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Thursday, 5 July 2018

तुम्हारी भक्ति मेरी आस्था से बड़ी क्यों है !



     
 

 हम समानता की बात करते हैं, इसके लिये लड़ते-झगड़ते हैं । लेकिन, मुझे एक बात समझ में नहीं आती है कि फिर मानव द्वारा निर्मित ईश्वर के दरबार में अमीर-गरीब,  खास और आम भक्त को लेकर अमूमन यह भेदभाव क्यों होता है। गोविंद और गुरु के उपासना स्थलों पर जाने से यदि हमारे जैसे आम आदमी को दोयम दर्जे का भक्त (दर्शनार्थी) कहलाने का दंश सहना पड़े।  और यहां माता के दरबार में वीआईपी दर्शनार्थी हमें यह कह मुंह चिढ़ाते दिखें कि देखों पगले तुम घंटे भर से नंगे पांव तपती भूमि पर खड़े हो । आसमान अंगारा उगल रहा है, फिर भी धीर- वीर बने अपनी आस्था की परीक्षा दे रहे हों । वहीं देखों न हम वीआईपी भक्तों की किस्मत, वातानुकूलित लग्ज़री वाहन से यहां आते हैं और तुम आम भक्तों को दूर ही रोक प्रशासन, पुलिस के और पुजारी के सहयोग से हम खास भक्तों को चटपट सीधे गर्भगृह में इंट्री( प्रवेश) मिल जाती है। तुम हो कि बेचारा बने हमें मंदिर परिसर में टुकुर- टुकुर ताकते रहते हो। वैसे , वीआईपी भक्तों से भी ऊपर वी वीआईपी दर्शनार्थी भी होते हैं। जैसे ,राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, सत्ता पक्ष के शीर्ष नेता , बड़े उद्योगपति, बड़े सिने स्टार , जब वे आते हैं तो उनकी सुरक्षा और व्यवस्था का हवाला देकर पूरा मंदिर परिसर ही खाली करवा लिया जाता है। वह भी उनके आगमन के काफी पहले से।
   मैं अपने जनपद के प्रसिद्ध सिद्धपीठ विंध्यवासिनी धाम में वर्षों से कुछ ऐसी ही व्यवस्था दर्शन- पूजन को देख रहा हूं। आम दर्शनार्थी यहां अकसर ही दुर्व्यवहार के शिकार होते हैं। जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, दक्षिण भारत और भी देश के विभिन्न प्रांतों से ये गरीब देवी भक्त यहां शक्तिपीठ पर तमाम आर्थिक, शारीरिक कठिनाइयों को सहते हुये आते हैं, किंतु उन्हें उनकी आस्था की परीक्षा के दौरान जब दोयम दर्ज का भक्त यहां ठहरा दिया जाता है तो असहनीय वेदना पहुंचती है।
    विगत चार जुलाई को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह एवं अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को विंध्यवासिनी धाम में दर्शन पूजन करना था। सो, अति विशिष्ट दर्शनार्थी होने के कारण उनकी सुरक्षा व्यवस्था के लिहाजा से मंदिर परिसर खाली करवाना लाजिमी भी है। इन्होंने दर्शन- पूजन दोपहर पौने दो बजे के आसपास किया । परंतु सुरक्षा व्यवस्था का हवाला दे प्रातः दस बजे से ही मंदिर जाने का मार्ग तक खाली करवा लिया गया। यह कैसा अन्याय है आम भक्तों के साथ। खैर विंध्य पंडा समाज के अध्यक्ष राजन पाठक ने जब देखा कि इन विशिष्ट जनों को दर्शनार्थ आने में विलंब है , वहीं हजारों आम देवी भक्त मार्ग रोके जाने से इस उमस भरे मौसम में बिलबिला रहे हैं। तो उन्होंने आलाअफसरों की सम्वेदनाओं को झकझोरा, तब जाकर दोपहर पौने बारह बजे मंदिर से दूर खड़े इन दर्शनार्थियों को गर्भगृह में प्रवेश का अवसर मिला।
         यदि मैं अपनी बात कहूं तो इसी विशिष्ट दर्शनार्थी व्यवस्था के कारण जब कभी भी समाचार संकलन के लिये महामाया के दरबार में जाता हूं, तो गर्भगृह में जाने की जगह इच्छा हुई तो माता जी का झांकी से दर्शन कर लेता हूं। यह आम और खास दर्शन व्यवस्था के विरुद्ध मेरी अपनी भावना है कि लम्बी कतार में खड़े आम भक्त की आस्था को पत्रकार होने के नाते वीआईपी दर्शन का लाभ लेकर कुचलने का कार्य मैं कदापि नहीं करूंगा। नहीं तो पंडा समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी और पुलिस अधिकारी सभी मेरे पहचान वाले हैं। सो, उनके स्नेह के कारण मैं भी चाहूं, तो व्यवस्था भंग कर इस वीआईपी दर्शन सुविधा का लाभ निश्चित ही ले सकता हूं।
लेकिन, महामाया के दरबार में दर्प से भरा  मानव यदि अपनी माया (धन, प्रभाव एवं जुगाड़) का चमत्कार दिखलाएं, तो उससे बड़ा नादान कौन है। यदि इतनी ही आसानी से सुलभ दर्शन देने की मंशा होती तो फिर पहाड़ों की चोटियों पर धर्मस्थल- उपासना स्थल क्यों स्थापित करते हमारे पूर्वज! जरा विचार करें इसपर भी ।  मैं तो सदैव स्वयं अपने को आम आदमी के आसपास रखने का प्रयत्न करता हूं और हर वीआईपी व्यवस्था का प्रतीक विरोध अपने तरीके से करता रहता हूं। वह भोजन हो, रहन- सहन हो या फिर दर्शन ही क्यों न हो।
शशि

Tuesday, 3 July 2018

"पंथ पर चलना तुझे तो मुस्कुराकर चल मुसाफिर




 

     इन दिनों मैं फिर से और ठीक से जीवन जीने की  कला सीख रहा हूं। वैसे, तो वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने की कोई अधिक तैयारी मुझे नहीं करनी है, क्यों कि पहले से ही घर-परिवार से बहुत दूर खूबसूरत मुसाफिरखाने में जो सुकून से रहता हूं। रोटी, कपड़ा और मकान की चिन्ता नहीं है। परंतु पिछले माह से मेरे जीवन में एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि मेरे पास रचनात्मक कार्य करने को पर्याप्त समय है।  सो, लगातार ज्वर की पीड़ा सहने के बावजूद मैं अपनी मुस्कान को आमजन को समर्पित करना चाहता हूं। अपनी कलम से खुलकर उनका समर्थन करना चाहता हूं । उनके दर्द को अपनी पीड़ा समझना चाहता हूं। वैसे, तो मैं कोई ढ़ाई दशक से जनसमस्याओं को ही अपने समाचार पत्र में उठाता आ रहा हूं। पर अब उनके और करीब आना चाहता हूं।
  एक खूबसूरत गीत की यह पंक्ति

"किसी का दर्द मिल सके ले तो उधार "

    इस बंजारे राही से बहुत कुछ कहना चाहती है। यह तभी सम्भव है जब मैं बचपन वाली अपनी मुस्कान को फिर से हासिल कर लूं। ताकि यह पथिक अपनी व्याकुलता से ऊपर उठ सके। अकेलेपन से एकांत की इस यात्रा में मेरे वानप्रस्थ जीवन में फिर किसी के प्रति कोई मोह न हो, यह सुनिश्चित कर रहा हूं । मेरे लोभ मुक्त जीवन का सबसे बड़ा राज क्या है, जानते हैं आप ? बस इतना ही मैं सदैव यह याद रखता हूं कि जब वर्ष 1994 में वाराणसी स्थित अपने घर से निकाल था, तो तन पर कपड़े के सिवाय कुछ भी नहीं लेकर आया था। वहां अटैची और अलमारी में पड़े तमाम समानों में कीड़े लग गये होंगे ही। मेरा छोटा सा कमर मेरी अब भी प्रतीक्षा कर रहा होगा और यदि दादा के मकान में मैंने अपना अधिकार मांगा होता, तो शहर में तीन मंजिला मकान मायने रखता है। जरा सोचे जब मैंने इन सब का त्याग कर दिया तो फिर इस छोटे से मीरजापुर नगर में उस लक्ष्मी के पीछे क्यों भागना , जिसके कारण ही गृहलक्ष्मी नहीं मिली हो मुझे । हां, दूसरों में खुशियां अवश्य बांट सकता हूं, वह भी बिल्कुल मुफ्त में। अपने लम्बे संघर्ष को सार्थक मोड़ देकर  अपनी लेखनी के माध्यम से मित्र- बंधुओं और आमजन का मनोबल निश्चित ही बढ़ा सकता हूंं मैं, क्यों कि इन सब नेक कार्यों के लिये मेरे पास प्राप्त समय है। और मेरा सामाजिक दायरा भी पत्रकार होने के कारण कुछ अधिक बड़ा ही है।मेरे प्रति यहां के तमाम लोगोंं में यह विश्वास है कि मैं सत्य की राह पर हूं। इन सभी ने मेरे लम्बे संघर्ष और प्रलोभन मुक्त जीवनशैली को
करीब से देखा है। फिर भी वर्षों बाद मिले इस खाली समय को मैं विवाह- बारात , मेला और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रम में शामिल हो गया अपना समय बिल्कुल भी नष्ट नहीं करना चाहता हूं। आज ही रात एक क्लब के द्वारा बड़ा आयोजन है। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह उसमें मुख्य अतिथि हैं , स्नेही जनों का अनुरोध था कि अब जब सायं मेरा अखबार नहीं आ रहा है, तो मैं भी इस कार्यक्रम में आऊं। पर मैं अपने एकांत को अनावश्यक भंग नहीं कर सकता, अतः ब्लॉग लेखन में जुटा हूं। कल 4 जुलाई को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की महत्वपूर्ण बैठक है। समाचार संकलन के लिये हम पत्रकार  दिनभर वहां विंध्याचल क्षेत्र में ही रहेंगे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदि बड़े नेता आ रहे हैं। वैसे तो साहित्यप्रेमी कहलाने के लिये अलंकारों से सजे बोझिल पुस्तकों को पढ़ने में भी मेरी कोई रुचि नहीं है, न ही धार्मिक ग्रंथों में। हां, रेणु दी की सजीव कहानियां मुझे जरुर पसंद और और ब्लॉग पर कुछ अन्य वरिष्ठ सदस्यों की भावनाओं से भरी कविताएं  मेरे व्यथित मन को शांति प्रदान करती हैं। पर जीवन की इस नयी पाली में मेरी जो बड़ी परीक्षा है वह यह कि मुस्कुराते हुये औरों के व्यथित हृदय को सांत्वना देना अपनी लेखनी, अपने कर्म और पथ के माध्यम से...
गोपालदास" नीरज" की कविता की यह सुंदर पंक्ति देखें-

" पंथ पर चलना तुझे तो मुस्कुराकर चल मुसाफिर"
शशि

Sunday, 1 July 2018

पंक्षी पिंजरे से बाहर है




 
तन की दुर्बलता भले ही नहीं दूर कर पा रहा हूं , पर मन इन दिनों प्रफुल्लित है। इसके तीन कारण है। पहला तो यह कि वर्ष 1988 के बाद अब कहीं जा कर निश्चिंतता के साथ अपनी पसंद की पुस्तक पढ़ पा रहा हूं। टेलीविजन और अखबार तो मैं वैसे भी देखता-पढ़ता नहीं हूं,  रंगमंच पर चार शो करने में ही पस्त जो हो जाता था।और अब पत्रकारिता से मोह भंग हो रहा है , तो इन माध्यमों में अपना समय नष्ट क्यों करूं ? इस मामले में मैं सच पूछें तो बसपा सुप्रीमो बहन मायावती के विचारों से सहमत हूं कि निष्पक्षता कितनी है इनमें ? मैं पत्रकार हूं,अतः मुझे पता है कि फलां चैनल अथवा न्यूज पेपर का झुकाव किस ओर है और क्यों,  साथ ही यह भी कि पेडन्यूज का गेम कैसे होता है। संस्थान के मालिकान हम जैसे जिले के पत्रकारों को नादान प्यादे से अधिक कुछ नहीं समझते। वे हमें बस विज्ञापन उगलने वाली मशीन बनाना चाहते हैं। अतः मैं अब अच्छे लेखकों को पढ़ना चाहता हूं।  पुस्तक लेने  बाजार भी नहीं जाना है हमें , न ही जेब टटोलना है। अपना स्मार्ट फोन जो है न ?  दूसरा कारण मैं इस झूठे उपदेश से मुक्त होने को हूं कि पत्रकारिता को पेशा न समझा जाए, बल्कि यह समझे कि जनता की सेवा का माध्यम है। सच कहूं तो नैतिकता के इसी पाठ ने मेरे तन-मन को खोखला बना दिया है। संस्थान हम जिले के पत्रकारों को कितना वेतन देता है , यही माह में 5 से 7 हजार के आसपास। मुझे अधिकतम साढ़े चार हजार मिला करता था। जिसमें से तो डेढ़ हजार रुपया कमरे के किराये में ही चला जाता !  फिर ऐसी भी क्या जनसेवा कि हाड़तोड़ परिश्रम करने के बावजूद जिस कार्य को करने से सम्मानजनक तरीके से जीवकोपार्जन न किया जा सके। यह समाज हमें भी क्रांतिदूत बना कर शहीद तो नहीं करना चाहता है।
      वैसे, इन क्रान्तिकारियों की भी एक छोटी सी ख्वाहिश जरूर थी -
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशां होगा।
       पर यहां आज आजाद भारत में भी दौलतमंदों के चौखट पर मेला लग रहा है।
 हमारे ही कुछ कर्णधार देश का दौलत विदेशी खजानों में जमा कर रहे हैं। अंग्रेज भी तो यही करते थें। राजनीति , शिक्षा, चिकित्सा सब व्यापार हो गया है। परंतु तकलीफ इन सभी को इस बात से है कि पत्रकारिता को पेशा नहीं जनसेवा कहा जाए। आप तरमाल गटकते जाए , हम टुकुर टुकुर ताकते रहें।  यही किया है मैंने वर्षों तक। परंतु अब नहीं, मैं स्पष्ट रुप से पत्रकारिता में आने वाले युवकों से कहना चाहता हूं कि ऐसी झूठी जनसेवा के लिये स्वयं को बलिदान कर देने से कुछ भी नहीं मिलेगा आपको। अतः साथ में कोई और उद्यम करों। जेब में लक्ष्मी होगी, तभी तो घर में गृहलक्ष्मी का प्रवेश होगा और बच्चों की किलकारियों से तुम्हारी बगिया खिलखिलाती नजर आएगी।
    खैर बात मैं अपनी प्रसन्नता की कर रहा था, तो तीसरा बड़ा कारण यह है कि मुझे रंगमंच पर चार की जगह सिर्फ दो शो ही करना पड़ रहा है, विगत एक माह से।  सो , दोपहर ढलते के बाद एक ऐसा फकीर बन जाता हूं , जिसे कोई चिन्ता नहीं बस चिन्तन  करना है ! रोड जाम के कारण जब रात्रि में पेपर लाना और वितरण करना बंद करना पड़ा था, तो पूछे नहीं कितना मानसिक कष्ट हुआ था मुझे, लेकिन संस्थान को तनिक भी नहीं । संघर्ष मेरा ही जो था। ग्राहक कुछ दुकानों पर तो साढ़े 10 -11 बजे रात तक भी मेरा इंतजार करते रहते थें। पूछ भी लिया करते थें कि शशि भैया आज बहुत विलंब, जाम लगा होगा न? इतने सालों से इस सांध्यकालीन दैनिक समाचार पत्र को लेकर मुझे गर्व यह था कि जिले की ताजी खबरों को सबसे पहले मैं पाठकों तक पहुंचा रहा हूं।बाकी के अखबार तो अगले दिन ही देंगे न।परंतु वर्तमान सरकार में ट्रैफिक क्या जाम होने लगा सार काम धंधा मेरा चौपट हो गया। चलो अच्छा हुआ योगी सरकार में मैं भी एक भिक्षुक बन गया हूं।  सो, मुंशी प्रेमचंद की कहानी पूस की रात के पात्र हल्कू की तरह प्रसन्न हूं । जानवर खा गये फसल तो क्या हुआ, अब खेत पर ठंड में रात तो नहीं गुजारनी पड़ेगी न ? मुझे भी तो अखबार का बंडल उतारने के लिये घंटों रोड पर अब नहीं खड़ा रहना होगा। याद है मुझे कि किस तरह से बरसात में औराई चौराहे पर खड़े-खड़े बारिश  से सराबोर हो जाता था या फिर ठंड में बारबार मफलर को कसते रहता था कि उसके झरोखे से बर्फिली हवाएं कानों में न जा घुसे। सड़क किनारे खड़े घड़ी की भागती सूई को निहारता रहता था।  कांटा बढ़ता रहता था, फिर भी बस का पहिया रास्ते में न जाने कहां जाम हो जाया करता था। जब पेपर का बंडल हाथ लगता था ,तो देर रात होने पर औराई से मीरजापुर वापसी के लिये आटो ,बस या ट्रक कोई भी साधन मिल जाए, की तलाश में भटकता था। अब योगी राज में इन सभी तकलीफों से मुक्त हूं। ठीक उसी हल्कू की तरह, जिसे फसल नष्ट होने पर भी यह पीड़ा नहीं हो रही थी कि खेती किसानी की जगह अब मजूरी करनी होगी। सो, साधुवाद देना चाहता हूं वर्तमान सरकार की बेपटरी हुई इस यातायात व्यवस्था को जिसने ढ़ाई दशक की एक बड़ी पीड़ा से यूं ही झटपट मुझे मुक्ति जो दिलवाई है।
         सो," पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोए" , चलो यह कह कर तो कोई उपहास नहीं करेगा, क्यों कि पंक्षी पिंजरे से बाहर है !



 ( शशि)

चित्र गुगल से साभार

Friday, 29 June 2018

तेरे जुमले से काश ! इनका घर संवर जाता...

       तुम नेता नहीं देवता जो कहलाते

 
 अपने देश में यदि राजनैतिक जुमले की बात करें, तो उसके केंद्र में गरीबी ही रही है, जातीय - मजहब और मंडल कमंडल की सियासत से पहले भी एवं बाद में भी । "गरीबी हटाओ देश बचाओ " का नारा 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी का और " अच्छे दिन आने वाले हैं " यह जुमला 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी का रहा है। पर हम निम्न मध्यवर्गीय लोगों के जीवन स्तर में इतने वर्षों में क्या तनिक भी सुधार हुआ है ? ईमानदारी से सत्ताधारी दल के नये-पुराने नेता बस इतना बता दें!
      जहां तक मेरा अनुभव है, तो एक गरीब मजदूर से अधिक  कष्टकारी और कुंठित जीवन शिक्षित निम्न- मध्यवर्गीय लोगोंं का है। श्रमिकों को तो यह गरीबी मानसिक वेदना इसलिए उतनी नहीं देती कि उनकी सोच लगभग मेरे जैसी ही है कि चलो भाई क्या किया जाए , अपने पास कोई महाविद्यालय की डिग्री तो है नहीं कि जेंटलमैन कहला सकूं। तो फिर मेहनत मजदूरी से जो मिल गया, उसी से गुजारा कर लिया जाए । परंतु वे शिक्षित लोग , जिनकी अनेक ख्वाहिशें रहीं युवा काल में, अब साहब की जगह पांच- छह हजार पगार पाने वाले नौकर बन कर रह गये हैं । उनकी स्थिति देख कर मुझे सिहरन सी हो जाती है कि यदि मैंने विवाह किया होता कहीं, तो क्या होता ? किराये पर कमरे की व्यवस्था, बच्चों की शिक्षा,दवा - इलाज, पर्व -त्योहार, मांगलिक कार्यक्रम और फिर श्रीमती जी को खुश करने के लिये भी तो खास अवसर  पर उन्हें  कुछ तो तोहफा देना होता ही। यह तो ऊपरी खर्च है,  अभी भोजन की व्यवस्था बाकी है। जब मेरे समक्ष विवाह का प्रस्ताव आया युवाकाल में, तो मैंने कितनी ही बार जेब टटोला था। वहां हमारे अखबार के दफ्तर में भी सम्पादक जी ने एक बार टोक ही दिया था कि शशि वैसे तो तुम्हारा निजी मामला है, पर मेरी मानों तो शादी कर लो। यहां भी मित्र गण मेरा उपहास इसीलिये किया करते थें। परंतु न कभी हमारे संपादक ने यह सोचा और न ही इन साथियों ने की  कि प्रेस से तब मुझे तीन हजार रुपया प्रति माह वेतन ही मिलता था। उसमें से आधा तब कमरे का किराया ही हो जाता न। उपदेश देना एवं उपहास उड़ाना तो बड़ा आसान सा कार्य है।
   फिर भी मुझे अपने लिये कोई दुख नहीं है, क्यों कि ईमानदार कहलाने के लिये मैं स्वयं ही घर आयी लक्ष्मी और भावी गृहलक्ष्मी को ठुकरा दिया था। यह जानते हुये कि जिले स्तर की पत्रकारिता में धन की जरुरत जुगाड़ से ही पूरी की जा सकती है। यह समाज, सरकार और संस्थान वाह ! वाह !! कहने के अतिरिक्त हम जैसों की कोई आर्थिक मदद नहीं करेगा। ये तो हमारा साथ संकटकाल में भी नहीं देते है। हां, घड़ियाली आंसू टपकाने वालों की कतारें जरुर कुछ लम्बी हो जाएंगी। .   
        खैर छोड़े बात उन गरीबों की कर रहा हूं जो शिक्षित है। तो सबसे पहले मुझे अपने ही बचपन के वे दिन याद आ जाते हैं। जब घर पर अपना विद्यालय नहीं खुला था। तब पापा एक निजी स्कूल में पढ़ाते थें । बाद में वहां का प्रबंध तंत्र पर एक दबंग का कब्जा हो गया था। अध्यापकों को वेतन तक नहीं मिल पा रहा था। एक शिक्षित परिवार के लिये वह कितना कठिन दौर था। मम्मी- पापा और हम तीन भाई- बहन, पांच सदस्यों का खर्च कैसे चले ? हम सभी स्वाभिमानी भी थें। उपवास पसंद था, पर किसी को घर के अंदर की हालात की जानकारी नहीं हो पाती थी। तब 10 पैसे की बनी बनाई  सब्जी लेने के लिये मैं एक परिचय की बुआजी के पराठे की दुकान पर लुकछिप के देर शाम जाया करता था, क्यों कि रोटी के अतिरिक्त और कुछ बनना सम्भव नहीं था। मम्मी जानती थीं कि दिन भर परिश्रम करने के बावजूद यदि पापा को सब्जी- रोटी भी न मिली, तो अगले दिन वे पुनः श्रम कैसे करेंगे। एक बार तो मम्मी ने बक्से भर गुलसन नंदा के अपने तमाम  उपन्यास इसलिए बेच दिये थें, ताकि हम सभी दीपावली मना सकें  और फिर होली पर कीमती साड़ियों को भी पड़ोसियों के हवाले कर दिया , जिससे कुछ पैसे मिल जाएं और हम बच्चों के लिये नये कपड़े ना सही मिठाई बनाने की सामग्री ही आ जाये । मेरी स्मृतियों में तो मौसी जी का दर्द से भरा वह चेहरा भी सामने आ जाता है, जब यही गरीबी बार बार उनके किसी न किसी आभूषण को निगल जाया करती थी। मौसा जी दो विषयों में पोस्टग्रेजुएट थें। उनके पिता जी की सर्राफा की बड़ी सी दुकान, बड़े भाई बैंक में प्रबंधक, एक भाई होम्योपैथिक चिकित्सक, एक अन्य की मोटर साइकिल पार्ट्स की बड़ी सी दुकान, फिर भी उच्चशिक्षा प्राप्त हर संस्कारों से युक्त मेरे मौसा जी बेरोजगारी का दंश झेलते ही रहें, सड़क दुर्घटना में मृत्यु से पूर्व तक। इसके बावजूद अपनी इकलौती पुत्री का दाखिला मुजफ्फरपुर के सबसे महंगे कान्वेंट स्कूल में करवाया था। मैं जब वहां था, तो कभी उसे गोद में उठा कर , तो कभी हाथ पकड़ कर स्कूल छोड़ने जाया करता था। उस विपत्तिकाल में भी मौसी जी अपने अमीर रिश्तेदारों के यहां पड़ने वाले मांगलिक कार्यक्रमों में महंगे उपहार की व्यवस्था किसी तरह से कर ही लिया करती थीं। दरवाजे पर जो पर्दा टंगा रहता था, उसके अंदर की हलचल हम सभी के अतिरिक्त परिवार का कोई अन्य सदस्य नहीं जान पाता था। आज भी इसीलिए मौसी जी का सभी जगह बहुत सम्मान है।
        अब तो आप कुछ- कुछ समझ ही सकते हैं कि एक निम्न मध्यवर्गीय शिक्षित परिवार बेरोजगारी का दंश किस तरह से झेल रहा है। और हमारे ये राजनेता सियासत की बिसात पर हमें झूठे हसीन सपने दिखला रहे हैं।

(शशि) चित्र गुगल से साभार

Thursday, 28 June 2018

कबीर की वाणी है हमारा आत्मबल



  महान समाज सुधारक संत कबीर को लेकर मेरा अपना चिंतन है। कबीर की वाणी में मुझे बचपन से ही आकर्षण रहा है । जब छोटा था, तो विषम आर्थिक परिस्थितियों में पापा (पिता जी)  अकसर ही कहा करते थें -

" रुखा सुखा खाई के ठंडा पानी पी।
देख पराई चुपड़ी मत ललचाओ जी।।"

  जिसे सुन हम सभी अपनी सारी तकलीफों और शिकायतों को भुलाकर कर बिन मुस्कुराये रह नहीं पाते थें।

   और अब जब मैं किसी को इसलिए दुखी देखता हूं कि उसे कहीं से न्याय नहीं मिल पा रहा होता है । जिससे अपने इस शोषण से वह व्यथित हो रहा होता है , तो उसे सांत्वना देने के प्रयास कहा करता हूं-

 "दुर्बल को ना सताइये, वां की मोटी हाय।
बिन सांस की चाम से, लोह भसम होई जाय।।"

  यह उस संत की वाणी है,  जिसने 15 वीं शताब्दी में एक जनक्रांति ला दी थी । और आज 21 वीं सदी में भी उतनी ही प्रासंगिक है। मैंने स्वयं अपने आहत मन को अनेकों बार यही कह सांत्वना दिया है। कहना नहीं होगा कि परिणाम भी मेरे अनुकूल रहा। यहां पत्रकारिता में आज मैं इसी लिये ढ़ाई दशकों से डटा हुआ हूं। जो मुझे बाहर करना चाहते थें, वे स्वयं नेपथ्य में हैं। मेरा सदैव से यह चिन्तन रहा है कि गरीब और ईमानदार व्यक्ति को पीड़ा न दिया जाए। इनके विरुद्ध षड़यंत्र न हो और न ही इनके हक अधिकार पर डाका डाला जाए। फिर भी दर्प से भरे सामर्थ्यवान लोग कबीर की चेतावनी की अनदेखी करते रहते हैं। मैं सिर्फ दो बातें उनसे कहना चाहता हूं। गरीब व्यक्ति को भूल कर भी न सताया करों और एक निर्बल व्यक्ति की आह से भी खतरनाक एक ईमानदार  व्यक्ति की बददुआ होती है, क्यों कि वह अपना सर्वस्व दावं पर लगा चुका होता है, इस संकल्प के लिये। वैसे, मैं कोई उपदेशक तो हूं नहीं ,जो ज्ञान बांटता फिरूं , भले ही स्वयं अंधकार में पड़ा रहूं। पहले क्या किया , वह और बात है, पर अब अपनी कथनी करनी में बिल्कुल भी अंतर नहीं रखना चाहता हूं। भले ही पत्रकार हूं, परंतु पला-बढ़ा एक निम्न मध्यवर्ग में ही हूं । जब कोलकाता में बाबा- मां के यहां था तो , वह दूसरी बात थी। वहां , मेरी हर अभिलाषा पलक झपकते ही पूरी हो जाती थी। फिर जब मीरजापुर आया तो संघर्ष की प्रतिमूर्ति बनने को विवश था। किसी तरह से समर्थ जन अमानुष बन निर्बल लोगों का शोषण कर रहे हैं, इसकी प्रथम अनुभूति भी इसी मीरजापुर में मुझे हुई। एक कड़ुवा सत्य तो यह भी है कि मैं स्वयं भी उन मूक बधिर लोगों से ही एक हूं, जिसने अपने हक अधिकार के लिये कभी भी जुबां नहीं खोली। नियति के समक्ष समर्पण के अतिरिक्त और कोई विकल्प भी तो नहीं होता है मनुष्य के पास। बस ऐसा ही कह देते हैं निर्बल जन ! पर कबीर ने ऐसा किया क्या ? इसलिये मैं इस लंबी बीमारी(ज्वर) में भी अपने कर्म का त्याग नहीं कर पाता हूं। मुझे कोलकाता में अपने बचपन का वह दिन याद हो आता है। जब सुबह लम्बे समय से अस्वस्थ मेरी मां (नानी) ट्रांजिस्टर जैसे ही खोलती थीं । वंदेमातरम के बाद कबीर वाणी ही सुनने को मिलती थी। मैं बाहर सीढ़ी पर बैठा पढ़ रहा होता था पर कान रेडियो की ओर रहता था ।  तब भी कबीर के इस दोहे में

" माटी कहे कुम्हार से , तु क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौदूंगी  तोय ।। "

  तब मेरा जितना आकर्षक था , आज कहीं अधिक है। इसी के बल पर तो मैं करीब दो दशक अपने पुराने बुखार को बराबर  चुनौती दिये जा रहा हूं। सुबह 5 से 7 बजे दो घंटे साइकिल प्रतिदिन चलाता हूं और साथ ही चार घंटे तक समाचार भी मोबाइल पर ही रोजाना टाइप करता हूं। फिर भोजन बनाना आदि भी अनेक कार्य तो रहता ही है।
     हां, जब यह देख लिया हूं कि अखबार में स्वतंत्र लेखन नहीं कर सकता हूं। किसी जनप्रतिनिधि के प्रेसवार्ता के प्रकाशन के लिये पहले विज्ञापन चाहिए। तो मैंने इस नये प्लेटफार्म का चयन किया है। लेकिन, अन्याय के समक्ष समर्पण करना मेरी आदत नही हैं। सच कहूं, तो ब्लॉग लेखन से मेरी नई पहचान बनी है।
   यहां मैं कबीर की उस वाणी पर खरा उतरने की मंशा रखता हूं कि

 "कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सब की खैर।
   ना  काहू  से दोस्ती , न  काहू  से  बैर ।।"

निष्पक्ष भाव का होना जीवन में इसलिये आवश्यक है कि हम  स्वयं को भी टटोल सकें। जब यह मित्र और शत्रु का द्वंद हमारे अंदर समाप्त हो जाएगा। तभी हमें इस सत्य का ज्ञान होगा -
  "बुरा जो देखन मैं चला , बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ।।"
शशि
चित्रः गुगल से साभार

Tuesday, 26 June 2018

बिना कोई पदचिह्न छोड़े यूं कैसे चला जाऊं...



 

 
    " भैया आपका स्किन( त्वचा) छोड़ रहा है " अभी पिछले ही दिनों प्रिय रामेश्वरम ने मुझसे कहा था। यह बता ही चुका हूं कि जब मीरजापुर आया था, तो उनके परिवार ने ही मुझे शरण ही नहीं स्नेह भी दिया था। सो, मेरे प्रति उनकी यह चिन्ता स्वाभाविक है। परंतु शरीर और बीमारी को  लेकर ऐसी चेतावनी से मुझे अब तनिक भी घबड़ाहट नहीं होती है। अतः मैंने भी प्रतिउत्तर में कह दिया कि अब तो सब कुछ समेट ही रहा हूं। इसे अन्यथा न लें ! समेटने का अभिप्राय मेरा यह है कि संसार के इस बाजार से निकल एकांत की ओर बढ़ रहा हूं। जहां  शांति है और मृत्युभय भी नहीं। करीब तीन दशक में चंद दिनों को छोड़ इस अकेलेपन ने मुझे असहनीय वेदना दी है। अजीब सी छटपटाहट और घबड़ाहट थी उस अकेलेपन में । आसपास किसी अपने को व्याकुलता से तलाशती रहीं तब मेरी ये निगाहें , कोई हमदर्द नहीं दिखा फिर भी , वह नगमा है न कि  "अब तक जो भी दोस्त मिले बेवफा मिले। " हां ,अब  उस अकेलापन से निकल एकांत यात्रा की ओर बढ़ रहा हूं। एकांत में न दर्पण मुझे भयभीत करेगा, न ही कोई स्नेह से यह कहेगा कि कितने दुर्बल होते जा रहे हो। भोजन एवं वस्त्र का लोभ भी कहां होता है इस एकांत में, फिर भी तेज में वृद्धि निश्चित होती है। इसी एकांत में ही तो  सृजन होता है। जहां सिद्धार्थ बुद्ध बन जाते हैं और शिव समाधि लगा महादेव । जीवन क्षणभंगुर है, सो जाहिर है कि यह पथिक भी चाहता है कि अपना कोई पदचिह्न वह इस संसार में छोड़ ही जाए। मित्रों यह जो पत्रकारिता है न , मेरी स्थाई पहचान नहीं है। बड़े पत्रकारों की गुमनाम जिंदगी मैंने इसी छोटे से मीरजापुर में देखी है। ऐसे बुझे दीपक की तरह मैं प्रस्थान करना नहीं चाहता, इसीलिये प्रयास है मेरा कि इस एकांत में कुछ तो सृजन कर जाऊं, ताकि यह ग्लानि न होने लगे कि आया था तो मुट्ठी बंधी थी और अब हाथ पसारे जा रहा हूं।निश्चित ही हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम अपने अनमोल जीवन में संघर्ष भरी वह आखरी बाजी जीतें, जहां अकसर लोग हार जाते हैं। जैसे किसी क्रिकेट मैच में हार रही टीम का खिलाड़ी आखिरी गेंद को बाउंड्री से बाहर भेज विजय पताका फहरा देता है। मेरी भी कोशिश है कि नियति संग जो मुकाबला चल रहा है , उस संघर्ष भरे जीवन के पिच पर नियति के हाथों बोल्ट होने से पहले ही गेंद को बाउंड्री से उस पार कर दूं। मेरे समझ से हर किसी को इसे गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए कि  अपने जीवन की फिनिशिंग किस तरह से की जाए । बचपन से लेकर प्रौढावस्था तक हम सभी नियति के समक्ष नतमस्तक है। लेकिन, इस एकांत यात्रा में अब मेरे पास एक अवसर है कि गेंद को बाउंड्री पार करवा , हारा हुआ मैच अपने नाम कर सकूं। अमूमन लोग यह नहीं सोचते कि जीवन के इस मैच में आखिरी गेंद पर उन्हें कुछ करना है। पूछने पर यही कहेंगे कि अभी तो बच्चों की शादी की है, नाती- पोते संग खेलना है , फिर उनका भी विवाह करना हैं और परनाना- परदादा बनना है। जब छोटा था, तो दादी कहती थीं  कि तुम्हारे विवाह और फिर वंशवृद्धि के बाद वे भी परदादी बन जाएंगी। तब स्वर्गारोहण के लिये सोने की सीढ़ी लग जाएगी। पहले के लोगों की ऐसी ख्वाहिश थी। पर मेरा कहां कोई वंश रहेगा।  फिर भी मुझे अपना विकेट फेंक कर नहीं जाना है, इस दुनिया से। राजनीतिक से जुड़ी सुर्खियों के लेखन से पत्रकारिता में मुझे यहां अलग पहचान निश्चित मिली है। फिर भी ब्लॉग लेखन में मेरा विषय सियासत नहीं रहा। मैं एक आम आदमी के संघर्ष को प्रस्तुत कर रहा हूं। मेरे पास तो किसी महाविद्यालय की डिग्री तक नहीं है। पर मां सरस्वती ने जिन पर कृपा की है, उनसे बस इतना कहना चाहूंगा कि अपनी रचना को कल्पना लोक में न लेते जाएं, छोटे पर्दे के किसी धारावाहिक की तरह। उंगली पकड़ हमें धरातल पर भी  चलना सिखाये वे।
   विषय बोझिल होता जा रहा है, सो  आये यह प्यारा सा समर्पण गीत गुनगुनाए अपने प्रिय के लिये-

हो मिल जाएं इस तरह ...
दो लहरें जिस तरह...
कभी हो ना जुदा
हां ये वादा रहा
(शशि)
 चित्रः गुगल से साभार

Saturday, 23 June 2018

बीमार तन- मन को जब गुरु ने दिया आत्मानुभूति का मंत्र



   
       चिदानंद रूप : शिवोहम शिवोहम
 
          जीवन में कष्ट हमें नई शिक्षा, नई चुनौती और नई मंजिल देता है। सो, अवसाद में आत्महत्या कर जीवन के वरदान को इतनी आसानी से हमें नष्ट नहीं करना चाहिए। जिसे हम अपना समझते हो, उसके बिछुड़ने अथवा उसके द्वारा तिरस्कृत होने पर भी नहीं। इन विपरित परिस्थितियों का सामना करना ही हमारा पुरुषार्थ है। हां, यदि ऐसी स्थिति में कोई सच्चा पथ प्रदर्शक मिल जाए, तो पथिक की राह आसान हो जाती है, अन्यथा तो अपना दीपक हमें अतंतः स्वयं ही बनना है।  मैं बात अपनी उन दिनों की कर रहा हूं , जब वर्ष 1999 में असाध्य मलेरिया ज्वर ने जबरन मुझसे मित्रता कर ली थी और दवा लेने के कुछ माह बाद फिर से वदन में भारी पीड़ा होने लगती थी, जब भी दर्पण में देखता था तो मेरे सुंदर स्वस्थ्य शरीर की जगह एक श्याम वर्ण का थका हारा , दुर्बलकाय , कांति हीन युवक उसमें दिखता था। कतिपय लोग तरह तरह की चर्चाएं मेरी बीमारी को लेकर करने लगे थें। सिर में और कमर के ऊपर असहनीय दर्द से मैं बिल्कुल बेचैन था । फिर भी रंगमंच पर सुबह से रात तक चार शो उसी तरह से करना पड़ता था। उस समय तो मैं इस स्थिति में भी नहीं था कि बिना श्रम किये दवा, आवास और भोजन की व्यवस्था कर सकूं। इस स्थिति में घर भी वापस नहीं लौटना चाहता था। वहां मेरा था भी कौन ? सारे संबंध समाप्त होने पर ही तो अनजान डगर पर निकला था। स्वाभिमानी था और हूं, इसीलिये किसी के समक्ष हाथ फैलाने का सवाल ही नहीं। नहीं तो मेरे जैसे कुछ पहचान वाले पत्रकार के लिये जुगाड़ से धन की व्यवस्था करना इतना कठिन कार्य भी नहीं था तब।ऐसे में एक ही मार्ग शेष बचा दिख रहा था, वह इस जीवन का अंत ,  ऐसी परिस्थिति दो बार ही उत्पन्न हुई हैं,  मेरे जीवनकाल में । वैसे, तो आज भी हल्का बुखार मुझे बना रहता है, स्वस्थ तन भी पुनः नहीं प्राप्त कर सका , लेकिन  शरीर, स्वास्थ्य, धन,भोजन अथवा अपने किसे मित के प्रति मोह नहीं है, इन दिनों मुझे , क्यों नहीं है इस पर  चर्चा बाद में करुंगा। अभी तो उस भयानक शारिरिक पीड़ा का उल्लेख्य कर रहा हूं। तब हमारे सब से घनिष्ठ मित्र रहें डा० योगश सर्राफा भी हार गये थें।एलोपैथी, होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक दवाइयों के साथ योग का सहारा भी लिया। योग एवं आसन तो मैं काफी पहले से ही करता था। परंतु सभी से मोहभंग हो गया था , इस कष्ट में। उस स्थिति में मेरे सबसे करीब जो रहें , वे हमारे गुरु जी पं० रामचंद्र तिवारी। लोभ मुक्त पत्रकारिता मैंने उन्हीं से सीखी है और भी बहुत कुछ उनसे जानना था, परंतु असमय ही कैंसर से उनकी मृत्यु हो गयी। उन्हें हम बाबू जी ही कहते थें। जब उन्होंने देखा कि मैं ठीक नहीं हो रहा हूं, असहनीय कष्ट में हूं , आत्मबल क्षीण होता जा रहा है और सम्भव है कि इस अवसाद में कोई अप्रिय कदम उठा सकता हूं। तो उन्होंने मुझे इससे मुक्त करने के लिये जबर्दस्त उर्जा से भरा 6 श्लोक  दिया। मुझे संस्कृत तो आती नहीं है। अतः एक कागज पर उन श्लोकों के साथ उसका अर्थ भी लिख कर दिया। फिर एक कैसेट भी दिया , जिसमें  आदि शंकराचार्य  द्वारा लिखित इन श्लोक चिदानंद रूप : शिवोहम शिवोहम का शास्त्रीय संगीत में गायन था। जिसे आत्मषट्कम /निर्वाणषटकम्  के रुप में जाना जाता है।

मनोबुध्यहंकार चित्तानि नाहं ,
न च श्रोत्रजिव्हे न च घ्राण नेत्रे ,
न च व्योमभूूमिर्न तेजो न वायु :
चिदानंद रूप : शिवोहम शिवोहम...

इन छंदों को पढ़ना, समझना सचमुच आत्मानुभूति के लिये मेरी समझ से आवश्यक है। परंतु बाद के कुछ वर्षों में न जाने क्यों मैं इससे दूर हो गया था, अन्यथा जीवन में पुनः कष्ट आता ही क्यों ? फिलहाल, अब मैं स्वयं को उर्जा , आत्मविश्वास एवं चेतना से लबरेज करने के लिये इन श्लोकों को जरूर सुबह साइकिल से अपने नियमित कर्मपथ पर भ्रमण करते हुये सुनता हूं और स्वयं में परिवर्तन भी महसूस कर रहा हूं। इन श्लोकों ने जीवन रक्षा में मेरी तब भी सहायता की थी एवं पुनः मैं एक बड़े परिवर्तन की राह पर हूं। अवसाद से मुक्ति के लिये मेरी समझ से तो इससे उत्तम श्लोक और कोई नहीं है। काश! मैंने गणित के सवालों में समय व्यर्थ करने की जगह संस्कृत का अध्ययन किया होता, तो आज इन श्लोकों के गायन से कितना आनंदित होता, फिर भी मोबाइल और ईयरफोन मेरी इस आवश्यकता की कुछ तो पूर्ति कर ही देते हैं। आज मैं समझ चुका हूं कि महल और मिट्टी दोनों का अस्तित्व एक ही है, तब नियति पर विलाप क्यों करूँ। और यह भी जान ही लिया हूं कि अधूरेपन का सदुपयोग करना ही जीवन की सबसे बड़ी कामयाबी है।
(शशि)
चित्र साभारः गुगल

Friday, 22 June 2018

दिखावे के लिये नहीं करूंगा योग


 मुझे शिव की समाधि, बुद्ध की खोज,गांधी की अहिंसा चाहिए

   आज अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की धूम रही। सुबह दैनिक क्रिया सम्पन्न कर जब पौने पांच बजे  निकला , तो सड़कों पर लोगों की कुछ अधिक चहल- पहल दिखी। समझ गया कि ये सभी योग प्रेमी हैं। सो, करो योग रहो निरोग की अलख वे जगा रहे हैं। पर इन दिनों अपना योग तो कुछ और ही है। समझ लें कि यह एक तरह का कठिन तप है। सुख- दुख, मान- अपमान जैसे विरोधी भावों में एक समान रहना, चार सूखी रोटी को ही अपना पकवान समझ लेना, दूसरों के वैभव की चकाचौंध में मन को स्थिर रखना , प्रलोभन की हर सामग्री से चित्त को मुक्त रखना , अपनी झूठी प्रतिष्ठा के लिये सत्य का त्याग न करना और भी बहुत कुछ  करने का प्रयत्न ....।  योगेश्वर कृष्ण के अनुसार यही तो योग है। हां, उसे प्राणायाम और योगाभ्यास से जोड़ दिया गया है।  तन पर मन और कर्म का प्रभाव तय है।
                मुझे दूसरों के ऐश्वर्य को देख अपनी दीनता पर क्षोभ क्यों नहीं होता है, जानते हैं ? बस एक छोटा सा प्रयोग मैंने किया है, वह है अपने से नीचे के तबके के लोगों के बीच से गुजरना और उन्हें सम्मान देना। इसका प्रत्यक्ष लाभ मुझे यह मिलता है कि ऐसे लोग मुझे देखते ही बड़े अदब से हाथ उठा स्नेह प्रदर्शन करते रहते हैं। ऐसा कर वे सभी मुझे एक विशिष्ट व्यक्ति का दर्जा ही दे देते हैं। फिर भला मैं क्यों किसी को हाकिम हुजूर कह सलाम करूं। अब चाहे वह धनकुबेर हो, बड़ा नेता अथवा अधिकारी ही क्यों न हो, उनके प्रति जो शिष्टाचार है, उससे अधिक नतमस्तक मैं इनमें से किसी के समक्ष नहीं होता। पत्रकार हूं, तो इन ढ़ाई दशक में न जाने कितने ही मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों, बड़े नेताओं से पत्रकार वार्ता की है। सबसे बड़े सिने स्टार और उद्योगपति भी यहां आये विंध्यवासिनी धाम में, तब भी अन्य कुछ साथी मित्रों की तरह इनके साथ अपनी तरफ से संयुक्त फोटोग्राफी की उत्सुकता कभी नहीं दिखलाई मैंने। बस अपना जो मुख्य कार्य था समाचार संकलन, ध्यान उसी पर केंद्रित रखा। सच कहूं तो साधारण वर्ग के लोगों ने  मुझे वह ऊंचाई दी है, जहां पहुंच कर मैंने देखा कि अमीर लोग भी मेरा सम्मान करने लगे हैं। इसीलिए आज एक पत्रकार अथवा एक समाचारपत्र विक्रेता के रुप में मेरी पहचान नहीं है यहां। यदि ऐसा होता तो सांध्यकालीन अखबार कोई अगले दिन सुबह सहर्ष भला क्यों लेता। प्रातः कालीन समाचार पत्रों में वैसे भी पाठकों को लेकर आपस में तनातनी रहती है। परंतु किसी ने भी मेरा पेपर बंद नहीं किया। यह मेरे लोभ रहित कर्मयोग का स्वतः मिला फल है कि सभी पाठकों का मुझे इस तरह से स्नेह मिल रहा है। हां,कर्मयोग के आगे मुझे  अपने योग में शिव की समाधि चाहिए, बुद्ध की खोज चाहिए, गांधी की अहिंसा चाहिए।  मुझे योग का बाजार नहीं चाहिए, मुझे मोक्ष भी नहीं चाहिए ।  मैं उस स्थिति की अनुभूति चाहता हूं, जिसकी प्राप्ति के बाद आदि शंकराचार्य  ने कहा था-

 न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव  मात्सर्यभावः
न धर्मों न  चार्थो न कामो न मोक्षः
 चिदानंद रुपः शिवोहम् शिवोहम्।

 जीवन की इस आखिरी बाजी को मुझे हर प्रयत्न कर जीतना ही है। सो, तन- मन के मैल को स्वच्छ करने में जुटा हूं। यह मेरा अपना स्वच्छता अभियान है। दिखावे के लिये न तो योग करूंगा ,ना ही हाथ में झांडू लूंगा।

शशि 21/6/ 2018

Wednesday, 20 June 2018

स्मृतियों के अटूट बंधन में है जीवन की राह




सारा प्यार तुम्हारा,
 मैंने बांध लिया है आंचल में।
तेरे नये रूप की नई अदा,
हम देखा करेंगे पल पल में।
 
    सच बताऊं मैं आपकों कि मुझे इस तरह के गीत इसलिये भाते हैं, क्यों कि अपनों की स्मृतियों को ये ताजगी देते हैं। हमारी भावनाओं , सम्वेदनाओं और मानव प्रेम के लिये सिर्फ वैराग्य की कामना से मन बोझिल हो जाएगा। सतनाम का जाप और इन कर्णप्रिय गीतों का कर्मफल मेरी दृष्टि में भिन्न नहीं है।हां, मन के भाव समय-समय पर भिन्न अवश्य होते हैं। प्रेम और करुणा ही जीवन है। यही हमारी जीवन शक्ति है। यदि ऐसे गीतों का मुझे सहारा नहीं मिला होता, तो जिन परिस्थितियों से मैं गुजरा हूं और आज जिस चिन्ता मुक्त जीवन की ओर अग्रसर हूं, तब वह व्याकुलता मुझे जीवन मुक्त करने की राह पर ले ही गयी होती। परंतु इन गीतों में मुझे अपनों का प्यार समाहित दिखा। मां, बाबा, दादी, मौसी और भी कुछ ऐसे लोग जो जाने-अनजाने मेरे जीवन में आये, उन स्मृतियों का अटूट बंधन मेरा जीवन रक्षक बन गया। आज मुसाफिरखाने में एक पथिक के रुप में मैं जिस वैराग्य की अनुभूति कर रहा हूं। स्वाथ्य, धन और भोजन तीनों के ही लोभ से बिल्कुल मुक्त हूं।  मेरे व्याकुल मन को तब ज्ञान की भाषा समझ में नहीं आयी थी। सो, अपने इस वेदना में अपनों को ढूंढने के लिये इन गीतों का सहारा लिया। जिसमें सफल हुआ। अन्यथा एक गृहस्थ नामी कथावाचन द्वारा खुदकुशी करने का प्रकरण हमारे सामने हैं। हमने ऐसा तो नहीं पढ़ा कभी कि कृष्ण के विरह में गोपियों ने प्राण त्याग दिये हो, क्योंकि कृष्ण संग स्मृतियों का अटूट बंधन जो था उनका। जीवन में एक ऐसा मंच हम जरुर तैयार रखें, जहां अपनों के वियोग के बावजूद हम उस पर नृत्य कर सकें, रुदन कर सकें। ये गीत और ब्लॉग लेखन दोनों ही मेरे नीरस जीवन में अमृत कलश की तरह है। बेशक यह ब्लॉग मैं अपने लिये लिख रहा हूं और मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या सोच रहे हैं। मैं यहां बिल्कुल खुले मन से लिखता हूं। इसके लिये कुशल लेखक होना आवश्यक नहीं है। हां, शब्दों में भाव होना चाहिए। ताकि हम जब भी अपनी इस डायरी के पन्नों में अपनी तस्वीर देखें, तो दर्पण की तरह हो, न की उसमें कोई बनावटीपन हो, हां एक मुस्कान अवश्य हो। बस आज इतनी सी बात कहनी है। अब अपनी गीतों की नगरी में वापस लौट रहा हूं, शुभ रात्रि।

 मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है
जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है
सूरज न बन पाए तो, बन के दीपक जलता चल
फूल मिले या अंगारे, सच की राहों पे चलता चल ...(शशि)

Tuesday, 19 June 2018

दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन





 न जाने क्यूं होता है ये जिंदगी के साथ
  अचानक  ये   मन
  किसी के जाने के बाद ,करें फिर उसकी याद
  छोटी   छोटी   सी  बात ...

         मेरी लिये अश्वनी भाई के ऐसे गीतों का गुलदस्ता खासा मायने रखता है। फादर डे पर ब्लॉग पर कुछ वरिष्ठ साथियों की कविताएं पढ़ रहा था। कितने श्रद्धा भाव से लिखी गयी थीं, वे चंद पंक्ति। मन बोझिल सा हो गया । पुत्र होने का जब कोई फर्ज अपना पूरा किया होता, तब न नमन करता मैं भी ! अन्यथा चित्र पर माला पहनाने का क्या मतलब है। बाबा(नाना) और पापा( पिता जी) दोनों में से किसी के अंतिम संस्कार तक में मैं मौजूद नहीं रहा। यहां पश्चाताप की दो बूंदों से काम नहीं चलेगा। नियति की विडंबनाओं से मैं यह पूछ भी तो नहीं सकता कि तुम्हें मैं ही इतना प्रिय क्यों हूं कि जब भी मुस्कुराने की बारी आती है, आंखें भर आती हैं। ढ़ाई दशक तक पता नहीं सुबह से लेकर रात तक ये चार शो वाले रंगमंच का चयन मैंने कैसे और किस विवशता में कर लिया था कि अपनों से दूर बहुत दूर होता चला गया। यदि अब यह कहूं कि दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन, तो स्मृतियों के अतिरिक्त और क्या शेष है मेरे पास । हां , आप ऐसी गलती कभी मत करना अपना कर्म क्षेत्र चयन करते समय, अपनों के लिय वक्त जरूर रखना । मैं तो अपने पागल मन को यूं समझा लेता हूं -
 ऐ मेरे उदास मन
चल दोनों कहीं दूर चले
मेरे हमदम तेरी मंजिल
ये नहीं ये नहीं कोई और है...

पर इसके लिये भी काफी अभ्यास करना पड़ा है मुझे । अब भी मैं  विवाह- बारात जैसे मांगलिक समारोह की चकाचौंध भरी दुनिया में इन पच्चीस वर्ष बाद कदम रखने में असहज महसूस करता हूं। मैं एकांत चाहता हूं , इस दुनिया से मेरा अब ऐसा क्या रिश्ता ? पर जो शुभचिंतक हैं न, वे मेरी मनोस्थिति को कहां समझ पाते हैं। सो, उनके आनंद के लिये जाना तो पड़ेगा ही।
  वैसे, इस बार फादर डे पर अपनी वेदना से कहीं अधिक व्याकुलता अगले दिन एक दुखद घटना को लेकर हुई मुझे। हमारे जैसे किसी भी सम्वेदनशील इंसान की जुबां पर सिर्फ एक ही शब्द रहा कि बच्चे किस दबाव में इतना बड़ा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। जो उनके माता पिता को ताउम्र सालता रहेगा। घटना यह है कि नगर के एक प्रमुख चिकित्सक की सत्तरह वर्षीया पुत्री का शव फादर डे के अगली सुबह उसके कमरे में पंखा से लटका मिला। छोटी सी बात थी मृत छात्रा को चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी प्रतियोगी परीक्षा में कम अंक मिल रहे थें। नामी चिकित्सक हैं, सो उनके पास हर वैभव मौजूद रहा। फिर भी उनके भव्य बगले में मातम बन मौत ने पांव रख ही दिया। पिता ने अपनी दोनों ही पुत्रियों को शहर के सबसे बड़े कानवेंट स्कूल में पढ़ाया था। जरूर तमन्ना अभिभावकों की भी होगी कि उनकी बिटिया भी डाक्टर बन नाम रौशन करे।  ऐसी ही महत्वाकांक्षा  किशोर मन पर भारी पड़ती है कभी कभी । परीक्षा में असफल होने के बाद वह टूटती रही होगी। उसकी मनोस्थिति को कोई समझ नहीं पाया होगा। परिणाम सामने हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष भगवती प्रसाद चौधरी जिनका इस डाक्टर परिवार से घरेलू संबंध हैं, जो अच्छे चिंतक भी हैं, वे चकित से थें कि बच्ची ने इतना बड़ा दुस्साहसिक कदम किस तरह से उठा लिया । दुपट्टे को पंखा में फंसाने के बाद कुर्सी को पांव से धक्का देने की हिम्मत वह आखिर किस प्रकार जुटा पाई। यह चिन्तन का बड़ा विषय है, हम सभी के लिये। बड़ों का तनावग्रस्त हो अप्रिय कदम उठाना समझ में आता है। लेकिन ,बच्चों पर इतना अधिक उनके कैरियर का दबाव ? कहां जा रहे हैं हम मित्रों इस भौतिक युग में, विचार किया आपने। क्या कभी अपने बच्चों से पूछा कि वे क्या चाहते हैं। मैं तो अपना किशोरावस्था याद कर सहम उठता हूं। कोलकाता में 6 की परीक्षा पास कर वाराणसी जब आया था, तो सीधे कक्षा 8 की बोर्ड की परीक्षा में बैठा दिया गया था। फिर नौ में साइंस का स्टूडेंट हो गया। जो लड़का सदैव अपने परिश्रम के  बल पर कक्षा में अव्वल रहा हो। उसे दो दर्जा  ऊपर की पढ़ाई तनिक भी समझ में नहीं आ रही थी। फिर भी अपने सम्मान के लिये दिन भर और देर रात भी गणित का सवाल हल करता रहा। सो,गणित में भले ही मुझे हाई स्कूल बोर्ड की परीक्षा में 100 में से 98 अंक मिल गया, परंतु ना जाने किस कारण परिवार से दूरियां बढ़ती ही गयी,  मैं घर छोड़ कोलकाता बाबा के पास होते हुये मुजफ्फरपुर मौसी के घर जा पहुंचा।वे सारे स्वप्न जो मुझसे  जुड़े थें अभिभावकों के वे बिखर गये। आज भी व्याकुल पथिक बना मंजिल तलाश रहा हूं। कहने का बस इतना तात्पर्य है कि अपने बच्चों की मनोदशा को हमें समझना होगा, क्यों कि वे अपनी नहीं अपने अभिभावकों की महत्वाकांक्षा के शिकार हैं। उन्हें भारतीय और आयातित संस्कृति के मध्य फंस कर अकेले ही द्वंद करने के लिये छोड़ दिया गया है। कसूरवार कौन है हम या ये नादान बच्चे ...शशि

Sunday, 17 June 2018

उम्र भर दोस्त लेकिन साथ चलते हैं...




   अश्वनी भाई ने आज बारिश के इस सुहावने मौसम में किशोर दा का एक खूबसूरत  गीत भेजा है । बोल हैं  -

  दिये जलते हैं, फूल खिलते हैं
बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं।
दौलत और जवानी, इक दिन खो जाती है
सच कहता हूं सारी दुनिया दुश्मन हो जाती है
उम्र भर दोस्त लेकिन साथ चलते हैं

   सो,पहले मैं सोचता था कि यह बुखार भी न जाने क्या बला है। सूखी हड्डियों को कब से चूसे जा रहा हैं। धीरे - धीरे दो दशक होने को है, इससे जान पहचना हुये और अब हम दोनों की लगता है कि उम्र भर की यारी हो गयी है। मेरे स्वस्थ शरीर पर इसका  श्याम रंग कब का चढ़ चुका है और वजन वर्ष 1999 में जो दस किलो घटा ,तो वहीं पर स्थिर है। दुनिया की किसी औषधि का प्रभाव अब हमारी दोस्ती पर पड़ने वाला नहीं है। आज सायं यहां खुबसूरत मुसाफिरखाने में बिल्कुल एकांत में बारिश का लुफ्त उठा रहा हूं। सुबह जब दो घंटे साइकिल से अखबार संग लिये नगर भ्रमण कर लौटा था, तो ज्वर का प्रभाव पुनः बढ़ गया था। आखिर , मेरा हमदर्द जो ठहरा वह। सो, पर्व हो या अवकाश का दिन, प्रेम प्रदर्शन का यह उसका अपना तरीका है। अन्यथा अब तक जो भी मिलें, वे राह बदल लिये। दोपहर बाद अभी को दवा लेकर  उठा हूं। आज रविवार है, इस दिन मैं अपने बार में कुछ लिखा करता हूं। अतीत की यादें ही शेष बची हैं, पत्रकारिता में मन जो नहीं लगता है। फिर भी किसी तरह से अखबार में अपना मीरजापुर कालम भरे रहता हूं। मित्रों को मेरी खबरें पसंद है, तो यह उनका बड़प्पन है। एक बात साफ कर दूं कि यहां जो भी मेरा पेपर लेते हैं, वे मेरे पाठक नहीं हैं। वे सभी स्नेह रखते हैं मुझसे और यह नहीं चाहते कि मैं मीरजापुर छोड़ कर चला जाऊं, इसलिये ही अखबार लेते हैं। हमारे मित्र घनश्याम भैया का यह विशेष अनुरोध रहा कि मैं अपने बारे में कुछ लिखूं, ताकि जब ना रहूं, तो वह समाज के लिये वह मेरी एक पहचान हो। सच कहूं, तो मैंने अपने इस लम्बे संघर्ष से ऐसा कोई अमृत कलश नहीं पाया है कि उसे मिसाल के रुप में प्रस्तुत कर सकूं, फिर भी कल ईद पर जब भाकपा माले के बड़े नेता यूं कहें कि उसके " थिंक टैंक " टीम के सदस्य   कामरेड सलीम भाई के घर गया, तो उन्होंने दिल्ली से आयीं आम आदमी पार्टी की एक वरिष्ठ नेत्री से मेरी पहचना यह कह कर कराई कि ये शशि जी हैं, बेहद ईमानदार पत्रकार, जो ढ़ाई दशक से साइकिल से चल कर समाचार संकल्प, लेखन,अखबार लाने से लेकर वितरण सभी करते हैं। कभी प्रशासन के दबाव में झुके नहीं भले ही मुकदमा झेल रहे हैं। तो समझ ले मित्रों कि किसी महाविद्यालय की डिग्री न रखने वाले व्यक्ति के लिये इतना पहचान बनाना भी कम नहीं है। आज मेरी बात मैं और मेरे साथी इस बुखार की है। जीवन में किसी न किसी का साथ होना चाहिए, सो वह अपना फर्ज निभा रहा हैं। यह वर्ष 1999 की बात रही, जब जब पहली बार मुझे इस तरह से सर्दी जुकाम ने जकड़ा था। मेरे प्रति स्नेह रखने वाले मित्र डा० योगेश सर्राफा ने जब देखा कि होम्योपैथी की उनकी हर दवा नाकाम हो रही हैं, तो पीछे मोहल्ले के एक चिकित्सक के पास ले गये थें। रक्त परीक्षण में ना जाने क्या चूक हुई कि लम्बे समय तक टायफाइड की अंग्रेजी दवा चलती रही और मेरी स्थिति दिन प्रतिदिन गंभीर होती ही गयी। जिस पर एक और डाक्टर ने अपने अनुभव के आधार पर कहां कि तुम्हें मलेरिया है। दवा दी तो मैं ठीक हो गया। कुछ माह बाद फिर से वही ज्वर पीड़ा। तब से दिल्ली  से लेकर वाराणसी तक की दवा कर चुका हूं। मलेरिया विभाग की टीम लखनऊ से आयी थी। तमाम कोशिश उसका भी व्यर्थ रहा। बीएचयू के एक बड़े डाक्टर ने नींद की दवा लिख दी थी। आयुर्वेदिक दवाओं पर भी लाख रुपये के आस पास तो जरूर खर्च किया हूं, तमाम महंगे भस्म दिये गये थें। हां, अब एक काढ़ा लेता हूं और वर्षों से मलेरिया की फिर कोई अंग्रेजी दवा नहीं ली है। कितने ही वर्षों से यह काढ़ा ही मेरा उपचार है । बुखार अधिक होने पर अंग्रेजी दवा ले लेता हूं । ठंडे जल में स्नान करने में मैं असमर्थ हूं। फिर भी कुदरत का यह करिश्मा देखें कि मैं सुबह से रात तक अपने दिनचर्या में व्यस्त रहता हूं। मेरे मुखमंडल पर आपकों कभी भी बीमारी की पीड़ा नहीं दिखेगी। और दिखेंगी भी कैसे , इस एकाकी जीवन में किसी ने कहा तो सही कि ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे...(शशि)
चित्र गुगल से साभार

Saturday, 16 June 2018

ईद तो तेरी भी थी, उन्हें यूं मिटा के क्या मिला




 


   रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद आज ईद एक बार फिर आई है। अपना जो शहर है , वह वैसे ही गंगा जमुनी तहजीब के लिये सरनाम है। हां, कुछ सियासत कभी कभार घुस जाती है, नहीं तो भाईचारे की महक हममें कायम है। ईदगाह यानी की शहर के इमामबाड़े  मुहल्ले में खासी रौनक है । सुबह से ही तरह तरह की खाद्य सामग्रियों की दुकानें सजी हैं। बच्चों की निगाहें खिलौनों पर और याचकों की ईदगाह पर आने वालों के बटुए पर थीं।  परंतु मेरी नजरें कुछ और ही ढूंढ रही थी। बचपन में मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी ईदगाह पढ़ी थी। सो , इतने बड़े मेले में मासूम बच्चा हामिद और उसकी दादी अमीना को ये आंखें खोज रही थीं। चहुंओर नजर दौड़ाया था फिर भी हामिद तो नहीं मिला , लेकिन अमीना एक नहीं अनेक दिखीं। महंगाई के बोझ तले क्या हिन्दू, क्या मुसलमान निम्न मध्यवर्गीय परिवार दबता जा रहा है। अच्छे दिन का हसीन ख्वाब कांटा बन आम आदमी को चुभन दे रहा है। सो, अमीना के अनेक रुप दिखे यहां, पर बहुरुपिया मत समझ लेना इन्हें भाईजान । अब तो कपड़े भी हर नमाजियों के पास नये नहीं थें। फिर भी मासूम हामिद की मुस्कान के लिये  हर मूमकिन कोशिश परिजनों ने की थी। कालीन- दरी का कारोबार ठंडा पड़ने से बेरोजगारी और जोरों पर है। फिर भी  हजारों ऐसे बुनकरों की रोटी पर चोट करके भी रहनुमा खिलखिला रहे हैं।ःः   एक पत्रकार हूं, सो आज मेरा भी जरा डाइट कार्यक्रम रहता है। ईद की नमाज खत्म होते ही  कामरेड सलीम भाई , छोटे भाई , हाशिम चचा के दरवाजे पर दस्तक देना तो तय है। हालांकि इसकी नौबत नहीं आती, मेहमानों के स्वागत में वे पहले से जो तैयार है। सलीम भाई की दूध, केशर और चिरौंजी वाली सेवई लाजवाब होता है।पिछली ईद तक तो अपने चुन्ना भाई हैं न कंतित से अशोक भैया के हाथों टिफिन भर सेवई और दहीबड़ा भेजा करते थें।पर अब ठिकाना बदल दिया हूं। घर- परिवार जो नही है , सो मुसाफिरखाने अपना नया आशियाना है।हम यतीमों का और भला कहां ठिकाना है। फिर भी खुशनसीब हूं कि इतने दोस्त मिले हैं। जरा सी देर हुई नहीं कि छोटे भाई का संदेशा आ जाता है कि कब आ रहे हो भाई। मेराज भाई हो या इमरान मियां सभी अपने मित्र बंधु हैं।आज बुखार ज्यादा हैं पर दवाइयां ले रखी है। सभी जानते हैं कि स्वास्थ्य कारणों से मैं छोला दहीबड़ा नहीं खा सकता हूं।फिर भी कुछ तो लेना ही है न। ईदगाह पर रमजान के नमाज का दृश्य कितना अद्भुत रहता है, जब एक साथ हजारों सिर सिजदे में झूकते हैं। गजब का अनुशासन दिखता है। अल्लाह के दरबार में कोई अमरी न गरीब है, जो जैसे आया नमाज स्थल पर पीछे की कतारों में खड़े होता चला गया यहां। वैसे भी मुझे अजान की आवाज बेहद सुकून देती हैं, ठीक उसी तरह जब किसी मंदिर में आरती के समय घंटा घड़ियाल बजा करता है। सारी चिन्ताएं मानो कुछ देर के लिये चिन्तन में बदल जाती है। लेकिन , इस बार मन कुछ व्याकुल है। सोच रहा हूं कि उस जवान के परिजनों पर क्या बीत रही होगी, जिसे अगवा कर मारा गया है। अब यहां कौन सी मजहब की दीवार है।  ईद की छुट्टी ले वह घर को निकला था, परंतु आतंकवादियों ने उसे जीवन से ही  मुक्त कर दिया । जरा भी नहीं सोचा कि त्योहार पर किस-किस का कलेजा नहीं फटेगा उसके घर पर। यह कैसा तुम्हारा
जहां है। कल हम कहां और तुम कहां, फिर भी मारकाट मचा है। कोई तीन दशक पूर्व जब कालिंपोंग में रहता था, तब गोरखालैंड आंदोलन का रक्तपात देखा था। जिस कमरे में मेरा बसेरा था। उसके ऊपर कत्ल हुआ था। यहां पत्रकारिता में आया तो कुछ ही वर्षों बाद नक्सलियों के पदचाप से जिले का एक हिस्सा दहला था। वर्ष 2001 में मार्च का वह महीना था। रात में होलिका दहन के साथ हर किसी को रंग से सराबोर होना था, पर उसी दिन यहां भवानीपुर गांव में 16 लाशें एक साथ पड़ी थींं। जिसमें एक किशोर का भी शव था। पुलिस इन सभी को नक्सली बता रही थी। लेकिन, वहां मौजूद ग्रामीण महिलाओं की भीड़ कुछ और दास्तां कह रही थी। उस रात जीवन में पहली बार गोलियों से छलनी मृत पड़े इतने इंसानों को देखा था। जब किशोर था तो बनारस में वह खौफनाक दंगा भी देखा था। हिन्दू मुस्लिमों के धर्म से जुड़े जयकारे न जाने क्यों पल भर में साम्प्रदायिक हो जाते थें। आतंकवादी, नक्सली, अलगाववादी सबकी एक ही कहानी है कि यह धरती हमारी है, या फिर हक- अधिकारी की लड़ाई है। दहशतगर्दों को न त्योहार से मतलब है , न ही पुत्र को कंधा देते पिता से या फिर पिता को मुखाग्नि देते उस मासूम से। पल भर में चूड़ियां तोड़ देते हैं वे दुल्हनों की , बोलों बूढ़ी मां का कोख उजाड़ कर तुम्हें क्या मिला। मेरी तरह तुम यतीम तो हो नहीं , मां और बीवी तुम्हारी
राह देख रही होगी। पत्नी ना सही तो भी किसी अपने पर प्यार जरूर आया होगा। देखों तुमनें जिस पत्रकार सुजात बुखारी को मारा है। जनाजे में उमड़ी भीड़ देखी क्या उनके। अमरत्व की यहीं निशानी है। जवान जो मरा है । भारत माता के लिये शहीद हुआ है।  पर तुम्हारी लाशों को तुम्हारा मुल्क क्या देगा । फिर सबकों क्यों विरह वेदना दे रहे हो।  ईद तो तेरी भी थी, यूं इन्हें मिटा के तुम्हें क्या मिला। फिर कैसे मनाऊं ईद बोलो, जब पड़ोस में कोई सिसक रहा है।

शशि

Thursday, 14 June 2018

हम न सोचें हमें क्या मिला है, हम ये सोचें किया क्या है अर्पण


   


      आज सुबह  निकला तो हृदय को छूने वाले कर्णप्रिय भजन की यह पंक्ति " हम न सोचें हमें क्या मिला है, हम ये सोचें क्या किया है अर्पण"  मेरे मन की वेदना से अनेकों सवाल करते मिली। सचमुच मैं बिल्कुल स्तब्ध सा रह गया कि आखिर क्या संदेश छिपा है, इस प्रार्थना गीत में !  स्वयं को एक बार फिर से टटोलने लगा मैं । अपनों से क्या मिला, समाज ने क्या दिया , यह उलाहना दे मन किस तरह से करुण क्रंदन करता आ रहा है ,  जाने कितने ही वर्षों से। मां के गुजरने के बाद कभी आंचल की छांव की चाहत, तो कभी घर-आंगन को अपनी किलकारियों से सराबोर करने वाले मासूम चेहरों की कल्पना , जिस सुख से मैं इस धरा पर मानव तन पा कर भी वंचित ही रह गया। या फिर स्वस्थ शरीर खोने की पीड़ा जैसी व्याकुलता से आंखें ना मालूम कितनी बार भर आई होंगी। क्या यही वेदना मेरी नियति है ? मैं ही एक इकलौता इंसान हूं, जो उस दयालु परमात्मा की कृपा से वंचित हूं। ऐसे अनेकों सवाल न जाने कब से मन को आहत करते रहे हैं। मैं एक कूपमंडूक सा उसी में उलझा पड़ा सिसकता रहा अब तक। क्या बताऊं दूर ना सही अपनों की ओर भी निगाहें नहीं डाली मैंने। वाराणसी में मेरे घर से ताऊ जी का मकान बहुत दूर नहीं है। वे मेरे  सगे ताऊ जी नहीं , मेरी दादी की बड़ी बहन के पुत्र हैं। फिर भी स्नेह मुझ पर उनका सदैव रहा है। यदि मैं कभी बनारस जाता भी हूं, तो कैंट से प्रेस के दफ्तर और फिर वहां से अपने मित्र कंपनी गार्डन को निहारते हुये सीधे ताऊ जी के घर ही जाता हूं। काफी बड़ा बंगाल है शहर में उनका। एक महाविद्यालय में विधि संकाय के विभागध्यक्ष रहें वे। सम्मान में बड़े-छोटे सभी उन्हें वकील साहब कहते हैं। तीन पुत्रियों के जन्म के काफी दिनों बाद पूजा पाठ से एक पुत्र धन की प्राप्ति हुई थी। सबके दुलारे विक्की बाबू जब छोटे थें, तो मेरे पापा के विद्यालय में ही पढ़ते थें। इकलौता संतान, पर  बेहद आज्ञाकारी था वह। जब किशोरावस्था समाप्ति की ओर थी,  एक दिन घर पर ही हुई एक दुर्घटना से ताऊ और ताई जी के आंखों का तारा , बुढ़ापे का सहारा अप्रत्याशित तरीक़े से छीन लिया गया । उसकी मौत ने सभी को स्तब्ध कर दिया था।नियति ने एक और छल किया । कुछ वर्षों बाद उनकी छोटी पुत्री जो तीनों बहनों में सबसे चंचल, हंसमुख एवं गृहकार्य में दक्ष थी, को ना मालूम किस बीमारी ने डस लिया कि शरीर का रंग काला पड़ता गया, वजन बिल्कुल ही गिर गया। इसके बावजूद भी उसने जीवन के लिये काफी संघर्ष किया। परास्नातक की शिक्षा दिलवाने के लिये ताऊ जी ने उसके लिये स्कूटी खरीदी थी। परंतु वह भी अपने भाई की राह पर बढ़ चली। आज जब मुझे इन दोनों छोटे-भाई बहन की याद रुला दे रही है कि किस तरह से मैं जब कभी मीरजापुर से वाराणसी उनके घर जाता था ,तो वे शशि भैया फालसा का शर्बत लें, यह खा लें न ? ताई जी की तरह ही इन सभी बच्चों का स्वभाव था। बड़ी दो पुत्रियों का विवाह हो गया और इन दोनों बच्चों को वे खो दिये। आप समझ सकते है कि उनपर क्या बीती होगी।       
              लेकिन, इस नियति को किस तरह से पराजित किया जाता है, इसे मैंने यहीं पर देखा है। कुछ महीने पूर्व संगीतमय देवी भागवत के आयोजन पर जब ताऊ जी के बुलावे पर मैं बनारस गया था।  वहां एक सुखद अनुभूति से मन प्रफुल्लित हो गया था । परिवार के तमाम सदस्य कथा सुनने जुटे हुये थें और इसी दौरान मुख्य यजमान की भूमिका में  बैंठी ताई जी भावमय मुद्रा में हाथ ऊपर किये नृत्य कर रही थीं। ताऊ जी बताते हैं कि तुम्हारी ताई जी को काफी मुश्किल से पुनःइस स्थिति में वापस ला पाया हूं । यह अंधकार से प्रकाश की ओर उनका कठिन सफर है। अब ताई जी मुझसे  बराबर यह कहती हैं कि पप्पी तुम एक बार तिरुपति वैंकटेश्वर बाला जी का दर्शन कर आओ, देखों अपना ही जिद्द ना करों। तुम भी स्वयं में परिवर्तन देख पाओगे। पर सिर झुकाये उनकी आज्ञा का निरंतर उलंघन करते आ रहा हूं। मुझे अपनी इन दो बूंद आंसुओं  में ईश दर्शन जो करना है।

शशि

(चित्र गुगल से साभार )
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मित्रों, विशेष यह कहना है कि अब मुझे भी कुछ पढ़ना हैं। अतः सप्ताह में हर दूसरे दिन ही हमारी मुलाकात होगी।
आप सभी का स्नेह मिल रहा है, इसके लिये आभार पुनः व्यक्त कर रहा हूं। हां , अपने 94 फॉलोवर का यह विश्वास  कभी नहीं टूटने दूंगा कि सपना नहीं बेचता मैं, हकीकत मेरी कहानी है। इस ब्लॉग को अस्तित्व में लाने के लिये मैं सदैव रेणु दी का आभारी हूं।
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