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Friday, 18 October 2019

इक वो भी दीपावली थी..


हमारी छोटी-छोटी खुशियाँ( भाग- 3 )
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    सच कहूँ तो पहले अभाव में भी खुशियाँ थीं और अब इस इक्कीसवीं सदी में सबकुछ होकर भी खुशियों का अभाव है।
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    पिछले कुछ महीनों में स्वास्थ्य तेजी से गिरा है, फिर भी ठीक पौने चार बजे ब्रह्ममुहूर्त में शैय्या त्याग देता हूँ । आश्रम में रहने का एक बड़ा लाभ यह हुआ है कि मैंने  वहाँ जो अनुशासित जीवन व्यतीत किया है , वह सदैव के लिए  मेरी दिनचर्या बन गया है । इस शरीर का क्या है- माटी का पुतला बोले न बोले, तो निर्बल काया का शोक क्यों करूँ ?
     अतः आलस्य त्याग प्रातःभ्रमण करता हूँ, स्वास्थ्य के लिये ही नहीं , मानसिक शांति भी इससे मिलती है। आश्रम में था तो गुरुदेव कहते थें कि साधु और साधक दोनों को श्रम अवश्य करना चाहिए।
    आश्रम के समीप अखाड़े का जो कुआँ था, यदि हम अपने स्नान के लिये दो बाल्टी  जल उसमें से लेते थें , तो इतना ही पानी वहाँ स्थित पानी टंकी में डालना होता था । इस नियम का पालन सभी करते थें ।
    किसी वस्तु का स्वयं उपभोग करने के साथ ही हम औरों का भी कल्याण करें, यह संदेश इसमें निहित था।  खैर, वे दिन अब लौट के नहीं आएँगे , परंतु उनकी सुखद स्मृतियाँ सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगी ।
  आज सुबह के सन्नाटे को चीरते हुए ,  सिखों की टोली शब्दकीर्तन  करते हुये सड़क पर दिख गयी । जिसमें शामिल पुरुष,महिला और बच्चे ढोल- मंजीरा बजाते हुये गुरुद्वारे की ओर जा रहे थें ।  कार्तिक माह प्रारम्भ जो हो गया है ।अतः गंगाघाटों पर भी स्नानार्थियों की संख्या काफी बढ़ी हुई दिखी ।
  ऐसा खुशनुमा वातावरण मुझे सदैव लुभाता है । काशी में था तो कमंडल हाथ में लिये घर से सीधे पंचगंगा घाट पहुँच जाया करता था ।
    वे भी क्या खुशियों भरे दिन थें,यह सोच ही रहा था कि कालिम्पोंग का वह दृश्य याद हो आया, जब गोरखालैंड को लेकर हिंसक आंदोलन चल रहा था । इसके बावजूद भी उस ठंड , कोहरे और दहशत भरे वातावरण में इसी तरह सुबह सिखों की टोली बेखौफ निकला करती थी । तब मैं भी रजाई त्याग बाहर निकल बारजे पर आ जाता था । वे सभी पहाड़ी ढलान और चढ़ाई से होते हुये गुरुद्वारे को जाते थें । मैंने सोचा कि यह कितनी बहादुर कौम है , न तो कोई भय न ही किसी तरह की शिथिलता , मुझमें भी इनकी तरह स्फूर्ति एवं उत्साह होना चाहिए । इसी सकारात्मक सोच का परिणाम रहा कि वहाँ मैं प्रातःभ्रमण पर निकलने लगा। पहाड़ी क्षेत्र में सुबह-शाम भ्रमण का अपना ही आनंद  है  ।
   वहाँ वह मेरी पहली दीपावली थी ,जब मैं न घर पर था, न मौसी के यहाँ और न ही ननिहाल में ।  छोटे नाना जी के घर से हमेशा की तरह टिफिन बाक्स आ गया था , पर इतने प्रमुख पर्व के दिन ऐसे कैसे अकेले चुपचाप भोजन कर लूँ । सो, मन उदास हो गया था और कुछ भी न खाते बना था ।  देर शाम अश्रु बूंदों को आँखों में ही समेटे उनकी दुकान से आहिस्ता-आहिस्ता कदम बढ़ाते हुये    अपने कमरे पर जा पहुँचा था कि तभी पड़ोसी अधेड़ दम्पति अभिभावक की भूमिका में सामने आ , स्नेह की बरसात करने लगें । उन्होंने अपने साथ मुझे भोजन कराया। उनका अपनत्व देख मेरी आँखें पुनः नम हो गयी थी, पर यह खुशियों भरे आँसू थें ।
      उस दीपावली पर उनका यह निश्छल प्रेम ही मेरी सबसे बड़ी खुशी बनी और आज भी जब अंकल-आंटी  की याद आती है ,आँखें बरसने लगती हैं और मन कालिम्पोंग के उसी कमरे पर पहुँच जाता है, जहाँ बारजे पर खड़े हो हम रात्रि में खूब बातें किया करते थें ।
       यहाँ अपने होटल पर उम्मीद है कि इस बार मेरे मित्र टिफिन पहुँचा जाएँगे , अन्यथा तो पहले ब्रेड , बिस्किट और मिठाइयों  के सहारे ही होली, दीपावली एवं दशहरा काट लेता था ।
    परंतु बचपन में मेरी दीपावली  ऐसी तो न थी । अरे हाँ , याद आया कि बनारस में हम तीनों भाई- बहन अपने माता-पिता के साथ कितने उल्लासपूर्ण वातावरण में यह दीपोत्सव पर्व मनाते थें। करवाचौथ पर्व के पूर्व ही मम्मी सफाई अभियान में लग जाती थीं । वे पापा के सहयोग से पूरे मकान में वे चूना किया करती थीं । अलकतरा ( तारकोल) से खिड़की- दरवाजा रंगा जाता था । कोलकाता से आये कागज के रंगबिरंगे फूल और रिबन से कमरों की सजावट होती थी ।  साथ ही घर के बाहर दूसरी मंजिल की खिड़कियों पर इलेक्ट्रॉनिक झालर लटकाए जाते थें । ऐसी  सजावट देख हमारे पड़ोसी चकित से रह जाते थें कि इस गरीब मास्टर का घर किस तरह से इतना स्वच्छ ,सुंदर और सजा हुआ है, परंतु उन्हें यह नहीं पता था कि जो रिबन और झालर आदि थें, उसे मम्मी कितना सहेज कर एक बक्से में रखा करती थीं । वर्षों उसी से काम चलता रहा । वे बड़े घर की बेटी होने का अपना कर्तव्य निभाती थीं ।
     हम बच्चों के लिये ढेर सारी मिठाइयाँ दीपावली पर ही घर में बनती थीं । आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि कुछ भी महंगी खाद्य सामग्री  बाहर से खरीदी जा सके । अतः बेसन और बेगार से लड्डू  और मगदल हमारे अभिभावक तैयार करते थें । इसके लिये पैसे की व्यवस्था पिछले कुछ माह से किसी तरह विभिन्न खर्चों में कटौती कर की जाती थी, परंतु दीपावली पर घर में हर तरह का व्यंजन बनता था । जिसमें कचौड़ी, सांगरी की सब्जी, कांजी वड़ा, दही वड़ा और सूरन का अचार अवश्य शामिल होता था। वैसे ,कुछ वर्षों पश्चात पिता जी मिठाइयों के कई डिब्बे लेकर आने लगे थें । दरअसल , वे जिनके यहाँ ट्यूशन पढ़ाने जाते थें, वे सभी काफी सम्पन्न शिष्य थें । अतः ये  अपने मास्टर साहब को इस त्योहार पर मिठाइयाँ कैसे न देतें । पर हम धनी के समक्ष न दीन बने और न ही धनाभाव में किसी ने रुदन किया ।
     हमारे माता-पिता हर वर्ष मिट्टी के गणेश -लक्ष्मी , ग्वालिन , दीपक , रूई ,चीनी के खिलौने और लाई-चिउड़ा आदि पहले से ही ले आया करते थें । घर में एक लकड़ी का छोटा सा मंदिर था। पापा प्रत्येक दीपावली पर चमकदार  कवर पेपर लेकर आते थें और मम्मी बड़े ही प्रफुल्लित मन से उसे लकड़ी के मंदिर पर चिपकाया करती थीं। इसी में गणेश- लक्ष्मी और गोबर गणेश को बैठा कर पूजन होता था । वहीं पर रंगोली बना उसके इर्दगिर्द दीपकधारी ग्वालिन और कुछ मिट्टी  के खिलौने रखा जाता था। दीपकों से पूरे घर को जगमगाने के पश्चात पिता जी जो सीमित संख्या में रौशनी, अनार, जलेबी, फुलझड़ी और सांप लेकर आते थें, उसका आनंद हम सभी एक साथ छत पर लेते थें । उन दिनों घर में मिट्टी के घंट के नीचे दीपक रख काजल पारने की परम्परा भी थी। अगले दिन भोर में टूटे हुये सूप को पिटती हुई दादी की यह आवाज "  ईश्वर पैठे, द्ररिद्रता भागे" सुनाई पड़ती थी।
      बात कोलकाता की करूँ ,तो यहाँ मैंने अपने बाबा-माँ संग खूब मस्तीभरी दीपावली  मनायी थी। खिलौने तो पूछे ही न बाबा मुझे और कारखाने से   किसी व्यक्ति को साथ ले टोकरी भर पक्की मिट्टी के खिलौने ले आते थें।  दुकानों पर जिस भी खिलौने की ओर मेरी ऊँगली उठी नहीं कि वह उस टोकरी में होता था । उस आखिरी दीपावली मैंने माँ के साथ बारजे में रौशनी भी जलायी और बम भी फोड़े,यद्यपि  मिष्ठान दुकान पर भी मैंने काफी समय दिया और पारिश्रमिक के रुप में छोटे नाना जी ने मुझे एचएमटी की खूबसूरत कलाई घड़ी दी थी। यह वर्ष 1982 की बात है। यह मेरे जीवन का सबसे खुशनुमा उत्सव पर्व था।तब मुझे क्या पता था कि अगले दो माह पश्चात ही माँ की छाया से मैं वचिंत होने जा रहा हूँ। मैंने तो उस दीपावली  के दिन घर- दुकान एक कर माँ को खूब परेशान किया था , पर  वे मुझे लाड़ और दुलार की थपकियाँ दिया करती थीं। मेरे जीवन में दीपावली  की वह साँझ फिर कभी नहीं आयी।
      और मुजफ्फरपुर की दीवाली को भला कैसे भुला सकता हूँ । मौसी जी इस दिन शाम साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा बन मौसा जी के मोटरसाइकिल पार्ट्स की दुकान पर पूजन करने जाया करती थी। वहाँ मौजूद बाइक मिस्त्री शहजादे सारी तैयारी किये , उनकी ही राह तकता था।
तब मौसा जी की आर्थिक स्थिति बढ़िया नहीं थी, परंतु गृहलक्ष्मी के रूप में मौजूद मौसी जी ने कभी भी किसी को इसकी भनक तक नहीं लगने दी कि धन का यह संकट कितना बड़ा है। वे कठोर से कठोर दुःखों में अविचलित रहीं।
      मेहमानों के स्वागत -सत्कार में उन्होंने कभी कोई कमी नहीं आने दिया दी  । उनकी यह व्यवहारकुशलता अपनों की चौकन्नी आँखों को भी धोखा  दे देती थी। सबसे पहले उनके कमरे पर ही रिश्तेदार और जानपहचान वाले लोग आते थें , फिर वे उनकी तीनों जेठानियों के यहाँ जाते थें । यूँ कहें कि घर को स्वर्ग बनाने की कला है उनमें ।
रिश्तों को स्वार्थ की तराजू पर उन्होंने कभी नहीं तौला । मेरा ध्यान ऐसे अवसर पर वे अपनी इकलौती पुत्री से अधिक रखा करती थीं। उनके स्नेह की गंगाजल वैसे तो आज भी मुझपर छलकती है।
      सच कहूँ तो पहले अभाव में भी खुशियाँ थीं और अब इस इक्कीसवीं सदी में सबकुछ होकर भी खुशियों का अभाव है । आप भी विचार करें कि क्या मैं असत्य कह रहा हूँ ।?  हमने निज स्वार्थ का एक घेरा अपने चारों ओर बना रखा है, तो फिर बाह्यजगत की खुशियाँ उसमें कैसे प्रवेश करेंगी ? आज स्वर्ण  का महत्व है, सत का नहीं ।
      अब रहा मेरे लिये अब इस उत्सव के मायने, तो पिछले दिनों एकांतवास जैसी स्थिति में विकल हृदय को आश्रम की स्मृतियों ने एक नयी दिशा दी है। वहाँ जब था, तो गुरुदेव सदैव कहा करते थें कि जो पीछे छूट गया,उस पर पश्चाताप न करो और मन एकाग्र कर सतनाम का मौन जप  किया करो । उनका कहना था कि साधु और साधक को सदैव आनंदमय स्थिति में रहना चाहिए। वह कहा गया है न-
सदा दिवाली संत की, आठों पहर आनंद।
कब मरि हो,कब पाई हो, पूर्ण परम आनंद ।।
         अतः काशी स्थित गुरु के सानिध्य में जो भी दिन मैंने गुजारे थें। वे सभी पर्व ही तो थें । मैं वहाँ शोकमुक्त हो कर रहा । कोई अपना सगा-संबंधी साथ नहीं था । हम साधक थें और परमात्मा की कृपा हम पर बरसती थी । अतः आज भी जीवन के तिक्त और मधुर क्षणों से ऊपर उठ कर मैं उस अमृत को क्यों नहीं प्राप्त कर सकता ? किस अनजाने मोह से जूझ रहा हूँ । आश्रम की उन्हीं खुशियों को समेटने का प्रयास इस दीपावली पर्व पर मैं पुनः करूँगा।
       मैंने इस अनजान शहर में अपने परिश्रम एवं ईमानदारी से जो भी पहचान बनायी है ,  उसका ही परिणाम है कि आज अनेक विशिष्टजन मुझे सम्मान देते हैं।
     नियति ने  मेरा स्वास्थ्य, मेरा परिवार मुझसे छीन ली है । अपने लगने वाले शुभचिंतक यूँ ही अचानक बदल गये । यह भी कह सकते हैं कि न माला गूंथी और फूल  भी  कुम्हला गया ।
       ऐसे अनगिनत प्रश्न करने से अब क्या लाभ होना है । जीवन की इस शून्यता और दर्द से इतर यह समाज भी तो एक विशाल परिवार है । इस खुशी को मैं उदासी में क्यों बदलूँ ? मुझे तो वह दीपक जलाना है , जिसके संदर्भ में महाकवि गोपालदास ' नीरज' ने यूँ कहा है-

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...।

     - व्याकुल पथिक
  ( जीवन की पाठशाला )ः




Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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धन्यवाद, शब्दनगरी संगठन

Saturday, 12 October 2019

स्नेह भरे ये पर्व ..

हमारी छोटी-छोटी खुशियाँ( भाग- 2)




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  परम्पराओं के वैज्ञानिक पक्ष को तलाशने की आवश्यकता है , उसमें समय के अनुरूप सुधार और संशोधन  हो , न कि उसका तिरस्कार और उपहास ..
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    यह परस्पर प्रेम , विश्वास एवं समर्पण भाव ही है कि जो हमें पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व का बोध कराता है। जिससे हम एक सूत्र में बंध कर अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहते हैं । मेरा पूरा परिवार भी कभी एक दूसरे के प्रति समर्पित था।
    हाँ, याद है मुझे आज भी नाटी इमली का वह भरतमिलाप । दशरथनंदन चारों भाइयों के मध्य परस्पर प्रेम की एक झलक देखने की ललक लिये लाखों श्रद्धालु यहाँ जुटते हैं।
    विजयादशमी पर्व के दूसरे दिन पूरे वाराणसी और आसपास के जनपदों से भी लोग इस प्राचीन भरतमिलाप को देखने जुटते हैं। यूँ समझे कि आस्था का जनसैलाब यहाँ उमड़ता है।
    विदित हो कि धर्म की नगरी काशी में  सात वार और तेरह त्यौहार की मान्यता प्रचलित है।  नवरात्र और दशहरा के बाद रावण दहन के ठीक दूसरे दिन यहाँ विश्व प्रसिद्ध भरतमिलाप का उत्सव काफी धूमधाम से मनाया जाता है।
   कभी दादी हम दोनों भाइयों को लेकर नाटी इमली जाया करती थीं। हर-हर महादेव के उद्घोष के मध्य हाथी पर बैठ काशी नरेश ( आजाद भारत में भी जनता उन्हें सम्मान में राजा साहब ही कहती थी) आते थें और फिर जब सूर्यनारायण अस्ताचल की ओर होते थें, तो चारों भाइयों के मिलन का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता था।  सायं लगभग चार बजकर चालीस मिनट पर जैसे ही अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें भरतमिलाप मैदान के एक निश्चित स्थान पर पड़ती हैं , तब लगभग पांच मिनट के लिए माहौल थम सा जाता है। भरत और शत्रुघ्न दौड़ कर राम और लक्ष्मण के चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। इन भाइयों का परस्पर प्रेम देख भावुक होने के कारण मेरी आँखें नम हो जाया करती थीं।
   संत तुलसीदास जी के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत काफी विचलित हो उठे। मान्यता है कि उन्हें स्वप्न में तुलसीदास जी के दर्शन हुए और उसके बाद उन्हींं की प्रेरणा से उन्होंने इस रामलीला की शुरुआत की थी।
    दादी हम दोनों भाइयों को भी इसीतरह से प्रेमभाव बनाये रखने को कहा करती थीं। हम तीनों भाई-बहन एक दूसरे ध्यान रखते भी थें, परन्तु हम जब बड़े हुये,तो न जाने क्यों स्नेह का यह बंधन टूट गया। बड़ों के द्वारा पक्षपात भी इसका प्रमुख कारण बना।
  खैर, यह परम्परा क्या ढोंग है ? नहीं मित्रों , इस रामलीला के माध्यम से हमें यह सार्थक संदेश मिलता है कि संकट अथवा षड़यंत्र कैसा भी क्यों न हो यदि परिवार में आपसी सद्भाव एवं त्याग की भावना है ,  हम सत्य के मार्ग पर हैं , तो इस आपसी सौहार्द के समक्ष हर विपत्ति नतमस्तक है।
    अरे! आज तो शरदपूर्णिमा है। याद है मुझे कि इस दिन मैं कोलकाता स्थित अपने कमरे के बाहर सीढ़ी पर खड़ा हो चंद्रमा की रोशनी में सुई में धागा पिरोते थे । माँ कहती थी कि ऐसा करने से आँँखों की ज्योति बढ़ती है। साथ ही खीर पकाकर रातभर ओस में चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता था। हम सभी सुबह इस खीर का प्रसाद ग्रहण करते थें । हमें बताया गया था कि चंद्रदेव ने रात्रि में अमृत- वर्षा की है, अतः खीर खाने से स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। बंधुओं , अपनों के स्नेह से निर्मित यह खीर बाजार में नहीं मिलती है कि पैसे से खरीदा जा सके।
  क्या इस परम्परा को भी आधुनिक तथाकथित सभ्य समाज के कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए ?
  वैज्ञानिक व्याख्या यह है कि चन्द्रमा की किरणों को 'रजत-ज्योत्स्ना' कहने के पीछे चन्दमा पर उपलब्ध एल्युमिनियम, कैल्शियम, लोहा, मैग्नीशियम तथा टिटेनियम में वह बहुत सारे गुण विद्यमान है, जो चांदी में उपलब्ध होते है । चावल की खीर के पीछे औषधीय कारण है कि नए धान की फसल पर जब चन्द्रमा की यह किरणें पड़ती हैं तब धान (चावल) अत्यंत पुष्टिकारक हो जाता है । आश्विन मास का नामकरण अश्विनीकुमारों के नाम से होने के कारण आयुर्वेदिक चिकित्सक तमाम बीमारियों की दवा इस रात रखे गए खीर के साथ रोगियों को देते है । पुष्टिकारक एवं आयुष्य देने वाली किरणों के कारण ही हमारे ऋषियों ने 12 महीनों में 'जीवेम शरद:शतम' का आशीष देकर इस माह को गौरवान्वित किया ।
      शरदपूर्णिमा पर्व को कोजागरी पर्व कहा जाता है । संस्कृत में 'को' का अर्थ रात्रि से है और 'जागरी' का आशय जागरण से है । चातुर्मास में नारायण की योगनिद्रा की स्थिति में इस दिन माता लक्ष्मी धरती पर वरदान एवं निर्भयता का भाव लेकर विचरण करती हैं । जो जागता है और नारायण विष्णु सहित उनका का पूजन अर्चन करता है, उसे आशीष देती है । इसीलिए चन्द्रोदय होते ही सोने, चांदी, या मिट्टी का दीपक जलाकर एवं खुले आकाश में खीर का भोग लगाकर पूजन अर्चन करना बताया गया है ।
   शरदऋतु की पूर्णिमा के चन्द्रमा की रसमयी किरणों में भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर तक पहुंचने की लीला है । चन्द्रमा का सम्बंध मानव के मन से है । सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर विकास तक के पीछे मन की भूमिका है । मन अंधकार की ओर भी ले जाता है तो ज्ञान के बल प्रकाश की ओर ले जाता है ।

   इसी पर्व के पश्चात पति- पत्नी के प्रेम का पर्व करवाचौथ आ जाता था। इस सुहाग -पर्व की सुखद अनुभूति तो मुझे नहीं है, परंतु फिर भी इस व्रत के दिन मैंने अपनी माँ, मम्मी और मौसी तीनों के सहायक की भूमिका अवश्य निभाई है।
   कुछ वे बुद्धिजीवी जो ऐसी परम्पराओं को सिर्फ दिखावटी बता इनका विरोध करते हैं, सम्भवतः इन्हें ऐसे पर्व की खुशियों की अनुभूति नहीं है।  सच तो यह है कि इस करवाचौथ पर्व में वह स्नेह निहित है , जो युवा ही नहीं वृद्ध दम्पति को भी मुस्कुराने का अवसर देता है।
  अब चलते हैं बनारस अपने घर पर , जहाँ करवाचौथ पर मेरी माता जी यानी कि मम्मी निर्जला व्रत रख सुबह से ही पूजा व्यवस्था को लेकर व्यस्त हो जाती थीं। मिश्रित धातु के बड़े और छोटे दोनों करवा और थाली को राख से अच्छी तरह चमका कर धुला जाता था। चावल भी धोकर छत पर धूप में डाला जाता था। हम बच्चों की जिम्मेदारी थी कि कोई पक्षी उसे खाने न पाए। इस चावल और चीनी को पीस कर उसमें शुद्ध घी एवं कपूर डाल कर लड्डू बनाये जाते थें। मेरा कार्य था गाय का गोबर ,  बेसन का लड्डू और करवा में  प्रयुक्त होने वाला सींक लाना। पूजाघर की दीवार के एक चौकोर भाग को गोबर से लेपन किया जाता , जिसपर पीसे चावल को पानी में घोल उससे सियामाई सहित सातों बहनों, सूरज, चांद, वृक्ष, जिसपर छलनी और दीपक लेकर चढ़ा एक युवक, निर्जला व्रतधारी उसकी बहन और उसके सातों भाई एवं भाभी के अतिरिक्त वह नाव जिसपर उसका पति सवार होता था , वे सारे चित्र बनाएँ जाते थें। पहले यह कार्य मम्मी करती थीं ,परंतु बाद में चित्रकला में रूचि होने के कारण मैं यह सब बनाया करता था। कोलकाता माँ और मुजफ्फरपुर में मौसी जी भी मुझसे से सियामाई और अन्य चित्र बनवाती थीं। अंतर सिर्फ इन दोनों स्थान पर यह था कि दीवार की जगह मोटे सफेद कागज पर गोबर लेपन कर उस पर चित्र बनाया जाता था, ताकि घर की दीवार खराब न हो और पूजन के पश्चात चित्र सुरक्षित रहे।
    पापा तो रात में ट्यूशन पढ़ा कर आते थे, अतः   सुहागिनों का सम्पूर्ण श्रृंगार करने के पश्चात व्रत की कथा मम्मी मुझे ही सुनाती थी। पुरस्कार में मुझे उसी रात सर्वप्रथम चावल के दो बड़े लड्डू मिलते थें। यह लड्डू मुझे सबसे प्रिय है। जिसे पिछले लगभग तीन दशक से नहीं खाया हूँ , क्यों कि मेरी वह छोटी- छोटी खुशियाँ एक-एक कर छिनती चली गयी।
 पापा जब रात में आते थें,तो पूजन कार्य सम्पन्न कर मम्मी को जल ग्रहण करवाते थें। एक बात बताऊँ , सदैव मौन अथवा कठोर वचन बोलने वाले पिता जी इस दिन पत्नीभक्त बने दिखते थे और निर्जला व्रत होने के बावजूद भी  मम्मी की खुशी देखते ही बनती थी। करवाचौथ एवं हरतालिका व्रत पर वे घर की मुखिया जो हो जाती थीं। हम सभी उनकी आज्ञा मानते थें।
 हाँ, कोलकाता में माँ -बाबा तो सदैव एक दूसरे को चौधरी संबोधन से बुलाया करते थें। वहाँ , पति-पत्नी में अधिकार को लेकर कोई भेद नहीं था और मुजफ्फरपुर में मौसी जी वैसे ही मेरे सीधे साधे मौसा जी पर भारी पड़ती थीं।
   पुरुषों के धैर्य की असली परीक्षा छोटी दीपावली को होती थी। चार दशक पूर्व तब कार्तिक माह में ठंड पड़ने लगता था, इसके बावजूद उन्हें करवा में रखे ठंडे जल से स्नान करना पड़ता था। सिर पर जैसे ही करवा का पानी पड़ता था पापा , बाबा और मौसा जी कांप उठते थें। बच्चों-सा नटखटपन भी इनमें आ जाता था। सो, इस जल को डलवाने से पूर्व नखरे किया करते थें, परंतु अपनी -अपनी श्रीमती जी की घुड़की के समक्ष ये सभी नतमस्तक थें।
  तो क्या माँ, मम्मी और मौसी किसी उपहार के की कामना से व्रत रहती थीं। चार दशक पूर्व तो उत्तर प्रदेश एवं बिहार में करवाचौथ का प्रचलन भी आज जैसा नहीं था। मेरी मम्मी एवं मौसी ने पति से उपहार लेना तो दूर, अपने आभूषण बेच कर हम सभी को तमाम पर्वों पर खुशियाँ दी हैं।
 विपरीत आर्थिक स्थिति में भी कितना समर्पित थें, वे एक दूसरे के प्रति ऐसे पर्वों पर ,जिसका स्मरण कर आज भी मेरा मन आनंदित हो जाता है।
   वैसे, स्त्रियों के कार्य में मुझे इस तरह से रुचि लेते देख मेरा उपहास भी होता था ,तो यह आशीष भी मिलता था कि तुम्हें सर्वगुणसम्पन्न पत्नी मिलेगी।  खैर, नियति के समक्ष हर कोई नतमस्तक है। अतः जीवनसाथी की कल्पना और   अभिभावकों का यह आशीर्वाद फलीभूत नहीं हुआ। फिर भी ये खुशियाँ ,ये परम्पराएँ और अपने लोगों की स्मृतियाँ मेरे मानसपटल पर अंकित है। यही मेरे जीवनभर की पूंजी है। जब भी पर्व-त्योहार के अवसर पर इस बंद कमरे में मन विचलित होता है। उसे खुशियों भरी यादों की यह नींद की गोली दिया करता हूँ।
   सत्य तो यह है कि यदि हम अपनी संस्कृति, अपने संस्कार एवं अपने प्राचीन साहित्य को युवा पीढ़ी को देने में असमर्थ रहे, तो वह भटकाव की स्थिति में रहेगी। वर्तमान में नैतिक मूल्यों की उपेक्षा कर अर्थ के पीछे भागती दुनिया को ही वह सत्य समझ बैठेगी। वह विचारों के ठोस धरातल पर खड़े होने की जगह सिद्धांतविहीन स्वहित के मार्ग पर बढ़ उस दलदल में जा फंसेगी, जहाँ से उसे बाहर निकालने वाला कोई मार्गदर्शन नहीं होगा। अतः परम्पराओं के वैज्ञानिक पक्ष को तलाशने की आवश्यकता है , उसमें समय के अनुरूप सुधार और संशोधन हो ,न कि उसका तिरस्कार और उपहास ।
    आज भी जब मैं अपनी खुशियों को ढ़ूंढता हूँ तो बचपन में जो पर्व- त्योहार , दर्शन-पूजन और व्रत-उपासना परिजनों के साथ मनाया , उसमें वह छुपी मिलती हैं। (क्रमशः )

- व्याकुल पथिक
जीवन की पाठशाला






Shashi Gupta जी बधाई हो!,

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Tuesday, 8 October 2019

हमारी छोटी- छोटी खुशियाँ (भाग-1)

हमारी छोटी- छोटी खुशियाँ (भाग-1)
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   उस उदास शाम भी मैं जीवन की शून्यता और दर्द से स्वयं को उभारने की कोशिश में जुटा हुआ था कि किसी ने आवाज लगायी..

  " सा'ब , खुरमा ताजा है, लेंगे ? "

 " ले आओं भाई दस का " -मैंने कहा।

  ठेलेवाले की पुकार सुनकर उस दिन न जाने क्यों मैं स्वयं को रोक नहीं पाया था। यह जानते हुये कि बाहर का सामान न खाने की सख्त हिदायत मिली है। वैसे, मन को चाहे कितना भी तपा लो फिर भी मेले-पर्व पर ये इच्छाएँ हैं न, बेकाबू हो ही जाती हैं। सो, यह भूल गया कि  पिछले सप्ताह भर कमरे में बिस्तर पर एकाकी पड़ा हुआ था। सिर को जरा देर सहलाने वाला भी कोई न था,तो जीवन के रहस्यों पर से पर्दा एक-एक करके हटने लगा था। वैसे , अभी तो ये बानगी है।  आगे बड़ी चुनौतियों से टकराना है। अतः अपने दुर्बल तन-मन सावधान किये जा रहा हूँ।
   खैर,  खुरमा स्वादिष्ट था , परंतु अभी एक-दो  टुकड़े खाया ही था कि मन बोझिल-सा होता चला गया । वह सीधे बनारस की उस गली में जा घुसा था , जहाँ से कोई तीन दशक पूर्व एक युवक रोजी-रोटी की तलाश में भटकते हुये मुजफ्फरपुर,कालिम्पोंग और फिर मीरजापुर आ बसा है। वहाँ उसका अपना घर था, अपना स्वप्न था, अपने लोग थें और पर्व- त्योहार भी..।
  जीवन के उन मधुर स्मृतियों को वह अब भी भुला नहीं पाया है।
  उसके बचपन का एक हिस्सा कोलकाता में तो दूसरा यहीं गुजरा था ।  दुर्गापूजा- दशहरे परिवार  के पाँचों सदस्य  इन तीन दिनों में पैदल ही बनारस शहर का मध्य हिस्सा घूम आया करते थें। तब माताजी के हाथ का बना यह खुरमा ही हम बच्चों के लिये अनमोल मिठाई हुआ करता था।
   मैदा, चीनी और घी से बने इस खुरमा मिठाई, जिसे शक्कर पारा भी कहते है , को ऐसे विशेष अवसरों पर वे बनाती थीं। तब हमारे अभिभावकों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि बाजार से मिठाइयाँ मंगाई जा सके, फिर भी हम सभी बहुत खुश थें। प्रत्येक रविवार को पिता जी का अवकाश रहता था। अतः हम सभी राजघाट पुल तक घूमने जाया करते थें। माताजी सुबह ही खुरमा और लाई नमकीन बना कर डिब्बे में भर लेती थीं,ताकि पुल पर बैठ जब पापा-मम्मी वार्तालाप में व्यस्त रहे ,तो हम तीनों भाई-बहन उसे खाते हुये माँ गंगा को निहारते रहें। हम बच्चों को रेलगाड़ी दिखलाने थोड़ी देर के लिये पिताजी काशी रेलवे स्टेशन पर भी जाते थें। पुनः पैदल घर वापस लौटते समय पांव भले ही जवाब देने लगते थे, फिर भी हम उर्जा से लबरेज रहते थें। किसी तरह की फिजूलखर्ची न थी इसतरह के पिकनिक में भी पिताजी को जेब टटोलना पड़ता। लेकिन, खुशियाँ  जिसे याद कर आज चार दशक बाद भी भी आँखें चमक उठती हैं। हमारी ये खुशियाँ बनावटी नहीं थी। हम तंगहाल भले  थें , पर दीनहीन नहीं..।
    श्रम से कोई पीछे नहीं हटता था। हम होंगे कामयाब यह उम्मीद हमारे अभिभावकों में कायम थी। सो,अगले दिन सुबह पिता जी और हम दोनों भाई पैदल विद्यालय की ओर निकल पड़ते थें। कतुआपुरा , विशेश्वरगंज से संकठादेवी मंदिर  समीप तो न था। उसी मंदिर के सामने हमारा स्कूल था। परिवार के किसी भी सदस्य में आलस्य का नामोनिशान तक न था। सभी एक दूसरे की आवश्यकता को समझते थें। आपस में कोई बहाने हम नहीं किया करते थें। पिता जी तो पूरे सत्यवादी हरिश्चन्द्र ही थें।
 हाँ, उनमें एक अवगुण था, वे क्रोधित शीघ्र हो जाते थें। अतः रात जब वे ट्यूशन पढ़ा कर लौटते थें , तो माता जी का पूरा प्रयास रहता था कि उनकी इच्छाओं का पूरा सम्मान हो। वे नमकीन सेव लेकर आते थें। यह उन्हें सबसे प्रिय था।  भोजन की थाली में यही नमकीन सेव उनके लिये चटनी और आचार-पापड़ था।  हम तीनों को भी उसमें से थोड़ा-थोड़ा हिस्सा मिलता था। ठंड के दिनों में बिस्तरे पर रजाई से मुँह ढक कर लेटे- लेटे ही हम बच्चे इस नमकीन सेव को देरतक ठुंगते रहते थें।
     मुहल्ले-टोले में ऐसा कोई परिवार नहीं था, जो हर सप्ताह सपरिवार पिकनिक मनाता हो। गरीब मास्टर साहब के इस खुशहाल परिवार को देख धनिक पड़ोसियों को तनिक ईष्या भी होती थी। हम तीनों बच्चों को स्वच्छ,सुंदर और बढ़िया वस्त्र पहने देख , वे समझ नहीं पाते थें कि इसके लिये पैसा कहाँ से आता था , पर वे नहीं जानते थें कि  हमारे वस्त्रों की धुलाई और रख रखाव पर कितना ध्यान दिया जाता था। धूप में सारे कपड़े उलटा कर ही फैलाये जाते थें , इसलिये उसका रंग नहीं उड़ता था। विद्यालय से घर आते ही हमारे यूनिफॉर्म खूंटी पर टंग जाते थें। जूता रैक में होता था।
   त्योहार मनाने के लिये पैसे की व्यवस्था कुछ महीने पहले से ही हमारे अभिभावक करने लगते थें। खर्च में कटौती करने के लिये हर रात्रि वे डायरी पर  प्रतिदिन खरीदी गयी सामग्रियों का विवरण लिखते थें, ताकि आय- व्यय का संतुलन बना रहे। दस पैसे के सामान को भी जोड़ा जाता था। एक दीपावली पर्व पर तो माता जी ने  घर में संग्रहित लगभग सौ उपन्यास एक पुस्तक की दुकान पर बेच दिया। ये सभी उस समय के अच्छे लेखकों  के उपन्यास थें। लेकिन, हम बच्चों की खुशियाँ बड़ी थी उससे। मुझे याद है कि एक होली पर उन्होंने अपनी कई महंगी नयी साड़ियाँ बेच दी थीं, जिसका उन्हें तनिक भी दुख नहीं हुआ। इस तरह से धन के अभाव में हमारा परिवार किसी भी पर्व को मनाने से वंचित न रहा।
     रामलीला, नक्टैया और दुर्गापूजा देखने और घूमने का लुत्फ़ हमसभी ने खूब उठाया है। वैसे तो रामलीला देखने हम दादी के साथ जाया करते थें । हमारे माता-पिता से छिप-छिपा कर दादी अपनी ममता हम दोनों भाइयों पर लुटाया करती थीं ।  लाटभैरव की नक्टैया में शामिल लाग और विमान हमारे घर के समीप से देर रात गुजरता था। इसे देखने के लिये स्थान चयन की जिम्मेदारी दादी की हुआ करती थी। दारानगर और चेतगंज की नक्टैया हम देखते थें।
   हम बच्चों के लिये मुखौटे , तीर-धनुष और तलवार-गदा खरीद कर पिताजी लाया करते थें। इन्हें धारण कर हम भी राम- लक्ष्मण जैसा संवाद करते थें। मुकुट और तीर की सजावट मैं स्वयं करता था। छत पर जा बंदरों को तीर-धनुष दिखला हम भगाया करते थें। हम बच्चों को इसतरह से खेलते देख पापा- मम्मी को अत्यधिक  सुख मिलता था। मुझे याद है कि बाजार में हम तीनों ही बच्चे किसी सामग्री को लेने के लिये अपने अभिभावकों से कभी भी जिद्द नहीं करते थें। जैसे हम समय से पहले ही बुद्धिमान हो गये थें और घर की आर्थिक स्थिति का ज्ञान हो गया था।
    हमें बालू में भूनी हुई मूंगफली, रेवड़ी-चिउड़ा भी खाने को मिलती थी। इन्हीं खाद्य सामग्रियों के लिये हम बच्चे नक्टैया की बेसब्री से  प्रतीक्षा करते थें। यूँ समझें कि यही हम बच्चों का मेवा था।
  हम तीनों को खुश देख कर हमारे अभिभावकों को अत्यंत संतोष मिलता था। उन्हें प्रतीक्षा थी कि उनका श्रम कब मुस्कुराएगा। वे ईश्वर से प्रार्थना करते थें कि  धन की कुछ और व्यवस्था इन बच्चों के लिये हो जाती ,तो बढ़िया मिठाइयाँ भी आ गयी होंती... ।(क्रमशः)
         -व्याकुल पथिक
    जीवनकी पाठशाला से



Shashi Gupta जी बधाई हो!,

आपका लेख - (हमारी छोटी-छोटी खुशियाँ)आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुआ है | आप अपने लेख को आज शब्दनगरी के मुख्यपृष्ठ (www.shabd.in) पर पढ़ सकते है | 


Wednesday, 3 July 2019

यातनागृह...!

यातना गृह..!
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   मीरजापुर के एक रईस व्यक्ति के " करनी के फल " पर लिखा संस्मरण
      यह पुरानी हवेली उसके लिये यातना गृह से कम नहीं है..मानों किसी बड़े गुनाह के लिये आजीवन कारावास की  कठोर सजा मिली हो ..  ऐसा दंड कि ताउम्र इस बदरंग हवेली के चहारदीवारी के पीछे उस वृद्ध को सिसकते एवं घुटते हुये जीवन व्यतीत करना है..यहाँ से तो उसकी अर्थी ही उठेगी..!
   एक छोटे से गंदे कमरे में उसे रखा गया है.. जहाँ बच्चे उसके लिये अनमने ढंग से सुबह-शाम की चाय और दो वक्त का भोजन रख आते हैं..पलट कर कभी कोई नहीं पूछता उससे कि दादा जी ! और कुछ चाहिए ..इसी मुट्ठी भर अन्न के लिये वह टकटकी लगाये रहता है,दरवाजे के चौखट की ओर ..
    चौकी पर पड़े-पड़े  यह बुड्ढा अब तो जब देखों खांसते रहता है.. सांसों की धौंकनी उसके वृद्ध काया को हिला कर रख देती है..
   लेकिन इससे कहीं अधिक पड़ोस वाले कमरे से पुत्रवधू का अपने पति को सम्बोधित कर  यह बुदबुदाना -  "  यह बुड्ढा मरता भी नहीं, दिन भर खाता है और रात में खांसता रहता.. । "
 ऐसे अनेक व्यंग्य वचन उसके हृदय को बींध जाते हैं ..पके आम सी जिस वय में प्यार की आवश्यकता होती हैं..अपनों का यह दुत्कार उसके लिये असहनीय है..अश्रु बुंदों से आँखें उसकी भरी रहती हैं.. ।
  सच तो यह अघोषित "यातनागृह "  उसका ही कर्मफल है..!नियति ने नहीं स्वयं इसका सृजन उसने अपनी जवानी के जोश में किया है..!
 कभी मेन रोड पर इतनी जमीनें थीं , उसके पास कि " बाबू साहब " कह लोग उसे सलामी दागा करते थें.. न जमींदारी थी उसके पास , न आय के साधन.. स्वयं अपने परिश्रम एवं पुरुषार्थ से उसने बिस्वा भर जमीन भी न खरीदी थी ..
   मित्र मंडली जो ऐसी मिली कि " झूम बराबर झूम शराबी "  का नृत्य देर रात तक इसी हवेली के अतिथि कक्ष में चला करता था..
   मुफ्त में दारू- मुर्गे की व्यवस्था हो तो यार-दोस्तों की क्या कमी है..?  अपने बैठके़ की रौनक देख बाबू साहब का सीना  दर्प से फुल जाया करता था,लेकिन तिजोरी तो खाली ही थी और गृहस्थी की गाड़ी भी खींचनी थी.. मेहनत कर कोई कारोबार भी उन्होंने नहीं कर रखा था..बाजार में उधार बढ़ने लगा और कोई तगादा लेकर घर के चौखट पर आए , तो उसकी यह गुस्ताख़ी माफ नहीं थी..।
    ऐसे में बाबू साहब के पास कर्ज से मुक्त होने के लिये एक ही विकल्प था , बाप- दादे की अचल संपत्ति ..कितनों की ही गिद्ध दृष्टि उसी पर तो थी..।
  बच्चे जब तक होश संभालते , बाबू साहब के हाथ से इस विशाल भूखंड का अधिकांश हिस्सा  फिसल गया .. सिर्फ यह हवेली जिसमें उनका परिवार था और समीप की एक जमीन ही शेष बची थी..पिता के नक्शेकदम पर पुत्र तो नहीं थें ..लेकिन बेरोजगार थें वे दोनों..हवेली के बड़े हिस्से को किराये पर दे दिया गया था साथ ही सड़क की ओर कुछ दुकानों का निर्माण , इन दोनों पुत्रों ने एक राजमिस्त्री के साथ मिलकर स्वयं मेहनत- मशक्कत कर किया था..कुल मिला कर यही दस-बारह हजार रुपये किराये से आ जाया करते थें और गृहस्थी की गाड़ी इसी किरायेदारी से बाबूसाहब का बड़ा लड़का खींच रहा था..   ऐसा लग रहा था कि इस पूर्व जमींदार परिवार के ये दोनों लड़के वक्त के ठोकर के साथ संभल गये हैं..।
    परंतु बाबूसाहब .. ?
 गरीबी और बेकसी की जिन्दा तस्वीर बन गये थें वे.. जेब खाली था फिर भी उनकी चटोरी जीभ कहाँ मानती थी .. घर पर उनके लिये दो वक्त की सूखी रोटी से अधिक कुछ भी न था .. बहू-बेटे जब भी सड़क के इस छोर से उस छोर तक की कीमती जमीन को निहारते .. उनका कलेजा बाहर आ जाता था..वे हाथ मलकर पछताते ..करोड़ों की ये सारी सम्पत्ति कभी उनके ही पूर्वजों की थी.. जिस पर उनके पिता ने गुलछर्रे उड़ाया था..अतः अर्जित किराए में से वे बाबू साहब को फूटी कौड़ी भी न देते थें..।
  उधर, दिन ढलते ही हवेली के बाहर ऊपर सड़क किनारे भोला मिष्ठान और शिवम चाट भंडर , रामू खटिक की गुमटी में रखा दशहरी और लगड़ा आम, चंदूभाई की कुल्फी एवं ठंडई की दुकान पर ग्राहकों को इन तमाम तरह के व्यंजनों का रसास्वादन करते देख बाबू साहब से तनिक भी सब्र न हो पाता था..वो कहा गया है न कि वृद्ध और बच्चे की प्रवृति एक समान होती है..  ललचाई आँखोंं से यह वृद्ध भी छड़ी का सहारा लिये,सड़क पर आ खड़ा होता था..इस उम्मीद से कि कोई पुराना दोस्त - यार दिख जाए और कुछ न सही तो पुराने  एहसानों को याद कर कोई छोला-समोसा ही पूछ ले..।
    पर हाल यह था कि जेब खाली क्या हुआ कि बाबू साहब को सामने देखते ही कभी उनसे दुआ-बंदगी करने वाले यूँ दिशा बदल लेते थें ..मानों काली बिल्ली रास्ता काटने खड़ी हो..
 उनकी भूख तो घर के दो वक्त की रोटी से मिट सकती थी..
पर चटोरी जीभ न मानी.. जिसने जीवन रस का भरपूर स्वाद लिया हो, उसकी रसना मानती भी तो कैसे..?
   आखिरकार एक दिन लज्जा का आवरण हट गया .. अपने निर्बल काया को लाठी के सहारे घसीटते हुये यह बूढ़ा आदमी
किसी पड़ोसी से दस रुपया का नोट मांग आया..
 जमींदार परिवार से होने का उसका दम्भ अब  दीनता में बदल चुका था..
   वह दिन भी आया ,जब बाबू साहब की इस नयी आदत से परेशान पड़ोसियों ने अपने घरों के दरवाजे बंद कर लिये..      फिर तो एक कुल्हड़ चाय के लिये भी किसी भले आदमी की तलाश इस बूढ़े व्यक्ति को करनी पड़ती थी..।
   इसी बीच पड़ोसी मोहल्ले के तीन युवकों ने बाबू साहब से नजदीकी बढ़ा ली.. कोई एक माह तक इन तीनों ने उनकी  रसना को कुछ इस तरह से तृप्त कर दिया कि उनका रोम- रोम इन युवकों को आशीर्वाद देने लगा..।
 और एक दिन हवेली से समीप की शेष बची एक मात्र जमीन का सौदा बिना अपने पुत्रों को बताये डेढ़ लाख रुपये में बाबू साहब ने इन युवा मित्रों से कर लिया..।
 जमीन की रजिस्ट्री के बाद ये युवक महीनों फिर न दिखें..उधर, बाबू साहब ने भी चार - छह महीने में ही सारा धन उड़ा दिया..।
  ठीक छह माह बाद एक दिन बाबू साहब की चीख -पुकार की आवाज सुन पड़ोसी उस पुरानी हवेली की तरफ दौड़े.. देखा कि दोनों पुत्र यमराज की तरह पिता के सीने पर चढ़ हुये हैं.. तब पड़ोसियों को भी पता चला कि उन तीनों युवकों ने जिस जमीन का गोपनीय सौदा बाबू साहब के साथ किया था..वह हवेली के बाहर वाला वह हिस्सा था.. जिसे छल से उन्होंने अपने नाम करवा लिया था..इसी पर उनके पुत्रों ने दुकानें बनवा उसे किराये पर दे रखी हैं .. जो इस परिवार की रोजी- रोटी का जरिया है..।
  युवा मित्रोंं द्वारा किये गये इतने बड़े धोखे से बाबू साहब से कहीं अधिक उनके पुत्र सदमे में थें.. और अपनी इसी चटोरी जीभ के कारण ही बाबू साहब आज भी इसी हवेली में अपने ही पुत्रों द्वारा बंधक बना कर रखें गये हैं.. उन्हें पागल घोषित कर दिया गया है..परिवार का हर सदस्य उनसे घृणा करता है.. इस यातना गृह से वे बाहर नहीं निकल सकते हैं.. उन पर चौकन्नी निगाहें रखी जाती है..।
   किसी मांगलिक समारोह में भी वे नहीं जा सकते.. भला पागल इंसान को कोई पूछता हैं..।
    अपनी ही हवेली में कैद अपराध बोध से भरे इस बूढ़े आदमी के विकल हृदय से एक ही आवाज आती है अब -     " मेरा मर जाना ही अच्छा है..।"
     -व्याकुल पथिक
     ( 25 मई 2019 )
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   ( इस लेख के पात्र काल्पनिक नहीं हैं। डेढ़ माह पूर्व लिखा लेख है। अतः यह वृद्ध अभी जीवित है अथवा यातना गृह से उसे मुक्ति मिल गयी है। इसकी जानकारी नहीं है। )

Monday, 1 July 2019

रेणु दी..

रेणु दी..
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 " शशि भाई , यदि आप चाहते हैं कि आपकी बात अन्य पाठकों तक पहुँचे, तो आपको अपने ब्लॉग में काफी कुछ सुधार करना पड़ेगा । "
  ...यह रेणु दी ही थीं , जिन्होंने " व्याकुल पथिक " को गत वर्ष सर्व सुलभ बना दिया था। मेल पर भेजे गये उनके संदेश ने आभासीय दुनिया में प्रथम बार मुझे उस पवित्र स्नेह का आभास करवाया जो " बहन- भाई " के मध्य होता है।
   कहना नहीं होगा कि अब जबकि पथिक का ब्लॉग सूना पड़ा है, उसकी लेखनी ठहर गयी है , उसकी चिन्तन शक्ति , उसकी पहचान और उसका आत्म सम्मान सब-कुछ इसी आभासीय दुनिया में नष्ट हो चुका है। ऐसे में उसके हृदय के रिसते हुये घाव पर किसी ने मरहम का फाहा रखने का प्रयास किया है , तो वे श्रीमती रेणुबाला सिंह ही हैं, जिन्हें मैं स्नेह से रेणु दी बुलाया करता हूँ।
    ब्लॉग पर मौजूद इस साहित्यिक जगत में जब भी यह लगता है कि यहाँ निखालिस कुछ भी नहीं है। इस तथाकथित संवेदनशील मंच पर निर्मल अश्रुओं का कोई मोल नहीं है। ऐसे में रेणु दी मेरे लिये वह आदर्श साहित्यकार हैं , जिनके हृदय में कृत्रिमता तनिक भी नहीं है।
  मुझे उनकी रचानाओं, उनकी लेखनी और ब्लॉग जगत में उनकी  विशिष्ट पहचान से कहीं अधिक उनका व्यवहारिक पक्ष पसंद है।अपने अंदर के पत्रकार अथवा बहन के प्रति प्रेम भाव में ऐसा मैं कदापि नहीं कह रहा हूँ । उनमें अनजाने लोगों के प्रति भी जो सहयोग की भावना है, वे उन्हें एक साहित्य प्रेमी से ऊपर मानव की विशिष्ट श्रेणी में ला खड़ा करता है। जो वास्तविक साहित्यकार का श्रृंगार है ।
  मैंने देखा कि उन्होंने निश्छल एवं निस्वार्थ भाव से "शब्द नगरी " , " प्रतिलिपि " और " ब्लॉग " पर कनिष्ठ रचनाकारों का न सिर्फ उत्साहवर्धन किया है, वरन् उनकी कविता एवं लेख की त्रुटियों को भी मधुर संबोधन के साथ सुधारने का कार्य किया है। ऐसा करने में समयाभाव के कारण वे अपनी रचना न लिख पाती हो, फिर भी इस आभासीय जगत के अनजाने लोगों के सहयोग के लिये सदैव तत्पर रहती हैं। जिनमें से एक मैं भी था । यूँ कहूँ तो इस " व्याकुल पथिक " ब्लॉग पर मुझसे कहीं अधिक उनका ही अधिकार बनता है और इस ब्लॉग के सूनेपन से यदि कोई आहत है , तो वे रेणु दी हैं । वे ब्लॉग पर मेरी वापसी चाहती हैं । हाँ ,मीना शर्मा दी भी इसके लिये मेरा उत्साह बढ़ा रही हैं।  परंतु  दुर्भाग्य के प्रहार को बदलने में इस बार असमर्थ-सा हूँ । अस्वस्थता के कारण पुनः आश्रम जीवन संभव नहीं है। अतः एकांतवास ही एकमात्र विकल्प है। इस आभासीय जगत की पाठशाला में मैंने जीवन का वह अंतिम कष्टप्रद अध्याय पढ़ा है । जिसने स्वास्थ्य से कहीं अधिक मेरे उस अपनत्व -भाव पर प्रहार किया है, जिसके लिये मैं आजीवन भटकता- फिसलता रहा। सो, अब यह काया ढांचा मात्रा है। जिसमें स्पंदन नहीं है।यह मेरे हृदय की दुर्बलता रही कि इस आभासीय संसार में वर्षों बाद स्नेह और अपनत्व की भूख पुनः जगा बैठा।
    फिर भी रेणु दी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त किये बिना , इस आभासीय दुनिया से विदाई , उनके ही जैसे उन भद्रजनों का अपमान करना होगा , जिनमें दूसरों के प्रति सहयोग की भावना है।
    रेणु दी के ब्लॉग पर जाने से और उनके द्वारा लिखी श्रेष्ठ रचनाओं को पढ़ने से ,यह आभास होना कठिन है कि यह ऐसी गृहणी के द्वारा लिखा गया लेख अथवा कविताएँ हैं, जो सुबह से रात्रि तक अपने पारिवारिक दायित्वों में व्यस्त रहती हैं और इसके पश्चात भी अपने साहित्य प्रेम के कारण देर रात कम्प्यूटर पर बैठ इस सीमित समयावधि में ही नयी रचनाओं का सृजन करती हैं साथ ही दूसरों की रचानाओं पर अपनी प्रतिक्रिया भी देती हैं। ऐसे अनेक नये रचनाकार जिनका " कमेंट बाक्स " खाली पड़ा रहता है, उसके उत्साहवर्धन के लिये रेणु दी की प्रथम टिप्पणी उसपर निश्चित ही दिखाई पड़ती है। कभी इन्हीं में से एक मैं भी था।
   
        "  रेणु दी वह संपूर्ण आर्य नारी हैं ,जो साहित्यकार होने से पहले एक कुशल गृहणी हैं । अपने प्रियजनों संग रिश्तों की खुशबू को बरकरार रखने के लिए वे गृहस्थ धर्म का अनवरत निष्ठा पूर्वक पालन करते हुए, रात्रि में साहित्य सृजन के लिए सहर्ष तत्पर रहती हैं । जैसा कि प्रबुद्ध वर्ग के लिए कहा जाता है कि जिस तरह शरीर का खाद्य भोजनीय पदार्थ है, उसी तरह से मस्तिष्क का खाद्य साहित्य है।  सच कहूं तो रेणु दी में वह संवेदना और सहानुभूति है ,जो साहित्य की सृष्टि करती है। "

    परिस्थितिजन्य कारणों से परास्नातक की शिक्षा उन्होंने किसी कालेज जाकर न भी ग्रहण की हो, तब भी उनकी यह डिग्री गांव की बेटी की शिक्षा के प्रति समर्पण और संघर्ष की दास्तान है।
  रेणु दी की कविताओं में प्रकृति, सौंदर्य एवं मानव मन का सम्मिश्रित चित्रण है। हर शब्द बोलता है और व्यर्थ यहाँ कुछ भी नहीं है। वहीं, गद्य की बात करे ,तो उनका हर लेख विषय वस्तु को विस्तार के साथ समाहित किये हुये है। उसमें सम्पूर्णता है और सार्थकता भी।
  ब्लॉग पर रचनाओं की अधिक संख्या एवं पेज व्यूज के पीछे भागने वाले लेखकों के लिये रेणु दी का ब्लॉग " स्पीड ब्रेकर " है। जिस तरह से "गति अवरोधक" असावधान वाहन चालकों को सजग करता है। उसी तरह उनका ब्लॉग भी ऐसे लेखकों को सावधान करता है कि वे जरा ठहर कर अपनी रचनाओं की स्वयं समीक्षा करे ।
   स्वयं अपने कार्यों का मूल्यांकन करना ही  मनुष्य के लिये सफलता की दिशा में बढ़ता वह पहला कदम है , जो उसे शीर्ष पर ले जा सकता है। आत्मावलोकन कर अपनी भावनाओं पर नियंत्रण  रखा जा सकता है।
  रेणु दी ऐसी ही रचनाकार हैं , जिन्हें यह पता है कि गृहस्थ धर्म ही उनकी प्राथमिकता है। सो, वे अपने कवि हृदय को अपने पारिवारिक दायित्व पर बोझ बनने नहीं देती हैं। जो एक कुशल गृहिणी का प्रथम कर्तव्य है।
     आज जब ब्लॉग जगत से दूर विकल हृदय लिये एकांतवास पर हूँ। मानसिक तनाव एवं अस्वस्थता के कारण " नेत्रों की ज्योति " बुझने को है। न्यूरो सर्जन के माध्यम से उचित उपचार होने तक ऐसे में लिखने- पढ़ने में असमर्थ रहूँगा। फिर भी प्रयत्न कर  रेणु दी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिये इन चंद शब्दों को लिख सका हूँ । साहित्यकार तो मैं हूँ नहीं ,अतः मेरी यह धृष्टता वे अवश्य क्षमा कर देंगी, ऐसा मुझे विश्वास है।
   
              -व्याकुल पथिक
                20 जून 2019

Friday, 7 June 2019

ख़्वाब उजाले की.. !


ख़्वाब उजाले की.. !
***************
कुछ तो था मुझ में
जो तुमने भरोसा पाया
दोस्त तो और भी थें
पर क्यों मेरे करीब आया ?

उजड़ी हुई दुनिया थी मेरी
और  वो तन्हाई
दर्द फिर भी न था कोई
ना हम आहें भरते ।

लूटे अरमानों के घरौंदे
न  सजाया  करते _
रखते थे ख़्याल मेरा
तब तुम ये कह के ।

जब नहीं चाह थी और
 न हम रोया करते
क्यों उजाले की हसीं
ख़्वाब  दिखाया करते ?

मांगा  तुमसे भी ना था
कुछ हमने तो कभी
बस जुदाई की ये बातें
तुम  ना यूँ  करते  ।

तेरे तो अपने थें बहुत
और मनमीत भी है
मेरी ज़िंदगी में न था कोई
 ए दोस्त इक तेरे सिवा ।

रूठते भी थे तुम तो
 हम  यूँ  मनाया करते
 मानो हो परवरदिगार
तुम  ही  क़िस्मत मेरे !

 जाने क्या हुई भूल जो
 ये सजा फिर से मिली
 ना दोस्ती का ख़्याल रहा
 न आँसुओं पे रहम आया !

यादों  के  मक़बरे  में
जब कभी पाओगे हमें
खिलखिला के झगड़ना
 तुम वही बुद्धू कह के ।

वो ! जाने वाले न ठहर
और क्यों रोकूँ भी तुझे ?
इस अंधेरे में उजाले की
अब न ख़्वाहिश है मुझे ।

बुझते शमा को दिल से
जलाएँ भी क्यों लोग ?
बाजार  में रौशनी की
नुमाइश क्या कम है ??

 दर्द  दिल का फिर ना
  यूँ  अब  बताएँगे  तुझे
 खुशियों भरी महफ़िल हो
 लो  ये दुआ करते है ..!!

  -व्याकुल पथिक
    

रामनाम सत्य ..!!!


रामनाम सत्य ..!!!
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रामनाम सत्य .. रामनाम सत्य..
       क्या कोई शवयात्रा है ? सड़क पर तो ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा था..   फिर क्यों भरी दुपहरी में यह व्यक्ति  ऐसे बुदबुदा रहा था .!  क्या यह उसका अंतर्नाद है अथवा विरक्त मन की आवाज ..ठीक से  समझ नहीं पा रहा था मैं, उसकी इस मनोदशा को..!!!
      देखने में विक्षिप्त तो न था..!  सोसायटी में खासी पहचान है उसकी .. कपड़े भी ठीक-ठाक पहन रखे हैं ..केश जरूर अस्त -व्यस्त है..
    न जाने क्या चल रहा था उसके दिमाग में..  बगल से गुजरे पहचान वाले लोग तक उसे दिखाई नहीं पड़ते.. धक्का खाये जा रहा था औरों से.. इस  बावले को हो क्या गया है ..?
किस वेदना से यह इस तरह से आहत था कि उसे हर किसी की नजरों से छिपाये ,  सीने में दबाये और सिर झुकाये चला ही जा रहा था..।
     डगमगाते-लड़खड़ाते हुये कदमों से किसी प्रकार अपनी निर्बल काया,मन और प्राण लिये आहिस्ता-आहिस्ता बस सड़कें नापे जा रहा था ..मोटर- गाड़ियों तक का शोर न सुन पा रहा था वह पागल.. हाँ, पागल ही तो होते हैं ऐसे इंसान ..?
 लेकिन, वह विक्षिप्त नहीं था , अर्द्ध विक्षिप्त भी न था.. उसने अपने जीवन के तिक्त क्षण अनेक बार देखे हैं। जीवन की शून्यता एवं दर्द से ऊपर उठ चुका था।
    उसकी लेखनी कभी आग उगलती थी, पर आज वह स्वयं सुलग रहा है..
     कहाँ को निकल पड़ा यह, इस चटख धूप में - माँ गंगा के दर्शन को या गुरु के आश्रम .. ऐसी मनोदशा में ये दोनों स्थान उसके उद्विग्न चित्त को तनिक विश्राम देते हैं..परंतु आज वह किस राह पर बढ़ा जा रहा है..?
   कठोर से कठोर दुखों में भी जो आँखों में आँसू नहीं लाता था, वह जीवन का दांव कैसे हार बैठा है..! जिसने जीवन रस का तनिक भी स्वाद न चखा , उसकी फिर कैसी कामना और लालसा है..  स्वयं में एक पहेली ही तो है , यह आदमी ..?
        अभी पिछले ही दिनों तो सरकारी अस्पताल के मेडिकल वार्ड में निढाल पड़ा दिखा था ।  खून चढ़ाये जाते समय किस तरह से इधर- उधर वह टुकुर- टुकुर ताक रहा था। उसकी मनोदशा देख  सीनियर नर्स ने ममत्व से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा था कि इस बहन पर भरोसा रख।
   हर किसी मरीज के अपने तीमारदार थें वहाँ..कितनी आत्मीयता से वे सभी अपने बीमार परिजनों की देखभाल कर रहे थें और यह बावला मोबाइल हाथ में लिये सुबह- शाम न जाने किसका इंतजार करता दिखता.. कोई आता भी तो न था उसके पास.. !
    लेकिन, कोई तो था उसका अपना ,पर कौन.. ?
 मोबाइल फोन में लगे नोटिफिकेशन की जैसे ही आवाज़ आती , वह झट उसका स्क्रीन  टटोलने लगता था.. कभी अंदर तो कभी बाहर ,उसकी यह बेचैनी बतलाती थी कि आभासीय दुनिया में ही सही कोई था उसका भी ..कौन हो सकता है भला इस यतीम का ..! कभी किसी से जिक्र तक तो नहीं की  थी ..।
    मानव के अंतरमन को समझा आसान नहीं होता.. परंतु मोबाइल स्क्रीन पर जिस तरह से नम आँखों से उसकी कंपकंपाती उंगलियाँ दौड़ने लगती थी, वह इस बात का संकेत था कि इस हाल में भी उसके मन में किसी के स्नेह की शीतल छांव की ललक थी.. अन्य मरीजों की तरह उस तीमारदार का जिसका संबंध शायद उसी मोबाइल फोन से था..  जो अब उसके लिये कबाड़ है..उसमें न जीवन है, न वह स्पंदन है , न संवेदनाएँ हैं और ना तो वह आवाज ही , जिससे उसके वीरान जीवन में कुछ पल के लिये मधुरता आ जाती थी..।
     जिसने स्वार्थ की तराजू पर कभी रिश्ते को नहीं तौला था,  उस शाम न जाने क्यों तनिक अपनेपन के लिये  तड़प उठा था यह जिद्दी इंसान..मोबाइल पर संदेशों का कुछ लम्बा ही आदान- प्रदान होता रहा.. फिर ऐसी क्या कड़वी बात हुई कि तकिये में चेहरे को छिपाये पूरी रात सिसकता रहा वह..बिल्कुल उस मासूम बच्चे की तरह ,जिसकी माँ का स्नेहिल आंचल उससे रूठ गया हो.. उसकी सुर्ख लाल आँखें गवाह हैं, उस सुबह वह बिल्कुल अकेला हो चुका था..जिसने उसे स्नेह का पुनः आभास कराया था ,  इस आभासीय दुनिया में उससे सम्पर्क भंग हो चुका था..अपनेपन की ललक ठंडी पड़ चुकी थी.. जीवन का यह सच  _  " रामनाम सत्य है " ..  महामंत्र बन उसे मुक्तिपथ की राह बता रहा है .. महा श्मशान की यात्रा पर अकेले  निकल पड़ा है वह .. हर मानव को यह सफर करना पड़ता है, परंतु जीवन के पश्चात ..
    अनेक लौकिक संस्कारों से वंचित रह गया यह विचित्र प्राणी जीवित अर्थी बन स्वयं ही अपने अंतिम संस्कार को निकल पड़ा है..
  देखने से तो यही लगता है कि उसने हॉफ सेंचुरी भी नहीं लगाई है.. फिर उम्र के इसी पड़ाव पर यह शीघ्रता ..?   यूँ कुटुम्ब एवं मित्र जनों से दूर वह अनंत की यात्रा पर बढ़ चला है..।
  न जाने कौन सा अपराध बोध है उसमें मन में ..  चिता  की राख बन गंगा मैया के आंचल में समाने की यह छटपटाहट उसकी.. माँ से मिलन की यह आखिरी ख़्वाहिश है उसकी..।
   स्नेह-समर्पण का उसके नहीं मोल रहा, निष्ठुर नियति ने  छीन लिया हर सहारा उसका , जिसे भी जीवनदायिनी समझा..उसके ममत्व एवं अपनत्व के लिये तड़पा.. स्नेह के लिये मुहँ खोलते ही जल के बुझ गये मन के सारे दीपक उसके .. हिय में सुलगती आग अब दावानल बनने को है..या फिर बुझने को है उसकी जीवन ज्योति..! आँखों के आँसुओं को पीकर वो तो चला मरघट की ओर.. अब न किसी को पुकारेगा, न ही कोई शेष अभिलाषा है उसकी..
 और कितनी बार अग्नि परीक्षा से गुजरेगा वह , निष्कपट होकर भी क्यों कलंकित रहा पूरा जीवन उसका .. ?
       इन अनेक सवालों को लिये,  फिर भी शुभ दिवस, शुभ संध्या एवं शुभ रात्रि कहने वाले किसी अपने की मधुर स्मृति में खोया बटोही निकल पड़ा है, अपने अंतिम सफर को ..  तुम क्या जानो ,कभी कितना हँसमुख था, तूफानों में तरणी खेने वाला यह इंसान.. आज ख़ामोशी के चादर में लिपटा, जैसे कुदरत ने दे दी हो उसे कफ़न प्रीति का..
     इस दुनिया के मेले में जब नहीं रहेगा वह ,कोई तो पुकारेगा उसे अंतर्मन से  , तुम कहाँ चले गये ..?
   पर जिस पवित्र स्नेह की चाह थी , जीवित तो न पा सका उसे ..
    काश  ! उस मधुर स्वर को वह आखिरी बार सुन पाता.. उस स्नेहिल अभिवादन की अनुभूति पुनः कर पाता..  जीवन सफल बना जाता.. हंस अकेला उड़ जाता..क्या उसे कुछ भी न देगा यह सभ्य समाज.. क्यों करवाता है फिर कर्म की पूजा और धर्म का यशोगान..क्यों खो गये उसके स्वप्न सारे..?
    निर् निमेष निहारता वह नभ को , न पूछता है कोई सवाल.. !!!
                 
                           - व्याकुल पथिक


 



ं

Friday, 31 May 2019

प्रदूषण करता अट्टहास

प्रदूषण करता अट्टहास
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प्रदूषण दशानन सा करता अट्टहास
दसों दिशाओं में हैं जिसका प्रताप
है कोई मर्यादापुरुषोत्तम ?
रण में दे उसे ललकार ।

रक्तबीज सा गगन  में करता प्रलाप
भूमंडल पर निरंतर  जिसका विस्तार
है   कोई   महाकाली ?
करे उसका रूधिरपान ।

दक्षराज सा बढ़ता जिसका अभिमान
सती होती  प्रकृति , असहनीय संताप
है   कोई   वीरभद्र ?
करे   उसका   संघार ।

जनसेवकों की वाणी में करता निवास
शकुनि सा जिसका कपट जाल
है  कोई  कृष्ण ?
दे   गीता का  ज्ञान ।

भ्रष्टतंत्र का कर नित्य नव श्रृंगार
प्रदूषण हिंसा को देता उपहार
है कोई गांधी ?
करे फिर अहिंसा पाठ ।

वसुंधरा का"मानव"करता कुटिल मंथन
वासुकी सा फुफकार प्रदूषण
है कोई नीलकंठ ?
हलाहल का करे पान ।

सागरपुत्रों सा दिग्विजय का लेके प्रण
 कपिल का तप ध्वनि प्रदूषण से किया भंग
भस्म हुईं महत्वाकांक्षाएँ अनंत
न मानव रहा, न उसका यंत्र ?

रे हतभाग्य ! किया सृष्टि का महाविनाश
मुक्ति की याचना लिये बन प्रदूषण की राख
नहीं  कोई  भगीरथ  ?
 न गंगावतरण की आस।
 
             -व्याकुल पथिक

Thursday, 30 May 2019

हमें कौन देगा रोटी, कपड़ा और मकान... ! (पत्रकारिता दिवस)

पत्रकारिता दिवस पर हुई निष्पक्ष लेखनी की बात
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पर हमें कौन देगा रोटी, कपड़ा और मकान !
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प्रिंट मीडिया के पत्रकारों के अंदर से भाव निष्पक्ष है, लेकिन , आदर्श के साथ अर्थ का गहरा संबंध है। हमारे सामने अपने परिवार का भी खर्च है। अतः कहीं न कहीं हमें समझौता करना पड़ता है।
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    प्रत्येक वर्ष 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर हम आत्मावलोकन करते हैं । इसके लिये हम जो मंच सजाते हैं और उस पर जो अथितिगण उपस्थित रहते हैं। वे इस दिन  समालोचक की भूमिका में होते हैं। वे हमारी पत्रकारिता के गुण- दोष को बतलाते हैं। राष्ट्रीय, प्रांतीय ,जनपदीय एवं ग्रामीण स्तर पर पत्रकारिता की दशा- दिशा पर चिंतन- मंथन होता है। इस संदर्भ में हम लोगों को याद दिलाया गया कि आजादी के पहले पत्रकारिता मिशन रही, इसके बाद उद्योग और अब यह लाइजनिंग (दलाली)  हो गयी है।
वहीं , एक बुजुर्ग पत्रकार जिन्होंने अपने समय के सबसे प्रमुख समाचार पत्र के कार्यालय में उप सम्पादक की कुर्सी संभाली थी। अपने संघर्ष एवं अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा कि प्रिंट मीडिया के पत्रकारों के अंदर से भाव निष्पक्ष है, लेकिन , आदर्श के साथ अर्थ का गहरा संबंध है। हमारे सामने अपने परिवार का भी खर्च है। अतः कहीं न कहीं हमें समझौता करना पड़ता है।
      मैं वर्ष 1994 से ही हमलोगों की पत्रकारिता कैसी होनी चाहिए, इसपर उपदेश सुनते आ रहा हूँ। कोई कहता है कि जनपद स्तर पर सरकारी विभागों में अनेक भ्रष्टाचार हैं। स्थानीय पत्रकार ऐसे मुद्दों पर कलम चलाने से बचने लगें हैं , तो किसी का कहना रहा कि हम विज्ञापनों के पीछे दौड़ने लगें हैं और सत्ताधारी राजनैतिक दल के हाथों की कठपुतली हो गये हैं। किसी ने यह भी कह दिया कि कम से कम सम्पादकीय पृष्ठ तो निष्पक्ष रखा जाए। जो मुख्य वक्ता होते हैं, वे आजादी के समय की पत्रकारिता और उस दौर में लेखनी के पराक्रम की चर्चा अवश्य करते हैं । लेकिन कभी किसी ने यह नहीं जानना चाहा हम जैसे श्रमिक पत्रकारों से कि हमारे परिवार का खर्च कैसे चलता है। आय का श्रोत क्या है , कितना है और बस इतना ही क्यों है , हम पत्रकारों की जीविका के संदर्भ में उनकी जुबां पर एक भी शब्द नहीं रहता  ?
    वे यह जानते ही नहीं कि श्रमिक पत्रकारों का सबसे बड़ा संघर्ष उनके कार्यक्षेत्र से इतर पारिवारिक जिम्मेदारी को लेकर है।  ये भद्रजन हमें जाने और पहचानने भी कैसे , क्यों कि वे तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौंध देख रहे हैं,  टीवी चैनलों पर अथवा वे कुछ पत्रकार जो इस जुगाड़ तंत्र में खिलाड़ी समझे जाते हैं और उनके पास सारी सुख सुविधा हैं, उन्हें ही असली पत्रकार समझते हैं। ऐसे जेंटलमैन इस तरह के पत्रकारों से मित्रता किये रहते हैं। शासन, प्रशासन और राजनेताओं से लेकर औद्योगिक घरानों में जुगाड़ू पत्रकारों की पूछ होती है , वहीं श्रमिक पत्रकारों को सुदामा समझ इन प्रभावशाली लोगों के द्वारपाल ही  इनका रास्ता काट देते हैं। वह सखा कृष्ण जो की द्वारकाधीश है , वह द्रुपद हो गया है। वह नहीं पहचानेगा सुदामा को। नहीं मिलेगा सुदामा को अपने कर्मपथ पर डटे रहने का पुरस्कार। होता क्या है अब कि पत्रकारिता के सिद्धांतों से समझौता नहीं करने वाले पत्रकारों को यह कॉकस किसी न किसी तरह अपने चक्रव्यूह में फंसा ही लेता है। समाचार लेखन में कोई कमजोरी पकड़ उसपर मुकदमे आदि दर्ज करवा देता है, फिर सम्पादक को नोटिस जाते ही , ईमानदार पत्रकार छटपटाने लगता है। आय का स्त्रोत उसका इतन नहीं है कि वह कोर्ट कचहरी का चक्कर लगा से। सम्पादक से अलग डांट मिली कि ऐसा क्यों समाचार लिखा ।  तब ऐसे भद्र लोग उस पत्रकार का सहयोग करने सामने नहीं आते, वरन् यह कहते मिलते हैं कि बेचारे के साथ बहुत बुरा हुआ ।
  अतः मरा- कटा और आपराधिक घटनाओं की खबर , बड़े राजनेताओं की बयानबाजी, सामाजिक कार्यक्रम और कभी कभी जनसमस्या भी , अमूमन इन्हीं सब समाचारों से पेज भर दिया जाता है।
       कभी- कभी तो ऐसा भी हो रहा है, जिनके विरुद्ध क्षेत्रीय पत्रकारों ने बिल्कुल सही रिपोर्टिंग की है और अखबारों में प्रकाशित होनेके बाद खलबली भी मची है, ऐसे कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को प्रेस के स्वामी  " कालापानी" की सजा सुना दे रहे हैं, क्यों कि जिसे पत्रकार ने  खलनायक बताया था , वह प्रेस के स्वामी की निगाहों में नायक बन बैठता है। है न यह भी आठवां आश्चर्य ? जुगाड़ तंत्र में सब चलता है। जिसके पास लक्ष्मी है ,वह मायाजाल का सृजन कर लेता है। फिर देते रहे श्रमिक पत्रकार अपनी ईमानदारी की सफाई।
  मुझे यह समझ में  नहीं आता कि ये भद्रजन जिस गोदी मीडिया  की बात हम पत्रकारों के बीच रख रहे हैं, उसमें हमारे जैसे लोग कितना सुधार कर सकते हैं , क्यों कि यह कार्य तो संस्थान के स्वामी ही कर सकते हैं। हमें तो संस्थान से जो दिशा निर्देश मिलता है , उसी का अनुसरण करना होता है। तमाम बड़े समाचार पत्रों में ऐसा ही होता है।
   मुझे तो यह भी समझ में नहीं आता कि पत्रकारिता दिवस पर हम इन प्रबुद्धजनों को आमंत्रित कर अपनी पत्रकारिता की समीक्षा ही क्यों करवाते हैं, जब हम उनकी सुझावों का अनुपालन ही नहीं कर सकते हैं। हम तो कठपुतली है साहेब अपने संस्थान के और अपने मन से कुछ नहीं कर सकते हैं। हाँ , एक काम हम बखूबी कर सकते हैं , वह यह कि पत्रकारिता के लाइसेंस के सहारे नौकरशाहों, राजनेताओं और औद्योगिक घरानों में अपनी पहचान बना सकते हैं। उनका फंसा हुआ कुछ काम " दलाल " बन कर प्रशासन, पुलिस और राजनेताओं से करवा सकते हैं। ऐसा करने में हम पत्रकार जितना अधिक प्रवीण होंगे, हम इस समाज की नजरों में उतने ही बड़े पत्रकार होंगे। यह कड़ुवा सत्य है कि आज ऐसे ही जुगाड़ू पत्रकार सफल हैं।
   फिर भी कर्म की पूजा निश्चित होती है। इस वर्ष पत्रकारिता दिवस से जुड़े एक कार्यक्रम में मंच पर जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक संग वरिष्ठ कालीन निर्यातक बाबू सिद्धनाथ सिंह भी बैठे हुये थें। एसपी संग गुफ्तगू के दौरान उन्होंने मेरे बारे में उन्हें बताया कि एक ऐसा पत्रकार भी है , जो साइकिल  से ही चलता है और जुगाड़ तंत्र से दूर है। उन्होंने मेरा परिचय जब इन विशिष्टजनों से करवाया , तो मुझे एक सुखद अनुभूति निश्चित हुई कि ऐसे आत्मीयजनों के होते हुये मेरा त्याग निरर्थक तो नहीं गया। लेकिन, अब भी यही कहूँगा कि हमारे श्रम का उपहास न किया जाए और हमें इतना वेतन मिले कि हम श्रमिक पत्रकार भी  मान, सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीवन यापन कर सकें। अपने परिवार की  सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें।
  आप सभी देख ही रहे होंगे कि हम सुबह से रात तक कार्य करते हैं। परंतु जनपद स्तर पर हमें वेतन चार से आठ हजार के   मध्य ही मिलता है। वैसे हम जुगड़ से पैसा कमा सकते हैं,लेकिन तब ये ही भद्रजन आलोचना करते हैं। यदि हम छोटे संस्था से जुड़े हैं, तो वह हमें पर्याप्त वेतन देने में असमर्थ है।बड़े संस्थान भी यही करें, तो निश्चित कष्ट होता है।  हमारी योग्यता और हमारे परिश्रम का मूल्यांकन न भी किया जाए, तो कम से कम सिर उठा कर समाज में उठने बैठने का अवसर तो मिले। एक बात बताऊँ मैं, जब साइकिल से किसी बड़े कार्यक्रम अथवा आला अफसर के यहाँ जाता हूँ, तो कभी- कभी नकली (फर्जी)पत्रकार ठहरा दिया जाता हूँ, क्यों कि पहरेदारों को यह विश्वास नहीं होता कि साइकिल से भी पत्रकारिता आज के दौर में होती है। फिर मुझे अपना परिचय पत्र दिखलाना होता है कि मैं मान्यता प्राप्त पत्रकार हूँ।  तब वे कहते हैं , " सर , प्लीज ! बुरा न माने भ्रम हो गया था। "
   अब आप बताएँ कि बाइक खरीद भी लूँ , तो पेट्रोल का पैसा कहाँ से लाऊँ ?
   हाँ, जुगाड़ तंत्र की दासता स्वीकार कर लूँ,तो दो क्या चार पहिया गाड़ी के स्वामी हम भी होंगे।  खैर ,मुझ जैसे पत्रकारों से यह सम्भव नहीं हो सका।
   ऐसे में जहाँ पत्रकारिता दिवस पर मंच से हमें नसीहत दी जा रही है। वहीं मंच के नीचे हमारे जैसे श्रमिक पत्रकारों के जीवन में अंधकार है, आजीविका के लिये संघर्ष है और जुगड़ तंत्र का उपहास भी सहन करना है। भले ही पत्रकारिता बनिये की दुकान नहीं हो, यह सन्यासी का काम है, फिर भी आप सब हमारी परिस्थितियों पर विचार करें कि ऐसी चुनौतियों के समक्ष हम कब तक तनकर खड़े रहेंगे। मित्रों , हमारी नोकदार कलम भोथरी न हो, इसके लिये सरकार एवं समाज हम श्रमिक पत्रकारों  रोटी ,कपड़ा और मकान मुहैया करवाएँ ?
प्रणाम।
    -व्याकुल पथिक

बाहरी व्यक्ति से बिना आर्थिक सहयोग लिये प्रेस क्लब ने मनाया पत्रकारिता दिवस
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पत्रकारिता में पारिश्रमिक की शुरुआत मदन मोहन मालवीय ने की थी
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     आदर्श पत्रकारिता के मानदंडों पर खरा उतरने के लिए मिर्ज़ापुर प्रेस क्लब रजिस्टर्ड द्वारा इस बार बिना किसी बाहरी व्यक्ति से आर्थिक सहयोग चंदा लिए बिना पत्रकारिता दिवस के आयोजन का जो निर्णय लिया गया था।  उस पर संस्था के सभी सदस्य खरे उतरे। मिर्ज़ापुर के पत्रकारिता जगत के लिए यह एक ऐतिहासिक कार्यक्रम रहा। वरिष्ठ और कनिष्ठ पत्रकारों की मौजूदगी में भव्यता के साथ  इसका आयोजन किया गया । जिसमें जिलाधिकारी अनुराग पटेल के अतिरिक्त ऐसे वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार मौजूद रहे, जिन्होंने पत्रकारिता और पत्रकार से जुड़े सभी विषयों पर प्रकाश डाला।  मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार बृजदेव पांडेय फिक्की की उस  टिप्पणी का उल्लेख किया, जिसमें उसने कहा है, "  मैं मन और आत्मा की स्वतंत्रता के लिए पत्रकारिता करता हूं।"  उन्होंने बताया कि मदन मोहन मालवीय ने 1947 में अभ्युदय पत्रिका के प्रकाशन के साथ ही पत्रकारों को पारिश्रमिक देने का चलन पारित किया था। मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार  रविंद्रनाथ जायसवाल ने वर्तमान समय में प्रिंट मीडिया की बढ़ती विश्वसनीयता को रेखांकित किया । विशिष्ट वक्ता भोलानाथ कुशवाहा जिन्होंने इलाहाबाद में एक प्रमुख समाचार पत्र के जिम्मेदार पदों पर रहकर कार्य किया है , उन्होंने पत्रकारों की हर तरह की परिस्थितियों पर व्यापक प्रकाश डाला और कहा कि अखबारों का अस्तित्व निष्पक्षता की बुनियाद पर टिका है। यह सच है कि बहुत कुछ अखबार के मालिक की मर्जी पर निर्भर है ,पर भाषा और संवेदना तो पत्रकार के हाथ में है। उन्होंने कहा कि प्रिंट मीडिया दस्तावेज है । पत्रकारों का आर्थिक पक्ष मजबूत हो इसके लिए समाज तथा सरकार दोनों को मंथन करना चाहिए गोष्टी में जिलाधिकारी पटेल ने कहा कि नैतिक और विकसित समाज बनाने में पत्रकारों की अहम भूमिका होती है। कार्यपालिका ,न्यायपालिका, व्यवस्थापिका  तीनों ही पत्रकारिता के आईने में अपनी खामियों एवं अच्छाइयों को देख सकता है । उन्होंने कहा कि समाज उन्हें ही याद करता है जो विषम परिस्थितियों में सकारात्मक कार्य करते हैं । पत्रकार इसी श्रेणी में आते हैं। गोष्टी को सर्व श्री सलिल पांडेय, देवी प्रसाद चौधरी ,संजय सिंह गहरवार ने भी संबोधित किया। विषय परिवर्तन पत्रकार संतोष श्रीवास्तव ने किया।  संस्था द्वारा वरिष्ठ पत्रकार सर्व श्री भोला नाथ पांडेय, कृपा शंकर चतुर्वेदी, रविंद्र नाथ जायसवाल ,चंद्रभूषण तिवारी एवं भोलानाथ कुशवाहा को मतवाला सम्मान से सम्मानित किया गया। संस्था के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा, सचिव अजय शंकर गुप्त ,शिवशंकर उपाध्याय, शशि गुप्ता ,सुजीत वर्मा ,प्रभाकर मिश्र ,विनोद सिंह ,प्रवीन सेठी ,दिनेश उपाध्याय और राहुल गुप्ता आदि क्लब के सदस्य मौजूद रहे। गणमान्य जनों में विवेक बरनवाल, डा0 रमाशंकर शुक्ला ,बद्री विशाल ,धीरेंद्र सिंह ,कमलेश दूबे ,सुरेश सिंह, संजय दूबे, राजाराम यादव, देव गुप्ता ,मोहित गुप्ता विश्वजीत दूबे,सुनील कुमार पांडेय, आयुष सिंह आदि भी उपस्थित रहे।


Tuesday, 28 May 2019

न मिले मीत तो...

न मिले मीत तो...
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न कोई मीत मिले तो फ़क़ीरी कर ले
जलती शमा को बुझा के जुदाई सह ले

मिलती नहीं खुशियाँ तन्हाई जब होती
स्याह रातों में ग़मों से फिर दोस्ती कर ले

लोग ऐसे भी हैं उजाले में नहीं दिखते
आज़माएँ उनको भी ग़र अँधेरा कर ले

देके दर्द अपनों को जो वाह-वाह करते
वो अपनी ही निगाहों में कभी गिरते हैं

यतीमों की दुनिया में तू अकेला भी नहीं
राह में जो मिलते हैं वो हमदर्द तो नहीं

आँखें भर आई क्यों इक सहारा ढ़ूंढे ?
है इंसान तो मज़लूमों से दोस्ती कर लें

ख़ुदा के घर देर हो और अंधेर भी सही
ज़ख्म दिल का न भरे पर जिया करते हैं

कैसे समझाऊँ तड़पते नाज़ुक दिल को
उम्मीदों की चिता में यूँ न जला करते हैं

राह वीरान हो मुसाफ़िर तो चला करते हैं
दुनिया के  तमाशे में वो न रमा करते हैं

दर्द  को यूँ  ही सीने में दबाए रख ले
तेरी बिगड़ी है तक़दीर, वे नसीबा वाले ।

                       - व्याकुल पथिक

Sunday, 26 May 2019

काकी माँ..




काकी माँ..
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   काकी माँ तो सचमुच बड़े घर की बेटी हैं।   संकटकाल में भी वक्त के समक्ष न तो वे नतमस्तक हुईं , न ही अपने मायके एवं ससुराल के मान- सम्मान पर आंच आने दिया । वे संघर्ष की वह प्रतिमूर्ति हैं ।
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     काकी माँ.. ! यह प्यार भरा सम्बोधन आज भी स्मृतियों में आकर मुझे आह्लादित कर जाता है। हाँ , इतने बड़े घर में एक काकी माँ ही तो थीं। जिनके समक्ष हुड़दंगी बच्चों की भी बोलती बंद हो जाया करती थी , फिर भी उनके चौखट पर हाजिरी देने परिवार के सारे बच्चे आया करते थें। आर्थिक परिस्थितियाँ चाहे जैसी रहीं हो, लेकिन काकी माँ न जाने कहाँ और किस तिजोरी से बिस्किट-टॉफी का जुगाड़ इन शैतानों के लिये किये रहती थीं। इनके जन्मदिन पर भी कुछ न कुछ वे देती ही थीं। कोई दर्जन भर बच्चे तो घर के ही थें।

   वैसे मैंने स्वयं किसी को कभी काकी माँ नहीं कहा है। परंतु बचपन में इस कर्णप्रिय शब्द को उस घर-आंगन में गूंजते हुये देखा है। जिसका अब अस्तित्व ही नहीं है। वहाँ न संयुक्त परिवार रहा,न बच्चे रहें और नहीं ही काकी माँ । अब तो वे नानी माँ बन गयी हैं।
    मैं यहाँ जिस भद्र महिला की बात कर रहा हूँ । विवाह के पूर्व वे बड़े घर की बेटी जैसी ही थीं । महानगर में रहती थीं  और अपने माँ- बाप की लाडली बिटिया थीं। जिस परिवार से तब वे संबंध रखती थीं, वे धनिक थें। बंगला, गाड़ी और नौकर भी सेवा में हाजिर रहते थें। वैसे तो, काकी माँ के पिता उतने संपन्न नहीं थें , क्यों कि जब वे छोटे थें तभी माँ की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्ति का बंदरबांट हो गया था । फिर भी रहन-सहन उनका धनिकों से कम नहीं था , यूँ  कहें कि वे दिल से अमीर थें । उनकी दो पुत्रियों में काकी माँ छोटी  हैं। हर कार्य में निपुण और व्यवहारिक ज्ञान ऐसा है कि  कई प्रांतों में फैले सगे सम्बंधियों से आत्मीयता आज भी कायम है।
     हाँ, जिनके बीच वे रहती थीं , उस सोसाइटी के अनुरूप जरा बन संवर के रहना पड़ता था। बनावट, दिखावट और मिलावट ,भद्रजनों की यह एक गंभीर बीमारी है । वे समाज में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करना चाहते हैं। अतः उनके साथ उठते- बैठते काकी माँ ने भी अपने ऊपर यह आवरण डाल रखा था।  सम्भवतः यदि वे ऐसा न करती तो हीन भावना से ग्रसित हो सकती थीं , उन्हें वह सम्मान नहीं मिलता और इन जेंटलमैनों की सोसायटी में कोई उन्हें स्वीकार नहीं करता ।
   इतने सम्पन्न परिवार के मध्य उनका अविवाहित जीवन ठीक-ठाक गुजर रहा था।  एक नटखट बालक कुछ वर्षों तक इस परिवार का अंग रहा। वह अपनी नानी माँ और मौसी माँ का राजदुलारा था । कोलकाता जैसे महानगर के पहचान वाले कान्वेंट स्कूल में उसे दाखिला दिलाया गया था। काकी माँ उसे अंग्रेजी की कविता रटवाया करती थीं।
   उन्हें पता था कि  हिन्दी भाषी तभी जेंटलमैन कहे जाते हैं, जब विलायती बोली उनकी जुबान पर हो। लेकिन , दो बंगालियों को आपस में अपनी भाषा छोड़  अंग्रेजी बोलते उन्होंने भी कम ही सुना होगा ।
  खैर वह शैतान बालक पढ़ने की जगह कमरे से लेकर बरामदे तक दौड़ लगाया करता था। माँ -बाबा( नाना-नानी ) तो उसे डांटते न थें कभी , ऐसे में काकी माँ की तिरछी नजरों से ही वह तनिक घबड़ाता था। वही क्या हर बच्चा काकी माँ की आँखों का इशारा समझता था। मायके और ससुराल दोनों ही जगह जब बच्चे शैतानी करते थें ,तो काकी माँ की सेवा ली जाती थी। ऐसे हठी बच्चों को रास्ते पर लाने के लिये  डांट- फटकार एवं  पिटाई की कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी काकी माँ को। वे तो बस आँखें तरेरती थीं और स्टेच्यू बनकर खड़े हो जाते थें, ये सारे हुड़दंगी बच्चे । मानो वे अनुशासन की पाठशाला थीं  । जिसने इसमें  प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया । वह अडानी- अंबानी परिवार के मध्य पहुँच कर भी अपनी परवरिश पर गर्व कर सकता है। फिर भी उस नटखट बालक को यह औपचारिकता पसंद नहीं थी। बचपन से ही उसे दुनिया की हर दौलत से कहीं अधिक प्रिय था ,अपनों से मिलने वाला प्यार - दुलार। इसी स्नेह और अपनत्व के लिये न जाने क्यों आज प्रौढ़ावस्था में भी वह उसी बालक सा  मासूमियत लिये मचलता है ?
    वह नादान ,जिन्हें अपना समझता है, उसी से जब कभी दुत्कार मिलता है। तो अस्वस्थ तन से कहीं अधिक उसका मन आहत हो उठता है। अपनी इस निर्लज्जता पर वह क्या कहे ! संत बनने की चाहत है और भिक्षुक बना स्नेह की याचना करता है। उसकी अंतरात्मा उसे झकझोरती है कि धिक्कार है उसके जीवन पर , संकल्प में जिसके बल न हो ।
    क्या यह विकल इंसान वही बालक है ,जो डिनर टेबल पर  प्लेट से चम्मच का टकराव न हो, काकी माँ  के इस फरमान को रद्दी टोकरी में डाल, कभी यह कहता था कि ऐसे भद्रजनों के मध्य उसका क्या काम ? उस बालक की निर्भिकता , स्पष्टवादिता एवं आत्म स्वाभिमान के समक्ष जब ऐसे जेंटलमैन मौन रहते थें, तो आज वह आत्मबल कहाँ चला गया उसका ?  सम्भवतः इसीलिये कहा गया है , " समय होत बलवान  "
   लेकिन, काकी माँ तो सचमुच बड़े घर की बेटी हैं।   संकटकाल में भी वक्त के समक्ष न तो वे नतमस्तक हुईं , न ही अपने मायके एवं ससुराल के मान- सम्मान पर आंच आने दिया । वे संघर्ष की वह प्रतिमूर्ति हैं , जो अपनी माँ , पिता , श्वसुर एवं पति की मृत्यु के पश्चात भी न टूटी और न झुकी ही।  तब ऐसे संकटकाल में भी अपने धनाढ्य सगे सम्बंधियों से  आर्थिक सहयोग उन्होंने नहीं मांगा था।
   विवाह के बाद जब तक उनकी माँ जीवित थीं , ससुराल आना-जाना लगा रहता था। पति उच्च शिक्षा प्राप्त थें, परंतु दुर्भाग्य से अथवा अपनों के छल से, उनका व्यवसाय ठीक से चला नहीं। फिर भी मायके की छत्रछाया  में उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय थी। लम्बी प्रतीक्षा के बाद एक नन्ही परी का आगमन उनकी माँ के रहते ही हो गया था। माँ ने तो पहले से ही नाती हो या नातिन  सारी व्यवस्था कर रखी थी। लेकिन, काकी माँ के धैर्य की कठोर परीक्षा तब शुरू हुई , जब माँ का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। ऐसे में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी बमुश्किल ही हो पा रहा था । काकी माँ को तेल और नमक से चावल खाते कभी सगे- संबधियों ने नहीं देखा । कभी- कभी इस मुट्ठी भर चावल के लिये भी पैसे नहीं होते थें। उन्हें हल्दीराम का भुजिया और समोसा अत्यंत प्रिय है। कोलकाता में थीं, तो बाबा दिन भर तरह तरह के चाट और महंगे फल भेजा करते थें। शाम को वह बूढ़ा नौकर  भेलपुरी बनवा कर लाता था। मलाई गिलौरी, मलाई लड्डू, काजू एवं पिस्ता बर्फी से लेकर संदेश, राजभोग , खीरमोहन और वह शुद्ध देशी घी का सोनपापड़ी तो नीचे कारखाने से ही  आ जाया करता था। लेकिन यह ससुराल में अपने मुहल्ले के चौक पर स्थित प्रसिद्ध दुकान से वह बड़ा वाला समोसा जो, तब पचास पैसे में मिलता था , उस एक छोटे सिक्के की व्यवस्था भी कठिन थी।
     परंतु उनका व्यक्तित्व इतना विराट था कि दरवाजे पर लटके पर्दे के पीछे के अपने जीवन संघर्ष की भनक तक उन्होंने अपने संयुक्त परिवार को लगने नहीं दिया। उनके हाथ की बिना घी लगी रोटी , कभी कड़ी नहीं हुआ करती थी। छोटी सी लौकी से वे रसेदार सब्जी इतना स्वादिष्ट बनाती थीं कि पकवान का स्वाद तक फीका पड़ जाता था।  दीपावली - होली जैसे पर्व घर आने वाले मेहमानों को उनके हाथों से बने व्यंजन इस तरह पसंद थें कि सबसे पहले वे काकी माँ के दरवाजे पर ही उनके पति अथवा पुत्री का नाम लेकर आवाज लगाया करते थें। कांजीबड़ा, दहीबड़ा, मालपुआ सहित तरह - तरह के पकवान बनाने की व्यवस्था वे कैसे कर लेती थीं, यह रहस्य उनके दिवंगत पति भी नहीं जान सके थें।
  हाँ,उनके शरीर पर से गहने एक-एक कर कम होते चले गये, फिर भी अपनी इस उदासी को पर्दे के उस पार नहीं जाने दिया। वह बालक जो समझदार हो गया था, उसे जब कभी वे अपने खाली हुये शरीर के उन अंगों को दिखलाती थीं, जिनपर मायके से मिले स्वर्णाभूषण शोभा बढ़ता थें, तो काकी माँ की डबडबाई आँखों में जिस दर्द को उसने देखा है, उसे कोई बड़े घर की बेटी ही सहन कर सकती है। फिर भी औरों के यहाँ आयोजित मांगलिक कार्यक्रमों में वे खाली हाथ कभी नहीं गयीं। बाद में एक दौर वह भी आया ,जब काकी माँ  को सुबह से शाम तक चौका - बर्तन करते देखा गया। मायके में जिन हाथों से वे झाड़ू पोछा तक नहीं करती थीं। उन्हीं नाजुक कलाइयों से वे घंटे भर चटनी और मसाला  पीसा करती थीं , क्यों कि उनके पति का व्यापार जब चौपट हो गया, तो पिता ने उन्हें नालायक समझ अपनी दुकान में मालिक नहीं, वरन् अघोषित सेवक के रुप में जगह दे रखी थी। सो, श्वसुर और उनकी मित्र मंडली के भोजन की सारी व्यवस्था काकी माँ ही किया करती थीं। श्रम उनका था और धन ससुर जी का।
   देखें न नियति को यह भी कहाँ मंजूर था। ससुर जी ने जैसे ही आँखें बंद की , उनके पति को अपने ही सगे सम्बंधियों ने पिता की दुकान से बेदखल कर दिया। यह घृणित कार्य करते हुये , तनिक भी नहीं पसीजे थें, उनके भाई- भतीजे। बिल्कुल सड़क पर आ गया यह दम्पति। जीवकोपार्जन के लिये किसी तरह से एक छोटे से विद्यालय में नौकरी मिली थी उनके पति को। घर पर काकी माँ भी छोटे बच्चों  को पढ़ा लिया करती थी। एक चिन्ता और थी उन्हें , पुत्री के लिये योग्य वर की खोज पूरी नहीं हो पा रही थी। उन्होंने तो बड़े घर की नातिन और अपने इकलौती संतान के लिये कितने ही स्वप्न संजोये थें। काकी माँ योग्य जमाता के लिये अनगिनत बार ईश्वर से प्रार्थना करती थीं,पर उन्हें क्या पता कि अग्नि परीक्षा तो अभी बाकी है और एक दिन ठंड के मौसम में विद्यालय जाते समय उनके पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। जो पिता सुबह से रात तक स्कूल-कोचिंग पढ़ा अपनी पुत्री के हाथ पीले करने का स्वपन साठ वर्ष की अवस्था में देख रहा था। वह सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया। बाहदुर पुत्री ने ही तब पिता का अंतिम संस्कार किया था, क्यों कि सम्पन्न होकर भी सगे सम्बंधियों ने कभी भी उनकी आर्थिक स्थिति समझने का प्रयत्न नहीं किया । अतः बेटी ने पुत्र बन पिता को मुखाग्नि दी थी। वह बालक जिसे काकी माँ ने बचपन में बड़ा दुलार दिया था। वह भी उनके संकट में काम नहीं आया। वह तो किसी दूसरे प्रांत में दो वक्त की रोटी के लिये गुलामी कर रहा था।
   अब बचीं माँ - बेटी । काकी माँ अपने जर्जर मकान में  छोटे बच्चों को पढ़ाया करती थीं और उनकी पुत्री ने भी एक निजी विद्यालय में नौकरी कर ली। तब उनके मन में एक ही प्रश्न था कि किस अपराध का दण्ड मिला है। अपने मांग का सिंदूर तो उजड़ गया , परंतु पुत्री के हाथ पीले कैसे हो। अनेक प्रांतों में अति सम्पन्न रिश्तेदार जिसके हो , जिसने कितनी ही शादियों में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करवाई है। उसके आंगन में शहनाई बजवाने वाला कोई नहीं  !
    डगमगाने लगा था उनका स्वाभिमान। तभी एक चमत्कार सा हुआ और एक उच्चकुल के सुशील लड़के ने उनकी पुत्री का हाथ थाम लिया। इस तरह से काकी माँ के संघर्षपूर्ण जीवन का धुंध छंट गया। अब वे अपनी पुत्री, जमाता और सुंदर से नाती के साथ रहती हैं। इस अवस्था में भी दुर्बल तन को किसी तरह संभाल वे घर का काम काज किया करती हैं।       अब वह प्यारा चंचल बालक जब नानी- नानी पुकारते हुये खिलखिलाता है , तो अतीत के आईने में काकी माँ को उसी का मुखड़ा नजर आता है। उस बच्चे के परवरिश में वे अपनी सारी वेदनाओं को न जाने कब का भूल चुकी हैं। काकी माँ अब बेहद खुश हैं, परंतु वृद्धावस्था ने अपना प्रभाव दिखलाना शुरू कर दिया है। फिर भी वे कोलकाता वाले उस शैतान बालक को भुला नहीं पायी हैं।

                          - व्याकुल पथिक


  यहाँ काकी माँ कोई काल्पनिक पात्र नहीं हैं। वे आज भी जीवित हैं और प्रकाश स्तंभ के रूप में अपने परिजनों के कर्म पथ का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं-प्रणाम