Followers

Sunday, 10 February 2019

मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को...

ऐसी वाणी बोलिए ...
*****************************
मैं तो कहूँगा कि अपने दर्द को लेखनी बना लो, यह तुम्हारा सच्चा साथी है ।  जब भी मन में भावनाओं का उफान हो, हृदय की वेदना किसी को पुकार रही हो, उसे शब्द देना सीखो । तुम जितना ही उसमें डूबोगे, उतना ही उसका स्नेह तुम्हारे प्रति बढ़ता जाएगा।
*****************************
बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देवी मे
मूढत्वं च हरेर्देवि त्राहि मां शरणागतम्

( अर्थ- हे देवि ! आप मुझे बुद्धि दें, कीर्ति दें, कवित्वशक्ति (सुमधुर वचन) दें और मेरी मूर्खता का नाश करें । आप मुझ शरणागत की रक्षा करें ।)

        सरस्वती पूजन का पर्व था कल । छात्र जीवन की अनेक स्मृतियों का बस यूँ ही स्मरण हो आया।   तब मैं पुरानी रद्दी सामग्रियों के साथ में कुछ न कुछ प्रयोग किया करता था । जिसे देख जब यह कहा जाता था कि वैज्ञानिक बनेगा  तू , तो मुझे बड़ी खुशी मिलती थी । परंतु ऐसा हुआ नहीं, अपनों की उस वाणी ,उस आशीर्वाद के मध्य कटुता की दीवर खड़ी हो गयी ।

   उस वृद्ध बाबा की वाणी को भला अब भी कहाँ भूला हूँ।  उस रात  मैं हाईस्कूल बोर्ड की परीक्षा की तैयारी कर रहा था, गणित के सवालों में उलझा हुआ था, कमरे की बिजली देर तक जलती देख वे मेरे पास आये थें, उनके पदचाप को मैं सुन न सका, परंतु वे मुझे बड़े ही ध्यान से देख रहे थें। परिवार के सभी सदस्य निंद्रा देवी के आगोश में थें, फिर भी मैं लकड़ी के उसी छोटे से मेज पर कापी- किताब फैलाये हुआ था।
   वृद्ध बाबा ने मुझे तनिक टोका, ऐसा लगा कि मेरे अध्ययन कार्य से खुश थें। सम्भवतः इसीलिए उन्होंने मेरी हस्तरेखा देखने के लिये दायां हाथ आगे करने को कहा। उनके सम्मान में मैंने ऐसा किया भी, जबकि इन रेखाओं के खेल में मुझे कभी रूचि नहीं थी और आज भी नहीं है । उन्होंने मेरे हाथ पर खींची रेखाओं को देखा और फिर धीमे स्वर से कहा कि इतना परिश्रम काहे कर रहा है तू देर रात तक,तेरे नसीब में विद्या नहीं है। गांव के एक अनपढ़ वृद्ध व्यक्ति के इस भविष्यवाणी पर तब हँसी आयी थी , जब हाईस्कूल बोर्ड की परीक्षा में गणित में मुझे सौ में से 98 अंक मिलें।
   लेकिन इसके बाद ही किस्मत की रेखाओं का खेल शुरु हो गया ।  विद्या की नगरी काशी से मेरा संबंध टूट गया।  आज पत्रकारिता क्षेत्र में होने के कारण अनेक विद्वानों के संग हूँ ,फिर भी विद्या के उस वरदान से वंचित रह गया , जिसकी चाहत छात्र जीवन में थी। तब समझ में आया कि उस बाबा के जिह्वा पर सरस्वती बैठी थीं , जो मुझे दंडित कर रही थीं, परंतु क्यों , किसलिये , मेरा अपराध क्या था, इसलिए कि मैं एक शिक्षक का पुत्र था, विद्याध्ययन के प्रति समर्पित था ?
  सवाल चाहे जितना भी हम करते रहें, परंतु नियति किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं देती है।
  याद है कोलकाता में एक बार माँ ने नाराजगी भरे स्वर कहा था -
  " मुनिया , तंग कर ले जब नहीं रहूँगी तब समझेगा "
  जो माँ सदैव मुझे स्नेह देती थी , क्षणिक क्रोध में उनकी वाणी का व्यापक प्रभाव पड़ा मेरे जीवन में ।

     सलिल भैया का सबक है कि जिह्वा सरस्वती का घर है और झूठ जिह्वा का कूड़ा है । जहां कूड़ा रहता है वहां इंसान नहीं बैठ सकता तो माँ  सरस्वती कैसे बैठेगी ? अतः जो जितने समय झूठ बोलता है तत्काल उतने समय जिह्वा से सरस्वती विदा हो जाती हैं । इसके अलावा गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है- चरित्र से दूषित, फरेबी, तिकड़म से साधन और शक्ति सम्पन्न व्यक्ति की प्रशंसा करने से सरस्वती नाराज होती हैं । 'कीन्हे प्राकृत जे गुन गाना, ता धुनि लागि गिरा पछिताना'-मानस, बालकांड,11वीं चौपाई ।
    ऐसे में सरस्वती जब नाराज होती हैं तो उस व्यक्ति के घर से बाहर चली जाती हैं। उसकी आने वाली पीढ़ी मूर्ख, आलसी, उद्यम विहीन तथा अन्यान्य दोषों से भर जाती है । सरस्वती की कृपा के लिए अपने से बड़ी उम्र के किसी व्यक्ति को अनर्गल अपमानित नहीं करना चाहिए । बल, धन, पद और रुतबे के चलते अपमानित और आहत करने से सरस्वती को पीड़ा होती है । संत कबीर ने भी तो यही कहा है -

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।

       मानव प्रवृत्ति पर एक महात्मा जी का प्रवचन सुना था। वे बता रहे थें कि दो गुण एक साथ नहीं टिक सकते हैं। उन्होंने "सत्य" और "शील" का उदहारण दिया।
  शीलवान व्यक्ति यह प्रयत्न करता है कि वह प्रिय बोले। कोई अप्रिय बात अथवा निर्णय हो ,तो वह टालने लगता है। वहीं सत्यवादी व्यक्ति निःसंकोच कड़ुवा सत्य प्रकट कर देता है। जैसे उक्त वृद्ध बाबा ने मेरी शिक्षा के संदर्भ में कहा था ।
        महात्मा जी का कहने का तात्पर्य यह था कि मानव में सारे गुण एक साथ नहीं हो सकते हैं। यह तो मेढ़कों की तौल है। अतः विवेक से आवश्यकतानुसार निर्णय लेना चाहिए।

           सरस्वती पूजन की प्रथम धुंधली सी स्मृति कोलकाता के उस इंग्लिश स्कूल की है, जब मैं शिशु कक्षा का छात्र था। इसके पश्चात दार्जिलिंग की पहाड़ियों पर सरस्वती पूजन के पंडालों को प्रथम बार देखा था। कोलकाता में और फिर वाराणसी में घर पर इस अवसर पर पंडाल आदि की सजावट मैं ही करता था। मुजफ्फरपुर में मौसी के घर अन्य लड़कों के साथ सजावट का अवसर एक वर्ष मुझे मिला। सफेद कागज पर नीले रंग से आकाश जैसा दृश्य मुझे उपस्थित करना था।
सरस्वती देवी की तस्वीर अथवा मूर्ति के समक्ष पुस्तक और कलम को हम सभी रख देते थें। आज के दिन पठन- पाठन का कार्य नहीं किया जाता था।
      छात्र जीवन की ये सारी खुशियाँ न जाने कहाँ चली गयीं । मैंने जितने भी वर्ष जहाँ - जहाँ पंडाल सजाएँ हैं, वे सारे आशियाने फिर से याद हो आये हैं।  कल एकांत में बैठा उन सुखद स्मृतियों को बोझिल मन से टटोल रहा था। रविवार होने के कारण कुछ फुर्सत में जो था। न कोई साथी न मनमीत संग था।
      सिलसिले फिल्म के इस गीत की चंद पक्तियों को गुनगुना रहा था -

कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे कहें हम
 कब तक यूँ ही खामोश रहें, और सहें हम
मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं..

   जब दर्द हर पैमाने को पार कर जाता है, तन्हाई अंतहीन हो जाती है ,साथी जो राह में मिले,वे सपने हो जाते हैं,वेलेन्टाइन डे जैसे पर्व उपहास उड़ाते हैं । जीवन के हर मोड़ पर किसी को आवाज दे देकर हृदय की वेदना आँसुओं की झड़ी लगाये रहती है। गीत के वो बोल हैं न -

मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा
मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने

       तब चेतना कहती है कि आवाज देकर इस लौकिक जगत में किसी को भी न पुकारो । जब दर्द ही तुम्हारी किस्मत है,तो उस पर स्नेह का मरहम भला कौन लगाएगा  , बार बार यूँ दोस्ती का हाथ मत बढ़ाया करों, यह साथ टिकता नहीं।

  सरस्वती के यदि उपासक रहे हो , तो मौन हो जाओ, चिन्तन करो और फिर अपनी लेखनी को शब्द दो। वही तुम्हारा साथी है, मनमीत है। अपनी तन्हाई को औरों के हवाले न करो,वहाँ उपहास मिलेगा, सहानुभूति मिलेगी , कुछ दिनों के लिये तुम्हारे दर्द को बांटने का प्रयास भी कोई उपकारी जन कर सकता है। लेकिन, एक दिन जब तुम्हें आभास होगा कि कच्चे धागे ( सम्बंध) के रिश्ते के समक्ष  तुम्हारे निश्छल स्नेह का कोई मोल नहीं ,तब ?
    ऐसे में इंसान के कदम जब लड़खड़ाते हैं, इस तन्हाई से बचने के लिये वह किसी मादक द्रव्य का साथ पकड़ लेता है। परंतु मैं तो कहूँगा कि अपने दर्द को लेखनी बना लो, यह तुम्हारा सच्चा साथी है ।  जब भी मन में भावनाओं का उफान हो, हृदय की वेदना किसी को पुकार रही हो, उसे शब्द देना सीखो । तुम जितना ही उसमें डूबोगे, उतना ही उसका स्नेह तुम्हारे प्रति बढ़ता जाएगा। यह सच्चा प्रेम ही तुम्हें उस अलौकिक जगत का आभास कराएगा, जहाँ तुम्हारा एकांत  आनंद बन जाएगा , फिर अन्य की प्रतीक्षा कहाँ रहती है ,क्यों कि हम स्वयं ही सृजन करने में समर्थ होते हैं।
   सो, क्यों न इस हृदय के इस दर्द की वीणा को लेखनी के माध्यम से स्वर दिया जाए-

मेरी ज़िन्दगी में वो ही गम रहा
तेरा साथ भी तो बहुत कम रहा
दिल ने, साथी मेरे, तेरी चाहत में थे
ख्वाब क्या क्या बुने
मैं तो हर मोड़ पर...


Friday, 8 February 2019

नजरों में कैसी समायी ये दुनिया

नजरों में कैसी समायी ये दुनिया
**********************

नजरों में कैसी समायी ये दुनिया
पलकें उठा कर बिजली गिराती

 उमड़ते  अरमानों को है जलाती
निगाहों में यादें बसाती ये दुनिया

इंसानों को ठगती ,हैवानों को भाती
अपनी सी लगती ,मगर गैर होती

निगाहों में जिसके नहीं है ठिकाना
उम्मीदों के दीपक जलाती बुझाती

रिश्तों में उलझा - सताती ये दुनिया
किस्तों  में दिलको जलाती ये दुनिया

ये सिक्के और पायलों की खनखन
बहका के क्यों बहलाती ये दुनिया

किसी को हँसी दे रुलाती है दुनिया
नजरों में उठा के गिराती है दुनिया

वफाओं को  निगाहों से गिरा के
कातिलों सी  मुस्काती ये दुनिया

सिसकती है यादें सताती है दुनिया
हँसी लबों  की  चुराती  ये  दुनिया

पनाहों में लेकर  - ठोकर क्यों देती
किसी को बसंत किसी को सर्द देती

मुहब्बत का पैगाम सुनाती ये दुनिया
चिता फिर उसकी सजाती ये दुनिया

बुझी राख को सहलाती ये दुनिया
नजरों में कैसी समायी ये  दुनिया

अपने ये जो आँसू खिलते कमल हैं
इसे न सूखा दो ये प्यारी सी दुनिया।

-व्याकुल पथिक







    

नज़र हम पर भी कुछ डालो


नज़र हम पर भी कुछ डालो

*********************

अंधेरे में जो बैठे हैं
नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रोशनी वालों...

     दुनिया का यह विचित्र मेला , थकान भरी अनजान राहें, बोझिल मन और अपनों को ढ़ूंढती निगाहें -

हमारे भी थे कुछ साथी,
हमारे भी थे कुछ सपने
सभी वो राह में छूटे, वो
सब रूठे जो थे अपने..

 जिधर भी देखों नजरों का ही खेल है, इनमें मोहब्बत है या साजिश, इसकी परख भी कहाँ आसान है । जब सपने टूटते हैं, अपने नहीं मिलते हैं ,तो फिर से रोशनी वालों को पुकारता है यह मासूम हृदय , ताकि वह पुनः छला जाए । विवेक यही तो उलाहना देता है न कि यूँ निगाहें उठा-उठा कर क्यों इंतजार कर रहे हो किसी अपने का, अभी और फिसलने का इरादा तो नहीं  ..?

   सम्बंध फिल्म के इस दर्द भरे गीत का अंत भले ही सुखद रहा हो , परंतु वास्तविक जीवन में ऐसा ही हो , इसकी कोई गारंटी नहीं। नजरों पर भावना, विवेक, प्रेम , सम्वेदना, धर्म और कर्म किसी का भी पहरा नहीं रह गया है। विचित्र  बदलाव हो गया है , इंसान की निगाहों में ? 

   उक्ति है न कि कहीं पर निगाहें , कहीं पर निशाना ।

 राजनीति जगत में ऐसा ही हो रहा है। सियासी बिसात पर गजब का दांव चलते हैं, हर इलेक्शन से पूर्व ये राजनेता। गृद्ध दृष्टि की तरह नजरें उनकी वोटबैंक पर रहती है, जिसके लिये जुबां से न जाने कितने झूठे वायदे करना पड़े, साम्प्रदायिकता , जातिवाद और आरक्षण का मीठा जहर घोलना पड़े।
     छात्र जीवन में मंडल और कमंडल की राजनीति और पीएम की कुर्सी पर बैठने वाले एक शख्स को जनसभाओं में  जेब से चुटका निकालते देखा था। नजरें जनता की उसी चुटके पर गड़ी होती थी। इस चुटके ने दिल्ली का तख्तोताज दिला दिया। आरक्षण की आग ने कई राज्यों में जातिवादी राजनीति को शीर्ष पर पहुँचा दिया, पर चुटका कहाँ खो गया ? सिंहासन से जब वे नीचे उतरे और सितारा गर्दिश में  था, तो यहाँ  विंध्य धाम में एक डाकबंगले पर पत्रकार वार्ता में मुझे भी उनसे सवाल-जवाब का अवसर मिला था।
    याद है कितने ही युवक आरक्षण की आग में उनके ही कारण जल मरे थें, लेकिन वे भी कहाँ अमर रहें। मौत की नजर में राजा -रंक सब समान है। सो, वे भी लाइलाज़ बीमारी के शिकार हो गये । तमाम राजनेताओं की जयंती  मानायी जाती है , परंतु उनके चित्र पर कितने लोग माल्यार्पण करते हैं ?
     अब तक जितने भी राजनैतिक जुमले रहें, उन पर "अच्छे दिन आने वाले हैं"  यह नारा भारी रहा।
    वो कहते भी हैं कि अच्छे दिन आ गये हैं। अंतरिम बजट में देखें किसानों, श्रमिकों और मध्यवर्गीय लोगों को हमने खुशहाल कर दिया। इन रहनुमाओं की नजरें कब हम जैसे निम्न मध्यवर्गीय लोगों पर उठेगी। जिनकी मासिक आमदनी  5 से 6 हजार रुपया प्रतिमाह है, क्या उनके सपने नहीं हैं। वे कैसे चला रहे हैं  घर- गृहस्थी। अपने देश के  तमाम बेरोजगार नौजवान कब तक यह पुकार लगाते रहेंगे-

कफ़न से ढांक कर बैठे हैं
हम सपनों की लाशों को
जो किस्मत ने दिखाए
देखते हैं उन तमाशों को
हमें नफ़रत से मत देखो
ज़रा हम पर रहम खा लो...
 
  अच्छे दिन की यह अन्तहीन प्रतीक्षा कब तक करता रहेगा, यह वर्ग। जो शिक्षित है, संस्कारिक है, दायित्व बोध भी है , उसमें। फिर भी इस वर्ग की कुंठा पर , उनकी पीड़ा पर और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं पर निगाहें किसी भी रहनुमा की नहीं उठती। बजट में इन बदनसीब युवाओं के लिये ऐसा कोई सम्मानजनक काम कब होगा , जो इन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए ?
     एक और प्रश्न जो जनता को स्वयं से पूछना चाहिए कि उनके नजरिए से  किसी राजनैतिक दल विशेष को वोट दिया जाए अथवा एक योग्य प्रत्याशी का चयन किया जाए । लोकतंत्र में यही सबसे बड़ी कमजोरी है जनता की , वह दल , धर्म और जाति की राजनीति को प्रमुखता देती रही है। जो व्यक्ति उसके दुख- दर्द में वर्षों से साथ रहा, निस्वार्थ भाव से सामाजिक कार्य करता रहा, फिर भी मतदान के दिन उसकी ओर नजर उठा कर न देखना , वहीं ऐसा प्रत्याशी जिसे जनता जानती भी न हो,जहाँ से वह चुनाव लड़ रहा है वह उसका कर्मक्षेत्र भी न हो साथ ही कोई सामाजिक सारोकार न हो, इस जुगाड़ तंत्र में किसी प्रमुख राजनैतिक दल से टिकट लेकर आ गया हो, मतदाता इस बात को जानते हुये भी दलगत राजनीति से ऊपर नहीं उठते , ऐसे भ्रष्ट प्रत्याशी को वे अपनी नजरों से गिराते नहीं ,तो परिणाम जगजाहिर है। किसी के ईमान को , काम को, सेवा को  यदि हम अपनी निगाहों में महत्व नहीं देंगे , तो फिर बड़े बैनर की ललक में भ्रष्ट, अपराधी और सर्वथा अयोग्य व्यक्ति को जनप्रतिनिधि चुनते रहेंगे। जनता को यदि रौशनी चाहिए ,तो  उनपर नजर डालनी होगी, जिन्हें उसने अंधेरे में बैठा रखा है। फिर वह यह नहीं कहेगी -

उत्तर ,दक्षिण, पूरब
पश्चिम
जिधर भी देखो मय
अंधकार...

  एक नया शब्द इन दिनों प्रचलित है गोदी मीडिया। चौथे स्तंभ से पिछले 26 वर्षों से जुड़ा हूँ। इस नगर के प्रमुख सामाजिक -राजनैतिक कार्यकर्ताओं से ही नहीं आम जनता से भी अपना दुआ- सलाम है। परंतु जनपद स्तरीय पत्रकारिता में  आठ- दस हजार रुपया वेतन भी प्रतिमाह कुछ ही पत्रकार पाते हैं,जो प्रमुख समाचार पत्रों से जुड़े हैं। ग्रामीण क्षेत्र की पत्रकारिता में वह भी नहीं है।  मेरे जैसे पत्रकार जो मझोले अखबारों से जुड़े हैं , अपने वेतन से वे अपने कमरे का किराया ही दे पाएँगे ,यदि बीवी- ,बच्च़े साथ हो। फिर हम ईमानदारी का बस्ता कब तक ढ़ोते रहेंगे। हमारी परिस्थितियों पर क्या कभी किसी की नजर गयी ? ढ़ाई दशक इस शहर में गुजार दिया हूँ। किसी ने आज तक नहीं पूछा कि शशि भाई पैसे की व्यवस्था कहाँ से करते हो। वहीं जिन्होंने अर्थयुग की महत्ता समझ अपना नजरिया बदला ,वे गोदी मीडिया बन  हर सुख- सुविधा का लुफ्त उठा रहे हैं। मेरे पास भी यह अवसर था। जनता बताएँ कि हम दिन - रात उसकी सेवा में थें, सच लिखने पर धमकियाँ भी मिली और षड़यंत्र के तहत गोदी मीडिया वालों ने हमें मुकदमे आदि में फंसवा भी दिया। कितनों को तो उसके संस्थान से भी वे निकलवा देते हैं। तो जिस जनता के लिये हमने संघर्ष किया , क्या उसने कभी एक- एक रुपया आपस में चंदा करके  हम जैसों का सहयोग किया।  जनता की यह मामूली आर्थिक मदद  हमारी सबसे बड़ी नैतिक विजय होती तब , इस गोदी मीडिया और उसको बढ़ावा देने वालों के विरुद्ध।

    अब यदि कोई वरिष्ठ सरकारी अधिकारी जिसकी मोटी तनख्वाह हो, वह यह कहे कि वह बड़ा ईमानदार है  तो भला इसमें उसका कितना बड़प्पन है ? वह ईमानदार रहे , इसीलिए तो उसे ढ़ेर सारी भौतिक सुख सुविधाएँ पहले से ही मुहैया करवाई गई है। यदि फिर भी वह अन्य अवैध स्त्रोतों से धन अर्जित करता है, राजनेताओं के दबाव में अनुचित कार्य करता है अथवा इसके लिये उन्हें प्रोत्साहित करता है , तो यह उसकी आवश्यक नहीं धनलोलुपता है। ऐसा मेरे एक मित्र ईमानदार पुलिस अधिकारी का नजरिया है । वे दफ्तर में चाय भी अपने पैसे का पीते और मुझ जैसे चुनिंदा लोगों को पिलाते थें। उनका दृष्टिकोण साफ था ,वे अपने सरकारी वेतन को ही कुबेर का खजाना बताते थें। ऐसे अधिकारी जब कभी जुगाड़ तंत्र के षड़यंत्र के शिकार होते हैं। उसके चक्रव्यूह में.फंसने के बावजूद समर्पण नहीं करतें । संकट काल में उनका सुरक्षा कवच बन जनता को आगे आना चाहिए , न कि यह कह खामोश हो जाना चाहिए कि बेचारे बहुत ईमानदार थें, उनके साथ बुरा हुआ । जनता जिस दिन अपनी नजरों से कर्मपथ पर चलने वाले व्यक्ति के ईमान का जनाजा देखना बंद कर देगी,उसी क्षण से सामाजिक एवं राजनैतिक परिस्थितियाँ  बदल जाएँगी।
     वैसे तो, नज़रों का तमाशा भी मन की तरह ही बड़ा विचित्र होता है। मुझे तो लगता है कि तन, मन और मस्तिष्क तीनों के पास अपनी - अपनी दृष्टि होती है। वो कहते हैं न मन की आँखों से देखों , विवेक की दृष्टि से देखों, भावनाओं में मत बहते रहो , स्नेह से देखो नफरत से मत देखो। स्पर्श के पश्चात दृष्टि से ही शिशु अपनों को पहचानता है। मृत्यु के पश्चात सबसे पहले मृत व्यक्ति के नेत्रों की पलकों को ही बंद किया जाता है। अतः जब तक जिंदगी है, अपनी नजरों को साफ रखें।

Sunday, 3 February 2019

मन, मौन और मनन

    मन, मौन और मनन
***************************
    मौनं सर्वार्थसाधनम् ।
( मौन सारे काम बना देता है ) — पंचतन्त्र

    * मुनि(मौनी) और उनका यह "मौन" इसे समझने के लिये जब भी आश्रम जीवन को स्मरण करता हूँ, हृदय में आनंद और प्रकाश की अनुभूति होती है। वैसे तो तब भी मैं साधना स्थल पर मौन रह कर मन की चंचलता को "मौन" नहीं रख पाता था, इसलिये मुनि नहीं बन सका ,फिर भी प्रयत्न निश्चित करता था । यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता था कि मेरा मस्तिष्क मौन रहे। वह विचार रहित रहे और मन उसे छेड़े नहीं। मन, मौन और मनन  का मानव की प्रवृत्ति , उसकी जीवन शैली , उसकी कार्य क्षमता यहाँ तक की उसके स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष और व्यापक प्रभाव पड़ता है। जब हम अपने मन को मौन की ओर अग्रसर करते हैं, तो मनन की प्राप्ति होती है।
    हमारा यही मौन चिन्तन हमें अपने कर्मपथ और फिर मोक्षमार्ग की ओर ले जाता है। मौन से ही एकाग्रता, ध्यान और समाधि की प्राप्ति होती है।

    ब्लॉग जगत में विशेष पहचान बना चुका "पाँच लिंकों  का आनंद "  यह ब्लॉग जिस पर इन दिनों मैं सुबह अपने विचारों के मार्गदर्शन के लिये जाया करता हूँ , उसके संचालन का दायित्व देख रहीं यशोदा दी का "मुखरित मौन" उस "अनहद" की तरह है,जिसमें आंतरिक प्रकाश और ध्वनि का संचार नित्य हुआ करता है । हम सभी भी इस "नाद" को मौन रह कर सुनने का प्रयत्न करें। यह हमारे अंदर की ध्वनि है। बाह्य जगत की आवाज तो हम निरंतर सुनते हैं । मौन का पदचाप कब सुनेंगे हम।
 अभी पिछले दिनों संजय भाष्कर जी का एक लेख पढ़ रहा था। जो यशोदा दी को समर्पित था।  जिसके प्रतिउत्तर में
उनके ये शब्द -
"ईश्वर कुछ लेता है, तो बहुत कुछ देता भी है। कैंसर ने आवाज़ छीन ली,पर उंगलियों में कलम पकड़ने की ताकत  भी दी । "
  उनके आत्मविश्वास, आत्मबोध, आत्मशक्ति  और आत्मचिंतन का परिचायक है। किसी तरह की निर्बलता, दुर्बलता और शिथिलता उसमें नहीं है। इसे ही मनोबल कहते हैं। ऐसी ही विचार शक्ति से व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

    उचित कहा उन्होंने कि प्रकृति कुछ लेती है, तो देती भी है, क्यों कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया निश्चित है। यदि स्नेह का बंधन टूटता है, तो उसका चिन्तन पथिक को जीवन दर्शन कराता है।
 कल सोमवार को मौनी अमावस्या पर्व पर यशोदा दी का जन्मदिन है। अतः यही प्रार्थना है, हृदय से कि वे इसी प्रकार दृढ़ता के साथ प्रकाश स्तम्भ बन हम सभी का मार्गदर्शन करती रहें।
      मौनी अमावस्या पर इस सोमवार को जब अनेकों श्रद्धालु जो अपने मुनियों के ज्ञान,विज्ञान और सिद्धांत में विश्वास रखते हैं,इस भौतिक युग में भी मौन रह कर गंगा स्नान करेंगे । मैं भी अपने विकल मन से यह अनुरोध करूँगा कि वह कुछ क्षणों के लिये ही सही  मौन धारण कर ले। मौन को आत्मसात करे वह। जैसा कि मौनी अमावस्या से स्पष्ट है कि यह पर्व वाह्य जगत से अंतर्जगत की ओर ले जाने वाला पर्व है । इंद्रियाँ  यदि मौन होती हैं तभी मन भी मौन रहता है । मन पर विराम न रहने पर चाहकर भी मौन नहीं रहा जा सकता । एकांत में बैठ कर भी मौन रहना कठिन है । इस पर्व पर तीन शब्दों पर गौर करने की जरूरत है । पहला मन, दूसरा मौन, तीसरा मनन ।  मौन रह कर  मन को साधते ही जब मनन की प्रक्रिया शुरू होने लगती है और तब अंतर्जगत में अमृत वर्षा  होने लगती है । जो बाह्य जगत के किसी भी पदार्थ की प्राप्ति से बढ़ कर है ।
       आश्रम में जो पहला कार्य साधकों को करना होता था, वह मौन रहना ही था। मंत्र जाप भी मौन रह कर हम करते थें और ध्यान भी । हाँ , प्रार्थना के समय हमारा मौन टूटता था और तब हृदय से जो शब्द निकलता था , वह मन-मस्तिष्क को आनंद देता था। यह सुखद अनुभूति ऐसी है , जिसकी अभिव्यक्ति के लिये शब्द नहीं होते हैं।
      बचपन की बात करूँ, तो एक बार मैं दार्जिलिंग में पुस्तक खरीद रहा था। बचपना था, तो बोलता बहुत था। उसी दौरान एक नेपाली महिला ने तनिक कड़ुवे शब्दों में प्रथम बार मुझे यह पाठ पढ़ाया था कि कम बोला करूँ। जब कोलकाता में था,तो बड़े नाना जी के घर जाते समय मौसी जी की हिदायत होती थी कि डायनिंग टेबुल पर भोजन के समय दो बातों का विशेष ध्यान रखना , पहला यह कि भोज्य सामग्रियों को दांतों से चबाने की आवाज मुख से बाहर नहीं आये और चम्मच जब प्लेट का स्पर्श करे, तो वह मौन रहे।
  मुझे उनका यह दोनों ही निर्देश पसंद नहीं था, अतः बालीगंज जाना बिल्कुल नहीं चाहता था । पत्रकारिता में भी यही बताया गया कि मौन रह कर पहले सुना करों फिर सवाल करों। यदि हमें असत्य बोलने से बचना है,तो मौन रहने  का प्रयत्न करना होगा। मौन हमारे अहंकार, क्रोध और अशिक्षा जैसी दुर्बलताओं का भी आवरण है।
    अध्यात्म जगत से जुड़े श्री सलिल पांडेय का कहना है कि मौन का वैज्ञानिक महत्व यह है कि मनुष्य का शरीर शून्य में प्रवाहित तरंगीय शक्ति को संचित करने लगता है जैसे स्विच आफ करने से यंत्रों की बैटरी जल्दी चार्ज हो जाती है । मानव शरीर वायु में प्रवाहित तरंगों से, जल में समाहित औषधीय गुणों से, सूर्य किरणों से उत्तम स्वास्थ्य, धरती से उत्पन्न खाद्य पदार्थों से पोषक-तत्व, अंतरिक्ष से निकलती उर्जा तेजी से आत्मसात करने लगता है । पतंजलि के योग सिद्धांत के अनुसार भी उथल-पुथल भरे वातावरण में मौन साधते शरीर के मूलाधार से लेकर सहस्रार तक के सभी षट्चक्र प्राकृतिक ऊर्जा संग्रहित करने लगते हैं । मेडिकल साइंस के अनुसार पूरे शरीर को मस्तिष्क में स्थित 'न्यूरो ट्रांसमीटर' संचालित करता है । मौनसाधना से 'एसीटोलकोलिन हार्मोन्स' संतुलित होता है जो शरीर को स्वस्थ करता है जबकि 'नारइपीनेफ्रिन हार्मोन्स' चित्तवृत्तियों को संयमित करता है । मेडिकल साइंस के इसी भाव को ऋषियों और मुनियों ने माघ महीने में सर्वाधिक 'हरिओम' की कृपा वर्षा का काल माना ।
    मेडिकल सांइस के अनुसार मनुष्य की सर्वाधिक ऊर्जा बोलने, चलने तथा स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबन्ध से खर्च होती है। व्यक्ति जब मौन व्रत में बोलने, खानेपीने के साथ मन को संयमित कर जीवन व्यतीत करता है तब  उसके रक्त में क्षारीय तत्व बढ़ता है जो केवल तन के लिए ही नहीं बल्कि मन के लिए लाभप्रद होता है । जबकि इसके विपरीत जीवन जीने से यूरिक एसिड (अम्लीय तत्व) बढ़ता है । पेट में अम्लीय तत्व बढ़ने से पाचन तंत्र बिगड़ता भी है । इसलिए ऋषियों ने माघ महीने में व्रत-उपवास तथा सूर्योदय पूर्व स्नान का विधान किया। फलाहार से क्षारीय रसायन की वृद्धि होती है । अतः मौन साधना की महत्ता समझ कर ही विद्वानों ने कहा कि बोलना एक कला है तो मौन उससे भी उत्तम कला है ।

Saturday, 2 February 2019

तेरी याद दिलाएगा...



तेरी याद दिलाएगा...
****************

जब-जब चन्दा आयेगा
तेरी याद दिलायेगा
सारी रात जगायेगा
मैं रो कर रह जाऊँगी
दिल जब ज़िद पर आयेगा
दिल को कौन मनायेगा..

   यादों की ऐसी पीड़ा भी विचित्र होती है। कोई सांत्वना  काम नहीं देती है। भले ही वक्त ने जख्म को भर दिये हो।
फिर भी कभी- कभी खाली पड़ा यह लंचबॉक्स बचपन के उस टिफिन बाक्स की याद दिला देता है , जिसमें किसी माँ का स्नेह था, किसी मासूम का अरमान था और कितने ही मनपसंद व्यंजन थें उस बालक के , जिसे खोने के बाद टिफिन तो अनेक मिले ,परंतु किसमें स्नेह था और किसमें छल, नहीं समझ सका वह पथिक। जब भी कभी क्षुधा की अग्नि भड़की या मन ने ज़िद ही कर दिया कि आज तो यह चाहिए, उसे डांट पड़नी निश्चित है, क्यों कि विवेक उस पर अपना वर्चस्व चाहता है। भले ही जागते रहे वह सारी रात , मनाने फिर कोई नहीं आएगा उसकी इस पुकार पर- 

होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
मुक़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो..

  कोलकाता  में जब वह माँ (नानी) के पास रहता था। वह टिफिन  बाक्स आज भी उसे याद है और एक लंच बाक्स यहाँ भी है, जो वर्षों से खाली पड़ा है। पिछले एक माह से देर शाम भोजन का पैकेट लेने वह होटल से सांईं मेडिकल तक जाता है। अब यही मोटे कागज का पैकेट ही उसका डिनर बाक्स है । इस भोजन के डिब्बे के रंगरूप बदलने के साथ उसका प्रेम भी बदलता गया।
   जिस टिफिन बाक्स से पथिक का स्नेह जुड़ा था। उसी को किसी ने अपने स्वाभिमान के लिये , तो किसी ने अपने स्वार्थ के लिये पांव तले रौंद दिया। स्नेह का बंधन टूट गया, फिर भी यादों की जंजीरों से वह जकड़ा रहा ।
   अब भी याद है उसे जब वह मात्र पांच वर्ष का था, तो टिफिन बाक्स में  बड़े प्यार व दुलार से अंगूर , काजू की बर्फी और उसके पसंद के व्यंजन मिलते थें।
  परंतु नानी माँ का यही स्नेह उसकी जीवन यात्रा पर एक दिन भारी पड़ा। उस दिन जिसका रक्त था वह , उसी ने यह टिफिन बाक्स देख लिया। समानता का प्रश्न उठा उस बालक को बनारस ले आया गया। कोलकाता के प्रमुख अंग्रेजी माध्यम स्कूल की जगह उसे काशी के हिन्दी माध्यम विद्यालय में दाखिला दिलाया गया। स्कूल की बस की जगह नन्हे पांवों से डेढ़-दो किलोमीटर दूर विद्यालय जाना पड़ा प्रतिदिन ।
      अब जो टिफिन बाक्स था उसके पास, उसमें रोटी-पराठे और टमाटर हुआ करता था। शिशु कक्षा से उसे सीधे दर्जा दो का विद्यार्थी बना दिया गया। अंगूर की जगह टमाटर से उसका मन बहलाने के लिये उसके गुरु जी तब कहा करते थें-

"लाल- लाल है पके टमाटर, खाकर देखों कितने अच्छे।"

    फिर वह कुछ बड़ा हुआ तो कोलकाता में माँ के आंचल का पुनः छांव मिला। फिर से टिफिन में राजभोग और महंगे फलों को स्थान मिला। वर्ष 1982 में ,वह आखिरी दीपावली थी उसकी , जिसे माँ के साथ मनाया था उसने,  वह स्नेहिल छांव कुछ दिनों बाद हमेशा के लिये छीन गया उससे।  वापस बनारस के लिये टिकट कट गया उसका । जाते समय उस बालक को बताया गया था कि वह काशी विद्याध्ययन के लिये जा रहा है ,वापस घर कोलकाता लौट कर आना है। उसके बाबा (नाना) उसे हर माह मनिआर्डर किया करेंगे । सो, टिफिन बाक्स की जगह उसे प्रतिदिन इतना जेबखर्च मिल जाता था कि स्कूल में लंच के समय बाहर जा छोला भटूरा अथवा इटली डोसा खा सकता था। कुछ दिनों बाद वहाँ फिर से समानता की बात उठी। यह प्रश्न किया गया कि एक ही लड़के को मनिआर्डर क्यों आएगा। तो वह जेबखर्च भी चला गया। दुखी मन से बाबा ने मनिआर्डर करना बंद कर दिया।
   फिर कभी टिफिन बाक्स न मिला उसे छात्र जीवन में। हाँ निठल्ला कहलाने का दर्द अवश्य मिला। उसने एक विद्यालय में नौकरी कर ली । अपने घर का स्कूल हो कर भी औरों के यहाँ शरण ली। जब वेतन मिला तो पहला कार्य उसने अपने सहपाठी के प्रतिष्ठा से स्टील का टिफिन बाक्स खरीदने का ही किया। स्नेह और भोजन की तलाश में आश्रम पहुँचा , तो इसी टिफिन बाक्स में आश्रम से भोजन घर पर लाया करता था। फिर बाद में जब वहीं रहने लगा तब टिफिन बाक्स
फिर से खाली हो गया।
         हाँ ,याद है उसे यह भी कि मुजफ्फरपुर एक टिफिन बाक्स मौसी भी दिया करती थी ,जब काम पर जाता था। वे सुबह उठ कर उसके पसंद की उबली सब्जी बना दिया करती थीं ।   कलिम्पोंग में था,तो एक टिफिन बाक्स वहाँ छोटी नानी जी भेजा करती थीं, छोटे नाना जी के मिष्ठान के प्रतिष्ठान पर , उसमें माँ जैसा स्नेह तलाशता था , वह नादान । उसकी उदासी देख पड़ोस की एक आंटी जो महाराष्ट्र की थीं, रात्रि में उस टिफिन को उससे ले लिया करती थीं और अपने यहाँ बना स्वादिष्ट एवं गर्मागरम व्यंजन उसके लिये परोसा करती थीं। आज उन्हें नमन करने की इच्छा हो रही है पथिक को, परंतु बीता हुआ समय कहाँ वापस लौटता है ? सिर्फ यादें ही संग रहती हैं। यह बात भी तो तीन दशक पुरानी है। आंटी शाकाहारी थीं और अंकल जी जो कश्मीरी ब्राह्मण रहें , उन्हें नानवेज बहुत पसंद था। पति परमेश्वर के लिये वे उसे बनाती थीं। दूसरी पत्नी थी उनकी, विवाह इस शर्त पर हुआ था कि दिवंगत प्रथम पत्नी के बच्चों की माँ बन कर ही रहेंगी। स्त्रियों में त्याग की भावना का प्रत्यक्ष दर्शन उनमें मुझे हुआ। फिर भी यदि कोई सौतेली माँ कहे तो..?
    कोलकाता, बनारस , मुजफ्फरपुर, कलिम्पोंग से होते हुये टिफिन बाक्स की कहानी उसकी मीरजापुर में भी जारी रही। लेकिन एक दर्द, एक चुभन , एक परायापन और एक चिन्तन के साथ उसका भी पटाक्षेप हो गया। अब टिफिन बाक्स खाली है । पथिक को प्रतीक्षा है कि आहत हृदय उसका , उसी प्रकार से खाली डब्बा हो जाए। न उसकी याद रहे और न ही कोई आकांक्षा। हृदय का रूदन मौन हो जाए और वह स्थितिप्रज्ञ हो जाए।
    क्यों कि दिल की ज़िद कुछ ऐसी होती है कि जब भी यादें मचलती हैं। तन्हाई में वो अपनों को ढ़ूंढती है । रात आँखों में  कटती है और दिन का उजाला उसे याद दिलाता है-
   
तेरा ग़म तेरी ख़ुशी
मेरा ग़म मेरी ख़ुशी
तुझसे ही थी ज़िन्दगी
हँस कर हमने था कहा
जीवन भर का साथ है
ये कल ही की बात है..

Friday, 1 February 2019

यादों के चिराग़ों को जलाए हुए रखना

यादों के चिराग़ों को जलाए हुए रखना
********************
 मेरा चिन्तन तो यही है कि अपनी स्मृतियों से इतना भी दूर न चले जाएँ हम कि अपनों को ही न पहचान पाए
********************

बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी
ख़्वाबों में ही हो चाहे मुलाक़ात तो होगी
ये प्यार ये डूबी हुई रँगीन फ़िज़ाएं
ये चहरे ये नज़ारे ये जवाँ रुत ये हवाएं
हम जाएं कहीं इनकी महक साथ तो होगी ..

    मानव जीवन में मन और मस्तिष्क का विचित्र द्वंद्व दिखता है।  स्मृति जो मस्तिष्क की प्रमुख बौद्धिक क्षमताओं में से एक है, मन उसे कुरेदते रहता है। यादों के घरौंदे को जब भी मन टटोलने लगता है ,अतीत की हर बात ताजी हो जाती है। जो हमें सुख- दुख की अनुभूति करवाती है। हम कहीं भी रहें , यादें हमारी साया बन साथ होती हैं । जीवन में जब कोई संग रहता है । पास या दूर रहता है ।  विश्वास रहता है कि वह अपना है। मन प्रसन्न रहता है । ऐसे क्षणों में ये यादें मुस्कुराती हैं । इस उम्मीद संग यूँ  हसीन ख़्वाब बन जाती हैं -

यादों के चिराग़ों को जलाए हुए रखना
लम्बा है सफ़र इस में कहीं रात तो होगी...

     परंतु हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं है , क्यों कि यादें  सवाल भी तो करती हैं और सताती भी हैं-

जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में
नज़रों को हम बिछाएंगे
चाहे कहीं भी तुम रहो, चाहेंगे तुमको उम्र भर
 तुमको ना भूल पाएंगे
मेरे कदम जहाँ पड़े, सजदे किये थे यार ने
मुझको रुला रुला दिया, जाती हुई बहार ने ...

     ऐसी यादों में रूदन होता है, बेइंतहा दर्द होता, अंधकार होता है , ऐसे में इंसान इस खूबसूरत दुनिया के रंगमंच पर स्वयं को फिल्म "जोकर" के उस मासूम राजू के समकक्ष पाता है , जिसके साथ सभी ने अपनी सुविधा के हिसाब से मनोरंजन किया, फिर भी नादान उसी को सच्चा स्नेह समझ बैठा। वह सबका रहा , परंतु उसका कोई नहीं हुआ। तब जब पर्दा गिरता है, भ्रम टूटता है, दिल तड़पता है, वे यादें नगमे बन जाती हैं, हृदय को चुभन देती हैं और जीवन को अंधकार। मनुष्य भूल जाता है , दिन और रात का फर्क-

अपनी नज़र में आज कल, दिन भी अंधेरी रात है
साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है
इस दिल के आशियान में बस उनके ख़याल रह गये
 तोड़ के दिल वो चल दिये, हम फिर अकेले रह गये..

    ऐसी ही वेदना जब नियति से निरंतर प्रश्न किये ही जा रही थी , कोमल हृदय बुरी तरह आहत था, माँ के आंचल की स्नेहिल छांव की याद सता रही थी और कोई अवलंबन नहीं था , स्नेह का कोई मोल नहीं था , वह उपहास कर रहा था , दिल से लेकर ईमान तक की सौदेबाजी में  दम घुटा जा रहा था और जीवन व्यर्थ लग रहा था ,  आहत हृदय सावधान कर रहा था-

ऐसे वीराने में इक दिन, घुट के मर जाएंगे हम
जितना जी चाहे पुकारो, फिर नहीं आएंगे हम
 ये तेरा दीवानापन है ...

     तब इन यादों ने ही ब्लॉग पर पथिक को सृजन शक्ति दी है और वह अपने दर्द को शब्द देने का प्रयत्न करने लगा । ढ़ाई दशक की अपनी पत्रकारिता के बाद पिछले वर्ष जब वह आखिरी आशियाना भी उजड़ गया और फिर चंद्रांशु भैया ने अपने होटल में उसे शरण दी । उस वक्त मन की व्याकुलता चरम पर थी । हृदय बार बार स्मृतियों के घरौंदे की ओर भाग रहा था, मानो यह यादों की बारात नहीं उसका जनाजा निकला हो । दर्द, वेदना, अवसाद , भावना एवं  सम्वेदनाएँ और स्वार्थ सभी मिलकर कर " पथिक के विवेक " के अंतिम संस्कार के लिये चिता सजाए हुये थें । कोई आश्रय नहीं था, कोई आश्रम नहीं था , जिसका सहयोग ले पथिक अपने व्याकुल मन को सांत्वना दे सके । ऐसे में ब्लॉग को जब उसने पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ी अपनी कड़ुवी यादों से सजाना प्रारम्भ किया , सर्वप्रथम रेणु दी का मार्गदर्शन मिला । उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि सकारात्मक लिखों या नकारात्मक , बस वे निरंतर पथिक का उत्साहवर्धन करती रहीं, अपनी स्नेह भरी प्रतिक्रिया के माध्यम से, फिर तो वह बेझिझक लिखता ही चला गया, अपनी स्मृतियों को, अनुभूतियों को अपने चिंतन को शब्द देने लगा।  इन यादों के कारण ही पत्रकारिता जगत से इतर एक नयी पहचान मिली और सम्मान भी। माना कि  ब्लॉग पर वह अन्य रचनाकारों की तरह सकारात्मक लेखन को केंद्र में नहीं रख सका , फिर भी इस नकारात्मकता में कुछ न कुछ सामग्री सभी के लिये है , ऐसा उसका मानना है, क्यों कि कल्पनाओं में जाकर उसने कभी अपनी आकांक्षाओं को व्यक्त नहीं की है , हर एक दर्द से रूबरू हुआ । जब स्नेह के चंद शब्दों की चाह में छला गया। तो लगा अपनी यादों की पोटली टटोलने-

क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें..

   शिकायत तो  पथिक को भी किसी से नहीं है, बस समय के साथ सभी आगे बढ़ गये और उसकी मंजिल दूर होती गयी।
यादों की जंजीरों को तोड़ने का प्रथम प्रयास अल्पकालीन आश्रम जीवन में उसने किया था। सफलता की ओर अग्रसर था कि अपनों की स्मृतियों के मोह ने उसे मुक्ति पथ से वंचित कर दिया। अन्यथा ध्यान की उस अवस्था में उसे यह कहाँ  याद था कि उसके भी अपने हैं और कुछ सपने हैं। कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी,बस एक कार्य था भृकुटि के मध्य ध्यान केंद्रित करना। उस सुखद क्षण को जब भी याद करता है वह , हृदय आनंद से भर उठता है। वह उलाहना देता है कि पथिक अपनी मंजिल से क्यों भटक गया , स्नेह के जंजीरों में बंध कर छला जाता रहा। काश ! वह आश्रम, वह कुआँ  वह साधना स्थल और वह खड़ाऊँ फिर से प्राप्त कर लेता, लेकिन मन में वह पावनता कहाँ से लाएगा तू पथिक ? यह सोच मन उदास हो जाता है।
   बात यादों की हो रही है, तो महाभारत के आदिपर्व में दुष्यंत और शकुंतला का दृष्टांत है। महाराज दुष्यंत जब शकुंतला से गंदर्भ विवाह करते हैं ,तो वापस राजमहल वापस जाते समय अपनी एक अंगूठी उसे देते हैं । वे कहते हैं कि इस निशानी को दिखलाते ही उन्हें विवाह का स्मरण हो जाएगा । परंतु शकुंतला से वह अंगूठी खो जाती है और राज दरबार में दुष्यंत अपनी पत्नी को पहचान नहीं सकें।
    मेरा चिन्तन तो यही है कि अपनी स्मृतियों से इतना भी दूर न चले जाएँ हम कि अपनों को ही न पहचान पाए।  वर्ष 1994 से पत्रकारिता यहाँ कर रहा हूँ। अर्थयुग के प्रभाव में युवावस्था में जब कभी जुगाड़ तंत्र का अंग बनने के लिये मन मचलता था, तो ये यादें ही थी ,जो यह कह राह रोक देती थीं कि अपने अभिभावकों से जो संस्कार मिला , उसे तुम कैसे भुला सकते हो ?
  हम अपने राष्ट्र वैभवशाली गौरव गाथा , महान क्रांतिकारियों के बलिदान और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के त्याग को भुला रहे हैं, उन्हें भी भूल रहे हैं, जिन्हें हर वर्ष राष्ट्रीय पर्वों पर यह कह नमन किया जाता है-

कुछ याद उन्हें भी कर लो
 जो लौट के घर न आये
ऐ मेरे वतन के लोगों
ज़रा आँख में भर लो पानी..

  परिणाम यह है कि हमारे लोकतंत्र पर दिनों दिन भ्रष्टतंत्र की पकड़ मजबूत होती जा रही है , तो आये उन यादों को फिर से जीवित करें हम , जो भारत माता के इन अमर बलिदानी सपूतों से और उनके संकल्प से जुड़ी हैं। उनके सपनों को साकार करें। भ्रष्टतंत्र और जुगाड़ तंत्र से यदि हमें बाहर निकलना है ,तो बापू और शास्त्री जी जैसे महान आत्माओं की सादगी याद रखनी होगी। जिसके आलोक में हम योग्य जनप्रतिनिधियों का चयन करें। जिन्होंने करोड़ों लुटा कर चुनाव लड़ा , सिंहासन पाने के बाद वे जनता को फिर क्यों याद रखेंगे ?

    

Wednesday, 30 January 2019

ये कैसा ख़ुमार है...

 ये कौन सा ख़ुमार है...
**********

कसमे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या
कोई किसी का नहीं ये झूठे, नाते हैं नातों का क्या
सुख में तेरे साथ चलेंगे दुख में सब मुख मोड़ेंगे
दुनिया वाले तेरे बनकर तेरा ही दिल तोड़ेंगे
 देते हैं भगवान को धोखा, इनसां को क्या छोड़ेंगे ...

      उपकार फिल्म का गीत है यह । आवाज़ तो मेरी मधुर नहीं है, फिर भी जब कभी गंभीर रूप से अस्वस्थ हो जाता हूँ ,आसपास किसी को नहीं पाता हूँ , तब जीवन का यह सत्य सामने होता है, जो इस नगमे में है। ऐसे में हृदय की व्याकुलता को दिलासा देने के लिये  मैं इसकी दो चार पंक्तियों को गुनगुना लेता हूँ। स्नेह की तलाश में इस खूबसूरत पर रंग बदलती दुनिया में भटकते हुये हम बंजारे ही रह गये हो , तो मन के भारीपन को कम करने का यह तरीका बूरा नहीं है ?
     गत सप्ताह बारिश और ठंड के कारण  तबीयत अधिक बिगड़ गयी  , तो उस रात्रि मेरे एक मित्र मिश्रा जी, जो  सीनियर मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव हैं, ने कुछ दवाइयाँ लाकर मुझे दी । वे सांईं मेडिकल पर रखा मेरे भोजन का पैकेट भी लेते आये। पिछले एक माह से सप्ताह में छह दिन रात्रि में मेरे लिये रोटी- सब्जी के पैकेट की व्यवस्था समाजसेवी श्री अमरदीप सिंह की संस्था के सौजन्य से हो जा रही है। अन्यथा तो सुबह की तरह रात्रि में भी दूध ब्रेड या दलिया से काम चल रहा था। असंतुलित भोजन और व्यथित हृदय का सीधा प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य पर पड़ता है, इसकी अनुभूति है पथिक को , परंतु  न ही कोई विकल्प है,ना ही जीवन के प्रति मोह शेष है ,  जब यूँ ही स्नेह की तलाश में एकाकी चलते हुये उसने अपने जीवन के स्वर्णिम काल गुजार दिये , तो अब ट्रेन की आखिरी सीटी बजाने की ही  प्रतीक्षा है।
 
         उस रात्रि जब मिश्रा जी दवा लेकर कमरे पर आये , तो उन्होंने अपने  " थ्री ईडियट्स " दोस्तों की एक संक्षिप्त जीवन कथा और व्यथा मुझे बातों ही बातों में कह सुनाई।
     बड़ी विचित्र है, इन तीनों की दुनिया भी, जो कर्मपथ पर था वह भी अपनी निष्ठा की कीमत चुका रहा है और जिसने " झूम बराबर झूम शराबी "  को अपना जीवन दर्शन समझा , उसकी  भी वही स्थिति है।
    वो उक्ति है न , " टके सेर खाजा, टके सेर भाजी। "

  दरअसल मेरे एकाकी जीवन पर कुछ लोग सवाल उठाते रहे हैं। कुछ तो उपहास भी करते हैं कि जीवन के हर आनंद से दूर यह मनहूस प्राणी कैसे जेंटलमैन हो सकता है ? घर आई लक्ष्मी को कौन ठुकराता है, इसीलिए तो गृहलक्ष्मी इसके पास नहीं आयी। जाहिर है कि जनपद स्तरीय पत्रकारिता में यदि अतिरिक्त आर्थिक स्त्रोत नहीं है, तो फिर हम जैसों (पत्रकार) का बाजार भाव ठंडा है। युवावस्था में तब पत्रकारिता का यह जुनून जो था  , इस नशे के लिये मैंने अपने भविष्य को दांव पर लगा दिया । व्यस्तता बढ़ती गयी और स्नेह के बंधन टूटते गये। जो अपने थें ,वे दूर हो गये।

      मेरे मित्र मिश्रा जी ने देश - दुनिया देखी है, समाजिक , राजनैतिक और कुछ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी रहे हैं। लेकिन , समय के साथ चल रहे हैं। काम के नशे में परिवार की उपेक्षा नहीं की ,उन्हें नियति ने श्रम के प्रतिदान में खुशहाल परिवार दिया है। वे मुझे दो- ढ़ाई दशक से जानते हैं, उन्हें पता है कि ईमानदारी की राह में कांटे हैं ,फूल नहीं।
 अतः मेरे प्रति उनके हृदय में एक सम्मान है। हाँ ,इतना अवश्य कहते हैं कि भोजन की व्यवस्था पर किसी तरह ध्यान दें , शेष तो किस्मत का खेल है।
  यहाँ बात मैं उनके तीन मित्रों की जीवन यात्रा की कर रहा था। पहला मित्र उनका उनके ही पेशे से जुड़ा  है। अच्छी खासी आमदनी  रही । लेकिन मधुबाला से पहले मधुशाला से दोस्ती हो गयी।  मित्रों ने काफी समझाया कि देखों भाई थोड़ा बहुत ले लिया करों, मन बहलाने के लिये, परंतु शराब उनके यार के जैसी हो गयी ।  परिणाम यह रहा कि छोटे भाइयों का विवाह हो गया और जनाब अकेले अब यह दर्द भरे नगमे गाया करते हैं-

ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा
मेरा ग़म कब तलक, मेरा दिल तोड़ेगा..

    अत्यधिक शराब सेवन से  काम धंधा चौपट हो गया है और स्वास्थ्य भी बेहतर नहीं है। जीवन साथी के लिये जब मन ने पुकार लगाई , तो उनके पास  न काया रहा न माया  , बेचारे सोशल मीडिया के माध्यम से चैटिंग करने लगें। एक विदेशी युवती पर डोरा डालने में सफल हुये भी , तो सात समुंदर पार जाने के लिये पैसा अब नहीं शेष है। सो, मन में इस उम्मीद को जीवित रखते हुये कि कभी तो उनके पास इतना पैसा होगा कि वे अपनी प्रेयसी के देश जाएंगे और दुल्हन बना उसे संग लाएँगे , परंतु कब यौवन तो ढलने को है ?  सो, अब बाकी बचा है यह गीत उनके लिये -

सुहानी रात ढल चुकी ना जाने तुम कब आओगे -
जहाँ की रुत बदल चुकी ना जाने तुम कब आओगे
हर एक शम्मा जल चुकी ना जाने तुम कब आओगे
तड़प रहे हैं हम यहाँ तुम्हारे इंतज़ार में ..

 दूसरे मित्र की दास्तान भी कम दर्द भरी नहीं है। दवा का अच्छा कारोबार रहा। सुंदर पत्नी मिली और पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। लेकिन , कांच की बोतल से दोस्ती कर ली और जब नशा उतरा तो घर पर न बीवी मिली न बच्चा। मदिरा और ध्रूमपान ने उपहार में अस्थमा का मर्ज दे दिया। बढ़िया कारोबार चौपट हो गया। परिवार के अन्य सदस्यों ने भी दूरी बना ली। उम्र के इस पड़ाव पर जब एकाकीपन जीवन संध्या को गमगीन किये हुये है। वे अपनी अर्धांगिनी और प्रेम पुष्प की वापसी के लिये पुकार लगा रहे हैं ।  कोई ऐसा मिल जाए , जिसके प्रयास से उनके उजड़े आशियाने में फिर से रौनक हो जाए । होली और दीपावली की वह खुशियाँ वापस लौट आये , पर देर हो चुकी है। वे जिससे भी अपना दर्द कहते है, झिड़क मिलती है कि पहले अपना स्वास्थ्य तो सुधारों , आदत बदलों और धनलक्ष्मी की व्यवस्था करों , फिर करना गृहलक्ष्मी की वापसी की प्रतीक्षा ।
     काश  !  शराबी फिल्म में अमिताभ बच्चन का यह डॉयलॉग  "नशा शराब में होती तो नाचती बोतल"  ही सुन लिया होता ,तो तुम भी कहा करते-

थोड़ी आँखों से पिला दे रे सजनी दीवानी..

  आज जीवन संगिनी  के इंतजार में यूँ बैचेन तो न होते आप  ?

   तीसरे मित्र की जीवन यात्रा इन दोनों से विपरीत और करूणामय है। वे एक ऐसे संगठन से जुड़ा हैं , जो  चाल ,चलन और चरित्र  की बात करता है । डेढ़ दशक से वे निष्ठावान कार्यकर्ता के रुप में अपनी सेवा दे रहे हैं। कर्मपथ पर हैं, फिर भी धनलक्ष्मी का दर्शन दुर्लभ है। परिणाम यह है कि समाज, परिवार और वह संगठन जिसके लिये वे समर्पित हैं , तीनों के द्वारा उपेक्षित हैं। दुनिया में पैसा ही किस्मत है, यह बात तब उन्हें समझ में आयी , जब जीवन संगिनी और बच्चों ने उन्हें सम्मान देना बंद कर दिया। ऐसे में हाहाकार कर उठता है हृदय कि सच के मार्ग पर चलने वालों को ऐसा कठोर दंड, फिर विलाप करता है मन-

किस्मत के खेल निराले मेरे भैया.
किस्मत का लिखा कौन टाले मेरे भैया..

  यहाँ भी तो उसका यह जुनून , जो संगठन के प्रति था , नशा बन गया । यह नशा भी "जाम" बन उसकी बर्बादी की पठकथा लिख गया।
      निठल्ले होने का दर्द क्या होता है, "पथिक" को इसकी कड़ुवी अनुभूति है। अन्यथा उसका भी आशियाना था, जहाँ अपनों का बसेरा था और सपनों का घरौंदा था। अब वह सिर्फ एक बंजारा है , न अनाड़ी है न ही खिलाड़ी !

होगा मसीहा सामने तेरे फिर भी न तू बच पायेगा
तेरा अपना खून ही आखिर तुझ को आग लगायेगा
आसमान में उड़नेवाले मिट्टी में मिल जायेगा
सुख में तेरे साथ चलेंगे दुःख में सब मुख मोड़ेंगे
 दुनियावाले तेरे बनकर तेरा ही दिल तोड़ेंगे ...

इस सत्य से साक्षात्कार कर चुका है वह।
    पथिक  की अनुभूति तो यही कहती है कि स्नेह भी एक नशा है, इसके पीछे मत दौड़ों ,अन्यथा कर्मपथ पर ठोकर खाओगे। फिर भी यदि नशा करनी है तो कुछ ऐसे करो -

हुई महंगी बहुत ही शराब के थोड़ी थोड़ी पिया करो
 पियो लेकिन रखो हिसाब के थोड़ी थोड़ी पिया करो...

Saturday, 26 January 2019

वर्षगांठ समारोह क्या इनके लिये भी ?


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर  विवाद
  (  प्रकाशित समाचार)
*******************
  गणतंत्र दिवस पर्व पर राष्ट्र हर वर्ष अपनी संप्रभुता और शक्ति का प्रदर्शन ध्वजारोहण समारोह में करता है। यह उत्सव (वर्षगांठ) हम इसलिये मना पाते हैं, क्यों कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, क्रांतिकारियों और वीर जवानों ने इसके लिये निहित स्वार्थ से ऊपर उठ कर त्याग और बलिदान को  प्राथमिकता दी है । जिनका एक ही स्वप्न रहा है कि राष्ट्र का हर नागरिक सुरक्षित, खुशहाल और स्वतंत्र जीवन व्यतीत कर सके। लेकिन यहाँ हर नागरिक का मतलब यह थोड़े न हुआ की आतातायी, दुराचारी और अन्य पाप कर्म करने वाले लोग भी इस उत्सव समारोह में आजादी की दुहाई देते हुये आ घुसे और लगे गोली- बम चलाने। ऐसे अराजक तत्वों को दूर रखने के लिये ही तो तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जाती है।
   अच्छा आप ही बताएँ  कि अपने किसी प्रियजन का वर्षगाँठ मना रहे हो, तो क्या ऐसे किसी व्यक्ति को कार्यक्रम में शामिल होने देंगे , जिसके आचरण से अराजकता फैलने का भय हो ?  क्या करेंगे आप , यही न कि ऐसे अवांछनीय तत्वों को त्वरित कार्रवाई करते हुये कार्यक्रम स्थल से बाहर कर देंगे ?  इसके लिये पहले से भी हम व्यवस्था करते हैं और   आपातकालीन स्थिति के लिये भी। कोई भी यह कभी नहीं चाहेगा कि किसी भी उत्सव में अवांक्षित तत्वों का प्रवेश हो।
   
    फिर तिरंगा लहराते समय डोर यदि उनके हाथ में हो ,  कथनी-करनी में जिनके भिन्नता रहती है, ऐसे लोग "जेंटलमैन" का  मुखौटा पहन महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री जैसे कैसे हो जाते हैं। छोटे बड़े मंचों पर ऐसे वर्षगांठ के अवसर पर वे ही छाये रहते हैं ,उनके उपदेश को सुनकर आम आदमी ताली बजाता रहता है,कोई यह नहीं टोकता है कि कल तक तो हर कार्य में इन्हें सुविधा शुल्क, गुंडा टैक्स चाहता था, वे जाति - धर्म के नाम पर वोट मांगते थें और आज इस मंच पर वे नैतिकता के पुजारी बने खड़े हैं।

     ऐसे में पता नहीं क्यों मेरा यह मासूम हृदय ऐसे कार्यक्रमों से दूर मुझे लेते जाता है। वह दुनियादारी के इस सच को समझने कि कृत्रिमता का चोला पहन हँसी ठहाके लगाना ही जीवन है , की जगह उस सत्य को तलाशने लगता है, जब बचपन में वह छोटा सा तिरंगा हाथ में लिये विद्यालय जाया करता था , तब गुरूजनों से वह जो ज्ञान पाता था। नैतिक शिक्षा की पुस्तकों में जो सबक उसने पढ़ी थी। अब जब पत्रकार होने के लिहाज से चहुँओर  बड़े - बड़े कार्यक्रमों में सम्मिलित होने का अवसर मिलता रहा है, तो इसी सत्य को जान वह हर बार आहत हो जाता है।
           अतः मैं तो अपने मन मंदिर में ही अपने प्यारे तिरंगे को समाहित कर लेता हूँ, तकि ऐसा कोई कार्य नहीं कर सकूं , जिससे ऐसे राष्ट्रीय पर्व पर मेरी ही लेखनी मुझसे सवाल करे। यदि एक संकल्प भी हम अपने और ऐसे राष्ट्रीय पर्व के वर्षगांठ पर सच्चे मन से लिये होते, तो फिर परिस्थितियाँ भिन्न होती।  पथिक अपने जीवन पथ पर अकेला इसलिये पड़ गया कि वह भावनाओं के भूलभुलैया में उलझ गया और    आम आदमी  इस लिये पीछे रह गया , क्यों वह भी जुमलेबाजों के झुनझुने से मन बहलाने लगा।
 
       जो लोग वैचारिक क्रांति, परिवर्तन और समानता का संदेश लेकर प्रकट होते हैं , वे जनता का सरदार बनते ही अपना रंग बदल देते हैं। समृद्धि , सच्चाई , ईमानदारी , पारदर्शिता और आम आदमी के  हित के लिये कुछ करने की बात आखिर वे क्यों भुला देते हैं। यह सब तो प्राचीन काल से होता रहा है। विडंबना तो अब यह है कि जिन्होंने कुछ किया है हम उन्हें भुला देते हैं। उनके प्रति हमारा दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है। चाहे वे स्वतंत्राता संग्राम सेनानी ही क्यों न रहे हो। ऐसे में फिर कौन देश और समाज की सेवा करना चाहेगा।
  अपने मीरजापुर में विगत दिनों यहाँ के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बैरिस्टर युसूफ इमाम जिनका नाम मंडलीय चिकित्सालय भवन पर लिखा था, उसे मिटाने के लिये एक प्रमुख राजनैतिक दल के युवा बिग्रेड के सिपहसालार अड़ गये। यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन इस होहल्ला के दौरान किसी ने वहाँ लिखे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर गोबर फेंक दिया। जिससे हृदय मेरा भी आहत हुआ,मैंने उस अनुशासित राजनैतिक दल के मुखिया और जनप्रतिनिधियों से भी एक पत्रकार की जगह देश के एक नागरिक के रुप में यह प्रश्न किया कि जो हुआ उस दिन क्या वह उचित था ?
  इस प्रकरण पर  मैंने विस्तार से समाचार तब लिखा भी था। किसी को वह खबर पसंद आयी , तो किसे ने बुरा मान लिया।
 इस तरह से राजनीति से जुड़ी बातें  वैसे तो मैं ब्लॉग पर पोस्ट नहीं करता हूँ।
  परंतु  आप सभी से जानना चाहता हूँ कि किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को जाति-धर्म के चश्मे से देखना कितना उचित होगा ?

Friday, 25 January 2019

वो सुबह कभी तो आयेगी..

*************************
युवाओं के लिये यह "अवसाद युग" है। अनापेक्षित आंकाक्षा रूपी यह "ऑक्टोपस"  अपनी मजबूत भुजाओं में युवा वर्ग के मन- मस्तिष्क को इस तरह से जकड़ ले रहा है कि वह संज्ञा शून्य हो जा रहा है।
**************************

 इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी..

   उस सुबह की उम्मीद जब टूट जाती है, मानव जीवन पर जब अंधकार पूर्ण ग्रहण लगा देता है ,हृदय जब यह समझ लेता है कि ऐसा कोई नहीं है जिससे स्नेह का प्रतिदान या अवलंबन इस जग से प्राप्त कर सके,संसार के हर रिश्ते बेगाने लगने लगते , तब व्यथित हृदय की पीड़ा शब्द बन जाती है-

क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है
हद-ए-निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है
ये किस मुकाम पर हयात, मुझको लेके आ गई
न बस खुशी पे कहां, न ग़म पे इख्तियार है ...

  यही अवसाद है , जब भी मानव अपने सामान्य जीवन से राह भटक जाता है, परिस्थितियाँ चाहे जो भी हो,  प्रेम का बंधन छलावा लगता है, महत्वाकांक्षाएँ बोझ बन जाती हैं,पद- प्रतिष्ठा और वैभव नष्ट हो जाते हैं , भ्रष्टतंत्र में ईमानदारी का उपहास होता है, श्रम का मूल्य नहीं मिलता है, जुगाड़ तंत्र प्रतिभाओं का गला घोंट देता है,तब हृदय चित्कार कर उठता है। वह नियति से सवाल करता है-

 हसरत ही रही मेरे दिल में बनूँ तेरे गले का हार
दर्पण को देखा, तूने जब जब किया श्रृंगार
फूलों को देखा, तूने जब जब आई बहार
एक बदनसीब हूँ मैं मुझे नहीं देखा एक बार..
     
      पत्रकारिता के क्षेत्र में रह कर ऐसी कितनी ही हृदय विदारक घटनाओं को देखा और समझने का प्रयास करता रहा हूँ , आखिर क्यों अवसादग्रस्त व्यक्ति को मौत को गले लगाना ही मुक्ति पथ समझ में आता है।

     नगर के एक ख्याति प्राप्त चिकित्सक की पुत्री , जो की इंटरमीडिएट की छात्रा थी, ने गत वर्ष अपने बंगले में फांसी लगा ली।  रात्रि में उसने अपने परिवार के साथ भोजन किया,  इसके बाद अपने कमरे में गयी और सुबह सब कुछ समाप्त।
शुभचिंतकों की भीड़ जुट गयी,तमाशबीनों की तरह- तरह की बातें शोकाकुलपरिजनों के हृदय और प्रतिष्ठा को कहीं और अधिक आहत कर रही थीं। पता चला कि अभिभावकों की उम्मीद उसकी महत्वाकांक्षा बन गयी और प्रवेश परीक्षा में मिली असफलता ने जिस अवसाद को जन्म दिया, वह जीवन पर भारी पड़ा। यह अवसाद ही  तो है, जब कोमल हृदय की महिलाएँ अपने मासूम बच्चों संग मौत की छलांग लगा लेती हैं। प्रेम के बंधन को टूटते देख कितने ही युगल एक दूसरे का हाथ थाम साथ मरेंगे की राह पर बढ़ लेते हैं।

       युवाओं के लिये यह "अवसाद युग" है। अनापेक्षित आंकाक्षा रूपी यह "ऑक्टोपस"  अपनी मजबूत भुजाओं में युवा वर्ग के मन- मस्तिष्क को इस तरह से जकड़ ले रहा है कि वह संज्ञा शून्य हो जा रहा है।

            मैं जिस अवसाद की बात करना चाहता हूँ, वह है सतकर्म का उपहास ,यह एक ऐसी सजा है , जो इंसान के हृदय को सर्वाधिक चोट पहुँचाती है। हर क्षेत्र में एक सच्चे व अच्छे व्यक्ति को उपेक्षा का दंश सहते देखा है मैंने। बात राजनीति से शुरू करूँ, तो माननीय बनने का अवसर किसे मिल रहा है। उसे ही न जो धनबल, जातिबल और बाहुबल से सम्पन्न हो। आमतौर पर निष्ठावान आम कार्यकर्ताओं की हिस्सेदारी राजनीति में दोयम दर्जे के पदाधिकारियों तक ही सीमित है, उस राजनेता की पीड़ा जब अवसाद बन जाती है,तो पूरे समाज पर उसका आवरण छाने लगता है। सारी व्यवस्था बिगड़ जाती है। यही तो हो रहा है न वर्तमान में ?

       राजनीति की बात छोड़े,  मैं अपने पत्रकारिता जगत और स्वयं से जुड़े कटू अनुभूतियों को बताना चाहूँगा। इस क्षेत्र में छब्बीस वर्ष गुजारा हूँ। आज भी बेरोजगारों जैसा हूँ । लेखनी , निर्भिकता और निष्पक्षता की सराहना कभी हुई भी थी । लम्बे समय से राजकीय मान्यता प्राप्त पत्रकार हूँ। लेकिन पत्रकारिता पूरी तरह से व्यवसाय बन गयी, हम जैसे पत्रकार जो नहीं बदलें, जीवन की खुशियों से वंचित रह गये,चले पुरस्कार नहीं सही लेकिन इस कर्तव्य का जब जुगाड़ तंत्र में उपहास होता है,तो यही अवसाद को जन्म देता है। चुनाव में पराजय के बाद सत्ता की चकाचौंध से वंचित राजनेता  आसमान से जब जमीन पर गिरते हैं,तो अवसाद में वे ऐसे सिद्धांत विहीन गठबंधन की राजनीति करते हैं  कि  लोकतंत्र की गरिमा गिरती है।

     धर्मग्रंथों पर दृष्टि डाले , तो परिजनों को युद्ध क्षेत्र में देख अर्जुन को जो अवसाद हुआ, कृष्ण ने विराट रूप के माध्यम से उसका ही निवारण किया है, जो गीता में वर्णित है । रामचरित मानस में जब सीता की खोज में निकले बंदरों ने समुंद्र उस पार लंका जा , वापसी में संदेह जताया,हनुमान भी मौन थें, अवसाद छाने लगा,तभी जामवंत के जादुई शब्द ने-

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना, पवन तनय बल पवन समाना।बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ...
 
      पल भर में इसका निवारण कर दिया, उल्लास से भर उठे हनुमान ,उन्हें अपने पराक्रम का अनुमान हो गया।  दुर्गासप्तशती के पहले  ही अध्याय में मेधा ऋषि ने अवसाद ग्रस्त राजा सुरथ और समाधि वैश्य को भगवती के रुप में उस तेजपुंज का अवलंबन दे , इन दोनों के जीवन में उल्लास का संचार किया। मेधा क्या है ,बुद्धि ही तो है न ?

     आशय यह है कि अवसाद दूर हो सकता है, यदि कोई अवलंबन हो। बुद्ध, विवेकानंद सभी ने इसी तरह से अपने अवसाद को दूर किया।  सामान्य मानव जीवन में पति, पत्नी प्रेयसी , मित्र, अभिभावक और गुरुजनों में से किसी ने भी स्नेह वर्षा यदि उचित समय पर की , तो यह भावनात्मक आश्रय विवेक का सृजन करता है, अवसाद निवारण के लिये वृद्ध माता- पिता के लिये भी हमारा यही स्नेह होना चाहिए। जो लोग अपनों के स्नेह से वंचित रह गये हैं, बंजारों सा जीवन जी रहे हैं,अवसाद में हैं ,उनके आहत हृदय को यह प्रार्थना भी सुकून दे सकती है-

तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो
तुम्ही हो साथी तुम्ही सहारे
कोई ना अपने सिवा तुम्हारे
जो खिल सके ना वो फूल हम हैं
तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं...

  वैसे तो, अवसाद का घटाटोप इस अर्थयुग में छाता ही जा रहा है। दौलत से शोहरत हासिल करना चाहता है, आज का इंसान। इस दौड़ में जो पीछे छूट जाता, किसी मोड़ पर वह अकेला हो जाता,उसके अपने ही जब उसकी असफलता पर उपहास करते हैं , कोई अपना नहीं होता जो आगे बढ़कर हाथ थाम ले, फिर भी कोई अवलंबन तलाशें, जो यह विश्वास दिलाता रहे-

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी..

   सदाबहार गीतों और दर्द भरे नगमों में मैं अपने इसी अवलंबन को ढ़ूंढ़ लेता हूँ।

    पथिक का जीवन भी स्नेहीजनों के बिछुड़ने से अवसाद से भरा रहा है। पत्रकारिता की परिभाषा अब जबकि व्यापार हो गयी है,तो इसमें गुजरे लम्बे जीवन और उस अनुभव का भी मोल नहीं रहा। वह तो ऐसा सौदागर बन गया है कि जो दर्द खरीदता और बेचता है । जहाँ सकारात्मकता के अमृत कलश की पूछ हो , वहाँ दर्द का सौदा कौन करता है। सो, वह पथ पर बिल्कुल अकेला है। उसका तो यही  मानना है कि उजाले का सब रिश्ता है, अंधेरे का संबंध दो लाशों के मिलन  या फिर तन्हाई से है। इस मिलन की चाह और तन्हाई से जो बाहर निकल सका ,वही अवसाद से मुक्त हो सका।

    जब भला मानुष बन कर भी किसी का स्नेह नहीं मिल रहा हो, इस अवसाद को यूं समझ गले लगा लो बंधु-

 ठोकर तू जब न खाएगा,
पास किसी ग़म को न जब तक बुलाएगा
ज़िंदगी है चीज़ क्या नहीं जान पायेगा
रोता हुआ आया है चला जाएगा...

  मेरी सबसे पसंदीदा फिल्म "जोकर" का है यह गीत , जिसे कवि गोपालदास "नीरज" ने लिखा है। इसी अंदाज में दुनिया के सर्कस को समझ रहा हूँ। जो स्नेह की राह में मिल रहे हर ठोकर पर सावधान करता रहा है , ये भाई जरा देख कर चलो..

      जीवन का यह कड़ुवा अनुभव (गम) ही अवसाद में पथिक का दीपक बन जाता है। जब कोई अवलंबन नहीं हो, यह दर्द पथिक की किस्मत बन जाता है। जिसने उसे ब्लॉग पर सृजन का अवसर दिया है।
    यह सदैव याद रखें कि नेत्रों की नमी से नहीं हृदय में दबी  वेदनाओं के पिघलने से अवसाद दूर होता है।

    

Thursday, 24 January 2019

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
***********************
    ऐसे राष्ट्रीय पर्वों पर यह चिन्तन- मंथन और खुली बहस होनी चाहिए कि आजाद हिन्दुस्तान में नैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक मूल्यों के लिहाज से हमने कितनी ऊँचाई तय की है और आम आदमी का जीवन स्तर खास आदमी के वैभव के समक्ष कहाँ पर टिक पा रहा है। जिन्होंने हमें आजाद मुल्क दिया ,हम उनके स्वप्न को कहाँ तक साकार कर पाये हैं।
*****************************

ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झनकार
ये इसमत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं..

    1957 में रिलीज हुई प्यासा फिल्म का यह गीत है। जिसमें अभिनेता आजाद भारत के रहनुमाओं से यही सवाल कर रहा था । परिस्थितियाँ आज भी कमोबेश वही है, बस नीलाम घर का स्वरूप थोड़ा बदला हुआ है। उस वक्त सिक्कों की झंकार पर  बेबस अबलाओं की अस्मत बिकती थी और अब भद्रजनों का ईमान नीलाम होता है। जनता जहाँ न्याय की उम्मीद लेकर जाती है,जिसके हाथ भी वह सत्ता सौंपती है, वह लोकतंत्र की जगह भ्रष्टतंत्र का पुजारी , संरक्षक अथवा मूकदर्शक हो जाता है। ठगी सी रह जाती है जनता, वह फिर से पुकार लगाती है-

ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ..
 
   सुबह साढ़े चार बजे जब होटल से निकलता हूँ और अपने शहर के मुकेरी बाजार तिराहे पर खड़ा अखबार का बंडल लेकर आने वाली जीप की प्रतीक्षा करता रहता हूँ , तभी इस कड़ाके की ठंड में जीवन का संघर्ष देखता हूँ। अलावा के लिये लकड़ी के अभाव में आजाद भारत के लोग सड़कों पर बिखरी पड़ी रद्दी सामग्री किस तरह से बटोर कर जला रहे होते हैं । यह गलन (ठंड) वैसे मुझे भी परेशान करता है, परंतु ललचाई नजरों से दूर से जल रही आग को देख गरमाहट महसूस कर लेता हूँ, क्यों कि जीप के आते ही अखबार वितरण के लिये साइकिल से नगर भ्रमण पर निकलना जो होता है। सोचता हूँ कि श्रम तो भरपूर करता हूँ , परंतु जेब खाली फिर भी क्यों है।
    उधर,  चुनाव को लेकर टिकट के अनेक दावेदारों ने अपनी तिजोरी खोल रखी है। करोड़ों में सौदा पटेगा और उससे दुगना- चौगुना खर्च होगा , परंतु किसी एक चौराहे पर अलावा जलवाने का कलेजा फिर भी नहीं है इन भावी प्रत्याशियों में। जब ढाई दशक पहले यहाँ की पत्रकारिता से जुड़ा था , तो पता चला था कि दस प्रतिशत कमीशन का खेल होता है, सराकरी धन से होने वाले विकास कार्यों में और अब किसी निर्माण कार्य पर स्वीकृत धनराशि का आधा भी ठीक से खर्च नहीं होता है। बनते ही सड़कें टूट जाती हैं, क्या किसी ठेकेदार को कठघरे में खड़ा होते देखा है आपने? पारदर्शिता किसी भी सरकारी कार्य में दिखती है आपको ?
   ऐसे भी अनेक लोगों के हाथ में आज अपना प्यारा तिरंगा है , वे ध्वज फहराते हैं , सलामी लेते हैं और हम बस ताली बजाते हैं। अपने राष्ट्रीय ध्वज को इनके गिरफ्त से किस तरह से आजाद कराया जाए । स्वच्छ प्रशासन का स्वप्न आम आदमी का पूरा हो। यह चुनौती नौजवानों के सामने है। क्रांति की उम्मीद तो सदैव इसी युवा वर्ग से रहती है। वह गीत है न -

हिंद के नवजवानो उठो शान से ,
अपनी हस्ती मिटा दो वतन के लिये....

      राष्ट्र भक्ति से भरे ऐसे गीतों को सुनकर कभी अपना भी मन भी झुम उठता था, बाहें फड़फड़ाने लगती थीं और देश प्रेम जाग उठता था। राष्ट्रीय पर्वों पर आज भी इन गीतों को सुनना मैं पसंद करता हूँ , अनेक सवाल मन में लिये, जिसका जवाब हमारे रहनुमाओं के पास नहीं है और कभी होगा भी नहीं , क्यों कि कठघरे में वे स्वयं हैं। मैं नहीं समझ पाता कि एक सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र ,जिसे कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था,जिसने सम्पूर्ण विश्व को मानवता का संदेश दिया, उसी देश में असमानता की खाईं इतनी गहरी क्यों हो चली है।
          छात्र जीवन की अनेक स्मृतियाँ ऐसे राष्ट्र पर्व से जुड़ी हैं। जब कुछ बनने की चाहत, कुछ करने की आकांक्षा थी। कितने शान से तिरंगा हाथ में लिये हम सभी बच्चे अपने विद्यालय जाया करते थें । वहाँ गुरुजनों से ऐसे पर्व की महत्वता को जानते समझते थें , सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ ही एक प्रमुख आकर्षण हम बच्चों को वहाँ मिलने वाला मिष्ठान होता था। युवावस्था में प्रवेश करने से पूर्व तक देशप्रेम की भावना कुछ ऐसी थी कि दिन भर राष्ट्रीय पर्व से जुड़े गीत सुना करता था। वाराणसी में पिता जी के विद्यालय में झंडारोहण की तैयारी से संबंधित सारा कार्य मैं ही करता था,  सजावट का यह गुण मुझे अपनी मौसी से प्राप्त हुआ है। अब यह बात और है कि न मैं अपने आशियाने को सजा पाया और न जीवन को , फिर राष्ट्र की सजावट में मेरी उपयोगिता कहाँ से रहती ?
       मेरी वे सारी महत्वाकांक्षाएँ , जो युवावस्था तक  राष्ट्र ,समाज , परिवार और स्वयं को लेकर थी, इस चिन्तन तक सिमट कर रह गयी है कि अपने देश में व्यवस्था परिवर्तन सम्भव नहीं है । न तो भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन मिलेगा और न ही भय मुक्त जनता होगी । पत्रकार हूँ अतः इन ढाई दशकों में करीब से राजनीति में बहुत कुछ परिवर्तन देखा हूँ। अपने प्रदेश में मंडल - कमंडल का कमाल देखा , जाति - मजहबी बयार  ,धनलक्ष्मी का धमाल और जुमलेबाजों की सरकार भी देखा हूँ। सत्ता परिवर्तन के लिये  हर तरह की राजनीति हुई, परंतु गरीबों की पहचान नहीं बदली, रोटी, कपड़ा और मकान की मांग नहीं बदली , नौजवानों की बेरोजगारी नहीं बदली और दौलतमंदों की तिजोरी नहीं बदली। हाँ, जिन क्रांतिकारियों ने अपनी हस्ती वतन की आजादी के लिये मिटा दी थी , आज उनके पथ पर चलने वालों की राह जरूर बदल गयी है। लोगों की  सोच बदल गयी है , वे चाहते हैं कि पड़ोसी का बेटा भगत सिंह बने, लेकिन उनका लाल टाटा, बिड़ला और अंबानी हो जाए, चाहे किसी भी तरह से ।  इतना तक भी ठीक परंतु नौजवान क्या चाहते हैं , इसपर चिन्तन और चिन्ता दोनों की ही आवश्यकता है। पहला तो यही कि वे रोजगार सरकारी नौकरी चाहते हैं। चाहे जिस भी प्रकार से उच्चशिक्षा की डिग्री उनके पास है ही। जिसकी ललक में वे कमोबेश दौड़-भाग करते है। लेकिन , जनसंख्या विस्फोट का दंश झेलते हैं। हजार में एक को आर्थिक रुप से सुखमय जीवन का यह मधुकलश (सरकारी नौकरी) मिल पाता है। शिक्षा प्राप्ति के बाद कुछ युवक छोटे- बड़े  पैतृक अथवा नये व्यवसाय में जुट जाते हैं , तो कुछ दूसरों की चाकरी करते हैं और सम्मान भरा जीवन चाहते हैं ।
  अब जब राजतंत्र नहीं रहा, देश गुलाम भी न रहा , ऐसे में फिर आमजन को उसके ही द्वारा चुनी गयी सरकार से यह उम्मीद तो रखनी ही चाहिए न कि भले ही वह प्राइवेट सेक्टर में हो, लेकिन उसके श्रम का इतना मूल्य मिलता रहे कि वह अपने परिवार का सामान्य तरीके से भरण पोषण कर ले। पहला अन्याय युवाओं के साथ यही से शुरू होता है कि आर्थिक स्थिति में बिल्कुल असमानता है। प्राथमिक पाठशाला का एक सहायक अध्यापक चालीस हजार से ऊपर  वेतन लेकर कक्षा से अकसर लापता रहता है और उससे कहीं योग्य शिक्षक छोटे शहरों में प्राइवेट स्कूल की नौकरी में मात्र पाँच हजार में पसीना बहा रहा है। सुबह से रात तक घर -घर जा बच्चों को पढ़ा कर अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींच रहा है। यह एक बानगी है। रोजगार की असमानता वाली इसी स्थिति से गुजर रहे करोड़ों लोग जिनकी मूलभूत आवश्यकताओं को निर्ममता के साथ बदस्तूर उसी तरह से कुचला जा रहा है, जैसा कि राजतंत्र में और गुलाम भारत में होता रहा । फिर यह शिकायत स्वभाविक है -

अंधेरे में जो बैठे हैं,
नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रोशनी वालों
बुरे इतने नहीँ हैं हम
ज़रा देखो हमें भा लो
कफ़न से ढांक कर बैठे
हैं हम सपनों की लाशों
को..
   युवावर्ग उस जुगाड़ तंत्र को भी देख रहा है कि कतिपय समाज के ठेकेदारों, राजनेताओं , अपराधियों और भ्रष्टजनों  ने किस तरह से राष्ट्र के सम्पूर्ण वैभव को अपनी मुट्ठी में कर रखा है। मानो देश की तकदीर को ही बंधक बना लिया हो।
 लोकतंत्र में एक और बड़ा उलटफेर हुआ है।पहले कुछ ही राजनेता , मुखिया और सम्पन्न व्यक्ति अपने वर्चस्व के लिये माफियाओं की बैसाखी खरीदते थें, परंतु जब से कुछ प्रमुख क्षेत्रीय राजनैतिक दलों ने विभिन्न प्रांतों में सत्ता पर अधिकार जमाना शुरू किया, माफिया स्वयं माननीय हो गये। जो दोनों हाथ से सरकारी खजाने को लूट रहे हैं, बिना किसी प्रतिरोध के, ऐसे लोग जब मंच से तिरंगा फहराएंगे और शुचिता की बातें करेंगे, तो निश्चित ही सच्चाई, ईमानदारी, पवित्रता , मानवता कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र भक्ति जैसे गुण स्वतः ही जंजीरों में जकड़ जाएँगें। यह युवावर्ग इसीलिये गुमराह है। वह यह समझ रहा है कि सारा वैभव उसी के पास है जो चतुर बहेलिये की तरह हो और लोकलुभावनी बातों का जाल बिछा कर भोली जनता का आखेट करना जानता हो।
    दुर्भाग्य से आज ऐसे ही अनेक लोग हमारे बलिदानी क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के उत्तराधिकारी बन गये हैं। देश का नौजवान रंग बदलती इस दुनिया की रीति नीति को देख रहा है। उसी दौड़ में शामिल होने की होड़ में यह भूल बैठ रहा है कि "रंगे सियार" की स्थाई पहचान नहीं होती है। वहीं जिन्होंने त्याग किया, जो बलिदान से पीछे न हटें, आज भी यदि कहीं कोई  खंडहर है उनके नाम से तो वहाँ दीपक जलते हैं, श्रद्धा से जनमानस नतमस्तक होता है,  वे अमर हैं, यह बात इन नौजवानों को फिर से बतलाना होगा -

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा..।
(शशि गुप्ता)

Sunday, 20 January 2019

जो दुनिया जीवन से खेले..!

जो दुनिया जीवन से खेले..!
******************
   इस दुनिया के मेले में क्यों मन रमा रहा है , किसी से "स्नेह की भीख " मांगने से अच्छा है कि तू फंटूश फिल्म के इस गीत को गुनगुनाये जा
***********************

दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना
जहाँ नहीं चैना वहाँ नहीं रहना
दर्द हमारा कोई न जाने
अपनी गरज के सब हैं दीवाने
किसके आगे रोना रोएं
देस पराया लोग बेगाने..

      विवाह- बारात का मौसम है। चहुंओर गाजे बाजे का शोर है। भव्य मंडप जिसके समीप ही डीजे पर स्त्री , पुरूष और बच्चे सभी थिरक रहे हैं। अगली सुबह शहनाई की गूंज के संग विदाई का रश्म पूरा होते ही , यह समारोह स्थल तन्हाई में बदल जाता है। यहाँ सजे हुये फूल बिखर जाते हैं, पांव तले कुचले जाते हैं और विवाह मंडप से बाहर कूड़ेदान में पहुँच जाते हैं।
   कैसी विचित्र सृष्टि की संरचना हैं , आज हँसी है, तो कल रोना है। जीवन के प्रारम्भ होते ही मृत्यु की आहट हर पल तेज होती जाती है, तो फिर क्या शहनाई और क्या तन्हाई ?
शहनाई का संग तो पल दो पल का है,लेकिन तन्हाई महबूबा है। वह गीत है न -

ज़िन्दगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी
मौत मेहबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी..

 सो,मैं इसी तन्हाई के लबादे को कसता जा रहा हूँ। उसी महबूबा से मिलन की चाह लिये ।
   अभी पिछले ही दिनों एक कसाई की दुकान के समीप से गुजर रहा था,जहाँ पर मैंने एक तंदुरुस्त बकरे को देखा । बड़ा  इतरा रहा था अपने भाग्य पर, क्यों कि कसाई बड़े जतन से उसकी देखभाल जो करता था ,किन्तु वहीं मैंने जीवन का यह सच भी देखा कि जो हाथ कभी स्नेह से उसका पीठ सहला रहा था, उसकी क्षुधा शांत कर रहा था,वहीं हाथ उसका कत्ल कर रहा था , तब बकरे के जीवन के प्रति उसे तनिक भी मोह न हुआ। मतलब की यह दुनिया है।
   हाँ, मैंने उसके गर्दन पर छूरा चलते समय समीप खड़ी बकरियों जिन पर यह मूर्ख बकरा अपना अधिकार समझता था, उनकी आँखों का भय देखा है । वे नहीं समझ सकेंगे इसे ,जो उनका गोश्त टटोल रहे होंगे । विडंबना यहाँ भी यह है कि इन बकरियों को बकरे की मौत से कहीं अधिक अपने जीवन का भय है ..

माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥

   छात्र जीवन में इस दोहे की उपयोगिता हम विद्यार्थियों के लिये मात्र हिन्दी व्याकरण की दृष्टि से रही, परंतु अब इसके  चिन्तन पक्ष को समझ सकता हूँ ।
        यह निष्ठुर प्रकृति हमारे साथ यही तो करती है।  कबीर दास की यह सबक याद है न..

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे।
 एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूगी तोहे।।

     वह हमें मिटा देगी, अपने में समा लेगी तय है । आश्चर्य तो यह है कि फिर भी हम उसी स्नेह के पीछे दौड़ते हैं, जो निश्चित ही हमें कष्ट देगा,आज नहीं तो कल।
    माँ थी, तो मैं भी उसी बकरे की तरह तंदुरुस्त था। स्नेह और बढ़िया भोजन दोनों ही मिलता था। माँ के असमय जाने पर उस कसाई ने अपना यह धर्म भुला दिया , मेरे प्रति कि  कत्ल से पहले वह मेरी आवश्यकताओं का ध्यान रखता।
  वैसे तो ऐसा न कर वह स्वयं ही घाटे में है, क्यों कि दुर्बल बकरे में मांस कम होगा तो कीमत भी कम मिलेगी उसे। अतः मुझे तो  हँसी आती है, उसकी इस मूर्खता पर कि वह क्यों घाटे का सौदा किये है। थोड़ी खुशी मुझे भी बख्शी होती , तो उसे कोई मालदार सौदागर मिलता, तब मेरी इन सूखी हड्डियों में कुछ गोश्त जो होता।
    और रही बात उस छूरे के भय की, जिसे वह मुझे  व्यर्थ ही दिखला रहा है । मैं तो स्वयं ही सांसों की इस डोर से आजाद होने के लिये व्याकुल पथिक बना मुक्ति पथ की ओर बढ़े जा रहा हूँ। ऐसा कोई स्नेह का बंधन नहीं रहा , जो हाथ पकड़ मेरी राह रोकता हो । माँ से बिछुड़ने के बाद आशियाना और मुसाफिरखाने सभी मेरे लिये एक जैसे रहें।

     मौत के चौखट पर इन आँसुओं का कोई मोल नहीं होता है। उसमें "मानवता" कहाँ होती है अन्यथा जीवन की आयु सीमा तय होती। मृत्युदंड से पूर्व अंतिम इच्छा पूछ ले , इतनी तो इंसानियत उसमें होनी चाहिए न ..?  हमारे इस प्रश्न पर वह यह कह उपहास उड़ाती है कि तुम मनुष्य क्या ऐसा नहीं करते हो , कभी किसी को राह चलते अपने वाहन के पहिये तले रौंद दिया , तो कभी किसी को निजी खुन्नस में ठोंक दिया। कितने ही युद्ध तुमने अकारण निजी महत्वाकांक्षाओं के लिये लड़े हैंं।
       मेहंदी हाथ की छूटी भी नहीं कि विधवा विलाप सुन मुझ जैसे पत्रकारों का हृदय भी कभी- कभी दहल उठता है, अंत्यपरीक्षण स्थल पर इस करुण क्रंदन को ही नहीं उस माँ के रोते हृदय से भी हमारा सामना होता है , जिसकी गोद में उसका लाल सोया होता है, ममता की डोर तोड़, माटी का पुतला बना पड़ा होता है।
        इस कत्लखाने में बकरे की चीख पर रहम किसे आता है ? ग्राहक को मांस चाहिए और विक्रता को धन, फिर बकरे के दर्द का क्या ?  अरे , नादान क्यों छटपटाहट है तूँ इतना । छूरा किसी के गर्दन पर चले या किसी के मासूम हृदय को आहत करे , रक्त तो दोनों का ही सूर्ख है।  कौन समझाय इस मन को  कि मत हाथ पसारा करो-

लाख यहाँ झोली फैला ले
कुछ नहीं देंगे इस जग वाले
पत्थर के दिल मोम न होंगे
चाहे जितना नीर बहाले..

   यही इस जगत का सत्य है। अध्यात्म, चिन्तन और विज्ञान को चाहे जितनी भी ऊँचाई तक हम ले जाएँ । अंहिसा के पुजारी महात्मा गांधी ही क्यों न बन जाएँ , फिर भी याद रखना है कि मृत्यु हमसे स्नेह नहीं करेगी।
   इस दुनिया के मेले में क्यों मन रमा रहा है , किसी से "स्नेह की भीख " मांगने से अच्छा है कि तू फंटूश फिल्म के इस गीत को गुनगुनाये जा -

अपने लिये कब हैं ये मेले
हम हैं हर इक मेले में अकेले
क्या पाएगा उसमें रहकर
जो दुनिया जीवन से खेले..!

      तब भी सत्य तो यही है न कि हमें ये सारी अनुभूतियाँ इसी जगत और इसी मानव तन से  प्राप्त हुई हैं । यदि मृत्यु सत्य है, तो उसका आश्रय स्थल यह जगत कैसे असत्य हो सकता है, अन्यथा ये दोनों ही नश्वर हैं ?

Friday, 18 January 2019

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार..

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार..
************************
  एक कल्पना, एक दिवास्वप्न और एक उम्मीद में कभी खो जाता हूँ कि हम मनुष्यों की ऐसी कोई बस्ती कहीं तो होगी, जहाँ  "मानवता" का पुष्प खिला हो । जिसकी पंखुड़ियों को बिखेरने वाले अमानवीय हाथ वहाँ न हो। हम भी जहाँ इसी तरह झूम,नाच और गा लें
****************************

किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है..

   बिखरी हुई इंसानियत और कदम- कदम पर मिली तन्हाई से यह मासूम दिल जब भी उदास होता है, अनाड़ी फिल्म का गीत उसे एक पैगाम देता है। मुकेश की जादुई आवाज़ में राजकपूर को उछले, कूदते , मुस्कुराते और गुनगुनाते देख व्याकुल मन बरबस बोल उठता है , वाह! यही तो मानवता है। एक कल्पना, एक दिवास्वप्न और एक उम्मीद में कभी खो जाता हूँ कि हम मनुष्यों की ऐसी कोई बस्ती कहीं तो  होगी, जहाँ मानवता का पुष्प खिला हो । जिसकी पंखुड़ियों को बिखेरने वाले अमानवीय हाथ वहाँ न हो। हम भी जहाँ इसी तरह झूम,नाच और गा लें। भीड़ भरी सड़कों पर निकलते ही ठोकर खाने का भय न हो , गलियों के सन्नाटे में घुटन न हो , अपने ही आशियाने में षड़यंत्र न हो और घरौंदे के उजड़ने का दर्द जीवन की खुशियों को वक्त से पहले ही  विरक्त न कर दे ।  मानव, मानव जीवन, मानव प्रवृत्ति, मानव स्वभाव की पहचान मानवता से ही है, अन्यथा पशुवत है हम।अपने मन, वचन और काया से, दूसरों की मदद करना, यही मानव जीवन का उद्देश्य है। गोस्वामी तुलसीदास ने मानवता की परिभाषा कुछ यूँ बताई है-

'परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई'।

      वैसे, यह हृदय है न जो हमारा ,वह हमारे प्रत्येक मानवीय और अमानवीय कार्यों पर मुस्कुराता और मुर्झाया करता है।  मन की आवाज से बढ़ कर कोई पाठशाला नहीं है, मानवता को समझने का।

   अमानवीय हाथ की बात से ही अपने विचारों को व्यक्त करने का प्रयास करता हूँ। जिसने प्रथम विश्वयुद्ध ( महाभारत) को जन्म दिया। याद करें हस्तिनापुर की वह राजसभा जिसमें एक धर्मराज ने जिन हाथों से पासा फेंक द्यूतक्रीड़ा में अपनी पत्नी को दांव पर लगाया था , युवराज के उस हाथ को भी जो बार - बार जंघा को थपथपा रहा था, किसी नारी कि अस्मत को तार- तार करने के लिये उतावला हो रहा था और उन हाथों को भी जिसने भरी सभा अग्रज की पत्नी के चीरहरण का प्रयास किया। साथ ही "मानवता" के उस हाथ को भी समझने का प्रयास करता हूँ ,जिसे देख एक कवि ने यूँ लिखा-

 सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है
सारी ही की नारी है कि नारी की ही सारी है..

   मानवता पर ऐसे कुठाराघात का वर्णन और कहीं भी नहीं है कि एक राजा के दरबार में उसकी ही कुलवधू न्याय की गुहार लगा रही हो,अपने अस्मत की रक्षा की पुकार लगा रही हो। वहाँ बैठें जितने भी ध्यानी, ज्ञानी, विज्ञानी भद्रजन थें , सभी उसके अपने थें ,जिनमें उसके वे बलशाली पाँच पति भी थें ,परंतु इन सारे नेत्रहीनों की सभा में मानवता का दीपक लिये खड़े एक विदुर को छोड़ किसी ने भी कुलवधू का चीरहरण होते देख प्रतिकार नहीं किया। जिसका परिणाम महाभारत रहा। उस राजसभा में मानवीय मूल्य को भूल अपनी निजी प्रतिज्ञा को जिन्होंने भी महत्व दिया, वे भी नष्ट हो गये इस युद्ध में। महाभारत कथा की दृष्टि से इसे ऐसा विश्वयुद्ध मान सकते हैं। जिसमें लाखों स्त्रियों को विधवा होने का दंश सहना पड़ा। लिंगानुपात असंतुलित हुआ और इसकी परिणति इस कलयुग का प्राकट्य है।
     अब तो इंसानियत किस तरह से हैवानियत में बदल गयी दामिनी कांड उसका एक घिनौना चेहरा है। छोटी- छोटी बच्चियों के साथ दुष्कर्म और साक्ष्य छिपाने के लिये उनकी निर्मम हत्या तक कर देते हैं ऐसे दरिंदे। ऐसी घटानाओं में समाचार संकलन के दौरान कांप उठता है हृदय हम पत्रकारों का भी। जिसे नासमझ बच्ची अंकल जी कहती थी , उस मासूम को टाफी दिलाने का प्रलोभन दे, ऐसा कृत किया जो कोई पशु भी न करता हो। ऐसे में मानवता चित्कार कर उठती  है-
  देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान
कितना बदल गया इंसान कितना बदल गया इंसान
सूरज न बदला चांद न बदला ना बदला रे आसमान
कितना बदल गया इंसान कितना बदल गया इंसान...
   
   विदेश में रह रहे एक बेटे ने पिता की मृत्यु के बाद अपने वतन लौट अपनी माँ से कहा कि जो यह भवन है न उसे बेच दो और चलो साथ ,वहाँ तुम्हारी पुत्रवधू  सेवा को तत्पर रहेगी। उधर मकान बिका और इधर एयरपोर्ट पर माँ को छोड़ पुत्र लापता । पुत्र के इस धोखे से आहत बेचारी माँ जब वापस लौटी उसी घर में , तो जानते हैं सजल नेत्रों से नये गृहस्वामी से उसने क्या कहा था , यही कि इस मकान को उसके मृत पति ने अथक परिश्रम से बनवाया था , अतः  इसी में दाई की नौकरी दे दो, आखिरी सांस जीवन का वह अपने पति के घर ही लेना चाहती है।वह टूट चुकी थी और विश्वास नहीं कर पा रही थी कि जिस लाडले को इतनी ऊँचाई दी, वह इतना नीचे जा गिरेगा। लेकिन, तभी मानवता ने हाथ बढ़ा उस वृद्ध महिला को सम्हाल लिया , क्यों कि नये भवन स्वामी ने यह जो कहा , " माँ मुझे ही पुत्र समझ ले न, आप यहाँ अभिभावक बन कर रहें ।"

   हम इसी इंसानियत की तलाश करते हैं । हर मनुष्य चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो कभी न कभी मानवता उसमें आ ही जाती है। छात्र जीवन में विद्यालय में एक कहानी "तैमूर की हार पढ़ी" थी। जिसमें यह क्रूर आक्रमणकारी एक बच्चे से कहता है कि तैमूर खूंखार है, लेकिन वह बहादुर बच्चे को सलाम करता है। तेरा दूध और चाकू  हमेशा याद रहेगा,  बिना खूनखराबा किये यह गांव छोड़ कर वह जा रहा है। उस बालक की निर्भिकता ने एक लुटेरे के हृदय में कुछ क्षण के लिये मानवता को जन्म दे दिया।
    बुद्ध के समक्ष आते ही अंगुलीमाल डाकू से साधु हो गया । उसका हृदय गुनगुनाने लगा-

मिटे जो प्यार के लिए वो जिंदगी
जले बहार के लिए वो जिंदगी
किसी को हो न हो, हमें तो एतबार
जीना इसी का नाम है..

      सच तो यही है कि कायर मनुष्य कभी मानवता का उपासक हो ही नहीं सकता है। कोई भी ध्वज तभी सुरक्षित रहेगा है,जब उसका आधार (दंड) दृढ़ हो। सिर्फ भावनाओं से करुणा से मानवता की रक्षा संभव नहीं है। इसके लिये कठोरता भी होनी चाहिए । बौद्ध धर्मावलंबी अहिंसक तिब्बतियों से यही गलती हुई। भावनाओं में बह कर कभी हमनें भी "हिन्द- चीन भाई " कहा था। हमारे रहनुमाओं की यह मानवता राष्ट्रीय अस्मिता के लिये महंगी पड़ी।

         यह चुनावी वर्ष है , तो बात थोड़ी राजनीति पर भी हो जाए।  महामानव बने लोग खादी के वस्त्रों में लकदक जन मंच से मानवीय कल्याण के पक्ष में बड़ी बड़ी लच्छेदार बातें करेंगे। लेकिन , यह सब उनका मुखौटा मात्र होगा। पर याद रखें कि गांधी की तरह लंगोटी में कोई न होगा, न ही लाल बहादुर शास्त्री की तरह सादगी की झलक उनके चाल चलन से दिखेगी। महंगे लग्जरी वाहनों का काफिला , धनवर्षा करता प्रचारतंत्र और झूठे आश्वासनों का पिटारा इनके संग होगा। चुनाव प्रचार के दौरान आमजन के प्रति कुछ ऐसा दुलार दिखलाएँगे कि इनसे बड़ा मानवता का पुजारी और कोई है ही नहीं।
अपने जनपद में भी पाँच वर्ष पूर्व वे बुझी काटन मिल की चिमनी में धुआँ करने का आश्वासन देकर  चले गये थें। भोली जनता ने मानवीय गुण का परिचय दिया और उन्हें सिंहासन सौंप दिया ।  मानवत कथनी और करनी की इन रहनुमाओं की यह रही कि बेरोजगार, बदहाल, बेबस अपने जनपद के नौजवान  आज भी इस बुझी चिमनी ( कलकारखाने की चाह)को टुकुर- टुकुर ताक रहे हैं।
         मुट्ठी भर राजनीति के नेताओं, अर्थपतियों, सफेदपोश अपराधियों और धनलोलुप कुछ नौकरशाहों ने इंसान और इंसानियत से जुड़ी सारी व्यवस्थाओं को चौपट कर रखा है। मानवता खून के आंसू रो रही है, फिर भी मजे की बात यह है कि वे ही इस समाज के भाग्य विधाता बने बैठें है। सभामंडप में बापू (महात्मा गांधी) का द्वितीय अवतार स्वयं को साबित करने के लिये शब्दजाल बुनते रहते हैं। मानवता  इसी में बंधक बनी छटपटाहट रही है। इनकी चकाचौंध भरी दुनिया को देख युवावर्ग दिगभ्रमित है,वह भी मानवीय गुणों का त्याग कर इस अंधकूप में छलांग लगा रहा है।
      नैतिक शिक्षा का वह सबक  जिससे विद्यालय में बच्चे स्वयं ही मानवीय गुणों से परिचित हो जाते थें , वह कहाँ और क्यों गुम हो गया है । सभ्य समाज को इस पर गंभीर चिन्तन करना होगा। पहला तो यही कि जो जनहित में तप ( सृजन) कर रहा हो, समाज उसका संरक्षण करे, उसके कार्य , उसके श्रम, उसकी निष्ठा और निःस्वार्थ भाव से की गयी उसकी साधना को सम्मान दें। उसके इन मानवीय गुणों का उपहास इन शब्दों से करना कि जमाने के साथ चलना  नहीं  सीखा । इससे बढ़ कर अमानवीयता और कुछ भी नहीं है। ऐसे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों को जिस मंच से सम्मान- पुरस्कार मिलना चाहिए , उसपर यदि कोई जुगाड़ तंत्र से अपना अधिकार जमा लेगा ,तो दिन प्रतिदिन मानवता का इसी तरह से क्षय होगा। इन ढ़ाई दशकों में पत्रकारिता के क्षेत्र में उपेक्षा ,उपहास और बेरोजगारी के इस दर्द से मैं  गुजर चुका हूँ। राजनीति, साहित्य और समाज सेवा के मंच पर मुझसे भी अधिक त्याग करने वालों के हृदय को टटोले जरा उनकी इसी "मानवता" ने अनेकों जख्म उसे दिये हैं। भ्रष्ट राजनीति के अपराधीकरण ने माननीयों की परिभाषा बदल दी है। बगुला जब समाजसेवा के मंच पर "हंस" बन खड़ा हो , तो फिर मानवीय गुणों का संरक्षण कदापि सम्भव नहीं है ।

          जब बनारस में कम्पनी गार्डेन से मेरी दोस्ती थी। वहाँ , एक मानव जी , जो कवि भी थें, प्रातः भ्रमण को आते थें। धर्म ग्रंथों की कथाओं को ज्ञान-विज्ञान की तराजू पर तौला करते थें। अतः वहाँ काशी में वामपंथियों जैसी उनकी वाणी को मुझ जैसे चंद युवकों को छोड़ कौन पसंद करता। परंतु एक बात वह यह कहते थें कि बेटा मतभेद विचारों का हो ठीक है,मनभेद मत करना कभी। यदि संकट काल में किसी ने सहायता को पुकारा तो उसकी जाति- धर्म न देखना। यह जो दिल से दिल तक का रिश्ता है न यही "मानवता" है।

 रिश्ता दिल से दिल के एतबार का,
जिंदा हमीं से नाम प्यार का,
कि मरके भी किसी को याद आएँगे,
किसी के आँसुओं पे मुस्कराएँगे,
कहेगा फूल हर कली से बार-बार
जीना इसी का नाम है..

   यह गीत मुझे बेहद सुकून देता है, जब कभी मेरा हृदय स्वयं को छला हुआ, ठगा हुआ महसूस करता है।
   -व्याकुल पथिक
 (जीवन की पाठशाला )

Monday, 14 January 2019

चली-चली रे पतंग मेरी चली रे ..


चली-चली रे पतंग मेरी चली रे ...
***********************
चली-चली रे पतंग मेरी चली रे
चली बादलों के पार हो के डोर पे सवार
सारी दुनिया ये देख-देख जली रे...

   मकर संक्रांति पर्व है आज । मैं कब से नीले आसमान में रंगबिरंगी बड़ी -छोटी पतंगों को इठलाते देख रहा था। उस अनंत की ऊँचाई नापने की एक मासूम सी कोशिश में जब वे मचलती ,उछलती और फड़फड़ाती हैं , तो पतंगबाज मुस्कुराते हैं।यही नहीं इन्हें आपस में लड़ाते भी है और जब कोई पतंग कट जाती है , असहाय सा नीचे की ओर गिरने लगती है । उसी दौरान विजेता के ' वह काटा- वह काटा ' के अट्टहास से आकाश गूंज उठता है।
       .दो पतंगों के पेंच की लड़ाई में एक दूसरे की डोर काटने का यह जो जुनून पतंगबाजों की होती है। जिसके लिये वह अपने सारे अनुभवों का उपयोग करता है। वह यह व्यवस्था करता है कि डोर( मांजा) मजबूत रहे और पतंग भी अच्छी रहे। तब जाकर उसका मनोरंजन पूर्ण होता है।
         कटी हुई पतंग जो नीले अंबर से अगले पल धरती की ओर गिरने लगती है , सोचे जरा उसका अस्तित्व क्या होता है । उसे तो लूटने के लिये लोग दौड़ते हैं। उस पर भी यदि किसी एक का अधिकारी नहीं हुआ , तो सब मिल कर उसे लूटते हैं और वह फट जाती है, मिट जाती है, किसी को याद नहीं रहता कि कुछ क्षण पूर्व यह खूबसूरत पतंग इस आसमान की ऊँचाई छू रही थी। पतंगबाजों का मनोरंजन कर रही थी।  जमीन पर पड़ी इस फटी हुई कटी पतंग को पांव तले मत कुचलो मित्र , इससे कुछ सबक लो।
    कैसी विचित्र विडंबना है कि ये पतंग आपस में कभी नहीं लड़ती - झगड़ती हैं , पर यह डोर इनकी दुर्गति का कारण बनती है। जब तक डोर नहीं बंधी रहती है , पतंग बेखौफ पतंग विक्रेता के यहाँ पड़ी रहती है , पर जैसी ही "धागा" के बंधन में आयी , वह पतंगबाज के अधीन हो गयी जो फिर अपना मनोरंजन उससे करेगा। निर्माता ने धन की चाह में उसे बेच दिया। पतंगबाज ने अपने मनोरंजन के लिये उसे कटी पतंग बना दिया और लुटेरों ने उसका छीना झपटी कर उसका अस्तित्व मिटा दिया।
    इसी को आधार बना मैं अपने चिन्तन को शीर्ष पर ले जाने का प्रयत्न जब भी करता हूँ ,तो जीव(पतंग) , माया(डोर) और ब्रह्म (मनुष्य) , मेरा दृष्टिकोण कुछ ऐसा हो जाता है । फिर मुझे लगता है कि इस पतंग की तरह हम भी तो किसी के मनोरंजन की सामग्री तो नहीं है। इस तरह के चिन्तन से मन आहत होता है , वह प्रश्न  करता है -

 दुनियाँ बनाने वाले, क्या तेरे मन में समायी
काहे को दुनियाँ बनायी, तूने काहे को दुनियाँ बनायी
काहे बनाये तू ने माटी के पुतले
धरती ये प्यारी प्यारी, मुखड़े ये उजले…

   इस सवाल का सही जवाब किसी के पास नहीं है कि आखिर यह दुनिया किसके मनोरंजन के लिये बनायी गयी है।  हम सब तो बस पतंग हैं,माया-मोह रूपी यह डोर जीतनी मजबूत होगी, हम उतना अधिक आसमान में फड़फड़ाते हैं, फिर भी जमीन पर गिरना ही नियति है हमारी।
    अतः यह तो तय है कि हम कर्ता नहीं है, नियति के अधीन हैं, बात यदि कर्मफल की करूँ, तो यहाँ भी मेरा चिन्तन इस चिन्ता में बदल जाता है कि कर्मफल से नहीं जुगाड़ तंत्र(छल प्रपंच) से यह दुनिया चल रही है। अन्यथा स्नेह का ,श्रम का, कर्त्तव्य निष्ठा का प्रतिफल हमें उस अनुपात में न सही तो भी कम से कम संतोष जनक निश्चित मिलता। पत्रकारिता में हूँ, यदि थोड़ा सा अपने पथ से हट जाता तो आज मेरे पास भी वह तमाम भौतिक सुविधाएँ निश्चित होतीं। बंगले, मोटर और रूतबे से ही अब तो हम लोगों को भी सम्मान मिलता है । जिनके पास धन है ,जुगाड़ है , वे सब लोकतंत्र के प्रहरी "माननीय" बन जा रहे हैं। अपराधियों को भी दागी जनप्रतिनिधि कोई कहाँ कहता है , बल्कि उनके दरबार में कहीं अधिक रौनक रहती है।

           खैर ,विषय मेरा यहाँ पतंग , डोर और पतंगबाज है यहाँ , तो क्या हमें भी किसी ने  अपने आनंद के लिये पतंग का रुप दे रखा है। सच तो यह है कि हम इंसान आपस में कभी नहीं झगड़ते है। हम जिस डोर रूपी भावनाओं से बंधे हैं, वे भड़कती हैं,भभकती हैं और फिर बुझ जाती हैं ,हमें कटी पतंग बना कर।
    अन्यथा तो हमारा मन सदैव विश्राम की स्थिति में रहता है , जगतगुरु शंकराचार्य की तरह यह उद्घोष करते हुये-

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ...

   संत , दार्शनिक , वैज्ञानिक  , आस्तिक और नास्तिक  जिनमें भी थोड़ी चिन्तन शक्ति है , वह इसी खोज में है कि मृत्यु  के बाद क्या ..? सृष्टि के निर्माण का रहस्य क्या है ?? पहले बताया जाता था कि चंद्रमा पर जो काला धब्बा है, वहाँ एक बुढ़िया सूत कात रही है। धर्मशास्त्रों में तो इस पर कई कथाएँ हैं , लेकिन विज्ञान ने बताया कि ये ऊँचे पहाड़ और गहरी खाईं के निशान हैं। पर इस ब्रह्मांड का एक छोर भी विज्ञान अभी तक नहीं पकड़ पाया है,तो इसके निर्माण और निर्माता की कैसे जाने।

  अपनी बात करूं तो चिन्ता से यदि चिन्तन की ओर बढ़ता हूँ, तो वह मानसिक संतुष्टि जो उस छोटे से आश्रम जीवन में मुझे प्राप्त हुयी थी , वह मुझे पुकार रही है, विवेक की पहरेदारी  मेरे आहत हृदय पर इन दिनों बढ़ती जा रही है। वह मानो बार बार उलाहना दे रहा है कि इस वर्ष के प्रथम दिन जब तुम बिल्कुल एकाकीपन  की अनुभूति कर रहे थे, तुम्हारी भावनाएँ तुम्हारे हृदय को आहत कर रही थीं , तब कोई था तेरा, कोई स्नेहीजन , कोई प्रियजन ..?  वह मुझसे निरंतर झगड़ रहा है कि आश्रम छोड़ कर तुम्हें क्या मिला ? कोई ऐसा डोर अब भी मोह का शेष है ..? वैसे, उसका यह कड़वा सच मेरे हृदय की वेदना पर मरहम की जगह जख्म  पर नमक के छिड़काव जैसा है।  मैं शर्मिंदा हूँ ,बस एक आत्मसंतुष्टि लिये कि चलो इसी बहाने दुनिया तो देख ली । अपना- पराया, दुख- सुख, प्रेम और छल , षड़यंत्र और धोखा , धनलक्ष्मी का खेल, किसी के प्रति भी अत्यधिक कर्तव्यपरायणता का दंड जैसी अनुभूतियाँ मुझे वही संदेश एक बार फिर से दे रही हैं जिसे ग्रहण कर सिद्धार्थ ने ज्ञान प्राप्त की और गौतम बुद्ध बन गये। बड़ा सरल सा संदेश रहा उन नृत्यांगनाओं का,  वीणा के तार के संतुलन की ही तो बात उन्होंने कही थी।
     मनुहार, प्रेम , स्नेह युक्त भोजन और वह क्षुधा  जिनका उपभोग गृहस्थ प्राणी करते हैं ,उसकी आकांक्षा और कल्पना हम जैसों को नहीं करनी चाहिए, अन्यथा जिन्हें तुम अपना मित्र समझते हो, वही तुम्हारा उपहास करेंगे। यह तुम्हें ही तय करना है कि इनसे किस तरह से मुक्त हो , किस आश्रम के पथ की ओर कदम रखते हो । कटी पतंग कहलाने से पूर्व आसमान की ऊँचाई पर पहुँचना ही जीवन की सार्थकता है।
   कोलकाता में था,तो सिर्फ आज के ही दिन मुझे किसी के देखरेख में पांचवीं मंजिल के ऊपर छत पर जाने की अनुमति थी, पतंग लेकर । बनारस में था तो हम तीनों भाई-बहन गैस वाले गुब्बारे उड़ाते थें। पतंग उड़ाना नहीं सीख पाया, परंतु कटी पतंगों को    सहेज - संवार कर रखता था। ऐसी अनेक पतंग मेरे कमरे में टंगी रहती थीं। एक विशेष मोह था ,इनके प्रति मुझे। कभी - कभी तो अभिभावक नाराज भी हो जाते थें कि  मैं क्यों कमरे को कूड़ाघर बना रखा हूँ। पिता जी अध्यापक थें, अतः पतंग से उन्हें नाराजगी थी। छिपा कर मैं इन कटी पतंगों का रखा करता था। समझ में नहीं आता कि मैं किस राह पर चल पड़ा कि आसमान की ऊँचाई छूने से पूर्व ही कटी पंतग बन आ गिरा और मुझे किसी का सहारा( स्नेह)  न मिल पाया  ?

 न किसी का साथ है, न किसी का संग
 मेरी ज़िंदगी है क्या, इक कटी पतंग है ...

बस इस प्रश्न का उत्तर चाहता हूँ,अपनी किस्मत से।