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Wednesday, 30 September 2020

प्यार का तोहफ़ा

(जीवन के रंग)

  बंगाल के सबसे बड़े पर्व दुर्गा- पूजा पर बंगालियों का रंग-ढंग देखते ही बन रहा था। बंगाली स्त्रियों का कहना ही क्या,पूजा के पाँचों दिन षष्ठी से दशमी तक वे अलग-अलग परिधानों में जो दिखती हैं । सप्तमी की संध्या के लिए अलग साड़ी, तो अष्टमी के अलग वस्त्र। नवमी के दिन माथे पर लाल सिंदूर , सिर पर बड़ी-सी लाल बिंदी ,लाल रंग की साड़ी और उसी रंग की चूड़ियों में इन्हें देख ऐसा लगता है कि धरती पर मानो स्वयं देवी ही उतर आयी हों। दशमी की शाम वैसे तो माँ के जाने का गम होता है,फिर भी माँ को पूरे उमंग और उत्साह से भावपूर्ण विदाई देने के लिए ये बंगाली औरतें चौड़े लाल पाड़ वाली साड़ी पहनती हैं। सुहागिन स्त्रियाँ एक दूसरे संग सिंदूर की होली खेलती हैं ,  जिससे सभी की साड़ियाँ एक जैसी रक्तवर्णी हो जाती हैं। इनकी नम आँखों में अगले साल माँ के पुनः आगमन की प्रतीक्षा होती है। इसी आशावाद से यह मानव जीवन संचरित है। किन्तु सोनम मुखर्जी के लिए ऐसे पर्व सदैव दर्द का पैगाम लेकर आते हैं। उसके अपने जीवन में कोई आशा और उमंग जो नहीं रहा। दिल की ख़ामोशी चेहरे पर छिपाये नहीं छिपती। वह ऐसे उल्लास भरे अवसर पर भी नीली पाड़़ वाली पुरानी सफ़ेद साड़ी पहने अष्टमी व्रत-पूजन की तैयारी में जुटी हुई थी। 

डा0 सुशांत उसके दुःख से अनभिज्ञ नहीं है,किन्तु इस संदर्भ में जब भी कोई पहल करना चाहता, सोनम की गरिमामयी देवी तुल्य छवि जो वर्षों से उसके हृदय में है, संकोच की दीवार बन जाती है। आज वह चिकित्सक है,तो यह इस देवी के त्याग और तप का परिणाम है, परंतु बदले में सोनम को क्या मिला ? एकाकी जीवन, न अपना घर-न कोई स्वप्न ।जिसके लिए सुशांत स्वयं को जिम्मेदार मानता है। चाहे जैसे भी हो सोनम की खुशियाँ वापस लाकर ही रहेगा, इसे लेकर वह स्वयं को दृढसंकल्पित कर चुका था । वर्षों पूर्व माँ की मृत्यु से वीरान पड़े उसके घर में इस बार विजयादशमी और दीपावली मनायी जायेंगी , ऐसा निश्चय कर सुबह अवकाश के दिन भी हॉस्पिटल जाते समय उसने पहली बार अधिकार भरे स्वर में सोनम से कहा था -" शाम मैं आपको ऐसा तोहफ़ा दूँगा,जिसमें हम दोनों की खुशियाँ हैं,तैयार रहिएगा.. और हाँ, ना-नुकुर बिल्कुल नहीं चलेगा।" 

 सुशांत के जाने के पश्चात उसका यह 'सरप्राइज गिफ्ट' सोनम के मन को उद्विग्न किये हुये था। यह उपहार उसके लिए एक पहेली जैसा था। इस विषय पर वह जितना ही चिंतन करती, उतनी ही चिंतित होती जाती ।वह विचारों के दलदल की गहराई में धँसी जा रही थी । उसके मुखमंडल पर कभी स्त्रीयोचित लज्जा का भाव छा जाता तो कभी सामाजिक उपहास के भय से सिहर उठती । "क्या करे वह ? कैसे मनाए इस जिद्दी युवक को जिसने किशोरावस्था से लेकर अब-तक उसकी कोई भी बात नहीं टाली थी,मानो रोबोट हो,किन्तु इसबार उसके लाला ने उससे कुछ मांगा है ?" इस विषय पर वह स्वयं से अनेक प्रश्न करती और खुद ही निरुत्तर हो जाती। " हे ईश्वर ! तुझसे यही प्रार्थना है कि मेरे कारण  सुशांत की समाजिक प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आने पाए।"  जैसे-जैसे दिन चढ़ता जा रहा था , सोनम की धड़कनें तेज होती गयीं।इन दोनों के बीच वर्षों से पवित्र स्नेह का ऐसा संबंध है,जो बिना कहे एक दूजे की भावनाओं को बयां कर देता है, इसलिये सुशांत के निश्छल व मासूम हृदय की आवाज़ सोनम तक पहुँच रही थी। जिसने उसे विकल कर रखा था। "नहीं-नहीं , यह अनर्थ नहीं होने देगी।उसके वर्षों की तपस्या का परिणाम है डा0 सुशांत। यही कोई तीस वर्ष का ही तो है। अभी उसका पूरा भविष्य सामने है।"

  तभी उसके मानसपटल पर अतीत से जुड़ी अनेक खट्टी-मीठी यादें चलचित्र की भाँति दृश्यमान होने लगती हैं। अठारह वर्ष पूर्व जब वह  बीस की थी,तब अपनी विमाता से प्रताड़ित होकर घर छोड़ कोलकाता भाग आयी थी। भीड़ भरी सड़कों पर उसके तन को घूरती अनेक आँखों के मध्य सौभाग्य से सुशांत की विधवा माँ से कालीबाड़ी में भेंट हो गयी। जिनका ममत्व भरा आँचल उसका सुरक्षा कवच बन गया। उसकी काकी एक कुशल नर्स थी । दो-ढ़ाई वर्ष उनका यही सानिध्य ,भविष्य में सोनम और सुशांत की आजीविका का वर्षों सहारा बना रहा।

  उसे वह मनहूस दिन भलिभाँति याद है , जब जानलेवा ज्वर ने उसके आश्रयदाता से उसका जीवन छीन लिया था। महाप्रयाण से पूर्व उस विधवा माँ ने अपने इकलौते पुत्र को उसके समक्ष कर अश्रुपूरित नेत्रों से कहा था -" बेटी ,जब से तू आयी है, इस नटखट के स्वभाव में आश्चर्यजनक परिवर्तन दिखा है। इस घर के कुलदीपक को बुझने मत देना। प्रयत्न करना कि यह पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो जाए। मेरे पास तुझे देने को इन आभूषण के सिवा और कुछ नहीं है , इन्हें रख ले। "

 जिसे सुनकर सोनम की आँखें भी बरसने लगी थीं । उसने रुँधे गले से कहा था-"काकी, ऐसा न कहें, हम आपको कुछ नहीं होने देंगे।" लेकिन अगले ही पल उसकी काकी की साँसें उखड़ने लगीं । फिर भी अपनी अधूरी बात पूरी करते हुये उन्होंने पुत्र से कहा था-" बेटा, यह सदैव याद रखना कि इस घर पर सोनम का भी तेरे समान अधिकार है। उसे कभी कष्ट मत देना।" और अगले ही क्षण करुण-क्रंदन से वातावरण बोझिल हो उठा था।

   उस दुःखद दृश्य का स्मरण कर सोनम की आँखें फिर से डबडबा उठी थीं ।वह यह कैसे भूल सकती है कि नवमी का ही दिन था जब काकी उसे एक बड़ा दायित्व सौंप विदा हो गयी थी। और आज उनकी मृत्यु के सोलह वर्ष पश्चात इसी दुर्गापूजा पर्व पर यह बावला सुशांत उसके लिए उपहार की बात कर रहा है। "डाक्टर हो गया तो क्या कोई अपनी माँ को भूल जाता है !  "नहीं-नहीं  ऐसा कोई तोहफ़ा स्वीकार नहीं करेगी। न ही पर्व की खुशियाँ मनाएगी । होता है नाराज तो हो ले।",ऐसा विचार कर वह पुनः अपनी स्मृतियों में खो जाती है।

  विधि जब प्रतिकूल हो, पग-पग पर दुर्भाग्य सामने खड़ा होता है। गृहत्याग के बाद सोनम को इस दुनिया की बुरी निगाहों से बचाने के लिए उसे  काकी के ममत्व की जो छाँव मिली थी, अब वह भी नहीं रही। लेकिन सुशांत के साथ होने से उसका आत्मबल पहले की तरह कमजोर नहीं था। दृढनिश्चय के साथ अपने प्रारब्ध से वह टकरा गयी। 


   सुशांत उससे आठ साल छोटा है,किन्तु दोनों के इस अनाम पवित्र संबंध को लेकर कुत्सा और कानाफूसी  करने वालों की कमी नहीं थी। ताने सुनकर उसकी आत्मा तड़प उठती थी। फिर भी इसकी परवाह न कर एक निजी नर्सिंगहोम में नर्स के मामूली पगार से उसने अपना पेट और तन काट कर सुशांत की शिक्षा जारी रखी। उसकी स्नेह की छाँव और कठोर श्रम को देख नटखट सुशांत के हृदय में विद्यार्जन की ऐसी ललक जगी कि डिग्री मिलते ही वह कोलकाता के एक हॉस्पिटल का सितारा बन गया। समाज का भूषण है वो। पर हाँ,एक ऐसे जीवनसाथी की उसे ज़रूरत है,जो उसी की भाँति उसके लाला का ख़्याल रख सके। तभी वह अपने दायित्व से मुक्त होगी। माना कि थोड़ा जिद्दी है,पर दिल का सच्चा है। उसने कई बार इस विषय पर सुशांत की ख़ामोशी तोड़ने की कोशिश की और पूछा था-"लाला ! कोई पसंद की लड़की हो तो बता  दें । अच्छा, एक काम कर न्यूज़ पेपर में मैट्रिमोनियल कैसा रहेगा ? " लेकिन विवाह के नाम पर सुशांत के मुख पर ताला जड़ जाता। यह देख झुंझला कर वह कहती-"तो क्या जीवन भर मुझसे चौका-बर्तन करवाएगा ? रसोइए के हाथ के भोजन से तेरा हाज़मा खराब हो जाता है ।" प्रतिउत्तर में सुशांत मुस्कुराते हुये कहता- "बंदा हाजिर है। बोलो क्या खाना है।" और फिर आमलेट बनाने की तैयारी में जुट जाता। उसके ऐसे ही नटखटपन पर फ़िदा सोनम अपना गुस्सा थूक,उसकी हर ज़रूरत को अपनी प्राथमिकता समझती।

     लेकिन इस जीवन-संघर्ष में सोनम की अपनी खुशियाँ पीछे छूट चुकी थीं। कभी कोमलता और सुकुमारता की बेजोड़ मूर्ति थी वह। किन्तु समय के थपेड़े ने उसके गोरे गुलाबी रंग, मक्खन-सी काया पर असमय ही ग्रहण लगा दिया था।उसका जीवन रंगीनियों से दूर हो चुका था।जिसका उसे तनिक भी अफ़सोस नहीं है, क्योंकि वह काकी के विश्वास का मान रखने में सफल रही। यह उसकी कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी ? सोनम अतीत के इन्हीं तिक्त और मधुर क्षणों में खोयी हुई थी कि न जाने कब आहिस्ते से बाबू मोशाय सुनहरे रंग का एक खूबसूरत डिब्बा लिये उसके पीछे आ खड़े हुये।

 " सरप्राइज !",

सुशांत की आवाज़ सुनते ही सोनम हड़बड़ा कर सोफे पर से उठी ही थी कि शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है । अगले ही पल वह बाबू मोशाय के आगे बढ़े हुये बाँहों में होती है । क्षण भर के लिए दोनों की नज़रें मिलती हैं। सोनम ने देखा कि सुशांत की आँखों में वही मासूमियत उतर आयी है, जब सोलह वर्ष पूर्व माँ को खोने के बाद वह इसीप्रकार उससे आ लिपटा था। बस तब वह सिसक रहा था और अब वे आँखें खिलखिला रही हैं।

"पागल हो क्या बिल्कुल ? नवमी को काकी की बरसी है और तुम्हें यह परिहास सूझ रहा !", सोनम ने सुशांत को तनिक झिड़कते हुये कहा था। 

 "तो क्या हुआ,इतने साल हो गये हैं,माँ को गुजरे। भगवान राम का वनवास भी चौदह वर्ष में समाप्त हो गया था। और आप वहीं ठहरी हुई हैं।",तुनक कर सुशांत ने प्रतिवाद किया। 

"अरे ! यूँ नाराज क्यों होते हो, तुम्हें छोड़ मेरे पीठ पर और है ही कौन ? तुम पर अधिकार समझा, सो कह दिया। " सुशांत का उतरा हुया चेहरा देख सोनम से रहा नहीं गया। "अच्छा, लाओ मेरा उपहार ,जो कहोगे मानूँगी। यह हनुमान जी की तरह मुँह न फुलाया करो। मेरी तो जान निकल जाती है।" 

    "हाँ भई,ऐसा ही हूँ मैं ।आपकी तरह सदैव के लिए मौनव्रत थोड़े न किया हूँ। अच्छा, अपना वचन पूरा करें और यह परिधान शीघ्र पहन कर आयें   । हम दोनों दुर्गा पांडाल  घूमने चलेंगे। वह भी कार से नहीं, पैदल। जिसतरह माँ के संग गये थे।",बाबू मोशाय ने कनखियों से सोनम के मुख-मंडल को निहारा था,ताकि उसके चेहरे के भाव को परख सके। 

"ना बाबा ,यह नहीं हो सकता, वह भी लाल  छींटदार  लखनवी चिकन की साड़ी ! यह तो सुहागिनों के लिए होती है। इसे पहन कर वह भी तुम्हारे साथ पैदल ही सड़क पर ! ",ऐसे उपहार को देख सोनम का पूरा बदन थरथरा उठा था। यदि ऐसा अनर्थ उसने किया तो कैसे करेगी इस निष्ठुर सभ्य जगत का सामना ?

    यह सुनाते ही क्रुद्ध हो सुशांत सत्याग्रह पर अड़ गया। सीधे भूख हड़ताल की धमकी दे उसने लपक कर अटैची उठा ली, दो-चार कपड़े उसमें ठूँस दरवाजे की ओर जा बढ़ा। उसका ऐसा रूप पहले कभी सोनम ने नहीं देखा था। वह व्याकुल हो उठी थी, जैसे जल बिन मीन। अपने डाक्टर को मनाने के लिए वह दौड़ कर उसका बाँह पकड़ अपनी ओर खींचते  हुये अत्यधिक वेदना भरे स्वर में कहती है- " लाला, त्योहार के दिन ऐसे रुठे जा रहे हो ! कैसा निर्दयी है रे ! यह भी नहीं सोचा इस घर में मेरा क्या होगा?"


   पहली बार लाल जोड़े में सादगी भरा श्रृंगार कर सोनम सकुचाते हुये उसके समक्ष सिर झुकाये आ खड़ी होती है। उसका पवित्र मुखमंडल सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहा था। उसका ऐसा भव्य स्वरूप देख सुशांत के का अंग -प्रत्यंग रोमांचित हो उठा था। उसे सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वही जीवनदायिनी  ,प्राण- पोषणी देवी उसके समक्ष खड़ी है, जिसका स्वप्न वह देखा करता है।जिसपर वह अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर है। इस तनमन अवस्था में उसे स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति हो रही थी। वह कहता है- "क्या दर्पण में कभी स्वयं को देखा है ? साक्षात देवी दुर्गा का प्रतिबिंब लग रही हैं आप। याद रखें यह मानव जीवन वेदना की मूर्ति बनने के लिए नहीं है। समय और भाग्य के अत्याचार से हम मुक्त हो चुके हैं।"  सोनम गूँगी  गुड़िया की तरह जड़वत खड़ी रही। "अरे ! चलना नहीं है कि बस यूँ ही समय व्यतीत करते रहेंगे हम। एक बार बोल दिया न ,मार्ग में कोई नाक-सिकोड़े हमें फ़र्क नहीं पड़ता।"


    देर रात तक सोनम को वह कोलकाता के मशहूर दुर्गा पांडालों में घुमाता रहा। भव्य पांडाल ,पूजा की पवित्रता,रंगों की छटा,तेजस्वी चेहरों वाली देवियाँ,धुनुची नृत्य, सिंदूर खेला और भी बहुत कुछ दिव्य और अलौकिक दृश्य वर्षों बाद देख वह अचम्भित-सी रह जाती है,मानो किसी नयी दुनिया की सैर कर रही हो, क्योंकि बीते तमाम वर्षों में उसका सफर घर से नर्सिंग होम तक ही रहा। पांडालों में जनसमुदाय उमड़ा हुआ था। इतनी भीड़ देख कर बिछुड़ जाने के भय से उसने सुशांत के बायें हाथ को कस कर पकड़ रखा था। ऐसे सौंदर्य,लज्जा, स्नेह,गर्व और विनय की देवी को सुशांत भी भला क्यों खोना चाहेगा ? घर लौटते समय उसने सोनम को उसके उसका मनपसंद  बंगाली मिष्ठान 'संदेश' खिलाया था। मेले की थकान से उसका शरीर शिथिल अवश्य पड़ गया था ,परंतु सदैव उदास रहने वाला मुखड़ा खिल उठा था। शुष्क आँखों में रोशनी थी। अब-तक अनजाने मोह से जूझ रहा उसका हृदय कुछ कहना चाहता था, फिर भी वह मौन रही।

   सुशांत दृढ़ चित्त मनुष्य था। उसे देवी प्रतिमा के समक्ष यह संकल्प लिया था कि सोनम की सूनी मांग उन्हीं की तरह लाल सिंदूर से भरी होगी । यह दीवाली उनके लिए विशेष होगी। 

वह जनाता था कि ऐसा हृदय कहाँ,जिसे प्रेम न जीत सके। प्रेम में फैली हुई बाँहों का आकर्षण भला किस पर न हुआ हो। वह इस तथाकथित सभ्य समाज को यह संदेश भी देना चाहता था कि यदि अधिक उम्र के लड़कों से लड़कियों को विवाह दिया जाता है,तो विशेष परिस्थितियों में वर से यदि कन्या ज्येष्ठा हो तो उसे भी वही मान मिलना चाहिए। सोनम को वह तब से चाहता था, जबसे स्वयं उसने यौवन की दहलीज पर पाँव रखा था। बस उसे अपने आत्मनिर्भर होने की प्रतीक्षा थी। ताकि वह सोनम को ढेरों खुशियाँ दे सके। उन दोनों के मध्य जो पवित्र रिश्ता रहा, उसे अब वह एक नाम देना चाहता है।  


     उधर, सोनम उसकी मंशा अनभिज्ञ थी। अपने लाला के प्रति उसके मन में शुद्ध स्नेह तो था, किन्तु स्वार्थ नहीं। उसने यह कल्पना तक नहीं की थी सुशांत कभी इसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखेंगा। वह स्तब्ध थी, आवेश में कहती है-"लाला ,क्या तू मेरी जगहँसाई करवा के रहेगा ?" किन्तु सुशांत निस्संकोच भाव से उसके हर प्रश्न का उत्तर दिये जा रहा था। वह कहता है - "मैंने एक नारी के सारे भाव मातृत्व, पत्नीत्व, गृहिणीत्व आपमें देखा है। मेरे लिये स्त्री कुत्सित वासना का माध्यम  नहीं है। वर्षों से साथ में हूँ,क्या आपको कभी मेरे आचरण में खोट नज़र आया?"उसके अधिकार भरे शब्दों में प्रेम का  गंगाजल छलक रहा था । उसकी मनोदशा देख सोनम को भी जीवन का मनोहर राग सुनाई देने लगा था। आँखों से प्रेम की किरणें निकलने लगी थीं। देखते ही देखते प्रेम से दोनों विह्वल हो उठे थे।मानो प्यासे को ठंडे जल की झील गई हो । संकोच की दीवार टूट चुकी थी।इसे सोनम की सहमति समझ सुशांत यह मधुर गीत गुनगुने लगता है-


ना उम्र की सीमा हो,ना जन्म का हो बंधन।

जब प्यार  करे कोई , तो देखे केवल मन।


    उधर, सोनम ! वह तो अपने पिया के रंग में रंगी जा रही थी। वीरान  घर में पवित्र अनुगूँज फिर से गूँजने लगी थी। किसी ने सत्य ही कहा है- "जब भी जीवन में सुनहरा पल आपके सामने हो उसके स्वागत से मुँह मत मोड़ो। छूट गया तो वापस नहीं आएगा।" और सोनम इस सच से अब नज़रें नहीं चुराना चाहती थी।

-व्याकुल पथिक

Wednesday, 23 September 2020

कर्मफल

 


कर्मफल

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जीवन के रंग

     पितरपख का महीना चढ़ते ही गनेशू सेठ स्वर्गलोक सिधार गये। उन्होंने न किसी की सेवा ली न दवा-दुआ ! इतवार की सुबह आरामकुर्सी पर बैठे-बैठे ही प्राण पखेरू उड़ गये। मुख में तुलसी-गंगाजल डालने का अवसर भी प्रियजनों को नहीं दिया। उन्हें इसकी ज़रूरत भी नहीं थी,ताउम्र अपने व्यवसाय को ही देवता समझ जो पूजा था। दाँतों से दमड़ी पकड़ने की कला में वे पूरे इलाके में विख्यात, यूँ कहें कुख्यात थे।जीवन के आखिरी दिनों तक दुकान में आसन जमाये रहे। पुत्र ने धंधे में तनिक भी उदारता बरती नहीं कि ग्राहकों के सामने ही लगते नसीहत देने । घंटों व्यापार की रीति-नीति समझाते।व्यवसाय में संबंधों की उपेक्षा की बात कहते। चंदा-सहयोग माँगने वालों को ढ़ोंगी बता, उनसे सावधान करते। यह भी उपदेश देते कि कुशल बनिया वो ही है,जो धंधे में पराई पीड़ा को अपने दिल से न लगाता हो। सेठजी स्वयं तो दर्शन-पूजन , दान-पुण्य एवं व्रत-उपासना से दूर रहते और यदि घर-दुकान में एक अगरबत्ती से अधिक बेटे-बहू ने सुलगायी नहीं कि ऐसा शोर मचाते मानो खजाना लुट गया हो। उनकी बस एक ही आकांक्षा थी--घर आयी लक्ष्मी तिजोरी से बाहर न जाए, इसीलिए उन्होंने न तो कभी अपने संकीर्ण हृदय का विस्तार किया और न ही संचित धन का धर्म-कर्म और समाजसेवा जैसे कार्यों में सदुपयोग ।


   उनका धन-लक्ष्मी से अत्यधिक स्नेह स्वभाविक था।जिसकी कृपा से वे गनेशू से सेठ गनेश प्रसाद बने थे। जब-तक जीवित रहें मुग्ध नेत्रों से अपने खजाने को तौलते रहे। धन देखते ही उनके हृदय में हिलोरें उठने लगतीं।आनंद से रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठता। बचपन में एक साइकिल तक को तरसने वाले सेठ की कोठी की शोभा अब बाहर खड़ी महंगी मोटरगाड़ी बढ़ाने लगी थी। शहर के उन चंद उद्यमियों में उनका नाम मिसाल था, जिन्होंने अपने पुरुषार्थ से विरासत में मिली बंजर भूमि पर सोने की फसल उगाई थी। फिर भी उनसे ईर्ष्या करने वालों की कमी नहीं थी। उनका सबसे बड़ा शत्रु यह कंजूसी ही थी। जिसे वे खुद के अमीर होने का राज समझते।धीरे-धीरे बेटे-बहू भी उनके रंग में ढलते गये। कृपणता के मामले में बाप-बेटे का रिश्ता लक्खीमल-करोड़ीमल जैसा था। घर के मुखिया के रूप में वे सर्वमान्य रहें,पूरा परिवार उनके इशारे पर चलता था।


      योग्य उत्तराधिकारी पाकर सेठ को विश्वास हो गया था कि ऐसे पुत्र के रहते उनकी दौलत पर समाज का कोई भी परोपकारी प्राणी डाका नहीं डाल सकता। फिर भी मन में जिसे लेकर आशंका थी, वह था उनका पौत्र भोंदू। तीन बहनों के बाद जब उसका जन्म हुआ था, तो सेठ ने यह कह कर किसी विशेष आयोजन पर पहरा बैठा दिया था कि लड़का जब-तक पाँच साल का नहीं हो जाए, उसके जन्म की खुशी में कोई भी उत्सव घर में नहीं होगा। लेकिन बच्चे के ननिहाल से आये ढेरों उपहार की गिनती करने वे स्वयं दरवाजे पर जा डटे। बच्चे की तीनों सगी बुआ भी अपने पिता की इस कंजूस पर तुनक उठी थीं।जिस कारण अनेक दिनों तक उन्होंने मायके की ओर झाँका भी न था । बच्चे के जन्म पर मायके से कीमती उपहार मिलने की उम्मीद जो टूट चुकी थी। ऐसे शुभ कार्यक्रमों में बुआओं का हक-पद बनता ही है।पिता की कंजूसी से उनकी ये अभिलाषा धरी रह गयी थी।


  वैसे भोंदू बच्चे का असली नाम नहीं था। हाँ, गनेशू उसे भोंदू कह इसलिए पुकारते ,क्योंकि वह अपने बाप-दाद की तरह धन-संग्रह की प्रवृत्ति से दूर था।जब-तब चोरी-छिपे अपने जेबख़र्च से ग़रीब सहपाठियों का सहयोग किया करता था। धन के संबंध में उसकी यह उदारता भला कंजूस सेठ को कैसे सहन होती,जिसने अपने जीवनकाल में भूल कर भी मदद के नाम पर किसी को फूटी कौड़ी न दी हो।इसलिए उन्होंने अपने कुलदीपक को धन-संचय संबंधी नसीहत देने के लिए अपनी पाठशाला में बुला लिया। बच्चे के समक्ष दानशीलता के दुर्गुण पर  घंटों व्याख्यान देते। घर आये अतिथि को शनिदेव समान बताते। ऐसी विपत्ति से निपटने के लिए उन्होंने जिन युक्तियों का सहारा लिया था, यह सब सबक भोले बालक को रटाते। उसे बार-बार  चेताते - "बेटे, यही मेरी अमीरी का राज है। इस फ़न में तेरा बाप भी पक्का है। अब तेरी बारी है ।"


    गनेशू सेठ में इस कंजूसी के अतिरिक्त कोई बुराई नहीं थी। मुहल्ले में हर कोई इसका साक्षी है कि उसने धूर्तता से यह धन अर्जित नहीं किया। उन्होंने किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया,किसी की शिकवा- शिकायत नहीं की।उनकी आँखों में तो उनका धंधा नाचता रहता,अन्य कार्यों के लिए वक़्त कहाँ था ? वे हर उस व्यक्ति की दृष्टि में शांतिप्रिय थे, जो उनकी तिजोरी पर बुरी नज़र नहीं रखता था। किन्तु कंजूसी के काले रंग पर और कोई रंग चटख हो भी तो कैसे , इसीलिये शुभचिंतकों में सेठ के सूमपना के किस्से उनके जीवनकाल में ही मशहूर थे। उनके सारे गुणों पर यह एक अवगुण भारी था।


   तो फिर सेठ की ऐसी सुखद मृत्यु उनके किस कर्मफल का पुण्य-प्रताप था ? मुहल्ले-टोले में इसीपर  नयी बहस छिड़ी हुई थी। आखिरकार बूढ़े भगेलू भगत से रहा नहीं गया- "भगवान के दरबार में यह कैसा अंधेर है ? इस पापात्मा को ऐसी सद्गति !" "हाँ भईया ,गज़ब कलयुग है ! जिसने कभी एक दमड़ी परोपकार पर ख़र्च नहीं किया,उस बूढ़े को ऐसी सुखद मौत!"-गंगा स्नान कर लौटी श्याम दुलारी काकी का स्वर भी कम कसैला नहीं था। यूँ समझे कि सेठ का स्वर्गारोहण उसपर सदैव तंज़ कसने वालों के रंज का कारण बन गया था।


      गनेशू सेठ की पुत्रियों का ससुराल दूर था। उनके आने के पश्चात कृत्रिम शोकाकुल वातावरण में अंतिम संस्कार की क्रिया पूर्ण हुई। अब रात्रि हो चुकी थी। नाते-रिश्तेदार अपने घरों को लौट गये थे। फुर्सत मिलते ही सेठ की बहू ने अपने पति  से कहा- "अजी सुनते हो ! बाबूजी कितने पुण्यात्मा थे, जो पितरपख में ऐसी सुखद मृत्यु मिली ? मैं तो इतना ही चाहती हूँ कि वे जहाँ भी हों ,अपनी छाया हमपर बनाए रखें। कुछ भावुक सी हो गयी थी सुमन।

   " हाँ, भई! मरे भी तो रविवार बंदी के दिन, व्यापार को भी क्षति नहीं पहुँची। यदि और दिन जाते तो दुकान जो बंद करनी पड़ती। " सेठ के लायक पुत्र ने पत्नी की ओर देख अपनी सहमति जताते हुये कहा।

   "अरे हाँ, वे तो कोरोना संक्रमणकाल में गये हैं। ऐसे में तेरही भोज की बस औपचारिकता ही हमें निभानी है।ऐसे नाज़ुक वक़्त में किसी के दरवाजे आता कौन है ?अन्यथा बड़ा आयोजन करने में डेढ़-दो लाख गल जाते, जिसे देख उनकी आत्मा भी दुःखी होती,किन्तु देखो जी, पिताजी ने मरते दम तक हमारा कितना ख्याल रखा।"

    मुदित मन से सेठ की पुत्रवधू ने जैसे ही अपनी बात पूरी की ही थी कि सामने भोंदू को खड़ा पाया। जिसकी दृष्टि निरंतर उस कूड़े के ढेर पर टिकी हुई थी। जिसपर बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्लियाँ पड़ी हुई थीं।सुबह इसी पर उसके दादा का पार्थिव शरीर रखा गया था। वह उस ओर संकेत कर सवाल करता है - " वह तो ठीक है माँ,परंतु यह बर्बादी क्यों ? सैकड़ों रुपये की सिल्लियों को आपने कूड़े में फेंक दिया ! और आप दोनों कहते हो कि दादाजी हमें आशीर्वाद दें! अरे ! उनकी आत्मा रो रही होगी, धन की ऐसी बर्बादी पर।"


  तनिक ठहर कर भोंदू ने फिर कहा - " और सुनो माँ , जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तो आप दोनों कोरोना से मरना। मुझे न तो इन सिल्लियाँ पर पैसे खर्च करने पड़ेंगे और ना ही आपके क्रियाकर्म पर। सुना है कि यह काम सरकार अपने पैसे से करती है। हाँ माँ, तब दादा जी कितने खुश होंगे मुझ पर, आप दोनों से भी अधिक और उनकी अधूरी आकाँक्षा पूर्ण हो जाएगी,तभी उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। है न पिताजी ! "


  अपने इकलौते पुत्र के ऐसे विचार जानकर अज्ञात भय से सिहर उठे थे वे दोनों। उनका मुख मलिन पड़ गया था पुत्र के शब्द तीर की भाँति मर्म- स्थल को छेद गये ।दानशीलता को सबसे बड़ा अवगुण समझने वाले गनेश सेठ ने जिस अच्छे दिन का सृजन अपने परिवार के लिए किया था,उसी कृपणता ने उनके परिवार की संवेदनाओं का इस प्रकार हरण कर लिया था कि बारह साल का मासूम बालक पैसे बचाने के लिए अपने माता-पिता को कोरोना से मरने की बात कर रहा है। क्या धन का लोभ मानव की आत्मा को इतने नीचे गिरा देता है ? किसी ने उचित ही कहा है-"बाढ़ै पूत पिता के धर्मे।"


    गणेश सेठ तो चले गये,किन्तु धन-संग्रह के प्रति उनकी अत्यधिक लालसा उनके परिवार का कर्मफल बन उसके उज्जवल भविष्य को निगलने  बढ़ी आ रही है। संभवतः इसे ही प्रारब्ध कहते हैं। जो पूर्व जन्म का संचित कर्म नहीं होता,वरन् इसी जन्म में स्वयं अथवा अपनों के द्वारा किये गये कर्म का फल है। संबंधित व्यक्ति अथवा उसका परिवार इसके दंड से अछूता नहीं है।इसलिए इस दम्पति को ऐसा लग रहा था मानो उनका अपना पुत्र ही दंड हाथ में लिए न्याय का देवता शनि बना सामने खड़ा हो...!

 

  तभी उन्हें फ़क़ीर बाबा की वही चिरपरिचित आवाज़ सुनाई पड़ती है। बाबा सेठ की दुकान पर आया करते थे। अपनी आदत के अनुसार बाप-बेटे दोनों ने ही कभी फूटी कौड़ी भी उन्हें न दी थी। और बाबा यह कह आगे बढ़ जाते थे-" ना घर तेरा ना घर मेरा चिड़िया रैन बसेरा।" 


    सेठ गनेश प्रसाद के साथ भी यही हुआ,जिस दौलत को उन्होंने आजीवन हृदय से लगाए रखा ,दबे पाँव आयी मौत ने इतना अवसर भी नहीं दिया कि वे मृत्युलोक से प्रस्थान के पूर्व  अपनी तिजोरी में संचित उसी सम्पत्ति को अंतिम बार जीभर कर देख लेते।


   - व्याकुल पथिक



Wednesday, 16 September 2020

दुःख! तुम लौट आओ

 दुःख! तुम लौट आओ


( जीवन के रंग)

 दिन भर अंगार बरसाने के बाद आसमां ने नीलिमा की भीनी चादर ओढ़ ली थी। जलती धूप से राहत मिलते ही लोकबाग खरीदारी अथवा मनोरंजन के लिए घर से निकल पड़े ,जिससे बाज़ारों में रौनक छा गयी। फलों की दुकानों पर लंगड़ा और दशहरी आम के खरीददारों की भीड़ लगी हुई थी। इस वर्ष मौसम अनुकूल होने से फलों का राजा आम ख़ास ही नहीं आमजनों के लिए भी सुलभ था। इन दुकानों पर निम्न-मध्य वर्ग के ग्राहकों को देख दीपेंदु का मन हर्षित हो उठा था। 


    यूँ तो आम हो या लीची उसकी स्वयं की स्वादेन्द्रिय इनके लिए अब कभी नहीं तरसती-तड़पती है । उसे तो यह भी नहीं पता कि पर्व-उत्सव के दिन कब निकल जाते हैं। वह पेट की आग बुझाने के लिऐ जैसे-तैसे कुछ भी बना-खा लेता है। जिह्वा पर नियंत्रण पाने में परिस्थितियों ने उसकी भरपूर मदद की है। थाली में पड़ीं कच्ची-पक्की रोटियाँ और उबली सब्जी उसके लिए पकवान समान हैं । जीवन की धूप-छाँव से दीपेंदु नहीं घबड़ाता, क्योंकि वह समझ चुका है कि जीवन की महत्ता वेदनाओं और पीड़ाओं को हँसते-हँसते सह लेने में है।


     फिर भी आज न जाने क्यों इन आमों के देख अतीत से जुड़ी अनेक घटनाओं का स्मरण हो आया । इस आनंद-स्मृति में उसे गुदगुदी-सी होने लगी। बात तब की है,जब वह अनाथ नहीं था। उसका अपना छोटा-सा घर था। माता-पिता और भाई-बहन संग थे। परिवार के सदस्यों में कितना स्नेह था, संवेदनाएँ थीं, सच्चाई की झंकार थी। सहानुभूति, दया और त्याग जैसे गुणों के कारण आनंद और उत्साह दो मासूम बच्चों की तरह उसके घर-आंगन में किलकारियाँ भरा करते। उसके परिवार में यदि कुछ नहीं था तो वह थी लक्ष्मी की कृपा। जिसका सामना उसका परिवार बड़े धैर्य के साथ कर रहा था। उन दिनों उसके पिता अपनी शिक्षा की डिग्री लिये नौकरी की तलाश में बनारस जैसे शहर में चप्पलें घसीट रहे थे। जीविका के लिए कोई ठोस आश्रय नहीं था। पुरुषार्थ कर के भी लक्ष्मी को प्रसन्न नहीं कर पाने का उन्हें दुःख था। बिना किसी जुगाड़ के नौकरी उस जमाने में भी इतनी ही दुष्प्राप्य थी, जितना की अब है। 



    धन के अभाव में दरिद्रता का दारूण दृश्य उत्पन्न हो गया,फिर भी परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के प्रति समर्पित थे। मिल कर दुःख बाँटने से कोई पीछे नहीं हटता। उसके परिवार की खुशी का यही राज था। दीपेंदु की माँ बड़े घर की बेटी थी। ससुराल के अभावग्रस्त जीवन ने उन्हें विचलित अवश्य किया, किन्तु शीघ्र ही परिस्थितियों के अनुकूल उन्होंने खुद को ढाल लिया। वे कोयल और शक्कर के अभाव में छत पर गिरे बरगद के सूखे पत्तों से अँगीठी सुलगा गुड़ के चूरे से चाय लेतीं,लेकिन उनके मुख से उफ ! किसी ने नहीं सुना। पति-पत्नी गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए दस-पाँच पैसे तक का हिसाब रखते। हर रात्रि जब वे ख़र्च पर नियंत्रण के लिए डायरी लेकर बैठते माथे पर चिन्ता की लकीरें और गहरा जातीं । हृदय-पीड़ा आँखों में न समाती और प्रभात होते ही बच्चे रट लगाने लगते - "मम्मी! भूख लगी है। नमक-रोटी दो न।"  ज़िगर के टुकड़ों की यह करुण पुकार सुनकर नित्य नयी चुनौतियों के साथ उनकी दिनचर्या शुरू हो जाती। किन्तु जीवन के इस संघर्ष में किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी। आशा का झिलमिलाता दीपक बुझने नहीं पाए इसके वे लिए एक-दूसर के मनोबल को ऊँचा रखते।


      दीपेंदु को भलिभाँति याद है कि इस विपत्ति में भी उसके परिवार में भाग्य का रोना नहीं था। उन तीनों बच्चों के लिए घर में होली, दीपावली और दशहरा जैसे पर्वों पर पकवान बनते। पूड़ी-कचौड़ी, दहीबड़ा-कांजीबड़ा और मगदल वे तीनों भाई-बहन त्योहारों पर छककर भोजन करते, क्योंकि ऐसे स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए उन्हें अगले किसी उत्सव की प्रतीक्षा जो करनी पड़ती थी। पर्वों पर रुपये-आठ आने के पटाखे अथवा रंग-अबीर उसके पिता लाना नहीं भूलते। पर्वों पर नये वस्त्र नहीं बने तो क्या हुआ,वे ऐसे स्वच्छ पोशाक पहनते , जिसे देख अड़ोस-पड़ोस के बच्चे यह नहीं कह सकते थे -" तुम बहन-भाइयों ने होली पर पुराने कपड़े पहन रखे हैं।" और हाँ, खिचड़ी(मकर संक्रांति) पर्व पर उन तीनों बच्चों के लिए माँ चूड़ा-लाई और गुड़ से निर्मित कनस्तर भर लड्डू बनाना कैसे भूल जातीं। बच्चों से ही तो सारे उत्सव हैं। 


  "वाह! घर के बने पकवान कितने स्वादिष्ट थे ! कितना स्नेह छिपा था इनमें।" बचपन के उन दिनों का स्मरण होते ही दीपेंदु का हृदय पुलकित हो उठा था। वे भी क्या दिन थे,जब दस पैसे की चाय लेने वह भागा-भागा उस खंडहरनुमा मकान में नीचे से ही चायवाले काका को पुकारते घुस जाता था।स्नेहवश वे मखनहिया दूध से बनी अपनी चाय से उसका गिलास भर देते थे। घर लौटते ही माँ उसे ढेरों आशीष देते न थकती।वह स्वयं से वार्तालाप में कुछ इस कदर खो-सा गया था कि सड़क पर हो रहे शोर-शराबे और मोटर-गाड़ियों की आवाज़ तक उसे नहीं सुनाई दे रही थी। 


     पिताजी को अपने रिश्तेदारों से  मदद लेना पसंद न था।घर की आर्थिक स्थिति को देख दीपेंदु समय से पहले समझदार हो गया था, इसीलिए त्योहार मनाने में उसके गुल्लक का भी छोटा-सा योगदान हुआ करता था। मिट्टी का शिवलिंग बना तो कभी आसमान से कट कर छत पर आ गिरीं पतंगों को आकर्षक बना कर वह मुहल्ले के दो-चार बच्चों को बेच दिया करता था। यदि कभी किसी हितैषी ने चार आने भी दिये तो उसे चाट-पकौड़ी में उड़ाने की जगह इसी गुल्लक में सहेजता । खिलौनेनुमा प्लास्टिक का यह गुल्लक ननिहाल में उसे बैनर्जी दादू ने दिया था। जो अब यहाँ बचत का महत्व समझा रहा था। यदि किसी पर्व पर जब कभी उसकी माँ के गहने,बरतन, साड़ी और पुराने उपन्यास बिके थे, तो उससे पहले उसका गुल्लक खाली होता था। ऐसा कर उसे खुशी मिलती थी। हर्ष-विषाद युक्त हृदय से उसके माता-पिता आपस में चर्चा करते - "हमारे ये बेसमझ बच्चे कितने बुद्धिमान हो गये हैं!हम क्या इन्हें कभी खुशियाँ नहीं दे पाएँगे ?"


     अरे हाँ ! याद आया, दूर्गापूजा पर पूरे परिवार के साथ वह शहर के पांडालों की सजावट देखने निकलता तो कबीरचौरा पर हलवाई की उस दुकान से लिये गये लौंगलता की मिठास वर्ष भर कायम रहती थी और होली पर बंगाली टोला के रसगुल्ले को कैसे भुला सकता है वह। जिसे खरीदने के लिए रिक्शे के पैसे की बचत की जाती। पाँव थक जाते, परंतु चेहरे पर मुस्कान होती। लाटभैरव के नक्कटैया की रात घर में पहली बार रेवाड़ी-चूड़ा पिताजी लेकर आते। वे तीनों बच्चों को मध्यरात्रि लाग और चौकियाँ दिखलाने ले जाते। 


   "अहा ! धनाभाव में सुख से भरे उन दिनों पर सारे धन-दौलत न्योछावर है।" दीपेंदु अपने उस दुःख भरे सुनहरे दिनों के स्मरण-लोभ में डूबता ही जा रहा था। उसे याद है कि उन बच्चों के जन्मदिन पर केक और मिष्ठान मंगाने में अभिभावक  असमर्थ थे, किन्तु चावल-दूध की खीर का भगवान को भोग लगाया जाता था। मेवे, इलाइची और केशर के सुंगध न सही,इसमें प्रेम की अद्भुत मिठास घुली होती थी। प्रसाद तो वैसे भी अमृततुल्य हो जाता है। सावन में ठेकुआ  चढाने वे सभी दुर्गाजी और मानस मंदिर जाते। मार्ग में लिये गये दो- तीन भुट्टे में ही पूरे परिवार की आत्मा तृप्त हो जाती थी। इनको खरीदने के लिए पैसे की व्यवस्था पहले से करनी पड़ती थी। फिर भी वे सभी कितने खुश थे।

 

   और उस दिन जब माँ ने नज़रें नीचे कर पिताजी से कहा था -"सुनते हैं ! बच्चों ने इस बार आम नहीं खाया है। वैसे,इसके लिए वे जिद्द नहीं करते,किन्तु यदि हो सके तो..।" वेदना से भीगे इस स्वर को सुनकर उसके पिता ने दुःख भरी दृष्टि से उसकी माँ को देखा था और फिर उन दोनों की गर्दन झुक गयी थी। उसी रात जब वे काम से लौटे तो उनके रुमाल में कुछ बँधा हुआ था। अत्यधिक उमस से बेचैन दीपेंदु को नींद नहीं आ रही थी।तभी उसने देखा कि माँ उन आमों के गले और सड़े हुये हिस्से को अलग कर रही थीं। एक सभ्रांत परिवार की स्त्री के लिए ऐसा करना लज्जाजनक था। डबडबा उठीं अपनी आँखों को उन्होंने बड़ी सफाई से बच्चों से छिपा लिया।



   दीपेंदु समझ गया कि पैसे के अभाव में उसके पिता ने अपने स्वाभिमान और प्रतिष्ठा को ताक पर रख उन बच्चों के लिए उस ढेर में से कुछ आम छाँट लाये थे,जिन्हें दुकानदार सड़ा-गला और गुलगुले समझ अलग रख दिया करते थे। ग़रीब-गुरबे कम दाम पर इन्हें खरीद ले जाते। यह देख उस नासमझ बालक का हृदय में कंपन-सी उठी थी । उसे ऐसा आभास हुआ कि इन दागी आमों की मिठास ने उसकी आत्मा हमेशा के लिए तृप्त कर दी हो। अब भला बाज़ार में बिक रहें आमों में वह रस कहाँ? इन्हें खिलाने वाले वे अपने प्रियजन कहाँ ?


     जिस दुर्लभ निधि के स्मरण-मात्र से उसे परमसुख की अनुभूति हो रही थी।नस-नस में बिजली-सी दौड़ आयी थी। वह समझ गया है कि दुःख तो जीवन का सबसे बड़ा रस है,जो सबको माँजता है, सबको परखता है। हृदय में जमा यही बूँद-बूँद दर्द मानव की मानसमणि है। इसे संभाल कर रखना चाहिए। क्योंकि सुख के आते ही उसका परिवार बिखर गया था, संवेदनाओं के तंतु कमजोर पड़ गये थे और महत्वाकांक्षा ने आपसी संबंधों के मध्य दीवार खड़ी कर दी थी। काश ! दुःख के वे ही दिन  वापस लौट आते। उसके एकाकी जीवन में फिर से स्नेह रूपी पीयूष-वर्षा होती। दीपेंदु अपने नेत्रों से बह चले अश्रु प्रवाह को नहीं रोक पा रहा था।


-व्याकुल पथिक


 


Wednesday, 9 September 2020

औक़ात

औक़ात
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  अरुण दा अब हमारे बीच नहीं रहें। कोरोना संक्रमण ने शोषित-उपेक्षित वर्ग के हक़-अधिकार के लिए ताउम्र संघर्ष करने वाले इस सादगी पसंद राजनेता को जिस दिन अपने गिरफ़्त में लिया,उसी दिन यह आशंका गहरा गयी थी कि  दादा का उसके खूनी पंजे से बचना संभव नहीं है। उनके शरीर में पहले से ही वे सारे रोग मौजूद थे,जिसके गृह में प्रवेश करते ही कोरोना की मारक क्षमता प्रबल हो जाती है, इसलिये उन्हें बचाया नहीं जा सका। तमाम छोटे-बड़े श्रमिक आंदोलनों में कभी मेघ-गर्जना करने वाले इस महान आत्मा के निधन पर मानो पूरा शहर शोकाकुल हो उठा था। एक सच्चे जनसेवक के लिए इससे बड़ी और क्या श्रद्धांजलि होगी ? मृत्यु तो जीवन का अंतिम सत्य है। प्राणी चाहे कितना भी सामर्थ्यवान हो, किन्तु मृत्युदेवी के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण करना ही पड़ता है।

      वैसे, उम्र के इस पड़ाव पर उनकी राजनैतिक गतिविधि शिथिल पड़ गयी थी, किन्तु इस शहर में दबंग राजनेता के रूप में उनकी वही पुरानी पहचान कायम थी। वे किसी पद-प्रतिष्ठा के मोहताज नहीं थे। उन्होंने विलासिता के जाल में फँस कर अपने संस्कारों को कभी गिरने नहीं दिया। सफेद मोटा कुर्ता पहने कद-काठी से मज़बूत इस शख्स में न जाने कौन-सा ऐसा जादू था कि उसकी एक आवाज़ पर असंगठित मज़दूर  तबके के लोग अनुशासित सिपाहियों की तरह एक मंच पर आ जुटते थे। जो अरुण दा को देवता समझते , उनकी पूजा करते और उनके लिए प्रचंड शासन-शक्ति से भी टकरा जाते थे। 

     अरुण दा जब कालेज में पढ़ते थे, तो उन्होंने अपनी छात्र राजनीति को श्रमिक वर्ग के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया था।  किसकी मजाल  कि किसी मज़दूर को मजबूर समझ वह उसका गला हलाल कर दे ? दादा की युवा फ़ौज उस पर हल्ला बोलने को तत्पर रहती थी। विधाता ने उन्हें अच्छी कद-काठी , अक्खड़पन के साथ कड़क आवाज़ भी दे रखी थी। वैसे भी जो व्यक्ति अपने ईमान पर डटा हो, उसे किसी प्रलोभन से डिगाना हँसी खेल नहीं होता है। मजदूरों के इस मसीहा पर आँखें तरेरने का मतलब था --'बर्रे के छत में हाथ डालना !' इसलिये धनबल और बाहुबल से यहाँ काम नहीं लिया जा सकता था। धनिकों का जुगाड़ तंत्र भी बेमानी था, कौन अफ़सर चाहेगा कि ऐसे आंदोलनकारी से बेज़ा उलझकर  नगर की शांति भंग होने दिया जाए।  और फिर तबादले से बचने के लिए वह 'कुर्सी पकड़' में अपनी ऊर्जा व्यर्थ करे। 

      उनकी राजनीति जब चटकी तो सोशलिस्ट संगठनों ने आगे बढ़ कर सलामी ठोकी थी। राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का सानिध्य प्राप्त हुआ और इसतरह से उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन इसी श्रमिक वर्ग को समर्पित कर दिया था। ऐसे तबके के प्रति उन्हें सच्चा प्रेम था और इनके साथ अन्याय होने पर उनका हृदय तिलमिला उठता था, क्योंकि अन्य राजनेताओं की तरह ये सब उनके लिए 'वोट बैंक' नहीं थे। जिसका परिणाम यह रहा कि ऐसे अभागों पर अत्याचार कर जो लोग हँसते और तालियाँ बजाते थे, वे सब सहम उठे थे। 
   
     किन्तु सियासत में साफ़गोई भला कहाँ चलती है। यहाँ तो बगुला भक्त बन उन्हीं मछलियों को गटकना होता है, जो उसपर विश्वास करती हों। सो,इन ग़रीबों संग दग़ाबाज़ी वे कैसे कर सकते थे, इसीलिये सिद्धांत विहीन राजनीति करने वाली पार्टियों संग उनकी विधि न बैठ पायी। वे फिर से एकला चलो रे.. की डाक लगाने लगें। अब तरुणाई ढलने लगी थी। यहाँ तक की अपना घर भी नहीं बसाया ,क्योंकि उनका मानना था कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा यह वर्ग ही उनकी संतान है। जिनके लिए उन्हें कुछ करना है।

       अपने देश की सियासत का हाल यह है कि पूरे पाँच वर्षों तक बड़े राजनैतिक दलों के जनप्रतिनिधियों को कोसने वाली जनता को जब भी अपना प्रतिनिधि बदलने का अवसर मिलता है, तो वह फिर से दल, जाति और मजहब के मकड़जाल में उलझ जाती है। उसकी मति मारी जाती है, क्योंकि अगले पाँच वर्षों तक उसे पुनः हाय-हाय करने की आदत-सी पड़ चुकी है। अपनी जनसेवा के बल पर किसी निहंग द्वारा आम चुनाव जीतना इस अर्थयुग में चमत्कार से कम नहीं है। जनता की इसी कमजोरी का लाभ उठा कर धनबल, बाहुबल और जातिबल से संपन्न लोगों ने लोकतंत्र को जुगाड़तंत्र में बदल रखा है। जिस कारण सफ़ेदपोश जनता के लिए काम करने वाले सच्चे राजनेताओं को उनकी औक़ात जनता की अदालत में ही बता देते हैं, ताकि उसका मनोबल इसप्रकार से टूट जाए कि या तो वह राजनीति से सन्यास ले ले अथवा उन जैसे गिरगिट लोगों की टोली का हिस्सा हो ले। 

   किन्तु उस वर्ष म्युनिसिपैलिटी के इलेक्शन ने इतिहास बदल दिया था । बात सन् 1995 की है। निहंगों की फ़ौज को न जाने क्या सूझी कि उसने अपने प्रिय नेता का राजतिलक करने की ठान ली । चेयरमैन के उम्मीदवार के रुप दादा के नाम की घोषणा होते ही शहरी राजनीति में वर्चस्व रखने वाले एक दल के नेताओं ने उपहास किया था-"अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। इस चुनाव में उसे अपनी औक़ात समझ में आ जाएगी ।"

       उनका कहना अनुचित न था। एक और विशाल संगठन और उसके पारम्परिक समर्थक और दूसरी ओर मुट्ठी भर लोग। न कोई संगठन- न पार्टी। सबसे कठिन कार्य तो यह था कि घर-घर जाकर अपरिचित चुनाव चिन्ह की पहचान करवाना। और तभी श्रमिक वर्ग का सिंहनाद सुनाई पड़ा था- "अरुण नहीं,यह आँधी है, मीरजापुर का गाँधी है ।" इक्के, ठेले, रिक्शे और खोमचे वालों से लेकर हर मजदूर की जुबां पर सिर्फ़ यही जुमला था। देखते ही देखते ये मज़दूर मजबूर नहीं मज़बूत दिखने लगें ।  वज्रपात-सा हुआ था प्रतिद्वंद्वियों पर। चुनाव परिणाम जब आया तो औक़ात बताने वालों को खुद अपनी औक़ात समझ में आ गयी थी।

     यह चेयरमैन पद उनके जीवनभर की कमाई रही। जनता ने इस विश्वास के साथ उन्हें मीरजापुर का प्रथम नागरिक बनाया था कि जो व्यक्ति पूर्णतया निःस्वार्थ है,जिसे धन और कीर्ति की लालसा नहीं है,वही अन्य की अपेक्षा उत्तम कार्य कर सकता है।

    ख़ैर, इस  चुनाव के बाद दुबारा कोई इलेक्शन अरुण दा भी नहीं जीत सकें,क्योंकि जीवन में सुनहरा अवसर सदैव नहीं आता है। फिर भी उन्होंने अपने कार्यकाल में जनहित में जो कार्य किये,उसका गुणगान आज भी होता है।  किसी भी इंसान को उसका यही व्यक्तित्व और कृतित्व  अमरत्व प्रदान करता है।

---व्याकुल पथिक






Wednesday, 2 September 2020

मोक्ष



मोक्ष
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(जीवन के रंग)

   बचपन से ही वह सुनता आ रहा है कि जैसा कर्म करोगे-वैसा फल मिलेगा , किन्तु अब जाकर  इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि पाप-पुण्य की परिभाषा सदैव एक-सी नहीं होती है। बहुधा उदारमना व्यक्ति को भी कर्म की इसी पाठशाला में ऐसा भयावह दंड मिलता है कि उसकी अंतर्रात्मा यह कह चीत्कार कर उठती है - " हे ईश्वर ! मेरा अपराध तो बता दे।" और प्रतिउत्तर में ज्ञानीजन कहते हैं -" तुम्हारा प्रारब्ध !" जिसके विषय में हमें कुछ भी नहीं पता..!!

   आज इस मलिन बस्ती के खंडहरनुमा मकान के बदबूदार बरामदे में जिस वृद्धा का निर्जीव शरीर पड़ा हुआ था, उसके साथ भी नियति ने कुछ ऐसा ही तमाशा किया था। उसकी मौत पर आँसू बहाने वाला कोई न था। मुहल्लेवाले उसकी काया को सद्गति देने की शीघ्रता में थे।शहर के उस छोर पर रहने वाले वृद्धा के पुत्र को सूचना भेजी गयी थी। बेटा नालायक ही सही किन्तु मुखाग्नि देने का अधिकार तो उसी का बनता है !

   मानव जीवन की यह कैसी विडंबना है कि जिस वृद्धा ने ताउम्र परिश्रम किया हो, बहुतों पर उसके उपकार रहे हों,लेकिन आखिरी वक़्त भाग्य ने उसे औरों के रहम पर छोड़ दिया था।  रबड़ी-मलाई वाला कुल्हड़ जिसने उसकी आत्मा को तृप्त कर मोक्ष प्रदान किया था, वह भी उसे  किसी ग़ैर ने ही दिया था। उसकी मृत्यु के समय मुख में तुलसी-गंगाजल डालना तो दूर आस- पास कोई न था। आज सुबह उसका निर्जीव शरीर देख सभी ने उसकी मुक्ति पर संतोष प्रकट किया था।

     दीनू भी वहीं ख़ामोश खड़ा था। उसका संवेदनशील हृदय वेदना से कराह उठा था । वह आसमान की ओर निगाहें उठा कर सवाल करता है- " क्या इसीलिए तुझे दीनबंधु कहा जाता है !" उसके मानसपटल पर इस वृद्धा को लेकर अतीत से जुड़ी अनेक घटनाएँ ताजी हो गईं।

    जिस बुढ़िया के कफ़न के लिए ये सभी आपस में चंदा कर रहे थे, उसे कभी परांठेवाली काकी के नाम से पुकारा जाता था। जिसकी मशहूर दुकान के गरमागरम आलू के परांठे इतने स्वादिष्ट होते थे कि दिन चढ़ते ही ग्राहकों की कतार लग जाती थी। दीनू का परिचय उससे तब हुआ था, जब वह पहली बार दस पैसा लेकर उनकी दुकान  पर रसेदार तरकारी लेने गया था। वह उसके दादी की उम्र की थी। तनिक सकुचाते हुये उसने दस का सिक्का और गिलास उसके सामने बढ़ाया था। 
    अच्छे पोशाक में खड़े इस बालक को विस्मित नेत्रों से देख काकी ने परिचय पूछा था। "अच्छा, तो तू मास्टर का लड़का है !" और फिर गिलास भर तरकारी उसे थमाते हुये पैसा वापस करने लगी। " नहीं ,आप इसे रख लो ,मम्मी डाँटेगी।" बच्चे ने दृढ़तापूर्वक कहा था। "अच्छा ठीक है रे ! पर क्या मैं तेरी दादी जैसी नहीं ?"

   दीनू के परिवार के लिए वह सबसे बुरा दौर था। उसके पिता दिन भर चप्पल घिसते फिरते और शाम को उसकी माँ को यह चिंता खाये जाती कि सूखी रोटी कैसे पति के सामने रखी जाए ? पापा के लिए परांठे की दुकान से मसालेदार सब्जी लाने का सुझाव दीनू का ही था। घर की परिस्थिति देख वह समय से पहले होशियार जो हो गया था।

   एक दिन परांठेवाली दादी ने उसकी माँ से कहा -"बहू, मैं तो गँवार हूँ। हो सके तो मेरे पोते को अपने घर बुला लिया कर।तेरे बेटे के साथ कुछ पढ़ने-लिख लेगा ।" अपने पोते को गिनती-पहाड़ा रटते देख काकी दीनू को ढेरों आशीर्वाद देती। मानो उसके अरमान को पर लग गये हों। दो परिवार एक-दूसरे के करीब आ गये थे। एक के पास धन था,दूसरे के पास विद्या।

   वक़्त ने अचानक करवट लिया और फिर काकी की खुशहाल दुनिया में भूचाल-सा आ गया। वर्षों पुरानी उसकी दुकान खाली करा ली गयी। वह आँचल पसार दबंग भूस्वामी के पाँव पकड़ गिड़गिड़ाती रह गयी । उसे बनारस जैसे शहर की इस बड़ी मंडी में नयी दुकान नहीं मिली। आजीविका के लिए बेटा-बहू नगर के बाहरी इलाके में जा बसे। नयी जगह पर धंधा चला नहीं ,तो वे दोनों काकी पर बरसते। इंसान हर दुःख सह लेता,अपनों का तिरस्कार नहीं।

     मन कठोर कर काकी अपने पुराने मुहल्ले में आ गयी। यहाँ आकर उसे बोध हुआ कि दुनिया तो पैसे की है, जब धन नहीं तो आत्मसम्मान कैसा ? अब उनके प्रति सभी का दृष्टिकोण बदल गया था। पेट पालने के लिए उसने एक चबूतरे पर  बैठ वर्षों टॉफी-बिस्कुट बेचा था। उम्र के साथ-साथ उसके जीवन में अंधकार बढ़ता जा रहा था। उसका परिवार और स्वप्न दोनों बिखर गया था । मानो ग़रीबी और बेबसी की जिंदा तस्वीर हो वह। काकी को इस हाल में जब भी  दीनू देखता उसका कलेजा धक से रह जाता, किन्तु उसमें दयाभाव दिखलाने के सिवा कुछ भी मदद करने का सामर्थ्य न था। ऐसी स्थिति में उसे अपनी दीनता पर लज्जा आती।

   पिछले कुछ दिनों से काकी इसी बरामदे में टूटी खाट पर निःसहाय पड़ी हुई थी। अतिसार की बीमारी ने उसके तन को निचोड़ लिया था। उसकी साँसें मंद पड़ती जा रही थीं। आसपास अपना कोई न था। मन को दिलासा देने के लिए   वह अपने सुनहरे अतीत को याद कर रही थी। पति के मृत्य शोक को किनारे कर उसने कितने जतन से अपने पुत्र मोहन को पाला था। दिन-रात छाती फाड़कर काम करती थी। नाते-रिश्तेदार से लेकर मुहल्ले-टोले वालों के दुःख-दर्द में भी कभी पैसे से मदद में पीछे न हटती। जिसका यही फल मिला उसे ? धीरे-धीरे उसके तन की पीड़ा पर मन की वेदना भारी पड़ती जा रही थी।

     जिन नाती-पोते के लिए रात में पड़ोस की दुकान से रबड़ी-मलाई भरे कुल्हड़ घर लेकर आती थी, आज जब वह बेसुध खाट पर पड़ी है तो इन सभी की आँखों का पानी मर गया है। किसी ने नहीं सोचा कि बुढ़िया क्या खाती है ?  वृद्धावस्था में स्वादेन्द्रिय कम विद्रोह नहीं करती है । रबड़ी-मलाई की याद आते ही काकी के साथ भी कुछ ऐसा हो रहा था। वह अपनी अन्य पीड़ा को भूल स्वादेन्द्रिय की गुदगुदाहट के वशीभूत हो जाती है । "आह ! कितनी स्वादिष्ट मलाई थी। काश ! कोई हितैषी होता जो उसकी आत्मा को तृप्त कर देता।"  मलाई का स्वाद उसे बेक़ल किये हुये था। जिस पर नियंत्रण पाना उसके बस में नहीं जान पड़ता था। "हाँ, दीनू से कह के देखूँ।और किसी से कहने में तो लज्जा आएगी। कहीं झिड़क न दें मुहल्लेवाले कि इस बुढ़िया को देखों आँव पड़ रहा है और मलाई खाएगी।"

    काकी के इस बालहठ ने दीनू के हृदय को हिला कर रख दिया था। वह समझ गया था कि दीपक बुझने से पहले भभक रहा है। काकी के सूख चुके तन-मन में नवजीवन का संचार अब संभव नहीं था। .....उस रात दीनू दबे पाँव आया था। उसके हृदय में एक द्वंद जारी था। जिसे परे रख उसने अपने ही हाथों से स्नेहपूर्वक काकी को मलाई खिलायी थी। होठों पर जीभ फेर काकी ने गदगद स्वर में उसे जी भर के दुआएँ दी थी। उसकी आखिरी इच्छा जो पूरी हो गयी थी।  

      दीनू ने काकी को अमृत दिया अथवा विष  उसे नहीं पता। वह सिर्फ़ इतना जानता है कि उस कुल्हड़ भर मलाई ने उसकी परांठेवाली दादी की आत्मा को तृप्त कर दिया था। जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हो गया था। फिर कभी वह अपने पुत्र और पौत्र से मिलन के लिए नहीं तड़पेगी। मलाई के लिये नहीं तरसेगी। क्योंकि काकी जीवन का हर रंग देख इस निष्ठुर जगत से जा चुकी थी। उसे मोक्ष मिल गया था। 

    वह आर्द्र नेत्रों से काकी के उज्जवल पड़ चुके मुख को देखता है। जिसपर अद्भुत शांति थी। दीनू जीवन और जगत के इस रहस्य को समझ गया था कि आज जो राजा है कल वह भिखारी हो सकता है।जिसे यह बोध हो गया कि महल और मिट्टी का अस्तित्व एक ही है, वही सुखी है। तभी उसे वही चिरपरिचित आवाज़ सुनाई पड़ती है-राम नाम सत्य है..।

 - ©व्याकुल पथिक




    

Wednesday, 26 August 2020

फेरीवाला


फेरीवाला 
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      वही अनबुझी-सी उदासी फिर से उसके मन पर छाने लगी थी। न मालूम कैसे यह उसके जीवन का हिस्सा बन गयी है कि दिन डूबते ही सताने चली आती है। बेचैनी बढ़ने पर मुसाफ़िरख़ाने से बाहर निकल वह भुनभुनाता है-- किस मनहूस घड़ी में उसका नाम रजनीश रख दिया गया है ,जबकि उसके खुद की ज़िदगी में चाँद के खिलखिलाने का अवसर ही न आया हो । जीवन का यह पड़ाव उसे कचोट रहा है। "आखिर, किसके लिए जीता हूँ मैं ..?" किन्तु इस प्रश्न का उत्तर स्वयं उसके पास भी नहीं है।

      और तभी उसकी संवेदनाओं से भरी निगाहें उधर से गुजर रहे एक वृद्ध फेरीवाले पर जा टिकती हैं। वह बूढ़ा आदमी किसी प्रकार अपने दुर्बल काया, मन और प्राण लिये डगमगाते , लड़खड़ाते कदमों से उसी की ओर बढ़ा चला आ रहा था। उसके कंधे कपड़ों के गट्ठर के बोझ के कारण आगे की ओर झुक गये थे। झुर्रीदार पिचका हुआ चेहरा, आँखों के नीचे पड़े गड्ढे और माथे पर शिकन उम्र से कहीं अधिक मानो उसकी दीनता की निशानी हो। किन्तु वह मानव जीवन के उस संघर्ष का भी मिसाल है, जिससे परिस्थितियों के समक्ष अभी घुटने नहीं टेके हैं।

    चिलचिलाती धूप में दिन भर सड़कों पर पाँव घसीटते ,मुँह बाए गलियों में ग्राहकों को तलाशते हुये उसकी पिंडलियाँ बुरी तरह से दुखने लगी थीं।सड़क किनारे एक अतिथि भवन के चबूतरे को देख उसके बदन में थरथराहट हुई थी और वह धौंकनी-सी तेज होती अपनी साँसों को विश्राम देने के लिए धम्म से उस पर जा बैठता है। कंधे से गट्ठर का बोझ हटा वह चारदीवारी से सट कर अपनी पीठ सीधी करता है। अपने तलुओं को सहलाते हुये उस बूढ़े आदमी ने अपनी धुँधलाई आँखों से आसमान की ओर देखा था।
 मानो अपना अपराध पूछ रहा हो। सामने की दुकान पर कुछ लोग चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। यह देख बूढ़े ने भी अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाला था और फिर न जाने क्या सोच कर दाँत किटकिटाने कुछ बुदबुदाने लगता है। उसके उदास चेहरे के भाव में यकायक परिवर्तन देख रजनीश की उत्सुकता उसमें बढ़ने लगी थी । यूँ कहें कि उसकी पत्रकारिता कुलबुला उठी थी। किन्तु बिना संवाद के किसी के अंतर्मन को पढ़ना आसान तो नहीं होता ? औरों का दर्द वही समझ सकता है जो स्वयं भी उससे गुज़रा हो। 

     इस लोकबंदी ने रजनीश को भी फिर से पटरी पर ला खड़ा किया है। वर्षों की उसकी पत्रकारिता अब दो वक़्त की रोटी देने में भी समर्थ नहीं है। अक्सर छोटे संस्थानों में काम करने का यही हश्र होता है। किन्तु जहाँ कभी अपनत्व मिला हो, रोटी मिली हो, उसके प्रति मोह मानव स्वभाव है।उम्र के इस पड़ाव पर  इस संदर्भ में हानि-लाभ की चिन्ता कर वह अपने कष्ट को सिर्फ़ और बढ़ा ही सकता है, इसलिए रजनीश इस मानसिक पीड़ा से उभरने की कोशिश कर रहा है। वह ईश्वर को धन्यवाद देता है कि उसके पास कुछ पैसे हैं ...और उस होटल के मालिक को भी जहाँ उसने शरण ले रखी है। अन्यथा आज इसी बूढ़े फेरीवाले की तरह वह भी दर-दर भटकते रहता ।

     परिस्थितियों में समानता ने रजनीश को उस फेरीवाले के और करीब ला दिया था। उसने देखा   गट्ठर में बंधे गमछे और लुंगी को चबूतरे पर छोड़ वह बूढ़ा हैंडपंप की ओर बढ़ जाता है। प्यासे कंठ को तृप्त करते समय भी उसकी निगाहें अपनी अमानत (गट्ठर) पर जमी रहीं। खुदा का शुक्र है कि ग़रीबों के लिए अब भी मुफ्त में यह जल उपलब्ध है, अन्यथा इस पर भी बाज़ारवाद की मुहर लग चुकी है।

    फेरीवाला अब स्वयं को कुछ हल्का महसूस कर ही रहा था कि भगौने में खदकती चाय की खुशबू उसके घ्राणेंद्रिय में अनाधिकृत रुप से प्रवेश कर जाती है, जो उसके स्वादेन्द्रिय को विद्रोह के लिए बराबर उकसा रही थी। वह फिर से अपनी जेब को टटोलने लगता है। दिन भर के मेहनत-मशक्कत के बावजूद बिक्री के कोई दो सौ रुपये मुश्किल से उसके हाथ आये थे। संभवतः इसीलिए उसने अपनी चाय की तलब को बलपूर्वक रोक रखा था । " हे ईश्वर ! ये कैसी लाचारी है कि दिन भर चप्पल घिसने के बाद भी एक कुल्हड़ चाय इस वृद्ध को नसीब नहीं है !" यह देख रजनीश के हृदय में एक तड़प-सी उठती है कि फिर किस व्यवस्था परिवर्तन की बात चुनावों में हमारे रहनुमा करते हैं। इसीबीच चबूतरे पर रखे गट्ठर को खोल लुंगी और गमछे को तह करते समय फेरीवाले की नज़रें वहीं खड़े रजनीश से मिलती हैं।

   "क्यों चाचा,बाज़ार तो मंदा रहा होगा न ?" रजनीश स्वयं को रोक नहीं सका था और इसी के साथ दोनों के बीच वार्तालाप शुरु हो जाती है। बूढ़े ने उसे बताया कि उसका नाम सिब्ते हसन है और वह अकबरपुर का रहने वाला है। बाल बच्चेदार है, पर पेट तो सबका अपना है। लोकबंदी के बाद पहली बार वह धंधे पर निकला है। कोरोना के भय से कब तक बैठकर खाता। बच्चों को आस लगी रहती है कि अब्बा कुछ लेकर आएँगे, किन्तु यहाँ आकर बाज़ार का जो हाल देखा,उससे उसका दिल बैठा जा रहा है। क्योंकि इन दो सौ रुपये में उसका अपना मुनाफ़ा साठ रुपये ही है। इनमें से दस के नोट तो मुसाफ़िरख़ाने के बरामदे में रात्रि गुजारने के देने होंगे और फिर पेट की आग भी तो अभी शांत करनी है। वैसे, इस लोकबंदी के पहले वह जब भी इस शहर में आता था तो हजार-बारह सौ की बिक्री हो ही जाती थी,किन्तु इस बार घर वापसी के लिए भाड़े तक का पैसा नहीं निकला है।

      "तो और मुझसे क्या जानना चाहते हो आप ?" सिब्ते हसन अब धीरे-धीरे उससे खुलने लगा था। "मैं एक पत्रकार हूँ। कोराना काल में आप जैसे रोज कमाने-खाने वालों के दर्द से रूबरू होना चाहता हूँ। "अपनी मंशा स्पष्ट करते हुये रजनीश ने कहा था। 

    यह सुन बूढ़े के बदन में सिर से पाँव तक लर्ज़िश हुई थी।वह आसमान की ओर निगाहें उठा कर कहता है -" अबतक तो किसी तरह गुजारा हो गया ,आगे रब जाने ?" इस बार उसके स्वर में काफी वेदना थी। उसके पास जो थोड़ी बहुत पूंजी थी, उसे बीते साढ़े चार महीनों में घर में बैठे-बैठे खा चुका है।वह कहता है- " ठीक है कि सरकार इस संक्रमणकाल में हमें मुफ़्त में चावल दे रही है,किन्तु परिवार का ऊपरी खर्च भी तो है। बाल- बच्चों को ऐसे कैसे तरसते छोड़ दिया जाए ? आखिर सत्ता में बैठे नेता भी तो औलाद वाले हैं,क्या उन्हें हम जैसों पर जरा भी रहम नहीं है ?" सिब्ते दिल का गुबार निकाले जा रहा था।

    "अरे साहब ! उनके साहबज़ादे तो कैफ़े-रेस्टोरेंटों में हजारों ऊपरी उड़ा देते हैं और हम हाड़ तोड़ मेहनत करने वाले ग़रीब-गुरबे अपने बच्चों को गोश्त का एक टुकड़ा तक नहीं दे पा रहे हैं। लानत है हमपर और ऐसी व्यवस्था पर ...।" हर एक बात एक आह -सी बन निकलती रही थी उसकी जुबां से।

     रजनीश को ऐसा लगा कि मानो ऐसे श्रमजीवियों की यह ' आह ' ज्वालामुखी में बदलने ही वाली हो , न जाने कब इनमें से लावा फूट पड़े और एक नयी क्रांति को जन्म दे। इस नयी व्यवस्था में इन्हें समानता का अधिकार प्राप्त हो, किन्तु सियासतबाज कम चालक नहीं होते, वे हर बार आमचुनाव में जातीय-मज़हबी ढोल बजा कर इन्हें बरगला ही लेते हैं और यह ज्वालामुखी फिर से ठंडा पड़ जाता है।

         आज पूरे दिन इस शहर में जब वह बौराया-सा घूमता रहा तो उसने महसूस किया कि वह सच में बूढ़ा हो गया है। इन साढ़े चार महीनों में सड़क पर पैदल चलने का अभ्यास क्या छूटा कि उसके बदन पर बुढ़ापे का जंग लगते देर न लगी। वह कहता है- "जब तक काम पर निकलता था मेरा शरीर रवा था,लेकिन आज तो पाँवों ने बिल्कुल जवाब ही दे दिया है। " अब दुबारा मीरजापुर में वापसी कब होगी , यह उसे भी नहीं पता। और जब धंधा है ही नहीं तो क्यों यहाँ आकर अपनी हड्डियाँ तोड़ता फिरे..।
  
      वैसे तो सिब्ते आजम धंधे के लिए बनारस और जौनपुर भी जाता रहा है, किन्तु मिर्ज़ापुर से उसका जुड़ाव-सा हो गया है। वह कहता है कि अन्य बड़े शहरों में लूटमार है,बेअदबी है और यह जिला अब भी अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए मशहूर है। यहाँ लोगों के दिल में मुहब्बत है, जो उस ग़रीब को भी ' मौलाना ' कह के बुलाते हैं।  वह कहता है कि खाना और भाड़ा बनारस जैसे शहरों में सस्ता है और व्यवसाय भी ठीक ही हो जाता है,परंतु अदब से बात करने वाले लोग यहाँ की तरह वहाँ नहीं हैं। उसकी बातों से लगा कि वह खुद्दार इंसान है।अपने धंधे में भी मुनाफ़ा उताना ही लेता है, जितना वाजिब है। जैसे देश भर की ईमानदारी का जिम्मा सिब्ते जैसे मेहनतकश लोगों ने ही ले रखा हो।

     इस शहर में वह तब से आ रहा है, जब  मुसाफ़िरख़ाने का किराया चार-पाँच रुपये हुआ करता था और अब यह बढ़ कर साठ हो गया है। इसलिए उसे गंदगी से पटे इस अतिथिगृह के बरामदे में ही रात काटनी पड़ती है। अतिथिगृह क्या इसे कूड़ाघर ही समझें,क्योंकि यहाँ सिब्ते आजम जैसे ग़रीब मुसाफ़िर जो ठहरते हैं। शहर में स्वच्छता अभियान की डुगडुगी बजाने वाले जनप्रतिनिधियों की दृष्टि न जाने क्यों इसके बदबूदार शौचालय की ओर नहीं गयी है !  मच्छरों का गीत सुनते हुये यह बूढ़ा फेरीवाला एक और रात यहीं गुजारने को विवश है। और हाँ, मुनाफ़े के साठ रुपये में से दस तो ऐसे ही चला गया, शेष बचे पचास जिसमें रात का खाना और सुबह वापस अकबरपुर जाने के लिए वाहन के भाड़े की व्यवस्था करना है। वह हाईवे पर खड़ा होकर किसी ट्रक वाले से मिन्नत करेगा, क्योंकि बस की यात्रा आज उस जैसों के लिए सपना है। किन्तु उसे अपने कष्ट की नहीं फिक्र इस बात कि है कि उसे खाली हाथ देख अपनों की वह उम्मीद टूट जाएगी,जिसके लिए वह इस शहर में आया है।  

    ख़ैर, भारी मन से रजनीश से विदा लेते हुये वह कहता है- " आप भले आदमी जान पड़ते हो, जो मुझ जैसों में भी आपकी रूचि है। आपसे बात करके मन कुछ हल्का हुआ है,अन्यथा आज का दिन तो मेरे लिए बहुत तकलीफ़देह रहा।"

     रजनीश यह जान कर स्तब्ध है कि रंगीन कपड़ों को बेचने वाले की ज़िंदगी कितनी बदरंग है।वह मोबाइल फोन निकाल फेरीवाले से उसका एक फ़ोटो लेने की इजाजत मांगता है। यह देख उत्सुकतावश सिब्ते उससे पूछता है- "आप जो छापोगे, क्या उसका कुछ लाभ मुझ जैसों को  मिलेगा ?" यह सुन फिर से रजनीश का मन तड़प उठता है, वह अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुये कहता है -" बड़े मियां , मैं तो एक मामूली पत्रकार हूँ, तुम्हारी समस्या से बस अख़बार का पन्ना रंग सकता हूँ, इससे अधिक मुझमें कुछ भी सामर्थ्य नहीं है। " अच्छा, खुदा हाफिज़ ..! और फेरीवाला आहिस्ता-आहिस्ता मुसाफ़िरख़ाने की ओर बढ़ जाता है। उन दोनों में फ़र्क़ इतना है कि सिब्ते को सिर्फ़ एक रात अतिथिगृह में गुजारनी है और रजनीश को ताउम्र। 

      लेकिन कुछ अनसुलझे प्रश्न रजनीश का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं ----- ऐसे मेहनती लोग जिन्होंने कभी किसी को दबाने-सताने का प्रयास नहीं किया, उन्हें किस बात की सज़ा मिली है? क्यों मिल रही है ? इन मेहनतकश लोगों की ये कैसी भाग्य-रेखा है? क्या यह इनके पिछले जन्मों के कर्म का परिणाम है अथवा इसके लिए हमारी सामूहिक अर्थव्यवस्था दोषी है ? ग़रीबी से मुक्ति के लिए क्या ये इसीप्रकार ताउम्र छटपटाते रहेंगे ? है कोई मसीहा जिसकी आँखों में इनके लिए इंसाफ़ हो? तो क्या यही ईश्वरीय न्याय है...!!!
            - व्याकुल पथिक


Wednesday, 19 August 2020

सज़ा

सज़ा
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     पौ फटते ही उस मनहूस रेलवे ट्रैक के समीप आज फिर से भीड़ जुटनी शुरू हो गयी थी। यहाँ रेल पटरी के किनारे पड़ी मृत विवाहिता जिसकी अवस्था अठाइस वर्ष के आस-पास थी, को देखकर उसकी पहचान का प्रयास किया जा रहा था। सूचना पाकर पुलिस भी आ चुकी था।
मृत स्त्री के चम्पई रंग वाले मुखड़े पर जिस किसी की भी दृष्टि पड़ती उसका हृदय करुणा से भर उठता था। माथे पर बड़ी-सी लाल बिंदी,गले में मंगलसूत्र , नाक में कील और टब्स पहने रखे वह किसी अच्छे घराने की लग रही थी। किन्तु मृत्यु के बाद भी उसके शांत मुख पर एक दर्दभरी कहानी थी। वहाँ जुटी भीड़ ट्रेन से कटने का सवाल भी और आकलन भी कर रही थी।

    लाल वस्त्रों में लिपटी मृतका के सिर के पिछले हिस्से से लहू का रिसाव हो रहा था, जिससे आसपास की जमीन लाल हो गई थी । सिर में लगी इस चोट के अतिरिक्त उसके शरीर पर अन्यत्र घाव नहीं थे। जिसे देख कर ऐसा महसूस हुआ कि नगर के इस सुसाइड प्वाइंट पर मरने से पहले वह जान देने की विवशता से विचलित हुई होगी । जिस कारण वह रेलगाड़ी के समक्ष छलांग लगाने का साहस नहीं जुटा सकी थी किन्तु फिर भी इंजन के धक्के ने उसके जीवन की इहलीला को हमेशा के खत्म कर दिया। जिसके लिए वह गहरी रात घर से दबे पाँव मृत्यु के लिए ही निकली थी। 

    उसने अपनी पहचान के लिए कोई पत्र अथवा सुसाइड नोट नहीं छोड़ रखा था। लाश देखते ही झल्लाते हुये दरोगा ने सिपाही से कहा था-" यार ! क्या मुसीबत है ? लोग यहीं आ क्यों कट मरते हैं ?" यदि शिनाख़्त नहीं होती तो रेलवे पुलिस पूर्व में इसी रेलवे ट्रैक पर मिले कुछ अन्य लाशों की तरह इस मृत महिला के शव का भी पोस्टमार्टम कर फाइल बंद कर देती। परंतु निकटवर्ती मुहल्ले की होने के कारण शव की पहचान हो गई। 

    जैसे ही उसके द्वारा आत्महत्या करने की सूचना ससुरालवालों के माध्यम से उसके मायके तक पहुँची वज्राघात-सा हुआ था उनपर। रक्षाबंधन पर्व से पूर्व ममता का भाई उसके ससुराल आया था। तभी उसने अपनी इकलौती बहन की डबडबाई आँखों में छिपी वेदना को पढ़ लिया था। वह अपनी लडली बहन को कुछ दिनों के लिए साथ ले जाना चाहता था, ताकि उसमें नव जीवन का संचार हो सके। उसके इस प्रस्ताव को जब ससुरालवालों ने इंकार किया तो भाई संग मायके जाने के लिए ममता ने भी हाथ-पाँव जोड़े थे, फिर भी उसकी सास का कलेजा नहीं पसीजा । और तो और उसके दोनों मासूम बच्चों को माँ की ममतामयी आँचल से दूर कर उन्हें मामा के साथ ननिहाल भेज दिया गया। 

   ऐसा होते देख ममता ने रुँधे कंठ से इसका विरोध किया था। उसे यह बात बिल्कुल भी नहीं समझ में आ रही थी कि जब वह स्वस्थ हो चुकी है, तब भी उसके अपने ही सगे-संबंधी इस प्रकार  उसे अछूत क्यों समझ रहे हैं। उसे किस अपराध की सज़ा मिल रही है ?

      ममता को कुछ दिनों पूर्व कोरोना हुआ था। पूरे चौदह दिन वह अपनों से दूर आइसोलेशन सेंटर में पड़ी रही। कोविड अस्पताल जाते वक़्त उसे सांत्वना देना तो दूर पुराने विचारों वाली उसकी बूढ़ी सास ने उसे कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ रखा था। उसने भरे मन से एम्बुलेंस में पाँव रखा  ही था कि तभी पीछे से सास कि कर्कश गर्जना सुनाई पड़ती है। वह कह रही थी-"यह अभागिन सबके लिए संकट बन गयी है। पता नहीं कहाँ से बीमारी उठा लाई है। ख़बरदार  जो इससे मिलने अस्पताल में कोई गया, नहीं तो सबको महामारी दे देगी यह।"  सास के  इस कटु-वचन ने रोग से उसके बीमार तन से कहीं अधिक कोमल मन पर प्रहार किया था। तब जाते-जाते उसने अपने पति देवांश की ओर आशाभरी निगाहों से देखा था ,परंतु उसने भी  उपेक्षात्मक रुख अपनाया

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   आइसोलेशन सेंटर से 14 दिन बाद निकल कर जब ममता वापस घर लौट रही थी । उसे साँस लेने में अब भी कुछ कठिनाई हो रही थी, किन्तु अपने दोनों मासूम बच्चों की यादों में खोयी हुई थी। जिन्हें देखने के लिए उसकी आँखें तरस रही थी। ममता सोचा रही थी कि इस एकांतवास के पश्चात घर पहुँचते ही बच्चे माँ-माँ पुकारते हुये उसकी आँचल में आ छिपेंगे । स्वस्थ होकर फिर से सास, ससुर और पति की सेवा में जुट जाएगी।
  
    परंतु यह क्या ? उसके ससुराल लौटने पर  परिवार के सदस्यों ने उसका स्वागत नहीं किया। सभी उससे सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंस ) बनाए हुये थे। सास  ने चरणस्पर्श करने से मना कर दिया। पतिदेव नीचे अपनी दुकान पर आसन जमाये हुये थे। बच्चों को भी उसके निकट आने नहीं दिया गया और तभी दूर खड़ी ननद ने उसे पीछे वाली कोठरी में जाने के लिए इशारा किया। बिना रोशनदान वाले इस छोटे से कक्ष और उसमें रखे तख्त को देख उसका कलेजा बैठा जा रहा था। और तभी सास फिर से आग उगलते हुये कहा- "मेरी बात कान खोल कर सुन लो, इस कमरे के बाहर कदम मत रखना,जब तक हमें यह न लगे कि तुम पूरी तरह ठीक हो।" आइसोलेशन सेंटर से ममता को कोरोना मुक्त होने का प्रमाणपत्र मिलने के बावजूद ससुरालवाले पुनः संक्रमण फैलने को लेकर भयभीत थे। उसकी सास और ननद के लिए उसके आत्मसम्मान पर चोंट पहुँचाने का यह सुनहरा अवसर था। अब इस घर में कबाड़ रखने वाली कोठरी में उससे बात करने वाला कोई नहीं था। स्नेह न सही उसके प्रति दयाभाव का प्रदर्शन भी नहीं किया जा रहा था। वह अकेली पड़ी दीवारों से बातें करती या सिसकती रहती थी। इसके बावजूद  सास की अविश्रान्त कैंची उसके नाज़ुक दिल पर चलती रही। वह दरवाजे से दूर खड़ी हो उसे ताना  देती -"इस महारानी को जरा देखों, कैसे आराम से खांट  तोड़ रही है।चौका -बर्तन के लिए हम माँ-बेटी तो हैं ही। ऊपर से इसके शरारती बच्चों ने नाक में दम कर रखा है।"

   तनिक-सी भूल हुई नहीं की वे दोनों उसके बच्चों का गाल लाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं। यह देख वह स्वयं से सवाल करती कि विवाह के पश्चात पिछले सात वर्षों से जिन ससुरालवालों की इच्छापूर्ति के लिए उनकी उँगलियों के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचती रहती ,वे ही आज इतने निष्ठुर कैसे हो गये हैं ? फोन पर उससे बातचीत के दौरान भाई को ममता की पीड़ा का आभास हो गया था, इसीलिए वह उसे अपने साथ ले जाने के लिए बहन के ससुराल आया था। किन्तु उसकी सास ने बड़ी चतुराई से बच्चों की उनकी सुरक्षा का हवाला देकर  मामा के साथ जाने दिया, परंतु ममता को नहीं जाने दिया । बहू की भवनाओं से सास संभवतः परिचित हो गयी थी कि यदि इसे खरी-खोटी सुनाती रहेगी तो वह सदा-सदा के लिए घर का पिंड छोड़ देगी, क्योंकि वह कोरोना को खतरनाक छुआ-छूत वाली बीमारी समझती थी। आखिर इसका अंततः असर हुआ भी। 

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     पुत्रों के जाने के पश्चात ममता बिल्कुल अकेली पड़ गयी थी। प्रियजनों के दुर्व्यवहार का संताप उसके मन-मस्तिष्क को कोरोना से भी घातक विषाणु की तरह चाट कर खोखला कर चुका था। इस हालात में भी उसपर दया करने वाला कोई नहीं था। तिरस्कार से उपजी वेदना ग्लानि में परिवर्तित हो गयी थी। उसे अपने जीवन से कोई आशा और उमंग शेष नहीं रह गया था।  एक दिन उसके चोट खाये हृदय में आतंकमय कंपन-सा हुआ था। उसकी आत्मा इस कैदखाने से मुक्त होने के लिए छटपटाने लगी थी। मोह का बंधन टूट चुका था।  अनुकूल वातावरण मिलते ही नकारात्मकता रुपी काली परछाई 'कोरोना' बनकर उसे दबोचने के लिए प्रगट हो जाती है। यह देख भय से आँखें बंद करते ही, वह उस शैतान के काले जादू के वशीभूत हो जाती है।तब इस कोठरी में एक ही आवाज़ गूँज रही थी- "ममता ! जब किसी को भी तेरी जरुरत नहीं है। प्रियजन भी तेरे संग आत्मीयतापूर्ण व्यवहार नहीं कर रहे हैं,तो तू मर क्यों नहीं जाती ?"

    धीरे-धीरे ममता का चेहरा अत्यंत कठोर होता गया। उसे लगा कि सारा दोष उसका और उसके प्रारब्ध का है। उसने अपने लिए सज़ा निश्चित कर लिया था और इसका प्रायश्चित करने के लिए उसी रात वह घर से निकली तो मौत उसके साथ हो गई । जिस स्त्री ने घर के बाहर पाँव तक नहीं रखा था, वह न जाने किस प्रकार शहर के दूसरे छोर पर स्थित इस सुसाइड प्वाइंट पर जा पहुँची थी । 
  
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   पोस्टमार्टम के पश्चात ममता का शव घर पर आ चुका था। अंतिम संस्कार की औपचारिकता पूर्ण की जा रही थी। उसके आभागे बच्चों को लेकर मायके वाले भी आ चुके थे। जिनके करुण-क्रंदन से वातावरण ग़मगीन हो उठा था। ससुराल पक्ष की महिलाएँ भी अपनी आँखों पर रुमाल अथवा आँचल रख नाक सुरसुराने लगी थीं ताकि मुहल्ले-टोले को लोगों को यह लगे कि बहूँ की मौत से वे भी अत्यंत दुःखी हैं। ममता के इस तरह से ट्रेन से कट मरने से समाज में उनकी प्रतिष्ठा को कहीं आघात न पहुँचे , दिखावे के लिए हर व्यवस्था सास-ननद ने कर रखी थी। उसका पति किंकर्तव्यविमूढ़ बना खड़ा था।

 अब उसकी अर्थी सज चुकी थी। वापस घर लौटते समय हर कोई मेहता परिवार को कोस रहा था। लोग आपस में गुफ्तगू कर रहे थे-

    "हे ईश्वर ! इस दुखिया को किस बात की सज़ा दी है। कितनी कुशांगी थी बेचारी। सिर पर साड़ी का पल्लू रखे बिना कभी बारजे से झाँकती न थी।" पहले ने कहा था। "हाँ, साहब ! बिल्कुल गऊ थी । सुनने में तो यही आ रहा है , जब से उसे कोरोन हुआ था,मेहता परिवार का हर सदस्य उसके पीछे पड़ गया था। " दूसरे ने अपनी बात रखी। " राम-राम ! कितना बुरा हुआ  उसके साथ। कैसी मृदुल मुस्कान थी उसकी। घर में कोई मेहमान आ जाए तो अतिथि सत्कार के लिए एक पाँव से खड़ी रहती थी। " तीसरा भी टपक पड़ा था।" हाय रे! कैसी कर्कशा स्त्री है यह बुढ़िया, अपनी बहू पर तनिक भी रहम नहीं आया। काश ! उसे मायके भेज दिया गया होता, तो जान बच जाती । " वापस लौट रही पड़ोस की काकी की संवेदना भी फूट पड़ी थी ।

     इनको इस प्रकार से ताना मारते देख ममता के पति देवांश को अब वहाँ और ठहरना कठिन प्रतीत हो रहा था। देवी स्वरूपा पत्नी द्वारा इस प्रकार से आत्मघात करने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने उसके असंवेदनशील हृदय को भी झकझोर कर रख दिया। उसकी सुप्त अंतरात्मा चीत्कार कर रही थी । उसके विवेक ने उसे पूरे घटनाक्रम पर दृष्टि डालने के लिए विवश कर दिया था। वह यह समझने का प्रयत्न कर रहा था कि इस कोरोना काल में यह सब क्या हो रहा है? कोरोना कोविड-19 न तो प्लेग जैसा खतरनाक महामारी है, जिससे अत्यधिक घबड़ाने की जरुरत है न ही वह एड्स जैसा भयावह रोग है,जिसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए  छिपाना पड़ता है।फिर यह कोरोना किस प्रकार से मनुष्य के सारे आत्मीय संबंधों को निगलता चला जा रहा है। यदि इसे संक्रमण से मृत्यु हो भी रही है, इनमें से अधिकांश लोगों को कोई न कोई अन्य रोग था। उसके केस हिस्ट्री को सामने लाना चाहिए, न कि उसे 'सामाजिक दूरी' बनाए रखने के लिए विवश किया जाए। 

       कुछ इसी प्रकार का चिंतन करते हुये देवांश का मन बदल जाता है । उसका देवत्व जाग उठता है। मामूली बीमारी को लेकर सर्वगुण सम्पन्न पत्नी को जिस तरह से यातना दी गयी, उसपर वह पश्चाताप करने लगता है । अचानक उसकी भृकुटि तन जाती है और  वह जोर से चींख उठता है- " हाँ, मैं हूँ दोषी । मेरी मति मारी गयी थी।किन्तु उनसे भी सवाल करो,जो हमें 'शारीरिक दूरी' की जगह 'सामाजिक दूरी' बनाने का पाठ पढ़ा रहे हैं। ये मीडिया क्या अँधी है ? उसकी भी तो इसमें भूमिका है ? हमसब यह कैसे भूल गये कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ..!" पत्नी को खोकर वह विक्षिप्त-सा हुआ जा रहा था। उसका अंतर्मन उसे धिक्कार रहा था, तो ऐसी परिस्थिति उत्पन्न क्यों हुई , इसपर प्रश्न भी कर रहा था।

    फिर इस अपराध के लिए सज़ा किसे मिलनी चाहिए.... ?

   --व्याकुल पथिक

15-8-2020

Wednesday, 12 August 2020


 माँ का रुदन
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      अरे ! ये कैसा रुदन है..? स्वतंत्रता दिवस पर्व पर उल्लासपूर्ण वातावरण में देशभक्ति के गीत गुनगुनाते हुये चिरौरीलाल शहीद उद्यान से निकला ही था कि किसी स्त्री के सिसकने की आवाज़ से उसके कदम  ठिठक गये थे। ऐसे खुशनुमा माहौल में रुदन का स्वर सुन चकित हो वह इधर-उधर देखने लगा था। उसने अपने कान उस ओर कर यह सुनने का प्रयत्न किया कि मन को विकल करने वाली यह आवाज़ किसकी है। और फिर जब पीछे पलट कर देखा तो स्तब्ध रह गया था चिरौरी । क्योंकि इसी उद्यान में अमर शहीदों की आदमकद प्रतिमाओं के समक्ष एक स्त्री बैठी हुई थी, जो कभी देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान करने वाले भारत माता के इन वीर सपूतों के मुखमंडल को  अपना सिर उठाकर गर्व से निहारती, तो कभी आँखें नीचे कर विलाप करती दिखी । उसकी वाणी में अथाह वेदना थी। मानों दर्द का समुंदर इस उपवन में उमड़ पड़ा हो। 

      चकित हृदय से वह स्वयं से प्रश्न करता है --अभी कुछ देर पूर्व ही तो इस उद्यान में अनेक राजनेता, अफ़सर और अन्य विशिष्टजन जुटे हुये थे। जिन्होंने इन शहीदों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के पश्चात शहीद स्तंभ के समक्ष आत्मनिर्भर भारत पर बड़ी-बड़ी लच्छेदार बातें कही थीं। झंडारोहण कर मुख्य अतिथि ने  'सबका विकास, सबको काम, सबका कल्याण और सबका साथ ' ऐसा उद्घोष करते हुये राष्ट्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराई थी। कैसा पावन वातावरण था ? जैसे लग रहा था कि गाँधी बाबा के सारे अनुयायी खादी धारण किये उनके सपने को साकार करने यहाँ आ पहुँचे हों। वर्ष में दो बार यह अद्भुत दृश्य इस उद्यान में अवश्य देखने को मिलता है।  देशभक्ति वाले गीत भी सुनने को मिलते हैं।

    किन्तु पंद्रह अगस्त के दिन इस पार्क में रोने की आवाज़ उसने इससे पूर्व कभी नहीं सुनी थी या यूँ भी कह लें कि उसने इस रुदन को सुनने का प्रयत्न ही नहीं किया था। उसके जीवन का अधिकांश समय तो अपनी शिक्षा की डिग्री लिये आजीविका की खोज में बड़े लोगों की चिरौरी करते गुजर गया है। और तभी से न जाने कैसे उसका नाम चिरौरीलाल पड़ गया है।कर्तव्यनिष्ठ हो कर भी आज़ाद भारत में वह स्वालंबी नहीं बन सका। जब भी सरकार बदलती, उसे लगता कि जैस रामराज्य आने वाला है,किन्तु चुनावी बुखार उतरते ही उस जैसे करोड़ों निम्न-मध्यवर्गीय लोगों की झोली खाली ही रह जाती है। जब स्वतंत्र राष्ट्र में भी लोकतंत्रीय शासन की व्यवहारिक क्रियाओं से देश के युवा नैराश्य की अवस्था में हों, उनकी शिक्षा का कोई मोल नहीं हो,तो ऐसी व्यवस्था अराजकता को जन्म देती है।

   वक़्त के थपेड़ों की मार सहते-सहते चिरौरीलाल का पौरूष अब थकने को है,किन्तु बेरोजगारी साढ़ेसाती बनी सिर पर चढ़ी हुई है । वह समझ गया था कि यह ग़रीबी किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत व्यवस्था का फल नहीं है, इसके लिए सामूहिक व्यवस्था दोषी है। हाँ,एक काम यह अच्छा हुआ है कि इस जीवन संघर्ष ने उसकी शुष्क संवेदनाओं के तंतुओं में स्पंदन ला दिया है, तभी इस उल्लास भरे दिन में भी इस स्त्री की अस्फुट-सी आवाज़ उस तक पहुँच पायी थी , अन्यथा समारोह समापन से लौट रहे अन्य किसी ने महिला के विलाप को नहीं सुना था । 

      ओह ! कितना दर्द है इस नारी के स्वर में ! उत्सुकतावश चिरौरी दबे पाँव वापस उद्यान की ओर बढ़ जाता है। और जहाँ वह विस्मयपूर्ण नेत्रों से उस महिला को देखता ही रह जाता है...!
" हाय ! यह कैसा अनर्थ है? ये तो अपनी भारत माता हैं ! आज़ के दिन इन्हीं का तो पूजन-वंदन देश का हर नागरिक करता है। और ये यहाँ आपने शहीद पुत्रों के समक्ष विलाप रही हैं।"  यह मार्मिक दृश्य देख भय से उसका हृदय काँप उठा था । इस स्थिति में माता से आँखें मिलाने का साहस नहीं जुटा पाता है। वह शहीद स्तंभ के ओट में छिपकर रुदन कर रही माँ भारती की बातें सुनने लगता है।

     उसने देखा भारत माता खुदीराम बोस की प्रतिमा से कुछ कह रही थीं। हाँ ,याद हो आया..इसी अमर क्रांति दूत की शहादत से जुड़ा यह गीत उसने ऐसे राष्ट्रीय पर्वों पर कोलकाता में अपने विद्यालय में सुना था । मात्र 19 वर्ष की अवस्था में खुदीराम आजादी के दस्तावेज़ पर सुनहरे अक्षरों में अपना हस्ताक्षर बना बढ़ गये थे , उस मंजिल की ओर जिसके समक्ष यदि अमृत कलश भी बेमानी है। बंगाल का हर शख़्स इस बालक के चरणों में नतमस्तक दिखा था उसे उस दिन। माँ भारती अपने इसी बलिदानी सपूत से रुँधे कंठ से शिकायत कर रही थी-- रे खुदी ! स्मरण कर जाने से पूर्व तूने अपनी माता से क्या वादा किया था, यही न..

 एक बार बिदाई दे माँ घुरे आशी।
आमी हाँसी- हाँसी पोरबो फाँसी,
देखबे भारतवासी ।

    पर देख न मेरे लाल ,आज जब देश आज़ाद है, तो तू नहीं आया, तेरे बलिदानी भाई-बंधु भी नहीं आए । और मेरे इस तिरंगे की डोर जिनके हाथों में हैं, वे सफ़ेदपोश जो तेरे उत्तराधिकारी बन बैठे हैं। वे ऐसे राष्ट्रीय पर्वों पर वैसे तो कितनी अच्छी बातें करते हैं। वे कहते हैं -- नये दौर में लिख देंगे मिल के नयी कहानी, हम हैं हिन्दुस्तानी ।  किन्तु  मंच बदलते ही गिरगिट के तरह रंग बदल लेते हैं। फिर शुरू हो जाती है जातिवाद,क्षेत्रवाद ,धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर नफ़रत की सियासत। मर जाती है इंसानियत। वे पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद का ढोल बजाकर देश की भोली जनता को छल रहे हैं। आज अवाम में ख़ासी कड़ुवाहट है। अपनी बादशाहत बचाने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं। सत्ता पाते ही ये राजनेता निरंकुशता का पर्याय बन जाते हैं। और अब तो माफ़िया भी माननीय बन कर मेरे तिरंगे को अपावन कर रहे हैं। जिनके शासन में मेरी बेटियों की अस्मत सुरक्षित नहीं है। दुराचारी मेरे आँचल को मैला कर रहे हैं। बोल,कैसे करूँ मैं अपने स्वाभिमान की रक्षा,जब देश की निर्बल जनता गाँधी जी के उन तीन बंदरों की भाँति अपने मुख, आँख और कानों को बंद किये हो ? क्या अहिंसा के पुजारी ऐसे ही होते हैं ?

    पुत्रों, तुम सभी ने मुझे फ़िरंगियों की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए खुशी-खुशी अनेक कष्ट सहे  थे । अपना सब कुछ मुझ पर न्यौछावर कर दिया था। और ये दौलत के पुजारी देश को बेच रहे हैं। अब तो मुझे भी नहीं पता कि इनमें से कौन जयचंद और कौन शकुनि है। कहाँ गये तुम्हारे जैसे पुत्र , जिन्होंने अपने पवित्र रक्त से भक्तिपूर्वक अपनी इस प्यारी भारतमाता के पाँव पखारे थे, किन्तु इन सफ़ेदपोशों में से कितने मेरे लिए रक्तदान किया है ? तुम्हारे मिशन का इन्होंने जनाज़ा निकाल दिया है। चाल, चरित्र, चिंतन जैसे आदर्श वाक्य इतिहास के पन्ने में दफ़न हो चुके हैं। 

      भारत माता कहती ही जा रही थीं-- क्या प्राचीन भारतवर्ष के मानचित्र में तूने कभी मेरी भव्य तस्वीर को देखा है ? क्या स्वतंत्र भारत में भी मैं वैसी ही हूँ ? और तो और ये मुझे इण्डिया कहने लगे हैं। क्या मैं इनके लिए माता नहीं रही ? खुदी, मेरी व्यथा-कथा को समझ रहे हो ? विचार और कार्य की स्वतंत्रता अवश्य ही मनुष्य को जीवन की उन्नति का मार्ग दिखलाता है, परंतु स्वतंत्रता का अर्थ स्वछंदता तो नहीं होता न पुत्र ?

    यह सब सुनकर चिरौरीलाल अश्रु से भरी माँ भारती की आँखों में झाँकने का साहस नहीं कर सका था।  ग्लानि से उसका हृदय विकल हो उठा था। किन्तु अडानी-अंबानी बनने की चाहत रखने वालों के इस देश में अब भगत सिंह बनना कौन चाहेगा ? वह भी नहीं..? अकस्मात उसे ऐसा लगा कि मानों अपनी दुखियारी माँ की चीत्कार सुनकर  इन शहीदों के मुखमंडल पर कठोरता छाने लगी हो। नाक के नथुने फड़फड़ाने लगे हों। नेत्र लाल अंगार हो गए हों।जैसे किसी सुप्त ज्वालामुखी ने मुँह खोल दिया हो। जिसमें से धुँआ निकल रहा था।
 उसे ऐसा लगा मानों ये प्रतिमाएँ कह रही हों-

  वक़्त गुलशन पे पड़ा तब तो लहू हमने दिया।
अब बहार आई तो कहते हो तेरा काम नहीं।।

       चिरौरीलाल से  इस उद्यान में और ठहरते नहीं बन रहा था। उसका दम घुटने लगा था । तभी उसकी चेतना ने आवाज़ लगायी --इससे पहले कि इनमें से लावा बहे , भाग चिरौरी.. भाग..।

-- व्याकुल पथिक
 ( 13-8-2020 )
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Wednesday, 5 August 2020

यादों की ज़ंजीर

 
  यादों की ज़ंजीर

    रात्रि का दूसरा प्रहर बीत चुका था, किन्तु विभु आँखें बंद किये करवटें बदलता रहा। एकाकी जीवन में वर्षों के कठोर श्रम,असाध्य रोग और अपनों के तिरस्कार ने उसकी खुशियों पर वर्षों पूर्व वक्र-दृष्टि क्या डाली कि वह पुनः इस दर्द से उभर नहीं सका है। फ़िर भी इन बुझी हुई आशाओं,टूटे हुये हृदय के आँसुओं और मिटती हुई स्मृतियों में न जाने कौन सा सुख है,जो उसे बिखरने नहीं देता है। वह जानता है कि ज़िदगी के सभी अक्षर फूलों से नहीं अंगारों से भी लिखे जाते हैं। संवेदनाओं को जागृत करने वाली ऐसी मार्मिक अनुभूति उसके लिए किसी दुर्लभ निधि से कम नहीं है।अब तो मनुष्य कृत्रिम जीवन का अभ्यस्त हो गया है, उसमें सहज प्रेम है कहाँ। फ़िर क्यों यही स्मृति आज़ उसके चित्त को पुनः उद्विग्न किये हुये थी ?

   " उफ ! यह मनहूस दिवस हर वर्ष न जाने क्यों मेरे उस घाव को हरा करने चला आता है,जिसे समय और विस्मृति ने भर दिया है।" --सिर को तकिए में धँसाते हुये भरे मन से बुदबुदाया था विभु। हाँ, यह दिन उसके लिए विशेष हो सकता था ,यदि कोई अपना समीप होता। ऐसे ख़ास अवसर पर वह बिल्कुल असहज हो उठता है, क्योंकि स्नेह की ही नहीं पेट की भूख भी शांत करना उसे कठिन प्रतीत होने लगता है । माँ की मृत्यु के पश्चात उसे अपने जन्मदिन पर बढ़िया व्यंजन खाने को नहीं मिला है। यूँ तो जेब में पैसे हैं,परंतु इच्छाएँ मर चुकी हैं। उसके हृदय में एक टीस सी उठती है, उन दिनों को याद कर के ।

    वैसे तो वह दिन भर मित्रों द्वारा भेजे ढेर सारे शुभकामना संदेशों में खोया रहा। परंतु ऐसे सुंदर  शब्दों से मनुष्य के उदर की क्षुधा तो शांत नहीं होती है , इसलिए शाम ढलते ही आत्माराम का रुदन शुरू हो गया था । पेट में चूहे उधम मचाने लगे थे। आज़ अपने अवतरण दिवस पर वह कुछ अच्छा भोज्य सामग्री मांग रहा था। उसकी यह गुस्ताख़ी विभु के लिए असहनीय थी। वह बूरी तरह से झुंझला कर कल के बचे हुये दो करेले उबाल लाता है। " चल अब खा इस कड़वे चोखे संग ये सूखी रोटियाँ, आज़ भी तुझे यही मिलेगा। सsss..ले ! मिठाई चाहिए न ?" -उसकी फटकार सुन आत्माराम किसी मासूम बच्चे-सा सहम उठता है । उदर की पीड़ा शांत होते ही कमरे की बत्ती बुझा कर वह धम्म से बिस्तर पर जा गिरा था और फ़िर से यादों ने उसे अपने आगोश में लेना शुरू कर दिया। वह कहता है-"  माँ ! काश तुम्हारे ही जैसा स्नेह करने वाला कोई और उसके जीवन में होता। किसी के हृदय में उसके लिए भी प्रेम होता। "  तेज गति से भाग रहे मन से वह क्यों बार-बार एक ही प्रश्न करता है-"उफ! ये यादें रात में ही क्यों इतना सताती हैं ! क्या किसी दुःखी इंसान के हृदय को कुरेदने के लिए इन्हें भी एकांत की तलाश होती है ?"

   तभी उसके मानसपटल पर चलचित्र की तरह अनेक स्याह-श्वेत दृश्य उभर आते हैं। और फ़िर वह बचपन की मधुर स्मृतियों में खोता चला जाता  है। माँ के जीवनकाल में अपने उस आखिरी जन्मदिवस की एक-एक बात उसे स्मरण होने लगी थी । इस सुखद अनुभूति ने मानों उसके तप्त हृदय पर ठंडे पानी की फुहार डाल दिया हो, किन्तु वह नादान यह कब समझेगा कि ये यादें उस जंजीर की तरह हैं, जिससे मुक्त हुये बिना आगे की यात्रा संभवः नहीं है। जीवन में कुछ ऐसे क्षण होते हैं ,जब मन के आगे मस्तिष्क का बस नहीं चलता है।

     विभु को माँ के हाथों से निर्मित नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों की याद आने लगती थी। तब घर में सुबह से ही कितना चहल-पहल रहती थी। बाबा ने टोकरी भर कर रजनीगंधा और गुलाब के पुष्पहार मंगा रखे थे। ठाकुरबाड़ी को ही नहीं, कमरे में जितनी भी तस्वीरें लगी होती थीं, वे सभी इस दिन इनसे सुशोभित होती थीं। देवी-देवताओं की मूर्तियों पर रोली और चंदन  लगाये जाते थे। रंग-बिरंगे झालर और गुब्बारों से दुल्हन की तरह कमरे और बारजे को सजाने की व्यवस्था का दायित्व स्वयं उसके नाजुक हाथों में होता था। अब तो यह सोच कर उसे विश्वास ही नहीं होता है कि इतनी छोटी-सी अवस्था में ऐसे जटिल कार्य वह कैसे कर लेता था !

      वो कहते हैं न कि उत्साह में कष्ट सहने की दृढ़ता के साथ ही कर्म में प्रवृत्त होने का आनंद भी होता है। इसीलिए उसकी अस्वस्थ माँ में इस दिन न जाने कहाँ से इतना साहस आ जाता था कि रुग्ण शैय्या का त्याग कर वे दिन भर भोजनालय में डटी रहती थीं। कारखाने का वह बूढ़ा नौकर बड़े से भगौने में दूध पहुँचा जाता था। आहा ! मेवे से निर्मित केशर युक्त खीर का स्वाद भला वह कैसे भूल सकता है ! पाकशास्त्र में माँ का मुकाबला करना उनके मायके और यहाँ ससुराल में ,किसी भी स्त्री के लिए संभव नहींं था। देखते ही देखते कांजी बड़ा, दही बड़ा और कैर-सांगरी की सब्जी वे तैयार कर लेती थीं। अतिथि कितने भी हो, द्रौपदी का यह भंडार खाली नहीं होता था। 

   उसके वैष्णव भक्त परिवार में बाज़ार से केक लाना संभव नहीं था। यह भ्रांति थी कि हर प्रकार के केक में अंडे का प्रयोग होता है। इसीलिए प्रसिद्ध बंगाली मिठाई संदेश और कैटबरी कोको पाउडर से निर्मित केक तैयार करने की ज़िम्मेदारी उस बड़े से तोंद वाले कारीगर को सौंपी जाती थी, जिसे वह हाड़ी दादू कहता था। शाम होते ही विभु नये वस्त्रों में खिलखिलाते हुये केक के मेज के समक्ष जा पहुँचता। माँ के हाथों से केक खाने का आनंद ही कुछ और था। उपहार और धन की तब भी उसे लालसा नहीं थी, लेकिन माँ के द्वारा बनाए गये व्यंजनों पर टूट पड़ता था। भोजन करते वक़्त उनके लाडले को किसी की नज़र न लगे , इस पर माँ का सदैव ध्यान रहता था।

   ऐसे खुशनुमा माहौल के मध्य पल रहे बालक को उस दिन यह कैसे अंदेशा होता कि यह शाम फ़िर कभी उसके किसी जन्मदिन पर लौट कर नहीं आएगी। वह तो ममता का सागर लुटाने वाली माँ के लाड़ और दुलार की थपकियों में खोया हुआ था। माँ और बाबा दोनों ही उसकी शिक्षा को लेकर गंभीर थे। अपनी कक्षा में प्रथम आने पर उसे विशेष उपहार मिलने वाला था। किन्तु क्रूर नियति ने उपहार की जगह उसकी माँ को ही छीन लिया। मरघट पर बहे उसके अश्रु फ़िर कभी नहीं मुसकाये। अपना ही आशियाना उसके लिए पराया हो गया था। आँखों में डोलते सपने भयभीत करने लगे थे। किसी अपने की खोज में मिले दुत्कार ने उसके कोमल हृदय की भावनाओं को जला कर राख कर दिया था। वह निस्सहाय-  हो गया था। उसके माथे पर ममत्व का चुंबन करने वाला कोई नहीं रहा।

    तभी विभु को आभास होता है कि इस धुप्प अंधेरे में एक डरावनी परछाई उसे घेरे जा रही है। यह देख उसकी बरसती आँखें भय से झपकने लगती हैं। वह रुँधे गले से मदद के लिए स्मृतिशेष उन सभी प्रियजनों को पुकारता है, जिनसे उसे अत्यंत स्नेह है, किन्तु इस बंद कमरे में उसे सिर्फ़ उस काली परछाई का अट्टहास सुनाई पड़ रहा था। मानों वह पूछ रही हो - " यहाँ मेरे सिवा,तेरा हैं कौन ?" यह भयावह परछाई और कोई नहीं उसका सुनहरा अतीत था। 

      वह जानता है कि मनुष्य स्मृति-लोभ से मुक्त हुये बिना आत्मोत्थान को नहीं प्राप्त कर सकता है,क्योंकि यह ज़ंजीर बनकर हमारे पैरों में लिपट जाती है,यदि हमें आगे बढ़ना है, तो इस क़ैदखाने से बाहर निकलना होगा, फ़िर भी उसके विवेक पर भावना भारी पड़ जाती है... और साथ ही यादों की जंजीर की जकड़न भी। 

    उफ! परिस्थितियों ने उसके जीवन को किस द्वंद्व में उलझा दिया है ! ...अब तो कोई अवलंबन तलाशो विभु ।

  - व्याकुल पथिक
    

Wednesday, 29 July 2020

आत्माराम

   
आत्माराम

      उसके घर का रास्ता बनारस की जिस प्रमुख मंडी से होकर गुजरता था। वहाँ यदि जेब में पैसे हों तो गल्ला-दूध , घी-तेल, फल-सब्जी, मेवा-मिष्ठान सभी खाद्य सामग्रियाँ उपलब्ध थीं।लेकिन, इन्हीं बड़ी-बड़ी दुकानों के मध्य यदि उसकी निगाहें किसी ओर उठती,तो वह सड़क के नुक्कड़ पर स्थित विश्वनाथ साव की कचौड़ी की दुकान थी, क्योंकि कचौड़ियाँ छानते वक़्त कड़ाह से निकलने वाली शुद्ध देशी घी की सुगंध उसकी स्वादेन्दिय को बेचैन कर दिया करती थी।अपनी इस स्थिति से उसे बोध हुआ था कि संयमित व्यक्ति के उदर की अग्नि भी अनुकूल अवसर मिलते ही भभक उठती है।


   यहाँ सुबह से ही ग्राहकों के कोलाहल के बीच कोई कचौड़ी बेलने तो कोई छानने और खिलाने में व्यस्त दिखता । बड़े-से कड़ाह में कनस्तर भर घी उड़ेल दिया जाता और फ़िर कचौड़ी और जलेबी बनाने केलिए चार-पाँच सहायकों संग हलवाई लग जाते थे। इस दुकान पर कचौड़ी खाने में इलाके के रईस व्यक्ति भी अपनी शान समझते थे।


     माथे पर तिलक-चंदन लगाये बिल्कुल प्रथम पूज्य गणेश देवता जैसे लंबोदर विश्वनाथ साव दुकान के दूसरे छोर पर गद्दी संभाले ग्राहकों से पैसा बंटोरने में व्यस्त दिखते। वे अपने इस कार्य में ऐसे निपुण थे कि दुकानदारी के वक़्त सगे-संबधी भी सामने आ खड़े हों तो उसे न पहचान पाए, किन्तु साव की काक दृष्टि इतनी पैनी थी कि कोई भी ग्राहक बिना पैसा दिये भीड़ का लाभ उठा यहाँ से खिसक नहीं सकता था। दुकान के इर्द-गिर्द खड़े होकर अथवा अंदर मेज पर बैठ चटखारे ले कर कचौड़ी खाते लोगों को देख कर रजनीश बुदबुदाता -" काश! उसके जेब में कुछ पैसे होते, ताकि वह भी इन ग्राहकों की टोली में सम्मिलित हो पाता।"


      सुबह के नाश्ते में कचौड़ी-जलेबी बनारसीपन की पहचान है। कड़ाह में छन-छन कर तैयार होती कचौड़ियों को देख वह मन ही मन कहता - " आहा! कितनी बड़ी-बड़ी,लाल-लाल और फूली-फूली ये गरमागरम देशी घी की कचौड़ियाँ हैं। उसकी क्षुधा  बस दो-तीन कचौड़ियों में ही तृप्त हो जाती और यदि साथ में दो-चार रसभरी ये कुरकुरी जलेबियाँ मिल जाती,तो क्या कहना। उसे अपनी दीनता पर तरस आता । घर पर उसके लिए दो वक़्त की चार सूखी रोटियों से अधिक कुछ नहीं था। पर व्यवसायहीन व्यक्ति से तो हितैषी भी चाय-जलपान नहीं पूछते हैं, पेट की अग्नि बुझ जाए यही काफ़ी है। क्यों वह इस मिष्ठान की दुकान पर दृष्टि डालकर अपनी क्षुधा और इच्छाओं को भड़कने देता है ?


  ऐसे विचार आते ही, स्वादेन्द्रिय विद्रोह करे इससे पूर्व रजनीश तत्क्षण सावधान हो जाता और स्वयं से कहता-" बंधु ! सुनो न.. खाने दो उन्हें कचौड़ी-पकौड़ी..ज़नाब ! जब पेट खराब हो जाएगा,तो लोटा लिये दौड़ते फिरेंगे..।"


     फ़िर भी हृदय की ऐंठन जब कम नहीं होती, तो वह उसे यूँ समझाता- " सुनो भाई ! तुमने भी तो अपने ननिहाल में अन्नपूर्णा का अनादर किया था। याद करो कोलकाता के तिवारी बदर्स और देशबंधु की मिष्ठान दुकान को, ऐसे बड़े प्रतिष्ठानों के सामान भी तुम्हें नहीं पसंद थे। माँ-बाबा न मालूम कितना मनुहार कर तुम्हें मूंग की कचौड़ी और लुची खिलाया करते थे।  तुम तो काजू बर्फी खाने तक में नखड़े दिखाते थे। "


   ओह ! तो क्या अन्न के इसी तिरस्कार का परिणाम था कि बनारस में बचपन से लेकर इस शहर से नाता टूटने तक उसके जेब में इतने पैसे कभी नहीं हुये कि वह विश्वनाथ साव की दुकान पर सुबह कदम रख पाता ? यह संताप रजनीश के हृदय की शीतलता को जलन दे रहा था।


   किन्तु आज़ उसकी तब आँखें फटी की फटी रह गयी थीं,जब उसने अपने छात्र जीवन के एक सादगी पसंद अध्यापक को यहाँ खड़े हो उँगलियों से मसालेदार तरकारी वाला दोना चाटते देखा था। देखते ही देखते मास्टर जी आठ कचौड़ियाँ गटक गये थे और अब जलेबी की बारी थी। 


   वे उसे दर्जा छह में हिन्दी पढ़ाया करते थे। अजी ! पढ़ाना क्या,उससे अधिक तो अपने शिष्यों को 'सादा जीवन , उच्च विचार ' का उपदेश देते थे वे। उस समय यह वित्तपोषण विद्यालय नहीं था । सो, यहाँ के शिक्षकों को मामूली तनख़्वाह से अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींचनी पड़ती थी। उस दौर में ट्यूशन से भी कोई खास कमाई नहीं होती थी। उसे भलीभांति स्मरण है कि गाँव से शहर में नौकरी की तलाश में आये मास्टर जी ने इमली की चटनी संग चावल खाकर दिन गुजारे थे। उन्हें अपनी ही एमo एo; बीएड की डिग्री हृदय में शूल सी चुभन देती। उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारती और सवाल करती - "मूर्ख! किसान पुत्र होकर भी हल की जगह क़लम थामने तुझसे किसने कहा था? अब देख, मास्टर जी कहलाने की यह ललक तेरी खुशियों पर भारी पड़ रही है।"


     किन्तु उनके चेहरे पर पड़ी दर्द की यह लकीर कभी इस सभ्य समाज को नज़र नहीं आयी।

रजनीश के पिता भी इसी स्कूल में पढ़ाते थे। माली हालत किसी भी शिक्षक की ठीक नहीं थी। सो ,प्राइमरी से लेकर जूनियर हाई स्कूल तक की कक्षाओं में इन गुरुजनों ने रजनीश को अध्यापक पुत्र समझ सदैव सादगी और संयमित जीवन का पाठ ही पढ़ाया था। 

      गुरुओं से मिले इसी ज्ञान का परिणाम रहा कि रजनीश ने अपने जिह्वा-स्वाद पर लगभग नियंत्रण पा लिया था।  किन्तु उसी विश्वनाथ साव की दुकान पर आज़ वर्षों बाद मास्टर जी को नये अवतार में देख बिल्कुल चौंक उठा था। वह विस्मयपूर्ण नेत्रों से उनमें आये इस परिवर्तन को देखता रहा। मास्टर साहब के चेहरे पर जो लालिमा थी, उसमें दर्प झलक रहा था। बाटा कम्पनी की चमचमाती महंगी चप्पलें पहने बादामी रंग के सफ़ारी शूट में खड़े गुरुजी के व्यक्तित्व में उसे ख़ासा बदलाव आ गया था । यह देख,वह समझ गया कि लिबास बदलने से व्यक्ति का रुतबा भी बदल जाता है । उसने बड़े गौर से गुरुजी को देखा, जो कचौड़ी, घुघरी और जलेबी ग्रहण करते हुये इस क़दर आनंदित हो रहे थे कि समीप खड़ा हर शख्स उनके लिए अजनबी था। 


    .ख़ैर,रजनीश दुकान के बाहर इस प्रतीक्षा में ठहर गया कि जब वर्षों बाद भेंट हुई है, तो क्यों न उनसे दण्ड-प्रणाम कर ले? सो, जैसे ही वे इस पटरी आते हैं,उसने उनका चरण स्पर्श कर अपना परिचय दिया। " अच्छा-अच्छा, तुम तो काफ़ी होनहार छात्र थे।" उन्होंने उसे बिल्कुल साधारण पोशाक और हवाई चप्पल में देख सहानुभूति जताई थी। फ़िर पूछा , "कुछ काम-धाम करते हो या नहीं, शायद तुम्हारी पढ़ाई भी अधूरी रह गयी थी।" उनके इस प्रश्न पर झेंप -सा गया था रजनीश।  क्या जवाब देता बेचारा ,यही न कि किसी निठल्ले की तरह अपने जीवन के अनमोल क्षणों को व्यर्थ कर रहा है। " अच्छा सुनों,मुझे विद्यालय जाना है।कल कम्पनी गार्डन में आकर मुलाकात करना ।" उसे चिन्तामग्न देख मास्टर जी ने कहा था। 


  ...और अगले दिन बाग में उसने मास्टर जी को  युवाओं की तरह उछल-उछल कर कसरत करते पाया । वे कभी बैजंती के अधखिले फूलों से ओस की बूँदों को हथेली पर उड़ेल उससे अपने नेत्रों को भिंगोते , तो कभी हरी घास पर तेज कदमों से चहलकदमी करने लगते थे। और जब ललाट पर स्वेद की बूँदें मुस्कुराने लगीं ,तो वे वहीं हरी घास पर आँखें मूँद विश्राम करने लगे थे।शीतल पवन बहने लगा था । जिससे बगीचे में लगे वृक्षों के पत्ते इस प्रकार कंपन करने लगे थे कि मानो वे दुनिया के सबसे सुखी व्यक्ति के सम्मान में पँखा झल रहे हो। तभी एक युवक आया, जिसने घंटे भर उनके शरीर पर तेल मर्दन किया।जिससे इस प्रौढावस्था में भी उनके अंग- प्रत्यंग में निखार-सा आ गया था। 


   उनके इस राजस सुख को देख वह चकित हृदय से सवाल कर रहा था-" क्या ये वही गुरुजी हैं, जिन्होंने कभी उसे सादगी से जीवन जीने का पाठ पढ़ाया था ?"  मास्टर जी के 'उपदेश और उपभोग' के अंतर के द्वंद में उलझता जा रहा था वह। तभी उसे उनकी पुकार सुनाई पड़ी - "अरे ! रजनीश आ गये ? चलो उस बेंच पर बैठकर बातें करते हैं !" अपने नित्य कर्म से निवृत्त हो कर मास्टर जी ने उस पर अपनी दृष्टि डाली । स्नेह की आँच पाकर वह मोम की तरह पिघलने लगा था।


     किन्तु गुरुजी के नेत्रों में उसके प्रति अपेक्षित करुण भाव नहीं दिखा , क्योंकि उनका दर्शन शास्त्र आज़ कुछ और बोल रहा था। उन्होंने कहा था - " सुनो रजनीश,  धन के बिना सारी विद्वता और योग्यता अंधकूप में पड़ी सिसकती रहती हैं। सो,आत्महीनता की अनुभूति से मुक्त होना चाहते हो तो पैसा कमाओ, अन्यथा शहर छोड़ किसी वन में शरण ले लो, मठ- आश्रम में चले जाओ, संयासी हो जाओ, कुछ भी करो, परंतु याद रखना निर्धन व्यक्ति के लिए इस सभ्य समाज में कोई स्थान शेष नहीं है। वह उपहास का पात्र होता है ।" तभी टोकरी में सेब लिये एक बूढ़े ने आवाज़ लगायी थी और बात अधूरी छोड़ वे उस ओर बढ़ चले थे ।


     ओह ! तो मास्टर जी ने आज़ उसे इस बगीचे में धन की महत्ता का पाठ  पढ़ाने के लिए बुलाया था ? तभी वे कह रहे थे कि यह दुनिया पैसे की है। पहले अपने 'आत्माराम' को तृप्त करो। 'राम' का क्या भरोसा, हर कोई 'दाम' मांगता है। पर एक दर्द जो उन्होंने  वर्षों से अपने सीने में  दबा रखा था, आज़ बातों ही बातों में फ़िर से उभर आया था। वह विद्यालय जिसमें उनकी योग्यता का डंका बजा करता था,उसी के दबंग व धनलोलुप प्रबंधक ने वित्तविहीन इस जूनियर हाईस्कूल के वित्तपोषित होते ही ,उनसे यहाँ शिक्षक बने रहने की शर्त पर मोटी रकम मांगी थी। स्तब्ध रह गये थे मास्टर जी! जिस शिक्षक धर्म के निर्वहन के लिए उन्होंने हर कष्ट सहा ,आज़ जब सुख के दिन आने को हैं, तो उनके ईमान की बोली लग रही है। चीत्कार कर उठा था उनका अंतर्मन और बदल गयी थी उनकी  सोच। 


     ख़ैर, नौकरी तो बचानी ही थी। सो, वे प्राइवेट स्कूल के अध्यापक की जगह वित्तपोषित विद्यालय के मास्टर साहब बन गये थे। अच्छा वेतन मिलने लगा, परंतु उनका पुश्तैनी खेत हाथ से निकल गया था। साथ ही उनका 'राम' भी इसी रिश्वत की ज्वाला में जल कर भस्म हो गया।  संवेदनाशून्य हो गये थे वे । स्वांतःसुखाय के अतिरिक्त उनके जीवन का और कोई ध्येय नहीं रहा।


      मास्टर जी ने अपनी अनुभूति की पाठशाला में फ़िर कभी किसी को सादगी और ईमानदारी का पाठ नहीं पढ़ाया। इस अर्थयुग में वे अपने शिष्यों को और धोखे में नहीं रखना चाहते थे। उन्होंने स्वयं को भी बदल लिया था। वे 'आदर्श' और 'यथार्थ' के मर्म को समझ गये थे, क्योंकि बिक गये खेत में उनका ' राम ' दफ़न हो चुका था और नौकरी बचाने के लिए दिया गया  रिश्वत  'आत्माराम ' बन अट्टहास कर रहा है।


                      -- व्याकुल पथिक