं, आम आदमी के नहीं। सत्ता पाने के लिये  कोई कट्टरपंथी तो कोई उदारवादी मुखौटा पहन लेता है। जिस दिन आप भी इसे समझ लेंगे, दूरियां मिट जाएंगी इस समाज में।  मैंने समझा है, इन पच्चीस सालों में इसीलिये किसी भी धर्म एवं जाति के प्रति कोई दुराग्रह नहीं है मेरे हृदय में ।  एक रचनाकार, एक पत्रकार, एक सच्चा  जनसेवक बनने लिये यह प्रथम सीढ़ी है हमारी कि हम सबके हैं और सभी हमारे हैं । आम चुनाव सामने हैं, जिसमें सदैव हम प्रबुद्धजनों की अहम भूमिका रहती है साथ ही जुगाड़ तंत्र के विरुद्ध शंखनाद का अवसर भी।

Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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Friday, 24 August 2018

ज़िंदा हैं जो इज़्ज़त से वो, इज़्ज़त से मरेगा

सुबह सड़कों पर जीवन संघर्ष दिखता है

 इबादत, समर्पण और कर्मयोग दिखता है
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दुनियाँ में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा
जीवन हैं अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा
गिर गिर के मुसीबत में संभलते ही रहेंगे
जल जाये मगर आग प़े चलते ही रहेंगे....

  मदर इंडिया फिल्म का यह गीत जीवन का संघर्ष, नियति के समक्ष पराजय न स्वीकार करने की जंग है।  जब  सुबह सूर्योदय से पूर्व हममें से अनेक लोग मीठी नींद में सोये होते हैं। तब हमारे घर के बाहर सड़कों पर एक कठिन जीवन संघर्ष दिखता है। बूढ़े बाबा नूर मोहम्मद गरीबी की मार से जिनका कमर टूट चुका है। वे लाठी के सहारे आगे की ओर झुके- झुके ही सही धीरे- धीरे पैरों को खिसकाते हुये खुदा की इबादत में मस्जिद को ओर बढ़ते दिखते हैं ।  पक्के नमाजी हैं वे । नमाज़ पढ़के वापसी के समय मेरी उनकी मुलाकात अकसर ही संदीप भैया की दुकान के बाहर सवा पांच बजे के आसपास हो जाती है।  उनकी बूढ़़ी आंखों में अब वह नूर नहीं है। वक्त की मार जो उनपर ऐसी पड़ी है कि कालीन , दरी और बीड़ी बनाने में हाड़तोड़ परिश्रम के बावजूद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति डांवाडोल है। स्वास्थ्य साथ छोड़ रहा है। लेकिन, वे अपने कर्म पथ से तनिक भी डिगें नहीं हैं। मैं उन पर एक लेख भी लिखा था। ऐसे शख्स मुझे बहुत पसंद है। जो जीवन के कठिन दौर में भी अपने पथ डटे रहते हैं । पुत्र की वर्षों पूर्व मौत हो गई तो क्या हुआ, उस दर्द को सीने में दबाये अपनी विधवा पुत्रवधू सहित पूरे परिवार का खर्च अपने इन्हीं बूढ़े कंधों पर उठाया है उन्होंने, बिना टूटे हुये । मौसम कोई भी , स्वास्थ्य जैसा भी हो और हालत घर का कैसा भी हो, फिर भी भोर में अपने घर से निकल पड़ते हैं इबादत खाने की ओर। मानो हम सभी को यह पैगाम दे रहे हो कि

  मालिक हैं तेरे साथ ना ड़र, गम से तू ऐ दिल
   गम जिस ने दिये हैं वो ही गम दूर करेगा

   फिर मैं जब कुछ आगे बढ़ता हूं, तो बूढ़ेनाथ मंदिर के सामने एक ऐसे वृद्ध व्यक्ति को देखता हूं , जो अपने पैरों के बल पर खड़े होने की स्थिति में अब नहीं है। सो, वे वाकर के सहारे मंदिर से लेकर कुछ दूर सड़क तक का सफर तय करते हैं । घर के बाहर चबूतरे पर बैठे-बैठे ही करीब एक घंटे तक हाथ- पांव हिलाते रहते हैं। उन्हें कभी परिवार के सदस्य को पुकारते मैंने नहीं देखा, ना मदद मांगते ही । शारीरिक लाचारी  को अपनी कमजोरी मानो उन्होंने कभी समझा ही नहीं, एक बहादुर योद्धा की तरह वे इस अपंगता जैसी कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं।  मैंने मंदिर के आगे शीश झुकाया हो या नहीं यहां, फिर भी इस संघर्ष पुरुष के समक्ष नतमस्तक हूं। किस तरह से धीरे- धीरे वे स्वतः ही अपने शरीर की मालिश करते हैं। अपने हर अंग को धीरे - धीरे हाथों से करीब घंटे भर मलते ही हैं। मैं तो अपलक उन्हें निहारता रह जाता हूं। बिल्कुल दुर्बल शरीर है, फिर भी स्वस्थ रहने की इच्छाशक्ति दृढ़ है। वैसे, मार्ग में मुझे बहुत से ऐसे बुजुर्ग और प्रौढ़ दम्पति भी दिखते हैं, जो टनाटन हैं , हंसी- ठिठोली आपस में किये रहते हैं। खुदा उनपर मेहरबान है। वजन घटाने के लिये कम अवस्था की एक लड़की अकसर ही पुरानी अंजही मुहल्ले की दिख जाती है, मेरी राह मैं। मुझे कुछ हंसी सी आ जाती है, इतनी कम आयु में ऐसे भारी भरकम लोगों को देख कर । यह लड़की भी आमलेट, मोमो, मैगी, चाट और गोलगप्पे खूब खाती थी। पर अब निश्चित ही पछतावा हो रहा होगा उसे। सो, सुंदर काया पाने के लिये उसका भी संघर्ष मैं सुबह देखता हूं। लेकिन, मुझे तकलीफ दो तरह के लोगों को देखकर होता है। पहला कोई ऐसा वृद्ध जो शारीरिक रुप से कमजोर है, फिर भी रिक्शा खींचे जा रहा होता है और दूसरा वे कुछ लड़के- लड़कियां जो घर से निकलते तो हैं कोचिंग पढ़ने जाने के लिये, परंतु कान से उनका सेलफोन सटा होता है। यह कैसा प्रेमपाश है इनका , जो एक दूसरे के भविष्य को अंधकारमय किये हुये हैं। वो बैराग फिल्म का गीत है न कि

" छोटी सी उमर में लग गया रोग , कहते हैं लोग मैं मर जाऊंगी "

    गर्दन से ऊपर के हिस्से कपड़े से लपेटे और उसी के अंदर मोबाइल दबाये ये लड़कियां आखिर क्या संस्कार लेकर बाबुल के घर विदा लेंगी ? किसी भी नारी संगठन ने इस पर तनिक भी विचार नहीं किया है और इससे अधिक हम कुछ कह भी नहीं सकते हैं। लड़के तो पहले ही इस खेल में बर्बाद हैं । सो, एक उम्मीद रहती थी कि शादी के बाद उसका घर संवर जाएगा, पर अब तो दोनों के अपने- अपने यार हैं  ! हां, कुछ ऐसे भी बदनसीब नजर आते हैं, जो आंखें खुलते ही मदिरालय का द्वार खटखटाने पहुंच जाते हैं।पता नहीं कहां से पैसा जुटा लाते हैं या बीवी- बच्चों का पेट काट लाते हैं।

     हां, एक संघर्ष मेरा भी तो सुबह रहता  है अब , चाहे शरीर हां कहे अथवा ना , फिर भी सप्ताह में छह दिन ठीक चार बजे उठना है। शौच- स्नान करके पांच बजे मुकेरी बाजार चौराहे पर खड़ा हो जाता हूं, इस प्रतीक्षा में कि जीप अखबार का बंडल लेकर आती ही होगी। अभी तीन दिनों पहले जब मलेरिया वाली वहीं पुरानी शारिरिक तकलीफ फिर से सर्दी-जुखाम एवं बुखार के बाद उभर आई,  मांसपेशियों और सिर में दर्द से बेचैन हो उठा, तो कुछ चिन्तित हो गया था कि किसी तरह से तो चिरायता मिश्रित काढ़ा पीकर मैंने इसपर कुछ नियंत्रण पाया था, अब फिर से कौन सी दवा तलाशी जाएं। सो, ऐसा लगा कि वर्ष 1999 से जिस असाध्य मलेरिया से पीड़ित हूं , कहीं उसकी दोस्ती अबकि और महंगी तो नहीं पड़ेगी। खैर काढ़ा एक बार की जगह तीन बार ले रहा हूं और स्वयं को कुछ ठीक महसूस कर रहा हूं। यह मेरा संघर्ष ही कि इस स्थिति में भी सुबह ढ़ाई घंटे मुझे आप मीरजापुर की सड़कों और गलियों को साइकिल से नापते हुये भी देखिएगा। ज्वर और दर्द चाहे कैसा भी क्यों न रहा हो , इन ढ़ाई दशकों में अपने इस होमवर्क से पीछे नहीं हटा। अब तो ऐसे कर्मयोगी बुजुर्गों को देख मेरे आत्मबल में कहीं अधिक वृद्धि हुई है। पर अभी थोड़ा ऊपरवाले से खटपट चल रहा है मेरा, सो मैं उसे अजमा रहा हूं और वह मुझे। इसीलिये तो मैं उसके चौखट पर दस्तक नहीं दे रहा हूं। उसे पुकार भी नहीं लगा रहा हूं। मेरे ढ़ेरों सवाल है बचपन से लकर युवाकाल के, मैं जवाब चाहता हूं उससे, पर वह भी तो कुछ पूछना चाहता हो मुझसे ? सो, पता नहीं मैं उसके कटघरे में खड़ा हूं, या वह मेरे। यह तो आमना-सामना होने पर ही पता चलेगा। फिर भी मुझे किसी की गुलामी कुबूल नहीं। चाहे वह खुदा हो या इस धरती का बादशाह । मैं बराबरी चाहता हूं किसी का दरबार नहीं। उसे याद होगा कि बचपन में मैंने उसकी किस तरह से सेवा किया करता था। पर मां(नानी) सहित उसने मुझसे  हर वह चीज छीनी है, जो मुझे प्रिय थी। अतः

 मैं तो वह मुसाफिर हूं, जो रस्ते में लुटा हूं ।
 ऐसे न दीप कभी किसी दिल का बुझा हो...

    अब इस बीमार शरीर पर क्या जोर लगाओगे ?  खुद्दारी मेरी फिर भी नहीं खरीद पाओगे। मैं नहीं जानता कि यह कैसा मेरा पागलपन है, परंतु ओ मुझे अजमाने वाले,  तुम भी कभी फुर्सत में  यह सोचोगे कि किस माटी के पुतले को गढ़ा है। हां , एक एहसान तुम मुझ पर करना कि मेरे इस स्वाभिमान को बनाये रखना।  न धन मिला, ना ही रोटी, कपड़ा और मकान ठीक से। जवानी यूं ही गुजर गई, न बीवी- बच्चे मिलें। एक स्वास्थ्य बचा था, तो उसे भी 19 वर्ष पूर्व छीन लिया। फिर भी शिकवा नहीं तुमसे, न कोई शिकायत है। जो संघर्ष करता हूं , यह तुमसे छिपा नहीं है। फिर तुम्हारे दरवाजे पर जा क्यों दूं दस्तक। सो, दोस्ती फिल्म का यह गाना मैं तुम्हें सुनाता हूं-

चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे
फिर भी कभी अब नाम को तेरे
आवाज़ मैं न दूंगा.. आवाज़ मैं न दूंगा
मितवा मेरे यार तुझको बार बार
आवाज़ मैं न दूंगा..

   वैसे,चाहूं तो मैं भी बैठ के भोजन कर सकता हूं। लेकिन, जिस निठल्ले होने का कलंक मुझ पर लगा था और मैं सब कुछ छोड़ घर से निकाल था। फिर से वह न कहलाऊँ, इतना मेरा ख्याल रखना। राह अभी लंबी है, मंजिल भी दूर है। इस पथिक की व्याकुलता पर दुनिया हंसे चाहे जितनी , पर तुम न उपहास करना।  प्यारे ! बस इस संघर्ष पथ पर इतना ही तुमसे चाहता हूं-

 " ज़िंदा हैं जो इज़्ज़त से वो, इज़्ज़त से मरेगा "

Tuesday, 21 August 2018

साथी हाथ बढ़ाना ... एक अकेला थक जाएगा , मिलकर बोझ उठाना



Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (साथी हाथ बढ़ाना ... ) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन
संवेदनाएं समाज की मरी नहीं हैं, वह गुमराह है क्यों कि नाविक सही नहीं है

 पत्रकारिता में अपनों द्वारा उपेक्षा दर्द देती है, लेकिन गैरों से मिला स्नेह तब मरहम बन जाता है
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आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
तीर-ए-नज़र देखेंगे
ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे
     
    विषय गंभीर है। हम पत्रकारों से जुड़ा है।यह जख्म भी हमारा है और यह दुआ भी हमारी है। पत्रकारिता में कभी- कभी ऐसी स्थिति आ जाती है कि हम  चाहे कितने भी कर्मठ पत्रकार हो, स्वाभिमानी हो, ईमानदारी से और पवित्रता के साथ अपनी लेखनी का  प्रयोग किये हो , फिर भी किसी ऐसे मोड़ पर जब हम टूट जाते, बिखरने लगते हैं, स्वयं को प्रभावशाली पत्रकार समझने का हमारा दर्प भी जाता रहता है और यह मन हाहाकार कर उठता है कि दशकों के परिश्रम का क्या यही परिणाम कि जिस संस्थान के लिये हमने अपना घर- परिवार , अपना यौवन और अपना जीवन सब कुछ दांव पर लगा दिया। उसी की नजरों में हम बेगाने से हैं। ऐसे संकटकाल में  जब हम बिस्तरे पर पड़ जाते हैं, तो अखबारों के पन्ने पर तब हमारी कोई खोज- खबर नहीं होती , जबकि हम हर एक की खबर खोज - खोज कर लिखते रहें । वहीं  जब हम जीवन- मृत्यु से संघर्ष करते हैं,  तो सबकुछ दांव पर लगाने के बावजूद बड़े अखबारों को  हमारे फोटो , हमारे नाम तक से परहेज रहता है।  हमें एक पत्रकार ( न हमारा नाम नहीं , ना ही उस समाचार पत्र का जिसके लिये हम काम करते हैं) लिखते , क्या इन समाचार पत्रों के स्वामी यह जतलाना चाहते हैं कि तुम हमारे कोई भी नहीं। आखिर क्यों वह संवेदना हमारे प्रेस के मालिकानों में तनिक भी नहीं होती है, जैसा हम अपने संस्थान के लिये सदैव करते रहे हैं । जबकि अस्पताल में  हमें देखने कितने ही विशिष्ट जन आते हैं । वे सिर्फ सम्वेदना जताने ही नहीं आते हैं ,वे समारा सहयोग भी करते हैं। पर जिनका बस्ता हमने वर्षों ढ़ोया , वे कहां गये ? ऐसे में हृदय का ताप और भी बढ़ जाता है। वह मौन रुदन बन जाता है।  नम आंखें जो दास्तां बयां करती हैं, खामोश जुबां पर जो शब्द होते हैं , उस पत्रकार के ...

नादान ……नासमझ …….पागल  दीवाना
सबको  अपना  माना  तूने  मगर  ये  न  जाना …
मतलबी  हैं  लोग  यहाँ  पैर  मतलबी  ज़माना
सोचा  साया  साथ  देगा  निकला  वो  बेगाना
बेगाना …….बेगाना ….
अपनों  में  मैं  बेगाना  बेगाना

         कुछ ऐसा ही तो होता है न ?  यहां मैं कि किसी एक पत्रकार की बात नहीं कर रहा हूं। हममें से बहुतों के साथ ऐसा होता ही रहा है। श्रमिक पत्रकार जो ठहरे हम , यूं भी कह लें कि हर क्षेत्र में कुछ ऐसा ही होता है। वफादारी की इतनी कीमत इस जुगाड़ तंत्र में चुकानी ही पड़ती है।  ऐसे में तब बस एक ही भरोसा होता है, वह है हमारी दुआ। हमारे शुभचिंतकों का स्नेह एवं हमारे मित्रों का कर्तव्य हमें नवजीवन  देता है । यदि हम किसी कारण पहले की तरह स्वस्थ्य नहीं भी हुये, तो भी हममें इतना आत्मबल तो निश्चित ही विकसित हो जाता है कि हम मृत्यु को एक बार पुनः ललकार सकते हैं और अपनी लेखनी को पहले से कहींं अधिक समाज को समर्पित कर सकते हैं। ठोकर खाने के बाद हमारे पांव अब धरातल पर होता है, ऐसे में हम दिवास्वप्नों में ही उलझे नहीं रह जाते हैं। जिन्होंने हमें स्नेह दिया , नवजीवन दिया,  उनकी छवि हमें प्राणी मात्र में दिखने लगती है। यही तो जीवन का लक्ष्य होता है न मित्रों ? अपने पत्रकारिता समाज पर एक बार फिर बहुत कुछ लिखना चाहता हूं, मन का वर्षों पुराना दर्द विस्फोट करने को है, पर क्या मिलेगा इससे। हमारे एक बड़े भाई जो ढ़ाई- तीन दशक से पत्रकारिता के प्रति समर्पित रहे हैं, करीब 18-20 दिनों से अस्पताल के बेड पर पड़े रहें । पुलिस एवं अपराध से जुड़ी खबर की जानकारी उनसे बेहतर तो इस जनपद में किसी के पास नहीं रहती। सो, उनकी तूती बोलती थी। लेकिन, जब वे बिस्तर पर गिरे , तो  उन्हें उठाने कौन आगे आया , जानते हैं  आप ? हमारे जैसे साथी पत्रकार  के अनुरोध पर यह समाज ही आगे आया। यह वही समाज है जिसे हम अकसर बेगाना कहते रहते हैं, लेकिन वह तो अपना निकला। सच तो यह है कि संवेदनाएं हमारी मरी नहीं है, बस वह इस जुगाड़ तंत्र की शिकार हो गई है, कुंठित हो गई है और राह भटक गई है।
      सोशल मीडिया पर उनके लिये सहयोग की अपील करने में ही हाथ कांप उठा था मेरा उस दिन , क्यों कि अस्पताल के वार्ड में बेड पर पड़े वरिष्ठ पत्रकार मित्र की आंखों में एक दर्द निश्चित ही रहा, कितनों का उन्होंने इसी अस्पताल में इलाज करवाया था और आज वे असहाय से निढ़ाल पड़े थें। फिर ठान लिया हम साथियों ने कि अब कुछ करना है और सोशल मीडिया पर मैंने यह पोस्ट किया कि
  " साथी हाथ बढ़ाना ... एक अकेला थक जाएगा , मिलकर बोझ उठाना "
   फिर क्या था  दुआओं का असर दिखा । जनप्रतिनिधियों , समाजसेवी जनों एवं आम आदमी  तक ने हम पत्रकारों के लिये संकटमोचन की भूमिका निभाई। सो, पर्याप्त धनराशि और चिकित्सकीय व्यवस्था हो गई। यही हमारी कमाई है कि यदि सहयोग के लिये  पुकार लगते ही समाज आगे आता है। भले ही संस्थान आये ना आये। पर यह याद हम पत्रकारों को भी सदैव रखना चाहिए कि हमारी लेखनी संस्थान की ही गुलामी न करती रहे , उसे जनहित में चलनी चाहिए। अपनी बात कहूं, तो जब अपनो ने निठल्ला सम़झ कर बेगाना बना दिया था, कोई तीन दशक पहले। जब अपना स्वयं का घर होने के बावजूद रेलवे स्टेशन की कुर्सियों पर रातें गुजारीं , तब भी अपना यही समाज ही तो आगे आया मेरे लिये भी । था क्या मैं इस अनजाने शहर में, एक बंजारा ही न ? पर किसी ने भोजन दिया, तो किसी ने रहने का ठिकाना, मान मिला , पहचान मिला । आज भी इन्हीं स्नेही जनों के कारण  ही रोटी और मकान की मेरी व्यवस्था है। वे जानते हैं कि मैं समाज की सम्पत्ति हूं, उनका धन हूं।  उनका मेरी प्रति यह जो विश्वास है न , वह किसी खजाने से कम नहीं है मेरे लिये ।अन्यथा वर्ष 1999 में जब मामूली सा सर्दी-जुखाम  मेरे लिये घातक मलेरिया रोग में बदल गया। जो आज तक इस दुर्बल शरीर को पीड़ा दिये ही जा रहा है  आज तो काफी तकलीफ में रहा ।  सो, अकसर ही मन को समझता हूं कि देखो साथी हो सकता है कि हमने जाने- अंजाने में हमने कोई बड़ा पाप किया हो, किसी की बद्दुआ ली हो, तभी यह मामूली सा रोग नासूर बन बैठा है। फिर भी इतना तो तय है कि कुछ अच्छे कार्य मैंने भी निश्चित ही किये हैं  कि मेरा जीवन, मेरी लेखनी एवं मेरा चिंतन उचित मार्ग पर है। अपनी चदरिया में जो दाग लगा है, उसे यहीं प्रायश्चित से पवित्र करना है। सत्य के मार्ग पर चलना है। कोई न कोई मददगार आएगा, इतना विश्वास रखना होगा हमें। इसलिये जो कष्ट आया है, हे मन ! उसे सहर्ष स्वीकार कर लो , मेरा अब लगातार यही एक प्रयास चल रहा है। माना कि मैं अब कभी स्वस्थ नहीं हो सकता , फिर भी औरों के लिये कुछ कर तो सकता हूं । ऊपरवाले का यह रहम क्या कम है ? यह भी तो हमें स्मरण रहना चाहिए कि...
      मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है।
      जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है।

    इसलिये बिना किसी शिकायत के हमें अपना सामाजिक उत्तरदायित्व पूरा करना चाहिए , ताकि यह कहते हुये इस खुबसूरत जहां से विदा ले सकें...

     रहें ना रहें हम, महका करेंगे ,
     बन के कली, बन के सबा, बाग़े वफ़ा में ।

Friday, 17 August 2018

बाधाएं आती हैं आएं, कदम मिलाकर चलना है



अटल जी ऐसे राजनेता रहें , जिनका कर्मपथ अनुकरणीय है। उनके सम्वाद में कभी भी उन्माद की झलक नहीं दिखी
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राजनीति की यह दुनिया जहां मित्र कम शत्रु अधिक हैं । उसमें ऐसा भी एक मानव जन्म लेगा, जिसके निधन पर हर कोई नतमस्तक है। यह भी एक आश्चर्य से कम नहीं है । क्यों कि उसने इंसान को इंसान बनना सिखलाया है-

पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी
ऊंचा दिखाई देता है।
जड़ में खड़ा आदमी
नीचा दिखाई देता है।
आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है,
न बड़ा होता है, न छोटा होता है।
आदमी सिर्फ आदमी होता है।

     यह उस शख्स की कविता की पंक्तियां हैं ,जो अब हमारे बीच  नहीं रहा। लेकिन, इस जहां से कूच करने से पहले उसने उसने अपने - पराये सभी का दिल जीता था। वह एक आदमी से ऊपर उठ कर महामानव बना था। जब वह भारत का प्रधानमंत्री बना था। देश की जनता को उस पर विश्वास था कि उसकी नाव (राष्ट्र) कुशल खेवनहार के हाथों सुरक्षित है। जिसके हृदय एवं वाणी में जाति- धर्म की बू नहीं हैं। वह नाविक जो  निःसंकोच यह उद्घोष करता हो -

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

     अतः यह सत्य है कि राजनीति के पटल पर अजातशत्रु कहलाने वाले भारत रत्न  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसा व्यक्तित्व विरले ही किसी को प्राप्त होता है इस जगत में। मेरे पिताजी जिन्हें राजनीति में कोई रुचि नहीं थी, यदि बनारस में अटल जी की जनसभा होती थी, तो उनका प्रयास रहता था कि वे भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाएं। यहां बात उस समय की है , जब जनसामान्य के घरों में टेलीविजन नहीं हुआ करता था। मुझे स्वयं अटल जी के बाद किसी अन्य राजनेता का भाषण  सुनने में कोई रुचि नहीं है।  लेकिन पत्रकार जो हूं, इसलिये बड़े राजनेताओं की जनसभा में समाचार संकलन के लिये तो जाना ही पड़ेगा। यदि कथनी एवं करनी में फर्क हो तो फिर भला ऐसे राजनेताओं की बातों को सुनने में क्यों अपना समय व्यर्थ किया जाए। टेलीविजन पर ऐसे डिबेट कार्यक्रम मुझे तनिक भी पसंद नहीं है। यहां मछली बाजार जैसा दृश्य और शोर है।  सो, टेलीविजन नहीं देखने के कारण भले ही देश - दुनिया के समाचार मेरे पास विलंब से पहुंचते हो। फिर भी  झूठ की इस सियासी दुनिया से बच के निकल ले रहा हूं, यह क्या कम है।
           जहां तक मेरा मानना है कि यह ठीक है कि हर कोई महान नहीं बन सकता है,पर वह इंसान निश्चित ही बन सकता है। अपने मोहल्ले एवं गली का लाल तो कहला ही सकता है। हां,  इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये भी  एक आदर्श ( पुरुष / स्त्री )  को दर्पण की तरह अपने सामने रखना होगा। ताकि जब भी हमारा अहंकार जागृत हो, किसी उलझन का सामना करना पड़े, चकाचौंध भरे इस जगत और जुगाड़ तंत्र के प्रति आसक्ति का भाव उत्पन्न हो, तब हम अपने विचलित मन को सावधान कर सके। जैसे मैं करता हूं , जब कभी मेरे मन में यह भाव आता है कि क्यों यह सादगी भरा जीवन व्यतीत कर रहा हूं। पहचान वाला पत्रकार हूं , इसीलिये सामने इस कलयुग का स्वर्ण कलश है। जुगाड़ मेरा भी कोई कम नहीं है,  फिर भी सादगी की प्रतिमूर्ति बनने में जुटा हूं ?  इस समाज के उपहास से , या फिर षड़यंत्र के मकड़जाल जाल से जब मन अत्यधिक वेदना से भर उठता है। तो पांव स्वतः ही उसी दलदल के समीप जाने को मचलते हैं। जिसमें ढ़ेरों लोग पहले से ही फंसे हैं। ऐसे में किसी महामानव की वाणी गूंजती है कानों में-

जन्म-मरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहां, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,

      हर एक शब्द का अपना अर्थ है। सो, पथिक चौक उठता है, जीवन के सत्य का उसे अहसास होता है  और व्याकुलता का हरण होता है। मैं ईश्वर को नमन करूँ ना करूँ ? पर  गांधी और शास्त्री जी की सादगी के समक्ष अपने इस अभिमानी शीश को  निश्चित ही झुकाता हूं। उसे बताता हूं कि तुम्हारा हर त्याग इनके समक्ष तुक्ष्य है।  इसलिए कहना चाहता हूं मित्रों , भाइयों और बहनों कि यदि आप राजनीति के गलियारों से निकल कर सत्ता के चौखट पर पहुंच गये हो। तो " अटल " बनो। एक कुशल बाजीगर भी मजमा जरूर लगा सकता है। वह जनता को भरमा कर सत्ता का ताज  पहन सकता है।  पर पर्दे का राज बाहर आने  का भय उसे सदैव ही बना रहता है। इसलिये वह जुमलेबाजी करता है , मनमानी करता है और जनता से ताली बजवाते रहता है।  लेकिन जब भी एक सच्ची और अच्छी कविता के इन शब्दों-

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है

  से उसका जुमला टकराता है। तो फिर सारा स्वांग वहीं स्वाहा हो जाता है।
                   एक बाजीगर एक तानाशाह चाहे,जितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाएं , फिर भी मृत्यु के पश्चात वह अटल तो नहीं ही हो सकता है। तब उसका कूटजाल  टूट चुका होता है, फिर कब्र में अकेले वह पड़ा होता है। वहीं , राजनीति के काजल की कोठरी में भी जो बेदाग ही रहता है, वहीं तो  "अटल " होता  है।  उसमें ही मृत्यु को ललकारने का सामर्थ्य है-

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?
और
ठन गई !
मौत से ठन गई है...

    जब तीसरी बार गठबंधन वाली उनकी सरकार बनी, तो प्रतिपक्ष ने पुनःउपहास किया था। लेकिन उस बार कुछ ऐसे डटे रहे " अटल " कि फिर कोई यह नहीं  कहता है तभी से  किसी से कि गठबंधन की सरकार टिकाऊ नहीं होती  है।  उनकी यह गर्जना-

अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

आखिरकार सार्थक हुई। उनके कार्यालय की स्वर्णिम चतुर्भुज  सड़क परियोजना एक मिसाल है। लेकिन दुर्भाग्य देखें की  कि अब तो चहुंओर नई सड़क गड्ढ़े वाली का शोर है। भ्रष्ट तंत्र की भुलभुलैया में ईमान राह भटक रहा है। स्थिति कुछ ऐसी हो गयी है अब  -
 
बिना कृष्ण के,
आज महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|
 
     स्थिति चाहे जैसी भी हो, पर याद रखें कि हैं तो हम माटी के पुतले ही। एक समय ऐसा भी आता है, जब शरीर साथ छोड़ने को होता है, हम अपनी ही पहचान भूलने लगते हैं। तब हमारा व्यक्तित्व एवं कृतित्व हमारी पहचान कराता है। हमारे क्षणभंगुर जीवन को चिरंजीवी बनाता है।


Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (बाधाएं आती हैं आएं, कदम मिला कर चलना है ) आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 
धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन
बहुत बहुत धन्यवाद, इस उत्साहवर्धन के लिये । शब्द नगरी परिवार को
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