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Wednesday, 19 August 2020

सज़ा

सज़ा
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     पौ फटते ही उस मनहूस रेलवे ट्रैक के समीप आज फिर से भीड़ जुटनी शुरू हो गयी थी। यहाँ रेल पटरी के किनारे पड़ी मृत विवाहिता जिसकी अवस्था अठाइस वर्ष के आस-पास थी, को देखकर उसकी पहचान का प्रयास किया जा रहा था। सूचना पाकर पुलिस भी आ चुकी था।
मृत स्त्री के चम्पई रंग वाले मुखड़े पर जिस किसी की भी दृष्टि पड़ती उसका हृदय करुणा से भर उठता था। माथे पर बड़ी-सी लाल बिंदी,गले में मंगलसूत्र , नाक में कील और टब्स पहने रखे वह किसी अच्छे घराने की लग रही थी। किन्तु मृत्यु के बाद भी उसके शांत मुख पर एक दर्दभरी कहानी थी। वहाँ जुटी भीड़ ट्रेन से कटने का सवाल भी और आकलन भी कर रही थी।

    लाल वस्त्रों में लिपटी मृतका के सिर के पिछले हिस्से से लहू का रिसाव हो रहा था, जिससे आसपास की जमीन लाल हो गई थी । सिर में लगी इस चोट के अतिरिक्त उसके शरीर पर अन्यत्र घाव नहीं थे। जिसे देख कर ऐसा महसूस हुआ कि नगर के इस सुसाइड प्वाइंट पर मरने से पहले वह जान देने की विवशता से विचलित हुई होगी । जिस कारण वह रेलगाड़ी के समक्ष छलांग लगाने का साहस नहीं जुटा सकी थी किन्तु फिर भी इंजन के धक्के ने उसके जीवन की इहलीला को हमेशा के खत्म कर दिया। जिसके लिए वह गहरी रात घर से दबे पाँव मृत्यु के लिए ही निकली थी। 

    उसने अपनी पहचान के लिए कोई पत्र अथवा सुसाइड नोट नहीं छोड़ रखा था। लाश देखते ही झल्लाते हुये दरोगा ने सिपाही से कहा था-" यार ! क्या मुसीबत है ? लोग यहीं आ क्यों कट मरते हैं ?" यदि शिनाख़्त नहीं होती तो रेलवे पुलिस पूर्व में इसी रेलवे ट्रैक पर मिले कुछ अन्य लाशों की तरह इस मृत महिला के शव का भी पोस्टमार्टम कर फाइल बंद कर देती। परंतु निकटवर्ती मुहल्ले की होने के कारण शव की पहचान हो गई। 

    जैसे ही उसके द्वारा आत्महत्या करने की सूचना ससुरालवालों के माध्यम से उसके मायके तक पहुँची वज्राघात-सा हुआ था उनपर। रक्षाबंधन पर्व से पूर्व ममता का भाई उसके ससुराल आया था। तभी उसने अपनी इकलौती बहन की डबडबाई आँखों में छिपी वेदना को पढ़ लिया था। वह अपनी लडली बहन को कुछ दिनों के लिए साथ ले जाना चाहता था, ताकि उसमें नव जीवन का संचार हो सके। उसके इस प्रस्ताव को जब ससुरालवालों ने इंकार किया तो भाई संग मायके जाने के लिए ममता ने भी हाथ-पाँव जोड़े थे, फिर भी उसकी सास का कलेजा नहीं पसीजा । और तो और उसके दोनों मासूम बच्चों को माँ की ममतामयी आँचल से दूर कर उन्हें मामा के साथ ननिहाल भेज दिया गया। 

   ऐसा होते देख ममता ने रुँधे कंठ से इसका विरोध किया था। उसे यह बात बिल्कुल भी नहीं समझ में आ रही थी कि जब वह स्वस्थ हो चुकी है, तब भी उसके अपने ही सगे-संबंधी इस प्रकार  उसे अछूत क्यों समझ रहे हैं। उसे किस अपराध की सज़ा मिल रही है ?

      ममता को कुछ दिनों पूर्व कोरोना हुआ था। पूरे चौदह दिन वह अपनों से दूर आइसोलेशन सेंटर में पड़ी रही। कोविड अस्पताल जाते वक़्त उसे सांत्वना देना तो दूर पुराने विचारों वाली उसकी बूढ़ी सास ने उसे कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ रखा था। उसने भरे मन से एम्बुलेंस में पाँव रखा  ही था कि तभी पीछे से सास कि कर्कश गर्जना सुनाई पड़ती है। वह कह रही थी-"यह अभागिन सबके लिए संकट बन गयी है। पता नहीं कहाँ से बीमारी उठा लाई है। ख़बरदार  जो इससे मिलने अस्पताल में कोई गया, नहीं तो सबको महामारी दे देगी यह।"  सास के  इस कटु-वचन ने रोग से उसके बीमार तन से कहीं अधिक कोमल मन पर प्रहार किया था। तब जाते-जाते उसने अपने पति देवांश की ओर आशाभरी निगाहों से देखा था ,परंतु उसने भी  उपेक्षात्मक रुख अपनाया

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   आइसोलेशन सेंटर से 14 दिन बाद निकल कर जब ममता वापस घर लौट रही थी । उसे साँस लेने में अब भी कुछ कठिनाई हो रही थी, किन्तु अपने दोनों मासूम बच्चों की यादों में खोयी हुई थी। जिन्हें देखने के लिए उसकी आँखें तरस रही थी। ममता सोचा रही थी कि इस एकांतवास के पश्चात घर पहुँचते ही बच्चे माँ-माँ पुकारते हुये उसकी आँचल में आ छिपेंगे । स्वस्थ होकर फिर से सास, ससुर और पति की सेवा में जुट जाएगी।
  
    परंतु यह क्या ? उसके ससुराल लौटने पर  परिवार के सदस्यों ने उसका स्वागत नहीं किया। सभी उससे सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंस ) बनाए हुये थे। सास  ने चरणस्पर्श करने से मना कर दिया। पतिदेव नीचे अपनी दुकान पर आसन जमाये हुये थे। बच्चों को भी उसके निकट आने नहीं दिया गया और तभी दूर खड़ी ननद ने उसे पीछे वाली कोठरी में जाने के लिए इशारा किया। बिना रोशनदान वाले इस छोटे से कक्ष और उसमें रखे तख्त को देख उसका कलेजा बैठा जा रहा था। और तभी सास फिर से आग उगलते हुये कहा- "मेरी बात कान खोल कर सुन लो, इस कमरे के बाहर कदम मत रखना,जब तक हमें यह न लगे कि तुम पूरी तरह ठीक हो।" आइसोलेशन सेंटर से ममता को कोरोना मुक्त होने का प्रमाणपत्र मिलने के बावजूद ससुरालवाले पुनः संक्रमण फैलने को लेकर भयभीत थे। उसकी सास और ननद के लिए उसके आत्मसम्मान पर चोंट पहुँचाने का यह सुनहरा अवसर था। अब इस घर में कबाड़ रखने वाली कोठरी में उससे बात करने वाला कोई नहीं था। स्नेह न सही उसके प्रति दयाभाव का प्रदर्शन भी नहीं किया जा रहा था। वह अकेली पड़ी दीवारों से बातें करती या सिसकती रहती थी। इसके बावजूद  सास की अविश्रान्त कैंची उसके नाज़ुक दिल पर चलती रही। वह दरवाजे से दूर खड़ी हो उसे ताना  देती -"इस महारानी को जरा देखों, कैसे आराम से खांट  तोड़ रही है।चौका -बर्तन के लिए हम माँ-बेटी तो हैं ही। ऊपर से इसके शरारती बच्चों ने नाक में दम कर रखा है।"

   तनिक-सी भूल हुई नहीं की वे दोनों उसके बच्चों का गाल लाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं। यह देख वह स्वयं से सवाल करती कि विवाह के पश्चात पिछले सात वर्षों से जिन ससुरालवालों की इच्छापूर्ति के लिए उनकी उँगलियों के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचती रहती ,वे ही आज इतने निष्ठुर कैसे हो गये हैं ? फोन पर उससे बातचीत के दौरान भाई को ममता की पीड़ा का आभास हो गया था, इसीलिए वह उसे अपने साथ ले जाने के लिए बहन के ससुराल आया था। किन्तु उसकी सास ने बड़ी चतुराई से बच्चों की उनकी सुरक्षा का हवाला देकर  मामा के साथ जाने दिया, परंतु ममता को नहीं जाने दिया । बहू की भवनाओं से सास संभवतः परिचित हो गयी थी कि यदि इसे खरी-खोटी सुनाती रहेगी तो वह सदा-सदा के लिए घर का पिंड छोड़ देगी, क्योंकि वह कोरोना को खतरनाक छुआ-छूत वाली बीमारी समझती थी। आखिर इसका अंततः असर हुआ भी। 

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     पुत्रों के जाने के पश्चात ममता बिल्कुल अकेली पड़ गयी थी। प्रियजनों के दुर्व्यवहार का संताप उसके मन-मस्तिष्क को कोरोना से भी घातक विषाणु की तरह चाट कर खोखला कर चुका था। इस हालात में भी उसपर दया करने वाला कोई नहीं था। तिरस्कार से उपजी वेदना ग्लानि में परिवर्तित हो गयी थी। उसे अपने जीवन से कोई आशा और उमंग शेष नहीं रह गया था।  एक दिन उसके चोट खाये हृदय में आतंकमय कंपन-सा हुआ था। उसकी आत्मा इस कैदखाने से मुक्त होने के लिए छटपटाने लगी थी। मोह का बंधन टूट चुका था।  अनुकूल वातावरण मिलते ही नकारात्मकता रुपी काली परछाई 'कोरोना' बनकर उसे दबोचने के लिए प्रगट हो जाती है। यह देख भय से आँखें बंद करते ही, वह उस शैतान के काले जादू के वशीभूत हो जाती है।तब इस कोठरी में एक ही आवाज़ गूँज रही थी- "ममता ! जब किसी को भी तेरी जरुरत नहीं है। प्रियजन भी तेरे संग आत्मीयतापूर्ण व्यवहार नहीं कर रहे हैं,तो तू मर क्यों नहीं जाती ?"

    धीरे-धीरे ममता का चेहरा अत्यंत कठोर होता गया। उसे लगा कि सारा दोष उसका और उसके प्रारब्ध का है। उसने अपने लिए सज़ा निश्चित कर लिया था और इसका प्रायश्चित करने के लिए उसी रात वह घर से निकली तो मौत उसके साथ हो गई । जिस स्त्री ने घर के बाहर पाँव तक नहीं रखा था, वह न जाने किस प्रकार शहर के दूसरे छोर पर स्थित इस सुसाइड प्वाइंट पर जा पहुँची थी । 
  
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   पोस्टमार्टम के पश्चात ममता का शव घर पर आ चुका था। अंतिम संस्कार की औपचारिकता पूर्ण की जा रही थी। उसके आभागे बच्चों को लेकर मायके वाले भी आ चुके थे। जिनके करुण-क्रंदन से वातावरण ग़मगीन हो उठा था। ससुराल पक्ष की महिलाएँ भी अपनी आँखों पर रुमाल अथवा आँचल रख नाक सुरसुराने लगी थीं ताकि मुहल्ले-टोले को लोगों को यह लगे कि बहूँ की मौत से वे भी अत्यंत दुःखी हैं। ममता के इस तरह से ट्रेन से कट मरने से समाज में उनकी प्रतिष्ठा को कहीं आघात न पहुँचे , दिखावे के लिए हर व्यवस्था सास-ननद ने कर रखी थी। उसका पति किंकर्तव्यविमूढ़ बना खड़ा था।

 अब उसकी अर्थी सज चुकी थी। वापस घर लौटते समय हर कोई मेहता परिवार को कोस रहा था। लोग आपस में गुफ्तगू कर रहे थे-

    "हे ईश्वर ! इस दुखिया को किस बात की सज़ा दी है। कितनी कुशांगी थी बेचारी। सिर पर साड़ी का पल्लू रखे बिना कभी बारजे से झाँकती न थी।" पहले ने कहा था। "हाँ, साहब ! बिल्कुल गऊ थी । सुनने में तो यही आ रहा है , जब से उसे कोरोन हुआ था,मेहता परिवार का हर सदस्य उसके पीछे पड़ गया था। " दूसरे ने अपनी बात रखी। " राम-राम ! कितना बुरा हुआ  उसके साथ। कैसी मृदुल मुस्कान थी उसकी। घर में कोई मेहमान आ जाए तो अतिथि सत्कार के लिए एक पाँव से खड़ी रहती थी। " तीसरा भी टपक पड़ा था।" हाय रे! कैसी कर्कशा स्त्री है यह बुढ़िया, अपनी बहू पर तनिक भी रहम नहीं आया। काश ! उसे मायके भेज दिया गया होता, तो जान बच जाती । " वापस लौट रही पड़ोस की काकी की संवेदना भी फूट पड़ी थी ।

     इनको इस प्रकार से ताना मारते देख ममता के पति देवांश को अब वहाँ और ठहरना कठिन प्रतीत हो रहा था। देवी स्वरूपा पत्नी द्वारा इस प्रकार से आत्मघात करने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने उसके असंवेदनशील हृदय को भी झकझोर कर रख दिया। उसकी सुप्त अंतरात्मा चीत्कार कर रही थी । उसके विवेक ने उसे पूरे घटनाक्रम पर दृष्टि डालने के लिए विवश कर दिया था। वह यह समझने का प्रयत्न कर रहा था कि इस कोरोना काल में यह सब क्या हो रहा है? कोरोना कोविड-19 न तो प्लेग जैसा खतरनाक महामारी है, जिससे अत्यधिक घबड़ाने की जरुरत है न ही वह एड्स जैसा भयावह रोग है,जिसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए  छिपाना पड़ता है।फिर यह कोरोना किस प्रकार से मनुष्य के सारे आत्मीय संबंधों को निगलता चला जा रहा है। यदि इसे संक्रमण से मृत्यु हो भी रही है, इनमें से अधिकांश लोगों को कोई न कोई अन्य रोग था। उसके केस हिस्ट्री को सामने लाना चाहिए, न कि उसे 'सामाजिक दूरी' बनाए रखने के लिए विवश किया जाए। 

       कुछ इसी प्रकार का चिंतन करते हुये देवांश का मन बदल जाता है । उसका देवत्व जाग उठता है। मामूली बीमारी को लेकर सर्वगुण सम्पन्न पत्नी को जिस तरह से यातना दी गयी, उसपर वह पश्चाताप करने लगता है । अचानक उसकी भृकुटि तन जाती है और  वह जोर से चींख उठता है- " हाँ, मैं हूँ दोषी । मेरी मति मारी गयी थी।किन्तु उनसे भी सवाल करो,जो हमें 'शारीरिक दूरी' की जगह 'सामाजिक दूरी' बनाने का पाठ पढ़ा रहे हैं। ये मीडिया क्या अँधी है ? उसकी भी तो इसमें भूमिका है ? हमसब यह कैसे भूल गये कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ..!" पत्नी को खोकर वह विक्षिप्त-सा हुआ जा रहा था। उसका अंतर्मन उसे धिक्कार रहा था, तो ऐसी परिस्थिति उत्पन्न क्यों हुई , इसपर प्रश्न भी कर रहा था।

    फिर इस अपराध के लिए सज़ा किसे मिलनी चाहिए.... ?

   --व्याकुल पथिक

15-8-2020

Wednesday, 12 August 2020


 माँ का रुदन
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      अरे ! ये कैसा रुदन है..? स्वतंत्रता दिवस पर्व पर उल्लासपूर्ण वातावरण में देशभक्ति के गीत गुनगुनाते हुये चिरौरीलाल शहीद उद्यान से निकला ही था कि किसी स्त्री के सिसकने की आवाज़ से उसके कदम  ठिठक गये थे। ऐसे खुशनुमा माहौल में रुदन का स्वर सुन चकित हो वह इधर-उधर देखने लगा था। उसने अपने कान उस ओर कर यह सुनने का प्रयत्न किया कि मन को विकल करने वाली यह आवाज़ किसकी है। और फिर जब पीछे पलट कर देखा तो स्तब्ध रह गया था चिरौरी । क्योंकि इसी उद्यान में अमर शहीदों की आदमकद प्रतिमाओं के समक्ष एक स्त्री बैठी हुई थी, जो कभी देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान करने वाले भारत माता के इन वीर सपूतों के मुखमंडल को  अपना सिर उठाकर गर्व से निहारती, तो कभी आँखें नीचे कर विलाप करती दिखी । उसकी वाणी में अथाह वेदना थी। मानों दर्द का समुंदर इस उपवन में उमड़ पड़ा हो। 

      चकित हृदय से वह स्वयं से प्रश्न करता है --अभी कुछ देर पूर्व ही तो इस उद्यान में अनेक राजनेता, अफ़सर और अन्य विशिष्टजन जुटे हुये थे। जिन्होंने इन शहीदों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के पश्चात शहीद स्तंभ के समक्ष आत्मनिर्भर भारत पर बड़ी-बड़ी लच्छेदार बातें कही थीं। झंडारोहण कर मुख्य अतिथि ने  'सबका विकास, सबको काम, सबका कल्याण और सबका साथ ' ऐसा उद्घोष करते हुये राष्ट्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराई थी। कैसा पावन वातावरण था ? जैसे लग रहा था कि गाँधी बाबा के सारे अनुयायी खादी धारण किये उनके सपने को साकार करने यहाँ आ पहुँचे हों। वर्ष में दो बार यह अद्भुत दृश्य इस उद्यान में अवश्य देखने को मिलता है।  देशभक्ति वाले गीत भी सुनने को मिलते हैं।

    किन्तु पंद्रह अगस्त के दिन इस पार्क में रोने की आवाज़ उसने इससे पूर्व कभी नहीं सुनी थी या यूँ भी कह लें कि उसने इस रुदन को सुनने का प्रयत्न ही नहीं किया था। उसके जीवन का अधिकांश समय तो अपनी शिक्षा की डिग्री लिये आजीविका की खोज में बड़े लोगों की चिरौरी करते गुजर गया है। और तभी से न जाने कैसे उसका नाम चिरौरीलाल पड़ गया है।कर्तव्यनिष्ठ हो कर भी आज़ाद भारत में वह स्वालंबी नहीं बन सका। जब भी सरकार बदलती, उसे लगता कि जैस रामराज्य आने वाला है,किन्तु चुनावी बुखार उतरते ही उस जैसे करोड़ों निम्न-मध्यवर्गीय लोगों की झोली खाली ही रह जाती है। जब स्वतंत्र राष्ट्र में भी लोकतंत्रीय शासन की व्यवहारिक क्रियाओं से देश के युवा नैराश्य की अवस्था में हों, उनकी शिक्षा का कोई मोल नहीं हो,तो ऐसी व्यवस्था अराजकता को जन्म देती है।

   वक़्त के थपेड़ों की मार सहते-सहते चिरौरीलाल का पौरूष अब थकने को है,किन्तु बेरोजगारी साढ़ेसाती बनी सिर पर चढ़ी हुई है । वह समझ गया था कि यह ग़रीबी किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत व्यवस्था का फल नहीं है, इसके लिए सामूहिक व्यवस्था दोषी है। हाँ,एक काम यह अच्छा हुआ है कि इस जीवन संघर्ष ने उसकी शुष्क संवेदनाओं के तंतुओं में स्पंदन ला दिया है, तभी इस उल्लास भरे दिन में भी इस स्त्री की अस्फुट-सी आवाज़ उस तक पहुँच पायी थी , अन्यथा समारोह समापन से लौट रहे अन्य किसी ने महिला के विलाप को नहीं सुना था । 

      ओह ! कितना दर्द है इस नारी के स्वर में ! उत्सुकतावश चिरौरी दबे पाँव वापस उद्यान की ओर बढ़ जाता है। और जहाँ वह विस्मयपूर्ण नेत्रों से उस महिला को देखता ही रह जाता है...!
" हाय ! यह कैसा अनर्थ है? ये तो अपनी भारत माता हैं ! आज़ के दिन इन्हीं का तो पूजन-वंदन देश का हर नागरिक करता है। और ये यहाँ आपने शहीद पुत्रों के समक्ष विलाप रही हैं।"  यह मार्मिक दृश्य देख भय से उसका हृदय काँप उठा था । इस स्थिति में माता से आँखें मिलाने का साहस नहीं जुटा पाता है। वह शहीद स्तंभ के ओट में छिपकर रुदन कर रही माँ भारती की बातें सुनने लगता है।

     उसने देखा भारत माता खुदीराम बोस की प्रतिमा से कुछ कह रही थीं। हाँ ,याद हो आया..इसी अमर क्रांति दूत की शहादत से जुड़ा यह गीत उसने ऐसे राष्ट्रीय पर्वों पर कोलकाता में अपने विद्यालय में सुना था । मात्र 19 वर्ष की अवस्था में खुदीराम आजादी के दस्तावेज़ पर सुनहरे अक्षरों में अपना हस्ताक्षर बना बढ़ गये थे , उस मंजिल की ओर जिसके समक्ष यदि अमृत कलश भी बेमानी है। बंगाल का हर शख़्स इस बालक के चरणों में नतमस्तक दिखा था उसे उस दिन। माँ भारती अपने इसी बलिदानी सपूत से रुँधे कंठ से शिकायत कर रही थी-- रे खुदी ! स्मरण कर जाने से पूर्व तूने अपनी माता से क्या वादा किया था, यही न..

 एक बार बिदाई दे माँ घुरे आशी।
आमी हाँसी- हाँसी पोरबो फाँसी,
देखबे भारतवासी ।

    पर देख न मेरे लाल ,आज जब देश आज़ाद है, तो तू नहीं आया, तेरे बलिदानी भाई-बंधु भी नहीं आए । और मेरे इस तिरंगे की डोर जिनके हाथों में हैं, वे सफ़ेदपोश जो तेरे उत्तराधिकारी बन बैठे हैं। वे ऐसे राष्ट्रीय पर्वों पर वैसे तो कितनी अच्छी बातें करते हैं। वे कहते हैं -- नये दौर में लिख देंगे मिल के नयी कहानी, हम हैं हिन्दुस्तानी ।  किन्तु  मंच बदलते ही गिरगिट के तरह रंग बदल लेते हैं। फिर शुरू हो जाती है जातिवाद,क्षेत्रवाद ,धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर नफ़रत की सियासत। मर जाती है इंसानियत। वे पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद का ढोल बजाकर देश की भोली जनता को छल रहे हैं। आज अवाम में ख़ासी कड़ुवाहट है। अपनी बादशाहत बचाने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं। सत्ता पाते ही ये राजनेता निरंकुशता का पर्याय बन जाते हैं। और अब तो माफ़िया भी माननीय बन कर मेरे तिरंगे को अपावन कर रहे हैं। जिनके शासन में मेरी बेटियों की अस्मत सुरक्षित नहीं है। दुराचारी मेरे आँचल को मैला कर रहे हैं। बोल,कैसे करूँ मैं अपने स्वाभिमान की रक्षा,जब देश की निर्बल जनता गाँधी जी के उन तीन बंदरों की भाँति अपने मुख, आँख और कानों को बंद किये हो ? क्या अहिंसा के पुजारी ऐसे ही होते हैं ?

    पुत्रों, तुम सभी ने मुझे फ़िरंगियों की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए खुशी-खुशी अनेक कष्ट सहे  थे । अपना सब कुछ मुझ पर न्यौछावर कर दिया था। और ये दौलत के पुजारी देश को बेच रहे हैं। अब तो मुझे भी नहीं पता कि इनमें से कौन जयचंद और कौन शकुनि है। कहाँ गये तुम्हारे जैसे पुत्र , जिन्होंने अपने पवित्र रक्त से भक्तिपूर्वक अपनी इस प्यारी भारतमाता के पाँव पखारे थे, किन्तु इन सफ़ेदपोशों में से कितने मेरे लिए रक्तदान किया है ? तुम्हारे मिशन का इन्होंने जनाज़ा निकाल दिया है। चाल, चरित्र, चिंतन जैसे आदर्श वाक्य इतिहास के पन्ने में दफ़न हो चुके हैं। 

      भारत माता कहती ही जा रही थीं-- क्या प्राचीन भारतवर्ष के मानचित्र में तूने कभी मेरी भव्य तस्वीर को देखा है ? क्या स्वतंत्र भारत में भी मैं वैसी ही हूँ ? और तो और ये मुझे इण्डिया कहने लगे हैं। क्या मैं इनके लिए माता नहीं रही ? खुदी, मेरी व्यथा-कथा को समझ रहे हो ? विचार और कार्य की स्वतंत्रता अवश्य ही मनुष्य को जीवन की उन्नति का मार्ग दिखलाता है, परंतु स्वतंत्रता का अर्थ स्वछंदता तो नहीं होता न पुत्र ?

    यह सब सुनकर चिरौरीलाल अश्रु से भरी माँ भारती की आँखों में झाँकने का साहस नहीं कर सका था।  ग्लानि से उसका हृदय विकल हो उठा था। किन्तु अडानी-अंबानी बनने की चाहत रखने वालों के इस देश में अब भगत सिंह बनना कौन चाहेगा ? वह भी नहीं..? अकस्मात उसे ऐसा लगा कि मानों अपनी दुखियारी माँ की चीत्कार सुनकर  इन शहीदों के मुखमंडल पर कठोरता छाने लगी हो। नाक के नथुने फड़फड़ाने लगे हों। नेत्र लाल अंगार हो गए हों।जैसे किसी सुप्त ज्वालामुखी ने मुँह खोल दिया हो। जिसमें से धुँआ निकल रहा था।
 उसे ऐसा लगा मानों ये प्रतिमाएँ कह रही हों-

  वक़्त गुलशन पे पड़ा तब तो लहू हमने दिया।
अब बहार आई तो कहते हो तेरा काम नहीं।।

       चिरौरीलाल से  इस उद्यान में और ठहरते नहीं बन रहा था। उसका दम घुटने लगा था । तभी उसकी चेतना ने आवाज़ लगायी --इससे पहले कि इनमें से लावा बहे , भाग चिरौरी.. भाग..।

-- व्याकुल पथिक
 ( 13-8-2020 )
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Wednesday, 5 August 2020

यादों की ज़ंजीर

 
  यादों की ज़ंजीर

    रात्रि का दूसरा प्रहर बीत चुका था, किन्तु विभु आँखें बंद किये करवटें बदलता रहा। एकाकी जीवन में वर्षों के कठोर श्रम,असाध्य रोग और अपनों के तिरस्कार ने उसकी खुशियों पर वर्षों पूर्व वक्र-दृष्टि क्या डाली कि वह पुनः इस दर्द से उभर नहीं सका है। फ़िर भी इन बुझी हुई आशाओं,टूटे हुये हृदय के आँसुओं और मिटती हुई स्मृतियों में न जाने कौन सा सुख है,जो उसे बिखरने नहीं देता है। वह जानता है कि ज़िदगी के सभी अक्षर फूलों से नहीं अंगारों से भी लिखे जाते हैं। संवेदनाओं को जागृत करने वाली ऐसी मार्मिक अनुभूति उसके लिए किसी दुर्लभ निधि से कम नहीं है।अब तो मनुष्य कृत्रिम जीवन का अभ्यस्त हो गया है, उसमें सहज प्रेम है कहाँ। फ़िर क्यों यही स्मृति आज़ उसके चित्त को पुनः उद्विग्न किये हुये थी ?

   " उफ ! यह मनहूस दिवस हर वर्ष न जाने क्यों मेरे उस घाव को हरा करने चला आता है,जिसे समय और विस्मृति ने भर दिया है।" --सिर को तकिए में धँसाते हुये भरे मन से बुदबुदाया था विभु। हाँ, यह दिन उसके लिए विशेष हो सकता था ,यदि कोई अपना समीप होता। ऐसे ख़ास अवसर पर वह बिल्कुल असहज हो उठता है, क्योंकि स्नेह की ही नहीं पेट की भूख भी शांत करना उसे कठिन प्रतीत होने लगता है । माँ की मृत्यु के पश्चात उसे अपने जन्मदिन पर बढ़िया व्यंजन खाने को नहीं मिला है। यूँ तो जेब में पैसे हैं,परंतु इच्छाएँ मर चुकी हैं। उसके हृदय में एक टीस सी उठती है, उन दिनों को याद कर के ।

    वैसे तो वह दिन भर मित्रों द्वारा भेजे ढेर सारे शुभकामना संदेशों में खोया रहा। परंतु ऐसे सुंदर  शब्दों से मनुष्य के उदर की क्षुधा तो शांत नहीं होती है , इसलिए शाम ढलते ही आत्माराम का रुदन शुरू हो गया था । पेट में चूहे उधम मचाने लगे थे। आज़ अपने अवतरण दिवस पर वह कुछ अच्छा भोज्य सामग्री मांग रहा था। उसकी यह गुस्ताख़ी विभु के लिए असहनीय थी। वह बूरी तरह से झुंझला कर कल के बचे हुये दो करेले उबाल लाता है। " चल अब खा इस कड़वे चोखे संग ये सूखी रोटियाँ, आज़ भी तुझे यही मिलेगा। सsss..ले ! मिठाई चाहिए न ?" -उसकी फटकार सुन आत्माराम किसी मासूम बच्चे-सा सहम उठता है । उदर की पीड़ा शांत होते ही कमरे की बत्ती बुझा कर वह धम्म से बिस्तर पर जा गिरा था और फ़िर से यादों ने उसे अपने आगोश में लेना शुरू कर दिया। वह कहता है-"  माँ ! काश तुम्हारे ही जैसा स्नेह करने वाला कोई और उसके जीवन में होता। किसी के हृदय में उसके लिए भी प्रेम होता। "  तेज गति से भाग रहे मन से वह क्यों बार-बार एक ही प्रश्न करता है-"उफ! ये यादें रात में ही क्यों इतना सताती हैं ! क्या किसी दुःखी इंसान के हृदय को कुरेदने के लिए इन्हें भी एकांत की तलाश होती है ?"

   तभी उसके मानसपटल पर चलचित्र की तरह अनेक स्याह-श्वेत दृश्य उभर आते हैं। और फ़िर वह बचपन की मधुर स्मृतियों में खोता चला जाता  है। माँ के जीवनकाल में अपने उस आखिरी जन्मदिवस की एक-एक बात उसे स्मरण होने लगी थी । इस सुखद अनुभूति ने मानों उसके तप्त हृदय पर ठंडे पानी की फुहार डाल दिया हो, किन्तु वह नादान यह कब समझेगा कि ये यादें उस जंजीर की तरह हैं, जिससे मुक्त हुये बिना आगे की यात्रा संभवः नहीं है। जीवन में कुछ ऐसे क्षण होते हैं ,जब मन के आगे मस्तिष्क का बस नहीं चलता है।

     विभु को माँ के हाथों से निर्मित नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों की याद आने लगती थी। तब घर में सुबह से ही कितना चहल-पहल रहती थी। बाबा ने टोकरी भर कर रजनीगंधा और गुलाब के पुष्पहार मंगा रखे थे। ठाकुरबाड़ी को ही नहीं, कमरे में जितनी भी तस्वीरें लगी होती थीं, वे सभी इस दिन इनसे सुशोभित होती थीं। देवी-देवताओं की मूर्तियों पर रोली और चंदन  लगाये जाते थे। रंग-बिरंगे झालर और गुब्बारों से दुल्हन की तरह कमरे और बारजे को सजाने की व्यवस्था का दायित्व स्वयं उसके नाजुक हाथों में होता था। अब तो यह सोच कर उसे विश्वास ही नहीं होता है कि इतनी छोटी-सी अवस्था में ऐसे जटिल कार्य वह कैसे कर लेता था !

      वो कहते हैं न कि उत्साह में कष्ट सहने की दृढ़ता के साथ ही कर्म में प्रवृत्त होने का आनंद भी होता है। इसीलिए उसकी अस्वस्थ माँ में इस दिन न जाने कहाँ से इतना साहस आ जाता था कि रुग्ण शैय्या का त्याग कर वे दिन भर भोजनालय में डटी रहती थीं। कारखाने का वह बूढ़ा नौकर बड़े से भगौने में दूध पहुँचा जाता था। आहा ! मेवे से निर्मित केशर युक्त खीर का स्वाद भला वह कैसे भूल सकता है ! पाकशास्त्र में माँ का मुकाबला करना उनके मायके और यहाँ ससुराल में ,किसी भी स्त्री के लिए संभव नहींं था। देखते ही देखते कांजी बड़ा, दही बड़ा और कैर-सांगरी की सब्जी वे तैयार कर लेती थीं। अतिथि कितने भी हो, द्रौपदी का यह भंडार खाली नहीं होता था। 

   उसके वैष्णव भक्त परिवार में बाज़ार से केक लाना संभव नहीं था। यह भ्रांति थी कि हर प्रकार के केक में अंडे का प्रयोग होता है। इसीलिए प्रसिद्ध बंगाली मिठाई संदेश और कैटबरी कोको पाउडर से निर्मित केक तैयार करने की ज़िम्मेदारी उस बड़े से तोंद वाले कारीगर को सौंपी जाती थी, जिसे वह हाड़ी दादू कहता था। शाम होते ही विभु नये वस्त्रों में खिलखिलाते हुये केक के मेज के समक्ष जा पहुँचता। माँ के हाथों से केक खाने का आनंद ही कुछ और था। उपहार और धन की तब भी उसे लालसा नहीं थी, लेकिन माँ के द्वारा बनाए गये व्यंजनों पर टूट पड़ता था। भोजन करते वक़्त उनके लाडले को किसी की नज़र न लगे , इस पर माँ का सदैव ध्यान रहता था।

   ऐसे खुशनुमा माहौल के मध्य पल रहे बालक को उस दिन यह कैसे अंदेशा होता कि यह शाम फ़िर कभी उसके किसी जन्मदिन पर लौट कर नहीं आएगी। वह तो ममता का सागर लुटाने वाली माँ के लाड़ और दुलार की थपकियों में खोया हुआ था। माँ और बाबा दोनों ही उसकी शिक्षा को लेकर गंभीर थे। अपनी कक्षा में प्रथम आने पर उसे विशेष उपहार मिलने वाला था। किन्तु क्रूर नियति ने उपहार की जगह उसकी माँ को ही छीन लिया। मरघट पर बहे उसके अश्रु फ़िर कभी नहीं मुसकाये। अपना ही आशियाना उसके लिए पराया हो गया था। आँखों में डोलते सपने भयभीत करने लगे थे। किसी अपने की खोज में मिले दुत्कार ने उसके कोमल हृदय की भावनाओं को जला कर राख कर दिया था। वह निस्सहाय-  हो गया था। उसके माथे पर ममत्व का चुंबन करने वाला कोई नहीं रहा।

    तभी विभु को आभास होता है कि इस धुप्प अंधेरे में एक डरावनी परछाई उसे घेरे जा रही है। यह देख उसकी बरसती आँखें भय से झपकने लगती हैं। वह रुँधे गले से मदद के लिए स्मृतिशेष उन सभी प्रियजनों को पुकारता है, जिनसे उसे अत्यंत स्नेह है, किन्तु इस बंद कमरे में उसे सिर्फ़ उस काली परछाई का अट्टहास सुनाई पड़ रहा था। मानों वह पूछ रही हो - " यहाँ मेरे सिवा,तेरा हैं कौन ?" यह भयावह परछाई और कोई नहीं उसका सुनहरा अतीत था। 

      वह जानता है कि मनुष्य स्मृति-लोभ से मुक्त हुये बिना आत्मोत्थान को नहीं प्राप्त कर सकता है,क्योंकि यह ज़ंजीर बनकर हमारे पैरों में लिपट जाती है,यदि हमें आगे बढ़ना है, तो इस क़ैदखाने से बाहर निकलना होगा, फ़िर भी उसके विवेक पर भावना भारी पड़ जाती है... और साथ ही यादों की जंजीर की जकड़न भी। 

    उफ! परिस्थितियों ने उसके जीवन को किस द्वंद्व में उलझा दिया है ! ...अब तो कोई अवलंबन तलाशो विभु ।

  - व्याकुल पथिक
    

Wednesday, 29 July 2020

आत्माराम

   
आत्माराम

      उसके घर का रास्ता बनारस की जिस प्रमुख मंडी से होकर गुजरता था। वहाँ यदि जेब में पैसे हों तो गल्ला-दूध , घी-तेल, फल-सब्जी, मेवा-मिष्ठान सभी खाद्य सामग्रियाँ उपलब्ध थीं।लेकिन, इन्हीं बड़ी-बड़ी दुकानों के मध्य यदि उसकी निगाहें किसी ओर उठती,तो वह सड़क के नुक्कड़ पर स्थित विश्वनाथ साव की कचौड़ी की दुकान थी, क्योंकि कचौड़ियाँ छानते वक़्त कड़ाह से निकलने वाली शुद्ध देशी घी की सुगंध उसकी स्वादेन्दिय को बेचैन कर दिया करती थी।अपनी इस स्थिति से उसे बोध हुआ था कि संयमित व्यक्ति के उदर की अग्नि भी अनुकूल अवसर मिलते ही भभक उठती है।


   यहाँ सुबह से ही ग्राहकों के कोलाहल के बीच कोई कचौड़ी बेलने तो कोई छानने और खिलाने में व्यस्त दिखता । बड़े-से कड़ाह में कनस्तर भर घी उड़ेल दिया जाता और फ़िर कचौड़ी और जलेबी बनाने केलिए चार-पाँच सहायकों संग हलवाई लग जाते थे। इस दुकान पर कचौड़ी खाने में इलाके के रईस व्यक्ति भी अपनी शान समझते थे।


     माथे पर तिलक-चंदन लगाये बिल्कुल प्रथम पूज्य गणेश देवता जैसे लंबोदर विश्वनाथ साव दुकान के दूसरे छोर पर गद्दी संभाले ग्राहकों से पैसा बंटोरने में व्यस्त दिखते। वे अपने इस कार्य में ऐसे निपुण थे कि दुकानदारी के वक़्त सगे-संबधी भी सामने आ खड़े हों तो उसे न पहचान पाए, किन्तु साव की काक दृष्टि इतनी पैनी थी कि कोई भी ग्राहक बिना पैसा दिये भीड़ का लाभ उठा यहाँ से खिसक नहीं सकता था। दुकान के इर्द-गिर्द खड़े होकर अथवा अंदर मेज पर बैठ चटखारे ले कर कचौड़ी खाते लोगों को देख कर रजनीश बुदबुदाता -" काश! उसके जेब में कुछ पैसे होते, ताकि वह भी इन ग्राहकों की टोली में सम्मिलित हो पाता।"


      सुबह के नाश्ते में कचौड़ी-जलेबी बनारसीपन की पहचान है। कड़ाह में छन-छन कर तैयार होती कचौड़ियों को देख वह मन ही मन कहता - " आहा! कितनी बड़ी-बड़ी,लाल-लाल और फूली-फूली ये गरमागरम देशी घी की कचौड़ियाँ हैं। उसकी क्षुधा  बस दो-तीन कचौड़ियों में ही तृप्त हो जाती और यदि साथ में दो-चार रसभरी ये कुरकुरी जलेबियाँ मिल जाती,तो क्या कहना। उसे अपनी दीनता पर तरस आता । घर पर उसके लिए दो वक़्त की चार सूखी रोटियों से अधिक कुछ नहीं था। पर व्यवसायहीन व्यक्ति से तो हितैषी भी चाय-जलपान नहीं पूछते हैं, पेट की अग्नि बुझ जाए यही काफ़ी है। क्यों वह इस मिष्ठान की दुकान पर दृष्टि डालकर अपनी क्षुधा और इच्छाओं को भड़कने देता है ?


  ऐसे विचार आते ही, स्वादेन्द्रिय विद्रोह करे इससे पूर्व रजनीश तत्क्षण सावधान हो जाता और स्वयं से कहता-" बंधु ! सुनो न.. खाने दो उन्हें कचौड़ी-पकौड़ी..ज़नाब ! जब पेट खराब हो जाएगा,तो लोटा लिये दौड़ते फिरेंगे..।"


     फ़िर भी हृदय की ऐंठन जब कम नहीं होती, तो वह उसे यूँ समझाता- " सुनो भाई ! तुमने भी तो अपने ननिहाल में अन्नपूर्णा का अनादर किया था। याद करो कोलकाता के तिवारी बदर्स और देशबंधु की मिष्ठान दुकान को, ऐसे बड़े प्रतिष्ठानों के सामान भी तुम्हें नहीं पसंद थे। माँ-बाबा न मालूम कितना मनुहार कर तुम्हें मूंग की कचौड़ी और लुची खिलाया करते थे।  तुम तो काजू बर्फी खाने तक में नखड़े दिखाते थे। "


   ओह ! तो क्या अन्न के इसी तिरस्कार का परिणाम था कि बनारस में बचपन से लेकर इस शहर से नाता टूटने तक उसके जेब में इतने पैसे कभी नहीं हुये कि वह विश्वनाथ साव की दुकान पर सुबह कदम रख पाता ? यह संताप रजनीश के हृदय की शीतलता को जलन दे रहा था।


   किन्तु आज़ उसकी तब आँखें फटी की फटी रह गयी थीं,जब उसने अपने छात्र जीवन के एक सादगी पसंद अध्यापक को यहाँ खड़े हो उँगलियों से मसालेदार तरकारी वाला दोना चाटते देखा था। देखते ही देखते मास्टर जी आठ कचौड़ियाँ गटक गये थे और अब जलेबी की बारी थी। 


   वे उसे दर्जा छह में हिन्दी पढ़ाया करते थे। अजी ! पढ़ाना क्या,उससे अधिक तो अपने शिष्यों को 'सादा जीवन , उच्च विचार ' का उपदेश देते थे वे। उस समय यह वित्तपोषण विद्यालय नहीं था । सो, यहाँ के शिक्षकों को मामूली तनख़्वाह से अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींचनी पड़ती थी। उस दौर में ट्यूशन से भी कोई खास कमाई नहीं होती थी। उसे भलीभांति स्मरण है कि गाँव से शहर में नौकरी की तलाश में आये मास्टर जी ने इमली की चटनी संग चावल खाकर दिन गुजारे थे। उन्हें अपनी ही एमo एo; बीएड की डिग्री हृदय में शूल सी चुभन देती। उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारती और सवाल करती - "मूर्ख! किसान पुत्र होकर भी हल की जगह क़लम थामने तुझसे किसने कहा था? अब देख, मास्टर जी कहलाने की यह ललक तेरी खुशियों पर भारी पड़ रही है।"


     किन्तु उनके चेहरे पर पड़ी दर्द की यह लकीर कभी इस सभ्य समाज को नज़र नहीं आयी।

रजनीश के पिता भी इसी स्कूल में पढ़ाते थे। माली हालत किसी भी शिक्षक की ठीक नहीं थी। सो ,प्राइमरी से लेकर जूनियर हाई स्कूल तक की कक्षाओं में इन गुरुजनों ने रजनीश को अध्यापक पुत्र समझ सदैव सादगी और संयमित जीवन का पाठ ही पढ़ाया था। 

      गुरुओं से मिले इसी ज्ञान का परिणाम रहा कि रजनीश ने अपने जिह्वा-स्वाद पर लगभग नियंत्रण पा लिया था।  किन्तु उसी विश्वनाथ साव की दुकान पर आज़ वर्षों बाद मास्टर जी को नये अवतार में देख बिल्कुल चौंक उठा था। वह विस्मयपूर्ण नेत्रों से उनमें आये इस परिवर्तन को देखता रहा। मास्टर साहब के चेहरे पर जो लालिमा थी, उसमें दर्प झलक रहा था। बाटा कम्पनी की चमचमाती महंगी चप्पलें पहने बादामी रंग के सफ़ारी शूट में खड़े गुरुजी के व्यक्तित्व में उसे ख़ासा बदलाव आ गया था । यह देख,वह समझ गया कि लिबास बदलने से व्यक्ति का रुतबा भी बदल जाता है । उसने बड़े गौर से गुरुजी को देखा, जो कचौड़ी, घुघरी और जलेबी ग्रहण करते हुये इस क़दर आनंदित हो रहे थे कि समीप खड़ा हर शख्स उनके लिए अजनबी था। 


    .ख़ैर,रजनीश दुकान के बाहर इस प्रतीक्षा में ठहर गया कि जब वर्षों बाद भेंट हुई है, तो क्यों न उनसे दण्ड-प्रणाम कर ले? सो, जैसे ही वे इस पटरी आते हैं,उसने उनका चरण स्पर्श कर अपना परिचय दिया। " अच्छा-अच्छा, तुम तो काफ़ी होनहार छात्र थे।" उन्होंने उसे बिल्कुल साधारण पोशाक और हवाई चप्पल में देख सहानुभूति जताई थी। फ़िर पूछा , "कुछ काम-धाम करते हो या नहीं, शायद तुम्हारी पढ़ाई भी अधूरी रह गयी थी।" उनके इस प्रश्न पर झेंप -सा गया था रजनीश।  क्या जवाब देता बेचारा ,यही न कि किसी निठल्ले की तरह अपने जीवन के अनमोल क्षणों को व्यर्थ कर रहा है। " अच्छा सुनों,मुझे विद्यालय जाना है।कल कम्पनी गार्डन में आकर मुलाकात करना ।" उसे चिन्तामग्न देख मास्टर जी ने कहा था। 


  ...और अगले दिन बाग में उसने मास्टर जी को  युवाओं की तरह उछल-उछल कर कसरत करते पाया । वे कभी बैजंती के अधखिले फूलों से ओस की बूँदों को हथेली पर उड़ेल उससे अपने नेत्रों को भिंगोते , तो कभी हरी घास पर तेज कदमों से चहलकदमी करने लगते थे। और जब ललाट पर स्वेद की बूँदें मुस्कुराने लगीं ,तो वे वहीं हरी घास पर आँखें मूँद विश्राम करने लगे थे।शीतल पवन बहने लगा था । जिससे बगीचे में लगे वृक्षों के पत्ते इस प्रकार कंपन करने लगे थे कि मानो वे दुनिया के सबसे सुखी व्यक्ति के सम्मान में पँखा झल रहे हो। तभी एक युवक आया, जिसने घंटे भर उनके शरीर पर तेल मर्दन किया।जिससे इस प्रौढावस्था में भी उनके अंग- प्रत्यंग में निखार-सा आ गया था। 


   उनके इस राजस सुख को देख वह चकित हृदय से सवाल कर रहा था-" क्या ये वही गुरुजी हैं, जिन्होंने कभी उसे सादगी से जीवन जीने का पाठ पढ़ाया था ?"  मास्टर जी के 'उपदेश और उपभोग' के अंतर के द्वंद में उलझता जा रहा था वह। तभी उसे उनकी पुकार सुनाई पड़ी - "अरे ! रजनीश आ गये ? चलो उस बेंच पर बैठकर बातें करते हैं !" अपने नित्य कर्म से निवृत्त हो कर मास्टर जी ने उस पर अपनी दृष्टि डाली । स्नेह की आँच पाकर वह मोम की तरह पिघलने लगा था।


     किन्तु गुरुजी के नेत्रों में उसके प्रति अपेक्षित करुण भाव नहीं दिखा , क्योंकि उनका दर्शन शास्त्र आज़ कुछ और बोल रहा था। उन्होंने कहा था - " सुनो रजनीश,  धन के बिना सारी विद्वता और योग्यता अंधकूप में पड़ी सिसकती रहती हैं। सो,आत्महीनता की अनुभूति से मुक्त होना चाहते हो तो पैसा कमाओ, अन्यथा शहर छोड़ किसी वन में शरण ले लो, मठ- आश्रम में चले जाओ, संयासी हो जाओ, कुछ भी करो, परंतु याद रखना निर्धन व्यक्ति के लिए इस सभ्य समाज में कोई स्थान शेष नहीं है। वह उपहास का पात्र होता है ।" तभी टोकरी में सेब लिये एक बूढ़े ने आवाज़ लगायी थी और बात अधूरी छोड़ वे उस ओर बढ़ चले थे ।


     ओह ! तो मास्टर जी ने आज़ उसे इस बगीचे में धन की महत्ता का पाठ  पढ़ाने के लिए बुलाया था ? तभी वे कह रहे थे कि यह दुनिया पैसे की है। पहले अपने 'आत्माराम' को तृप्त करो। 'राम' का क्या भरोसा, हर कोई 'दाम' मांगता है। पर एक दर्द जो उन्होंने  वर्षों से अपने सीने में  दबा रखा था, आज़ बातों ही बातों में फ़िर से उभर आया था। वह विद्यालय जिसमें उनकी योग्यता का डंका बजा करता था,उसी के दबंग व धनलोलुप प्रबंधक ने वित्तविहीन इस जूनियर हाईस्कूल के वित्तपोषित होते ही ,उनसे यहाँ शिक्षक बने रहने की शर्त पर मोटी रकम मांगी थी। स्तब्ध रह गये थे मास्टर जी! जिस शिक्षक धर्म के निर्वहन के लिए उन्होंने हर कष्ट सहा ,आज़ जब सुख के दिन आने को हैं, तो उनके ईमान की बोली लग रही है। चीत्कार कर उठा था उनका अंतर्मन और बदल गयी थी उनकी  सोच। 


     ख़ैर, नौकरी तो बचानी ही थी। सो, वे प्राइवेट स्कूल के अध्यापक की जगह वित्तपोषित विद्यालय के मास्टर साहब बन गये थे। अच्छा वेतन मिलने लगा, परंतु उनका पुश्तैनी खेत हाथ से निकल गया था। साथ ही उनका 'राम' भी इसी रिश्वत की ज्वाला में जल कर भस्म हो गया।  संवेदनाशून्य हो गये थे वे । स्वांतःसुखाय के अतिरिक्त उनके जीवन का और कोई ध्येय नहीं रहा।


      मास्टर जी ने अपनी अनुभूति की पाठशाला में फ़िर कभी किसी को सादगी और ईमानदारी का पाठ नहीं पढ़ाया। इस अर्थयुग में वे अपने शिष्यों को और धोखे में नहीं रखना चाहते थे। उन्होंने स्वयं को भी बदल लिया था। वे 'आदर्श' और 'यथार्थ' के मर्म को समझ गये थे, क्योंकि बिक गये खेत में उनका ' राम ' दफ़न हो चुका था और नौकरी बचाने के लिए दिया गया  रिश्वत  'आत्माराम ' बन अट्टहास कर रहा है।


                      -- व्याकुल पथिक



    

Wednesday, 22 July 2020

दुनिया में आकर जग को हँसाया


 दुनिया में आकर जग को हँसाया..


    यहाँ मैं इस छोटे से संस्मरण लेख के माध्यम  से एक ऐसे राजनेता के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल रहा हूँ, जिनका कृतित्व धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा एवं ज्ञान-विज्ञान नहीं,वरन् एक निश्छल 'मुस्कान' था। जो 'आह-आह' नहीं 'वाह-वाह' कह कर समाज के हर व्यक्ति का उत्साहवर्धन करते थे।  आत्मीयता  भरा यह शब्द उनके हृदय स्थल से निकलता था,न कि कंठ से।


    स्व0 माताप्रसाद दुबे👉खुद गए तो हँसते हुए पर लोगों को रुला गए-


  🌹 जिले की राजनीति को यहाँ की गंगा-जमुनी संस्कृति से सराबोर करने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता श्रद्धेय माता प्रसाद दूबे के आकस्मिक निधन की सूचना उस दिन जैसे ही मुझे मिली सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था। ख़ैर, भरे मन से पत्रकार धर्म का निर्वहन करते हुये मैंने अपने व्हाट्सअप ग्रुपों के माध्यम से शोक संदेश जनपदवासियों तक पहुँचा दिया। परिजनों ने बताया कि प्रातः नित्यकर्म के दौरान हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गयी। मंडलीय अस्पताल से जैसे ही उनके पार्थिव शरीर को रतनगंज स्थित आवास पर लाया गया, शोकाकुल शुभचिंतकों का आगमन शुरू हो गया और उनके पैतृक ग्राम मुजेहरा में इस कोरोना संक्रमण  के संकटकाल में भी भारी संख्या में लोग जुटे , जो उनकी अंतिम यात्रा की साक्षी बने।


इस कर्मयोगी के संदर्भ में यदि यह कहा जाए ..


कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये।

ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये॥

तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।


    स्वर्गीय दुबे  ने , वातावरण कितना भी बोझिल हो,संकट चाहे जितना भी गंभीर हो, ईश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन का भरपूर आनंद लिया और साथ ही सम्मुख खड़े व्यक्ति के अधरों पर भी मुस्कान लाने का प्रयत्न किया।


  उनकी जब भी और जहाँ भी मुझसे मुलाकात हुई, वे तपाक से बोल उठते थे-" का शशि ! तनिक मुसकिया द भाई।"


  और उस दिन जब उनकी वाणी मौन हो गयी,तो ऐसा लगा कि इस सावन में जिले की राजनीति से मुस्कराहट  चली गयी। निर्वाचित जनप्रतिनिधि न सही, किन्तु एक जनसेवक के रूप में --उन्होंने अपनी  निश्छल मुस्कान से यहाँ जनता के हृदय पर राज किया। दरअसल, यह मुस्कराहट होती ही ऐसी है,जो मोल नहीं ली जा सकती, मांगी नहीं जा सकती,उधार नहीं मिलती और इसे चुराया भी नहीं जा सकता है, क्योंकि जब तक यह दी नहीं  जाए, किसी के कुछ काम की नहीं होती और स्व0 दूबे यही मुस्कराहट तो बांटते थे। मुस्कराहट ही वह चीज है जिसे पाने वाला मालामाल हो जाता है, परंतु देने वाला भी गरीब नहीं होता है।


   लोकबंदी के पूर्व तक मेरी और दूबे जी की मुलाकात प्रतिदिन रतनगंज में होती थी, जब मैं साइकिल से अख़बार बांट कर वापस राही होटल लौटता था,तो वे अपने घर के बाहर समाचार पत्र के पन्नों पर आँखें गड़ाए मिलते थे। मुझे देखते ही, वे जोर से आवाज़ लगाते -"का शशि !"

और फ़िर वही चिरपरिचित वाक्य उनकी जुबां पर होता था- 'मुस्कुराहट की आकांक्षा !'

    उनका यही स्वरूप आज भी मेरी स्मृति में है । वैसे दूबे जी को मैं सच्चा राजनीतिज्ञ इसलिए मानता हूँ क्योंकि उन्होंने किसी के संग कभी भी छल-कपट नहीं किया। जो भी समीप आया, उसके यश में वृद्धि करने का प्रयास किया और जो अपना नहीं था उसके प्रति भी उनके मन में किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं थी। राजनीति के छलावे से दूर वे एक अच्छे इंसान थे। ऐसे ही कर्म-बहादुरों के लिए ही यह कामना की गयी है-


यद्यपि सौ शरदों की वाणी,

इतना काफी है अंतिम दस्तक पर
खुद दरवाजा खोलें...।🙏

  स्व0 दुबे इतना धैर्यवान थे कि विगत वर्षों पुत्र की आकस्मिक मृत्यु के सदमें को सहन करके भी मुस्कराहट  रूपी इस प्रेम-पंजीरी को समभाव से समाज के हर वर्ग में जीवनपर्यंत बाँटते रहें। वैसे, स्वयं के कष्ट से ऊपर उठकर दूसरों को खुशी देना प्रत्येक व्यक्ति के लिए  संभव नहीं है, पर इस संसार में यश भी तो सबको प्राप्त नहीं होता है ।


    और जरा यह विचार करें कि किसी के कष्ट में सहभागी होता भी कौन है, फ़िर हम क्यों अपनी पीड़ा दूसरों से कहते हैं। जब तनिक सी सहानुभूति दिखा पुनः ये ही लोग कहते हैं कि ऐसे मनहूस व्यक्ति से क्या वार्तालाप की जाए, जो सदैव अपने दुःख का वर्णन करते रहता है। यहाँ तक कि आपका कष्ट दूसरे केलिए परिहास का विशष बन सकता है। इसकी अनुभूति मुझे अपने इस असाध्य रोग के कारण हुई है। इसीलिए तो कहा गया है-


रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय। सुनि  इठलैहैं  लोग  सब , बाटि न  लैहै कोय॥


  वैसे,शास्त्रों के कथनानुसार कष्ट तो हम नहीं --हमारा यह नश्वर शरीर सहन करता है। हमारी आत्मा सदैव आनंदमय स्थिति में रहती है।

परंतु प्रत्यक्ष तो यही लगता है कि यह कैसे संभव है ? जैसे,उमस भरी गर्मी में बिजली चली गयी हो और ऊपर से मच्छरों के दल ने भी आक्रमण कर दिया हो, ऐसे में क्या हम आनंद की अनुभूति कर सकते हैं ? नहीं न ..?
     लेकिन, आज़ से ढ़ाई दशक पूर्व जब मैं प्रतिदिन बस से वाराणसी -मीरजापुर की यात्रा करता था। बस बिल्कुल भरी होती थी। भीषण गर्मी में भी तीन घंटे का यह सफ़र अनेक बार खड़े होकर तय करना पड़ता था। जीवन में इससे पूर्व मैंने इतना शारीरिक कष्ट नहीं सहन किया था, फ़िर भी पेट की ज्वाला शांत करने के लिए यह सब करना ही था।
    तभी मेरे मन में यह विचार आया था कि क्यों न मैं बस में ही आँखें बंद कर खड़े-खड़े यह अनुभूति करूँ कि ठंडी हवा चल रही है, जो मेरे मस्तिष्क के पिछले भाग से मेरे शरीर में प्रवेश कर रही है।  सच कहूँ तो ऐसा करते हुये मुझे पता ही नहीं चलता था कि यह कष्टकारी यात्रा कब पूरी हो गयी। बस आज़ यहीं तक,अगले सप्ताह पुनः किसी नये विषय के साथ बंदा हाज़िर है ।

----व्याकुल पथिक

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  विंध्यक्षेत्र से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में विशेष पहचान रखने वाले  'मर्द 'साप्ताहिक  के संपादक   आदरणीय सलिल पांडेय जी ने जनप्रिय दिवंगत राजनेता स्व0 माताप्रसाद दुबे को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एक विशेष परिशिष्ट निकाला है। मुझे भी इसमें अपनी लेखनी के माध्यम से स्व0 दुबे को श्रद्धासुमन अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। 👆

Wednesday, 15 July 2020

अवलंबन

जीवन के रंग
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     चितरंजन काका की बेचैनी बढ़ती ही जा रही है। कभी कमरे में तो कभी बारजे पर ,यही नहीं पड़ोस के दीना साहू की दुकान तक भी निकल पड़ते हैं। पर उम्र का यह कैसा विचित्र पड़ाव है कि उनके मन को कहीं शांति नहीं मिल पा रही है।वे स्थिर हो कर तनिक भी बैठ नहीं पाते हैं। उनके हाथ-पाँव तो पहले से ही काँप रहे थे, अब तो जुबां भी लड़खड़ाने लगी है, इसलिए वे क्या कहना चाहते हैं, इसे समझना किसी पहेली से कम नहीं है। फ़िर किसे इतनी फुर्सत है कि बूढ़े काका के समीप बैठ कर उनके मन को खंगालने की कोशिश करे। और तो और उनके संदर्भ यहाँ तक कहा जा है कि काका को 'मतिभ्रम' की शिकायत है। उन्हें किसी मनोचिकित्सक की सेवा लेनी चाहिए। अपने संदर्भ में शुभचिंतकों द्वारा ऐसी कानाफूसी से आहत काका ने कुछ इसतरह से मौन धारण कर लिया है,मानो संबंधों के दरकते अपने ही महल में उनके हृदय की आवाज़ गुम हो गयी हो। ठहाकों से गुलज़ार रहने वाले उनके बैठक में अब मरघट सा सन्नाटा है।

      वैसे, बेटे-बहू दोनों ही उनके भौतिक सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं,किन्तु इससे अधिक इस हवेली में उनके लिए कुछ नहीं है। परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनका हस्तक्षेप  नहीं है। वे कागज़ पर ही इस हवेली के मुखिया मात्र हैं । और परिजनों द्वारा अपनी यही उपेक्षा उनके लिए असहनीय है।सो, जीवन के संध्याकाल में एक ऐसा अवलंबन जो उन्हें मानसिक शांति प्रदान करे, उनके खालीपन को समेट ले, इसी के अभाव में वे असामान्य व्यवहार कर रहे हैं।और स्वयं से यह सवाल भी - "क्या अब मेरी किसी को ज़रूरत नहीं रही ?" 


        अन्यथा काका अपने नाम के अनुरूप प्रौढावस्था तक बेहद खुशमिज़ाज थे। अरे भाई ! नाम ही जो उनका चितरंजन है । और हाँ,एक दौर वह भी था कि जब उनकी दुनिया भी रंगीन थी। उनके अतिथिकक्ष की रौनक देखते ही बनती थी। जहाँ सभ्रांतजनों की उपस्थिति देख ,  ऐसा लगता था कि मानो किसी छोटे-मोटे ज़मींदार का दरबार हो। इन्हीं की तरह  काका अपनी अचल सम्पत्ति की बोली लगाते गये और उनके मेहमानखाने में ठंडा-गर्म होता रहा। बड़े होकर बच्चों ने घर को संभाल लिया,अन्यथा उनका बंगला भी हाथ से निकल जाता और सभी सड़क पर होते। लेकिन काका अकेले पड़ गये हैं , क्योंकि दरबारी तो कब का साथ छोड़ चले थे। घर पर मनबहलाव के लिए उनके पास कोई साधन शेष नहीं है, ईश भक्ति में उन्हें विशेष रूचि नहीं है और जीवन की यह साँझ उनपर भारी पड़ती जा रही है..।


  और उधर...


       मंदिर के समीप चबूतरे पर बैठीं वृद्ध महिलाएँ  "हरि-चर्चा" में मग्न थीं। इन सभी के मुख पर प्रसन्नता थी। इनमें निर्धन-धनी का कोई भेद नहीं था। फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि किसी की कलाई में सोने का कड़ा था,तो किसी ने साधारण काँच की एक-दो चूड़ियाँ पहन रखी थीं। किसी की मेवा-मिष्ठान से भरी प्रसाद की टोकरी वज़नी होती तो किसी की इलाइची दाना वाली टोकरी हल्की। यहाँ वे नित्य अपना दुःख-सुख बाँटने जुटती हैं। मंदिरों में धूप-दीपादि के पश्चात इसी चबूतरे पर सुबह-शाम बैठ कर भजन गाया करती हैं। 


     किन्तु इनमें से कुछ की बहुओं को संदेह है कि कीर्तन-भजन के नाम पर ,उनकी सासु माँ मुहल्ले की अन्य वृद्ध महिलाओं से अपने बहू-बेटे  की शिकायत करती हैं । इसीलिए इनके इस धार्मिक ,सामाजिक और पारिवारिक संवाद को उन्होंने  "गृह फोड़-चर्चा" का नाम दे रखा है।  ख़ैर ,नाम में क्या रखा है। प्रश्न यह है कि आपकी सोच कैसी है। जब जीवन के संध्याकाल में अपने ही घर में वृद्ध सदस्यों की जाने-अनजाने में उपेक्षा होने लगे, तो इस अवसाद से मुक्त होने के लिए किसी न किसी आश्रय की आवश्यकता  होती ही है। और इससे अच्छा और क्या है कि इन वृद्ध महिलाओं ने समय गुजारने के लिए इस चबूतरे का चयन किया है। क्योंकि घर के टेलीविज़न पर बहुओं का कब्जा है,उन्हें अपने पसंद की धारावाहिक जो देखनी होती है और फ़िर स्कूल-कोचिंग से छूटते ही बच्चे कार्टून लगा वहाँ अपना आसान जमा लेते हैं।


   दादी माँ की परियों वाली कहानी अब कौन सुनता है।! यदि बच्चे कभी अपनी दादी के साथ कहीं जाना चाहते भी हैं तो उनकी मम्मी की आवाज़ सुनाई पड़ जाती है-" गोलू , इधर आओ.. स्कूल का होमवर्क पूरा करना है कि नहीं ? "

  और ऊपर कमरे में जाते ही गोलू की तो क्लास ही लग जाती है। बेचारा  कुछ यूँ सहम जाता है कि दादी माँ की परछाई से भी दूर भागने लगता है। अपने ही संतान के बच्चे के सानिध्य से वंचित होना यशोदा के लिए भी सहज नहीं था। किन्तु
आधुनिकता की अंधीदौड़ में सारे संबंध तेजी से परिवर्तित होते जा रहे हैं।पति की मृत्यु के पश्चात यशोदा ने कभी सोचा भी नहीं था कि अपने ही घर में वह परायी जैसी हो जाएगी। बहू के पश्चात अब उसका बेटा कुंदन भी उसकी उपेक्षा करने लगा था। बेटे को अफ़सर बनाने के लिए उसने क्या-क्या नहीं किया था। किन्तु आज उसका पुत्र ' कुंदन ' और वह स्वयं ' पाषाण' बन गयी है।
वह अपने ही सभ्य परिवार में बैकवर्ड समझी जाती है।

    इसी घुटन से बाहर निकलने के लिए वह छटपटा रही थी कि एक दिन पड़ोस में रहने वाली   गायत्री ने उसे रास्ता सुझा दिया। अब यशोदा उसके साथ मंदिर के समीप के उसी चबूतरे पर नियमित पहुँच जाती है। वह धर्मनिष्ठ  महिला है। और भजन -हरि बिन तेरो कौन सहाई ... भी अच्छा गा लेती है, इसलिए यहाँ उसे ख़ूब सम्मान मिल रहा है। उसे ऐसा अवलंबन मिल गया है, जिससे बिछुड़ने का भय नहीं है।वह प्रभु -भक्ति में लीन रहने लगी है । उसे नयी पहचान मिल गयी है । वह मुहल्लेवासियों की 'यशोदा माई' बन गयी है ।  सभी लौकिक आकर्षक, लिप्सा, मोह और अनुराग से ऊपर उठ चुकी है।


   

    यह वृद्धावस्था मनुष्य के धैर्य की परीक्षा लेती है। घर में न सही तो बाहर ही किसी ऐसे आश्रय की तलाश करें, जहाँ कुछ देर के लिए सुकून मिल सके। कोई साथी मिल सके, जिसके संग वार्तालाप कर, मन का बोझ हल्का कर सके।
भले ही जीवनपर्यन्त हमने कर्म की उपासना की हो,फ़िर भी सच्चाई और ईमानदारी के अवलंबन से कहीं अधिक ममत्व भाव की आवश्यकता इस अवस्था में होती है। आश्रय कहीं भी मिले, पर ऐसा मिले कि मुख पर वहीं मुस्कान पुनः थिरकने लगे, ताकि वह जीवन की शून्यता और दर्द से उभर सके। 

   इकलौते पुत्र की मृत्यु के पश्चात डगमगाते पाँवों को छड़ी के सहारे मस्जिद की राह दिखलाते जुम्मन चाचा, जीवन के संध्याकाल में अर्धांगिनी से वियोग के पश्चात शहर के बगीचे में हम-उम्र लोगों संग प्रातःभ्रमण और आध्यात्मिक चर्चा करते पांडेय जी एवं अपनों से मिले तिरस्कार से उत्पन एकांत को ध्यान में परिवर्तित के लिए मंयक भी कुछ इसीप्रकार से प्रयत्न कर रहा है। उपासना स्थल, आध्यात्मिक चर्चा और ध्यान ये तीनों ही इनका अवलंबन है।


   व्याकुल पथिक



    

Sunday, 12 July 2020

कोरोना की दहशत

यह लेख कोरोना संक्रमित व्यक्ति की मनोस्थिति पर आधारित है ।

( आइसोलेशन सेंटर में उपचार के पश्चात कोरना संक्रमण से मुक्त पत्रकार श्री राजन गुप्ता का संदेश )
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   दूरदर्शन से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार  श्री समीर वर्मा ने इस ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया था।

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    छुआ-छूत (अस्पृश्यता) कभी धर्म के पर्दे में मानव की भ्रष्ट सामंती व्यवस्था का प्रतीक हुआ करती थी, किन्तु देखें न कि प्रकृति का खेल भी कितना विचित्र है ,जिसने इस कोरोना संक्रमण- काल में समाज के प्रभावशाली वर्ग को भी "अछूत" की श्रेणी में ला खड़ा किया है। किसी भी प्रशासनिक अथवा पुलिस अधिकारी, राजनेता और चिकित्सक के कोरोना (कोविड-19) पॉजिटिव पाये जाते ही बिना उसके ओहदे का ध्यान रखे शोर मचने लगता है - " अब तुम्हारी गली नहीं आना..।"

    संक्रमित लोगों से ही नहीं भयवश इनके स्वस्थ परिजनों से भी सामाजिक दूरी और बढ़ती जा रही है। कोरोना संक्रमित एक महिला चिकित्सक ने अपना दर्द कुछ इस तरह से बयां किया है-"क्या हमारे बच्चों को दूध के लिए भी तरसना पड़ेगा। हमने ऐसा क्या पाप किया है ?"

...कालोनी के लोगों को जैसे ही जानकारी हुई कि वे कोरोना संक्रमित हैं ,तो वे सभी उनके परिजनों की परछाई से भी दूर भागने लगे और दुकानदारों ने भी इस परिवार से किनारा कर लिया। उन्हें स्वयं की सुरक्षा से कहीं अधिक यह भय है कि पीड़ित परिवार के सदस्यों को देख
उनके प्रतिष्ठान से अन्य ग्राहकों के संबंध न बिगड़ जाए।
  
     और यदि किसी प्रतिष्ठान के स्वामी पर ही कोरोना का खूनी पंजा चल गया , तो समझें कि उसका सारा व्यवसाय कुछ दिनों के लिए चौपट। एक रेस्टोरेंट संचालक भी कोरोना के आघात से उभर नहीं पा रहा है ,क्योंकि उसके कर्मचारी संक्रमित जो हो गये थे। सो, इससे उसके होटल की तो पूरे शहर में "कोरोना वाला" के रूप में पहचान हो गयी है, किन्तु ग्राहकों के न आने से वह स्वयं जेब से ठन-ठन गोपाल है।   

        एक अस्पताल के मुखिया के संक्रमित होते ही सहयोगी चिकित्सकों के खिले हुये चेहरे कुछ इस प्रकार से स्याह पड़ गये , मानों सामने साक्षात यमराज खड़ा हो। पीड़ित वरिष्ठ चिकित्सक पर अपना गुस्सा उतारते हुये एक युवा डॉक्टर ने अपने मित्रों से कुछ यूँ कहा- " ये बुड्ढे स्वयं तो सजग नहीं रहेंगे और मीटिंग में बुलाकर हमारी जान भी आफ़त में डाल रहे हैं ।"

   एक और युवा प्रतिष्ठित व्यवसायी की पहचान सोशल वर्कर के रूप में रही, किन्तु इस दुष्ट कोरोना ने उसे अपने गिरफ़्त में क्या लिया कि पड़ोसियों ने ग्वाले को सख्त हिदायत देते हुये कहा- " सुनो भाई ! यदि उस घर की ओर दूध लेकर गये तो समझ लेना कि कई ग्राहकों से हाथ धो बैठोगे ।"

   बेचारा ग्वाला धर्मसंकट में पड़ गया था। संक्रमित व्यवसायी के बच्चों को वह वर्षों से गाय का दूध देता आ रहा था। ऐसे में मानवता क्या कहती है ? कैसे उन बच्चों को वह दूध से वंचित रखे और यदि ऐसा करता है तो फ़िर मुहल्ले के अन्य लोग उससे दूध नहीं लेंगे।

    एक चिकित्सक के घर काम करने वाली एक युवती का एक नज़दीकी संबंधी संक्रमित हो गया है। उसके रिश्तेदार के आइशोलेशन सेंटर भेजे जाने की जानकारी जैसे ही उक्त डॉक्टर को हुई उसने उसे यह फ़रमान सुना दिया - " माया ! यदि तुम अपने उस रिश्तेदार के घर गयी,तो फिर कल से काम पर मत आना। मेरी इस चेतावनी को गंभीरता से लो। आगे तुम्हारी मर्जी ।"

    लोकबंदी के पश्चात वैसे ही काम के लाले पड़े हुये हैं, ऐसे में एक तरफ़ चिकित्सक की हिदायत और दूसरी तरफ़ उसके संबंधी का वह परिवार जिसने सदैव आवश्यक पड़ने पर तन- मन-धन से उसका सहयोग किया है। अब क्या करे वह ?
 कहाँ तो उसने सोच रखा था कि काम समाप्त होते ही चल कर कोरोना पीड़ित संबंधी की पत्नी और उसके बच्चों की सुधि लेगी..और अब यदि वह ऐसा नहीं करती है तो वे क्या सोचेंगे ?  इस हितैषी परिवार से भी भविष्य में उसका पहले की तरह मधुर संबंध नहीं रह जाएगा। कहाँ से आ टपका यह कोरोना , इधर नौकरी जाने का भय और उधर शुभचिंतकों से संबंध बिगड़ने का डर। 
 उपकार करने वालों का संकटकाल में साथ न देना कृतघ्नता भी तो है। आखिर क्या करे वह ? माया को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। कोरोना उसके रिश्ते को तोल रहा था।

      ओह! यह कैसी विडंबना है कि पलक झपकते ही अपने पराये हो जा रहे हैं। आइसोलेशन सेंटर में रोहित स्वयं से प्रश्न कर रहा था। यह कैसी महामारी है कि जो पीड़ित व्यक्ति ही नहीं उसके परिवार को भी सामाजिक बहिष्कार की स्थिति में ला खड़ी कर रही है।  उसने ऐसा क्या कुकर्म कर दिया कि अचानक हरकोई बदला हुआ सा दिखने लगा है? यह तिरस्कार क्यों ? उसे लग रहा था कि उसकी दौड़ती-भागती ज़िदगी में सब-कुछ ठहर-सा गया है। अपनत्व का प्रदर्शन तो दूर सहानुभूति के दो शब्द कहने के लिए भी उसके इर्द-गिर्द यहाँ कोई शुभचिंतक नहीं है। 

    यह देख वेदना से भर उठा रोहित स्वयं से प्रश्न करता है कि प्लेग(हैजा) तो उसने देखा नहीं है, परंतु उसके संदर्भ में सुना अवश्य है। आज़ इस कोरोना में भी उसे उसी महामारी का प्रतिविम्ब नज़र आ रहा है। उसकी पलकों के पोर नम हो चले थे और आँखें बरसने ही वाले थीं कि तभी  आइसोलेशन सेंटर का डॉक्टर वहाँ आ जाता है। वह कहता है- "वेलकम रोहित ! अब तो तुम ठीक हो रहे हो,चिन्ता मत करो।"

 " थैक्यू सर , यहाँ आप सभी ने हितैषियों से बढ़कर मेरा ध्यान रखा, अन्यथा  कल तक साथ उठने-बैठने वाले मित्रों का भी फोन आना बंद हो गया है। "  
-- इतना कहते-कहते निस्सहाय-से अस्पताल के बेड पर पड़े हुये रोहित का गला रुंध जाता है ,फ़िर भी उसे अपने किसी भी शुभचिन्तक पर तनिक भी क्रोध नहीं आया ,क्योंकि वह जानता है कि हर किसी को अपना जीवन प्रिय है। 

 लेकिन , रोहित के पिता का हृदय अत्यधिक आहत है। वे कहते है कि जब उनका पुत्र ज्वर से पीड़ित था और इस शहर के नामी चिकित्सक भी उसका रोग नहीं पकड़ सकें , तो वह वाराणसी बेहतर उपचार के लिए चला गया था। परंतु यहाँ उसके कुछ परिचितों ने ही यह अफ़वाह फैला दी थी कि रोहित रोग छिपा रहा है। उसके परिवार के सदस्यों को भी कोरोना है । इसीलिए उसकी दुकान सील कर दी गयी है ,आदि- आदि..अनेक ऐसे कड़वे संवाद उन्हें सुनने को मिल रहे थे, जिससे उनका आत्मसम्मान आहत हुआ है। 

  और जरा यह भी तो सुनते चले कि उस हौली (देशी शराब की दुकान) के बाहर मित्र मंडली के साथ बिना मास्क लगाये बैठा यह भगेलू क्या कह रहा है ? अरे ! यह तो सामाजिक दूरी का उपहास उड़ा रहा है। वह कह रहा है कि हमारे मलिन बस्तियों में जा कर देखों, हुआ क्या वहाँ किसी को कोरोना ? परंतु बेचारा अपना सेठ तो गया काम से , अब सड़ता रहे 14 दिनों तक किरौना वाली कोठरी में। ससुरा , हमलोगों को देखते ही "सोशल डिस्टेंस-सोशल डिस्टेंस"  कह कर ऐसा भड़कता था, जैसे हमहीं कोरोना हो। अब जाकर उसी आइशोलेशन सेंटर में उपदेश दे।

      ख़ैर,निर्धन हो या धनवान, सुरक्षित हो अथवा असुरक्षित कोई भी इस संक्रमण रोग से अछूता नहीं है। परंतु हमें "सामाजिक दूरी" का ध्यान रखना ही होगा। और हाँ, कोरोना कोई एड्स की बीमारी तो नहीं है जो कि अपराध-बोध की अनुभूति हो, फ़िर भी यह क्यों किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा पर आघात कर रहा है ? इसे प्रकृति का अत्याचार कहे अथवा न्याय ?  रोहित को समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसे "जन-अपराध" के लिए दोषी कौन है ?

   संभवतः मीडिया चैनलों के माध्यम से इसे लेकर जो अत्यधिक भय दिखाया गया, यह उसी का दुष्परिणाम है कि संक्रमित क्षेत्र में माताएँ नवजात शिशु को दूध के अभाव में जल में शक्कर घोल कर पिलाते दिखीं, क्योंकि ग्वाले ने दूध देने से मना कर दिया था। जरा विचार करें कि ऐसी माताओं के हृदय पर क्या गुजरी होगी। ऐसे ही एक पीड़ित परिवार ने जब अपने इस दर्द से वरिष्ठ पत्रकार श्री सलिल पांडेय को अवगत कराया, तो उनके नेत्र भी नम हो गये। उन्होंने मुझसे कहा -"शशि, जातीय और सामाजिक छुआ-छूत ने तो अब-तक मानवता पर अनगिनत आघात किये ही हैंं, किन्तु यह आत्मीय छुआ-छूत हम इंसानों की संवेदनाओं को ही निगलने को आतुर है। "

  प्रबुद्धजनों को इसपर चिंतन अवश्य करना चाहिए।



  ----व्याकुल पथिक



    

Wednesday, 8 July 2020

सुख

( जीवन की पाठशाला से )
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    बीसवीं सदी के सशक्त क़लमकार कामेश्वर जी की एक रचना "सुख" पढ़ रहा था। जिसमें उद्योगपति जमनालाल बजाज एक मछुआरे ,जो कि अपनी जर्जर नाव की छाँव में आराम से लेट कर बीड़ी पी रहा था, से प्रश्न कर रहे थे। वे उससे कह रहे थे कि यदि तुम अधिक मछलियाँ पकड़ते, तो अमीरी की तरफ बढ़ सकते थे। जैसे ,नाव की जगह मोटरबोट और नायलॉन के जाल खरीद सकते थे। तब तुम्हारी आमदनी काफ़ी बढ़ जाती और तुम बेफ़िक्र हो खुशी से ज़िदगी जी सकते थे। जिसके प्रतिउत्तर में मछुआरे ने उनसे कहा था कि वह ऐसा क्यों करे ? क्योंकि वह तो अब भी खुश है और उनसे ज्यादा सुखी भी है।

     आज़ का मेरा विषय भी यही है। यह सुख क्या है ? मुझे आज़ भी भलीभाँति स्मरण है कि आजीविका की खोज में जब वाराणसी से मीरजापुर आया तो मेरे पास दो जोड़े कपड़े मात्र थे। समाचार पत्र कार्यालय से पारिश्रमिक के रूप में प्रतिदिन चालीस रुपया मिलता था। बनारस से मीरजापुर बस में ढ़ाई घंटे की यात्रा के दौरान मैं दो बड़े-बड़े अनार खरीद कर खा लिया करता था। रात्रि 11 बजे वापस लौटने पर एक ढाबे पर डट कर भोजन करता और  साथ ही एक लीटर दूध सुबह-शाम गटक लेता था। पेट पर हाथ फेरकर डकार लेता और नींद तो इतनी अच्छी आती थी कि आँखें सुबह ही खुलती थीं।धनसंग्रह करने की कोई अभिलाषा नहीं थी। सो,स्वस्थ और प्रसन्न था। दिन भर श्रम करने से जो स्वेद निकलते थे, उनमें मोतियों जैसी मुस्कान थी। 

      कुछ माह पश्चात अख़बार के दफ़्तर में मेरे एक शुभचिंतक ने सलाह दी कि कुछ रुपये इनमें से बचा लिया करो, जिससे तुम्हें इस समाचार पत्र की मीरजापुर एजेंसी मिल सके। इससे तुम्हारा सम्मान और आर्थिक लाभ दोनों बढ़ेगा। मैंने पूछा  कितना तो बताया गया कि कम से कम आठ हजार रुपये और नीचीबाग डाकघर में मेरा बचत खाता भी खोल दिया गया। यह वर्ष 1995 की बात है। मैं समाचार पत्र विक्रेता से अभिकर्ता बन गया। मुझे तीन किस्तों में पैसा संस्थान को देना था। इस धन को अर्जित करने के लिए मैं अपने ख़र्च में कटौती  करने लगा। दो की जगह एक अनार और दूध भी कम कर दिया। जबकि यौवन उफान पर था और अत्यधिक श्रम भी करना पड़ता था, जो इससे पूर्व मैंने कभी किया नहीं था। परिणाम यह रहा कि मेरे स्वास्थ्य में परिवर्तन आना शुरू हो गया। और फ़िर मुझे भविष्य की अनेकानेक चिंताओं ने घेर लिया। विवाह के लिए प्रस्ताव आने लगे, पर मैंने स्पष्ट कह दिया था कि कहा कि धन तो है ही नहीं। तभी अचानक मेरे मन में यह विचार आया कि मुझे किसी भी प्रकार से प्रयत्न करके दस लाख रुपये अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए एकत्र करना है।

 वैसे तो, इस अर्थयुग में पत्रकारिता को भी " जुगाड़ वाला धंधा" समझा जाता है, किन्तु मैं अनैतिक तरीक़े से धन अर्जित करने साहस नहीं जुटा सका, इसलिए मेरे लिए दस लाख रुपये बचत करने का लक्ष्य अत्यधिक कठिन था। इस गुल्लक को भरने के लिए मैं अपनी सारी सुख-सुविधाओं में कटौती कर आजीवन साइकिल से चलता रहा। वर्ष 1998 में असाध्य रोग ने मेरे दुर्बल शरीर पर आक्रमण कर दिया और फ़िर मेरे सारे स्वप्न बिखर गये। हाँ, मैंने कुछ धनसंग्रह अवश्य कर लिया , किन्तु "भविष्य" की चिन्ता में मेरा "वर्तमान"चला गया। मेरी " खुशी" चली गयी। प्रियजनों का वियोग सहना पड़ा।  घर-परिवार विहीन व्यक्ति के लिए उसका स्वास्थ्य  ही सबसे बड़ा धन होता है। अब मेरे पास न तो आजीविका का कोई साधन है और न ही वह खुशी, जिसे लेकर मैं मीरजापुर आया था। संग्रह किया हुआ धन "रोटी" दे सकता है, किन्तु "सुख" नहीं।  
     कुछ लोगों ने स्नेह प्रदर्शन कर छल भी किया।  एकाकी जीवन में ऐसा होता ही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में मेरा हृदय अत्यधिक विकल हो उठा। तत्पश्चात गुरुज्ञान के आलोक में मैंने पाया कि इस जगत के लौकिक संबंधों के प्रति विशेष अनुरक्ति ही भावुक मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता है । वह अपने प्रति किसी के द्वारा दो शब्द सहानुभूति के क्या सुन लेता है , बिना परीक्षण किये ही उसे अपना सच्चा हितैषी समझ लेता है।
      
     इन दिनों मानसिक शांति और स्वास्थ्य के लिए मैं प्राणायाम कर रहा हूँ। अध्यात्मवेत्ता श्री सलिल  पांडेय ने कहा है कि श्वांस को ऊपर से नाभि की ओर धीरे-धीरे नीचे (अपान वायु) की तरफ लाना है। वायु की प्रवृत्ति उर्ध्वगामी होती है । वायु का शरीर में उर्ध्वगामी होना पाचन-क्रिया को बाधित करता है। इसके लिए वायु को अपान स्वरूप ही श्रेष्ठ है। भगवान की पूजा में "पंचवायु" के समन्वय के क्रम में प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा, समानाय स्वाहा का जप करते हुए भगवान को नैवेद्य चढ़ाने का विधान किया गया है। मेडिकल साइंस भी वायु के इन स्वरुपों को मान्यता देता है। रक्तचापमापी यंत्र (स्फाइगनोमैनोमीटर) में पारा जिस प्रकार नीचे की ओर उतरता है, कुछ इसी प्रकार ही श्वांस को नीचे उतारने का प्रयत्न कर रहा हूँ। चरणबद्ध तरीके से ऐसा करना है। क्रमशः सर्वप्रथम सहस्त्रार चक्र (मस्तिष्क के मध्य भाग में), आज्ञा चक्र (नेत्रों के मध्य भृकुटि में), विशुद्ध चक्र (कंठ में),अनाहत चक्र (हृदय स्थल में), मणिपुर चक्र (नाभि के मूल में) से अनुभूति के माध्यम से श्वांस को नीचे नाभि पर केंद्रित करना है। मणिपुर चक्र में श्वांस नीचे उतारते समय मूलाधार (गुदा और लिंग के मध्य में) और स्वाधिष्ठान चक्र(लिंग मूल के चार अंगुल ऊपर ) की आनुभूति भी करनी होती है। तत्पश्चात मणिपुर चक्र से श्वास को ऊर्ध्वगामी ( ऊपर की ओर) सहस्त्रार चक्र की ओर ले जाना है। 
   ऋषियों ने माना है कि शिव शीश में स्थित हैं । पूरा शीश (गर्दन के ऊपर का भाग) ही शिवलिंग है। पंच ज्ञानेन्द्रियाँ इसी भाग में हैं। जबकि शिवा यानी माता पार्वती नाभि में रहती हैं । माँ और संतान का सर्वाधिक गहरा रिश्ता इसी नाभि से ही होता है। सारी तंत्रिका प्रणाली का मुख्य केन्द्र विंदु नाभि और मस्तिष्क ही है। शीश पर्वत है तो नाभि कुंड। उक्त प्राणायाम का आशय है कि शिव नीचे उतर कर पार्वती के पास आते हैं । इस स्थिति में तन स्वस्थ होता है। अपान वायु के जरिए नाभि में आकर जब शिव शिवा को लेकर अपने कैलाश पर्वत शीश में आते हैं तो चिंतन-मनन शिवस्वरूप हो जाता है। मन को शांत और तन को स्वस्थ करने के लिए सलिल भैया ने यह विशेष प्रकार का प्राणायाम मुझे सिखाया है।

        अभी प्रारम्भिक चरण है। जिस सुख की कामना मैं ऐसे योग-प्राणायाम के माध्यम से इस अवस्था में कर रहा हूँ, वह सुख तो मुझे तीन दशक पूर्व सहज ही गुरुदेव  के आश्रम में प्राप्त हो गया था। गुरुकृपा से आश्रम में मिले खड़ाऊँ एवं साधारण वस्त्रों में ही। मैं मोहवश इस 'अमृत कलश ' का त्याग कर ' मदिरापान ' के लिए निकल पड़ा था। परिणाम यह रहा कि उस दिव्य प्रकाश (आनंद) से वंचित हो गया।

    परंतु  मछुआरा बुद्धिमान था, उसे ज्ञात था कि उसकी खुशी किसमें है। इसीलिए उसने बड़ी दृढ़ता के साथ उद्योगपति श्री बजाज को जवाब दिया था - "मैं इसी स्थिति में आपसे अधिक सुखी हूँ।"
     सत्य यही है कि मनुष्य अपने संतोष से सम्राट और अभिलाषाओं से दरिद्र हो जाता है। और हाँ, यदि सुख का एक द्वार जब कभी बंद होता है, तो दूसरा खुल भी जाता है। अतः बंद नहीं इस खुले द्वार की ओर भी देखें। 

-व्याकुल पथिक


    

Wednesday, 1 July 2020

दौर ये कैसा ?


मन के भाव
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प्यार पंछी से जता के
शिकार इंसान का करते हैं।

  दौर ये कैसा देखो यारो 
जहाँ सैयाद मसीहा होते हैं !

आग  घरों में लगा के
जो चैन की नींद सोते हैं।

गज़ब सियासत देखो यारो 
वे  रहनुमा हमारे होते है !

शहतीर पलकों से उठा के
सुई  विषभरी चुभोते  हैं  ।

इंद्रजाल ये कैसा देखो यारो 
हम यहीं मुतमईन होते हैं !

 दुनिया को बहका के जो
 खुद मालामाल होते हैं ।

जमाना ये कैसा देखो यारो
वे ही  पीर-फ़क़ीर होते हैं !

हंगामा खड़ा करके जो  
फ़िर पर्दे में मुसकुराते  हैं।

खेल कलयुग का देखो यारो 
वे सच्चे साहित्यकार होते हैं !

पहचान पथिक इन्हें तनिक ,
 भरोसा इनपे नहीं करते हैं ।

अनजान दर्द से आँखों के 
पर क़लम के महान होते हैं !

- व्याकुल पथिक


     

Monday, 29 June 2020

अंजाम

       मन के भाव
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नक़ाब जब हटता है
और सच सामने आता है

मुखौटे में शैतान देख

रुदन तब मुस्कुराता है

चेहरा जब बदलता है

और शूल बन  चुभता है

दिल का ग़जब हाल देख

बावला वैरागी कहलाता है

उम्मीद जब टूटती  है

चिता अरमानों की सजती है

मरघट पर  मेला देख

भटका दृष्टा बन जाता है

संवेदना तब सिसकती है

जब घात बड़ों की सहती है

पढ़े -लिखो का खेल देख

हंस  बगुला बन जाता है

भावना जब धधकती है

तब काँच  बन पिघलती है

प्रतिशोध की ज्वाला देख

मानव  दानव   बन जाता है

आह तब निकलती है

जब छल मित्र का सहती है

धोखे का अंजाम देख

पारस  लौह बन जाता है !! 

   -व्याकुल पथिक


Wednesday, 24 June 2020

सौदा

मन के भाव
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    "हमारा यह नटखट लल्ला बाबा जी का पक्का भक्त हो गया है। अभी साढ़े तीन साल का है ,पर देखो न ऐसा कपालभाति प्राणायाम करता है कि बड़े-बड़े योग साधक चकित रह जाते हैं..!"

      अमुक प्रतिष्ठान पर खड़ीं उन दोनों महिलाओं का वार्तालाप सुनकर मयंक ने उत्सुकतावश अपनी दृष्टि उस ओर डाली ,तो देखा कि वे औषधीय गुणयुक्त चाय का एक पैकेट खरीद रही थीं। साधारण पोशाक में लिपटी बिना साज- श्रृंगार के ये प्रौढ़ और युवा औरतें आपस में माँ-बेटी थीं। जिनकी निगाहें दुकान में करीने से सजाकर रखे गये बाबा जी के तरह-तरह के स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों पर टिकी हुई थीं। वे दुकानदार से ऐसे कुछ उत्पादों का मूल्य पूछतीं और फ़िर उसकी क़ीमत सुनकर मनमसोस के रह जाती थीं। यहाँ से उन्होंने सिर्फ़  एक पैकेट दिव्य चाय ही लिया था। हाँ, बच्चे के ज़िद करने पर प्रौढ़ महिला अपने बटुए को टटोलती है । उसने पाँच-पाँच के दो सिक्के उसमें से निकाले और आटे से निर्मित बिस्किट का एक छोटा सा पैकेट बच्चे को थमा दिया । वह चाहती तो पाँच रुपये वाला पारले-जी बिस्किट भी उसे दिला सकती थी,पर बाबा जी के उत्पाद पर उसे पूरा भरोसा था । 


         वे माँ-बेटी बाबा जी की सच्ची अनुयायी थीं, जो दुकान पर खड़े एक अन्य योग साधक को बड़े गर्व से बता रही थीं कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य साधारण चाय नहीं पीता है। वे सभी सुबह योग-प्राणायाम कर गिलोय ,तुलसी और कालीमिर्च इत्यादि डाल के बनाये गये काढ़े का सेवन करते हैं। उनका लल्ला भी यह कड़वा काढ़ा मांग कर पीता है। यह उनके लिए जीवन संजीवनी है। बाबा जी ने बताया है।  हाँ,जब कभी घर में कोई अतिथि आता है,तभी वे इस दिव्य पदार्थों से बनी चाय के पैकेट का उपयोग करती हैं। वे उन्हें दूध-चायपत्ती वाली साधारण चाय पिला कर बाबा जी की आज्ञा का उलंघन नहीं कर सकती हैं।

     वे महिलाएँ जिनके पास स्वयं दिव्य चाय पीने का सामर्थ्य नहीं हो ,फ़िर भी गुरु में उनकी ऐसी प्रबल आस्था देख पल भर के लिए मयंक को अपने आश्रम वाले जीवन का स्मरण हो आता है। जहाँ गुरु में उसकी श्रद्धा तो थी,किन्तु उनकी वाणी को तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयत्न करता था। वह स्वयं से सवाल करता था कि ज़ब ईश्वर एक है, तो उस तक पहुँचने का मार्ग बताने वाले धर्मगुरुओं में एक दूसरे की उपासना पद्धति को लेकर इतनी घृणा क्यों है ? वे उपासना के तरीके को लेकर अपने शिष्य के हृदय में "विश्वास परिवर्तन" कराना क्यों चाहते हैं ?  संभवः आस्था की पाठशाला में "तर्क और विज्ञान " जैसे शब्द नहीं हैं,अतः मयंक सच्चा शिष्य नहीं बन सका था। 

     और आज़ भी इन दोनों महिलाओं की गुरु- आस्था को देख वह आनंदित तो हुआ ,लेकिन उनकी आँखों में छिपी ग़रीबी की इस विवशता को पढ़ कर मयंक का संवेदनशील हृदय द्रवित हो उठा था। उसके मन में पुनः अनेक प्रश्न उठ खड़े हुये हैं। लेखन कार्य से जुड़ा होने के कारण वह अनेक गुरुओं के दरबार में गया है। विंध्यक्षेत्र के एक प्रमुख आश्रम में उसने देखा है कि संपन्न भक्तों को गुरु की विशेष कृपा और प्रसाद की बड़ी-बड़ी पोटलियाँ मिलती हैं,जबकि सामान्य भक्त इस सुविधा से वंचित हैं ,चाहे गुरु के प्रति उनमें कितनी भी आस्था क्यों न हो । स्वयं महामाया विंध्यवासिनी के मंदिर में मायापति (वीआईपी) भक्तों के चरणों तले आम दर्शनार्थियों की आस्था कुचली जाती है। ऐसे उपासना स्थलों पर विशिष्ट व धनाढ्य भक्तों की ही पूछ के पीछे व्यापार नहीं तो और क्या है ? फ़िर इन दोनों ग्रामीण महिलाओं की आस्था का क्या मोल है?

यह सवाल आज़ भी उसके लिए यक्ष प्रश्न है! 

  मयंक को नहीं पता कि क्या कभी इन निर्धन महिलाओं में इतना सामर्थ्य होगा कि वे बाबा जी द्वारा निर्मित स्वास्थ्यवर्धक खाद्य सामग्रियों को "गुरु प्रसाद" समझ घर ला सकेंगी। इस अर्थयुग में उसका यह कैसा विचित्र प्रश्न है ?  यह जानते हुये भी कि इस सभ्य संसार में सब-कुछ व्यापार है । अन्यथा ऐसा कोई एक सस्ता स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद तो इन ग़रीब भक्तों के लिए किसी न किसी प्रतिष्ठान पर होता ही , जिसे वे अपने परिवार के लिए आसानी से क्रय कर सकती , किसी सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान पर मिलने वाले राशन की तरह ? काश ! इनके निष्ठा और विश्वास के लिए ऐसी कोई व्यवस्था संभव हो पाती।


     यकायक मयंक को अपने एक संबंधी के उस उपदेश की याद आ गयी थी। जब वह कालिम्पोंग में रहता था। जहाँ उनकी मिठाई की दुकान थी, वहीं पहाड़ की ऊँचाई पर एक सरकारी कन्या विद्यालय भी था। लंच के समय प्रतिदिन उस पहाड़ी से नीचे उतर कर लगभग चालीस- पचास नेपाली छात्राएँ  पचास पैसे का सिक्का लिये उनके प्रतिष्ठान पर आया करती थीं। निर्धन परिवार की ये  लड़कियाँ भूजा (बेसन का नमकीन सेव)  खरीदने आती थीं। पचास पैसे में और कुछ मिलना संभवः भी नहीं था। दुकान पर इनके लिए भूजा के बड़े-बड़े पैकट तैयार कर पहले से रख दिये जाते थे। जिनमें कम से कम एक रुपये का भूजा होता था। मयंक ने स्वयं तोल कर उसे देखा था। वह समझ नहीं पाता था कि दुकान पर यह घाटे का व्यापार क्यों किया जाता है ?  आखिर एक दिन उसने अपने संबंधी से पूछ ही लिया। जिसपर प्रतिउत्तर में उन्होंने कहा था-   
  " हम व्यापारी अवश्य हैं,किन्तु ये बच्चे हमारे लिए 'करेंसी' नहीं हैं ,जो सिक्के का वजन देख कर इन्हें सौदा दिया जाए। देखना ही है, तो भूजा लेने के पश्चात इनके मासूम चेहरे पर मुस्कान देखिये आप.. ।" उनका कहना था कि व्यापार में भी मानवीय संवेदनाएँ  होती हैं। 

     काश ! उनकी यह बात धर्म के तथाकथित उन ठेकेदारों को भी समझ में आ जाती, जो धर्म को ' व्यापार ' और भक्त को 'करेंसी' समझते हैं । जिसके मूल्य के अनुपात में अपना आशीर्वाद भक्त को प्रसाद की छोटी- बड़ी पोटली के रूप में देते हैं। इनमें से कोई भी धर्मगुरु घाटे का व्यापार करना नहीं चाहता है। वे उस बच्चे की तरह खरा सौदा नहीं करना चाहते हैं, जो बाद में गुरु नानक देव बना। कोई भी गुरु नानक, कबीर और रैदास नहीं बनना चाहता है। वे तो मुनाफ़े वाला व्यापार चाहते हैं। फ़िर ऐसे में वे पचास पैसे में एक रुपये का भूजा जैसा कोई उत्पाद ग़रीब भक्तों को कैसे देंगे ..?

   तो क्या इस दुनिया में 'करेंसी' ही अब सब-कुछ है..! धर्म,शिक्षा, चिकित्सा, साहित्य, राजनीति और यहाँ तक की समाजसेवा भी सौदा है..!
आस्था,त्याग समर्पण, संवेदना और भावना जैसे शब्द उसी प्रतिष्ठान के महंगे उत्पादों की तरह सजावट की सामग्री मात्र हैं..! जिन पर निर्धन नहीं सिर्फ़ धनिकों का अधिकार है, क्यों कि व्यवसायिक दृष्टि से वह कागज़ का टुकड़ा भारी है..? 
    परंतु याद रखें जिस दिन हमें हृदय की तुला पर वजन करना आ जाएगा, उन छात्राओं का धातु निर्मित पचास के सिक्के वाला पलड़ा भारी मिलेगा । हम करेंसी से 'इंसान' बन जाएँगे। वे व्यापारी से संत बन जाएँगे,बिल्कुल गुरु नानक देव की तरह हम खरा सौदा कर पाएँगे। 
      
  -व्याकुल पथिक